धर्म : प्रासंगिकता से जुड़े कुछ सवाल

एक

कुछ लोगों के लिए धर्म के विकल्प के बारे में सोचना भी कुफ्र हो सकता है. कुछ कहेंगे—‘घोर कलयुग!’ धर्म न रहा तो धरा कैसे टिकेगी. ऐसा कहते समय वे विज्ञान के सारे सिद्धांतों को किनारे कर देंगे. दुनिया के सारे ‘आइंस्टाइन’ और ‘स्टीफन हॉकिंग’ उनके तर्कों के आगे पानी मांगते नजर आएंगे. उनके लिए यह असंभव स्थिति है. वे मानते हैं कि धरती धर्म पर टिकी है. सृष्टि का एकमात्र कर्ता, सर्जक, पालनहार परमात्मा है. वही प्राणिमात्र को जन्म देता तथा समय आने पर वापस बुला लेता है. जीवन परमात्मा की धरोहर है. मनुष्य चाहे भी तो धर्म के बाहर नहीं जा सकता. ऐसे अतिविश्वासियों के सामने आप लाख नास्तिक होने का दावा करें, वे नहीं मानेंगे. आपकी ‘नास्ति’ को ‘आस्ति’ में बदलने के लिए वे घिसेपिटे अनगिनत तर्क देंगे. आप माने या न माने पर वे मानकर रहेंगे कि उन्होंने आपका ‘अज्ञान’ दूर करने की भरसक कोशिश की है. ऐसा क्यों होता है? क्या धर्म सचमुच विकल्पहीन है? क्या ईश्वर के बगैर दुनिया का काम नहीं चल सकता? क्या धर्म मनुष्य की अज्ञानता की सीमा है? अगर सभी लोग एक साथ धर्म को मानने से इन्कार कर दे, तब ईश्वर क्या करेगा? क्या वह कुपित होकर सृष्टि को मेटने की ठान लेगा? या अपने लिए चापलूसों की नई दुनिया रचने में लग जाएगा?

आस्थावादी यहां कह सकता है कि आदमी की क्या बिसात जो ईश्वर या उसके विश्वास को मेट सके. ईश्वर की भक्ति तो भाग्यशालियों को प्राप्त होती है. ईश्वर जिन्हें चुनता है, वही लोग भक्ति में सिद्धि प्राप्त कर पाते हैं. भक्ति कितनी हो, भक्त को समर्पण हेतु कितना और कहां तक अवसर दिया जाए, यह अधिकार भी आराध्य का है. ऐसे ईश्वर के आगे आदमी का अस्तित्व अखिल ब्रह्मांड में राई जितना भी नहीं है. आप कहते रहें कि यह सामंती सोच है. राजा को, पुरोहित को सर्वेसर्वा माननेवाली दृष्टि ही ईश्वर को सर्वेसर्वा बनाती है, ताकि उसके बहाने सामंती शक्तियां अपनी मनोरथसिद्धि कर सकें. सत्ता से चिपके लोगों का स्वार्थ धर्म को बनाए रखने में है. इसके लिए वे हर संभव कोशिश करते हैं. अपने लक्ष्य में प्रायः कामयाब भी होते हैं. इन सब बातों पर चर्चा बाद में, पहले यह जान लें कि धर्म आखिर है क्या? उसकी शक्ति का स्रोत क्या है? उसकी शुरुआत कब हुई? और आज के जमाने में उसका औचित्य क्या है? क्या धर्म सचमुच विकल्पहीन है? यदि नहीं तो धर्म जो सहस्राब्दियों से जीवन और समाज को अनुशासित करता आया है, का विकल्प कौन हो सकता है? इसके लिए हमें धर्म की प्रचलित परिभाषाओं से हटकर बात करनी होगी. इसलिए कि उन परिभाषाओं में स्वयं इतना घालमेल है कि उनसे धर्म की निर्विवाद छवि बन ही नहीं पाती.

अपने अनुयायियों के लिए धर्म न्याय का ‘मारग’ है. ऐसा मार्ग जिसे वे स्वयं तय नहीं करते. स्वयं तय करने का उन्हें अधिकार है भी नहीं. तय करता है ईश्वर; अथवा वह पुजारी जो स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि बताकर भक्त और ईश्वर के बीच अपना स्थान सदैव सुरक्षित रखता है—ऐसा वे मानते हैं. ईश्वर यानी आध्यात्मिक शक्ति. जो लोग उसकी अधिसत्ता में विश्वास रखते हैं, उसके कथित आदेश को मानते हैं—वे ईश्वर के अनुयायी हैं. ईश्वर का प्रत्यय कब गढ़ा गया, कहना कठिन है. लेकिन उसपर ज्यादा जोर दोढाई हजार वर्ष पहले से दिया जाने लगा था. यह वह समय था जब बड़े राज्य बनने की शुरुआत हुई. अपने साम्राज्यवादी मनसूबे साधने के लिए राजाओं को ऐसे सैनिकों की जरूरत थी, जो उनके इशारे पर खून की नदियां बहा सकें. जो परलोक की चाहत में अपने और अपने बंधुवांधवों तक को दाव पर लगा सकें. इस तरह धर्म और राजनीति का संबंध विधिवत राजनीतिक दर्शनों के विकास से पहले का है. यह भी कह सकते हैं कि राजनीतिक दर्शन के उदय से पहले धर्म ही राजनीति की जिम्मेदारी संभालता था. हालांकि उससे भी लंबा समय ऐसा रहा है जब लोग स्वयं अपनी व्यवस्था चलाते थे. उसके लिए उन्हें न तो बाहरी शक्ति की आवश्यकता थी, न राज्य की और न ही धर्म की.1 धर्म ने जीवन में दस्तक दी तो कबीले का मुखिया बाकी जिम्मेदारियों के साथ पुरोहिताई भी संभालने लगा. यह स्थिति हजारों वर्ष तक विद्यमान रही.

धर्म को आधार बनाकर राज्यों के सांगठनीकरण की शुरुआत का इतिहास हमें 3300 वर्ष पहले तक ले जाता है. मिस्र के सम्राट अखनातून की गिनती धर्म चलाने वाले सबसे पहले राजाओं में की जाती है. मात्र 15 वर्ष की अवस्था में उसने पुराने देवताओं को हटाकर नए धर्म की शुरुआत की थी. वह बहुदेववाद का समय था. प्रत्येक सभ्यता में देवताओं की मानो कतार लगी होती थी. हर कबीले का अपना देवता था. अखनातून को यह अजीबसा लगा. आखिर ईश्वर इतना कम महत्त्वाकांक्षी कैसे हो सकता है कि छोटेछोटे कबीलों तक सिमटकर रह जाए. उसने सूर्य को एकमात्र देवता स्वीकार किया. और लोगों से कहा कि वे उसी को अपना देवता स्वीकार करें. कबीलावासियों से उनकी आस्था छीनने का काम इतना आसान न था. अखनातून का विरोध हुआ. उसने विरोधियों से निपटना शुरू किया. इससे राज में विद्रोह फैल गया. उसे कुचलने के लिए अखनातून ने पूरी ताकत झोंक दी. जीत विरोधियों हुई. अखनातून की खंजर घोंपकर हत्या कर दी गई. बहुदेववाद फिर जीत गया. सहस्राब्दियों पश्चात जब एकेश्वरवाद का जोर चला तो अखनातून को दुबारा प्रतिष्ठा मिली. उस समय उसको मसीहा मान लिया गया. जाहिर है धर्म ने हजारों वर्ष कबीलाई संस्कृति के हिस्से के रूप में गुजारे हैं, जब प्रत्येक कबीले का स्वतंत्र देवता था. आज की तरह सबका अलगअलग ईश्वर. अंतर बस इतना है कि अब कबीलों का आकार बढ़कर देश और समाज में ढल चुका है. ईश्वर को लेकर जिद वैसी ही है, जैसी अखनातून के समय में या उससे भी पहले रही होगी.

उस समय तक जीवन के कारण की एकदम आरंभिक खोज केवल प्राकृतिक उपादानों तक सीमित थी. फिर जब लगा कि जीव ही जीव को जन्म देता है तो जीवनोत्पत्ति में सहायक अंगों को महत्त्वपूर्ण माना जाने लगा. लगभग 8000 वर्ष पुरानी मंदिरनुमा इमारत के अवशेष सीरिया बार्डर के उत्तर में, उफेरात नदी के किनारे, तुर्की में प्राप्त हुई है, जिसे ‘गोबेक्लि टेप’ नाम दिया है. तुर्की भाषा में इस शब्द युग्म का अभिप्रायः है—नाभिदार पहाड़ी. इमारत के भग्नावशेष में प्रस्तर स्तंभों पर उत्क्रीड़ित पशुआकृतियों के अलावा स्त्री और पुरुष की नग्न आदमकद मूर्तियां भी मिली हैं. उनमें पुरुष शिश्न को उत्तेजित अवस्था में दर्शाया गया है. सिंधु घाटी की सभ्यता से भी मातृदेवी की नग्न प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं. शिवलिंग की पूजा आज भी भारत सहित कई देशों में खूब लोकप्रिय है. कालांतर में यही प्रतीक धर्म के हिस्से के रूप में ढलते चले गए. इस अवधि में ऐसे हजारों दार्शनिकविचारकसंतमहात्मा हुए जिन्होंने धर्म को पुरोहितों का पाखंड बताते हुए उसका जोरदार विरोध किया. एक के बाद एक तर्क देते हुए उन्होंने ईश्वर तथा उसपर आधारित धर्म की सत्ता को चुनौती दी, उसे नकारा भी. लेकिन वे उसे पूरी तरह मेटने में असमर्थ ही रहे. क्योंकि तब तक धर्म अपने आप को पूरी तरह फैला चुका था. उत्पादन तंत्र पर उसका कब्जा था. राज्य उसे संरक्षण प्रदान करता था.

आस्थावादी खुद को बदलें या अपनी राह चलें—उनकी मर्जी. वे अपने विश्वास को बनाए रखना चाहते हैं तो रखें सहीसलामत. इतिहास बताता है कि मनुष्य की भांति ईश्वर भी नश्वर है. गत तीन हजार वर्षों में जब से ईश्वर ने मानवजीवन में हस्तक्षेप करना आरंभ किया तभी से, सामान्य जीवों की भांति ईश्वर भी मरतेखपते या रूप बदलते आए हैं. आदमी आमतौर पर साठसत्तर वर्ष जीता है. ईश्वर की उम्र छहसात सौ या हजार वर्ष तक खिंच पाती है. वेदों में जो देवता थे, पौराणिक काल तक उनमें से कुछ बिसरा दिए गए थे तो कुछ का रूप बदल चुका था. करीब डेढ़ सहस्राब्दी पहले के देवताओं में से अनेक इन दिनों गायब हैं. उनकी जगह नए देवताओं ने ले ली है. पुराने देवता या तो भुला दिए गए हैं; अथवा उन्हें अप्रासंगिक मान लिया गया है. अवतारवाद का मिथक लगातार मरतेखपते देवताओं के बीच की कड़ी, प्रकारांतर में उन्हें अमर घोषित करने की स्वार्थसाधना है. वैसे भी मानव सभ्यता के आगे ईश्वर की उम्र बहुत छोटी है. पृथ्वी पर मनुष्य का आगमन करीब दो लाख वर्ष पहले हुआ. जबकि ईश्वर और धर्म का विचार मात्र चारपांच हजार वर्ष पुराना है. वेदों तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में हालांकि देवताओं का नाम आता है. लेकिन वे देवता कहीं बाहर से नहीं आए थे. प्राचीन मनुष्य अपने प्राकृतिक जुड़ाव के चलते प्राकृतिक उपादानों को ही जीवन के कारण के रूप में देखता था. इसलिए जल, वायु, प्रकाश, धरती, आकाश, वनवनस्पति आदि के प्रति सम्मानभाव दर्शाने के लिए उसने अपने देवताओं का नामकरण उनके अनुसार किया था. निस्संदेह, उनके नेपथ्य में मनुष्य की स्मृति में पैठे उसके पूर्वजों की छवियां भी थीं. देवताओं की आपसी लड़ाई और उसमें जयपराजय के उल्लेख भी शास्त्रों में और प्रायः सभी संस्कृतियों में हैं. करीब दो हजार वर्ष पहले, जब से राजनीति और धर्म का गठजोड़ शुरू हुआ, उन छवियों का देवताकरण कर दिया गया था. परिणाम यह हुआ कि जो घटनाएं इस देश की, चलतेफिरते मनुष्यों के बीच घटी थीं, वे किसी दूसरे लोक की मान ली गईं.

पुरापाषाणकाल में आदि मानवों का ईश्वर कैसा रहा होगा, उसके बारे में अनुमान लगाने के लिए हमारे पास पर्याप्त पुरातात्विक साक्ष्य हैं. तत्कालीन सभ्यता के अवशेषों से ज्ञात होता है कि उनका ईश्वर कबीले के मुखिया जैसा था, अथवा वह पशु जिसपर पूरे कबीले का जीवन निर्भर था. इस कारण वह कबीले के सदस्यों को अपना सबकुछ प्रतीत होता था. सारे निर्णय ग्रामणी या कबीला प्रमुख पंचायत में बैठकर लेता था. जब तक पशुआधारित सभ्यता रही, तब तक उपयोगी पशुपक्षी भी दैवी शक्ति का प्रतीक माने जाते रहे. कालांतर में जब मनुष्य ने प्रकृति पर विजय प्राप्त की तो पशुपक्षियों की कमजोरियां सामने आने लगीं. मनुष्य और पशुओं की स्पर्धा में श्रेष्ठतम मानवमानवियों देवीदेवता का पद दिया जाने लगा. टोटम के रूप में समाज में पहले से ही पैठ बनाए पशुपक्षियों को नवसृजित देवताओं के साथ जोड़ दिया गया. नंदी के साथ शिव, चूहे के साथ गणेश, लक्ष्मी के साथ कमल, इंद्र के साथ वाजश्रवा, कार्तिकेय के साथ मोर आदि. यही स्थिति आज भी है. वैदिक देवता इंद्र प्राचीन आर्यों का नायक है. जिसे दक्ष योद्धा माना गया है. आगे चलकर विष्णु, ब्रह्मा, शिव और तदनंतर राम, कृष्ण आदि की कल्पना की गई तो परंपरा के अनुसरण में नए देवताओं को भी अस्त्रशस्त्र से सुसज्जित किया गया. यहां एक सवाल उठ सकता है—ईस्वी सन के बाद ईसाई धर्म और इस्लाम के जो पैगंबर आए, उनमें से एक के हाथ में भी हथियार नहीं है. भारत में भी सिख, आर्य समाज आदि कई ऐसे धर्म हैं, जिनके प्रवर्त्तक बिना किसी हथियार के अपनेअपने समाजों में पूज्य हैं. फिर हिंदू देवीदेवताओं को ही अस्त्रशस्त्र के साथ क्यों दिखाया जाता है. पहला कारण तो यही है कि हिंदू देवीदेवताओं ने अपनी मूल छवियां वैदिक साहित्य से ग्रहण की हैं, जो असल में आर्यों के विजयअभियान की स्मृतियां हैं. दूसरा कारण पराजयग्रंथि. छोटेछोटे जातिसमूहों में बंटा भारतीय समाज विदेशी आक्रामकों के आगे कमजोर सिद्ध हुआ है. ऐसे में रक्षा का मामला देवताओं भरोसे छोड़ना ही था. इसके लिए उन्हें हथियार थमाना भी जरूरी लगा होगा. हम भारतीय गर्व कर सकते हैं कि हमने अपनी प्रस्तरकालीन और कांस्ययुगीन संस्कृति यहां तक कि देवताओं को भी अभी तक जीवित रखा है. जबकि इसी युग में जन्मी अन्य संस्कृतियां यूनान, रोम, ईजिप्ट आदि या तो तबाह कर दी गईं; अथवा हमलावर का धर्म स्वीकारने के बाद वहां के लोगों की पुराने देवताओं की याद प्राचीन ग्रंथों और गाथाओं तक सिमट चुकी है. उस समय हम प्रायः भूल जाते हैं कि इस अतीतव्यामोह की कीमत हमें मौलिक ज्ञान की अपनी ही परंपरा से कटकर चुकानी पड़ी है.

वेदों में अनार्यों और आर्यों के बीच संघर्ष का उल्लेख मिलता है. पुराणों तक आतेआते आर्य और अनार्य क्रमशः देवता और दानव में बदल चुके थे. इस तरह के संघर्ष प्रायः सभी प्राचीन संस्कृतियों में हैं. संस्कृति को सुरअसुर, देवतादानव का युद्ध दिखाना केवल इतिहास का हिस्सा नहीं है, इसके पीछे संस्कृतियों का द्वंद्व भी सम्मिलित है. जिसमें आश्चर्यजनक समानता है—

हिंदुओं, यूनानियों और रोमनों के देव परिवार अधिकतर एक से थे. इंसान की तरह ही एक दूसरे से प्यारदुश्मनी करनेवाले, मरनेमारनेवाले. यही वजह है कि उनके देवता भी मनुष्यों की तरह ही आचरण करते हैं. लड़ाइयां हारते और जीतते, राज करते हैं. इस तरह के जनविश्वासों में विश्वास की गुंजाइश ज्यादा, अक्ल की कम थी. और देवताओं की कहानियों का एक संसार ही खड़ा हो गया, जिसे मामूली तौर पर हम पुराण कहते हैं’1

यही नहीं, प्राचीन मिस्र और पर्शिया की संस्कृति तथा भारतीय संस्कृति के बीच भी काफी समानता है. लेकिन जाति प्रथा एक ऐसी विशेषता है जो उसे बाकी संस्कृतियों से अलग करती थी.

इतिहास साक्षी है, धर्म का उदय भले ही आध्यात्मिक जिज्ञासा के कारण हुआ हो, परंतु धर्म का अनुसरण करने वालों का कोई स्वतंत्र आध्यात्मिक नजरिया नहीं होता. वे महज अनुसरणकर्ता होते हंै. बल्कि स्वतंत्र आध्यात्मिक बोध का अभाव ही उन्हें धर्म की शरण में ले जाता है. थे. परंपरा में भी जिन लोगों का स्वतंत्र आध्यात्मिक नजरिया था, वे मुनि या दार्शनिक के रूप में जाने जाते थे. राज्याश्रय में रहने वाले ऋषियों की अपेक्षा जंगलों में आश्रम बनाकर रहनेवाले इन श्रमण मुनियों का समाज में अधिक सम्मान था. यह धर्म पर अध्यात्म की, आस्था पर बौद्धिकता की जीत थी. राजा दशरथ दरबार में पधारे विश्वामित्र का प्रतिकार नहीं कर पाते. महाभारत में भी युधिष्ठिर सहित राज्याश्रय में रहने वाले पुरोहितों को दुर्वासा के आगे झुकते हुए दिखाया गया है. यह दिखाता है कि उस समय तक समाज में बौद्धकिता का मूल्य था. वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच शास्त्रार्थ आम बात थी. अपवादों को छोड़ दिया जाए तो धार्मिक अनुयायी अपनी आस्था और विश्वास के प्रति कट्टर हुआ करते थे. बावजूद इसके राज्य पर उनका प्रभाव था. राजसत्ता को भी ऐसे ही लोगों की जरूरत थी. इसलिए वे सिद्धांत से अधिक व्यवहार पर जोर देते थे. ऐसे लोग ही राज्य के प्रति भरोसमंद रह सकते थे. इससे समाज में सिद्धांत और व्यवहार के बीच दूरी बनने का सिलसिला आरंभ हुआ. श्रमविभाजन समाज की आवश्यकता थी. उसको समाज की विभिन्न जरूरतों के साथसाथ लोगों की रुचि एवं योग्यता के अनुसार लागू किया गया. सिद्धांत और व्यवहार में पनप रही दूरी का दुष्परिणाम यह हुआ कि सत्ता और सत्ताकेंद्र से जुड़े लोग बाकी जनसमुदाय के मन में यह धारणा पैदा करने में सफल रहे कि योग्यता और प्रतिभा जन्मजात होती हैं. पुरोहितों ने खास तौर पर समाज में शासक और शासित, विशेष और साधारण का भेद पैदा करना आरंभ किया. उससे यह धारणा भी बनने लगी कि विचार करना विशिष्ट लोगों का कर्म है. जनसाधारण का कर्तव्य धर्म का पालन, यदि वहां कोई राह दिखाई न दे तो महान लोगों का अनुसरण करना है—

तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना, नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम्।

धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां, महाजनो येन गतः स पंथा।। महाभारत, 3/313/117

जब तर्क से कोई न्याय संगत बात दिखाई न दे. श्रुतियां अलगअलग रास्ते बताती हों. ऋषिमुनियों के अलगअलग मत हों. धर्मतत्व अत्यंत गूढ़ हो, और उससे कोई मार्ग नजर न आए, ऐसे में जिस रास्ते सिद्ध पुरुष जाएं, वही उत्तम है.’ जाति आधारित व्यवस्था में इसका सामान्यीकरण बौद्धिक और शारीरिक कार्य के विभाजन के रूप में किया गया. लोगों के मानस मंे यह बात बिठा दी गई कि सोचनाविचार तथा व्यवस्था का नेतृत्व जैसे कार्य केवल ब्राह्मण कर सकते हैं. इस क्रम में शूद्रों का कार्य केवल शीर्षस्थ वर्गों की सेवा करना निर्धारित किया गया. इससे सामाजिक स्थायी विभाजन, विशेषकर इस धारणा को कि बौद्धिक श्रम, शारीरिक श्रम से श्रेष्ठ है—मजबूत आधार मिला. प्रकारांतर में उसने समाज में अनेक दरारें भी पैदा कीं. आगे चलकर समाज जैसेजैसे परिपक्व हुआ, राजनीति शक्ति की धुरी बनने लगी. राजा पहले अपने राज्य की सुरक्षा के लिए कर लेता था. प्रजाहित उसके प्रत्येक निर्णय की धुरी रहता था. केंद्र शक्तिशाली हुआ तो राज्य और उसके आसपास के लोग सत्ता को अपना विशेषाधिकार मानने लगे. कल्याण की परिभाषाएं जिन्हें लोकहित से तय होना था, वे राज्य की मर्जी से तय की जाने लगीं. विकास मुट्ठीभर अभिजात्यों तक सिमट गया. राजसत्ता का अभिप्राय सुखवैभव का जीवन जीना, प्रजा से कर उगाहनाभर रह गया. यह एक प्रकार से राजधर्म की अवहेलना ही थी. उस व्यवस्था का अपमान था जो धर्म के नैतिक पक्ष को आगे बढ़ाने का नारा देते हुए, सर्वकल्याण के लक्ष्य के साथ सत्ता में आई थी.

प्रजा का अब भी मानना था कि वह राजा को बना सकती है, वही उसे चुनती है. राजा भी प्रजा के विद्रोह से डरता था. ऐसे में प्रजा और राजा के बीच में कड़ी के रूप में उदय हुए पुरोहित वर्ग ने अपने जन्म के साथ ही राजा के दिल में यह बोध पैदा करना आरंभ कर दिया कि वह जनता से कर लेने को अधिकृत है. इसके लिए शास्त्रीय व्यवस्थाएं भी की गईं. मनुस्मृति में लिखा गया कि समस्त धनसंपदा तथा उसके अलावा पृथ्वी पर जितनी भी भोग्य वस्तुएं हैं, ब्राह्मण उन सभी का स्वामी है. राजा उस धनसंपदा का रक्षक है. इस तरह संपत्ति का अधिकार जनसाधारण के हाथों से खिसककर ब्राह्मणों के हाथों में चला गया. उस व्यवस्था के पीछे संभव है मनु का सोचना रहा हो कि ज्ञान के अर्जनउपार्जन में लीन ब्राह्मण अपरिग्रही, निर्लोभी और संतोषी सिद्ध होंगे. वे समाज की संपदा का उपयोग व्यापक लोककल्याण के निमित्त करेंगे. लेकिन जातिआधारित विभाजन ने सारे सोच का ही कबाड़ा कर दिया. उल्लेखनीय है कि श्रमविभाजन का विचार मनु का मौलिक विचार नहीं था. न ही यह केवल भारत तक सीमित था. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने भी लोगों को उनकी रुचि, योग्यता के अनुसार स्वर्ण, रजत और लौह वर्गों में बांटा था. लेकिन इसके साथसाथ उसने बालक की जन्मसंबंधी पहचान छिपाने की अनुशंसा भी की थी. उसने व्यवस्था की थी कि बालक का पालनपोषण राज्य के आश्रय में, मातापिता से दूर रखकर इस प्रकार किया जाना चाहिए कि उनकी पैत्रिक पहचान छिपी रहे. जातीय आधारित विभाजन का विचार मनु का अपना था. उससे आगे चलकर सामाजिक विभाजन को मजबूत आधार दिया, ऐसा कि शूद्र वर्ग पीढ़ीदरपीढ़ी शीर्षस्थ वर्गों का दास बनता चला गया.

संपत्ति के उत्तराधिकार की भांति, ज्ञान के उत्तराधिकार को मान्यता देना उस समय के बुद्धिजीवी वर्ग की बहुत बड़ी भूल थी, जिसके पीछे उसके वर्गीय हित, सत्ता से चिपके रहने की लालसा और स्वार्थ छिपे थे. अजीब बात है कि एक ओर तो ब्राह्मण को समस्त मायावी प्रलोभनों से परे, ज्ञान साधना में रत दिखाया जाता था, वह घोषित अपरिग्रही था, दूसरी ओर उसे पृथ्वी की भोग्य वस्तुओं का स्वामित्व सौंपा गया था. यदि यह माना जाए कि ब्राह्मण को भोग्य वस्तुओं का स्वामी ब्रह्मा की ओर से बनाया गया था, तो ब्राह्मणों का यह दावा पूरी तरह अर्थहीन हो जाता है कि वे धरती के समस्त ज्ञान के एकमात्र प्रस्तोता, अन्वेषक और अधिकारी रहे हैं, यही उनका कार्य है. क्योंकि उन्हें तो ब्रह्मा की ओर से पृथ्वी की धनसंपदा जिसमें विलासिता की सभी वस्तुएं भी सम्मिलित हैं, की देखभाल की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है. संरक्षक संरक्षित सामग्री का उपभोग न करे, यह असंभव है. जातिवादी विभाजन का कलंक केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं था. देवता भी उससे लिसड़े हुए थे. जातिआधारित विभाजन का दुष्प्रभाव यह भी रहा कि देश में योग्य सैनिकों की कमी से हमेशा जूझता रहा है. ऊपर से आपस की फूट. खुद रकम खर्च करके पड़ोसी राजा को ठिकाने लगवाना. उससे भी बस न चले तो विदेशियों की मदद लेना, उस समय आम बात थी. जब अपनों पर भरोसा न हो, राज्यकर्मी षड्यंत्र में लगे रहते हों, तो सत्ता को बचाने के लिए किसी चमत्कार का ही सहारा था. सच तो यह है कि भारतीय समाज का प्रभुवर्ग समाजार्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता के नाम पर खुद अभय लेकर शोषण के लिए बाकी प्रजा को आगे कर देता था. भारत पहुंचे हमलावर चाहे मंगोल रहे हों, चाहे तुर्क, डच या अंग्रेज, सभी का प्रथम उद्देश्य यहां कि अतुलनीय धनसंपदा को हड़पना था. जनविद्रोह की संभावना को टालने के लिए विदेशी शक्तियां इस देश के प्रभुवर्ग को आवश्यक सुविधाएं प्रदान कर, शताब्दियों तक राज करती रहीं. इससे जनता का मनोबल गिरना ही था.

धर्म के नाम पर ये सामाजिक विकृतियां शुरू से ही प्रभावी थीं. या यूं कहें कि सामाजिक विकृतियों से धर्म का नाता उसके जन्म से है. ऐसा इसलिए हुआ कि धर्म को उसके आरंभ से ही शक्तिकेंद्र और शक्ति प्रत्याशा के रूप में पहचाना जाने लगा था. उसका उदय चाहे जिन कारणों से हुआ हो, लेकिन उसके विकास, राजसत्ता द्वारा धर्म की महत्ता की स्वीकारने के पीछे मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासा जैसा कोई मानवोपयोगी ध्येय न होकर, राजसत्ता की मनमानियों को शास्त्रीय आधार देने की सोचीसमझी चाल थी. ऋषिमुनियों का कोप असल में इसी धर्मसत्ता का कोप था. जिसके बल पर वह अपने निरंकुश आचरण को वैध बता सकती थी. इसके उदाहरण पूरब और पश्चिम में अनगिनत हैं. प्राचीन यूनान में सोफिस्टों का धर्म, वैदिक धर्म की भांति दिखावे में विश्वास करता था. भारतीय पंडितों की भांति वे भी दिखावे की संस्कृति में विश्वास रखते थे. मानते थे कि शास्त्रार्थ में प्रतिद्विंद्वी को पराजित करना, अपनी वकृत्वकला से लोगों को बस में कर लेना ही बौद्धिकता का मूल उद्देश्य है. सोफिस्टों को चुनौती देने की पहल सुकरात की ओर से की गई थी. जबकि भारत में धर्म के नाम पर निरर्थक कर्मकांड और आडंबरों को चुनौती देने का कार्य कई दिशाओं से, महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, मक्खलि घोषाल, अजित केशकंबली आदि के माध्यम से संपन्न हुआ था. उसमें सर्वाधिक सफलता गौतम बुद्ध को मिली. उन्होंने कर्मकांड, जाति प्रथा, बलि आदि पर रोक लगाते हुए मानव कल्याण को समर्पित समानता आधारित बौद्ध दर्शन की नींव रही. उसके प्रभाव में भारत में ब्राह्मण धर्म शताब्दियों के लिए नेपथ्य में चला गया. जिसे भारत का स्वर्ण काल माना है, वह असल में वही दौर था. जब धर्म का प्रभाव नैतिक मार्ग दर्शन के अलावा न्यूनतम था. राजनीति कल्याण नीति का पर्याय मानी जाती थी.

पश्चिम में धर्म को संगठित रूप मुख्यतः जीसस के बाद दिखाई पड़ता है. हालांकि जीसस के जीवनकाल में उस समय के सत्तानशीनों ने उनके विचारों का न केवल मजाक उड़ाया था, बल्कि उनकी अवहेलना और हत्या तक की गई थी. जीसस के विचारों में कोई विशेष दार्शनिक चिंतन नहीं था, मगर नैतिक मूल्य प्रबल थे. इसे हम अध्यात्म में नैतिकता का समायोजन कह सकते हैं. अपने उपदेशों में जीसस ने प्राणिमात्र के प्रति दया, करुणा, मैत्री और परोपकार पर जोर दिया था. दिखावे और कुलीनता की संस्कृति के बीच यही गुण उन्हें स्वीकार्य बनाते थे. जीसस ने धर्म और सामाजिकता के बीच की नैतिक दूरी को पाटने का काम किया था. भारतीय संतकवियों की भांति जीसस ने भी आर्थिक पक्ष को गौण माना था. नैतिकता को आर्थिक उपलब्धियों पर वरीयता देते हुए उन्होंने कहा था—‘हाथी सुई की नोक से गुजर सकता है. लेकिन धनपति स्वर्ग के दरवाजे से नहीं.’—वे धनपतियों को संदेश देना चाहते थे कि वे अपना धन कल्याणकारी कार्यों में लगाएं. दीनदुखी, अभावग्रस्त और जरूरतमंद लोगों की यथासंभव मदद करें. उनके उपदेशों का स्वर करुणामूलक था. जो समाज के उत्पीड़ित, दमित जन को इंसान के रूप में देखने की प्रेरणा देता था. इसलिए विपन्न, दास और अभावग्रस्त वर्ग के लोग, जिन्हें समाज में बहुत ज्यादा की कामना नहीं थी. जो विपन्नता और दासता को अपनी नियति मान चुके थे, जो अपने लिए केवल सहानुभूति की दरकार रखते थे, वे सब जीसस के आसपास जुटते गए. इस कारण उनके शिष्यों का दायरा लगातार बढ़ता गया.

जीसस की लोकप्रियता की बात तो समझ में आती है. लेकिन क्या कारण थे कि उनके जीवन काल में उनकी जान के दुश्मन, उन्हें तरहतरह से उत्पीड़ित करने और अंततः सूली पर चढ़ानेवाले तत्कालीन जमींदार और सामंतों ने आगे चलकर उन्हें पैगंबर के रूप में मान्यता दी? क्या यह उनका हृदय परिवर्तन था? क्या जीसस में सचमुच कोई दैवीय तत्व रहा होगा या कुछ ऐसे कारण भी थे जिनके कारण जीसस स्वर्ग के राज से अधिक इस लोक में सत्ता सुरक्षित करने में सहायक हो सकते थे? यदि दर्शन की दृष्टि से देखा जाए तो जीसस, सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, पाइथागोरेस, डेमोक्रिटिस, पेरामीनिडिस, जीनो आदि में से किसी के भी बराबर नहीं ठहरते. ये सब उनसे चारपांच शताब्दी पहले जन्मे थे. उन सभी को दरकिनार कर जीसस को पैगंबर माना गया गया. जबकि सत्य के लिए खुशीखुशी जहर पीने वाले सुकरात को केवल एक सनकी दार्शनिक होने से संतोष करना पड़ा. फिर क्या कारण है कि इतिहास के एक कालखंड में जो लोग जीसस के उपदेशों से चिढ़कर उन्हें सूली पर चढ़ा देते हैं, वही लोग डेढ़ शतादी पश्चात बाइबिल की आलोचना करने पर जियोदार्नो ब्रूनो को आग में जिंदा झोंक देते हैं. ध्यान से देखें तो जीसस को सूली पर चढ़ाने वाली तथा ब्रूनो को जिंदा जलाने वाली शक्तियां एक जैसी थीं. दोनों में कोई अंतर न था, सिवाय समय और परिस्थितियों के. ऐसा क्यों हुआ? इसे समझने के लिए केवल एक शताब्दी ईसा पूर्व के इतिहास की पर्तों में झांकना पड़ेगा. उस दास संघर्ष को याद करना होगा, जिसका सूत्रधार स्पार्टकस था. जिसके नेतृत्व में रोम की महाबली सेनाओं को मुंह की खानी पड़ी थी. यदि उस समय पर्शिया जैसे राज्यों की सेनाएं रोम की मदद को न आतीं तथा दासों को कुचलने के लिए यूरोप की पूरी अभिजात शक्तियां एकजुट न होतीं तो रोम नामक वह कथित महाबली साम्राज्य, एक दास योद्धा के हाथों पराजित हो चुका होता और दुनिया को दास प्रथा के खात्मे के लिए अब्राह्मम लिंकन की प्रतीक्षा न करनी पड़ती.

यह हमारे ज्ञात इतिहास का हिस्सा है कि रोम, पर्शिया, स्पार्टा सहित उस समय के सभी यूनानी राज्यों में दास प्रथा थी. कुलीन वर्ग दासों को आवश्यक मानते था. यहां तक कि सुकरात, प्लेटो, अरस्तु जैसे विचारकों ने भी दासप्रथा का समर्थन किया था. तब दासों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता था. उनकी जिंदगी उनके स्वामी की होती थी. मालिक यदि मारमार कर चमड़ी भी उधेड़ तो उस को किसी अदालत में मुकदमा करने का अधिकार न था. रोम का वैभव उतार पर था. अतीतमोह में जी रहे रोमनवासियों के लिए दासों का जानलेवा युद्ध मनोरंजक खेल में शुमार था. उसमें एक दास योद्धा को दूसरे योद्धा, जिसे ‘ग्लेडियेटर’ कहा जाता था, पर उस समय तक प्रहार करना होता था. जब तक दूसरा मर या पूरी तरह बेहोश न हो जाए. युद्ध में भाग लेने से इन्कार राज्यादेश की अवहेलना करना था. उसका एकमात्र दंड था, मृत्यु. उसके लिए उन्हें किसी राजाज्ञा की आवश्यकता न थी. स्वामी अधीन दासों को स्वयं दंडित कर सकता था.

महान दास योद्धा स्पार्टकस रोम के थ्रेशिया शहर में जनमा था. दास योद्धाओं को संगठित कर उसने न केवल उनके स्वाभिमान की लड़ाई लड़ी, बल्कि अपने अद्भुत रणकौशल के बल पर वह रोम तथा उसकी सहायक सेनाओं को हार का मजा चखाने में भी कामयाब रहा था. आगे चलकर संगठित सेनाओं ने स्पार्टकस को हराकर फिर अपना वर्चस्व कायम कर लिया था. स्पार्टकस सहित उसके छह हजार दास योद्धाओं को एक साथ सूली पर चढ़ा दिया गया. उस घटना के बाद सत्ताधारी वर्ग के दिमाग में यह बात भलीभांति बैठ गई कि केवल ताकत के बल पर लोगों को दास बनाए रखना असंभव होगा. इसलिए अगले चरण के रूप में धार्मिक दासता की परिकल्पना की गई. अवसर ईसा मसीह के उपदेशों के प्रति जनसाधारण की आस्था के रूप में सहसा उनके हाथ आ लगा था. स्पार्टकस की सेनाओं की पराजय के साथ दासों की मुक्ति की उम्मीद टूट चुकी थी. वे पूरी तरह हताश हो चुके थे. उन्हें यह लगने लगा था कि इस जीवन में मुक्ति असंभव है. अतः स्पार्टकस के बलिदान के 70 वर्ष पश्चात जब जीसस ने उन्हें मोक्ष का सपना दिखाया तो वे उनके अनुयायी बनते गए. आगे चलकर जीसस को मसीहा के रूप में सम्मान मिला. स्वयं जीसस ने खुद को परमात्मा का पुत्र बताकर इस धारणा को पुष्ट बनाने में योगदान दिया. उन्होंने उन दासों को अपना मानकर गले लगाया, जो दुत्कार सहते आए थे. मामूलीसी बात पर जिनका स्वामी हंटर से खाल उधेड़ देता था. ऐसे ही पददलित इंसानों को जीसस गले लगा रहे थे. उनके लिए अमीरगरीब, दास और स्वामी सभी बराबर थे. उनका पूरा संघर्ष गरीब और सताए हुए लोगों के लिए था. इसलिए उनकी ओर दासवर्ग का आकृष्ट होना स्वाभाविक ही था. अस्मिता की लड़ाई हार चुके दास वर्ग का, हताशा से जन्मा समर्पण था, मगर था स्वाभाविक. फलस्वरूप जीसस का आभामंडल बढ़ता गया.

ईसा मसीह की शरण में दासों का आना उनकी अस्मिता की खोज से जुड़ा था. वहां आध्यात्म का मसला उतना बड़ा नहीं था. बाइबिल में वैसे दार्शनिक सवालजवाब भी नहीं हैं, जैसे भारतीय उपनिषदों में उठाए जाते रहे हैं. या ईसा से छहसात सौ वर्ष पहले से यूनानी दार्शनिक जिनपर विचार करते आए थे. उसमें सामान्य नैतिकता, आचरण की शुद्धता तथा गरीबपीड़ित जनों के प्रति करुणाभाव है. आरंभ में अभिजात वर्ग की निगाह में जीसस महज एक भेड़ चराने वाले गड़हरिया थे. वे उनसे ईष्र्या करते थे, उन्हें लगता था कि जीसस दासों को सिर चढ़ा रहे हैं. दासों का सहयोगी मानकर आरंभ में उनपर भी खूब अत्याचार किए गए. स्पार्टकस की पराजय के बाद उसके छह हजार सहयोगियों को एक साथ सूली पर चढ़ा देना उनके लिए शौर्य की बात थी. जीसस के विरोधियों ने सोचा था कि असहाय और विपन्न लोग जीसस की सूली को भी पचा जाएंगे. वे शायद नहीं जानते थे कि आजादी की पहली दस्तक, आजादी की घोषणा नहीं, उसका एहसास लेकर आता है. गुलाम जिस क्षण जान ले कि वह गुलाम है, तत्क्षण उसकी आजादी का अभियान शुरू हो जाता है. अपने अनुयायियों को जीसस ने बताया था कि वे भी इंसान हैं. और इंसान होने के नाते वे दूसरों के बराबर हैं. यह बड़ा सपना था. फलस्वरूप असहाय, अकुलीन और विपन्न वर्ग जीसस की ओर खिंचता चला गया. एक दिन वह इतना बढ़ गया कि उसके आगे सल्तनत का आकार घटने लगा. बुद्धिजीवियों, दार्शनिकों ने जब यह देखा कि एक अहिंसक, समर्पित भीड़ जीसस के चारों और जमा है जिसे न भूख की चिंता है, न ही प्यास की. जो अपनी सांसारिक इच्छाओं को मार चुकी है….पर यह सोचकर संतुष्ट है कि आने वाला जीवन उसकी मनोकांक्षाओं को पूरा करने वाला होगा. इस जन्म के कष्ट आनेवाले जीवन में उपहार बन जाएंगे. और जीसस के बोल उन्हें बीन की धुन जैसी सम्मोहन से बांध लेते हैं, तब उन्होंने धर्म को ही अपनी सत्ता का रक्षाकवच बनाने का निर्णय किया.

सत्ताशिखर पर विराजमान लोग धर्म की कमजोरियों और जनमानस पर उसके प्रभाव को समझते थे. जानते थे कि उसके नाम पर लोगों को आसानी से फुसलाया जा सकता है. उसके सपनों और आकांक्षाओं का इस तरह अनुकूलन किया जा सकता है कि उनका ध्यान वास्तविक जरूरतों से पूरी तरह से हट जाए. स्पार्टकस ने अपने गुलाम साथियों में हथियार उठाने का हौसला पैदा किया था. जीसस के अनुयायी निहत्थे थे. स्पार्टकस और उसके साथियों के लिए मुक्ति इसी जीवन का स्वप्न थी. ईसा के अनुयायी परमात्मा से मुक्ति की आस लगाए थे. अंततः हताशा में उमड़ी श्रद्धा मार्गदर्शक बनी. अंधसमर्पण को ही मुक्ति पथ मान लिया गया. धर्म के नाम से सम्मोहित, निहत्थे लोगों की वह भीड़ सत्तानशीनों के बहुत काम की थी. धर्म के नाम पर उस भीड़ से वे बेगार ले सकते थे. सिर्फ पेटभर रोटी देकर, गुलामी करा सकते हैं. युद्ध में दुश्मन के प्रारंभिक प्रहारों को झेलने के लिए भीड़, जिसमें मुख्यतः दास थे, को युद्ध के मोर्चे पर ठेला जा सकता था. रोजीरोटी के संघर्ष में करुणामय जीवन जीने वाले दासों के बहुत बड़े सपने भी नहीं थे. उनकी आंखों को बड़े सपने देखने का अभ्यास भी कहां था. सिवाय पारलौलिक सुख के बहाने, जिसके बारे में विश्वास के साथ कुछ भी कह पाना असंभव था. इसके बावजूद धर्म का प्रलोभन इतना बड़ा था कि आदमी अपना सबकुछ लुटागंवाकर अपनी बंधुआसी जिंदगी को सिर्फ इस प्रत्याशा में बिता देता था कि इस जन्म में बोए गए कष्ट के बीज अगले जन्म में अक्षय सुखामोद की फसल के रूप में प्राप्त होंगे. कुल मिलाकर वह धर्म के बहाने आदमी के दिमाग को कैद करने का जानापहचाना षड्यंत्र था. अपने इसी गुण के कारण धर्म राजनीति का सबसे कारगर हथियार बना. धर्मसत्ता और राजसत्ता का गठजोड़ लगातार मजबूत होता गया. इस वर्ग ने हमेशा अपने स्वार्थ को आगे रखा. इसलिए जो राजनीति कभी जीसस से चिढ़ती थी, बदली परिस्थितियों में वह जीसस को ‘अपना’ मानकर उसके आलोचकों पर कहर ढा रही थी.

धर्म का गठन और उसकी संरचना पुरोहितों ने बड़ी चतुराईपूर्वक की थी. प्रकट में वह आमजन का हितैषी, उसका कल्याण करने वाला, समाज में मनुष्यता और स्नेह का संचार करने वाला माना जाता था. लेकिन दूसरी ओर धर्म ही था, जो सामाजिक ऊंचनीच का समर्थन कर उसको वैध ठहराता था. वह मुट्ठीभर लोगों को ‘विशेष’ बताकर बाकी को ‘सामान्य’ वर्ग में ढकेल देता था. हिंदू धर्म के सजेधजे, स्वर्णाभूषण मंडित, खिलेखिले, दिव्य चेहरों वाले देवीदेवता खासजन का ही प्रतिनिधित्व करते हैं. जनसाधारण के भूख से पिचके, मेहनत से झुर्राये तथा निराशा से पथराए चेहरों को देखते हुए वे देवता के नाम पर मजाक लगते थे. वह भक्त और देवता के बीच स्पष्ट आर्थिकसामाजिक विभाजन को दर्शाते थे. इस तरह धर्म ने आर्थिक स्तरीकरण को वैधता प्रदान की. राजासामंतों को जो दूसरों के श्रम पर जीते थे, उन्हें देवता या देवप्रतिनिधि घोषित करने का काम पुरोहितोंपंडितों ने संभाला. नतीजा यह हुआ कि जनसाधारण ने समाजार्थिक विभाजन को अपनी नियति स्वीकार कर लिया. समाज का गरीब, उत्पीड़ित, असहाय, सुविधावंचित, मेहनतकश वर्ग आत्महीनता का शिकार होने लगा. हताशा इतनी बढ़ी कि उस वर्ग ने उत्पीड़न और विपन्नता को ही अपनी नियति मान लिया. इस जन्म में कोई उम्मीद न देख, समस्या के मूल कारणों की ओर से मुंह फेरकर वह काल्पनिक स्वर्ग की प्रत्याशा में जीने लगा.

जीवन में धर्म के प्रभाव को दो भागों में बांटा जा सकता है. एक वह जो संबंधित व्यक्ति के विश्वास और जीवन प्रक्रिया को तय करता है. दूसरा वह जो व्यक्ति और समाज के संबंधों का नियंत्रण कर उसके और समाज के बीच व्यवहार का हिस्सा बनता है. व्यक्तिगत और सामूहिक रूप में धर्म आध्यात्मिक विश्वासों को व्यक्त करता है. बताता है कि व्यक्ति अथवा या समूह विशेष की आध्यात्मिक जिज्ञासाएं कहां आकर ठहरी हुई हैं. धर्म की नींव जीवन के कारण की खोज के रूप में रखी जाती है. बावजूद इसके सामान्य व्यवहार में वह कुछ कर्मकांडों और प्रदर्शन तक सीमित होकर रह जाता है. वह जीवनयात्रा की सिद्धि उस रूप में देखने लगता है, जिसका उसके अपने या अपने समाज के वास्तविक कल्याण से कोई नाता नहीं होता. लेकिन यह करते हुए वह अपने दुख के कारणों से भी दूर निकल जाता है. स्वार्थी शक्तियां लगातार यह समझाने में लगी रहती हैं कि भौतिक सुख मानव जीवन के वास्तविक लक्ष्यों की सिद्धि में बाधक तथा उसे परम लक्ष्य से भटकाने वाले हैं. दूसरी ओर यही धार्मिक शक्तियां पूंजीपतियों और धन्ना सेठों का महिमा मंडन करती हैं, जो लूट और काली कमाई का एक हिस्सा दान और जकात के बदले धर्म के नाम पर उन्हें लुटाते रहते हैं. निहित स्वार्थवश ऐसे लोगों को धर्मात्मा, महासेठ, महादानी जैसी उपाधियां लुटाई जाती हैं. यह न केवल उनकी लूट को, बल्कि बेहिसाब मुनाफे की प्रवृत्ति और उनके एकाधिकारवाद को स्वीकार्य एवं न्यायसंगत बनाता है, बल्कि दमित वर्ग को शोषक व्यवस्था के साथ अनुकूलन करने के लिए विवश करता है. विषमताओं में जीने का अभ्यास होते ही बदलाव की इच्छा घट जाती है. आदमी भविष्य की ओर से उदासीन होकर, केवल वर्तमान में जीने लगता है. प्रकारांतर में धर्म अकर्मण्यता और परजीविता को बढ़ावा देता है, जिससे एक वर्ग दूसरे की मेहनत पर जीवनयापन करने लगता है.

पराङमुखता किसी एक धर्म का लक्षण नहीं है. किसी न किसी रूप में यह सभी धर्मों की विशेषता है. यही समाजार्थिक विभाजन का असली कारण है. हिंदू धर्म की अतिरिक्त कमजोरी उसके समाज का जातिआधारित विभाजन है. हालांकि इसके लिए साधारणजन भी सर्वथा निर्दोष नहीं है. आम जन की कमजोरी है कि वह ज्ञान के उत्तराधिकार और संपत्ति के उत्तराधिकार में कोई फर्क नहीं कर पाता. जातिव्यवस्था से अनुकूलित व्यक्ति यह मान लेता है कि ब्राह्मण के बेटे में ब्राह्मण बनने का नैसर्गिक गुण है तथा राजमिस्त्री का बेटा केवल बेहतर राजमिस्त्री बन सकता है. इसलिए दोनों को एकदूसरे के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप से बचना चाहिए. ऐसे सोच से ही जातीय विभाजन को स्थायित्व प्राप्त होता है. हम जानते हैं कि ज्ञान का उत्तराधिकार संपत्ति के उत्तराधिकार जितना सरल और स्वाभाविक नहीं होता. ज्ञान के जातिअनुसार उत्तराधिकार की परंपरा में मूलभूत दोष यह है कि वह ज्ञान और भौतिक वस्तुओं के अंतरण में भेद नहीं कर पाती. मान लेती है कि केवल परिवार विशेष में जन्म ले लेने के कारण बाह्मण का बेटा अपने पिता की सभी खूबियों को प्राप्त करेगा और एक शूद्र की नियति केवल सेवाकर्म है. यह मनुष्य की नैसर्गिक विशेषताओं तथा उसकी मूलभूत स्वतंत्रता का निषेध करती है. व्यक्ति से चयन का अधिकार छीनकर यह उसे बौद्धिक अपंगता की ओर ले जाती है. परिणामस्वरूप व्यक्ति को अपनी रुचि के प्रतिकूल कार्यों में जुटना पड़ता है. ऐसे में वह अनमने भाव से सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करता है. जिसका नकारात्मक प्रभाव उसकी उत्पादकता पर पड़ता है. सांस्कृतिक आधार पर समाज के स्तरीकरण का लाभ उठाकर शीर्षस्थ पदों पर गैर प्रतिभाशाली लोग आरूढ़ होने लगते हैं. धर्मदर्शन के मामले में यही हुआ था. परिणामस्वरूप मौलिक ज्ञान के सृजन और प्रसारप्रचार में गिरावट आने लगी. नए ज्ञान के शोध और प्रसार की अपेक्षा अनुसरण को महत्त्व देने से समाज में बौद्धिक जड़ता का माहौल बना. सामाजिक मेधा मौलिक और लोकोपयोगी सृजन के बजाय राजा और सभासदों के कीर्तिगायन तथा दरबारी शोभा के बखान में खपने लगी. कालांतर में यह धारा इतनी क्षिप्र हुई कि शताब्दियां नए विचार के लिए तरसती रहीं. इसी से टीका संस्कृति का चलन बढ़ा. लेकिन यह सब अचानक नहीं हुआ था. इसके बीजतत्व वैदिक ज्ञान की उस परंपरा में निहित थे, जिसमें मौलिक सृजन से ज्यादा जोर कर्मकांडीकरण पर दिया जाता था. इस कारण इस देश में हजारों वर्ष पहले ही प्रदर्शनप्रिय संस्कृति जन्म ले चुकी थी.

लगभग 2200 से 3000 वर्ष पहले तक भारतीय मनीषियों की धाक विश्वपटल पर थी. बौद्ध और जैन धर्म के विस्तार ने भारतीय मेधा की श्रेष्ठता को दुनियाभर में स्थापित किया था. लेकिन बाद में उसमें ठहराव आने लगा. वस्तुतः वेदवेदांग की रचना से भारतीय मनीषी इतने आत्ममुग्ध हुए कि उपलब्ध ज्ञान की आलोचनाप्रत्यालोचना को विराम दे दिया गया. मान लिया कि जो ‘वेदों में नहीं, वह कहीं नहीं है.’ इस प्रवृत्ति ने ज्ञान के आदानप्रदान की संभावनाओं को निरंतर कमजोर किया. इसका नुकसान धर्मदर्शन को तो जो हुआ सो हुआ, उन ब्राह्मणपुरोहितों को भी खूब हुआ जो स्वयं को धर्मदर्शन का ठेकेदार मानते आए थे. चंद पृष्ठों की पोथी को बांचते हुए महापंडित होने का भ्रम पालना तथा अपने आगे किसी को कुछ न समझना, सिर्फ अपने संप्रदाय के ग्रंथों का पठनपाठन करना, और दूसरी विचारधारा से दूर रहना—इसी मानसिकता का परिणाम था. चूंकि धर्म का प्रभाव बहुत व्यापक होता है, इसलिए कह सकते हैं कि धीरेधीरे पूरा समाज बौद्धिक क्षरण की चपेट में चला गया. मौलिकता के अभाव में ज्ञान प्रदर्शन की चीज बनता गया. उसमें दोहरावतिहराव की घटनाएं बढ़ीं. ज्ञानार्जन और ज्ञानसंप्रेषण जैसे कार्य कुछ लोगों की बपौती होने तथा उस क्षेत्र में उनके लिए कोई चुनौती न होने के कारण मौलिक सृजन का स्तर निरंतर नीचे गिरता गया.

ऐसा नहीं है कि भारत में मौलिक ज्ञान और सामाजिक चेतना का सरासर अभाव रहा हो. समयसमय पर ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन भी पनपे. स्वयं ब्राह्मणों ने ज्ञान को कर्मकांड में ढलते देख आवाज उठाई. लेकिन धर्म सत्ता और राजसत्ता की वेगवती धारा के प्रवाह में समर्थन न मिलने से, वह सब सीपियों की तरह किनारे सिमटता गया. बौद्धिक जड़ता यहां तक बढ़ी कि सबकुछ शास्त्रों में सिमटता गया. जो शास्त्र सम्मत नहीं, वह धर्म सम्मत भी नहीं है, ऐसा माना जाने लगा. शास्त्रों को पढ़ने, उनकी व्याख्या करने का अधिकार समाज के जिस वर्ग को था, वह उनकी मनमानी व्याख्याएं करता था. कर्मकांड और दिखावे की संस्कृति के विरोध में बारहवीं शताब्दी के आरंभ में दक्षिण भारत से भक्ति आंदोलन का उद्भव हुआ, जिसने एकेश्वरवाद को नए सिरे से स्थापित करने का काम किया. भक्ति मार्ग के आरंभिक प्रवर्त्तक सामान्यतः वे संत थे, जिन्हें वर्णभेद के चलते वेदों के अध्ययन, अध्यापन अथवा उनपर टीकाटिप्पणी करने का अधिकार नहीं था. जिनके लिए मंदिर की सीढ़ियां चढ़ना निषिद्ध था. समाज के शोषित, उत्पीड़ित जनों, जो जाति व्यवस्था में निचले स्तर पर थे, का उस आंदोलन को भरपूर समर्थन मिला. संत कवियों ने मूर्तिपूजा, कर्मकांड और जाति व्यवस्था को निशाना बनाया. जब तक वह आंदोलन अपनी शुरुआत में था, पुरोहितों की ओर से उसे दबाने के भरसक प्रयास किए गए. संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, कबीर, रैदास आदि को जो अद्वैतवादी विचारक संत थे, उस समय के दुष्ट ब्राह्मणों ने खूब परेशान किया था. लेकिन संत कवियों के नेतृत्व में जनसाधारण को, विशेषकर वर्णव्यवस्था में निचले स्तर पर मौजूद जातियों को एक विकल्प मिल चुका था. उनका संदेश पूर्णतः स्पष्ट था—

वे तुम्हें वेद पाठ से रोकते हैं. तुम स्वयं उनको महत्त्व मत दो. पोथी पढ़पढ़कर आज तक कोई पंडित नहीं बना. आचरण की शुद्धता ही वेद है. अपने पड़ोसी से प्यार करना ही सच्चा जीवनदर्शन. उन्होंने तुम्हारे लिए मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए हैं. तुम उस ओर झांकों मत. पत्थर पूजने से देवता कभी नहीं मिलते. उल्टे हृदय पत्थर का बन जाता है. तुम्हारा परमात्मा तुम्हारे भीतर, अंतःकरण की शुद्धता में है—उसे पहचानो.’

भक्ति आंदोलन का विकास एक तरह से धर्म में नैतिकता, जिसने उसे जीवन में प्रासंगिक बनाया था और जो कर्मकांड और निरर्थक वितंडा के दौर में कहीं खो चुकी थी—का पुनः प्रवेश था. इसलिए जनसाधारण ने उसे हाथोंहाथ लिया. व्यापक जनसमर्थन पाकर भक्ति आंदोलन का प्रभावक्षेत्र निरंतर बढ़ता ही गया. वह पुरोहित वर्ग के लिए बड़ी चुनौती थी.

कालांतर में भक्ति मार्ग को जब समाज के शीर्षस्थ वर्गों का समर्थन मिलने लगा तो चालबाज पुरोहित वर्ग ने उसे भी अपने स्वार्थ के अनुसार ढालना आरंभ कर दिया. फलस्वरूप निराकार आराध्य को साकार में बदलने की कोशिशें तेज हो गईं. अपने दुर्व्यसनों तथा चालाकियों के कारण समाज में खासे बदनाम हो चुके वैदिक देवता, नए रूपाकार में प्रकट होने लगे. अवतारवाद को बढ़ावा मिला. इस दौर में द्वैतअद्वैत, साकारनिराकार पर जमकर बहसें चलीं. अशिक्षित और गरीबी से ग्रस्त समाज में वरीयता साकार को मिली. कबीर, रैदास, संत तुकाराम आदि संत कवियों तक भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग की धारा में कोई विरोध नहीं था. उन्होंने धर्म के साथसाथ दर्शन की बातें भी आसान शब्दावली में कही थीं, ताकि जनसाधारण भी उन्हें आसानी से समझ सके. आगे चलकर साकार भक्ति के रूप में अवतारवाद को बढ़ावा मिला तो ज्ञान का मखौल उड़ाया जाने लगा. बौद्धिक दीनता को भक्ति की विशेषता मान लिया गया. सूरदास ने गोपियों के माध्यम से भक्ति की ज्ञानमार्गी शाखा का खूब कटाक्ष किए गए. जिस समाज के कविकलाकारमार्गदर्शक ज्ञान का उपहास उसे निस्तेज होना ही था. भारत में यह काम भक्ति के नाम, धर्म और ईश्वर के नाम पर, पूरी ठसक के साथ किया गया, जिसे लंबे समय तक पंडितों का समर्थन मिलता रहा. नतीजा यह हुआ कि निराकार भक्ति आंदोलन के माध्यम से जिस सामाजिक क्रांति का आगाज कबीर, रैदास आदि संत कवियों ने किया था, वह धीरेधीरे व्यक्ति पूजा में ढलने लगी. उससे सामंतवाद को बढ़ावा मिला.

निराकार भक्ति का प्रचारप्रसार निरा भक्ति आंदोलन नहीं था. वह प्राचीन मुनियों की ज्ञानाधारित परंपरा को वापस लाने की बौद्धिक छटपटाहट का नतीजा था. चूंकि भारत के संत कवि समाज के निमस्थ वर्ग से आए थे और उनकी अभिव्यक्ति की भाषा संस्कृत न होकर, जनसाधारण की सधुक्कड़ी भाषा थी, इसलिए तत्कालीन बुद्धिजीवियों ने उसकी पूरी तरह उपेक्षा की. लेकिन साधारण बोलीबानी में कही गई वे बातें जनसाधारण के दिल में उतरती गईं. भक्तिकालीन कवियों को साकार और निराकार भक्ति के आधार पर वर्गीकृत करने का चलन रहा है. यह अमूर्त्त विभाजन है. इसकी जगह उचित होगा कि तत्कालीन कविता का अध्ययन संतकाव्य और भक्तिकाव्य के रूप में किया जाए. तब ज्ञानेश्वर, रैदास, कबीर आदि संत कवियों की श्रेणी में आएंगे. जबकि सूर, तुलसी, मीरा आदि की गिनती भक्त कवियों की जाएगी. समाज के कथित निचले वर्गों से आए संत कवि भक्ति और ज्ञान दोनों को साधे हुए थे. उनके चिंतन का दायरा व्यापक था. साधारण बोलीबानी में उन्होंने भारत की अध्यात्म परंपरा को उस वर्ग की पहुंच में लाने की कोशिश की थी, जिसे जातिआधारित विभाजन में उससे वंचित रखा गया था. जिस वर्ग से वे आए थे, वहां की बोलीबानी में वे भलीभांति पारंगत थे, इसलिए वे साधारण भाषा में लोककल्याण से जुड़ी असाधारण बातें बहुत आसानी से समझा सके थे. उनकी कविता में ऊंचाई और तत्वबोध दोनों ही थे. जिसकी तुलना हम प्राचीन यायावर मुनियों की कविता से कर सकते हैं.

भक्त कवि समाज के ऊंचे वर्गों से आए थे. अपने वर्गीय संस्कारों के साथ उन्होंने कविता को उसी रूप में ढाला. फलस्वरूप अवतारवाद और व्यक्ति पूजा को बल मिला. भक्त कवियों के लिए समाजार्थिक विभाजन महज विधि का विधान था. उसे केवल ‘ईश्वरीय अनुकंपा’ द्वारा ही मिटाया जा सकता था. संत कवियों ने मूर्तिपूजा और कर्मकांड का विरोध करते हुए चारित्रिक शुद्धता पर जोर दिया तथा असंतोष और लालच से दूर रहते हुए मिलजुलकर रहने का आवाह्न किया. एक समानता आधारित समाज के सपने को रैदास ‘बेगमपुरा’(बिना गम का शहर) के रूपक की तरह पेश करते हैं—

मैं बेगमपुर का वासी हूं. दुख, अंदेशे और शकसुबाह के लिए कोई स्थान नहीं है. वहां न तो मालगुजारी है, न लगान देने की चिंता. न कोई डर है, न ही किसी प्रकार की भूल या गलती का खौफ. मैंने ऐसा शहर पाया है, जहां सदैव खुशहाली छायी रहती है. वहां किसी को पतन का डर नहीं है. सभी बराबर हैं. बेगमपुरा की शासनव्यवस्था दृढ़ है और स्थायी है. वहां न कोई छोटा है, न बड़ा. सभी बराबर हैं. कोई दूसरे या तीसरे दर्जे का नागरिक भी नहीं है. सभी के लिए रोजगार है. मेरा नगर सज्जन और धनीमानी लोगों से भरपूर है. सभी बंधनमुक्त और आजाद हैं. जिसका जहां मन करे, जा सकता है. इस शहर में रहनेवाला प्रत्येक नागरिक मेरा मीतसखा है.’2

यह एक लोकतांत्रिक कामना है. जिसपर किसी भी आदर्श समाज की नींव रखी जाती है. ‘बेगमपुरा’ केवल रैदास का स्वप्न हो, ऐसा नहीं है. कबीर का सपना भी कुछ ऐसे ही शहर का था. कबीर की कविता में व्यंजना की भरमार है, रैदास की कविता में गहराई. शायद इसलिए कबीर ने रैदास को अपने से बड़ा माना है. रैदास के बेगमपुरा से वे भी सहमत हैं—‘अवधू यह बेगम देश हमारा.’ वहां का सत्त ही धर्म है. यहां ‘सत्त’ संपूर्ण न्याय का प्रतीक है. कबीर ने ‘बेगमपुर’ को अमर पुर भी कहा है. उल्लेखनीय है कि अमरपुर या अमरावती देवताओं की नगरी भी है. मगर वहां केवल देवता यानी अभिजन ही आजा सकते हैं. कबीर की अमरपुरी में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है. शर्त यह है कि व्यक्ति अहंकार को त्याग चुका हो. फिर चाहे वह बादशाह हो या फकीर. कबीर के अमरपुर में बसेरा कर सकता है—‘राजारंकफकीरबादसा सबसे कहौ पुकारा/जो तुम चाहो परम पद को, बसिहो देस हमारा.’ कबीर और रैदास दोनों ही बनारस के थे. संस्कृति की नगरी बनारस. धर्म के आधार पर विकसित संस्कृति आदमीआदमी में फर्क करती है. वह ‘जपमायाछापातिलक’ को सब कुछ मान लेती है. वर्णाश्रम व्यवस्था के सताए संत कवि बारबार नकली संस्कृति का लबादा उतार फैंकने को कहते हैं. भक्त कवि तुलसी के साथ ऐसा नहीं था. वर्णाश्रम व्यवस्था के शीर्ष से आए तुलसी के लिए वह आदर्श व्यवस्था है. इसलिए वे धर्म और वर्णाश्रम का गुणगान करते हैं. तुलसी के लिए ‘रामराज्य’ इसलिए आदर्श है, क्योंकि वहां सभी वर्णाश्रम के अनुसार अनुशासित हैं—‘बरनाश्रम निजनिज धरम निरत वेद पथ लोग.’

लोकतंत्र और समाजवाद जैसी विचारधाराएं आधुनिक पश्चिमी समाज की देन मानी जाती हैं. एक तरह से वे हैं भी. समाजवाद में जिस आदर्श समाज की कल्पना की जाती है, वैसा आदर्श समाज का सपना सबसे पहले हेनरी मूर(1478—1535) ने अपने व्यंग्य उपन्यास ‘यूटोपिया’ में देखा था. उसी से पश्चिम में समाजवाद और लोकतंत्र जैसी आधुनिक विचारधाराओं को प्रेरणा मिली. रैदास का ‘बेगमपुरा’ यानी ‘बिना गम का शहर’ हेनरी मूर से भी लगभग एक शताब्दी पहले की ऐसी ही मनोहर कल्पना यानी ‘यूटोपिया’ था. ऐसे समाज का स्वप्न जहां सभी लोग सभी स्तर पर बराबर हों. मूर का ‘यूटोपिया’ एक कटाक्ष है. वहां समानता की अवधारणा पर व्यंग्य किया गया है. कालांतर में उस व्यंजना को ही आदर्श मान लिया गया. जबकि रैदास का ‘बेगमपुरा’ व्यवस्था से सताए लोगों का मानवीय सपना था. अच्छा होता कि रैदास के बेगमपुर की कल्पना को बाकी लेखकोंकवियों का साथ भी मिला होता. तब संभव है कि समाजवाद और लोकतंत्र जैसे आधुनिक विचार भारत की जमीन पर ही शताब्दियों पहले ही जन्म ले चुके होते. लेकिन जहां विचार करना, किसी खास वर्ग की बपौती माना जाता हो, वहां नए विचार को जमीन मिलना आसान नहीं होता. पीढ़ियों से सत्ता केंद्रों पर जड़ जमाए लोग उसे आसानी से टिकने ही नहीं देते. रैदास और कबीर के साथ भी ऐसा ही हुआ था. शताब्दियों बाद विवेकानंद, दयानंद सरस्वती आदि ने धार्मिक सुधार की भरपूर कोशिश की, लेकिन प्रतिक्रियावादी शक्तियां हर बार किएकराए पर पानी फेरने का काम करती रहीं हैं.

क्रमशः..

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका

1. सांस्कृतिक निबंध, भगवतशरण उपाध्याय, 158.

2. बेगमपुरा सहर का नाऊँ, दुखु अन्दोह नहिं तिहि ठाऊँ.

ना तसवीस खिराजु न मालु, खउफ न खता न तरसु जवालु.

अब मोहि खूब वतन गह पाई,

ऊहां खैरि सदा मेरे भाई

कायम दायम सदा पातिसाही, दोम न सेम एक सो आही.

आबादानु सदा मसहूर, ऊहाँ गनी बसहिं मामूर

तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै हरम महल न को अटकावै.

कहि रैदास खलास चमारा, जो हम सहरी सुमीतु हमारा.

1 टिप्पणी

Filed under धर्म : प्रासंगिकता से जुड़े कुछ सवाल

One response to “धर्म : प्रासंगिकता से जुड़े कुछ सवाल

  1. आपके विचारों से पूर्णतया सहमत.

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