परीकथाओं का भविष्य : भविष्य की विज्ञानकथाएं

कल्पना की प्रवृत्ति आगे बढ़ना है, ठहरना अथवा पीछे हटना नहीं.

वाल्डो इमर्सन

अन्य कथारूपों की भांति परीकथाएं भी उत्पादकता के कारणों से प्रभावित होती है. आरंभ में जब जनजीवन प्रकृति आधारित था, जीवन आखेट और वनवनस्पतियों पर टिका था तो मानवअभिव्यक्ति का आकर्षण प्राकृतिक उपादान यथा पशुपक्षी, वनवनस्पति आदि होते थे. उन दिनों मनुष्य को अपनी बुद्धि पर गुमान नहीं था. वह स्वयं को पशुपक्षियों के परिवार का ही एक हिस्सा मानता था. इसलिए यह मानते हुए कि जड़चेतन किसी से भी सीखा जा सकता है, उसने पशुपक्षियों तथा प्राकृतिक उपादानों को केंद्र में रखकर अनगिनत कहानियां गढ़ीं. संगठन और संस्कृतिकरण की कोशिशों के रूप में धार्मिकसांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर भी कहानियां रची गईं. कालांतर में मिथकों और पुराकथाओं के सृजन का सिलसिला इतनी तेजी से चला कि मनोरंजन और सांस्कृतिकरण की कोशिश के रूप में गढ़ी गई पशुपक्षियों की कहानियां भी पुराकथाओं का हिस्सा बनती गईं. दोनों का कोला॓ज सांस्कृतिकरण की प्रक्रिया में सहायक बना. आगे चलकर राज्य संगठित होने लगे. सुरक्षा हेतु सेनाएं रखी जाने लगीं. यूनान के नगरराज्यों के बीच निरंतर चलनेवाले युद्धों के कारण युद्धसंस्कृति का विस्तार हुआ तो युवाओं को युद्ध की ओर प्रवृत्त करने के लिए नायक प्रधान परीकथाएं गढ़ी जाने लगीं. धीरेधीरे राजनीति व्यक्तिकेंद्रित होने लगी. राजाओं की विलासिता बढ़ी. रनिवास में एक से अधिक स्त्रियों का होना शान का प्रतीक माना जाने लगा. मुंह लगे लोग राजा की पसंदीदा रानियों की सुंदरता का बखान ‘परी’, ‘हूर’, ‘अप्सरा’ आदि कहकर करने लगे. उससे पहले परियों को जादूगरनी, चुड़ैल वगैरह माना जाता था. मध्यकाल आतेआते उनकी छवि में सुधार हुआ. उन्हें मनुष्य की कामनापूर्ति में सहायक बताया जाने लगा. औद्योगिक क्रांति के दौर में वैचारिक आंदोलन चले. समाज का पुराना सामंतवादी ढांचा चरमरा उठा. उसका प्रभाव परीकथा साहित्य पर भी पड़ा. फलस्वरूप उनमें भी बदलाव की मांग की जाने लगी. किस्सा कोताह यह कि आरंभ में केवल व्यक्ति था, समाज अनुपस्थित. धीरेधीरे समाज अस्तित्व में आया और व्यक्ति पर हावी होता चला गया. कालांतर में कुछ व्यक्तिसमूह और भी उभरे, फिर कुलीनतावाद अस्तित्व में आया. आगे चलकर अलगअलग टुकड़ों में बंटे या बांट दिए गए समाज ने एकल सत्ता को स्वीकृति दी. प्रकारांतर में समाज को दरकिनार करते हुए उस व्यक्ति ने खुद को इतना मजबूत कर लिया कि वह पूरे समाज का सर्वेसर्वा बन गया. एक आदमी खुश तो सारा समाज खुश. वह दुखी तो संपूर्ण राज्य पर चिंताओं के काले बादल मंडराने लगते. विरोधों को बलपूर्वक कुचलने की नीति ने साम्राज्यवादी ताकतों को आगे बढ़ने का अवसर दिया. फिर समय ऐसा भी आया जब राज्य के सर्वस्ववादी आचरण के विरुद्ध लोक चेतना जगी. व्यक्ति को अपनी गुमशुदा अस्मिता की याद सताने लगी. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास के साथसाथ ‘अस्मिता’ के सवाल सिर उठाने लगे. व्यक्ति एवं समाज के संबंध क्या हों? ‘स्वयं’ और ‘स्वयं से परे’ के बीच विभाजनरेखा कहां पर खींची जाए—विचारक ऐसे प्रश्नों के उत्तर में सिर खपाने लगे. इसके बावजूद चली उनकी जिनका सत्ता और संसाधनों पर कब्जा था.

साहित्य शब्द का पहला प्रयोग भर्तृहरि ने किया था—‘साहित्य, संगीत, कला विहीनः नरः. साक्षात पशु पुच्छ विषाण हीनः.’ उसका नजरिया हरेक दौर में समन्वयवादी का रहा. मौखिक और लिखित दोनों तरह से वह तनावों के शमन पर निरंतर जोर देता रहा. यदि हम प्राचीन परीकथाओं को देखें तो उनमें ऐसे लोक के दर्शन हमें होते हैं, जो सत्ताओं को सदैव उनकी सीमाओं की याद दिलाता रहता है. यह लोकसाहित्य की ताकत ही है कि उसमें एक किसान, बूढ़ी औरत या गरीब मजदूर भी राजा को उसके कर्तव्य की याद दिलाने से नहीं चूकता. इसका असर महाकाव्यों पर भी देखने को मिलता है. लोक ने राम को इसलिए ‘भगवान’ का दर्जा दिया क्योंकि वह सत्ता का मोह छोड़ कर्तव्यपथ की ओर बढ़ने में देर नहीं करते. युद्ध के पश्चात पांडव जब वन गमन करते है तो वे भी दर्शा रहे होते हैं कि अठारह अक्षौहिणी सेना की बलि चढ़ाकर भी सत्ता का शाश्वत भोग असंभव है. राजशाही की कमजोरी है कि वह सर्वप्रथम व्यक्ति के मूलभूत अधिकारों पर डाका डालती है, जबकि लोकथाओं एवं परीकथाओं में मानवाधिकारों तथा देश, समाज, संस्कृति और सभ्यता के गुणगान के साथसाथ व्यक्ति की नैसर्गिक स्वतंत्रता के प्रति सहानुभूति भी हमेशा बनी रही. विशेषकर स्त्रीपुरुष के भावनात्मक संबंधों को लेकर. तदनुरूप परीकथाओं में ऐसे विचारों को भी जगह मिली, जिन्हें व्यवहार में अनाचार अथवा समाजविरोधी माना जाता है. जैसे एक विवाहित पुरुष यदि विवाहित स्त्री से प्यार करने लगे तो समाज की निगाह में वह दुराचरण है. परीकथाओं में वह मनोरंजन के नाम पर खपा लिया जाता था. उसके माध्यम से परीकथाएं उन स्थितियों को सामने लाती हैं, जो समाज की तयशुदा आचारसंहिता के उल्लंघन का परिणाम हो सकती हैं. अपनी नैसर्गिक स्वच्छंदता का भोग करना, मनुष्य की जन्मजात चाहत होती है. लेकिन समाज में रहने के लिए उसे अपनी स्वच्छंदता के एक हिस्से का बलिदान करना पड़ता है. मानवप्रवृत्ति इस बलिदान को एकाएक स्वीकार नहीं करती. उसमें हमेशा ऐसी इच्छाएं अंगड़ाई लेती रहती हैं, जिन्हें समाज निषिद्ध मानता है. धीरेधीरे वे मनुष्य के अवचेतन का हिस्सा बन जाती हैं तथा अनुकूल अवसर पर कहानियों, परीकथाओं, सपनों आदि के माध्यम से प्रकट होती हैं. इसलिए कहानियों में वे प्रसंग जो दमित इच्छाओं की पूर्ति में सहायक हों, अथवा उनका समर्थन करते हों, पाठक की भावनाओं को छू लेते हैं. व्यावहारिक रूप में मान्य न होते हुए भी कहानियों/परीकथाओं में उनका आकर्षण लगातार बना रहता है. इस कारण परीकथाओं को साहित्य का ऐसा कोना मान सकते हैं, जहां व्यक्ति सामाजिक मर्यादाओं से परे, अपनी स्वच्छंदता का एहसास कर सकता है. इस तरह मानवमन में छिपे ज्ञातअज्ञात विकारों के उपचार हेतु परीकथाओं ने औषध का काम किया है.

मनुष्य की अद्वितीय कल्पनाशक्ति का विकास ब्रह्मांड के सापेक्ष बौनेपन की कुंठा तथा उसके समाहार की ललक से हुआ है. यह परीकथाओं और लोकसाहित्य में ही संभव था कि एक ‘कद्दू’ अपनी गरीब मां को सुखी देखने के लिए कमाई करने घर से निकले, राजदरबार में पहुंचकर अपने प्रतिभाकौशल से सभी को चमत्कृत करे और राजकुमारी को ब्याह कर घर ले आए. राजकुमारी की ओर देखनेभर से आंख निकलवा लेने वाली राजसत्ता उसका कुछ न बिगाड़ पाए. ऐसी कहानियां कोरी कल्पना की उड़ान न थीं. उनका लौकिक महत्त्व भी था. अतिसाधारण परिवार के किशोर बेटे का प्रतीक ‘कद्दू’ अपने बुद्धिचातुर्य से राजदरबार में सभी को चमत्कृत कर यह सिद्ध कर देता है कि बुद्धिविवेक, चपलता, तत्परता, साहस, वीरता और निडरता जैसे उदात्त गुण, केवल सत्ताशिखर पर विराजमान लोगों का एकाधिकार नहीं है. ब्राह्मण को मूर्ख, राजा को कमजोर और कायर तथा रानी को बदचलन दिखा पाना भी केवल कहानियों में संभव रहा. उनमें कौआ महान गाथाएं सुना सकता था, कुत्ता दर्शन बघार सकता था; और नदी का मामूली जीव कछुआ लोगों को राजनीति की शिक्षा दे सकता है. लोकमानस में स्वयंस्फूत्र्त जन्मी ये परीकथाएं उसे न केवल अपने अंधेरे कोनों से परचाती थीं, बल्कि सत्ता के दागधब्बों की ओर संकेत करते हुए, शीर्षस्थ वर्ग से भी समानता और सच्चरित्रता की मांग भी करती थीं. समाज का आईना होने के साथसाथ वे प्रजा की ओर से प्रस्तुत मांगपत्र जैसी थीं. दूसरी ओर ऐसी कहानियां और लोककथाएं भी रहीं, जिनमें राजा और उसके दरबारियों का महिमामंडन होता था. जो सामाजिक विभाजन को, ऊंचनींच, जातपात, धर्मभेद को शास्त्रसम्मत बताती थीं. जिनमें राजकुमारी को केवल उच्च कुल के राजकुमार से विवाह करने की छूट थी. जो कुलपरंपरा में छोटे हों, उन्हें राजकुमारी की ओर देखने तक का अधिकार नहीं था. दूसरे किस्म की कहानियां सामान्यतः मौखिक न होकर लिखित रूप में थीं. वे दरबारी लोगों द्वारा अपने आश्रयदाताओं के मनोरंजन हेतु, सुखसुविधाओं के बीच गढ़ी जाती थीं. जनसाधारण के बीच परीकथाओं की लोकप्रियता का कारण यह भी रहा क्योंकि वे चमत्कार के माध्यम से ही सही, पलक झपकते नाकुछ को सबकुछ बनाकर शीर्ष पर ले आती थीं. उनमें छोटेबड़े का भेद नहीं था. जिस अलाव के किनारे अस्सी वर्ष का दादा कहानी सुन सकता है, उसी के आगे, किशोर पोता भी कहानी का आनंद ले सकता है. इसलिए वे तीनतीन, चारपीढि़यों की ज्ञानसंपदा का वहन करने तथा उसे ऐच्छिक व्यक्ति अथवा व्यक्तिसमूहों तक पहुंचाने का कार्य लगातार करती रहीं.

समाज के छोटेसे छोटे व्यक्ति को केंद्र में आने का अवसर देने के कारण परीकथाएं समाज के वंचित वर्ग में विशेष लोकप्रिय रही हैं. यह समानता हालांकि कल्पना तक सीमित थी, इसके बावजूद वह व्यक्ति की कुंठाओं के समाहार में काफी मददगार सिद्ध होती थी. लोकसाहित्य की इसी ताकत और पैठ के आगे, समाज का प्रभु वर्ग, परीकथाओं को छोटे, वंचित लोगों का प्रलाप कहकर उपेक्षित करता रहा. तथापि परीकथाओं की लोकप्रियता पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा. प्रौद्योगिकीय क्रांति के दौरान उभरे मध्यवर्ग ने शिक्षा पर अधिकार कर प्रभुवर्ग के समक्ष अपनी शक्ति और पैठ का एहसास कराया था. यह एहसास भी कराया था कि प्रभुवर्ग का श्रेष्ठत्व, धनवैभव आदि उन्हीं अर्थात मध्य वर्ग के बुद्धिबल और श्रमबल की देन है. इसी वर्ग ने श्रुत परंपरा की परीकथाओं को लिखित रूप में पेश किया. शुरुआत फ्रांसिसी महिलाओं ने की, जो कुलीन परिवारों से संबद्ध होने के बावजूद लैंगिक भेदभाव का शिकार थीं. धीरेधीरे वे पूरे कुलीन समाज की पसंद में उतरने लगीं. दबाव में ही सही, शीर्षस्थ लोगों की निगाह में उपेक्षित रही देहाती और गंवईं कहानियां, प्रकारांतर में प्रभुवर्ग के बेडरूमों और दरबारों में भी दस्तक देने लगीं. परीकथाओं में नैतिक और भावनात्मक खजाने की खोज की जाने लगीं. इस तरह वे कहानियां दो भिन्न कार्यसंस्कृति और हैसियत वाले वर्गांे के बीच समन्वय हेतु पुल बनने में कामयाब रही हैं.

मूलतः सुननेसुनाने की विधा रही कहानियों ने अपना लंबा समय किस्सागोई के साथ बिताया है. फलस्वरूप उसकी शैली और प्रस्तुतीकरण में सार्वजनिक बोध हमेशा ही रहा. आज भी जब कोई मंजा हुआ किस्सागो परीकथा सुनाते समय अलखाता है—‘एक बार की बात है….’, ‘एक बार एक बियावान जंगल में’ तब वह अपने श्रोताओं को स्वतः ही एक परंपरा से जोड़ लेता है. प्रकारांतर में वे कहानियां सामूहिकता का आयोजन बन जाती हैं. प्राचीन परीकथाओं में प्रायः एक राजकुमार होता है, जिसे अंत में राजकुमारी मिल जाती है. यह मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता का प्रतीक, व्यक्ति का व्यक्ति से मिलन है. उसमें दोनों के व्यक्तित्व आमनेसामने होते हैं. दोनों की सक्रियता में अंतर के बावजूद उनके स्नेहबंधन को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होती है. राजकुमार का संघर्ष भले ही राजकुमारी के लिए हो, लेकिन अंततोगत्वा वह स्त्रीपुरुष के नैसर्गिक संबंध की ओर ही संकेत करता है. राज्य की चिंता छोड़ केवल राजकुमारी को पाने की सनक में निकले राजकुमार के आचरण को कोई भी स्वार्थपूर्ण नहीं कहता है. यह मानते हुए कि सामाजिकराजनीतिक कर्तव्य के बावजूद राजकुमार का अपना जीवन है, उसके कर्तव्य को निजी पुरुषार्थ की प्रस्तुति के रूप में सराहा जाता रहा है. यह व्यक्ति की नैसर्गिक स्वतंत्रता; यानी उन जीवनमूल्यों का सम्मान है जो देशकाल, धर्म, संस्कृति से परे, जन्म लेने के साथ ही उसे प्राप्त हो जाते हैं. यहां विवेकानंद का कथन स्मरणीय है. एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था—‘‘आप मुझे एक शिशु दीजिए. मैं उससे बारबार कहूंगा—‘तुम ब्रह्म हो….तुम्हीं ब्रह्म हो’, ‘तत्वं असि….तत्वं असि.’ साहित्य पाठक को उसकी अस्मिता और जीवनबोध से परचाने का कार्य पलछिन करता है. परीकथाओं की विशेषता है कि उनमें ‘पर’ के साथसाथ ‘अपर’ यानी ‘आत्म’ को भी सम्मान मिलता है. जबकि धार्मिक आख्यानों में ‘आत्म’ को ‘परमात्म’ का अंश कहकर गौण मान लिया जाता है. परीकथाओं में ‘आत्म’ की उपस्थिति को, जब तक शेष समाज को उससे कोई हानि न पहुंचे, सर्वत्र सराहा जाता है. जर्मन दार्शनिक मार्टिन बुबर(1878—1965) ने व्यक्तिपरकता की सामाजिक संदर्भ में व्याख्या की है. बुबर के अनुसार मनुष्य का आत्म सामान्यतः दो प्रकार से स्वयं को अभिव्यक्त करता है. पहला ‘मैं तू हूं’ और दूसरा ‘मैं, यह हूं’. ‘मैं तू हूं’ जहां स्वयं को दूसरे के व्यक्तित्व में विलीन कर देने की चाहत है. वहीं ‘मैं, यह हूं’ आत्मसंबोधि की अवस्था है. भारतीय परंपरा में इसे क्रमशः ‘तत्वं असि’(तुम ही ब्रह्म हो) तथा ‘अहं ब्रह्मास्मि’(मैं ब्रह्म हूं) कहा गया है. आशय है कि कहानियां जहां व्यक्ति को समाज से परचाती हैं, उसे पूरे परिवेश से जोड़कर विराट ब्रह्मांड का हिस्सा बना देती हैं, वहीं व्यक्ति के ‘आत्म’ की भी सुरक्षा करती हैं. इस प्रकार वे असीमित ‘पर’ और सीमित ‘अपर’ के बीच संतुलन और सौहार्द बनाए रखने में सहायक होती हैं. दूसरे शब्दों में ‘आत्म की पहचान’ के साथसाथ ‘विराट का बोध’ कराना ही साहित्य का उद्देश्य रहा है, ताकि व्यक्ति की गरिमा और समाज की मर्यादा, दोनों सुरक्षित रहें. यही साहित्यकर्म है. लोकसाहित्य इसे सहस्राब्दियों से निभाता आया है.

विज्ञान साहित्य किसी वस्तु अथवा प्राणी के अंतर्जगत एवं बाह्यः जगत दोनों को तर्कसंगत ढंग से जानने का माध्यम है. विज्ञान साहित्य अथवा साहित्यिक विज्ञान लेखन और अकादमिक विज्ञान लेखन में अंतर है. विज्ञान साहित्य में विज्ञान की तार्किकता को पाठकीय संवेदना और सामाजिक संदर्भों में उसकी उपयोगिता के आधार पर परखा जाता है. जबकि अकादमिक लेखन तथ्यों के वस्तुनिष्ठ विवेचन तक सीमित रहता है. साहित्य के सरोकार मानवीय होते हैं. साहित्य सोचता है—‘विज्ञान मानवमात्र के लिए’ है. इसी विचार को वह अपनी रचनाओं में उतारता है. कामना करता है कि उसके लाभ जनजन तक पहुंचें. वैज्ञानिक और विज्ञान के अकादमिक व्याख्याता, ‘विज्ञान विज्ञान के लिए’ जैसी निस्पृहता के साथ काम करते हैं. उनके कार्य की प्रकृति के अनुरूप निष्पृह रहना आवश्यक है. वैज्ञानिक ऐसी निस्पृहता न रखें तो उनका काम बड़ा मुश्किल हो जाए. आइंस्टाइन यदि सोचते कि उनके शोध के आधार पर भविष्य में परमाणु बम का निर्माण संभव होगा, जिससे हिरोशिमा और नागासाकी जैसी तबाही की कहानियां लिखी जाएंगी, तब क्या वे उस शोध के लिए उतनी ही तन्मयता के साथ काम कर पाते. वैज्ञानिक उपलब्धियों का लोकहित में प्रयोग हो, इसके लिए सामाजिक दबाव अनिवार्य हैं. उनके अभाव में महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक शोध पूंजीपतियों और व्यापारियों के अधिकार में चले जाते हैं, जिनका उपयोग वे निहित लाभ की वांछा के साथ करते हैं. ऐसे में उन लेखकों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है, जो विज्ञान को लोककल्याणकारी भूमिका में देखना चाहते हैं. आधुनिक विज्ञान लेखन ऐसे ही लेखकों की सर्जना का सुफल है. उसमें बहुत कुछ श्रेष्ठ है, लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है जो विज्ञान के नाम पर केवल पिष्टप्रेषण है. महज औपचारिकता, जिससे संबंधित लेखक की विज्ञान और विज्ञान साहित्य के प्रति कमसमझी को को परखा जा सकता है. विज्ञान के विशिष्ट ज्ञान की कमी तथा जातीय एवं धार्मिक पूर्वाग्रहों के कारण रचना विज्ञानबोध से वंचित रह जाती है. उसकी भरपाई वे कल्पना के अतिशय प्रयोग द्वारा करते हैं. परिणामस्वरूप वे विज्ञानकथा लिखने की यदि कोशिश करें भी तो रचना छिटककर विज्ञानगल्प के दायरे में चली जाती है. लेखक में विज्ञानबोध की कमी का परिणाम यह होता है कि कृति वैज्ञानिक आविष्कारों की पिछलग्गू बनी रहती है. यहां एक विवाद खड़ा हो सकता है. कुछ उत्साहित लेखक आपत्ति कर सकते हैं कि विज्ञान साहित्यकार मनुष्य के मंगल ग्रह पर पहुंचने की कल्पना कर चुके हैं. अपनी गल्पकथाओं में मनुष्य को आकाशगंगाओं और नीहारिकों में बसने वाले जीवन का सपना भी दिखा चुके हैं, जबकि वैज्ञानिक अभी तक मंगल के चक्कर ही काट रहे हैं. उत्तर स्पष्ट है, केवल विज्ञान और प्रौद्योगिकी का परिवेश बना देने से विज्ञानसाहित्य का उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता. इससे तो यह संदेश जाता है कि वैज्ञानिक लक्ष्यों की सिद्धि केवल विशिष्ट परिवेश, खास उद्देश्यों हेतु संभव है. साधारण जीवन में उसका कोई काम नहीं है. श्रेष्ठ विज्ञान लेखक वैज्ञानिक उपकरणों, प्रविधियों के पीछे निहित वैज्ञानिक तथ्यों को अपनी रचनाओं का विषय बनाता है. उसकी निगाह विकास के नाम पर अग्रसर प्रवृत्तियों पर भी रहती है. कुल मिलाकर विज्ञानसाहित्य केवल ‘असंभाव्य को संभव’ दिखाने की कलाकारी नहीं है, उसके विमर्श का दायरा इससे कहीं अधिक विस्तृत है.

परीकथा और विज्ञानकथा का भविष्य व्यक्ति एवं समाज के भावी संबंधों द्वारा तय होगा. इस बात से होगा कि व्यक्ति और समाज, एकदूसरे की अस्मिता का सम्मान करते हुए पारस्परिक हितों की रक्षा हेतु कितना तालमेल कर पाते हैं. यद्यपि साहित्यकारों का बड़ा वर्ग आज भी समर्पित भाव से सार्थक परीकथाएं एवं विज्ञानगल्प लिखने में लगा है. न केवल पुरानी और वैश्विक लोकप्रियता हासिल कर चुकी परीकथाओं को नई युगदृष्टि के अनुकूल ढाला जा रहा है, बल्कि नए युगबोध के अनुसार नई रचनाएं लिखने में भी इस वर्ग ने सफलता प्राप्त की है. तथापि जितनी बड़ी अपेक्षाएं हैं, चुनौतियां भी उतनी ही कड़ी हैं. जनमानस के बड़े हिस्से को बाजार ने अपनी चकाचैंध से प्रभावित किया है. निहित स्वार्थ के लिए वह उपलब्ध कलारूपों का भी व्यवसायीकरण करने में लगा है. उसी दिशा में काम करते हुए हाल के वर्षों में बाजार ने परीकथाओं एवं विज्ञानगल्प दोनों को अपने स्वार्थ के अनुरूप ढाला है. उनका नया रूप इतना बनावटी और विरूपित है कि कभीकभी तो रचना की श्रेणी अर्थात वह ‘परीकथा है अथवा विज्ञानकथा’—तय कर पाना भी कठिन हो जाता है. अतः इन दोनों कथारूपों के भविष्य की दिशा इससे भी तय होगी कि आगे ये दोनों धाराएं अपने साहित्यिक लक्ष्य एवं बाजारवादी आग्रहों के बीच संतुलन रखते हुए सामाजिक गतिशीलता के पक्ष में कितना योगदान दे पाती हैं. उम्मीद कम है, फिर भी परीकथाओं और विज्ञानसाहित्य की आगामी दिशादशा इस पर भी निर्भर करेगी कि उत्पादकता के लाभों को जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए अर्थव्यवस्वस्था ने खुद को कितना और किस दिशा में बदला है. ध्यातव्य है कि मुक्त बाजार की अवधारणा उत्पादनकेंद्रित अर्थव्यवस्था द्वारा, व्यक्तिमात्र को लाभ पहुंचाने के आश्वासन के साथ रखी गई है. मगर उसके लाभ मात्र कुछ हाथों तक सिमटकर रह जाते हैं. जिन्हें उनकी सचमुच जरूरत है, उन तक पहुंच ही नहीं पाते हैं. स्थिति सामंतवाद जैसी भले न हो, मगर इसके कई लक्षण उस व्यवस्था से पूरी तरह मेल खाते हैं. राजशाही और सामंती युग में समस्त अधिकार राजा के चहेते सामंतों और जमींदार वर्ग तक सीमित रह जाते हैं. नई व्यवस्था में पूंजीवादी शक्तियों के समर्थनसहयोग से बनी दायित्वहीन सरकारें स्वार्थसिद्धि हेतु उद्यमियों और शीर्षस्थ नौकरशाह का अत्यंत शक्तिशाली वर्ग खड़ी कर देती हें, जो धीरेधीरे समस्त सत्ताकेंद्रों पर कब्जा कर, मीडिया और अन्यान्य माध्यमों द्वारा लोगों को भरमाने लगता है. उस वर्ग की कोशिश रहती है कि उपलब्ध कलाएं अपने मूल सरोकारों से कटकर उसके प्रचारकतंत्र के रूप में कार्य करें. शक्तिकेंद्रों पर काबिज होने के कारण वह दूसरों पर अपनी इच्छाएं थोपने की स्थिति में भी होता है. या यूं कहें कि अपने स्वार्थ के अनुरूप कलाओं को मनचाहा रंग देकर उनसे सांस्कृतिक हथियार का काम लेता है. उसका प्रभाव विभिन्न कलारूपों पर भी पड़ता है. यदि बाजारवाद भविष्य में भी इसी तरह हावी रहता है, राजनीति जनता के प्रति अपने दायित्वों को भुलाकर केवल उद्योगपतियों और सरमायेदारों की हितरक्षक बनने में लगी रहती है, तो प्रसारण के बड़े माध्यमों यथा दूरदर्शन, सिनेमा आदि पर परीकथाओं और विज्ञानकथाओं से संवेदना और सामाजिकता के क्षरण की स्थिति ऐसी ही बनी रहेगी, जैसी अब है. कृत्रिम कथानकों में वृद्धि होगी. वे जनसरोकारों से दूर ‘कला केवल मुनाफे के लिए’ के निमित्त प्रयुक्त होकर अपनी सामाजिक भूमिका से पलायन करते हुए नजर आएंगे.

ऊपर जो आशंका हमने व्यक्त की है, वह सर्वथा निराधार नहीं हैं. कहीं न कहीं इसके बीजतत्व अतीत में भी छिपे हुए हैं. तीसरी औद्योगिक क्रांति से गुजर रही इकीसवीं शताब्दी में तकनीक स्वयं फंतासी का रूप ले चुकी है. कई जगह तो उसका आभामंडल इतना प्रभावी और सम्मोहक है कि खुद को अभिव्यक्त करने के लिए उसे किसी और कथामाध्यम की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती. यही कारण है कि इंटरनेट, कंप्यूटर गेम, सिनेमा, दूरदर्शन आदि पर प्रसारित, प्रचारित कई ऐसे कार्यक्रम हैं जो कथानक की जरूरत को नकारने का दावा करते हैं. यह मान लिया गया है कि आपाधापी के दौर में एक ही स्थान पर टिककर कहानी सुनने, परीकथा का आनंद लेने का समय किसी के पास नहीं है. इस व्यस्तता, जिसका बड़ा हिस्सा बनावटी है, का लाभ उठाने के लिए बाजार ने नएनए उपकरण उतारे हैं, जो तकनीकी कौशल के आधार पर मनोरंजन की जरूरत की भरपाई कर सकते हैं. उसके बनाए मायाजाल के आगे साहित्य और कलाएं दम तोड़ती नजर आती हैं. इन माध्यमों का सबसे बड़ा हमला कहन की कला पर है, जिसकी खूबी है कि वह व्यक्ति को अकेला नहीं रहने देती. पाठकश्रोता के चाहेअनचाहे, किस्सेकहानी के रूप में, वास्तविक या आभासी समाज उसके चारों ओर बन जाता है, जो उसको अवसरानुकूल प्रेरणाएं देने में सक्षम होता है. कहानियां व्यक्ति को विश्वास दिलाती हैं कि उसका अस्तित्व शेष समाज के साथ ही सुरक्षित है. दूसरी ओर आधुनिक प्रौद्योगिकी मानवमात्र को उपभोक्ता मानते हुए उसके आंतरिक एवं बाह्यः संसार पर अधिपत्य जमा लेने में अपनी सफलता मानती है. उसके संपर्क में आने के बाद वह स्वयं को न केवल आत्मनिर्भर और स्वतंत्र महसूस करता है, बल्कि खुद को शक्तिशाली भी मान बैठता है. इसलिए वह उपलब्ध कथारूपों का उपयोग केवल अपने खालीपन को भरने के लिए, औपचारिकता की तरह करता है. चूंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, वह स्वयं को बाहर की दुनिया से अलग कर ले फिर भी, उसके भीतर पैठा हुआ सामाजिक बोध उसे शेष समाज से जोड़े रखता है. इस कारण उसके साहित्य और कला की दुनिया की ओर वापस लौटने की संभावना सदैव बनी रहती है. मानवमन की इस प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखने तथा कमाई हेतु आज्ञाकारी उपभोक्ता में ढालने के लिए नई तकनीक ने आभासी दुनिया सृजित करने में सक्षम अनेक अवतार सृजित किए हैं. उनमें मैत्री केवल तस्वीरों से और विचार कंप्यूटर स्क्रीनों के सामने व्यक्त किए जाते हैं. उसकी विडंबना है कि एक साथ कितनी ही कंप्यूटर स्क्रीन से छनकर विचार जब व्यक्ति तक पहुंचते हैं, तब वे एक रेला बन चुके होते हैं. कंप्यूटर स्क्रीन चूंकि प्रतिवाद नहीं करती, इसलिए उनके आगे बैठा प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को विचार प्रदाता मानता है. सीधे संवाद के अवसरों के अभाव में वह अपने विचारों को ही अंतिम और सर्वोत्तम मानने का भ्रम पाले रहता है. दूसरे के विचारों को ग्रहण करने, उन्हें आत्मसात् कर दूसरों तक पहुंचाने का धैर्य उसके पास नहीं होता. कंप्यूटर स्क्रीन से निकलकर आ रहे विचारों के रेले में से नीरक्षीर की विवेचना करने के बजाए वह अपनी आधीअधूरी मान्यताओं के साथ बने रहने में ही गर्व महसूस करता है. कुल मिलाकर विचारों के रेले के बीच वह सबकुछ पाता है, परंतु असल में कुछ भी नहीं पाता. परिणामस्वरूप विभिन्न विचारधाराओं के बीच सार्थक संवाद, फिर कुछ निष्कर्षों को लेकर संकल्प धारण करने की स्थिति बन ही नहीं पाती. चूंकि वे माध्यम शक्तिशाली और तीव्र गति होने के साथसाथ चमकदमक से भी भरे होते हैं, इसलिए उनके प्रति युवामन में दीवानगी का भाव रहता है. तकनीक का आकर्षण कई बार इतना गहरा होता है कि कविता, कहानी जैसी साहित्य की विभिन्न विधाओं में विशेष रुचि न होने के बावजूद युवावर्ग उनमें इसलिए रुचि दिखाता है, ताकि तकनीक का प्रयोग कर ‘जमाने के साथ चलने’ का भ्रम पाल सके.

आधुनिक विकास की अवधारणा इस सिद्धांत पर टिकी है कि उसने व्यक्ति के जीवन को कितना सुविधामय और आत्मनिर्भर बनाया है. विज्ञान यह दावा भी करता है कि उसने व्यक्ति को सामाजिक जकड़बंदी से बाहर निकालकर आत्मनिर्भर बनाने का काम किया है? क्या इस आत्मनिर्भरता को प्राकृतिक स्वतंत्रता का पर्याय माना जा सकता है? शायद नहीं, क्योंकि प्राकृतिक स्वतंत्रता व्यक्ति को मुक्त करती थी. जबकि प्रौद्योगिकी प्रदत्त आत्मनिर्भरता व्यक्ति को समाज से काटकर यंत्रों और उपकरणों के माध्यम से आभासी दुनिया में कैद कर देती है. इतना आश्रित बना लेती है कि यंत्रों और उपकरणों की दुनिया ही उसे वैज्ञानिक ज्ञानविज्ञान का पर्याय लगने लगती है. प्राकृतिक स्वतंत्रता में असंतोष नहीं होता, प्राणिमात्र को यह भरोसा होता है कि प्रकृति उसकी आवश्यकतानुसार वस्तुएं उत्पादित करने में सक्षम है, इसलिए उसकी जरूरत की वस्तुएं उसको आगे भी समयानुसार मिलती रहेंगी. यह तोष उसको सहजीवन में बने रहने की प्रेरणा देता है. इस कारण वहां स्पर्धा को महत्त्व नहीं दिया जाता. आधुनिक प्रौद्योगिकी द्वारा निर्देशित दुनिया में ऐसा नहीं है. वहां विज्ञान और प्रौद्योगिकी का जिस प्रकार सीमित हितों में उपयोग होता है, उसमें हर नया शोध मनुष्य की कामनाओं को भड़काता है. उसकी आवश्यकताएं निरंतर बढ़ती चली जाती हैं. परिणामस्वरूप अनावश्यक स्पर्धा पैदा होती है. मनुष्य को हर समय यह लगता है कि उसके सुख के लिए सिवाय उसके कोई और सोचने और सहयोग करने वाला नहीं है. इस धारणा के साथ ही वह स्पर्धा को अपरिहार्य मान लेता है. वह डरता है कि दूसरों के भरोसे छोड़ते ही सबकुछ उसके हाथ से छिटक जाएगा. इस अविश्वास का परिणाम यह होता है कि जो स्पर्धा पहले बाहर के लोगों के साथ होती थी, उसका निरंतर सिमटता हुआ दायरा परिवार को भी अपनी गिरफ्त में ले लेता है. इसका असर सुखसुविधाओं के लिए अपने ही परिजनों पर संदेह, अविश्वास, हताशा और कुंठा के रूप में नजर आता है. इससे सामाजिक संबंधों का हृास होता है.

संबंधों में आत्मीयता की खोज व्यक्ति को आभासी दुनिया में ले जाती है. चूंकि आभासी दुनिया के लोग उसकी सुखसुविधाओं के साथ सीधे स्पर्धा में नहीं होते, और उनके साथ संवाद करते हुए वह अपने अभावों को भी छिपा सकता है, इसलिए उस दुनिया में उसका मन रमने लगता है. धीरेधीरे उसे वह नकली और आभासी दुनिया ही असली प्रतीत होने लगती है. इसमें दोष विज्ञान और प्रौद्योगिकी का नहीं है, बल्कि उसके लाभों का सीमित हाथों में कैद हो जाने का है. ज्ञान पर कभी किसी एक व्यक्ति का अधिकार नहीं रहा. वह पूरे समाज का होता है. उसके अर्जन में प्रत्यक्ष या परोक्ष सभी वर्गों का योगदान होता है. बावजूद इसके सामान्यतः उसका लाभ समाज के मुट्ठीभर लोगों को मिलता रहा है. यही बात विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर भी खरी सिद्ध होती है. वैज्ञानिक आविष्कारों के पीछे भी किसी न किसी रूप में समाज के प्रत्येक वर्ग का योगदान होता है, मगर उसका अधिकांश लाभ वे लोग उठाते हैं, जो कुछ पूंजी लगा देने मात्र से प्रयोगशालाओं के मालिक मान लिए जाते हैं. इसकी प्रतिक्रिया समाज के दूसरे वर्गों पर भी होती है. विकास के लाभों से वंचित लोग यह सोचकर कि उन्हें विकास के लाभ से सोचीसमझी नीति के अंतर्गत दूर रखा गया है, विकासप्रक्रिया में भरपूर योगदान देने से जी चुराने लगते हैं; अथवा उसका योगदान स्वतःस्फूर्त्त न होकर कर्मकांड मात्र रह जाता है. इससे सामाजिक अविश्वास जन्म लेते हैं, अंत:संघर्षों का जन्म होता है. उत्पादक यहां भी लाभ की स्थिति में रहता है. श्रमिकों को समझाने, उनकी समस्याओं का निदान खोजने की अपेक्षा वह तकनीक के स्वचालीकरण पर जोर देता है. जिससे उसकी उत्पादकता बढ़ती है. मालिक श्रमिकहितों के साथ मनमानी करने की स्थिति में बना रहता है. इससे दोनों वर्गों के बीच की खाई निरंतर बढ़ती जाती है.

ऐसे में साहित्यकार क्या कर सकता है? इसका उत्तर एकदम साफ है. साहित्य केवल साहित्य बना रहे, साहित्यकार निष्ठापूर्वक अपनी भूमिका निभाए, इससे अधिक न तो साहित्यकार से अपेक्षाएं हैं, न ही उसकी कोई आवश्यकता है. साहित्यकार को भरोसा होना चाहिए कि साहित्य समाज का केवल दर्पण नहीं होता. यदि साहित्य की भूमिका को केवल दर्पण तक सीमित कर दिया जाए तो इस प्रकार का काम करनेवाली और भी कई चीजें मिल जाएंगी. हम सभी समाज में रहते, उसको देखतेभोगते हैं. हमारी टिप्पणियां या जीवन एक प्रकार से समाज की छोटीछोटी तस्वीरें ही होती हैं. साहित्यकार की भूमिका इतनी भर नहीं है कि वह समाज का रोजमर्रा का हिसाबकिताब लिखता फिरे. साहित्य की भूमिका विधेयात्मक होती है. साहित्य समाज को केवल आईना ही नहीं दिखाता. गुणदोष दिखाने के साथसाथ वह समाज को यह भी बताता है कि उसके लिए क्या और कैसा होना श्रेयस्कर है. इसके लिए उपलब्ध मार्गों की ओर संकेत करते चलना भी साहित्यिक विमर्श का हिस्सा होता है. इस हकीकत को पूंजीपति भी भलीभांति समझता है. मगर उसके पास हर वर्ग से निपटने का खास तरीका होताा है, वह राजनेताओं को फुसलाकर, लालच देकर अपने बस में करता है तो साहित्यकारों को किसी न किसी प्रकार भरमाने, उनका विश्वास जीतने में लगा रहता है. इसलिए चाहेअनचाहे साहित्यकार से भी चूक होती रही है.

अधिकांश लेखकों ने विज्ञान को धर्म की तरह देखा; तथा वैज्ञानिक को पुरोहित की भांति पवित्र मान लिया. मान लिया कि सरकार या पूंजीपति द्वारा वैज्ञानिक से जो ‘पौरोहित्य कर्म’ कराया जा रहा है, वह वैसा ही है, जैसा उसको होना चाहिए. ऐसी परिस्थितियों में विज्ञान लेखन का कर्मकांड में ढल जाना स्वाभाविक हो गया. इस बारे में आलोचकीय चुप्पी षड्यंत्र की तरह कायम रही. अपवाद को छोड़कर वह कभी सक्रिय नहीं रही. इस कारण आधुनिक विज्ञान लेखन में न केवल दोहराव है, बल्कि कुछ अर्थों में तो वह परंपरा का ही पुनःप्रस्तुतीकरण लगता है. यदि पिछली शताब्दी के विज्ञान लेखन को देखा जाए तो उसके नब्बे प्रतिशत में वैसी वैज्ञानिकीय यात्राएं हैं, जैसे पहले राजामहाराजा युद्ध अभियानों पर निकलते थे और किए नए राज्य को फतह करके लौट आते थे. उनमें दो विपरीत शक्तियों के बीच महत्त्वाकांक्षाओं का वैसा ही संघर्ष है, जैसा कभी देवता और राक्षसों के बीच रहता था. यह दुनिया को अच्छे और बुरे में बैठेठाले बांट देने का शगल है, जिसके पीछे कुल व्यवस्था को सुर और असुर में बांटकर देखने का चलन रहा है. इससे इतर भी वैज्ञानिक लेखन या विमर्श हो सकता है, इसपर शायद ही कभी सोचा ही नहीं गया. यदि ध्यान से देखा जाए तो इसी प्रकार का लेखन पारंपरिक परीकथाओं में भी है. बल्कि कुछ मायनों, विशेषकर जनभावनाओं से नैकट्य के आधार पर मैं लोकसाहित्य और परीकथाओं को विज्ञान लेखन से बेहतर स्थिति में मानता हूं. उनमें लोक की न केवल ससम्मान उपस्थिति रहती है, बल्कि अनुकूल अवसरों पर उसके असंतोष और विरोध का भी उल्लेख होता है, जिससे समाज की आंतरिक हलचलों को परखा जा सकता है. विज्ञानकथाओं में इसका अभाव है. इस कारण वे अभिजन संस्कृति के चहेते सपनों का आधुनिक आख्यान बनकर रह जाती हैं. इस अवैज्ञानिक धारणा को कम से कम विज्ञान लेखकों द्वारा सच मान लिया लगता है कि कुछ लोग ‘ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम हैं’ और ‘कुछ ज्ञान प्राप्त करने में पूर्णतः अक्षम.’ परोक्ष रूप में विज्ञानसाहित्य भी इसी को सच सिद्ध करता है, इसलिए वह मध्यवर्गी फंतासी तक सीमित रह जाता है. विज्ञान की सामाजिक भूमिका वाला भाव वहां अनुपस्थित बना रहता है.

दूसरे शब्दों में हमारे विज्ञान लेखकों ने विज्ञानसाहित्य रचा अवश्य, लेकिन उनका संस्कार वही रहा, जो परीकथाओं में जमाने से चला आ रहा था. तो क्या हमारे विज्ञानसाहित्यकार विज्ञान लेखन के नाम पर परीकथाओं को ही नए कलेवर में ढालते आए हैं? यह सुनकर विचित्र लग सकता है. मगर सचाई यही है कि हमारा विज्ञान लेखन, विशेषकर विज्ञानकथाएं और विज्ञान गल्प, परीकथाओं के यदि एकदम आसपास नहीं, तो बहुत दूर भी नहीं है. कारण सिर्फ इतना है कि हमारे लेखकों ने अपनी रचनाओं में नवीनतम शोध और कल्पनाओं को तो भरपूर जगह दी, परंतु वे स्वयं विज्ञानबोध को वंचित रहे. समाज तो दूर वे उसे अपने जीवन में भी नहीं उतार पाए. अधिकांश विज्ञान लेखकों के लिए विज्ञान का अभिप्राय अंतरिक्षीय उड़ानों, हवाई जहाज, उपग्रह, प्रयोगशाला, अंतर्ग्रही युद्धों तक सीमित रहा. जबकि विज्ञान यंत्र अथवा उपकरण तक सीमित नहीं है. वह प्रयोगशाला भी नहीं है, जहां वैज्ञानिक लोग बड़ेबड़े शोध किया करते हैं. विज्ञान असल में पद्धति है. प्रणाली है ज्ञानार्जन की. उसकी नींव तार्किकता, जांचपरख और प्रयोगोंपरीक्षणों पर टिकी होती है. ऐसा विज्ञान लेखन वैज्ञानिक उपकरण, प्रयोगशाला आदि के बगैर भी लिखा जा सकता है. आदर्श विज्ञानगल्प तो वह है जिसमें वैज्ञानिक उपकरणों, प्रयोशाला और यंत्रों के उल्लेख के बिना भी भरपूर तार्किकता और विज्ञानबोध हो. क्योंकि ये सब विज्ञान साहित्य के साधन हो सकते हैं, साध्य नहीं. अधिकांश विज्ञान लेखक साध्य और साधन में अंतर नहीं कर पाते. इस कारण वे साधन को ही साध्य मानने की भूल कर बैठते हैं. वे विज्ञान की सामाजिक भूमिका को लेकर आश्वस्त नहीं हो पाते. बेकन ने विज्ञान को शक्ति माना था. ‘ज्ञान ही शक्ति है’ का नारा उसने दिया. वैज्ञानिकों के साथसाथ लेखकों ने भी उसी को मंत्र का दर्जा दे दे दिया. मुझे लगता है कि ज्ञानविज्ञान के साथ शक्ति के प्रत्यय को जोड़ देना सबसे बड़ी भूल रही, क्योंकि ‘शक्ति’ के साथ कहीं न कहीं ‘जंगल के न्याय’ की अवधारणा भी जुड़ी हुई है. शक्ति केवल विभाजन कर सकती है. छोटेबड़े का, गरीबअमीर का, काले और गोरे, स्त्री और पुरुष का वगैरह. यही हुआ भी है. शोध कार्य में डूबा हुआ वैज्ञानिक भले ही निर्लिप्तनिष्पक्ष रहे, विज्ञान की शक्ति जिसके हाथों में जाती है, चाहे उद्योगपति हो अथवा राजनेता, व्यापारी हो या अधिकारी, सभी उसका उपयोग प्रायः जंगल के न्याय की भावना के साथ करता है. यही होता आया है. बेकन के करीब साढ़े तीन शताब्दी बाद आइंस्टाइन ने जरूर कहा कि ‘ज्ञान सत्य है और सत्य का बोध आत्मा के लिए आवश्यक है.’ परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी. दुनिया विज्ञान की ताकत से हिल चुकी थी. अतः यह अपेक्षा विज्ञान लेखकों से थी कि वे बेकन की उक्ति ‘ज्ञान ही शक्ति है’ को भक्तिभाव लेने के बजाय उसके निहितार्थ को समझते तथा उसमें तत्काल संशोधन करते. बेकन के कथन के विरोधाभास को समझते कि विज्ञान का विकास यदि लोगों को उनके कष्टों से मुक्ति दिलाने के लिए हुआ है तो वह कल्याणधर्मी है. इसलिए विज्ञान को शक्ति बताने के बजाय ‘विज्ञान से सर्वकल्याण’ का नारा अधिक समीचीन रहता. उचित होता कि वे साहित्यकार और समाजकर्मी एकजुट होकर विज्ञान के लोकोन्मुखी उपयोग पर जोर देते. तब शायद कहीं वे विज्ञान की आमद के साथ देखे गए सपनों को पूरा करने में अधिक सार्थक भूमिका को अंजाम दे पाते.

इसके लिए प्रेरणाएं बहुत थीं. पश्चिम में सुकरात ने ‘सदगुण को शुभ’ की संज्ञा दी थी. अरस्तु ने नैतिकता के मार्ग को ही सर्वोत्तम माना था. महाभारत में तो अरस्तु और सुकरात से शताब्दियों पहले लिखा जा चुका था, ‘न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचितः’ मनुष्य के लिए ‘मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है.’ विज्ञान को शक्ति का पर्याय मानने का ही परिणाम था कि आइंस्टाइन के आविष्कार के आगे अलेक्जेंडर फ्लेमिंग, एडबर्ड जेनर की उपलब्धियों की पर्याप्त चर्चा न हो सकती. जबकि फ्लेंमिग ने पेनसिलीन तथा जेनर ने चेचक की वैक्सीन का निर्माण कर दुनिया को जानलेवा महामारियों से बचाने में मदद की थी. करोड़ों लोगों को उससे लाभ मिला. आज भी वे दोनों आविष्कार करोड़ों लोगों को स्वाथ्यलाभ देते हैं. आइंस्टाइन को सर्वाधिक चर्चा शायद इसलिए मिली, क्योंकि उनका आविष्कार ‘बड़ा धमाका’ कर सकता था. लोग उसके आविष्कार से भय खाते थे. वह भय वश जन्मा अनुराग था. कदाचित सामंती संस्कार, जो शक्ति के न्याय को ही अंतिम मान लेता है. आइंस्टाइन का आविष्कार बेकन की स्थापना कि ‘ज्ञान ही शक्ति है’ के अधिक निकट था. क्या इसके पीछे कोई साहित्यिक चूक रही? क्या उन साहित्यकारों की कमी रही, जो बेकन की परिभाषा को अंतिम मानते हुए वैज्ञानिक शोधों के समाजशास्त्रीय विश्लेषण से किनारा करते रहे? क्या इसके पीछे लेखकों का परंपरा और संस्कृति के पीछे अत्यानुराग था? जो मनुष्यता और मानवकल्याण की भावनाओं को भी देश, संस्कृति और राज्य की सीमाओं के अनुसार परखता है. क्या इसी कारण वह आधुनिकता से प्राप्त ज्ञानविज्ञान के साधनों का समयानुसार लाभ उठाने में विफल रहा? दरअसल यही वह चुनौती है जिससे हमारे साहित्यकारों को जूझना है. फिर वे चाहे परीकथा लेखक हों अथवा विज्ञान लेखक. उन्हें मान लेना चाहिए कि वे पहले साहित्यकर्मी हैं, विधाओं और लेखन की धाराओं का अंतर बाद में आता है. इसलिए यदि कोई परीकथा लिखना चाहता है तो उसको चाहिए ऐसा लिखे कि उसकी रचना में पर्याप्त विज्ञानबोध हो; और यदि विज्ञानकथा लिखना चाहता है तो उसके लिए रचना को परंपरा, संस्कृति और संवेदना के साथसाथ मनुष्यता से जोड़े रखना बेहद जरूरी है.

परीकथा, विज्ञानकथा और विज्ञानगल्प में समानता है कि ये तीनों मनुष्य का स्वप्नलोक रचने में सहायक होते हैं. केवल उनकी प्रकृति का अंतर है. परीकथाएं उस दौर के समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं जब सामाजिक आचारसंहिता पूरी तरह धर्म से नियंत्रित होती थी. धार्मिक मिथकों, परंपराओं से प्रेरित परीकथाएं जनसाधारण की भावनाओं, सपनों और आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करती हैं. एक तरह से वे धार्मिक विधान के भीतर ही अपने लिए स्वप्नलोक का निर्माण करना चाहती हैं. इस कोशिश में कहींकहीं वे धर्म के मायावाद का शिकार भी नजर आती हैं. चूंकि धर्म सामंतवादी समाज की खोज है, इसलिए परीकथाओं की संरचना पर सामंती प्रभाव स्पष्ट नजर आता है. उनमें हमें ऐसे समाज के दर्शन होते हैं, जिसमें आर्थिकसामाजिक और राजनीतिक वैषम्य को शास्त्रीय मान्यता प्राप्त थी. ऐसे में अधिकार वंचित वर्ग का स्वप्नलोक अपने लिए न्यूनतम आजादी, समानता और सुखसुविधाओं की अपेक्षा तक सीमित रह जाता है. समान नागरिक संहिता जैसा कोई सपना उस समाज का नहीं था, इसलिए समस्याओं के समाधान भी उसकी तय आचार संहिता के अनुसार ही प्राप्त होते थे. परीकथा में उदार एवं कृपालु परी की अनुकंपा नायक और नायिका पर अलगअलग होती थी. कथानायक यदि लड़का है तो परी उसे जादुई मदद द्वारा किसी छोटेमोटे राज्य का राजा बना देती थी. लड़की होने पर परी का काम कदाचित आसान था. राजकुमारी की सामान्य लालसा किसी सुंदर, सजीले, बहादुर राजकुमार की अर्धांगिनी बनने तक सीमित रहती थी. इसके लिए राजकुमार स्वयं प्रयासरत रहता था, इसलिए परी का काम राजकुमारी को प्रतीक्षारत छोड़कर अथवा उसके लिए सुंदर वस्त्रों, आभूषणों का प्रबंध कर देने मात्र से कार्य सध जाता था. पाठक इतने से संतुष्ट हो जाता था, हालांकि इसकी बहुत बड़ी कीमत स्त्री को अपनी स्वतंत्रता के रूप में चुकानी पड़ती थी.

जातीय आधार पर विभाजित समाज में सभी वर्गों की भूमिका तय थी. इसलिए परिवर्तन का सपना देखनेवाले साधारण पृष्ठभूमि को अपने महत्त्वाकांक्षाओं को साधने के लिए वर्गीय उत्क्रमण की प्रतीक्षा भी करनी पड़ती थी; और वह केवल चमत्कार में ही संभव था. दूसरे शब्दों में राजनीतिक अधिकारों के भोग हेतु नायक द्वारा आवश्यक शक्ति अथवा किसी चमत्कार के माध्यम से अपने वर्ग का उत्क्रमण कर, तत्कालीन राजनीतिक अधिकार संपन्न वर्ग में सम्मिलित होना आवश्यक था. उसके आसपास के लोगों को राजनीतिक अधिकारों में सीधी हिस्सेदारी के बजाए या तो अपनी नियति से समझौता करना पड़ता था, अथवा ऐसे ही किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करती पड़ती थी जो उनका उत्क्रमण करा सके. नायकनायिका के सीधे हित अथवा उनके महिमामंडन के अवसरों से इतर, प्रजा का उल्लेख परीकथा में आवश्यक न था. उसकी कहानी नायकनायिका से आरंभ होकर उन्हीं पर समाप्त हो जाती थी. समाज में कार्यविभाजन का आधार जातिव्यवस्था थी. कृषि भूमि राज्याधीन. इसलिए किसान, मजदूर, छोटेमोटे दस्तकार और व्यापारियों की आय उतनी नहीं थी कि उसके आधार पर वे आर्थिक आत्मनिर्भरता का सपना देख सकें. इस कारण परीकथाओं में एक स्वप्नलोक आर्थिक आत्मनिर्भरता का भी था, जिसका रास्ता पुनः चमत्कारों के रास्ते जाता था. समस्या के निदान के लिए परी छड़ी हिलाकर खजाने के ढेर लगा देती अथवा किसी अन्य चमत्कार के बहाने कोई छिपा हुआ खजाना नायकनायिका के बदले वर्तमान और भविष्य की प्रतीति करा देता था. कह सकते हैं कि परीकथाएं जनसाधारण के रोजमर्रा सपनों की उड़ान हैं. उन्हें नाउम्मीद भरे वातावरण में, स्थितियों से समझौता कर चुके समाज की शरणस्थली भी कही जा सकती हैं.

विज्ञान का जन्म ही परंपरा के प्रति संदेह के साथ हुआ था. धर्म जहां जीवन की समस्याओं का अंतिम निदान मोक्ष में खोजता था, वहीं वैज्ञानिकों का परम लक्ष्य इस भौतिक संसार में ही, अपने पुरुषार्थ द्वारा मोक्ष जैसी स्थिति उत्पन्न कर संपूर्ण मनुष्यता का कल्याण करने का रहा है. विज्ञान मानता है कि सृष्टि में कुछ भी अनुपयोगी या अशुभ नहीं है. न ही कुछ ऐसा है जिसका उपयोग मनुष्य के लिए निषिद्ध हो. जिसकी अनुभूति होती है, उसका अस्तित्व भी है. जिसका अस्तित्व है, प्राणिमात्र की कल्याणभावना के साथ उसका उपयोग करना पुरुषार्थ है. जीवन को सुखी बनाना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है. उसके लिए कोई भी कार्य जिससे दूसरों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष किसी प्रकार की हानि न पहुंचे, करने की आजादी व्यक्तिमात्र को मिलनी चाहिए. उल्लेखनीय है कि विज्ञान का विकास उस दौर में हुआ, जब समाज में प्रसुप्त अस्मिताएं सिर उठाने लगी थीं. नए विचारों की रोशनी में समाज में बराबरी के सपने जगे, तब लगा कि विज्ञान भी चमत्कार कर सकता है. इसलिए कहानी में जो कार्य पहले जादू से किया जाता था, वह तकनीक की सहायता से किया जाने लगा. लोगों को जागरूक और चैतन्य बनाने के लिए भी विज्ञानलेखन की जरूरत महसूस की गई थी. उसके लिए अनेक प्रतिभाशाली लेखक आगे आए. विज्ञान ने उन लोगों को सपने देखने का अवसर दिया जो साधनविहीन थे. जिनकी पूंजी केवल उनका श्रम था; जो अभी तक दूसरों पर आश्रित जीवन जीते आए थे, जिन्हें धर्म, जाति अथवा किसी अन्य व्यवस्था में सीधे हस्तक्षेप तथा अन्य अवसरों से वंचित किया गया था, उनके समर्थन में अनेक उदारवादी चिंतक, लेखक और कार्यकर्ता थे. सभी की आंखों में समरस समाज का सपना था. उनका मानना था कि विज्ञान ने अपने आगमन के साथ जो सपने लोगों को दिखाए गए थे, एकएक कर वे सभी झूठे सिद्ध हुए हैं. यह वर्ग निराश अवश्य था, किंतु हताश नहीं हुआ था. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सहयोग से स्वप्नलोक बसाने का उसका सपना, धरती पर अथवा धरती से परे, ऐसे लोक का सपना था, जहां श्रम का सम्मान हो. सभी कष्टकारी कार्य तकनीक की सहायता से संपन्न होते हों. जीवन खुशहाल, सभी बराबर और निरोग हों. विज्ञान पर अत्यधिक निर्भरता प्राणिमात्र एवं पर्यावरण के लिए कितनी हानिकर हो सकती है—इस प्रकार की चिंताएं भी उनकी रचनाओं में जगह लेती थीं. विज्ञानकथाओं और विज्ञानगल्प को लोकप्रिय बनाने में इसी सपने का योगदान रहा. यह लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि विज्ञानगल्प को गल्प का पर्याय मान लिया गया. तकनीक के कंधे चढ़ा मौलिक और कल्पनाप्रधान विज्ञानगल्प, आधुनिक व्यावसायिक सिनेमा की पहचान बन गया.

आदर्श समाज की स्थापना का ऐसा ही सपना परीकथाओं का भी रहा है. अपने स्वप्नलोक की खोज की यात्रा विज्ञान कथाकार को पृथ्वी से इतर किसी अन्य गृह, नक्षत्र पर भी ले जा सकती है. परीकथाएं सामाजिक जीवन के अपेक्षाकृत निकट बनी रहती हैं.वे स्वस्थसंपन्न सामाजिकता में अपना सार्थक पाती हैं. जीवन के लिए अनुकूल स्थितियों की कल्पना करते हुए वे पाठक को परीलोक ले जाती हैं, जहां मानवीय कल्पना साकार होती है. चूंकि प्राचीनकाल में यह माना जाता था कि देवलोक देवताओं का ठिकाना है, वहां केवल देवानुकंपा से जाया जा सकता है. दूसरा पाताल लोक, वहां राक्षसों का साम्राज्य है. इस कारण वह भी मनुष्य के लिए अनुपयुक्त है. अतः मृत्य मानव के लिए केवल मृत्युलोक है. केवल पृथ्वी जहां अनेकानेक चुनौतियां हैं, उसका ठिकाना हो सकती है. इसलिए मनुष्य ने कल्पना की एक और दुनिया गढ़ी, परीलोक. पृथ्वी और स्वर्ग के बीच का खूबसूरत ठिकाना. और मनुष्य को वह कल्पना इतनी पसंद आई की पीढि़यों का सपना बन गई. हालांकि सब कुछ वायवी, सुंदर सपने की तरह होने के कारण परीलोक का महत्त्व सैरसपाटे से अधिक न था. परीकथा पूरी होते ही उसका स्वप्नलोक भी बिखरने लगता था. इसके बावजूद उस कल्पकृति का महत्त्व बना रहा. इसलिए कि संघर्ष से जूझते, निराश अथवा महत्त्वाकांक्षाओं के घोड़े पर सवार मनुष्य को भी, कल्पना की वह रम्यस्थली थोड़े आराम का अवसर दे देती थी. ताकि वहां कुछ पल गुजारकर वह जीवन के नए सफर की ओर नई ऊर्जा के साथ प्रयाण कर सके. परीकथा पूरी होते ही मनुष्य वापस अपनी दुनिया में लौट जाता है. कदाचित अपनी दुनिया को परीलोक जैसा सुंदरसार्थक बनाने का स्वप्न लेकर.

दूसरे लोक की यात्रा के प्रसंग पुराकथाओं में भी हैं. मर्त्य सम्राट देवताओं की मदद के लिए स्वर्ग यात्रा करते रहते थे. विज्ञानगल्प में इस सपने को विस्तार मिला कि पृथ्वी से इतर अंतरिक्ष में भी स्थायी बस्तियों का निर्माण संभव है. ऐसी बस्ती जहां सभी बराबर हों. जहां सभी सुविधाएं यंत्रों द्वारा संभव हों. नागरिकों में पर्याप्त सामाजिक बोध हो. पुलिस, कानून, अदालतों की जहां आवश्यकता ही न पड़ती हो. आशय है कि आदर्शलोक चाहे वह परीकथाओं के माध्यम से देखा गया सपना हो अथवा विज्ञान की मदद से, दोनों लगभग एकजैसे ही थे. अंतर केवल उस आदर्शलोक के सपने को साकार करने के माध्यम पर था. विज्ञानगल्प द्वारा कल्पित आदर्शलोक मनुष्य के अपने बुद्धिविवेक, पुरुषार्थ, मैत्री, वैज्ञानिक दक्षता और सहयोगभावना पर टिका हुआ था. जबकि परीलोक की व्यवस्था परामानवीय शक्तियों अथवा चामत्कारिक अनुकंपा पर टिकी थी. एक खूबसूरत सपने की भांति, परीलोक में जरूरत की सभी वस्तुएं सहज हासिल की जा सकती हैं. लेकिन वहां की व्यवस्था के केंद्र में परियों की रानी होती थी. एक तरह से परीलोक आदर्श, उदार राज्य की छवि प्रस्तुत करता है. विज्ञानलोक में आमतौर पर वैज्ञानिक सर्वेसर्वा होते हैं. प्रायः मान लिया जाता है कि यदि सभी खुशहाल होंगे, अवसरों में सब की समान भागीदारी होगी तो राज्य नामक संस्था की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. इसलिए विज्ञान के आदर्शलोक को ‘बिना राजा का राज्य’ भी मान सकते हैं. हालांकि नकारात्मक सोच लिए कोई वैज्ञानिक ऐसा लोक भी गढ़ सकता है, जहां एकदम विपरीत परिस्थितियां हों. उस लोक का सर्वेसर्वा विज्ञान की ताकत के बल पर पूरी दुनिया पर काबिज होने का सपना देखता हो. विज्ञानगल्पों में ऐसे वैज्ञानिक को खलनायक मान लिया जाता है. कह सकते हैं कि विज्ञान गल्प में अकेले व्यक्ति की अति महत्त्वाकांक्षाओं के स्थान पर, लोककल्याण के साथ देखे गए सपनों को वरीयता प्राप्त होती है. इस तरह विज्ञानलोक का आदर्श, वहां की लोकतांत्रिक अथवा ‘बिना राजा के राज्य’ जैसी व्यवस्था परीलोक के उदार राज्य की अपेक्षा आधुनिकता के निकट अनुभव होती है. परंतु क्या सचमुच ऐसा ही है? विज्ञानसाहित्य जिस प्रकार के आदर्शलोक का सपना हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है, क्या वह सचमुच लोकतांत्रिक अथवा अराजक है? इसके लिए हमें आधुनिक विज्ञान साहित्य के कुछ विशिष्ट पहलुओं पर विचार करना होगा.

दि टाइम मशीन’ जैसे चुंनीदा मौलिक विज्ञान उपन्यासों को छोड़कर अधिकतर के कथानक चंद स्थितियों के इर्दगिर्द घूमते हुए नजर आएंगे. अधिकांश से बेकन की आत्मा झांकती हुई नजर आएगी, लगभग नब्बे प्रतिशत विज्ञानगल्प या तो यात्रा अभियान हैं; अथवा किसी वैज्ञानिक महत्त्वाकांक्षा के दुष्परिणाम की कथायात्रा. यात्रा अभियान पृथ्वी के दुर्गम स्थानों के हो सकते हैं और अंत:ग्रही भी. वे किसी उदार वैज्ञानिक के प्रयोग के दुष्परिणाम भी हो सकते हैं, अथवा किसी दुष्ट वैज्ञानिक के दुनिया पर छा जाने के पागलपन के भी. इसकी नींव मेरी शैली की कृति ‘फ्रेंकेस्टीन’, जिसे प्रथम वैज्ञानिक उपन्यास का दर्जा दिया गया है, के साथ ही पड़ चुकी थी. फ्रेंकेस्टीन में एक वैज्ञानिक मरे हुए प्राणियों को पुनर्जीवित करने का फार्मूला खोज लेता है. ‘फ्रेंकेस्टीन’ ऐसी ही रचना है, जिसमें ‘राक्षसी ताकत’ है. विज्ञान लेखकों का दूसरा सबसे पसंदीदा विषय यात्राअभियान और उसमें भी अंतरिक्षीय अथवा अंतग्र्रही यात्राओं का रहा है. जूल बर्न के उपन्यासों से लेकर ‘आश्चर्य वृतांत’(अंबिकादत्त व्यास), ‘चंद्रलोक की यात्रा’(केशवप्रसाद सिंह), डा. हरिकृष्ण देवसरे के ‘लावेनी’, ‘राजू की मंगल यात्रा’, ‘लूशियन का रहस्य’ जैसे उपन्यास अंतरिक्ष यात्रा को लेकर लिखे गए हैं. आशय है कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो लगभग सारा का सारा वैज्ञानिक साहित्य विज्ञान को शक्ति का पर्याय सिद्ध करने की कोशिश करता है. परीकथाओं में जो कार्य जादू, टोने या राक्षसी वृत्ति द्वारा कियाकराया जाता था, विज्ञानकथाएं ऐसे असंभव दिखने वाले कार्य को ज्ञानविज्ञान के माध्यम से संभव होते हुए दिखाती हैं. वे ज्ञान का मिथकीकरण करने में योगदान करती हैं. दरअसल जब हम शक्ति, विशेषकर किसी व्यक्ति, प्राणी अथवा मशीन को लेकर अकूत शक्ति की बात करने लगते हैं तो समाज को अनायास ही शक्तिसंपन्न और शक्तिहीनों में बांट देते हैं. तब अनचाहे ही समाज में मोटी रक्षा खिंच जाती है. उसके एक ओर वे होते हैं, जो शक्ति संपन्न हैं, दूसरी ओर शक्ति से वंचित. दोनों का टकराव कथानक को आगे बढ़ाने के काम लाता है. और जब समाज बंटा हुआ हो, उसमें मोटी रेखाएं खिंची हुई हों, तो वह लोकतांत्रिक हो ही नहीं सकता. यानी विज्ञान साहित्य के नाम पर लिखित रचनाएं, रचनाओं में दर्ज उनके आदर्शलोक लोकतांत्रिक होने का दिखावा भले ही करें, उनका संदेश लोकतंत्र के आदर्श से दूर रह जाता है. हालांकि विज्ञान में लोकतांत्रिक होने की भरपूर संभावना होती है, मगर विज्ञान को धर्म मान लेने वाले साहित्यकार प्रायः विज्ञानबोध से कटे होते हैं. इसलिए वे साहित्य की आत्मा के साथ न्याय करने में असफल सिद्ध होते हैं. विज्ञान का रूप कल्याणकारी हो सकता है, ज्ञानविज्ञान को लेकर साधारण आदमी की दृष्टि से भी सोचा जा सकता है, या सोचा जाना चाहिए, उस ओर हमारे विज्ञान लेखकों की प्रायः दृष्टि ही नहीं जा पाती. लालच, विज्ञान के प्रति नासमझी, यशप्रतिष्ठा अथवा किसी ओर कारण से, विज्ञान साहित्य का जो स्वरूप इससे बनता है, वह परंपरागत परीकथा साहित्य से कतई भिन्न नहीं है. विज्ञान गल्प में लेखक उन लोगों को जो पृथ्वी से परे की यात्रा करने में सक्षम हैं, एक अलग काल्पनिक दुनिया बसा लेता है. मगर ऐसे आदर्शलोक का यात्री चाहे पाठक हो या कथापात्र, हमेशा यह याद रखता है कि एक पिछड़ी हुई, अवैज्ञानिक किस्म की दुनिया, धरती पर मौजूद है. इससे उसमें अभिजन संस्कार पनपने लगता है और वह स्वयं को जनसमाज से भिन्न, उससे श्रेष्ठ सिद्ध करने में जुटा रहता है. इस तरह विज्ञान का आदर्शलोक पीछे हमने जिसे ‘बिना राजा का राज्य कहा है, अभिजातों की रम्यस्थली बन जाता है.

बहरहाल, विज्ञान जिस तरह से पांव पसार रहा है, उससे इस बात की पर्याप्त संभावना है कि कल्पना की यात्रा आगे और भी तीव्र होने वाली है. यह विरूपित होगी या सही दिशा की ओर लौटेगी, यह लेखकों, समाजशास्त्रियों, साहित्यकारों और आलोचकों पर निर्भर करेगा. इस बात पर भी निर्भर करेगा कि वे स्थितियों की व्याख्या सत्ता द्वारा निर्धारित अथवा उनके अनुकूल दिखनेवाली कसौटियों के आधार पर करते हैं; अथवा उनकी दृष्टि समाजोन्मुखी, बहुसंख्यक के हित को समर्पित होगी. ऐसे में परीकथाओं का क्या होगा? प्रौद्योगिकीय आकर्षण ने विज्ञान लेखकों को भटकाया है तो परीकथाओं को विरूपित करने में भी उसने कोई कमी नहीं छोड़ी है. यह प्रवृत्ति आज की नहीं है. 1847—1848 में जब छायाकार जार्ज क्रुकशंक ने शराब के दुष्परिणामों को जनजन तक पहुंचाने के लिए, लोकप्रिय परीकथाओं के मुख्य चरित्रों का उपयोग शराब की बोतलों के लेवल डिजायन के लिए किया, तो उस शताब्दी के महान उपन्यासकार चाल्र्स डिकेंस ने उसका जोरदार विरोध करते हुए एक महत्त्वपूर्ण लेख ‘फ्रा॓ड आ॓न फेयरीटेल्स’ लिखा था. आगे चलकर वह लेख हेंस एंडरसन जैसे अनेक परीकथा लेखकों की प्रेरणा बना. ऐसे प्रसंग गिनेचुने होंगे. सच यही है कि विज्ञान और तकनीक को जो दिशा लेखकों, साहित्यकारों, वुद्धिजीवियों और समाजशास्त्रियों की ओर से मिली चाहिए थी, उसका अभाव रहा है. शायद इसलिए कि आधुनिक मनुष्य प्राचीनता एवं आधुनिकता के बीच तालमेल बनाने में असफल सिद्ध हुआ है. विकास का लालच नई प्रौद्योगिकी को आकर्षित करता है तो परंपरा और संस्कृति के दबाव उसको पीछे की ओर ढकेलते हैं. जिस कंप्यूटर से वह बड़ीबड़ी गणनाएं करता है, योजनाएं बनाता है, उसी कंप्यूटर का उपयोग ‘ज्योतिष’ और ‘कुंडली मिलान’ के लिए भी करता है. इनमें से पहले के लिए विज्ञान तर्क देता है, दूसरी के लिए आस्था. हालांकि ये व्यक्ति और समाज दोनों की स्वाभाविक गतियां हैं. विकास की प्रक्रिया दो कदम आगे और एक कदम पीछे हटते हुए आगे बढ़ती है. विकासधारा अवरुद्ध न हो, इसके लिए अनुकूल प्रेरणाओं की जरूरत हमेशा बनी रहती है.

आधुनिक विज्ञान लेखक माक्र्स को भले ही न मानें, मगर उसका ‘द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ किसी न किसी रूप में उनकी रचनाओं पर छाया रहता है. उनमें अच्छे और बुरे की बीच सपाट विभाजन होता है; यानी एक और सभी अच्छे मान लिए जाते हैं, दूसरी ओर सभी बुरे. उस व्यवस्था में न्याय की एक ही संभावना बनती है. अच्छे द्वारा बुरे का अंत. दोनों के बीच संवाद या समझौते की स्थितियां भी हो सकती हैं, किंतु उसपर आधुनिक विज्ञानलेखन विचार ही नहीं करता. कुछ ऐसा ही परंपरागत परीकथाओं में भी होता है. यद्यपि नए चलन की परीकथाएं इस आरोप से बाहर आने को उत्सुक हैं. उनमें नायक की सराहना इसलिए की जाती है, क्योंकि वह समाज द्वारा स्थापित मान्यताओं के समर्थन में रहता है. जबकि खलनायक सामाजिक नियमों, व्यवस्थाओं को कदमकदम पर चुनौती देता है. रचना में विचित्रता की चाहत विज्ञान लेखकों को कई बार परीकथाओं और मिथकीय पात्रों की ओर ले जाती है. इससे परीकथा और विज्ञानकथा की दूरी घटती जाती है. प्रथम विज्ञान उपन्यास ‘फ्रेंकिस्टीन’ से लेकर आधुनिक विज्ञानगल्पों तक यही स्थिति है. फिल्मों में भी ‘ही मेन’, ‘स्पाइडर मेन’, ‘शक्तिमान’, बैटमेन, ‘रावन’, ‘रोबोट’ जैसे चरित्र पुराकथाओं और/या परीकथाओं से चरित्रों का आयात करने के बाद ही गढ़े गए हैं. विज्ञान लेखक भले ही कहते फिरें कि आज का बालक समझदार है, परियों, बौने, भूतप्रेत, तंत्रमंत्र की हकीकत को जान चुका है. समझता है कि ये सब कल्पना की उड़ान हैं, लेकिन जब स्वयं चरित्र गढ़ने की बात आती है, तब उनकी कल्पना भी वहीं से प्रेरणा ग्रहण करती है, जिसे वे पुराना, पोंगापंथी और दकियानूसी बताते हैं. पुराकथाओं और परीकथाओं के चरित्र, बदले नामरूप में ‘असंभाव्य को संभव’ दिखाने के कथाकौशल के बीच, तथाकथित विज्ञानसाहित्य में आसानी से खपा लिए जाते हैं. परीकथा लेखक इस बारे में अपेक्षाकृत ईमानदारी बरतता है. उसका ध्यान केवल मनोरंजन तथा रचना द्वारा मिलनेवाले संदेश तक सीमित होता है. पात्रों की वास्तविकता का उसका कोई दावा नहीं होता. जबकि विज्ञानगल्प में पुराकथाओं के चरित्रों को इस रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि ये आज भले ही काल्पनिक लगें, कल उन्हें प्रयोगशाला में गढ़ा जा सकता है. कई बार तो उन्हंे प्रयोगशालाओं में गढ़ा हुआ दिखाया भी जाता है. ‘डायनासोर’ नामक हालीवुड की फिल्म में वैज्ञानिकों को डायनासोर के जीवाश्म से प्राप्त डीएनए द्वारा सचमुच का डायनासोर गढ़ते हुए कल्पित किया गया है. परीकथाएं भी रक्तबीज जैसी कल्पनाओं को सहेजे रखती हैं. ऐसे पात्रों को वे राक्षस या ऐसा ही कोई नाम दे देती हैं. सामान्य विज्ञानबोध और तार्किकता के अभाव में विज्ञानगल्प, परीकथाओं के साथ उलझी हुई नजर आने लगती हैं. पात्रों की भिन्नता के बावजूद उनमें वास्तविक अंतर बहुत कम रह जाता है.

परीकथाओं की आत्मा किस्सागोई में बसती है. इधर जीवन में दिनोंदिन बढ़ती व्यस्तता के बीच किस्से सुननेसुनाने की परंपरा लुप्तप्रायः हो चुकी है. तो क्या साहित्य की यह रेशमी, खूबसूरत विधा एक दिन दमतोड़ लेगी? अथवा जिस तरह विज्ञानगल्पों में सीधेसीधे या घुमाफिराकर मिथकों और परीकथाओं के चरित्रों का उपयोग किया जा रहा है तथा परीकथाओं में नएनए प्रयोगों का सिलसिला चल रहा है, उससे भविष्य में दोनों का अंतर और भी तेजी से कम होता जाएगा? यह सब तो भविष्य ही तय करेगा. लेकिन जिस प्रकार असमान विकास के कारण गांव और शहर के बीच खाई बढ़ती जा रही है. गरीबीअमीरी अनुपात में लगातार इजाफा हो रहा है—उससे इतनी उम्मीद तो बनती है कि एक वर्ग के लिए परीकथाएं आगे भी उसका स्वप्नलोक बनी रहेंगीं. चूंकि उपभोक्तावादी मानसिकता का दौर अभी लंबा खिंचना है, ग्रामीण और सुदूर अंचल में बसे जनसमाजों में अपनी पैठ बनाने के लिए सिनेमा, दूरदर्शन, इंटरनेट आदि उनकी कहानियों तथा अन्य कथाप्रतीकों का जमकर उपयोग करेंगे, इससे यह भी तय माना जा सकता है कि दोनों के चरित्र परस्पर गड्डमड्ड होते जाएंगे. चूंकि आधुनिकता के तमाम आग्रहों के बावजूद मनुष्य परंपरागत मिथकों से किसी न किसी रूप में जुड़ा रहता है, इसलिए जनसमाज में अपनी पैठ बनाने के लिए, व्यावसायिक कारणों से ही सही, विज्ञानगल्प आगे भी परीकथाओं के मिथकीय चरित्रों का बड़ा आयातक सिद्ध होगा. जिस तरह संचारक्रांति ने दूरियों को पाटा है. सिनेमा, दूरदर्शन के अलावा इंटरनेट, मोबाइल फोन, कंप्यूटर आदि संप्रेषण के माध्यम के रूप में उभर कर आए हैं, उससे कहानियां पढ़नेसुनने से अधिक देखने की चीज बनती जा रही हैं. बदले परिवेश में लेखकीय कौशल की महत्ता घटी है. कुछ दशकों पहले आई फंतासीनुमा फिल्मों ‘स्पाइडर मेन’, बैटमेन, रावन आदि के मुख्य पात्रों की कल्पना परीकथाओं से प्रेरित थी. मगर उनमें तकनीक का इतना प्रयोग किया गया कि उनमें कथानक की संवेदना, जो परीकथाओं की प्रमुख विशेषता और साहित्य का गुण है, लगभग समाप्तसी हो गई. अमिताभ बच्चन अभिनीत भूतनाथ शृंखला की फिल्म ‘भूतनाथ’ 2008 में आई थी. वह फिल्म आस्कर वाइल्ड की परीकथा ‘दि केंटरविले घोस्ट’ पर आधारित थी. उसकी अगली कड़ी ‘भूतनाथ रिटर्नस’ केवल फंतासी है. भूत उसमें भी है, मगर उसका चरित्र परिवर्तन किया गया है. फिल्म का भूत खलनायक न होकर नायक है. पृथ्वी पर पहुंचने के बाद वह भारत की राजनीति तथा सामाजिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार, लापरवाही को देखकर इतना उद्वेलित होता है कि अपने लोक वापस लौटने का इरादा छोड़कर स्वयं चुनाव लड़ने का निर्णय ले लेता है. निर्वाचन नियमों की खामी का लाभ उठाकर वह टिकट पाने में सफल भी हो जाता है. कहानी में भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति और अपने अधिकारों के प्रति सचेत जनता के स्वप्नलोक को गढ़ा गया है.

मुंबइया फिल्म ‘एंटरटेनमेंट’ भी लोकतत्व पर आधारित है. उसमें एक अमीर आदमी कुत्ते को अपना वारिस बनाकर मर जाता है. कुत्ता जिस तरह के कारनामे दिखाता है, उससे एक श्रेष्ठ गल्प की संभावना बनती है. हिंदी के एक युवा ब्लाॅगर ने पिछले दिनों विज्ञान गल्प के नाम पर एक धारावाहिक उपन्यास लिखा. उसमें एक ओर गणित की बारीकियां थीं, विज्ञान के आधुनिकतम उपकरणों और शोधों की ओर संकेत था, वहीं चैंकानेवाली चीज उसमें राक्षस की उपस्थिति थी, जो किसी परीकथा से निकलकर विज्ञानगल्प में जा बैठा था. बहरहाल, परीकथा और विज्ञानगल्प के बीच यह सामान्य किंतु अनपेक्षित लेनदेन है. सामान्य इसलिए क्योंकि मनुष्य अपने अतीत को भूल नहीं पाता. भविष्य के लिए योजनानिर्माण तथा वर्तमान की चुनौतियों से निपटने के लिए वह अपने ज्ञानानुभव के साथसाथ वह पीढ़ीदरपीढ़ी चले आ रहे संस्कारों भी प्रेरणा लेता है. इसलिए विज्ञानकथा और परीकथाओं के संलयन पर लेखकों और आलोचकों के चाहे जो विचार हों, इतना तय है कि दोनों कथाधाराओं के बीच लेनदेन की प्रवृृत्ति आगे भी बनी रहेगी. और जैसा कि संकेत किया गया है, इस आदानप्रदान में विज्ञानगल्प परीकथाओं की अपेक्षा बड़ा ग्राहक सिद्ध होगा. यद्यपि वह प्रायः उन्हीं चरित्रों को उधार लेने को उत्सुक होगा, जो परीकथाओं में पुराकथाओं से आयातित हैं तथा लोकप्रिय मिथक के रूप में समाज में उनकी पूर्वप्रतिष्ठा है. इसलिए मौलिक और युगानुकूल परीकथाएं(विज्ञानगल्प भी) लिखनेवालों के लिए संभावना और चुनौती आगे भी बराबर बनी रहेगी. इससे परीकथाओं की महत्ता को आसानी से समझा जाता है. परीकथाओं के भविष्य को लेकर ऐसी ही आश्वस्ति चाल्र्स डिकेंस के शब्दों(फ्रा॓ड आ॓न फेयरीज) से भी झलकती है—

करुणा, सहिष्णुता, निर्बल और विपन्न के प्रति करुणाभाव, जानवरों के प्रति ममता, प्रकृति से स्नेहानुराग, क्रूरता और आतंक के प्रति घृणा, नफरत जैसी अच्छी बातें बच्चे के हृदय में पहली बार परीकथाओं जैसी सशक्त विधा के माध्यम से ही प्रवेश करती हैं. सही मायने में वे हमें भटकाव के दौर में सही रास्ता दिखाती हैं, हमें अंधियारे रास्तों से बचाती हैं, और हमें उस सीधेसादे रास्ते पर ले आती हैं जहां हम बच्चों के साथ उनकी उमंग और प्रफुल्लता के साथ साझा करते हुए घूमफिर सकते हैं. उपयोगितावादी दौर और हरेक काल में, हमेशा इस बात पर जोर दिया गया है कि परीकथाओं का सम्मान किया जाना चाहिए. अतएव प्रत्येक मनुष्य जो इस विषय को भलीभांति समझता है, वह यह भी जानता है कि जहां तक सूरज की रोशनी जाती है वहां तक, बगैर किसी कल्पना, बगैर किसी रोमांस के कोई राष्ट्र पहले न तो कभी था, न हो सकता है, न ही होगा.’

परीकथाएं लोकानुभूतियों का दस्तावेज हैं. उसमें आमजन के सपनों, इच्छाओं, संघर्षों एवं पीड़ाओं की झलक मिलती है. बड़ी बात यह कि वे कठिन संघर्ष के बीच भी उम्मीद को बनाए रखती हैं. उनका यही गुण उन्हें मानवसभ्यता से जोड़कर जीवन में लगातार प्रासंगिक बनाए रहता है. परीकथाओं के इन गुणों को आत्मसात् कर आधुनिक विज्ञान लेखन अपनी सामाजिक उपादेयता सिद्ध कर सकता है. दूसरी ओर विज्ञानकथाओं की तार्किकता एवं आधुनिक मूल्यबोध को अपनाकर, परीकथाएं भी अपने ऊपर लगनेवाले आरोपों से मुक्ति पा सकती हैं.

1 टिप्पणी

Filed under परीकथाओं का भविष्य : भविष्य की विज्ञानकथाएं

One response to “परीकथाओं का भविष्य : भविष्य की विज्ञानकथाएं

  1. अच्छा आलेख हैसही बात है कि विज्ञान यंत्र अथवा उपकरण तक सीमित नहीं है. वह प्रयोगशाला भी नहीं है, जहां वैज्ञानिक लोग बड़े-बड़े शोध किया करते हैं. विज्ञान असल में पद्धति है. प्रणाली है ज्ञानार्जन की. विज्ञावकथा के नाम पर अधिकोंश लोग परिकथाएँ ही
    लिख रहे है। संपादक परिकथाओं को विज्ञानकl के रूप में छाग रहे हैं।

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