पूंजी का राज या राज की पूंजी

आलेख

सुरक्षा के बिना विकास का आनंद नहीं होगा. विकास के बिना सुरक्षा का आनंद नहीं होगा; और मानवाधिकारों का सम्मान किए बिना हम न तो सुरक्षा का सुख भोग सकते हैं, न ही विकास का.

कोफी अन्नान

सरकार समाज का सबसे अनुत्पादक और खर्चीला, मगर अनिवार्य कर्म है. मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता इसके कार्यक्षेत्र को सीमित कर, कम खर्चीला बना सकती है. इसलिए कि ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जहां एक सभ्य व्यक्ति को, यदि वह सभ्यता का मतलब कर्तव्यपरायणता से लेता है, यदि वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है तथा अपने कार्यों का निष्ठापूर्वक पालन करता है, तो उसको सरकार की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. कहने की आवश्यकता नहीं कि समाज में अधिकांश व्यक्ति ऐसे ही होते हैं, जो बस अपने काम से काम रखते हैं. सरकार के होने या न होने से उन्हें कोई अंतर नहीं पड़ता. ऐसे लोग अपने जीवन को शांतिपूर्वक जीना चाहते हैं और वे जीने की भरसक कोशिश भी करते हैं. थोड़ेबहुत विक्षोभ को जो परिस्थितिगत प्रभावों के कारण उनके जीवन को प्रभावित करने आ धमकता है, नजरंदाज कर वे अपने जीवन में रमे रहना चाहते हैं. सरकार कैसी है, किस दल की है. उसकी मूल सैद्धांतिकी तथा विकास को लेकर नीतियां कौनसी हैं, आदि बातों का उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. सही मायने में ऐसे लोग सरकार की जरूरत होते हैं. हर चौथे या पांचवे वर्ष मतदान के बहाने ऐसे लोगों की सहानुभूति अर्जित करने के लिए सरकार को उनके दरवाजे पर जाना ही पड़ता है. उनपर एक विद्वान की उक्ति सटीक बैठती है. उसने कहा था—‘दुनिया के सारे के सारे कानून व्यर्थ हैं. इसलिए कि एक भले आदमी को उनकी जरूरत नहीं पड़ती और जो बुरे हैं जिन्हें ऐसे कानूनों की जरूरत है, वे ऐसे कानूनों की परवाह नहीं करते. सरकार के साथ भी यही स्थिति है. ऐसे बहुत से लोग हैं जिनका काम उसके बिना भलीभांति चलता रहता है. किसी गांव के आदमी से पता कीजिए कि इस देश का प्रधानमंत्री कौन है? संभव है वह चुप्पी साध ले. उसे मालूम ही न हो. इसका उसे कोई मलाल भी नहीं होगा. हालांकि व्यक्तियों के संपर्क के मामले में वह किसी भी शहरी को पछाड़ सकता है. साफ है, आम आदमी सरकार के मुखिया का नाम भले न जाने, परंतु वह न केवल अपने गांव, बल्कि आसपास के अनेक गांवों के लोगों के नाम, मौसम, फसल, पशुपक्षी, व्रतत्योहार आदि के बारे में बता सकता है, जिसमें पढ़ेलिखे लोग पिछड़ सकते हैं. उनकी निगाह में उसके व्यावहारिक ज्ञान का, उस ज्ञान का उसके स्थानीय स्रोतों का परिचय दे, कोई महत्त्व नहीं होता. इसलिए वे उसे अज्ञानी कहकर मन को तसल्ली दे लेते हैं. कारण साफ है—हम सूचना को ज्ञान समझते हैं. और मनोरंजन के अवसरों को छोड़कर प्रायः उन्हीं सूचनाओं को महत्त्व देते हैं, जिनका बाजार या उत्पादकता से कोई संबंध हो, जो हमें किसी न किसी प्रकार लाभ पहुंचाने वाली हो. अगर कोई हमसे पूछे कि गेहूं की बुबाई कब की जाती है? ईख का बीज कैसा होता है? पशुओं की मुख्य बीमारियां क्या हैं, तो अधिकांश बगलें झांकने लगंेगी. पर किसी गांव वाले से पूछ लीजिए, खेती से कोई वास्ता न रखने वाला भी ऐसे सवालों को चलतेचलते बूझ देगा. पर हम उसके सवालों को महत्त्व नहीं देते. हम सूचनाओं को महत्त्व देते हैं. सरकार खुद सूचनाओं के दम पर चलती है. इसलिए सरकार सूचना को ज्ञान की अहमियत भी देती है. जबकि सूचना ज्ञान का उपकरण है. वह स्वयं ज्ञान नहीं है. ज्ञान अपने आप में जटिल संकल्पना है. जब हम किसी वस्तु के बारे में ज्ञान का दावा करते हैं तो हमारा आशय होता है कि हमें उस वस्तु के उस पक्ष की जानकारी है, जो केवल सूचनाओं तक सीमित नहीं है. सरकार के जितने भी नेता या अधिकारी हैं, सब सूचनाएं बटोरने में लगे रहते हैं. इनमें नेताओं को सूचना बनाने और अधिकारियों को सूचनाएं बटोरने वाली मशीन कह सकते हैं. दूसरे शब्दों में अधिकारीगण नेताओं और पूंजीपतियों द्वारा बोई गई सूचनाओं की फसल काटते रहते हैं.

आप कहेंगे कि यह कैसी उलटबांसी है! आदमी ने सभ्यता के क्रम में ही सरकार बनाना सीखा है. आज का जीवन कितना व्यवस्थित है….दोषी को सजा दिलाने के लिए कानून है. अपराध रोकने के लिए पुलिस. सरकार न हो तो अस्पताल, यातायात, बिजली और पानी की आपूर्ति आदि सब धराशायी हो जाएं. हो सकता है कुछ अर्थों में उनका यह कहना सही हो. हमने देखा है ऐसे मामलों में सरकार की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण होती है. आज किसी एक प्रांत में अनाज की कमी पड़े तो सरकार तत्काल देश के दूसरे रास्तों से विदेश से जरूरतमंदों के लिए भोजन की व्यवस्था करती है. बीमारों की देखभाल के लिए अस्पताल हैं. यातायात को सुगम बनाने के लिए सड़कें और शिक्षा के लिए बेहतर सुविधाएं हैं. सरकार न हो तो इनकी कौन देखभाल करे. लेकिन ऊपर दिए गई सुविधाओं, शिक्षा, यातायात, स्वास्थ्य आदि में से कुछ भी ऐसी नहीं है जिसके लिए केवल सरकार पर निर्भर रहा जाए. बल्कि सरकार स्वयं इनके लिए निजी संस्थाओं पर रहने की वकालत करने लगी है. बड़े शहरों में शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात तो पहले ही निजी संस्थानों के हवाले था, अब सफाई, बिजली सप्लाई जैसे कार्य भी जो रोजगार सृजन के बड़े आधार थे, निजी संस्थानों को सौंपे जाने लगे हैं. जहां तक कानून और पुलिस प्रशासन की बात है, सरकार द्वारा दी जाने वाली ये व्यवस्थाएं इतनी लचर हैं कि कुछ पूछो मत. पुलिस की हालत इतनी गई बीती है कि लोग सिपाही को ‘वर्दी वाला गुंडा’ तक कह देते हैं. ऐसे माहौल में काम करते हुए पुलिस कर्मचारी अपना आत्मबल इतना गंवा चुका होता है कि इसका विरोध तक नहीं कर पाता. अस्पतालों का यही हाल है. यही हाल शिक्षा का भी है. सरकार नौकरी होने का रौब भले हो, परंतु आम धारणा यही है कि जिन सेवाओं से सरकार के होने का औचित्य सिद्ध होता है, उन्हें प्रदान करने में सरकार पूरी तरह नाकाम सिद्ध होती है. आदमी ही क्यों, सरकार का भी अपने सुरक्षातंत्र से भरोसा उठ गया लगता है. नहीं तो रेलवेस्टेशन पर जाकर सरकार की उद्घोषणाएं सुन लीजिए. चौबीसों घंटे माइक पर यही सुनाई देगा—‘लावारिस वस्तुओं को न छुएं….अपने आसपास अच्छी तरह देखें. अनजान वस्तु बम हो सकती है.’ यानी सरकार सुरक्षा जैसा काम भी ढंग से नहीं कर पाती. फिर भी सरकार का होना हमें अपरिहार्य लगता है. सरकार के बगैर भी समाज चल सकता है, इस बारे में सोच भी नहीं पाते. कारण साफ है, हम अपना नागरिक धर्म भूल चूके हैं. सब कुछ सरकार भरोसे छोड़कर निश्चिंत हो जाना चाहते हैं. पड़ोसी भूखा रहे, हमारी नींद खराब नहीं होती. उसपर कोई संकट आन पड़े तो हम पुलिस को फोन कर अपने नागरिक कर्म की इतिश्री कर देते हैं. परंतु अब संबंध औपचारिक हो चुके हैं. पहले यह केवल शहरों तक सीमित था. अब कस्बों और गांवों में भी शहर की यह बीमारी प्रवेश कर चुकी है. आप कहेंगे कि इसमें सरकार क्या कर सकती है? मैं कहूंगा कि यदि नहीं कर सकती तो उसकी जरूरत ही क्या है? शिक्षा, बिजली, पानी, यातायात, स्वास्थ्य, सुरक्षा जिनके होने से कभी सरकार का होना सिद्ध होता था या जो कल्याण सरकार की प्रतिनिधि जनसेवाएं कही जाती थीं, उन सबसे तो सरकार एकएक कर पल्ला झाड़ चुकी है. जो शेष हैं उन्हें भी जिम्मेदारी से पीछे हटती जा रही है. सारे काम निजी सेवाएं निजी कंपनियों के हवाले करती जा रही है. फिर सरकार के बने रहने का औचित्य? ऐसा कौनसा कार्य शेष है जो सरकार के होने को सार्थक बनाए.

सरकार के पक्ष में आपसे कुछ तर्क दिलवाकर मैं उसको अपरिहार्य नहीं बनाना चाहता. मैं चाहता हूं कि आप स्वयं मान लें कि आपको सरकार की जरूरत नहीं है. जिन कार्यों के लिए आप अभी तक सरकार पर निर्भर रहते आए थे, वे दरअसल सरकार के थे ही नहीं. अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए सरकार ने आपसे हथिया लिए थे. जब तक आपको शासित होने की आदत नहीं थी. अपनी जिम्मेदारियों को दूसरों पर डाल देना आपका स्वभाव नहीं था, उस समय तक सरकार आपकी अपनी होने का एहसास दिलाती थी. आपकी सहानुभूति अर्जित करना चाहती थी. परंतु जैसे ही सरकार आपकी जरूरत बनी, जिस दिन से आपने यह मानना आरंभ किया कि फलांफलां काम सरकार के हैं, उन्हें सरकार को ही करना चाहिए. नागरिक होने के नाते मैं भला क्या कर सकता हूं! उसी दिन से सरकार ने अपनी ताकत को पहचानना आरंभ कर दिया. यानी सरकार को जो ताकत मिलती है, उसका जो भारीभरकम लावलश्कर तैयार होता है, वह नागरिकों की कमजोरी या अपने कर्तव्य के प्रति उदासीनता से मिलता है. अधिकारों के प्रति चेतना के अभाव से, जंनतंत्र की कमजोरी से भी मिलता है. एक जागरूक समाज सरकार के बिना भी रह सकता है. समाज यदि आपसी तालमेल बनाने में कामयाब सिद्ध होता है. यदि वह अपने अधिकारों के साथसाथ कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक है? तो उसको सरकार की जरूरत ही नहीं रह जाती. और सरकार का काम भी यही है कि वह लोगों के आत्मविश्वास को वापस लाए, उन्हें उनके अधिकारों से परचाए और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करे. ताकि वे अपनी चुनौतियों से स्वयं निपट सकें. जो काम राजनीतिक संस्थाएं करती हैं, उनमें से अधिकांश को सामाजिक संस्थाओं से कराए, जो कम खर्चीली और ज्यादा जबावदेह होती हैं. यदि सरकार का काम यही सब है तो वह सामाजिकता को बनाए रखने के लिए जरूरी कदम क्यों नहीं उठाती. ऐसे सवालों पर सरकार अकसर यह कहकर पल्ला झाड़ लेती है कि यह करने से लोगों की जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप होगा. अगर सरकार परस्पर तालमेल बनाए रखना अपना कर्तव्य मानती है तो यह बुरी बात नहीं. पर सरकार का यह कार्य प्रायः अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने के लिए दिया करती है.

अब यह जान लिया जाए कि सरकार किसकी जरूरत है? सामान्यतः यही माना जाता है कि सरकार समाज की जरूरत है. चूंकि समाज अपने नागरिकों के योग से मिलकर बनता है इसलिए सरकार को नागरिकों की जरूरत कहकर प्रचारित किया जाता है. कम से कम जो लोग सरकार में हैं, वे तो यही कहकर अपना औचित्य सिद्ध करते हैं. हालांकि उनका यह दावा यथार्थ से एकदम परे है. सरकार चाहे कितनी ही उदार क्यों न हो, वह कुछ न कुछ तो शासन करती ही है. यह शासन कहीं न कहीं नागरिक स्वतंत्रता की कीमत पर होता है. तो क्या यह मान लिया जाए कि नागरिकगण स्वयं अपनी स्वतंत्रता का बोझ नहीं संभाल पाते, इसलिए वे सरकार के गठन को बाध्य हो जाते हैं? यदि इसे सच मान लिया जाए तो इसका अगला निष्कर्ष यह होगा कि मनुष्य अपनी स्वतंत्रता का सबसे बड़ा दुश्मन स्वयं होता है. अपनी स्वतंत्रता वह बड़ी आसानी से समाज के प्रभुवर्ग के हाथों में सौंपकर निश्चिंत हो जाता है और अपना जीवन ‘कोऊ नृप होय हमें का हानि’ कहते हुए बिताता है. ऐसी अवश्था में मानवाधिकार और व्यक्तिस्वातंत्र्य अर्थहीन होकर रह जाता है. एक सोये हुए समाज के लिए क्रांति के कोई मायने नहीं होते. बड़ीबड़ी क्रांतियां उसके आसपास से होकर गुजर जाती हैं और उसे पता तक नहीं चलता. भारतीय समाज के बारे में ऐसा हुआ है. पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में जब पश्चिमी जगत वैज्ञानिक क्रांति से गुजर रहा था, तब हमारे भक्तकवि प्रभुभक्ति में आत्मलीन नजर आ रहे थे. दलित और पिछड़े वर्ग से आए भक्त कवियों के लिए जातीय उत्पीड़न के सवाल तो थे, मगर आर्थिक असमानता जैसा कोई मुद्दा उनके आगे नहीं था. वे संतोष धन को ही सबसे बड़ा धन मानकर उसका गुणगान करने में लगे हुए थे. ‘सूखीसूखी खाय के ठंडा पानी पीव’ को ही सत्कर्म माने हुए थे. गरीबी उनकी ठसक थी. अगर कहीं से धन हासिल हो जाए उसे फेंक दिया करते थे. बस चले तो दानदाता को दुत्कार भी देते थे. दूसरी ओर शीर्षस्थ वर्ग ‘भूखे भजन न होय गोपाला’ कहकर कंगाली में भगवान को भी अंगूठा दिखाने को तत्पर रहता था. एक वर्ग दैन्य को अपना जीवन मान चुका था, दूसरे को उसका कोई अभ्यास नहीं था. धर्म एक के लिए अपने दैन्य से समझौते का नाम था, दूसरे के लिए अपनी सत्ता को बनाए रखने की रणनीति. उन्हें न तो मनुष्य के अधिकार याद थे, न ही संस्कृतिबोध था. उनका न तो बीता कल था, न ही आनेवाला कल. केवल गयागुजरा वर्तमान था, जिसे वे जैसेतैसे गुजार देना चाहते थे.

था॓मस पेन ने कहा है व्यक्ति समाज या राज्य में अपनी स्वतंत्रता को गंवाने के लिए सम्मिलित नहीं होता. बल्कि इसलिए सम्मिलित होता है कि वह अपनी स्वतंत्रता के साथसाथ उन सुखों का भी भोग कर सके, जिन्हें वह मानवीय सीमाओं के चलते स्वयं अर्जित करने में अक्षम है. बदले में वह जो स्वयं उत्पादन करता है, उसका एक हिस्सा दूसरों को देता है. समाज और व्यक्ति के संबंधों के गठन का मुख्याधार यही है. जबकि वह वर्ग समाज के बीच रहकर भी असुरक्षित और उत्पीडि़त था. उसका जीवन अपने लिए नहीं, दूसरों के सुखों में वृद्धि करने के लिए था. असमानताकारी व्यवस्था, सामंतवाद के लक्षणों को वह अपने जीवन में पूरी तरह आत्मसात् कर चुका था और उसी को अपना गौरव मानता था. इसी भावना के चलते पन्ना धाय हत्यारे के आगे राजा के बेटे की सुरक्षा करने के लिए अपने बेटे को आगे कर खुद को धन्य मान लेती है. प्रत्येक जीव में एक ही परमात्मा को मानने वाली, आत्माआत्मा को बराबर मानने वाली व्यवस्था पन्ना के कृत्य की आलोचना नहीं करती, बल्कि महिमामंडन करती है. जबकि सत्ताओं को बचाने के लिए जनसाधारण ऐसे ही बलि का बकरा बनते रहे. सामंतवाद की यह पराकाष्ठा कथित भगवान हाथों प्राप्त मौत के बाद मोक्ष मिलने के पाखंड में दिखाई पड़ती है. आततायी सत्ताओं के आतंक से मुक्ति, उनकी अनिवार्यता के एहसास से मुक्ति के लिए इन सांस्कृतिक अज्ञानताओं से बाहर आना जरूरी है.

लोग कहेंगे कि सरकार न होगी तो कानून कौन बनाएगा? न्यायालयों का संचालन कौन करेगा? सेना और पुलिस बल किसके अधीन रहेंगे? अपराधी तत्व सिर उठाने लगेंगे. कानून का डर ही तो अपराधियों की नाक में नकेल डाले रखता है. ऐसा करते समय हम यह तथ्य बिलकुल भुला देते हैं कि अपराध का अनुपात आज पिछले जमाने की अपेक्षा कहीं अधिक है. हमारी जेलें अपराधियों से भरी पड़ी हैं. अदालतों के पास इतने मुकदमे हैं कि सुनवाई का समय निकाल ही नहीं पातीं. एकएक मुकदमे की सुनवाई में वर्षों निकल जाते हैं. भारत सरकार के एक मंत्री की हत्या के एक मुकदमे का फैसला हाल ही में, चालीस वर्ष बाद आया है. इतने लबें अर्से तक टलने के बाद न्याय का कोई औचित्य रह ही नहीं जाता. यह काम लोकतंत्र के नाम पर, अभियुक्त पक्ष को बचाव का पूरा अवसर देने के नाम पर किया जाता है. अभियुक्त को सफाई का पूरा अवसर मिले, यह उसका अधिकार है. लेकिन इस बहाने न्याय केवल मजाक बनकर रह जाए, यह और भी बड़ी विडंबना होगी. ध्यान रहे यह स्थिति तब है जब पुलिस आधे से अधिक मुकदमे दायर ही नहीं करती. अगर पुलिस सारे के सारे केस दायर करने लगे तो आदमी को अपनी जिंदगी में, अदालतों की सुस्त रफ्तार के चलते, कभी न्याय मयस्सर न हो. यानी सरकार होने के एहसास, और इस बहाने अपराधियों थोड़ा भय होने के अलावा उसके रहने या न रहने से जनसाधारण को विशेष लाभ नहीं पहुंचा है.

कुछ लोग कहेंगे कि अपनी सरकार होने से सबको बोलने की समान आजादी है. अभिव्यक्ति का आनंद. जिसे यह सुविधा प्राप्त नहीं, उससे पूछिए. यह मनुष्यता की गरिमा का प्रमाण है. सच में मनुष्य को मनुष्य होने जैसा एहसास कराता है. सवाल है कि अभिव्यक्ति की आजादी जैसे सवाल जन्मे ही क्यों? क्यों यह स्थिति आन पड़ी कि लोगों की अभिव्यक्ति पर भी बंदिशें थोपी जाने लगीं. यदि सभी मनुष्य बराबर हैं, प्रकृति ने सभी को समान विशेषताएं दी हैं तो वे कौन लोग थे, जिन्होंने लोगों की अभिव्यक्ति पर बंदिश लगाने की शुरुआत की. जाहिर है वे सत्ताओं पर अनाधिकृत कब्जा जमाने वाले लोग रहे होंगे. उन्होंने पहले एक वर्ग के पढ़नेलिखने पर पाबंदी लगाई. जिन शास्त्रों के माध्यम से शासन चलाया जाता था, जिनको दैवी मानकर बातबात पर दुहाई दी जाती थी, उन्हें पढ़ना इतना बड़ा अपराध हो गया कि कान में पिघला सीसा डालने तक की सजाएं दी जाने लगीं. वह वर्ग जानता था कि जो सत्ता वह चला रहा है, वह दूसरे वर्ग की मूक सहमति पर ही टिकी है. यदि उसकी कमजोरियां सामने आने लगें तो लोग जो संख्या में कहीं अधिक हैं, जिनकी सम्मिलित शक्ति किसी भी राज्य की शक्ति से कहीं अधिक है, बल्कि राज्य को उसकी शक्तियां ही उसके समर्थन से प्राप्त हैं, वे अपनी शक्ति का एहसास कर अल्पसंख्यक सत्ताधारियों को एक झटके में उखाड़ फेंकेंगे. इसलिए उसने लोगों से बोलने का अधिकार ही छीन लिया. वेदों को विमर्श से बाहर निकालकर आप्तग्रंथ बना दिया गया. ताकि उनकी समीक्षा, उनमें दर्ज सामग्री पर संवाद ही न हो सके. वेदों से हुई शुरुआत दूसरे ग्रंथों तक भी पहुंची. अब यदि लोगों को अपने अतीत का स्मरण न हो, तो उससे संवाद करने का सलीका कहां से लाएंगे. और उसपर संदेह न करें तो सांस्कृतिक विकास कैसे होगा. इसलिए पहले सांस्कृतिक दासता की शुरुआत हुई. जिसे बहुत जल्दी राजनीतिक और सामाजिक दासता का रूप दे दिया गया. मानवाधिकार मनुष्य को उस दासता से उबारने की कोशिश हैं, जो सांस्कृतिक गुलामी के कारण जन्मी है. अभिव्यक्ति की आजादी, जो मनुष्य का मौलिक अधिकार है, बंद गुंबद में रोशनदान की तरह है. जिसके माध्यम से गुंबद में रह रहे लोग इंसान होने के एहसास को बचाए रख सकते हैं.

सरकार के होने से हम सब इतने अनुकूलित हैं कि असरकार होने के डर से ही लगता है सबकुछ बिखर जाएगा. इसलिए जब भी चर्चा होती है, सब असरदार सरकार की मांग करने लगते हैं. ‘सरकार’ समाज के बारे में सोचते हुए भी घबराते हैं. और सरकार है कि उसमें बैठे लोग केवल उतनी ही आजादी लोगों को देना चाहते हैं, जितनी से उनकी सत्ता बनी रहे. आखिर कुछ ऐसे लोग भी चाहिए जिनके माध्यम से अभिजातपन को दर्शाया जा सके. लोग इस बनावटी विभाजन को अकाट्य सच मान लेते हैं, इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे वरदान भी उसका भला नहीं कर पाते. यूं भी ऐसी आजादी का कोई अभिप्राय नहीं जिसका लोग लाभ न उठा सकें. क्योंकि जिन लोगों ने अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन किया, वे अभिव्यक्ति को कुंद करने का माध्यम भी ले आए. देखते ही देखते ज्ञान को सूचनाओं में बदल दिया गया. परीक्षाएं वस्तुनिष्ठ आधार पर ली जाने लगीं. स्मृति को कुंद करने के लिए मोबाइल आया. भाषा को कुंद करने के लिए एसएमएस, और सस्ते मनोरंजन को बढ़ावा देने के लिए वाटअप. विकास का अभिप्राय साफसुथरी सड़क और नागरिक सुविधाओं तक सिमट गया. घर के भीतर मनुष्य कैसा जीवन जीता है, उसकी रसोई में पक रहा भोजन पौष्टिक हैं भी या नहीं—इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता ही नहीं रही. जब अभिव्यक्ति कला का बोध ही न हो तो अभिव्यक्ति ही आजादी का मतलब क्या! अभिव्यक्ति की अधकचरी कला प्रदूषित अभिव्यक्ति के मायने ही बदल देती है.ऐसे लोगों को मतदान के बहाने आसानी से फुसला जा सकता है. धर्म, जाति और क्षेत्रीयता के प्रलोभन उसको मूल मुद्दों से भटकाए रहते हैं. लोगों का अभिव्यक्ति का अधिकार सुरक्षित रहे, जरूरी है. पर उतना ही जरूरी है अभिव्यक्ति कला का परिमार्जन. जिसकी समझ इतिहास, संस्कृति और ज्ञान के अधुनातन रूपों को समझे बिना असंभव है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आधुनिक कानून की विशेषता माना जाता है. नवसभ्यता का प्रतीक. यहां सरकार का आशय हर उस वर्ग से है जो शीर्ष पर विराजमान होकर दूसरों को निर्देश देता है. उसमें पक्ष और विपक्ष में मौजूद सभी नेता, अधिकारी आदि सम्मिलित हैं, जो उत्पादन में सीधे हिस्सा न लेकर समाज के दूसरे के श्रमकौशल पर निर्भर रहते हैं. समाज मुख्यतः शासक और शासित में बंटा होता है. सत्ता हमेशा शासकवर्ग के अधीन होती है, जो कभी पक्ष तो कभी विपक्ष में रहकर उसका लाभ उठाता है. अतएव अभिव्यक्ति की आजादी केवल सरकार के भरोसे संभव नहीं. सरकार अपने विरोध को विद्रोह की तरह लेती है. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जब अभिव्यक्ति के लिए सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा है. कुछ महीने पहले अरुंधति राय और बाद में प्रशांत भूषण ने सरकार की कश्मीरी नीति की आलोचना कर दी थी. सरकार तो चुप्पी साधे रही, लेकिन तथाकथित राष्ट्रवादियों को उनका बयान बेहद नागवार गुजरा था. जैसे अरुंधति और प्रशांत भूषण इतने शक्तिशाली हों कि उनके कहनेभर से कश्मीर पाकिस्तान के हाथों में चला जाएगा. इस पर वे लोग विशेष तौर पर नाराज थे, जो राष्ट्र को जड़ अवधारणा मानते हैं. यहां मामला अरुंधति राय या प्रशांत भूषण के अलगअलग बयानों के औचित्य का बिलकुल नहीं है. मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति ऐसे समाज के दृष्टिकोण का है, जो लोकतांत्रिक होने का दावा करता है और नियमित अंतराल के बाद अपने प्रतिनिधि चुनकर सरकार बनाता है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र प्राणवायु है. उसके न रहने से लोकतंत्र के निष्प्राण होने से कोई नहीं रोक सकता. लोकतांत्रिक समाजों से यह अपेक्षा तो की जाती ही है कि वे व्यक्ति के वाक् को नियंत्रण मुक्त रखें. मनुष्य यदि विवेकशील प्राणी है तो उसके विचारों का सम्मान होना चाहिए. किसी व्यक्ति की टिप्पणीमात्र से यदि किसी समाज की भावनाएं आहत होती हैं और वह उस व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ही सवाल खड़े करने लगता है तो मानना चाहिए कि उस समाज ने खुद को लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप ढालने में अभी देर है. ऐसे समाज में लोकतांत्रिक पद्धति पर चुनी गई सरकारें भी किसी न किसी दृष्टि से कमजोर होंगी ही.

सरकार सभ्य समाज की अनिवार्य बुराई, एक खर्चीला आयोजन है. लेकिन सच यह भी है कि बिना सरकार के आधुनिक समाज का काम सधने वाला नहीं है. इसलिए कि नहीं कि सरकार समाज की अपरिहार्यता है. बल्कि इसलिए कि समाजों में जिस तरह नागरिकताबोध का तेजी से पतन हुआ है, जिस तरह से लोग एकदूसरे की ओर संदेह से देखने लगे हैं, सार्वजनिक जीवन जिस तरह अविश्वास ने जगह घेर ली और विकास के नाम पर जो सैंकड़ों किस्म की संस्थाएं खड़ी की गई हैं, उन पर नियंत्रण और तालमेल बनाए रखने के लिए एक बड़ी संस्था की जरूरत है. सामंतवादी व्यवस्था में शीर्षस्थ वर्ग न केवल संसाधनों को कब्जाए रहता है, बल्कि लोगों के दिलों पर भी अधिकार कर लेता है. वे मन और विचारों से पंगु हो जाते हैं. दूसरों का हित तो दूर वे अपने हितानुकूल निर्णय कर पाने में भी असमर्थ होते हैं. ऐसे लोग केवल सिर झुकाकर आदेश मानने को बाध्य होते हैं. यानी लोगों की शासित होने की इच्छा ने सरकार को अपरिहार्य बनाया है. उन लोगों ने बनाया है जो छोटीछोटी बातों के लिए सरकार का मुंह देखते रखते हैं. जो अपने दरवाजे के ठीक सामने बने गड्ढे को भरने से इसलिए मुंह मोड़ लेते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि वह जमीन नगर पालिका की है. जैसे नगरपालिका उनकी अपनी संस्था न होकर ऊपर से थोपी गई संस्था हो. ऐसे लोग जो मामूली कार्यों के लिए भी सरकार का मुंह ताकते रहते हैं, वही उसकी उपस्थिति को अनिवार्य बनाते हैं. वरना बाहरी दुश्मनों से सुरक्षा और विदेशनीति के अलावा ऐसा कोई कारण नहीं है, जो सरकार के औचित्य की अनिवार्यता सिद्ध करता हो. आपाधापी के बीच लोग अपना धर्म भूल जाते हैं, व्यक्तिस्वातंत्र्य के वास्तविक अर्थ को भूल जाते हैं, यह भूल जाते हैं कि उनकी स्वतंत्रता या सुख पड़ोसी की स्वतंत्रता और सुख से अलग नहीं है, इसलिए वे सरकार नामक संस्था का औचित्य गढ़ते हैं. एकदूसरे को संदेह की निगाह से देखने के स्वभाव ने ही सरकार की अनिवार्यता सिद्ध की है.

विज्ञान और आधुनिक तकनीक ने व्यक्ति को जितना शक्तिशाली बनाया है, उससे लगता है कि उसके आगे कोई सीमा और मर्यादा है ही नहीं. मानवीकरण के नाम पर विकसित अनेक आधुनिक सुविधाएं अमानवीकरण की कोशिश करती नजर आती हैं. ऐसा नहीं है कि ऐसी तकनीक का कोई समाजार्थिक महत्त्व न हो. तकनीक ने मानवजीवन को सुविधामय बनाने के लिए अनेक विलक्षण काम किए हैं. उसके मनुष्यता पर अनेकानेक अहसान हैं. उसमें विपुल संभावनाएं हैं. इसलिए तकनीक के लोकहितकारी उपयोग पर जोर दिया जाना चाहिए. नई तकनीक की खोज भी आवश्यक है. लेकिन लेकिन तकनीक के विशुद्ध व्यावसायिक रूप ने मनुष्यता को नुकसान भी बहुत पहुंचाया है. इसलिए समय आ पहुंचा है कि हम अपने जीवन में तकनीक की सीमा निर्धारित करें. उसके उपयोग की दिशा पर नियंत्रण रखें. अपने वैज्ञानिकों और उत्पादकों को बताएं कि वे हमारे लिए नवीन तकनीक के किस प्रकल्प पर काम करें? उनके शोध की दिशा क्या हो? यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो एक जागरूक नागरिक और समाज के रूप में हम क्या कर सकते हैं, वह उन्हें समझाएं. यह कार्य सरकार को करना चाहिए. वह नहीं करती. या कर नहीं पाती. दरअसल सभ्यताकरण के नाम पर जो भारीभरकम तामझाम सरकार का बन चुका है, उसे चलाने कके लिए पैसा चाहिए. हर पांचवे वर्ष नेताओं को चुनाव में उतरना पड़ता है, उसके लिए पैसा चाहिए. और पैसा कमाने का सरकार की निगाह में सबसे आसान तरीका कराधान का है. जिसका बड़ा हिस्सा उद्यमियों और पूंजीपतियों की ओर से आता है. सरकार को पैसा चाहिए. उद्योगपतियों को मुनाफा. ऐसे में पूंजीपति यह शर्त थोपने में कामयाब हो जाते हैं कि पैसा चाहिए तो हमें निर्बंध काम करने की अनुमति दी जाए. यही होता है. सरकार एडम स्मिथ के ‘लेजेज फेयर’ का अनुसरण करने लगती है. बदले में पूंजीपतियों की ओर से पैसा आता है. हालांकि यह बड़ा भ्रम है. अपनी स्थिति और पहुंच का लाभ उठाते हुए पूंजीपति केवल उसका श्रेय ले जाता है. सच तो यह है कि सरकार के साथसाथ पूंजीपति का खजाना भी जनता की खूनपसीने की कमाई से भरता है. बहरहाल, सरकार को अपने समर्थन में देख पूंजीपति और पैसा कमाना चाहते हैं. उनकी सहूलियत के लिए सरकार कुछ ऐसी नई संस्थाओं का गठन करती है, जिससे उनकी राह आसान हो सके. परिणामस्वरूप पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ता है और वे फिर नई शर्तें थोपने, कुछ और आजादी की मांग करने लग जाते हैं. धीरेधीरे जो संस्थाएं सरकार ने खड़ी की थीं, वे पूंजीपतियों का मुनाफा कमाने का माध्यम बन जाती है. जैसे कि शिक्षा मनुष्य का मौलिक अधिकार है. इसलिए वह सभी को बराबर, एक समान मिलनी चाहिए. लेकिन हालात ऐसे नहीं हैं. प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में ही एक ओर ऐसी पाठशालाएं हैं, जहां बिछाने के लिए टाट तक नहीं हैं. दूसरी ओर वातानुकूलित कमरों से बने, आलीशान कान्वेंट स्कूल हैं. यह विषमता सड़क, यातायात, मनोरंजन हर जगह देखी जा सकती है. यहां तक कि अदालतें भी पीछे नहीं हैं. पूंजीपतियों के समर्थन और पैसे बनी सरकार को उन्हें मनमर्जी करने की छूट देनी ही पड़ती है. अब पूंजीपति हैं तो किसी एक तकनीक से भला क्यों संतुष्ट होंगे. वे हर उस क्षेत्र पर छा जाना चाहते हैं, जहां से उन्हें मुनाफे की उम्मीद हो. उनका बस चले तो आदमी सांसों का व्यापार भी करने लगें. असल में तो वे ऐसा करते भी हैं. अत्याधुनिक पूंजी के दम पर बने अस्पतालों को देख लीजिए. वहां ऐसा ही होता है. जिसके पास खर्च करने को है. एक साथ कई डा॓क्टर उसकी सांसों की गिनते करने में जुटे रहते हैं. ऐसी जिंदगियां जो सांसों की कीमत का भुगतान करने में नाकाम हैं, वे अस्पताल के बाहर भीड़ भरे चौराहों पर दम तोड़ लेती हैं. बाजार में बढ़ रही सुविधाओं तथा उन्हें एक झटके में बटोर लेने की चाहत ने आदमी को संवेदनहीन बनाया है. मानवकल्याण से जुड़ा प्रत्येक क्षेत्र जो कहीं न कहीं मानवाधिकार का मसला भी है, कई खानों में बंटा हुआ है. यदि गौर देखा जाए तो वे सब पूंजीपतियों के मुनाफा कमाने के रास्ते हैं. सरकार की मजबूरी है कि लोकतंत्र के कारण उसे जनता पर निर्भर रहना पड़ता है. विकास का दिखावा करना पड़ता है. इसलिए वह जबतब लोककल्याण कार्यक्रमों का दिखावा करती रहती है. मगर हालात में वास्तविक परिवर्तन हो नहीं पाता. सरकार संवेदनहीनता को बनाए रखने का भी कोई प्रयास नहीं कर पाती. वह आदमी को निस्संवेद भीड़ में बदलने के लिए प्रयासरत होती है.

इन कमजोरियों के बावजूद सरकार यदि जरूरी है तो सोचना होगा कि कौनसी सरकारें ज्यादा हितकारी है. वे कौनसी सरकार हैं, जिनके रहते मनुष्य अधिकतम स्वतंत्रता, सुख और सुरक्षा की प्राप्ति कर सकता है? सभ्यता के आरंभ से लेकर आज तक सरकार के अनेक रूप अपनाए जा चुके हैं. ऐसा दौर भी देखा गया है कि जब एक ही युग में विभिन्न देशों में सरकार के अलगअलग रूप रहे हैं. कुछ देशों में मिश्रित सरकार के प्रयोग हुए. लेकिन वह नाकाम सिद्ध हुए. सरकार की यानी अच्छी सरकार के बारे में कहा गया है कि सरकार जो कम से कम शासन करे. इसका एक अर्थ यह भी है कि सर्वोत्तम सरकार न्यूनतम शासन करती है. वह शासन करने जैसी स्थिति बनने नहीं देती. अपने आचरण की नैतिकता का उदाहरण पेश कर वह अपने नागरिकों का नैतिक स्तर इतना ऊपर उठा देती है कि उन्हें किसी बाहरी शासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. पर न्यूनतम शासन कह देना आसान है, उस स्थिति को प्राप्त करना बहुत ही कठिन. आखिर सत्ता और संपत्ति को नापसंद कौन करता है. समाज में होड़ मची हो तो आगे निकलकर दूसरों से विशिष्ट दिखने के लिए सत्ता और संपत्ति दोनों की प्रमुख भूमिका होती है. दरअसल हमारी यह मानसिकता दर्शाती है कि हम अच्छी सरकार चाहते ही नहीं हैं. हमारा खुद से मनुष्यता से विश्वास उठ चुका है. हम सुधार की उम्मीद छोड़ चुके हैं. और अब हालात यह हैं कि हमारा आलस्य और लापरवाही हम पर भारी पड़ने लगी है. इसलिए चुनावों के बाद हमारे यहां चेहरे बदलते हैं. कभीकभी पुराने चेहरे ही मुखौटा लगाकर हाजिर हो जाते हैं. वास्तविक सत्ता परिवर्तन कभी हो नहीं पाता. फिर भी यदि इस सत्य को हम समझने लगे हैं, यदि हम जानने लगे हैं कि लोकतंत्र को भीड़तंत्र या कुलीनतंत्र में बदलत़े हुए देखने के लिए हम भी उतने ही जिम्मेदार हैं, तो भूलसुधार जैसी कोशिश की जा सकती है. की जानी चाहिए.

यदि हम इस सत्य को जानने लगे हैं कि अच्छी सरकार वह है जो कम से कम शासन करती है, तो इसका सीधासा अभिप्राय है कि अच्छी सरकार वह है जो अपने नागरिकों को स्वयं शासित बनाने, आत्मानुशासन में ढालने का संकल्प धारण कर चुप नहीं बैठ जाती. बल्कि निरंतर प्रयासरत रहती है. वह जानती है कि यदि नागरिक आत्मानुशासित होंगे तो उन्हें किसी प्रकार के बाह्यानुशासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. लेकिन यह अनुशासन पीटी के अध्यापक द्वारा अनुशासन शब्द बोलना और भागीदारों का एक खास मुद्रा में आ जाना नहीं है. अनुशासन शब्द व्यापक है. वह मर्यादित भोग और संतुलित वितरण में सहयोग तक जाता है. यह आत्मसम्मान के साथ दूसरे के मान को सुरक्षित बनाए रखने का मामला भी है. यह जियो और जीने दो की भावना है. यह कोई नई समस्या नहीं है. मनुष्य इस समस्या से शताब्दियों से जूझता आया है. सफलता भी मिली है. परंतु तभी तक जब तक इंसान खुद जागरूक रहा है, जब तक उसने अपना नियंता स्वयं को माना है. जैसे ही वह लापरवाह हुआ, मानसिक और शारीरिक आलस्य ने उसे घेरा है—सत्ताओं पर स्वार्थी वर्गों के सवार होते देर नहीं लगी है. जब सरकार का वर्तमान स्वरूप नहीं था, सोचा गया था कि धर्म की सहायता से लोगों को पारलौकिक सत्ता का डर दिखाकर अनुशासन में रखा जाए. अतिरिक्त धनसंपदा मनुष्य के मन में लालच बढ़ाती है, इसलिए अपरिग्रह, अस्तेय, संतोष आदि को प्रत्येक धर्म ने अपना ध्येय माना. धर्म के साथ दूसरे नैतिक मूल्य भी जोड़े गए. फलस्वरूप धर्म शताब्दियों तक मनुष्य का नैतिक और सामाजिक मार्गदर्शक बना रहा. आदमी थोड़ा निश्चिंत हुआ तो धर्म के नाम पर धड़े बनने लगे. मंदिरों में सोने की मूर्तियां आकर सजने लगीं. और जिस व्यक्ति को मानव समाज ने अपना राजा बनाया था, वह स्वयं को ईश्वरीय प्रतिनिधि बताकर अपने लिए विशिष्ट अधिकारों की मांग करने लगा. ऐसे में व्यवस्था का लंबे समय तक टिके रहना और निर्णायक प्रेरणा शक्ति बने रहना असंभव था. लेकिन मनुष्य के चेतने में देर हो चुकी थी. समाज तब तक आर्थिकसामाजिक आधार पर बंट चुका था. शासक और शासित संस्कृति का अंतर साफ नजर आने लगा था. चूंकि शासक वर्ग दूसरों से अधिक साधनसंपन्न था, तथा बाकी लोग आर्थिकराजनीतिक रूप से उसपर निर्भर थे, इसलिए उनसे प्रेरित होना, उनके आदेश को मानना उनकी विवशता थी. यानी धर्म जो स्वयं नैतिकता का प्रवत्र्तन करने निकला था, जिसने स्वयं को आचार संहिता गढ़ी थी, वह भ्रष्ट, स्वार्थी धर्माचारियों के कारण विचलन का शिकार होने लगा. धर्म की बढ़ती ताकत देख कालांतर में राजसत्ता को स्वयं उसके करीब आना पड़ा. राजनीतिकधार्मिक सत्ता के गठजोड़ ने आम आदमी की स्वाधीनता को धीरेधीरे छीनना आरंभ किया. अब वह धर्म और राजनीति के नाम पर नाटक करने लगा. इससे निपटने के प्रयास भी हुए. दरअसल धर्मसत्ता के प्रवत्र्तकों की नीति संकट के समय कछुए की भांति अपने शरीर को समेट लेने और अवसर मिलते ही बिच्छु की तरह झपटकर डंक मार देने की रही है. कहा जा सकता है कि धर्म की प्रवृत्ति जहां आत्म को मजबूत, सक्षम और सहृदय बनाने की होनी चाहिए, बजाय इसके उसने लोकपरलोक, पापपुण्य, स्वर्गनर्क जैसी निराधार संकल्पनाओं द्वारा मनुष्य को निरंतर कमजोर बनाया है.

सरकार जो कम से कम शासन कर सकती है, वही हो सकती है जो नागरिकों को विवेकवान बनने, उन्हें आपसी तालमेल और विश्वास द्वारा आगे बढ़ने का पूरापूरा अवसर देती हो. इसके लिए समाज में स्पर्धा का लोप आवश्यक है. यह तभी संभव है जब उत्पादन राज्य की जरूरत के आधार पर तय किया जाए और प्रत्येक व्यक्ति को आगे बढ़ने के समान अवसर प्राप्त हों. इसके लिए समानता आधारित व्यवस्था चाहिए. यह सही है कि प्रत्येक मनुष्य की कुछ चारित्रिक भिन्नताएं होती हैं. यह संभव नहीं है कि प्रत्येक मनुष्य को एक ही ढांचे में ढाला जाए. विविधवर्णी समाज के लिए भी यह उचित भी नहीं है. लेकिन मनुष्य को यह तोष होना चाहिए कि उसने जो काम किया है, उसका प्रतिफल उसको प्राप्त हो चुका है. साथसाथ यह विश्वास भी जरूरी है कि आगे जो भी कामना करता है, उसको न्यायपूर्ण रास्ते पर चलकर पाया जा सकता है. इस कार्य में समाज उसका प्रतिद्विंद्वी न होकर सहयोगी है. दूसरे शब्दों में मनुष्य का अपनी समाजव्यवस्था पर भरोसा होना अनिवार्य है. यदि ऐसा न हो वह उन रास्तों का अनुसरण करने की सोचेगा, जो समाज के वृहद हितों को नुकसान पहुंचाने वाले हों.

अब जरा आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणाली पर भी विचार करके देखा जाए. यह माना जाने लगा है कि लोकतांत्रिक समाजवाद शासन की सर्वोत्तम प्रणाली है. फुकोयामा जैसे चिंतक मानते है कि यह मानवीय मेधा का चरम है. इसके बाद इतिहास का अंत स्वाभाविक है. इसलिए वे विचारधारा के अंत की घोषणा भी करने लगे हैं. यह बुद्धिजीवी हताशा की घोषणा है. एक तरह से ये उस बाजारवादी मानसिकता को संतुष्ट करते हैं, जो निद्र्वंद्व उपभोग के लिए मनुष्य को विचार से एकदम काट देना चाहते हैं. करीब डेढ़ शताब्दी पहले नीत्शे ने भी ईश्वर के अंत की घोषणा की थी—‘ईश्वर मर चुका है, हमने उसकी हत्या की है.’—नीत्शे ने जिन दिनों यह कहा, वह विकृत पूंजीवाद का युग था. जिसके विरोध में दुनियाभर में बौद्धिक आंदोलन खड़े हो रहे थे. नीत्शे ने शायद सोचा था कि उत्पादन व्यवस्था की क्रांति मनुष्य के चिंतनस्तर में वास्तविक सुधार करेगी. फलस्वरूप वह धर्म, संप्रदाय जैसे प्रलोभनों तथा तज्जनित भीरूताओं के चंगुल से बाहर आने में सक्षम होगा. मगर हुआ बिलकुल उल्टा. जिस धर्म से पूंजीवाद को खतरा महसूस होता था, जिसे वह अपने अबाध विस्तार में सबसे बड़ा रोड़ा मानता था, पूंजीवाद के विरुद्ध विचारकों की लड़ाई में वही सबसे ज्यादा सहायक सिद्ध हुआ. लेकिन भारत में तथा अन्य देशों में लोकतंत्र के नाम पर जो क्षेत्रीयतावाद, जातिवाद, भाषासंस्कृति, धर्म आदि का विभेदकारी खेल खेला जाता है, क्या वह उचित है? जो लोकतंत्र अपने विरोध को आत्मसात करने सामथ्र्य खो बैठा हो, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संसद के गलियारों से बाहर जाते ही दम तोड़ देता हो, क्या वह देश सही अर्थ में लोकतंत्र कहा जा सकता है? जिस देश का मीडिया पूंजीपतियों के हितों का संरक्षक हो, उन्हीं की भाषा बोलता हो. उन्हीं के समर्थन में दिनरात काम करता हो, वहां निष्पक्ष प्रेस से क्या कोई उम्मीद की जा सकती है? दरअसल लोकतंत्र एक चेतन समाज की अभिव्यक्ति है. यदि समाज में पर्याप्त लोकतांत्रिक चेतना हो, तो राजनीति हो या प्रेस, सचाई से विचलन आसान नहीं रह जाता. लोकतंत्र की कमजोरी यह है कि वह व्यक्ति को राजनीतिक अधिकार तो देता है, किंतु उन्हें समानता के स्तर पर लाने का कार्य नागरिकों के भरोसे छोड़ देता है. पर्याप्त नागरिक चेतना के अभाव में लोकतंत्र में नेता अपने नागरिकों को आकर्षित करने के लिए ऐसे मुद्दे उछालने तथा उनका राजनीतिक लाभ उठाने में सफल हो जाते हैं, जिनका उनके विकास से कोई लेनादेना नहीं होता. इसे वे लोकप्रिय राजनीति की मजबूरियां बताकर मीडिया भी कमोबेश मान्य ठहरा देता है.

लोकतंत्र एक चेतन समाज का दर्शन है. यदि समाज में पर्याप्त लोकतांत्रिक चेतना न हो तो उसका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता. लोकतंत्र की कमजोरी यह है कि वह व्यक्ति को समान अधिकार तो देता है, परंतु उसको समानता के स्तर पर लाने की जरूरत को बिसरा देता है. अथवा उसकी ओर ध्यान ही नहीं देता. या फिर उस काम को समय के भरोसे छोड़कर निश्चिंत हो जाता है. पर्याप्त नागरिक चेतना के अभाव में लोकतंत्र में नेता अपने नागरिकों को आकर्षित करने के लिए ऐसे मुद्दे उछालने आरंभ कर देते हैं, जिनका उनके जीवन और उसकी समस्याओं से कोई सीधा संबंध नहीं होता. लोकतंत्र में इस प्रकार के मुद्दे राजनीतिक लाभ के लिए, प्रायः धर्म और मीडिया के क्षेत्र में कार्यरत शक्तियों की सहायता से तैयार किए जाते हैं. इसका दुष्परिणाम यह होता है कि जनता अपने नेता के नैतिक आभामंडल तथा अन्य सद्गुणों के अभाव में जाति, धर्म, क्षेत्रीयता आदि को देखकर निर्णय लेने लगती है. चूंकि लोकलुभावन राजनीति के चालू तरीके खर्चीले भी होते हैं, इसलिए चुनावों में अधिक धन खर्च करने वाले व्यक्ति को उसका लाभ भी मिलता है. लोकतंत्र को लेकर यह डर आज का नहीं है. बल्कि उस समय से है जब इस व्यवस्था का जन्म ही हुआ था. करीब ढाई हजार वर्ष पहले सुकरात ने लोकतंत्र को बहुसंख्यक वर्ग की मनमानी का तंत्र कहकर उसकी आलोचना की थी. प्लेटो ने तो अपनी महान कृति ‘रिपब्लिक’ में अनेक पन्ने लोकतंत्र की आलोचना में काले किए थे. उसके अनुसार लोकतंत्र कालांतर में निरंकुश तंत्र में बदल जाता है. यह उसकी स्वाभाविक परिणति है.

प्लेटो ने विकल्प के रूप में दार्शनिक सम्राट का सुझाव दिया था. दार्शनिक सम्राट के रूप में प्लेटो की कल्पना अपने आप में खोए रखने, शासन और दुनियादारी की ओर से बेफिक्र रहने वाले आत्मलीन मुनि जैसी नहीं थी. दार्शनिक सम्राट से उसका आशय सद्गुणों से संपन्न साहसी, वीर, निडर, शांतिप्रिय, बुद्धिमान, ईमानदार, न्यायपरक, सहिष्णु, निष्पक्ष, मनुष्यता के उदात्त गुणों से संपन्न तेजोमय शासक से था. ऐसा व्यक्ति जो न केवल शांतिकाल में राज्य को विकास के शिखर पर पहुंचा सके, बल्कि युद्धकाल में सीधे समर में उतर कर दुश्मन को नाकों चने चबवा सके. प्लेटो की ऐसी ही परिकल्पना थी. प्लेटो का दार्शनिक सम्राट ऐसा उदात्त व्यक्तित्व था, जो प्रत्येक क्षेत्र में सर्वोत्तम हो. मोह, माया, लालच और स्वार्थ से दूर, ऐसा व्यक्ति जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में श्रेष्ठतम हो. दार्शनिक सम्राट की गरिमा भी उसको एकाएक नहीं मिल जाती. उसके लिए प्लेटो ने पूरा विधान तैयार किया था, जिसमें उच्चतम शिक्षा, देशसेवा से लेकर अनिवार्य सैन्य सेवा भी सम्मिलित हैं. कठिन परिश्रम, स्वाध्याय, उम्र के लंबे अनुभव के बाद ही व्यक्ति इन कसौटियों पर खरा उतर सकता है. आयु की मर्यादा विलक्षण प्रतिभाशाली पर लागू नहीं होती. भारत में प्राचीन यायावर मुनियों के रूप में हमें ऐसी ही प्रतिभाओं के बारे में सुनने को मिलता है. लेकिन भारतीय मुनियों और आश्रम व्यवस्था तथा प्लेटो के दार्शनिक की संकल्पना में मूल अंतर है. यह कि प्लेटो के आदर्श समाज में वंश परंपरा के लिए कोई स्थान नहीं है. बल्कि वहां व्यक्ति के निजी संबंध और भावनाओं को भी उपेक्षित रखा जाता है. प्लेटो सामूहिक जीवन की वकालत करता था. इसके लिए दार्शनिक समेत सभी नागरिकों को साझा छत के नीचे सोना, एक जैसा भोजन करना, एक समान जीवनस्तर अपनाना अनिवार्य था. उसने सोनेचांदी के उपयोग को वज्र्य माना है. निजी संपत्ति को वह एक सीमा के बाद नकार देता है. साझा जीवन की प्लेटो की संकल्पना आगे चलकर पत्नियों में साझेदारी तक विस्तार ले जाती है. समानता के विचार के लिए कभीकभी वह अति की सीमा को पार करता नजर आता है. विशेषकर उस समय वह जब वह काम संबंधों को मर्यादित करने की सोचता है. उसके आदर्श राज्य में मनुष्य के भावनात्मक संवेगों के लिए कोई स्थान नहीं था. उसने व्यवस्था की थी कि बच्चों का लालनपालन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि मातापिता और उनकी संतान एकदूसरे को पहचान न सकें. बच्चे समाज की जिम्मेदारी हैं और उसी का भविष्य. इसलिए बच्चों के लालनपालन की जिम्मेदारी अभिभावक होने के नाते हमारी भी है. संतानोत्पत्ति राजकीय धर्म है. योग्य संतान जन्म ले सके, इसके लिए प्लेटो ने विशेष अवसर पर स्वस्थ्य एवं बुद्धिमान स्त्रीपुरुष के जोड़ों को परस्पर मिलने, संतानोत्पत्ति के लिए समागम करने की अनुशंसा की है. प्लेटो की सहजीवन के प्रति सिफारिशें इतनी अधिक हैं कि वर्तमान समय में वे हमें अवास्तविक लगने लगती हैं. इसी के साथ उसका आदर्श राज्य का सपना भी वायवी बन जाता है. प्लेटो को अपने देश एथेंस से प्यार था, मगर वह स्पार्टा की योद्धा संस्कृति से बेहद प्रभावित था. स्पार्टा के हाथों एथेंस की पराजय की स्मृतियां उनके दिलोदिमाग पर थी. अत्यंत प्रतिभाशाली होने के साथ वह स्वयं बेहद सुंदर और शरीर सौष्ठव में दूसरों से आगे था. उसके व्यक्तित्व की यही खूबियां दार्शनिक सम्राट की परिकल्पना पर प्रभावी हैं. जीवन में शुभत्व की प्रतिष्ठा हेतु, प्लेटो की निष्ठा संदेह से परे है. इस बात को संभवतः प्लेटो भी समझता था. इसलिए अपनी आरंभिक कृतियों में दार्शनिक सम्राट का समर्थन करनेवाला प्लेटो अपने जीवन के उत्तरकाल में दार्शनिक मंडल को राज्य की बागडोर सौंपे जाने की सिफारिश करने लगता है.

दार्शनिक मंडल से प्लेटो का अभिप्राय समाज के निर्वाचित व्यक्तियों को सौंपे जाने से था. प्लेटो की दार्शनिक की परिभाषा, व्यापक संदर्भ लिए हुए है. उसके अनुसार दार्शनिक वह है जो विलक्षण मेधावी, प्रतिभासंपन्न अपरिग्रही, उदार, सत्यनिष्ठ, उच्च शिक्षित, अध्येता, तर्क शास्त्री, तर्कशास्त्री, उदारचेता है. अपनेअपने क्षेत्रों मंे निपुण और परंगत हैं. लोकतंत्र में भी जनप्रतिनिधि से अपेक्षा पर सकती है कि वह उदार, परमविद्वान, सत्यनिष्ठ, वीर, साहसी और नेतृत्वकला में निपुण हो. व्यवहार शास्त्र में उसके प्रवीणता हासिल हो. लोकतंत्र में भी जनप्रतिनिधि से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उपर्युक्त कसौटियों पर खरा उतरता हो. चूंकि एकल व्यक्ति कभी भी निरंकुश हो सकता है, इसलिए राज्य के भले के लिए आवश्यक है कि एकाधिक व्यक्तियों को शासनाधिकार सौंपे जाएं. तथा सम्मिलित राय से शासन चलाया जाए. उनका एक मुखिया जरूर हो, मगर वह दूसरों की राय का प्रतिनिधित्व करे. मनमानी करने से बचे. उसको मनमानी से रोकने के लिए जनता के पास पर्याप्त अधिकार हों. प्लेटो के दार्शनिक मंडल की परिणति एक आधुनिक संसदीय लोकतंत्र के रूप में देख सकते हैं. संसद के लिए निर्वाचित लोक प्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि गुणी, बुद्धिमान, तथा ईमानदार हों. उन्हें अपने राष्ट्र एवं क्षेत्र की समस्याओं की समझ हो. वे कुशल वक्ता तथा विवेकवान हों. ताकि जनप्रतिनिधियों के बीच अपनी बात को सलीके और सिलसिलेवार ढंग से प्रस्तुत कर सकें. शब्दों के थोड़े ऐरफेर के साथ यही गुण दार्शनिक के भी हैं. प्लेटो का मानना था कि दार्शनिक सम्राट लोकेच्छा को समझने वाला होगा. इसलिए वह अपनी राय जनमानस पर थोपने के बजाय लोगों की इच्छाओं को अधिक महत्त्व देगा. और जैसे जैसे लोग उसे अपनाएंगे, दार्शनिक की इच्छा व्यापक लोकेच्छा का प्रतिनिधित्व करती हुई नजर आएगी. इसलिए कि दार्शनिक के स्तर को प्राप्त करने के बाद वह लौकिक सुखों, मानसम्मान की छिछली आकांक्षाओं, लोभमोह आदि से मुक्त हो चुका होगा. ऐसे व्यक्ति का प्रत्येक निर्णय लोकोन्मुखी होगा.

भारतीय और यूरोप के समाजों में पद्रहवीं शताब्दी बौद्धिक चेतना के विस्तार की थी. धार्मिक पाखंड और रूढि़यों के प्रति जागरूकता की शुरुआत भी इसी दौर में हुई. भारत में कबीर, रैदास, संत ज्ञानेश्वर, आदि भक्त कवियों ने धार्मिक पाखंड का विरोध करते हुए मनुुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं को उर्ध्वगामी बनाने पर जोर दिया. उन्होंने धर्म और शास्त्रीयता के नाम पर पनपे कर्मकांड की भत्र्सना की तथा धार्मिक कुरीतियों के लिए पंडोंमौलवियों को ललकारा. यूरोप में यह काम मार्टिन लूथर ने किया था. दरअसल पंद्रहवींसोलहवीं शताब्दी के जिस दौर की ये घटनाएं हैं, भारतीय संदर्भ में तब की सामाजिक चेतना धार्मिक और सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से मुक्ति की लहर के रूप में पनपी थी. उन संतों, महात्माओं के धर्म के केंद्रीय सत्तावाले चरित्र से कोई शिकायत न थी. बल्कि दीनता के चरम पर जाकर भक्त कवि ईश्वर की अधिसत्ता को और भी पुख्ता रूप दे देते थे. यही दौर था जब पश्चिम में मशीनीकरण की प्रक्रिया के साथसाथ वैचारिक क्रांति ने दस्तक दी. भारत उस समय मुगल साम्राज्य का हिस्सा था. उसकी अर्थव्यवस्था के साधन पुराने थे. इसलिए भारत भक्तिकाल की चेतना को वास्तविक परिवर्तन की दिशा देने में नाकाम सिद्ध हुआ था. जिससे भक्ति आंदोलन की समस्त क्रांतिकारिता गुरुडम, मूर्तिपूजा, कर्मकांड को बढ़ाने वाली सिद्ध हुई. इसके विपरीत पश्चिम में उत्पादन के नवविकसित साधन मध्यवर्ग के उदय के साथ परिवर्तनकारी सिद्ध हुए. उभरती मध्यवर्गीय चेतना ने वहां वयस्क मताधिकार, लोकतंत्र एवं समाजवाद जैसे नए विचारों और आंदोलनों को जन्म दिया. फलस्वरूप वहां नई सभ्यता एवं संस्कृति का विकास संभव हुआ. जिनपर परंपरागत मूल्यों, जो उससे पहले तक समाज का नेतृत्व करते आए थे, का प्रभाव निरंतर क्षीण होता गया.

नई व्यवस्था समाज एवं राजनीति के प्रति नई आलोचना दृष्टि पैदा कर रही थी. खासकर तेजी से उभरते मध्यवर्ग में जो निस्संदेह औद्योगिक क्रांति का सुफल था, वर्गीय चेतना का उदय होता जा रहा था. दरअसल मध्यवर्ग अपने ही भीतर बुरी तरह विभाजित था. भौतिक सुखों के प्रति बढ़ती उसकी लालसाएं एक ओर तो पूंजीपति वर्ग का भरोसेमंद बने रहने को प्रेरित करती थीं, दूसरी ओर श्रमिकों के शोषण, उत्पीड़न में पूंजीपतियों का साथ देने के लिए मजबूर कर देती थीं. इसके पीछे उनके मन में छिपा क्षोभ था, जो सपनों के अनुरूप अपेक्षित आय न होने के कारण जन्मा था. प्रारंभ में गणतांत्रिक अधिकार देश के अभिजात वर्ग को प्राप्त थे. प्लेटों के समय में भी अभिजात उसी को माना जाता था, जो कुलीन हो तथा जिसे न्यूनतम निर्धारित भूमि का स्वामित्व प्राप्त हो. प्लेटो ने हालांकि गणतंत्र की आलोचना की थी, लेकिन मध्यवर्ग को यह विश्वास था कि गणतांत्रिक अधिकार मिलने से उसकी राजनीतिक ताकत में वृद्धि होगी. जो उसके विकास के रास्ते प्रशस्त करेगी. दूसरे शब्दों में वर्गीय शोषण का शिकार रहा मध्यवर्ग अपनी मुक्ति के लिए उसी रास्ते को अपनाना चाहता था, जो वर्गविभाजन के जिम्मेदार था. प्रकारांतर में वही उसके शोषण का कारण भी था. इसलिए आर्थिक समानता से पहले राजनीतिक समानाधिकारिता की मांग जोर पकड़ती गई. उसके लिए पहल चार्टिस्ट आंदोलनकारियों की ओर से की गई. जिनकी मुख्य मांग संसद में सदस्यता हेतु श्रमिकप्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम स्थान आरक्षित करने तथा वयस्क मताधिकार को लागू करने की थी.

चार्टिस्ट आंदोलन को व्यापक लोकप्रियता मिली. इसका आकलन करने के लिए मात्र यह उदाहरण पर्याप्त होगा कि अपनी मांग के समर्थन में चार्टिस्ट आंदोलनकारियों द्वारा वर्षों लंबा हस्ताक्षर अभियान चलाया गया, जिसमें वे अपनी मांगों के समर्थन में 60 लाख हस्ताक्षर लेने में कामयाब हुए थे. हालांकि आंदोलनकारियों के इस दावे को आलोचकों ने नकार दिया था. लेकिन चार्टिस्ट आंदोलनकारियों की इस मांग में दम था. हस्ताक्षरों की गिनती के लिए 13 व्यक्ति लगाए गए थे. लगातार 17 घंटे गिनती करने के बाद वे केवल 19 लाख हस्ताक्षर ही गिन पाए थे. आज से लगभग 175 वर्ष पहले यह बहुत बड़ी बात थी. व्यापक जनसमर्थन पाकर चार्टिस्ट आंदोलन बढ़ता गया. इससे ब्रिटिश सरकार का घबरा जाना स्वाभाविक था. आंदोलन को कुचलने के लिए बल प्रयोग का सहारा लिया गया. जिसमें हजारों चार्टिस्टों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया तथा सैकड़ों को स्वैच्छिक मृत्युदंड की सजा मिली. चार्टिस्ट आंदोलन हालांकि नाकाम सिद्ध हुआ, फिर भी चार्टिस्ट आंदोलनकारी को ब्रिटिश संसद में श्रमिक प्रतिनिधियों के लिए स्थान आरक्षित कराने, निर्वाचन प्रणाली में ढील दिए जाने में सफलता मिली थी. विज्ञान और औद्योगिकीकरण से बढ़ती सुविधाएं जहां लोगों के जीवन को अधिक सुखसुविधामय बना रहे थे, वहीं उनके मन में शोषण से मुक्ति की चाह भी जगा रहे थे.

मुक्ति की छटपटाहट पहले धार्मिक सुधारवादी आंदोलन के रूप में हुई थी. धर्म और राजनीति के गठजोड़ ने जहां धर्मसत्ता को मजबूत बनाया था. वहीं सामंती उत्पीड़न को भी बढ़ावा दिया था. अपनी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए धार्मिक सत्ताएं लगातार शक्ति बटोर रही थीं. इसके लिए उन्हें सामंतों की शोषणकारी वृत्ति से भी परहेज न था. ये लोग धर्म और शास्त्रों की मनमानी व्याख्या करते थे. वे जनसामान्य को त्याग, संयम तथा भोगविलास से दूर रहने की सीख देने वाले उन मठाधीशों का अपना जीवन विलासिता का प्रतीक था. धर्म के नाम पर संघवाद, पूजा के स्थान पर कर्मकांड समाज में परोसा जाता था. धर्म के नाम पर फैले आडंबर का सबसे पहला विरोध मार्टिन लूथर ने शुरू किया. बाद में जाॅन काॅल्विन ने यह कहते हुए कि सृष्टि में प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व मनुष्य की खुशी के लिए है, पहली बार सुख को जीवन के लक्ष्य के रूप में स्वीकारा. उससे पहले सुख की वांछा को हेय मानकर उसकी उपेक्षा का चलन था. सांसारिक सुखों को दुख का कारण, मोहमाया में संलिप्तता की जड़ और मोक्ष की राह में बाधक कहकर नकारा जाता था. जबकि धर्म और राजनीति से प्राप्त ताकत का लाभ उठाकर दूसरा वर्ग विलासितापूर्ण जीवन जीता था. लूथर ने धर्म के आडंबरवाद को ललकारा और उसको लोकोन्मुखी चेहरे को उभारने का काम किया. का॓ल्विन ने उससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए सुख के साथ जुड़ी हीनताग्रंथि को चुनौती दी. उसने जोर देकर कहा कि दुनिया में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिसका लक्ष्य आदमी को सुख पहुंचाना न हो.

ये सभी कोशिशें, जनसाधारण को राजनीति और विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए थीं. जो सहòाब्दियों से उपेक्षा और वर्जनाओं का शिकार होता आया था. आम आदमी को वर्जनाओं और निषेधों से बाहर निकालने का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य वाल्तेयर ने किया. मानवीय अस्मिता को विमर्श के केंद्र में लाने का श्रेय उसी को प्राप्त है. वाल्तेयर ने तार्किक शिक्षा पर जोर दिया. असमानताओं के लिए धर्म और संस्कृति को दोषी ठहराया तथा हर उस चुनौती को करारा जवाब दिया, जो उन जड़ताओं का, यथास्थिति का समर्थन करती थी. इसके बावजूद समाज में दास प्रथा कायम रही. सामाजिकआर्थिक असंतुलन बना रहा तो इसलिए कि उस समय तक प्रौद्योगिकीय क्रांति अपने आरंभिक दौर में थी. संसाधनों पर यथास्थितिवादी सामंतवाद वर्ग का कब्जा था. इसके लिए दुनिया को उन्नीसवीं शताब्दी तक प्रतीक्षा करनी पड़ी, जब प्रौद्योगिकीय क्रांति के लाभों के साथसाथ उसके नुकसान भी दुनिया के सामने आने लगे थे. अस्मितावादी आंदोलनों का दूसरा दौर कहा जाए कि निर्णायक दौर सतरहवीं शताब्दी में औद्योगिकीकरण के उभार के दिनों में हुआ. दरअसल उत्पादन बढ़ने से बाजार की समस्याओं में वृद्धि हुई थी. नए बाजारों की खोज में पहले वाणिज्यिक कंपनियों ने बाहर निकलकर अपने आर्थिक उपनिवेश स्थापित किए. फिर उन उपनिवेशों को राजनीति के अधिकार क्षेत्र में लाकर वहां साम्राज्यवादी खेल खेला जाने लगा. मशीनीकरण ने मध्यवर्ग की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की थी. कालांतर में यही वर्ग सामाजिक बदलाव के लिए नेतृत्वकारी शक्ति बना. हालांकि मध्यवर्गी चेतना प्रायः अपने स्वार्थी मनसूबों के इर्दगिर्द घूमती थी. एक ही समय में इसका एक धड़ा, बल्कि कहना चाहिए कि मजबूत धड़ा, पूंजीवाद के समर्थन में जुटा था; और उसको मजबूती प्रदान करता था. पूंजी के अलावा दूसरी बड़ी ताकत उस वर्ग को मध्यवर्ग से ही मिलती थी. निहित स्वार्थ के लिए दोनों एकदूसरे को बचाए रखना चाहते थे. जबकि मध्यवर्ग का दूसरा धड़ा पूंजीवाद से जूझने के लिए सर्वहारा समाज को एकजुट होने का आह्वान करता था. शोषित वर्ग के भीतर पैठे स्वाभाविक आक्रोश का लाभ उठाकर वह उसके माध्यम से पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने के लिए प्रोत्साहित करता था. इस वर्ग का प्रेरणास्रोत वैज्ञानिक क्रांति और नई विचारधारा से प्रभावित बुद्धिजीवी वर्ग था.

चूंकि मशीनीकरण के कारण मध्यवर्ग की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही थी. और अकूत पूंजी और शक्ति संपन्न होते हुए भी शीर्षस्थ वर्ग अपने अनेकानेक कर्तव्यों के पालन के लिए इस वर्ग पर निर्भर था, इसलिए मध्यवर्गी विचारकों की मांग को स्वीकार किए जाने पर जोर दिया जाने लगा. इससे पहले इसी वर्ग के विचारकों ने सुखवाद, उपयोगितावाद, विज्ञानवाद जैसे दार्शनिक विचारों को जन्म दिया था. ये विचारधाराएं इतनी लोकप्रिय हुईं कि उन्नीसवीं शताब्दी को इन्हीं की शती कहा जा सकता है. इस तरह लोकतंत्र की मांग एक प्रकार से समय की की मांग थी. सुखवाद और उपयोगितावाद के बहाने भौतिकवाद का समर्थन करती ये विचारधाराएं प्राचीन विचारधाराओं से कई मायने में भिन्न थीं. सुखवाद सुख को मानवजीवन का लक्ष्य स्वीकारता था. इसका दूसरा संकेत था कि सुख पर सभी मनुष्यों का समानाधिकार है. प्राचीन धर्मकेंद्रित विचारधाराएं सांसारिक सुख को हेय मानकर काल्पनिक सुखों का भरोसा दिलाती थीं. उल्लेखनीय है कि धर्मकेंद्रित विचारधाराएं अपने आप में ही विरोधाभास का शिकार थीं. जिस भोगविलास को वे पारलौकिक सुखों की खातिर हेय बताती थीं, स्वर्ग में उन्हीं का आधिक्य बताया जाता था. वही सुख देवों को अंतहीन मात्रा में उपलब्ध बताकर उन्हें श्रेष्ठ और वरेण्य माना जाता था. इस आधार पर समाज का पुरोहित वर्ग जनसाधारण को बरगलाता था. यह किसी एक देश या धर्म की बात नहीं थी, बल्कि सभी धर्मों का यही हाल था. इस प्रश्न का कि जब अभिजन समाज सांसारिक सुखों के अंतहीन भोग करने पर भी स्वर्ग के अधिकारी बन जाते हैं तो जनसाधारण के लिए वह हेय कैसे हो सकता है—वह जन्मपुनर्जन्म, पापपुण्य और भाग्य की अंतहीन गल्प सुनाने बैठ जाता था. इसी आधार पर चर्च की आलोचना करते हुए का॓ल्विन ने कहा था कि दुनिया की कोई वस्तु ऐसी नहीं है, जो मनुष्य को सुख पहुंचाने के लिए न बनी हो. उससे सुख को हेय मानने वाली प्रवृत्ति कमजोर पड़ने लगी.

भारत में चार्वाक और लोकायत दार्शनिक यही तर्क शताब्दियों से देते आए थे. गौतम बुद्ध के समय में भी आजीवक अजित केशकंबली नाम का संप्रदाय सुख को जीवन का मुख्य लक्ष्य मानता था. लेकिन भारतीय लोकमानस पर पुरोहितवाद इतनी तेजी से हावी रहा कि इस सत्य को स्वीकारने की उसकी कभी हिम्मत न पड़ी. आर्थिक रूप से दूसरों पर आश्रित होने के कारण भी जनसाधारण के लिए यह संभव नहीं था कि वह अपने जीवन को अपने ढंग से निर्धारित कर सके. जबकि पश्चिम में मार्टिन लूथर और काॅल्विन के विचारों का व्यापक प्रभाव पड़ा. अमेरिका में उनके विचारों के आधार पर बस्तियों का निर्माण किया जाने लगा. कालांतर में सुखवाद के आधार पर जिस परिपक्व विचारधारा की नींव रखी गई वह मानवता के करीब थी. सुखवादी विचारधारा के प्रखर चिंतक जा॓न स्टुअर्ट मिल ने सुख की कामना को मानव जीवन का लक्ष्य माना, लेकिन उसका सुख केवल भौतिकता की सीमा से बंधा नहीं था. उसने सुख का मानवीकरण किया था. मिल के अनुसार स्वतंत्रता भी सुख की अनिवार्यता है. क्योंकि वह मानवमन को तोष प्रदान करती है, तभी वह सुख के संसाधनों का आनंदमय भोग कर सकता है. दूसरे शब्दों में सुखवाद और उपयोगितावाद के माध्यम से ये विचारक मनुष्य की शताब्दियों पुरानी मानसिकशारीरिक परतंत्रता से मुक्ति दिलाने के लिए प्रयासरत थे. जनसाधारण को शताब्दियों से कभी धर्म, कभी राष्ट्र तो कभी राज्यभक्ति के नाम पर बांधा जाता रहा है. सुखवाद और उपयोगितावादी विचारधाराएं मनुष्य को उसके मनुष्यत्व से परचाने की कोशिश करती थीं. व्यक्तिस्वातंत्र्य के उभार को आगे चलकर जेफरसन और पेन ने मजबूत आधार दिया. अमेरिकी स्वाधीनता की उद्घोषणा के साथ तो इस विचार को मानो वैश्विक स्वीकृति ही प्राप्त हो चुकी थी.

मिल ने सुखवाद को नैतिकता की उच्चतम अवस्था माना था. सुख की उसकी परिकल्पना केवल भौतिक सुखों तक सीमित न थी. मिल के अनुसार कर्तव्यपालन, नैतिक आचरण, परदुखकातरता भी सुख के पर्याय हैं. क्योंकि इनमें समूचे समाज के सुख की कामना निहित है. उसने कहा था कि अकेले व्यक्ति का सुख, सुख न होकर स्वार्थ है. जिसे समाज की कीमत पर ही स्वीकार किया जा सकता है. यही बात माक्र्स और माओ ने भी कही. माक्र्स ने सुख की समानता को अवसरों की समानता का नाम दिया और साम्यवादी क्रांति का आह्वान यह कहकर किया कि शताब्दियों के शोषण के उपरांत अपना सबकुछ गंवा चुके सर्वहारा वर्ग के पास खोने के लिए कुछ नहीं है. जबकि जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है. उसने सर्वहारा क्रांति के माध्यम से मजदूरों का संगठित होकर सत्ता अपने हाथ में ले लेने को कहा. ‘साम्राज्यवाद कागजी बाघ है.’ और ‘जनता ही असली लोहे का दुर्ग.’ जैसी राजनीतिक ललकार देते हुए माओ ने जनता को संगठित विद्रोह के लिए पुकारा. उसने सभी राष्ट्रीय मुक्तियुद्धों को समर्थन दिया. अन्य देशों के क्रान्तिकारी संघर्षों को अपनी सफल क्रांति द्वारा प्रेरित किया और बताया कि भड़क उठने पर ‘एक चिंगारी सारे जंगल में आग लगा सकती है.’ चीनी जनता से आगे बढ़कर सत्तासंविधान को अपने अधिकार में ले लेने के आह्वान के बाद उसने कहा कि आगे बढ़ो और ‘मेहनत तथा किफायत से अपने देश का निर्माण करो.’ उसके कहने पर चीन के मजदूर, किसान और शिल्पकार एकजुट हुए और वहां सफल क्रांति संभव हो सकी. माओ का कहना था कि ‘राज्यसत्ता का जन्म बन्दूक की नाल से होता है.’ माओ के लिए संस्कृति भी उत्पादन की अन्य प्रेरणाओं जैसी थी. सांस्कृतिक क्रांति का आवाह्न करते हुए माओ ने कहा था—‘क्रांति पर पकड़ कायम रखो और उत्पादन को आगे बढ़ाओ.’ वर्गसंघर्ष, उत्पादनसंघर्ष और वैज्ञानिक प्रयोग—इन तीन आंदोलनों द्वारा उसने चीनी जनता में सृजनात्मक उत्साह का विस्फोट किया और सभी मोर्चों पर जबरदस्त उपलब्धियां हासिल कीं. फलस्वरूप वहां उत्पादन में रिकार्डतोड़ वृद्धि हुई, उत्पादनसंबंधों में आशातीत क्रांतिकारी परिवर्तन. क्रांति के बाद विशेषज्ञों और नौकरशाहों के व्यक्तिवादी प्रबंधन का स्थान क्रांतिधर्मा श्रमिक संगठनों के हाथों में पहुंच गया. समाजवादी उत्पादन के उपक्रमों के मा॓डलों— कृषिक्षेत्र में ‘ता चाई’ और उद्योग में ‘ता चिङ’ का जन्म हुआ. क्रांति के स्थायित्व एवं जनचेतना के फैलाव के लिए माक्र्स ने सर्वहारा वर्ग को द्वंद्ववाद की दार्शनिक शिक्षा से लैस किया गया, और यह मौलिक विचार दुनिया के सामने रखा कि मनुष्य के विचार, राजनीति और सामाजिक संस्थाएं उसके उत्पादन के संसाधनों से निर्धारित होते हैं. यह विचार अपने आपमें इतना शक्तिशाली था कि दुनियाभर में उसके आधार पर लोग संगठित होने लगे और एक समय ऐसा आया जब आधी दुनिया की राजनीति मार्क्स के विचारों से निर्धारित होती थी. किसी विचारक की इससे बड़ी उपलब्धि भला और क्या हो सकती है.

मिल ने व्यक्ति को समाज के लिए समर्पित होने की कामना की थी. उसने समाज में उम्मीद व्यक्त की थी कि वह व्यक्तिमात्र की अस्मिता एवं स्वतंत्रता का ध्यान रखेगा. स्त्रीमुक्ति का विचार हालांकि रूसो के समय में ही जोर पकड़ने लगा था. बाद में चाल्र्स फ्यूरियर तथा मिल ने भी उसको शिद्दत के साथ आगे बढ़ाया. लेकिन मिल की असली देन थी, व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता पर जोर देना. देखा जाए तो मिल का व्यक्तिस्वातंत्र्य का विचार रूसो की ‘व्यक्तिमुक्ति’ की भावना का ही विस्तार था. रूसो ने कहा था कि मनुष्य आजाद जन्मा है. लेकिन वह हर जगह बेडि़यों में है. ये बडि़यां धर्म, कानून, समाज आदि किसी की भी हो सकती हैं. व्यक्तिस्वातंत्र्य का विचार हालांकि मानवतावादी अभिकल्पना थी, लेकिन हम आगे देखेंगे कि उसका उपयोग पूंजीवाद द्वारा नितांत स्वार्थी ढंग से, उपभोक्तावाद को विस्तार देने के लिए किया गया. दूसरी ओर व्यक्तिस्वातंत्र्य के विचार के आधार पर ही अत्याधुनिक लोकतंत्र की नींव विकसित हुई. व्यक्तिस्वातंत्र्य ने ही कालांतर में मानवाधिकार और वयस्क मताधिकार जैसे आंदोलनों को जन्म दिया. दूसरे विश्व के बाद आहत मानवता के जख्मों को सहलाने के लिए ब्रिटिश उपनिवेश से बाहर आने वाले देशों ने लोकतंत्र को अपनाया. लेकिन बाजारवाद और पूंजी के दबाव में कुछ ही अर्से में लोकतंत्र ऐसा रूप धारण कर चुका है, जिससे उसके औचित्य पर सवाल उठने लगे हैं.

विचलन का कारण किसी से छिपा नहीं है. लोकतंत्र के अंतर्गत जो निर्वाचन पद्धति अपनाई जाती है, वह अत्यंत महंगी है. जीत के लिए अधिकतम मत प्राप्त करना जरूरी होता है. इसलिए मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए प्रत्याशी ऐसे आयोजन करते रहते हैं, जिनका विकास और राष्ट्र कल्याण से कोई वास्ता नहीं होता. जाति, धर्म, क्षेत्रीयता जैसे संवेगात्मक मुद्दे उठाकर मतदाता को फुसलाया जाता है. ये मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले सर्वाधिक लोकप्रिय मुद्दे हैं, जिनका वास्तविक विकास और लोककल्याण से कोई वास्ता नहीं होता. अत्यधिक धनराशि लुटाकर राजनीति में वही लोग आते हैं, जिन्हें वहां से और अधिक मिलने की उम्मीद होती है. ऐसे लोगों के लिए राजनीति एक व्यापार होती है, देशसेवा एक बिकाऊ मसाला. जिससे वे अपने व्यापार को चमकाते हैं. ऐसे जनप्रतिनिधियों को पूंजीपति, स्वार्थी धर्माचार्यों के चंगुल में फंसना आसान होता है. इसलिए वे अपने विवेक और लोकहित को ध्यान में रखकर केवल अपनी स्वार्थसिद्धि में जुटे रहते हैं. यह सच है कि सरकार में सभी जनप्रतिनिधि एकसमान नहीं होते. कुछ ऐसे होते हैं, जो वास्तव पद की गरिमा को बढ़ाते हैं, जिनका राजनीति में आना एक सामाजिकराजनीतिक लक्ष्य रखता है. किंतु ऐसे नेता संख्याबल में बहुत कम होते हैं और लोकतंत्र जो संख्याबल के आधार पर चलता है, वहां से अपनी कारगर भूमिका नहीं रच पाते. हताश होकर या तो लोकप्रिय राजनीति के रंगढंग अपना लेते हैं; अथवा राजनीति से ही किनारा कर लेते हैं. राजनीति को जनसाधारण अच्छा नहीं समझता. निष्पक्ष बुद्धिजीवियों के पास वर्तमान राजनीति के पक्ष में कहने के लिए बहुत कम होता हैं. और उनके द्वारा राजनीति और राजनीतिज्ञों की निरंतर आलोचना से समाज में उनकी हो छवि बनती है, वह समाज में सरकार की विश्वसनीयता को कम करती जाती है. जनता का सरकार में विश्वास न हो तो वह असहयोग की मुद्रा में आ जाती है. नागरिक धर्म भुलाकर लोग केवल अपनी स्वार्थसिद्धि में लग जाते हैं. इससे समाज में शांतिव्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार को अतिरिक्त बलप्रयोग करना पड़ता है. परिणामस्वरूप जनता में उसकी छवि और बिगड़ती है. ऐसी अवस्था में अच्छे, प्रतिभाशाली और नीतिसंपन्न व्यक्ति राजनीति में आना छोड़ देते हैं और निर्धारित अवधि के बाद होने वाली निर्वाचन प्रक्रिया सरकारी कर्मकांड बनकर रह जाती है. महंगी निर्वाचन प्रक्रिया में उतरनेवाले नेता एक लगाकर दस कमाने की नीयत रखते हैं. राजनीति से जुड़े लोग समाज में अच्छे नहीं समझे जाते. पर निहित स्वार्थ के लिए अच्छेभले लोगों को भी उन्हीं की कृपादृष्टि के लिए तरसना पड़ता है. जनता के बीच भ्रम बनाए रखने के लिए वे प्रबुद्ध होते लोकतंत्र का बारबार दावा करते हैं, लेकिन जिन नारों के साथ वे लोगों के बीच आते हैं उनका विकास और लोकहित से कोई वास्ता नहीं होता. उनके दांवपेंच से अनभिज्ञ यदि कोई व्यक्ति चुनाव में उतरे तो उसके लिए जीत आसान नहीं होती.

लोकतंत्र की आवश्यकता है कि सरकार जनता की वोटों से बनी सरकार जनता के लिए काम करे. जनता के लिए काम करे. लेकिन पूंजी, धर्मसत्ता तथा क्षेत्रीय विशेषताओं के आधार पर जो सरकार चुनी जाती है, वह ऊपर से भले ही लोकतांत्रिक दिखे, उसका स्वरूप अल्पसंख्यक सरकार का ही होता है. वह जनता के वोटों से चुनी हुई कुछ लोगों की सरकार होती है, जो अपने वर्गीय हितों और कुछ लोगों को लिए काम करती है. जनता के बीच भ्रम बनाए रखने के लिए वे लोकतंत्र की प्रबुद्धता का बारबार हवाला देते हैं. उनका मुंहलगा मीडिया और प्रचारसारथी जनता के बीच बारबार यही दोहराते हैं कि ‘लोकतंत्र जीत रहा है’. असलियत में ‘जनता की जीत’ और लोकतंत्र के नाम पर केवल अल्पतंत्र फलताफूलता रहता है. जनता की उदासीनता से शिखर पर बैठे लोग मनमानी पर उतारू हो आते हैं. ये लोकतंत्र की सामान्य कमजोरियां हैं, जिन्हें ढाई हजार वर्ष पहले ही समझा जा चुका था.

मनुष्य की अधिकतम आजादी और मानवाधिकारों की प्रतिष्ठा हेतु जरूरी है कि हम एक फैसला कर लें—आखिर हमें चाहिए क्या? पूंजी का राज या राज की पूंजी. आप कहेंगे इसमें क्या है? राज होगा तो पूंजी भी रहेगी ही. बिना पूंजी के क्या राज चल सकता है! सो पूंजी को राज में रहना चाहिए. फिर चाहे राज पूंजी का हो या राज की पूंजी. पूंजी होगी तो समाज में सुखसुविधाएं बढ़ेंगी. उस गरीबी और बेकारी से मुक्ति मिलेगी, जिसमें हमारे पूर्वजों ने पूरी जिंदगी काट दी और जिसके कारण वे वक्तबेवक्त रामनाम रटकर दुनिया से कटे होने का दावा करते थे. कोई इशारा न समझ पाए तो आप बताएंगे कि वे लोग यानी आपके पूर्वज दुनिया से कटे होने का दावा इसलिए करते थे कि उनके आसपास भीषण गरीबी, अकाल और बेबसी के सिवाय कुछ था ही. आंखें खोलते ही उन्हें अपनी दुनिया की कंगाली सामने आ जाती थी. इसलिए पूंजी चाहिए और राज इसलिए कि सुरक्षा का एहसास बना रहे. जो हमारे लिए सुखसुविधाओं का इंतजाम कर सके. जिसके सेनानी पहरेदार का काम करें. जो हमारी जरूरत की चीजों की आवाजाही बनाए रखे. राज इसलिए भी चाहिए ताकि हमारे आसपास शांति हो. कोई हमारे सुख की ओर आंख उठाकर देखने न पाए. अगर आप सरकार से इतना कुछ चाहते हैं तो कुछ भी बुरा नहीं है. और इतना काम तो हर सरकार करती ही है. यदि कर न सके तो आश्वासन अवश्य दे देती है. परंतु कुछ काम ऐसे हैं जिनसे आपका सुख सचमुच जुड़ा होता है. किंतु उस ओर न तो सरकार की ओर से कोई हाथ उठता है, न आप ही उठा पाते हैं.

यह ठीक है सरकार का काम नागरिक हितों की देखभाल करना है. उन्हें सुरक्षा और आवश्यक सुविधाएं प्रदान करना है. यह काम ऐसा तो नहीं कि हमें डर लगे. जिसे हम कभी कर भी न सकें. फिर हमें डर क्यों है कि कोई हमारे सुख की ओर टकटकी लगाए बैठा है. जरा नजर चूकी नहीं कि झपट्टा मारकर गिरा देगा. यह तो तभी हो सकता है कि हमारे पास जो है, वह दूसरों से ज्यादा हो. उस अवस्था में हमें राज भी चाहिए तो इसलिए कि वह हमारे धन की, जो दूसरों से अधिक है, जिसे हमने औरों का हक मारकर जुटाया हुआ है, की सुरक्षा कर सके. हम पेटभर खाकर, डकार लेकर मजे की नींद लें और कोई हमारी नींद में खलल डालने न आए. हमारा पड़ोसी किस हाल में है इस हम कोई ध्यान न दें. वह यदि भूखा है, लाचार है, किसी का सताया हुआ है तो उसकी रक्षा करने के लिए भी हमें राज चाहिए. सरकार से हम यह उम्मीद रखें कि वह हमारा कोई अहित न होने दे. इसके लिए वह हमसे चाहे तो कुछ कर भी ले. यदि हम ऐसा ही राज चाहते हैं तो सही मायने में हम राज की पूंजी नहीं, पूंजी का राज चाहते हैं. जो सरकार आपके धन की रक्षा करेगी, आपको आपके भूखे, जरूरतमंद पड़ोसी की कुदृष्टि से बचाएगी.

उस समय हम मान लेते हैं कि सरकार में जो हैं वे निरे भलेमानुष हैं. कि सरकार लोगों की सदेच्छा से चलती है. वह इतना ही सोचती है, जितना हम जानते हैं. यदि वे भले मानुष न हों तो? तब वह सीधे आपसे पूछेंगे कि हमें पहरेदारी ही बनना है तो दूसरे के धन की क्यों करेंगे. पहरेदारी करनी है तो अपने धन की करेंगे. जो धन अपना नहीं है उसको किसी न किसी तरह अपना बनाने की सोचेंगे. सच तो यह है कि सरकार का पूरा तामझाम इसी रणनीति के तहत चलता है. सरकार के पास ताकत है, पैसा है, पहुंच है. वह पहरेदारी कर सकती है. पहरेदारी करती है. परंतु उसमें मौजूद लोग तथा उन्हें अपनी पूंजी के बल पर संसद और विधायिकाओं तक पहुंचानेवाले पूंजीपति और सरमायेदार कहीं न कहीं यह इच्छा भी पाले रहते हैं जिस धन की रखवाली सरकार कर रही है, एक न एक दिन वह धन उन्हीं के खाते में आना है. यह सरकार चलाने का पूंजीवादी रवैया है. पूंजीवादी मुनाफे के लिए उद्योग चलाता है. नेता मुनाफे के लिए राजनीति में आता है. सीधासादा गणित. सीधसादा विचार. इसलिए पूंजीवादी समाज में धन की केवल एक ही गति होती है. वह निचले स्तर से ऊपर की ओर जाता है. पैसा पैसे को खींचता है—यह मुहावरा यूं ही नहीं बना है. पूंजी की सरकार मुनाफे के लिए बनती, मुनाफा देखकर चलती है. उसके नेता मानते हैं कि धन उसका जो पहरेदारी करे. इसलिए धन वापस लौटता जाता है. वहीं जहां से वह चला था. आप सोचते हैं, समाज में कुछ लोगों के पास अकूत धन होगा और दूसरे कंगाल रहेंगे तो उसमें असंतोष की लहर उठेगी. लोग आक्रोश से बलबलाने लगेंगे. परंतु ऐसा कुछ नहीं होता. आपके देखते ही देखते पहरेदार खुद को धन का मालिक मानने लगता है. सरकार के मालिक में बदल जाने का यही दुष्परिणाम होता है. आप इसको कुफल कहें तो भी चलेगा. पर उनका यही अभीष्ट है, जिसमें हर कोई पूंजी के इशारे पर नाचता हुआ नजर आएगा.

देखते ही देखते एक सरकार हमारी मालिक बन जाती है. इसलिए कि हम अपने लालच को मरने नहीं देते. हमने अपने स्वार्थ से समझौता किया; और ऐसे नेताओं को राष्ट्र की निगहबानी सौंपी, जो देश के बजाय अपने और हमारे स्वार्थ की रक्षा कर सकें. पर क्या सचमुच ऐसा हो सका. हममें इतना सामर्थ्य नहीं कि अपने फैसले खुद कर सकें. स्वार्थी पहरेदारों ने वह किया जो हर काइयां, स्वार्थी पहरेदार करता है. नेताओं ने हमारा वोट लिया. और फिर सत्ता में पहुंचकर ऐसे कानून बनाए जो संपत्ति के निचले वर्गों से ऊपर के वर्गों को वैध सिद्ध करते हों. हमारी संपत्ति धीरेधीरे उनके अधिकार में जाने लगी. सरकार के पास कानून की बड़ीबड़ी पुस्तकें होती हैं. उनमें बड़ीबड़ी बारीकियां होती हैं. उनकी व्याख्या के लिए विशेषज्ञों की पूरी टीम होती है. उनका पैसा जाता जनता की जेब से है, लेकिन वे साथ सरकार का निभाते हैं. इसी में उनकी और सरकार की शान है. इसलिए सरकार जो कुछ करती है, वह कानून की मदद से करती है. उन कानूनों की मदद से करती है, जिन्हें वह लोकहित के नाम पर बनाती है. सरकार के लिए लोक एक अमूर्त्तन धारणा है. उसमें यदि कोई ‘मूर्त्त’ फंस जाता है तो गलती उस व्यक्ति की. लोकसमर्थन पाकर सरकार कराधान के लिए बारीक नियम बनाती है. इतने बारीक कि सुनकर बुद्धि चकरा जाए. सीधे आमदनी पर टैक्स तो समझ में आता है. पर आप जो चीज खरीदें उसपर टैक्स, उत्पादक जो माल बनाए उसपर टैक्स, माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में जो भाड़ा लगे उसपर टैक्स. वस्तु को पैकेट बंद करने में जो लागत आती है, उसपर टैक्स. सामग्री और उपसामग्री पर भी टैक्स. फिर विज्ञापन जो आपको वस्तु के बारे में बताता है, उसपर भी टैक्स. दुकानदार का टैक्स, सर्विस टैक्स. आप गिनते जाइए. आपकी याददाश्त धोखा देने लगेगी, टैक्स की कतार कम नहीं पड़ेगी. और ये सब कहां से आता है. वही जो हम और आप रातदिन परिश्रम से कमाते हैं. वही तरहतरह से, अलगअलग नामों से सरकार की जेब में जाने लगा. पर सरकार में जो बैठे हैं. उन्हें हमी ने ताकत सौंपी है. परंतु निखालिस ताकत से काम चलता नहीं. बली को तो सुखसुविधा, मानवैभव सभी कुछ चाहिए.

सरकार से जुड़े लोगों को सुखी बनाने की जिम्मेदारी ली पूंजीपतियों ने. अपने कारखाने उन्होंने विलासिता की वस्तुओं को बनाने के लिए सौंप दिए. सरकार और सत्ता केंद्र पर विराजमान लोगों के पास संसाधनों की अफरात ही अफरात. विलासिता की वस्तुओं की बिक्री बढ़ी तो उसपर भी टैक्स लगा दिया. जनता को थोड़ा और दुहा जाने लगा. उत्पीडि़त अपनी सफलता उत्पीड़क की नकल करने में देखता है. वह उसी को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानता है. इसलिए हममें से जो थोड़ाबहुत बचा लेते थे, वे भी अपनी बचत को विलासिता की वस्तुओं पर खर्च करते रहते हैं. उत्पीड़क के लिए यह सबसे मुफीद है. पूंजी गरीब के बटुए से बाहर आएगी, तभी तो ऊपर तक जाएगी. परंतु ऐसा करतेकरते निचला वर्ग खोखला पड़ने लगता है. लेकिन महत्त्वाकांक्षाएं, चाहतें और सपने तो उस वर्ग के भी होते हैं. खाली जेब और बाजार के आकर्षण, मन में अंतद्र्वंद्वों को जन्म देते हैं. उससे समाज में असंतुलन बढ़ता है. आपसी अविश्वास में वृद्धि होती है. तनाव और अंतर्कलह पनपने लगते हैं. ये सब बढें तो असहिष्णुता और असंवेदनशीलता भी बढ़ने लगती है. इससे आपसी झगड़े, मुकदमेबाजी, कोर्टकचहरी को बढ़ावा मिलता है. इस बहाने हमारा धन फिर हमारे हाथों से खिसकने लगा. कुल मिलाकर सरकार जो हमने अपने निगहवानी और जरूरतों की देखभाल के लिए बनाई थी, उसमें ऐसे लोग शामिल होते जाते हैं, जो सिर्फ राजनीति करते हैं. सत्ता की राजनीति, मुनाफे की राजनीति, अवसर और पदलाभ की राजनीति. इस तरह राजनीति जो सेवाकर्म हो सकती थी, शीर्षस्थ लोगों के व्यवसाय में बदल जाती है. ऐसे लोग उसमें चले आते हैं जिनका एकमात्र ध्येय अपनी स्वार्थसिद्धि करना रहता है. वे जानते हैं कि छोटेछोटे अनेक खानों में बंटी जनता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती. लेकिन डर फिर भी सिर पर सवार होता है. डर इस बात का कि जिस ‘शार्टकट’ के जरिये वे उस स्थान तक पहुंचे हैं, उन्हीं के समान महत्त्वाकांक्षी कोई व्यक्ति उस स्थान पर पहुंचकर कभी भी उन्हें अपदस्थ कर सकता है. जनता ऊपर के वर्ग पर होने वाले ऐसे तमाशे को रोज देखती है. इससे लोगों को रोजमर्रा की ‘गपशप’ का मसाला मिलता है. उसी के जरिये वह अपनी कुंठाओं का विसर्जन करती है. उस समय वह भूल जाती है कि लोकतंत्र में उसकी सत्ता सर्वोपरि है. उसे यह अधिकार है कि स्वार्थी नेताओं को धूल चटा सके. परंतु वह ऐसा नहीं कर पाती. इसलिए कि शीर्ष पर बैठे हुए लोग उसको इतने छोटेछोटे खानों में बांट देते हैं कि वह कोई कारगर फैसला लेने की स्थिति में आ ही नहीं पाती. उसकी शक्तियां कारगर हो ही नहीं पातीं.

1947 में जब देश आजाद हुआ था कि उस समय हमारे पास एक ही नारा था—राष्ट्र के नवनिर्माण का. चूंकि राष्ट्र पहले था, इसलिए नेता और जनता सब उसी को समर्पित थे. लेकिन धीरेधीरे राजा और प्रजा सब स्वार्थसमर्पित होते चले गए. जनता इस सोच में अपने निगहबानों चुनने लगी कि वे सरकार बनाकर उसके सुख की रक्षा करेंगे. मगर निगहबानी की कसम खाकर सत्ताकेंद्र में पहुंचे नेता खुद को मालिक समझने लगे. लोग उनकी चालाकी को समझें, इसलिए धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, वर्ण जैसे मुद्दे बहस और पहचान का प्रतीक बना दिए गए. आज हालात यह हैं कि राज है, पर राज कहीं नहीं हैं. नेता के लिए वोटर महज उत्पाद है. चुनाव लड़ना महज मतप्रबंधन बनकर रह गया है. मतदाता ऐसे नेता को वोट देने जाते हैं, जिसपर उन्हें जरा भी विश्वास न हो. और जब चुनाव में खड़ा उम्मीदवार भ्रष्ट, और दागी हो, तो चर्चा का आधार भी धर्म, जाति, क्षेत्रीयता जैसे अनुत्पादक मुद्दे रह जाते हैं. नेता भी मतदाता की इस कमजोरी को जानता है. इसलिए वह चुनावों में ऐसे मुद्दे उछालते ही नहीं जिनका विकास से सीधा संबंध हो. ‘सब चलता है’ सोचकर मतदाता वोट देता है और मुखौटायुक्त नेता संसद पहुंच जाते हैं. इन चेहरों में यदाकदा जो बदलाव आते भी हैं, तो इन्हीं गैर उत्पादक मुद्दों द्वारा.

आजादी के बाद देश ने लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को चुना था. इसलिए कि देश को सामंतवाद के चंगुल से बाहर लाना था. तब देश में करीब सात सौ रियासतें थें. जिनके वजीर, जमींदार, राजा, सामंत सब अपना स्वार्थ देखते थे. उनके लिए तरक्की का मतलब था, राजपरिवार में विलासिता की वस्तुओं का बढ़ते जाना. किसी साम्राज्यवादी मनसूबे का साकार हो जाना. प्रजा उन सामंतों, जागीरदारों के भोगविलास को हसरतभरी निगाह से देखती, जिंदगी किसी तरह गुजर जाने तथा अगले जन्म में इस जन्म के अभावों की पूर्ति के लिए प्रार्थना करती थी. स्वर्ग उसके लिए बड़ा प्रलोभन था. दुख और अभावों, जीवनसंघर्ष की असफलताओं ने उसे भाग्यवादी बनाया था. इसलिए राजा कौन है, इस बारे में अधिक नहीं सोचती थी. वह नासमझ भी नहीं थी. न ही मूर्ख थी. अनुभव पगी थी. अनुभव ने ही उसे चुप रहना, संतोष करना सिखाया था. लेकिन गांधीजी ने जब उसका आवाह्न किया, तो पहली बार उसे अपने नेताओं पर भरोसा जमा. इसी के साथ वह हुंकार पड़ी थी, स्वतंत्रता के लिए.

आजादी सिर्फ राजामहाराजाओं, सामंतों के संघर्ष के फलस्वरूप आती तो देश में राजशाही ही पनपती. अठारह सौ सतावन में जितने भी रजबाड़े अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में सम्मिलित हुए थे, सभी के अपने स्वार्थ थे. उनकी लड़ाई केवल अपनी सत्ता के लिए थी. एक तरह से अच्छा ही हुआ जो आजादी से पहले देश के राजेरजबाडे़ अंग्रेज सरकार के पिछलग्गू बने हुए थे. जनता ने उनकी हकीकत को पहचाना और संगठित होकर अपने कंधे से गुलामी का जुआ उतार फेंका. देश उसका जो आजादी को अपने प्राणप्रण से सींचे. जनता के प्राणप्रण से बलिदान के फलस्वरूप स्वाधीनता ने दस्तक दी थी. इसलिए रजबाड़ों की हिम्मत ही न पड़ी थी, मनमानी करने दी. इसलिए जब भारत या पाकिस्तान में बंटने को कहा गया तो चुपचाप बंटते चले गए. जो इक्कादुक्का रहे उन्हें भी अपनी प्रजा और परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने पड़े. निहत्थे गांधी से सब डरते थे. जानते थे कि उस अधनंगे फकीर को तो कभी भी मार सकते हैं. पर वह अकेला कहां हैं! जनताजनार्दन का हाथ उनकी पीठ पर था. यह ठीक है कि गांधी उन नेताओं में से थे जिन्होंने भारतीय जनता को राजनीति का पाठ पढ़ाया था. मगर यह भारतीय जनता ही थी जिसके कंधों पर सवार होकर स्वाधीनता आंदोलन अपनी सफलता को पहुंचा. जिस देश की जनता जाग जाए उसको दुनिया की कोई शक्ति गुलाम नहीं बना सकती. सो जनता के कंधों पर सवार होेकर ही गांधी महात्मा बने, राष्ट्रपिता कहलाए. लेकिन गांधीजी यदि देश के एकक्षत्र नेता होते तो क्या देश में लोकतंत्र का आगमन संभव होता? क्या लोकतंत्र को गांधीवादी राजनीति का समापन बिंदू कहा सकता है? एक शब्द में इसका उत्तर है—‘नहीं.’

निस्संदेह गांधी भारतीय जनमानस में सर्वाधिक लोकप्रिय नेता थे. किंतु गांधी की मनोरचना में लोकतंत्र कहीं नहीं था. वे अपने निर्णय जिद पूर्वक लागू कराते थे. दबाव बनाने के लिए सत्याग्रह सबसे कारगर हथियार था. दरअसल गांधी का आदर्शराज्य ‘रामराज्य’ की परिकल्पना से बुना था. उनका हिंदू मानस उस दायरे से बाहर सोच ही नहीं पाता था. बाद में लोकतंत्र के समर्थक बने तो इसलिए कि उस समय तक दलित और पिछड़ों में एक पढ़ालिखा बुद्धिजीवी वर्ग पनप चुका था. उसके नेता थे, ज्योतिबा फुले और डाॅ. भीमराव आंबेडकर. संविधान निर्माण के क्षेत्र में डा॓. अंबेडकर ने वही किया जो अमेरिका में था॓मस जेफरसन ने किया था. दोनों के जीवन में कुछ समानताएं भी हैं. दोनों बेहद पढ़ाकु थे. दोनों को गरीबी से संघर्ष करना पड़ा था. दोनों का ही जीवन अभावों में बीता था. कुछ अर्थों में अंबेडकर का काम जेफरसन से भी बड़ा था. अंबेडकर को डा॓. अंबेडकर बनने तक सामाजिक परिस्थितियों, जातिवाद और छुआछूत के विरुद्ध भी युद्ध करना पड़ा था. जेफरसन का देश और वहां के लोग इस मामले में उदार थे. इसलिए उन्होंने अमेरिकी गणतंत्र के प्रमुख सूत्रधार को राष्ट्रपति के पद से नवाजा. भारत में एक दलित को ऐसे अवसर कम से कम उस समय न थे. जेफरसन ने अमेरिका के लिए ‘स्वाधीनता का घोषणापत्र’ तैयार किया था, डाॅ. अंबेडकर ने भारतीय संविधान. बाद में संविधान का जो प्रारूप स्वीकृत हुआ उसके कई प्रावधानों से डा॓. अंबेडकर की असहमति थी. तथापि लोकतंत्र का सम्मान करते हुए वे संविधान के प्रचारप्रसार में जुटे रहे.

बहरहाल, लोकतांत्रिक शासन प्रणाली लागू करने के बाद असली काम लोगों को अपने पैरों पर खड़ा करने का था. उनमें ऐसा विवेक पैदा करना जरूरी था, ताकि वे लोकतंत्र का लाभ उठा सकें. पढ़े और अनपढ़ दोनों वोट से बंदूक का काम कैसे लें, यह समझाने की जरूरत थी. लंबे समय तक सामंतवादी समाज में रह रहे लोगों में नागरिकताबोध पैदा करना था. सामान्य राय के पक्ष में निजी हितों को कुछ समय के लिए बलिदान करना क्यों जरूरी है—यह बात भी लोगों को समझानी थी. इसके लिए अंबेडकर सामाजिक क्रांति की आवश्यकता महसूस करते थे. उनके लिए सामाजिक आजादी का मसला राजनीतिक आजादी से बढ़कर था. अंबेडकर साहब की नहीं चली. राष्ट्र पिता कहलाए जाने के बावजूद गांधी की भी नहीं चली. गांधी की हत्या के बाद तो देश को उस दशा में सोचने का अवसर ही कहां मिला? आजादी की घोषणा के तुरंत बाद देश में दंगे होने लगे थे. उसके बाद पाकिस्तान तथा चीन का हमला. 1971 में फिर पाकिस्तान से युद्ध. ये कुछ कारण ऐसे रहे जिससे देश में मतदाता के विवेकीकरण का अभियान चल ही नहीं पाया. 1950 में देश में मानवाधिकारों को स्वीकृति देकर मनुष्य की मूलभूत स्वतंत्रता की घोषणा कर दी गई. मगर जाति, धर्म, वर्ग, क्षेत्रीयता में फंसे समाज में राजनीति का इतना स्खलन हुआ कि जनविवेकीकरण का अभियान सिरे ही नहीं चढ़ सका. विवेकीकरण की प्रक्रिया को अवरुद्ध करने के कुछ और भी कारण थे. उनमें एक था, हिंदू समाज की पराजित मनोग्रंथि. देशवासियों को पराजित दासता में जीवनयापन करते हुए पांच सौ से अधिक वर्ष पूरे हो चुके थे. आक्रामकों ने इस देश का आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक यानी सभी तरह से शोषण किया था. लेकिन धर्मप्राण जनता को धर्माधारित शोषण का सर्वाधिक क्षोभ था. इसलिए 1947 में जैसे ही विदेशी शासन से मुक्ति मिली, सबसे पहले जनता का ध्यान अपने धर्म और परंपराओं को सहेजने पर गया. आजादी के तुरंत बाद बंटवारे की घटना देश में सांप्रदायिक धु्रवीकरण की ही देन थी, जो स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही पनपने लगा था. आजादी के तुरंत बाद बंटवारे की घटना, धर्माधारित राष्ट्रों का निर्माण, बाद में पाकिस्तान के हमलों ने देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की पृष्ठभूमि तैयार की थी. कालांतर में वोट की राजनीति ने उसको और हवा दी.

उस समय यदि देश के नेता चाहते तो समन्वयात्मक राजनीति की शुरुआत कर सकते थे. पाकिस्तान से अधिक मुसलमान हिंदुस्तान में थे. तथा समाज में आपसी तालमेल बनाए रखना समय की आवश्यकता भी थी. ऐसे कुछ नेता अवश्य हुए जिन्होंने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बजाय समन्वयीकरण को अपनी राजनीति का लक्ष्य बनाया. किंतु वे अपने संप्रदाय से उभरकर ही नेता बने थे. उनके प्रशंसकों, समर्थकों में अधिक संख्या उनके अपने धर्मावलंबियों की थी. अतएव अपने संप्रदाय की एकाएक उपेक्षा उनके लिए संभव न थी. दूसरे समन्वयीकरण की राजनीति को अपने जीवन का लक्ष्य बनाने वाले वास्तविक नेता संख्या में बहुत कम थे. उनके पास संसाधनों का भी अभाव था. जो साधनसंपन्न थे, उनके वैसे सरोकार न थे. परिणाम यह हुआ कि आजादी के बाद सभी सरकारें तुष्टीकरण की नीति को अपनाने लगीं. इससे राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य निरंतर दूर होता गया. 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध ने पुराने जख्मों को और भी हरा कर दिया. उस युद्ध में पाकिस्तान को मिली पराजय ने जहां पाकिस्तानी मुसलमानों की हीनताग्रंथि को मजबूत किया, बल्कि हिंदुमुसलमानों के बीच नई दरार बनाने का काम किया. आर्थिक उदारीकरण के समय लगा था कि बाजार और प्रतिस्पर्धा के दबाव सांप्रदायिकता को भी चुनौती देंगे. विकास की चाहत लोगों को एकदूसरे के साथ लाएगी. फलस्वरूप जाति, संप्रदाय, धर्म और क्षेत्रीयता जैसे अनुत्पादक मुद्दे राजनीति से एकएक कर हटते चले जाएंगे. मगर वह केवल खामाख्याली थी. जो अपेक्षाएं की जा रही थीं, उनके लिए एक विवेकीकृत जनसमाज का गठन जरूरी था. लगा था कि विकास के साथ नई शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी ऐसा वातावरण बनाएगी. लेकिन बाजार और पूंजी की अपनी ठसक होती है. वह सबसे पहले उपभोक्ता के दिलोदिमाग पर कब्जा करती है. उसके सोचने और फैसले लेने की ताकत को चुनौती देती है. फिर उसको ऐसे मोड़ती है कि व्यक्ति वस्तुओं की खरीद अपनी जरूरत के बजाय प्रतिष्ठा को ध्यान में रखकर करने लगता है. धीरेधीरे वह ऐसा उपभोक्ता बन जाता है, जिसे बाजार कठपुतली की भांति अपनी उंगलियों पर नचाता है.

हाल की बात करें तो बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था ने मनुष्य के सारे सोच, सारी हरकतों को सुविधाभोगी बना दिया है. बाजार हालांकि हाल की अवधारणा नहीं है. पांच हजार वर्ष पहले भी बाजार था. व्यापारियों के काफिले दूरदूर तक यात्रा करते थे. बाधाओं का सीना चीरते हुए वे सैकड़ों, हजारों मील दूर निकल जाते थे. इसके साथ वे अपने देश की वस्तुओं के साथसाथ संस्कृति भी ले जाते थे. लेकिन वे व्यापार जरूरत की वस्तुओं का करते थे. विलासिता की वस्तुएं उस समय भी बनती थीं. मगर लोगों की जरूरतों या इच्छाओं पर बाजार का नियंत्रण न था. न बाजार लोगों की पसंदों को नियंत्रित करने की धृष्टता करता था. इसलिए जरूरतें व्यक्ति की अपनी थीं. वे व्यापारी की मनमर्जी से तय नहीं होती थीं. आज पंूजीवादी व्यवस्था ने सारे मायने बदल दिए हैं. स्थिति यहीं तक सीमित होकर रह जाने वाली नहीं है. बाजार न केवल मनुष्य के लिए नई जरूरतें रच रहा है, बल्कि सांस्कृतिक तत्वों को भी बाजार की दृष्टि से परिभाषित कर रहा है. कहीं पर संस्कृति को महत्त्वहीन बनाने के लिए उसको पूंजीपति घरानों के हवाले कर रहा है. उल्लेखनीय है कि बाजार अपने आप में बुरा नहीं है. हजारों, लाखों लोगों की जरूरत को पूरा करने वाली, लाखों को रोजगार देने वाली संस्था समाज की जरूरत ही कही जाएगी. किंतु उसपर मुट्ठीभर लोगों का नियंत्रण, उसका मुनाफाखोरों के हाथों में चला जाना बुरा है. बाजार का मनुष्य के निर्णयसामथ्र्य पर छा जाना बुरा है.

इससे मुक्ति संभव कैसे हो. कैसे बाजार को उसके मूल उद्देश्य तक वापस लाया जाए. यह कैसे हो कि बाजार भी रहे, पूंजी भी रहे और पूंजी अपना स्वभाव छोड़ दे. मनुष्य कठपुतली उपभोक्ता के बजाय विवेकवान ग्राहक की भांति व्यवहार करे. यहां पूंजी के स्वभाव को समझना पड़ेगा. उसका आशय है धनसंपदा का अपना मकसद भूलकर केवल लार्भाजन के काम में जुट जाना. समाज की संपदा जब धर्म भूलकर कुछ लोगों के मुनाफे के लिए काम करने लगती है, तो वह पूंजी बन जाती है. संपदा समाज की रहे, समाज के काम साधे. तभी वह सम्मानेय है. इसलिए पूंजी से अपना स्वभाव छोड़ने की अपेक्षा करना ही समाजवाद है. इसके लिए आवश्यक है कि पूंजी पर उन लोगों का अधिकार हो, जो उसका उपयोग करते हैं. उपयोग के तरीके और प्रविधियां कुछ भी हो सकती हैं, बस वे मानव की गरिमा बढ़ाने वाली हों. गिरानेवाली नहीं. उनसे समाज में उत्पादकता बढ़े, विलासिता नहीं. वस्तुओं का उत्पादन लोगों की जरूरतें पूरा करने के लिए हो, उद्योगों और बाजार पर एकाधिकार सिद्ध करने के लिए नहीं. पर क्या यह संभव है? यदि संभव है तो कैसे? कैसे यह संभव है कि व्यक्ति पूरे समाज के कल्याण के बारे में सोचे तथा उसकी उत्पादकता भी बाधित न हो. यह तभी संभव है जब प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ अपने समूह और समाज के बारे में सोचे. जब समाज में सामाजिक लाभों को आर्थिक लाभों जितनी ही महत्ता दी जाए. बल्कि उत्पादकता का ध्येय सामाजिक लाभ की प्राप्ति हो. आर्थिक लाभ गौण हों.

दरअसल समाजवाद और उसके समानधर्मा अर्थदर्शनों की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वे धन के राष्ट्र अथवा श्रमिक संगठनों के अधीन जाने की व्यवस्था तो करते हैं, किंतु नागरिकों को अधिकतम उत्पादन में सहयोग देने की कोई स्पष्ट आचारसंहिता उनके पास नहीं है. साम्यवाद में यह मान लिया जाता है कि उद्योगों पर स्वामित्वबोध की अनुभूति श्रमिकों को अधिकतम उत्पादन के लिए प्रेरित करेगी. जबकि समाजवाद यह मानकर चलता है कि जो समाज अपने प्रतिनिधियों को चुनने में सामथ्र्यवान है, उसके नागरिक अवश्य ही इतने योग्य हैं कि वे अपनी अंतःप्रेरणा के अनुसार राष्ट्रनिर्माण में भी अपना अधिकतम योगदान देंगे. समाजवाद की यह अपेक्षा अनुचित नहीं है. व्यक्ति यदि समाज से कुछ अपेक्षाए रखता है तो उसके समाज के प्रति कुछ कर्तव्य भी हैं. आशय है कि समाजवाद और साम्यवाद दोनों व्यवस्थाएं नागरिकों को अधिकतम उत्पादन में सहयोग देने के लिए स्पष्ट आचारसंहिता के बजाय स्वतः प्रेरणाओं का सहारा लेते हैं. जबकि व्यवहार में यह देखा गया है कि समाजवाद और साम्यवाद दोनों में निजी संपत्ति की अधिकारिता का निषेध, नागरिकों को उत्पादन कर्म के प्रति लापरवाह बनाता है. वह नागरिकों के मन में आलस्य की भावना का विकास करता है. जिससे उत्पादकता में घटाव शुरू हो जाता है. परिणामस्वरूप विकासदर शिथिल पड़ने लगती है.

विकासदर को बनाए रखने के लिए कुछ देश बलप्रयोग का सहारा लेते हैं. वहां लोगों से उनके लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिए जाते हैं. श्रमिक कामगारों से मनमाना काम लिया जाता है. उनकी मजदूरी उनकी न्यूनतम आवश्यकता के अनुसार तय की जाती है. यह एकदलीय अथवा निरंकुश शासन में ही संभव है. जैसा इन दिनों चीन में हो रहा है. पर इससे आजादी का आधा लक्ष्य ही हासिल हो पाता है. समाज के मानवीकरण की कोशिशें अधूरी रह जाती हैं. वैसे समाजवाद और साम्यवाद की लोगों से यह अपेक्षा अनुचित नहीं है कि लोग स्वतःप्रेरणा के आधार पर उत्पादन में हिस्सा लें और अपना यथासंभव योगदान दें. परंतु दोनों के साथ विडंबना यह है कि उन्हें ऐसे समाजों में काम करना पड़ा है, जहां ही जनता की कई पीढि़यां विकृत सामंतवाद का उत्पीड़न झेलतेझेलते अपना धैर्य, स्वाभिमान और कदाचित स्वतंत्र निर्णय लेने की ताकत भी खो चुकी हैं. इसलिए समानता और बराबरी के समाजवादी सपने लंबे समय तक उसका विश्वास नहीं जीत पाते. दूसरे अपने ही समाज में व्याप्त असमानता के कारण उन्हें ऐसे लोगों से स्पर्धा करनी पड़ती है, जो कई मायने में उनसे बहुत आगे हैं. इसलिए समाजवादी और साम्यवादी सपने उन्हें मायाजाल लगते हैं. जैसे कोई बच्चा बाजार में रंगबिरंगी वस्तुएं देख मचलने लगता है और उन्हें पाने के लिए कभीकभी मातापिता की गोद से उतर जाता है, वैसे ही वे भी छिटकने लगते हैं. आधुनिक समाज के लिए सबसे बड़ी चुनौती, व्यक्तिगत लाभ और सामाजिक लाभों के बीच तालमेल बनाए रखने की है. साम्यवाद, पूंजीवाद और समाजवाद जैसी व्यवस्थाएं इसी तालमेल के लिए अलगअलग रास्ते सुझाती हैं. इनमें से प्रत्येक की अपनी विशेषताएं हैं. कमजोरी यह है कि वे व्यक्ति और समाज के संबंधों पर विशेष ध्यान नहीं देते. इसलिए एक को संभालो तो दूसरा साथ छोड़ने लगता है. व्यक्ति समाज के साथ भी रहना चाहता है और स्वतंत्र भी. किन परिस्थितियों में वह इनमें से किसे वरीयता देता है, यह पूरी तरह उसी पर निर्भर है. लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक है कि नागरिक हितों के सामान्यीकरण को अपनाएं. मगर हितों के सामान्यीकरण की आवश्यकता पहले भी थी, आज भी है. समाजवाद और साम्यवाद दोनों इस बात पर एकमत हैं कि राज की पूंजी हो न कि पूंजी का राज्य. आधुनिक समाज के सामने बड़ी समस्या है. वह समस्या है कि व्यक्ति और समूह के हितों में तालमेल बिठाना. बाजार को तो दोनों ही चाहिए. व्यक्ति भी समूह भी.

बात हमने सरकार से आरंभ की थी और समाजवाद तक आ गई. विचारों की यह यात्रा अन्यथा नहीं थी. एक स्वाभाविक यात्रा है. क्योंकि दोनों का संबंध कहीं न कहीं व्यक्ति से है. उसके खोए हुए स्वाभिमान से है. सरकार इसलिए कर्तव्यच्युत होती हैं, क्योंकि उनपर जनता का वैसा नियंत्रण नहीं हो पाता, जैसा अपेक्षित होता है. समाजवाद और साम्यवाद जनजन के विकास की बात करते हैं, मगर व्यक्ति और समाज के संबंधों में पर्याप्त समन्वय न कर पाने के कारण, वे बहुत जल्दी बिखराब या पतन का शिकार होने लगते हैं. व्यक्ति के भीतर स्वतःप्रेरणाएं न जगा पाने के कारण आर्थिकसामाजिक समानता का लक्ष्य लेकर चले दोनों दर्शन अंतत असफल नजर आने लगते हैं. आखिर क्यों? मनुष्य की अंतःप्रेरणाओं को जगाने का सबसे बड़ा रास्ता तो यही है कि वह अपने अधिकारों को समझे. साथ में यह भी जाने कि म्नुष्य के रूप में उसके अधिकार केवल उसके अधिकार मात्र नहीं हैं, उनके पीछे उसके समाज के प्रति कर्तव्य भी निहित हैं. उसे यह बोध हो कि अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा वह तभी कर सकता है, जब वह दूसरे के मौलिक अधिकारों का सम्मान करे. यहां मानवाधिकारों की भूमिका केंद्रीय हो जाती है. यदि समाजवाद मनुष्य को यह भरोसा दिलाए कि वह आर्थिक लाभ के विभाजन के समय कोई भेदभाव नहीं करेगा और मानवाधिकार यह भरोसा जगाएं कि मनुष्य के मूलभूत अधिकार प्रत्येक अवस्था में सुरक्षित हैं, तब मनुष्य को यह भी भरोसा होगा कि पूरा समाज उसके अधिकारों, सुख की सुरक्षा और संपूर्ति के लिए संकल्पबद्ध हैं. तब निश्चय ही वह समाज और उसकी संस्थाओं को बचाना चाहेगा. यदि मनुष्य स्वयं सामाजिक संस्थाओं का सम्मान करेगा, अपने कर्तव्यों के प्रति चैतन्य और आत्मानुशासित होगा तो अनेक खर्चीली संस्थाओं का औचित्य अपने आप जाता रहेगा.

© ओमप्रकाश कश्यप

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