जातक कथाएं, बड्डकहा (कथासरित्सागर) तथा पंचतंत्र

हिंदी बालसाहित्य : अतीत से आज तक—2

यूं तो भारत में पशु-पक्षियों को लेकर कहानी लिखे जाने का चलन वैदिक काल में ही शुरू हो चुका था. उत्तर वैदिककाल तक वे कहानियों लोकसाहित्य में घुलमिलकर जनसमाज में अपनी जगह बना चुकी थीं. लोग उनके संदेश को जीवन में ढालने का प्रयत्न करने लगे थे. इस बीच उनमें गुणात्मक परिवर्तन भी आया था. किंतु लोकमानस में उनकी पैठ का, सोची-समझी कल्याणकारी नीति के अंतर्गत उपयोग जैन और वौद्ध आचार्यों द्वारा किया गया. उस समय वैदिक धर्म कर्मकांड और निरर्थक वितंडा में डूबकर अपनी प्रासंगिकता खोने लगा था. जनमानस धर्म के नाम पर थोपे जा रहे आडंबरों से त्रस्त था. कहने की आवश्यकता नहीं कि जब समाज का नेतृत्व दिशाहीन हो, निरर्थक वितंडा में खोकर अपना तेज बिसरा चुका हो, तब शताब्दियों से चली आ रही कहानियों, दंतकथाएं और किवदंतियां घने असमंजस में लोगों का मार्गदर्शन करती होंगी. जैन और बौद्ध आचार्यों ने समाज की जीवनी शक्ति और चेतना का प्रतीक बन चुकी कहानियों और दंतकथाओं को समाज से उठाया और अपने प्रवर्त्तक के नाम से जोड़कर उन्हें नए सिरे से प्रासंगिक बनाने में अपना योगदान दिया. यह काम इतनी बुद्धिमत्तापूर्वक किया गया कि उन कहानियों में अंतनिर्हित नीति-संदेश उनके धर्म-प्रवर्त्तक और मार्गदर्शक का जान पड़े. इसका लाभ भी उन्हें मिला. नए-नए उभरे बौद्ध और जैन धर्म की जनमानस में पैठ बनती गई. कहानियों के रूप में मौजूद लोकसंपदा और लोकविश्वासों का लाभ उठाने की यह अकेली कोशिश न थी. उससे पहले वैदिक धर्म के आचार्य भी यह करते आए थे. प्रकृति आधारित जीवन में वर्षा, धूप जल, अग्नि, वायू मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएं थीं. प्राचीन देवताओं का जखीरा जीवन की इन्हीं मूलभूत आवश्यकताओं के अधिष्ठाता के रूप में खड़ा किया गया था, जिसमें इंद्र(वर्षा), धूप(सूर्य) जल(वरुण), वायू(मरुत्), अग्नि(अग्नि) जैसे देवताओं की परिकल्पना की गई. इसी के फलस्वरूप जातक कथा, पंचतंत्र, बड्डकहा अथवा बृहत्कथा जैसे ग्रंथ अस्तित्व में आए. बुद्ध के पूर्वजन्मों को लेकर ईसा पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी में लिखी गई जातक कथाओं का बड़ा हिस्सा श्रीलंका में रचा गया था. कालांतर में विश्व की पचास से अधिक भाषाओं में अनूदित होकर ये कहानियां देश-देशांतर के साहित्य का हिस्सा बनीं और सर्वत्र सराही गईं.

जातक कथा अथवा किसी अन्य रूपाकार में जिन दिनों ये कहानियां लिखी जा रही थीं, वह समय पूरे विश्व में बौद्धिक जागरण का था. प्राचीनतम धर्मों में आ चुकी विकृतियों से मुक्ति के प्रयास हर जगह शुरू हो चुके थे. भारत में बुद्ध और महावीर, चीन में कन्फ्यूशियस, यूनान में सुकरात, प्लेटो तथा जापान में ताओ के माध्यम से धर्म-दर्शनों में नवीकरण का अध्याय लिखा जाने लगा था. पुराने धर्म अपनी विकृतियों के कारण उत्तरोत्तर ठहराव का शिकार हो रहे थे, नए धर्मों ने उनके द्वारा छोड़ी गई खाली जमीन पर अपने आदर्शों की नींव रखी और अपेक्षाकृत व्यावहारिक दृष्टिकोण के सहारे लोगों का विश्वास जीतने में कामयाब हुए. इसके लिए उन्होंने हर उस संसाधन का प्रयोग किया, जिनके आधार पर पुराने धर्मों ने अपनी जमीन बनाई थी, किंतु बाद में पूरी तरह अभिजातोन्मुखी हो जाने के कारण वे जनसाधारण के गले की हड्डी बनने लगे थे. बहरहाल, जातक कथाओं के बाद अगली महत्त्वपूर्ण कृति गुणाढ्य की ‘बड्डकहा’ थी. मूल ‘बड्डकहा’ अथवा ‘बृहत्कथा’ वररुचि(350 ईस्वी पूर्व) ने काणभूति से कही थी. गुणाढ्य ने उसे काणभूति ये सुना तथा उनका पैशाची में पुनर्लेखन किया. आगे चलकर यह कृति कथासरित्सागर, बृहत्कथामंजरी, हितोपदेश, बृहत्कथाश्लोक संग्रह, वैताल पचीसी, सिंहासन बतीसी जैसी महान कृतियों का आधार बनी. इन सभी में भारत की कहानीकला का उत्कृष्टतम रूप मौजूद है. बड्डकहा का मूल स्वरूप अनुपलब्ध है. मूल ग्रंथ सात खंडों में था. उनमें से अब एक भी प्राप्यः नहीं हैं. हिंदी कथा साहित्य में बड्डकथा का संस्कृत साहित्य के तीन मूर्धन्य कथाकार दंडी, सुबाहू और वाणभट्ट की रचनाओं पर उसका गहरा प्रभाव है. 850 ईस्वी में कंबोडिया की एक संस्कृत प्रशस्ति में गुणाढ्य और बृहत्कथा का उल्लेख हुआ है. इससे स्पष्ट है कि उस समय तक यह कृति न केवल प्राप्त थी, बल्कि इसकी ख्याति दूसरे देशों तक भी पहुंच चुकी थीं. ‘अरेबियन नाइट्स’ की कहानियां भी कथासरित्सागर के प्रभाव से अछूती नहीं हैं. ‘बड्डकहा’ के लिखे जाने की कहानी भी अपने आप में रोचक दृष्टांत हैं.

भारतीय इतिहास में सातवाहन वंश बहुत चर्चित रहा है. ईसा से पांच सौ वर्ष पहले लिखे गए ग्रंथ ऐतरेय ब्राह्मण में दक्षिण की एक पराक्रमी जनजाति ‘आंध्र’ को ‘दस्यु’ तथा अनार्य माना गया है. इसी वंश के सम्राट सिमुक(शासनकाल 235 ईसापूर्व—195 ईस्वी पूर्व) ने सातवाहन साम्राज्य की नींव डाली थी. सिमुक के वंश में हा॓ल का जन्म हुआ. बीसवीं शताब्दी में दक्षिण में पुरातात्विक खोज के दौरान उस कालखंड के कुछ सिक्के प्राप्त हुएं हैं, जिनपर ‘साड़’ अथवा ‘सात’ खुदा मिला है. विशेषज्ञों के अनुसार वह ‘हा॓ल’(शासनकाल 20 ईस्वीपूर्व से 24ईस्वी पूर्व) का ही प्राकृत नाम है. हा॓ल बहुत पराक्रमी सम्राट था. उसकी साहित्य में भी पर्याप्त रुचि थी. हा॓ल ने सतसई की रचना की है, जिसमें उसने गुणाढ्य द्वारा ‘बड्डकहा’ अथवा ‘बृहत्कथा’ के लेखन के दौरान उठाए गए कष्टों का उल्लेख किया गया है. अधिकांश विद्वानों का यह भी मानना है कि ‘बड्डकहा’ का लेखन हा॓ल के शासनकाल में ही हुआ था. वह संस्कृत का विद्वान था, जबकि बड्डकहा की रचना उस समय की लोकभाषा पैशाची में की गई थी. इसके पीछे स्वयं एक बृहत्कथा है. कहानी कुछ इस प्रकार है—

“सम्राट हा॓ल एक बार जलक्रीड़ा कर रहे थे. अचानक उन्हें संस्कृत का ज्ञान न होने का क्षोभ उपजा. उन्होंने तत्क्षण प्रतीज्ञा की कि जब तक धारावाहिक रूप से संस्कृत बोलने-लिखने नहीं लगेंगे, तब तक प्रजा को मुंह नहीं दिखाएंगे. जिन दिनों राजा के आदेश के बिना राज्य में पत्ता तक नहीं हिलता था. प्रजा अपने राजा को ईश्वर तुल्य मानती थी, उन दिनों राजा इस तरह की कठिन व्रत साध ले….बड़ी समस्या थी. पर राजा तो राजा. प्रतीज्ञा कर तो ली. लेकिन पूरी कैसे हो? राजा के प्रजा से कट जाने का असर राजकाज पर पड़ा. राज-काज बंद हो गया. राजा को संस्कृत सिखाने के लिए बड़े-बड़े पंडित बुलवाए गए. उनमें गुणाढ्य पंडित भी सम्मिलित थे. उन्होंने राजा को छह वर्ष में संस्कृत-निष्णात बना देने का आश्वासन दिया. राजा ने शर्त मान ली. राजा की पढ़ाई शुरू हो उससे पहले ही एक और पंडित ने दरबार में प्रवेश किया. उसने केवल छह महीने में ही संस्कृत सिखा देने का आश्वासन दिया.

गुणाढ्य के लिए यह असंभव बात थी. अपने रोष को दबाए बिना उन्होंने प्रतीज्ञा की, ‘यदि कोई व्यक्ति छह महीने में संस्कृत सिखा देगा तो मैं इस भाषा में लिखना ही छोड़ दूंगा.’ अब राजा बस इतना चाहता था कि संस्कृत में बोल-समझ सके. उसे उस भाषा में ग्रंथ तो रचने नहीं थे. तो हुआ यह कि छह महीने में राजा संस्कृत पढ़ने-लिखने और बोलने में प्रवीण हो गया. दरबारियों ने भी मान लिया कि राजा संस्कृत-ज्ञान से संपन्न है. अब गुणाढ्य के लिए बड़ी मुश्किल हुई. जिन दिनों पंडित की योग्यता भाषाज्ञान से आंकी जाती हो, केवल भाषा-ज्ञान के आधार पर किसी को पंडित की उपाधि से अलंकृत कर दिया जाता हो, ऐसे में बगैर किसी अभिजन भाषा के जीना बड़ा कठिन था. सम्राट गुणाढ्य जैसे विद्वान को खोना नहीं चाहता था. मगर बाजी हारने के बाद गुणाढ्य भी दरबार में नहीं रहना चाहते थे. अतएव वचन के अनुसार गुणाढ्य ने राजधानी छोड़ दी. वहां एक नया अवसर उनकी प्रतीक्षा में था. गुणाढ्य मौन होकर पिशाचों की बस्ती में रहने लगे. वहां एक गंदर्भ रहता था. उसे सैंकड़ों कहानियां याद थीं. गंदर्भ के मुंह से सुनी कहानियों को गुणाढ्य ने पैशाची भाषा में लिखना आरंभ किया. पिशाचों की बस्ती में लेखन सामग्री तो थी नहीं, इसलिए कागज के स्थान पर पशु-चर्म और स्याही की जगह पशु-रक्त प्रयोग किया गया. वर्षों बाद पुस्तक पूरी हुई. पिशाचों की बस्ती में तो लिखित पुस्तक का कोई उपयोग था नहीं. सो गुणाढ्य ने उसको राजा तक पहुंचाने का निर्णय लिया. अपने दो शिष्यों के साथ जो आरंभ से ही उनके साथ लगे थे, गुणाढ्य ने राजधानी की ओर कूंच कर दिया. राजधानी पहुंचकर ग्रंथ को शिष्यों के हाथ राजा के पास भिजवा दिया और स्वयं नगर के उपकंठ में विश्राम करने लगे.

ग्रंथ को देखकर राजा को घिन आने लगी. उसने शिष्यों से ग्रंथ के रचनाकार के बारे में जानना चाहा. शिष्यों ने बताया कि उनके गुरु मौन और अपने आप में मग्न रहने वाले हैं. वे किसी से नहीं मिलते. ऐसे ग्रंथ जो सूखे चमड़े पर पशु-रक्त से लिखा गया हो, जिसका लेखक मौन और मत्त रहनेवाला हो—उसमें भला क्या विचारणीय हो सकता है.1 यह कहते हुए राजा ने ग्रंथ वापस लौटा दिया. वह भाषा के आधार पर, वर्ण के आधार पर कृति का मूल्यांकन करने की प्राचीन परिपाटी थी, जो किसी कृति की श्रेष्ठता का आकलन उसकी भाषा अथवा रचनाकार के वर्ण से किया जाता था. बहरहाल, गुणाढ्य को शिष्यों ने जब सारी बात बताई तो वह अत्यंत मर्माहत हुए. उन्होंने हताश होकर पुस्तक को जला देने का निर्णय लिया. शुभचिंतकों ने सलाह दी कि वे एक बार राजा के समक्ष स्वयं उपस्थित होकर उसे पुस्तक में वर्णित कथाओं का श्रवण कराएं. मगर गुणाढ्य राजा के समक्ष अपना मौन तोड़ने तैयार न थे.

अंततः गुरु के आदेश पर अग्नि प्रज्वलित की गई. कोई उपाय न देख शिष्यों ने ग्रंथ को अग्नि-समर्पित करने से पूर्व उसकी कहानियां अंतिम बार सुनाने का आग्रह किया. गुणाढ्य ने अनुरोध स्वीकार कर लिया. शिष्य आसन जमाकर बैठ गए. गुणाढ्य पुस्तक के एक-एक पृष्ठ को पढ़कर अग्नि को समर्पित करने लगे. पुस्तक की कहानियां इतनी मधुर थीं कि पशु-पक्षी मग्न होकर सुनने लगे. जंगल में जो जहां था वहीं ठहर गया. मृग और बाघ अपने आपे को बिसरा, पांव पसारकर कथा सुनने लगे. सुबह से शाम हुई, शाम से सुबह. गुणाढ्य पुस्तक को जलाए बिना उठने को तैयार न थे. कहानी सुन रहे जीव-जंतुओं के पांव भी अकड़ने लगे. एक ही स्थान पर पड़े रहने से उनकी देह का मांस सूखने लगा. पाकशाला में सूखे मांस से बना भोजन सम्राट के पास पहुंचा. उसे खाते ही राजा के पेट में दर्द हो गया. तत्काल राजवैद्य को बुलाया गया. नाड़ी देखकर उन्होंने रोग का कारण बताया. तदनंतर वधिकों और शिकारियों को बुलवाया गया. इस पड़ताल के दौरान जंगल में कथा कह रहे अघोरी के बारे में राजा को बताया गया. राजा ने सबकुछ छोड़कर जंगल की ओर प्रस्थान कर दिया. जंगल में पशु-पक्षियों को दत्तचित्त कथा सुनते और अघोरी को एक-एक पृष्ठ पढ़कर जलाते देख राजा दंग रह गया. राजा ने आगे बढ़कर अघोरी से पुस्तक न जलाने का आग्रह किया. अघोरी रुक गया. मगर उस समय तक गुणाढ्य पुस्तक के छह खंड जला चुके थे. सातवें खंड की कहानियां ही क्षेमेंद्रकृत ‘बृहत्कथामंजरी’, सोमदेव कृत ‘कथासरित्सागर’ आदि रूपों में हमारे बीच उपलब्ध हैं.”

‘बृहत्कथामंजरी’ में दी गई इस कहानी में कितनी सचाई है, कहना कठिन है. इससे यह निष्कर्ष अवश्य निकलता है कि प्राचीन ग्रंथों, विशेषरूप से जिनमें कहानी अथवा लोक-मनोरंजन से जुड़ी सामग्री हो, को लिखने के कारण स्वरूप एक कहानी जुड़ी होती थी. कहानी की कहानी के रूप में. यह परिपाटी तत्कालीन कहानी को लेकर उस समय की शास्त्रीय परंपरा के अनुरूप थी. रुद्रट ने कथा अथवा महाकथा के लक्षण बताते हुए लिखा है कि कथा के आरंभ में देवता या गुरु की वंदना होनी चाहिए. फिर ग्रंथकार का अपना और कुल का परिचय दिया जाना चाहिए. और उसके बाद कथा लिखने का उद्देश्य वर्णित होना चाहिए. गुरु में एक कथानक होना चाहिए जो प्रधान कहानी का प्रस्ताव रख सके.’2 कथाग्रंथों को लिखने की कहानी, यानी कहानी की कहानी क्यों जरूरी है, इसका कारण स्पष्ट नहीं है. संभव है यह केवल व्यवस्था रही हो. चूंकि प्राचीन लेखन धर्मोन्मुखी था, धर्म-दर्शन की व्याख्या-विश्लेषण में लिखे हुए को महत्त्वपूर्ण माना जाता था और केवल मनोरंजन के लिए किस्से-कहानियां लिखने की कोई परिपाटी न थी—संभवतः ऐसे लेखन को मर्यादित करने तथा जब पर्याप्त कारण हों तभी लिखने की व्यवस्था प्राचीन आचार्यों ने की थी. जो भी हो गुणाढ्य ने ‘बृहत्कथा’ द्वारा प्रचलित परिपाटी में एक नया अध्याय जोड़ा था.

पंचतंत्र

प्राचीन भारतीय कथा-साहित्य में सर्वाधिक ख्याति ‘पंचतंत्र को मिली. छोटी-छोटी कहानियों को समेटे हुए यह कृति जहां-जहां गई, वहीं अपना प्रभाव छोड़ा. न केवल लिखित वाङ्मय पर, बल्कि देश-विदेश के लोकसाहित्य को भी इसने गहराई से प्रभावित किया. कह सकते हैं कि न केवल भारतीय बल्कि विश्व-साहित्य के इतिहास में पंचतंत्र मील का वह पत्थर है, जहां से उसकी मौलिकता और सोद्देश्यपरकता की यात्रा आरंभ होती है. बौद्ध दर्शन के बाद यही एकमात्र ऐसी भारतीय कृति है जिसने विश्व-भर की संस्कृतियों को प्रभावित किया है. कथा और उपकथा के रूप में छोटी-छोटी कुल 75 रचनाओं को अपने भीतर समेटे इस लघुकाय कृति की महत्ता इससे भी जाहिर होती है कि आर्थर एंथनी मेक्डोनल(1854—1930) ने ‘संस्कृत साहित्य का इतिहास’ लिखा तो उसके चैदहवें अध्याय ‘परीकथाएं और नीतिकथाएं’ की शुरुआत पंचतंत्र से की. कीथ और विंटरनिट्ज ने भी पंचतंत्र को विश्व-साहित्य को भारतीय मनीषा का प्रमुखतम अवदान माना है. यही नहीं बलदेव उपाध्याय ने ‘संस्कृत साहित्य का इतिहास’ तथा डा॓. कपिलदेव द्विवेदी ने ‘संस्कृत साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास’ में भी ‘पंचतंत्र’ को प्रमुख स्थान दिया है.

उल्लेखनीय है कि जिन दिनों पंचतंत्र की रचना हुई, उन्हीं दिनों बौद्ध और जैन विद्वान भी पशु-पक्षियों को पात्र बनाकर नीति कथाएं लिख रहे थे, किंतु येन-केन-प्रकारेण उनका ध्येय लोगों में अपने-अपने धर्म-दर्शन को लोकप्रिय बनाना था. इसके लिए वे धर्म को नीति और नैतिकता का आधार बनाकर प्रस्तुत कर रहे थे. उससे पहले महाभारत में भी नीति कथाएं आ चुकी थीं. महाभारत को धर्मग्रंथ और धर्मयुद्ध मानते हुए परोक्षरूप में धर्म को नीति कथाओं के आलंबन या मुख्य प्रेरणा के रूप में इस्तेमाल किया गया था. तुलनात्मक रूप से विष्णु शर्मा की दृष्टि कहीं अधिक मौलिक और यथार्थवादी थी. पंचतंत्र की रचना उन्होंने अस्सी वर्ष की परिपक्व अवस्था में की थी. तत्कालीन परंपरा के अनुसार निश्चय ही उनकी भी कुछ धार्मिक मान्यताएं रही होंगी, किंतु अपने रचनाकर्म को धार्मिक आस्था से निरपेक्ष रखते हुए उन्होंने पंचतंत्र को नीति-ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किया था, जिसमें मनुष्य को नीति-विषयक बोध केवल मनुष्य होने के नाते जरूरी माना गया था, न कि किसी धर्म-विशेष में आस्था के कारण.

‘पंचतंत्र’ की नीतिकथाओं की विशेषता है कि उनके मुख्य पात्र मानवेत्तर प्राणी पशु-पक्षी आदि हैं. महाभारत और उससे पहले की पुराकथाओं में आई नीतिकथाओं का मुख्य ध्येय सामान्यतः मोक्ष अथवा मत्यु-पर्यंत कल्याण की कामना को लेकर होता था. जबकि पंचतंत्र की रचनाओं का संबंध जीवन के व्यावहारिक पक्ष से था. राष्ट्र से था और उस राजनीति से था, जो प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही विधियों से राज्य पर असर डालती है. वे मनुष्य को दैनिक जीवन के सामान्य व्यवहार, कर्तव्य-अकर्तव्य, अच्छाई-बुराई आदि से परचाती हैं. वह भी बिना किसी धार्मिक शक्ति या विश्वास को बीच में लाए. पंचतंत्र की कहानियों के मुख्य विषय आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक हैं. यदि कहानियों के भावबोध, राजनीतिक दर्शन और नीति-विषयक सूझबूझ की दृष्टि से परखा जाए तो पंचतंत्र की कहानियों तथा चाणक्य प्रणीत ‘अर्थशास्त्र’ में समानता दिखेगी. इसलिए कुछ विद्वान आचार्य चाणक्य और पंचतंत्रकार विष्णु शर्मा को एक मानते हैं. यदि ऐसा न भी हो तो भी पंचतंत्रकार और ‘अर्थशास्त्र’ के रचियता चाणक्य में वैचारिक साम्य अवश्य रहा होगा. पंचतंत्र की रचना महिलारोप्य के राजा अमरशक्ति के तीन उदंड पुत्रों को राजनीति की व्यावहारिक शिक्षा देने के लिए की गई थी. वह भी मात्र छह महीने में. उन राजकुमारों ने ‘पंचतंत्र’ से क्या सीखा, यह तो ज्ञात नहीं है. पूरा इतिहास इसपर मौन नजर आता है, लेकिन पंचतंत्र के लिखे जाने के बाद से ही साहित्यिक कृति के रूप में इसे जो वैश्विक प्रतिष्ठा मिली, उससे न जाने कितने ‘राजकुमारों’ को इसने अपने नीति-विषयक ज्ञान से दीक्षित किया है; और आगे भी करता रहेगा.

उल्लेखनीय है कि पशु-पक्षियों की कहानियां तो समस्त दुनिया में कही-सुनी जाती थीं. वे मनुष्य के अर्वाचीन साथी रहे हैं. मनुष्य ने जब से अभिव्यक्ति की कला सीखी तभी से वह पशु-पक्षियों के साथ अपने संबंध को कलात्मक अभिव्यक्ति देता आया है. यह बात फ्रांस में खोजे गए हिम युग के गुफा चित्रों से होती है. फिर पंचतंत्र में ऐसा क्या था, जिसने इसे बाइबिल के बाद दुनिया की सर्वाधिक प्रचार पानेवाली पुस्तक बना दिया? दरअसल इससे पहले पशु-पक्षियों की कहानियां अक्रमबद्ध रूप में प्राप्त होती थीं. उनमें से प्रत्येक कहानी अपनी जगह महत्त्वपूर्ण होती थी, लेकिन सभी कहानियां अपनी-अपनी जगह महत्त्वपूर्ण हों तथा अलग-अलग होकर भी एक वृहद उद्देश्य को समर्पित हों, ऐसा नहीं हो पाता था. यूं जातक कथाएं ‘पंचतंत्र’ से पहले ही लिखी जा चुकी थीं. उनमें जो कहानियां थीं, वे अपने अनगढ़ रूप में लोक में विद्यमान थीं. जिसे भी अपने विचार के समर्थन में नीति-विषयक तर्क देना हो वह नीति-कथाओं को बीच में ले आता था. एक ही ग्रंथ में अलग-अलग संदर्भ के साथ अलग-अलग मिजाज की कहानियां हो सकती थीं. पंचतंत्रकार ने पहली बार नीति-कथाओं की ताकत को पहचाना था और अपेक्षाकृत बड़े उद्देश्य, उदंड राजकुमारों को शिक्षित करने के ध्येय से उन्हें क्रमबद्ध रूप में पुस्तकाकार पेश किया था.

चूंकि दुनिया में कोई भी सत्य अंतिम नहीं होता. प्रत्येक नीति विशिष्ट परिवेश में ही अनुकूल सिद्ध होती है. परिस्थितियों के अनुसार केवल संदर्भ बदलते रहते हैं. मनुष्य की स्वतंत्र प्रवृत्ति तथा व्यक्तित्व की जटिलता के कारण सभी को किसी एक नियम या विचार-दृष्टि से नहीं देखा जा सकता. जैसे किसी भले व्यक्ति से अच्छी बात कही जाए तो वह उससे सीख लेगा, लेकिन दुर्जन को यदि उपदेश दिया जाए तो वह उसको हमेशा उल्टा लेगा. इस बात को पंचतंत्रकार ने चिड़िया और कौए की कहानी के माध्यम से समझाया था. चिड़िया कौए को घौंसला बनाने को कहती है. उसको समझाने की कोशिश करती है. कौआ इसमें अपनी तौहीन समझता है और गुस्से में आकर चिड़िया के घौंसले को तहस-नहस कर देता है.

तो क्या दुर्जन को सुधारने की कोशिश ही न की जाए? पंचतंत्रकार का ऐसा उद्देश्य नहीं है. पंचतंत्र की रचना ही उदंड राजकुमारों को सही रास्ते पर लाने के लिए की गई है. उपर्युक्त कहानी में यदि चिड़िया को पता होता कि दुष्ट कौआ नाराज होकर नुकसान भी पहुंचा सकता है, तो वह दूसरा रास्ता अपना शक्ति थी; अथवा कौए की संभावित प्रतिक्रिया का अनुमान लगाकर उससे अपनी सुरक्षा की व्यवस्था कर सकती थी. इसलिए क्रिया की प्रतिक्रिया क्या हो सकती है, कोई भी कदम बढ़ाने से पहले इसका आकलन करना जरूरी है. इसलिए पंचतंत्र की कहानियां अपने संदेश में एक-दूसरे का विरोध करती, परस्पर काटती हुई लग सकती हैं. मगर असल में वे एक-दूसरे की विरोधी न होकर पूरक हैं. यही पंचतंत्र की विशेषता है. इसके लिए पंचतंत्रकार ने कहानियों का पैटर्न ऐसा रखा कि वे नीति और व्यवहार का पूरा ब्रह्मांड रच देती हैं. एक कहानी से दूसरी कहानी उसकी पूरक होकर निकलती चली जाती है. यही पंचतंत्र की महत्ता है. इसी से प्रभावित होकर ईरान के शाह नौशेरवां ने पंचतंत्र को ‘ज्ञान का महासागर’ था, जबकि बुर्ज़ोई पंचतंत्र को अमृत तुल्य मानता था. पंचतंत्र को लेकर एक किस्सा यह भी है कि संस्कृत साहित्य के पारखी विद्वान मौरिज विंटरनिट्ज से किसी ने प्रश्न किया—‘आपकी सम्मिति में भारत की विश्व को मौलिक देन क्या है?’ उत्तर में विंटरनिट्ज का कहना था—

‘एक वस्तु, जिसका नाम मैं तुरंत और बेखटके ले सकता हूं, वह पशु-पक्षियों को केंद्र बनाकर रचा हुआ कथा-साहित्य है, जो भारत ने संसार को दी है.’

पंचतंत्र का लेखनकाल तीसरी शताब्दी पूर्व का है. लेकिन विडंबना है कि शताब्दियों तक अपनी इस कृति से अनजान थे. यह कृति या तो ग्रंथालयों में पड़ी धूल चाट रही थी, अथवा लाल कपड़े में लिपटी किसी अलमारी में मुंह छिपाए होगी. भला हो जर्मन विद्वान जोहंस हर्टल(1872—1955) और अमेरिकी भाषाविज्ञानी फ्रेंकलिन एडगर्टन(1885—1963) का जिन्होंने उस कैद से पंचतंत्र का उद्धार किया. हालांकि पंचतंत्र की ख्याति पर दुनिया की पहले से ही नजर थी. उसका पहला अनुवाद पहेलवी में ईरान के राजा नौशेरवां के आग्रह पर उसके मंत्री हकीम बुर्ज़ोई ने किया था.

ईरान के शाही हकीम बुर्जोई ने किसी पुस्तक में पढ़ा था कि भारत में किसी पहाड़ पर संजीवनी बूटी प्राप्त होती है, जिसे मसलकर यदि उसकी कुछ बूंदें मृत व्यक्ति के मुंह में डाल दी जाएं तो वह जीवित हो उठता है. मरणासन्न व्यक्ति के प्राण लौट आते हैं. उसने यह बात बादशाह से कही, लेकिन नौशेरवां को इसका विश्वास नहीं हुआ. लेकिन यह कहते हुए कि किसी भी बात को बगैर जांचे-परखे नकार देना उचित नहीं, उसने बुर्जोई को भारत जाने की अनुमति दे दी. नौशेरवां के कार्यकाल में ही शतरंज का खेल भी भारत से ईरान पहुंचा था. वह इस खेल को गढ़नेवाले भारतीयों की मेधा से प्रभावित था. सम्राट की आज्ञा ले, तीन सौ ऊंटों के भारी-भरकम काफिले, रसद-पानी, माल-असबाव के साथ बुर्जोई भारत के लिए रवाना हुआ. लंबी यात्रा के पश्चात वह लगभग 550 ईस्वी के आसपास कन्नौज के राजा के दरबार में पहुंचा.

राजा ने दरबारियों की बैठक बुलाई. जिसके सेवन से मृतक के प्राण लौट आएं ऐसी वनस्पति की जानकारी किसी को न थी. वनस्पति की खोज में यथासंभव मदद का आश्वासन देते हुए राजा ने अपने कुछ आदमियों को भी उसके साथ लगा दिया. बुर्जोई राजा के सहायकों के साथ संजीवनी की खोज में जुट गया. उसने जंगलों की खाक छान मारी. वहां मिलनेवाली जड़ी-बूटियों को आजमाया. हर नई और अनोखी दिखनेवाली वनस्पति का परीक्षण किया गया. उसका अर्क निकालकर मृत व्यक्ति के मुंह में डाला गया. लेप बनाकर मृत शरीर पर मला गया. लेकिन सब व्यर्थ. हर बार उसको निराशा ही हाथ लगी. धीरे-धीरे उसकी हिम्मत जवाब देने लगी. उसे उस व्यक्ति पर गुस्सा आने लगा जिसने पुस्तक में संजीवनी बूटी का उल्लेख किया था. सबसे ज्यादा गुस्सा अपने ऊपर था. आखिर क्यों उसने मूर्खतापूर्ण बात पर विश्वास किया. और अपने साथ सैकड़ों मनुष्यों की परेशानी का कारण बना. अब वापस लौटकर शाह को क्या मुंह दिखाएगा!

‘वह व्यक्ति निश्चय ही मूर्ख और लापरवाह रहा होगा, जिसने पुस्तक में संजीवनी जैसी निराधार और काल्पनिक बूटी का जिक्र किया. जिसके कारण मुझे हजारों मील की यात्रा करनी पड़ी.’ बुर्जोई ने कोसा. वह हताश होकर वापस लौटने का निर्णय कर ही रहा था कि एक विद्वान व्यक्ति के बारे में जानकारी मिली. लोगों ने उसे बताया, ‘यहां एक विद्वान व्यक्ति रहता है, जो वर्षों से हमारा मार्गदर्शन करता आया है. उसके ज्ञान का आकलन करना, समुद्र की थाह लेने जैसा दुष्कर कार्य है. सहायक बुर्जोई को उस व्यक्ति के पास तक ले गए. बुर्जोई ने उसे देखा तो देखता ही रह गया. वृद्ध के चेहरे पर तेज था. होठ लगता थे कि मानो तत्काल कुछ अनोखा कहनेवाले हैं. ऊंचा माथा दर्शाता था कि उसने अपना जीवन ज्ञान की साधना में लगाया है. संजीवनी के बारे में पूछने पर वृद्ध ने बताया, ‘कभी मैंने भी संजीवनी के बारे में पढ़ा था. फिर जीवन का लंबा समय उसकी खोज में बिताया. लेकिन जब कुछ भी हाथ नहीं लगा तो हमने पुस्तक में लिखी बातों को दुबारा समझने की कोशिश की. तब हमने पाया—

‘विज्ञान पर्वत है. वन-वनस्पतियां वैज्ञानिक. उनका प्रभाव कभी कम नहीं होता. बल्कि गुणात्मक आधार पर बढ़ता ही चला जाता है. बिना ज्ञान के जीता-जागता मनुष्य भी मृत समान है. अशिक्षित होना निर्जीव होने के समान है. ज्ञान मनुष्य को पुनर्जीवन देता है. वही मनुष्य प्रसन्न है जो स्वयं को ज्ञान की साधना में लीन रखता है.’ बुर्जोई सम्मोहित होकर वृद्ध व्यक्ति को सुन रहा था. उसने आगे बताया, ‘राजा के खजाने में एक पुस्तक है, जिसे विद्वान ‘कलीला’(पंचतंत्र के पहेलवी अनुवाद का शीर्षक) कहते हैं. लोग जब बौद्धिक शिथिलता और लापरवाही का शिकार होने लगें तो उनके लिए एकमात्र औषध ‘कलीला’ है. संजीवनी ज्ञान का पर्वत है और अमरत्व ज्ञानार्जन की यात्रा.’ वृद्ध व्यक्ति की बातें सुनकर बुर्जोई की खुशी का ठिकाना न रहा. उसकी सारी थकान एकाएक गायब हो गई. साधु का आभार व्यक्त कर वह राजदरबार की ओर लौट पड़ा. दरबार में पहुंचकर उसने सम्राट की अभ्यर्थना की, कहने लगा—

‘हे सम्राट! जहां तक सूर्य का प्रकाश है आपकी कीर्ति वहां तक फैले. आपका प्रताप युगों तक बना रहे. आपके खजाने में एक पुस्तक है, जिसका शीर्षक ‘कलीला’ है. उसे बहुमूल्य वस्तु के समान सुरक्षित रखा गया है. ज्ञान की अमोल निधियां उसमें विद्यमान हैं. असल में वही पुस्तक मनुष्यता की संजीवनी है. यदि आपके लिए बहुत कष्टकारी न हो तो वह पुस्तक मुझे भेंट करने की कृपा करें.’

बुर्जोई की बात सुनकर राजा तमतमा उठा. गुस्से से उसकी देह थरथराने लगी. उसने बुर्जोई से कहा—‘वह पुस्तक मेरी आत्मा और प्राण दोनों हैं. उसको लेकर मैं न तुमपर भरोसा कर सकता हूं, न ही अपने दरबारियों पर. यहां तक कि स्वयं सम्राट नौशेरवां आकर कहें तो भी मैं उसे सौंपनेवाला नहीं हूं. हां, तुम अगर चाहो तो मेरी आंखों के सामने उसे पढ़ सकते हो.’

‘जैसा सम्राट चाहते हैं, वैसा ही होगा.’ बुर्जोई ने आश्वासन दिया.

राजा के आदेश पर खजाने से पुस्तक बाहर लाई गई. अपने साथी सलाहकारों के साथ बुर्जोई उसे पढ़ने लगा. वह पुस्तक को उतना ही पढ़ता था, जितना भली-भांति हृदयंगम कर सके. उससे आगे हरगिज नहीं पढ़ता था. रात को सोने से पहले वह उसको अपनी भाषा में उतार लेता था. बीच में उसने नौशेरवां को पत्र लिखा तो पुस्तक का एक अध्याय भी उसके साथ जोड़ दिया था. इस आशंका से दूर कि वह संजीवनी खोजने निकला था, और भेज रहा है एक पुस्तक का अनुवाद, ऐसे में बादशाह पर क्या प्रतिक्रिया होती है—वह पंचतंत्र रूपी ज्ञान के महासागर में अपनी आत्मा को नहलाता रहा. शाह को उसने जो अंश भेजे थे, उन्हें पढ़कर कुछ दिनों बाद एक पत्र आया, उसमें लिखा था—

‘ज्ञान का महासागर हम तक पहुंच चुका है.’

वापस लौटने के बाद बुर्जोई शाह के दरबार में पहुंचा. शाह की अभ्यर्थना के उपरांत उसने पूछा—‘संजीवनी के स्थान पर पुस्तक को पाकर कैसा लगा?’

बादशाह ने जवाब दिया—‘पुस्तक के बारे में तुमने जैसा सुना था, ठीक ऐसा ही है. उसका ज्ञान मेरी आत्मा को पवित्र कर चुका है.’ इतना कहकर शाह ने अपने खजाने की चाबी बुर्जोई के आगे डाल दी और कहा—‘ईरान का खजाना तुम्हारे आगे खुला है. उसमें से जितना चाहो निकाल सकते हो.’

बुर्जोई ने उत्तर दिया—‘मुझे शाहों के शाह नौशेरवां के दरबार में जगह मिली है. जिसे अच्छे और बुरे की पहचान है. जो विद्वता को सम्मान देता है. मुझे सोना, चांदी अथवा रत्नाभूषण कुछ नहीं चाहिए. फिर भी यदि देना ही है तो….’

‘कहो….हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं है.’

‘शाह मेरी प्रार्थना है कि जब मंत्री बोजोर्गमिर उसकी शाही प्रति तैयार करें, तो मैं चाहता हूं कि उसमें मेरे नाम का भी उल्लेख हो.’

‘अपनी कीर्ति को बनाए रखने के लिए विद्वान पुरुष की इससे महान इच्छा हो ही नहीं सकती.’ शाह ने उत्तर दिया. बुर्जोई के श्रम को देखते हुए उसकी इच्छा मान ली गई. बोजोर्गमिर ने जब पंचतंत्र का शाही संस्करण तैयार किया तो उसमें पहले अध्याय में बुर्जोई का नाम लिखा गया.3

उस समय तक पंचतंत्र को लिखे 800 से अधिक वर्ष बीत चुके थे. हैरानी की बात यह भी है कि भारत के ‘अमृत’ के बारे में दुनिया आठ शताब्दी के बाद जान रही थी. पंचतंत्र की महत्ता असंद्धिग्ध है. मगर भारतीयों की अपने ज्ञान और उपलब्धियों को छिपाकर रखने के स्वभाव के चलते हुआ था. हालांकि इस बीच पंचतंत्र के भारतीय भाषाओं में अनुवाद टीकाकरण आदि हो चुके थे. संस्कृत में तंत्राख्यायिका, दक्षिण भारतीय पंचतंत्र, नेपाली पंचतंत्र, हितोपदेश, सोमदेवकृत कथासरित्सागर, क्षेमेंद्र लिखित बृहत्कथा मंजरी, पश्चिम भारतीय पंचतंत्र, पूर्णभद्र कृत पंचाख्यान आदि ग्रंथों की रचना में पंचतंत्र की सामग्री का आंशिक या पूर्ण रूप से उपयोग किया गया था. लेकिन पंचतंत्र जैसी पुस्तक के आठ सौ वर्षों में मात्र आठ-दस अनुवादों या टीकाओं में सिमटकर रह जाना, उन दिनों भारतीयों की अपने ज्ञान के विस्तार के प्रति उदासीनता को दर्शाता है. हालांकि यह भी हो सकता है कि पंचतंत्र को जो प्रतिष्ठा बाद में, विशेषकर विदेशी भाषाओं में अनुवाद के पश्चात मिली, वैसी उस समय न रही हो. अध्यात्म और दर्शन जैसे गूढ़ विषयों के अध्ययन-अध्यापन में लीन रहनेवाले भारतीय मनीषियों को पशु-पक्षियों की कहानियां बहुत साधारण जान पड़ी हों. श्रेष्ठताबोध के साथ-साथ अपने ज्ञान को छिपाकर रखने, उसको दुनिया की नजरों से बचाए रखने का डर भी संभवतः भारतीयों के मन में था.

यह इस बात से भी स्पष्ट हो जाती है कि भारतीयों को पंचतंत्र के दूसरे अनुवाद, जो सीरियाई भाषा में बुद द्वारा 570 ईस्वी में किया गया था—का पता उनीसवीं शताब्दी में जर्मनी विद्वानों द्वारा चला. कुछ लोगों का कहना है कि बुद द्वारा सीरियाई भाषा में किया गया अनुवाद मूल संस्कृत के पंचतंत्र के सर्वाधिक निकट है. मूल ग्रंथ अप्राप्य होने के कारण यह बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती. लेकिन मूल ग्रंथ अप्राप्य होने के कारण ही उसके अनुवादों का महत्त्व और भी बढ़ जाता है. पंचतंत्र के अनुवादों को लेकर थियोडोर बेन्फी का अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है. विभिन्न अनुवादों का तुलनात्मक अध्ययन कर उसने मूल पंचतंत्र के निकट पहुंचने का सार्थक प्रयास किया है. पंचतंत्र का अगला अनुवाद 750 ईस्वी में सीरियाई भाषा से अरबी में हुआ, अनुवादक थे—अब्दुल्ला इब्नल मोकफ्फा. अरबी अनुवाद को उन्होंने नाम दिया—कलिलह-दिमनह, जो पंचतंत्र के मुख्य पात्र ‘करटक’ और ‘दमनक’ के अरबी रूपांतरण थे. ‘पंचतंत्र’ के यूरोपीय भाषाओं में अनुवादों का सिलसिला अरबी अनुवाद के माध्यम से ही बना.

अरबी अनुवाद से ग्यारहवीं शताब्दी के अंत में सिमियन ने यूनानी भाषा में पंचतंत्र को अनूदित किया. तदनंतर रब्बी जोयल कृत अरबी अनुवाद से 11वीं शताब्दी में ही हिबू्र अनुवाद. 1142 में अबुल मआली नसरल्ला द्वारा अरबी में एक और अनुवाद सामने आया. इसी वर्ष हिब्रू अनुवाद से जा॓न आफ केपुआ ने 1263—1278 लैटिन अनुवाद किया. 1470—1505 के बीच अबुल मआली नरसल्ला के अरबी अनुवाद से पंचतंत्र को फारसी अनूदित किया गया. आगे चलकर इससे तुर्की, फ्रेंच, डच, मलय, चेक, स्पेनिश, जर्मन और हंगारियन भाषाओं में कई अनुवाद हुए. 1483 ईस्वी में एंथानियस वा॓न फर द्वारा जर्मन अनुवाद, 1493 में स्पेनिश, 1546 में इटालियन, 1556 में फ्रेंच, 1570 में टामस नार्थ द्वारा अंग्रेजी तथा 1583 ईस्वी में गियुलियो नुति द्वारा इतालवी अनुवाद संपन्न हुए. 1644 में पंचतंत्र का एक और अनुवाद फ्रांसिसी भाषा में हुआ. आश्चर्यजनक रूप से वह अनुवाद ‘पिलपिली साहब की कहानियों’ के नाम से चर्चित हो गया. फ्रांसिसी लेखक ला॓ फोंतेन ने अपनी पुस्तक ‘फेबल्स’ लिखी थी. 12 खंडों में प्रकाशित उस पुस्तक में कुल 239 जीव-जंतु कथाएं थीं. अपनी कृति के बारे में फोंतेन की आत्मस्वीकृति थी कि उसने अपनी पुस्तक के लिए पशु-पक्षी की कथाओं का अधिकांश हिस्सा महात्मा पिल्पे की कहानियों से लिया है. महात्मा पिल्पे भारतीय लेखक विद्यापति का स्थानीय अपभ्रंश था. 1724 में फारसी के अनवार सुहेली के तुर्की अनुवाद से एक और फ्रांसिसी संस्करण तैयार किया गया, जिसका शीर्षक ‘विदपई की भारतीय कहानियां’ रखा गया. विदपई भी विद्यापति का ही अपभ्रंश था. उसके बाद तो पंचतंत्र के इतने अनुवाद हुए कि उनकी सूची बना पाना कठिन है.

आखिर पंचतंत्र की विश्वव्यापी लोकप्रियता का कारण क्या है? पशु-पक्षियों की कहानियां तो उससे पहले भी लिखी जा चुकी थीं. बल्कि उनका चलन दुनिया-भर के लोकसाहित्य में था. स्वयं भारत में ‘जातक कथाएं’ शीर्षक के अंतर्गत पशु-पक्षियों की कहानियों की भरमार है. पंचतंत्र को मिली अप्रत्याशित लोकप्रियता का कारण एक तो यह है कि ये एक उद्देश्य को समर्पित थीं. जातक कथा या दूसरे ग्रंथों जैसा बिखराब इनमें नहीं था. विष्णु शर्मा एक विचार या नीति की स्थापना के लिए कुछ कहानियां चुनते हैं. और उन्हें एक-दूसरे में इस तरह गूंथते हैं कि हर कहानी विचार को मजबूती प्रदान करती है. किसी विचार के पक्ष में नए-नए तर्क जुटाना भारतीयों के लिए नया नहीं था. वैदिक संस्कृत ने शास्त्रार्थ की परंपरा स्थापित की थी, जिसमें ऐसी बहसें चलती थीं. किंतु उसके लिए कहानियों का सहारा लेना, फिर पिटारे से एक के बाद एक कहानियां निकालते जाना और अंत में वृहद उद्देश्य से जोड़ देना पहली बार पंचतंत्र के रूप में सामने आया था. कहानी की शक्ति का यह पहला, अनूठा और सबसे सार्थक प्रयोग था. पंचतंत्र की रचना उदंड राजकुमारों को रास्ते पर लाने के लिए की गई थी. उसके लिए लेखक ने उस समय के उपलब्ध नीति और व्यवहार ज्ञान के अनुसार कहानियों को एक क्रम में सजाया था. चूंकि जीवन में कुछ भी एकरैखिक या सीधा-सादा नहीं होता, प्रत्येक घटना के तार दूसरी घटनाओं से जुड़े होते हैं. दूसरे शब्दों में प्रत्येक घटना एक भी होती है और अनेक भी. इसी प्रकार पंचतंत्र की कहानियों अलग-अलग होकर भी एक-दूसरे से संबद्ध थीं. जैसे एक घटना का संबंध दूसरी घटना से होता है, वही ‘कार्य-कारण’ संबंध पंचतंत्र की कहानियों में था. यह पंचतंत्रकार की शैली का अनूठापन था, जिसमें मनोरंजन भी था और दर्शन भी. पंचतंत्र की शैली का जादू ही था कि कालांतर में इसे कई बड़े आख्यानों में उपयोग किया गया, जिसका सबसे अच्छा उदाहरण ‘आलिफ लैला’ है.

पंचतंत्र की दूसरी विशेषता इसकी भाषाई सहजता है. पंचतंत्रकार ने जानवरों को कहानी का पात्र बनाया था. इसलिए उन्होंने अनावश्यक पांडित्य से भाषा को मुक्त रखा. पंचतंत्र में व्यावहारिक ज्ञान के लिए एक नीति-संदेश है. लेकिन वह इकहरा नहीं है. बल्कि परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है. जो दिखाता है कि परिस्थितियां भिन्न हों तो नीति का स्वरूप भी बदल सकता है. ऊपर से खूबी यह कि पाठक उसे कहानी के रूप में आत्मसात् करता है. चूंकि पात्र नाकुछ से पशु-पक्षी हैं, इसलिए कहानी के समापन के साथ ही उनका असर फीका पड़ जाता है, रह जाता है वह संदेश जिसको पाठक तक पहुंचाने के उद्देश्य से कहानी को गढ़ा गया है. पंचतंत्र के समय ही एक और महत्त्वपूर्ण कृति की रचना हुई थी, रचनाकार थे, गुणाढ्य और कृति का नाम था—बड्डकहा अथवा बृहत्कथा(350—200ईस्वीपूर्व). पंचतंत्र की भांति मूल ‘बड्डकहा’ भी अनुपलब्ध है. कथासरित्सागर से पता चलता है कि मूल ‘बड्डकहा’ लगभग 350 ईस्वी पूर्व वररुचि ने काणभूति से कही थी और काणभूति ने गुणाढ्य से. गुणाढ्य ने इसका पैशाची में पुनर्लेखन किया. आगे चलकर यह कृति कथासरित्सागर, बृहत्कथामंजरी, हितोपदेश, बृहत्कथाश्लोक संग्रह, वैताल पचीसी, सिंहासन बतीसी जैसी महान कृतियों का आधार बनी. इन सभी पुस्तकों में भारत में सहस्राब्दियों से कही जाने वाली पशु-पक्षियों की कहानियां हैं. इन्हीं के आधार पर विद्वान भारत को परीकथाओं का आदिदेश होने का दावा करते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. पैशाची वाग् मषी रक्तं मौनोन्मत्तश्च लेखकः।
इति राजाऽब्रवीतृ का वा वस्तुसारविचारणां।। बृहत्कथामंजरी—1/87
2. हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य का आदिकाल, पृष्ठ 61.
3. फिरदौसी कृत ‘शाहनामा’ से

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Filed under बड्डकहा (कथासरित्सागर) तथा पंचतंत्र, हिंदी बालसाहित्य : अतीत से आज तक

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