सामाजिक गतिशीलता के अवरोधक

लोकतंत्र और बाजारवाद के लगभग बेमेल से तालमेल ने हमारे समाज को विभ्रमों की स्थिति में ला दिया है. देश में एक ओर राजनीतिक शिथिलता का माहौल है. सत्ताकेंद्रों पर विराजित शक्तियां निर्णयात्मक दुर्बलता की शिकार हैं, वहीं दूसरी ओर बाजार पर पूंजीवादी शक्तियों का कब्जा है. वहां उत्पादों की खपत को लेकर गलाकाट प्रतियोगिता निरंतर बनी रहती है. सीमित संसाधनों के कारण स्पर्धा में पिछड़ रहे छोटे उद्यम तेजी से तबाही की ओर बढ़ रहे हैं. उपभोक्ता सामान की खरीद के लिए प्रलोभनकारी ऋणदाता संस्थाओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति से आम आदमी के भीतर सुख-सुविधाओं का लाभ उठाने की ललक बढ़ी है. इस तरह बाजार का एक लोकलुभावनकारी रूप हमारे सामने है, जो इस समाज को उसकी जड़ों से पूरी तरह काट देना चाहता है. यह नए प्रकार का औपनिवेशीकरण है, जो हमारी स्वतंत्रता पर हमलावर रुख अपनाए हुए है. इनके निशाने पर मनुष्य का आत्मविश्वास और जीवनमूल्य हैं. देश के बुद्धिजीवियों में अपसंस्कृतिकरण को लेकर चिंता व्याप्त है. वे देश की राजनीतिक दिशाहीनता तथा पूंजीवादी शक्तियों के प्रति निर्णय को लेकर असमंजस की स्थिति में हैं. जो लोग सांस्कृतिक अपसंस्करण से जूझने का नाटक कर रहे हैं, वे ठेठ पुरातनवादी हैं. इस समाज को वे वापस सामंतकाल में ले जाना चाहते हैं ताकि लोकतांत्रिक परिवेश के प्रभाव में जनता में जो चेतना जगी है, उसपर काबू पा सके.

ध्यातव्य है कि भारतीय संस्कृति में त्याग, अपरिग्रह, अस्तेय और समानता जैसे मानवमूल्यों को वरीयता दी गई है. परोपकार हमारे उच्चतम मानवमूल्यों में सम्मिलित रहा है. दूसरी ओर आधुनिक कही जानेवाली सभ्यता में इन मूल्यों को कोई स्थान प्राप्त नहीं है. नई सभ्यता त्याग के बजाय भोग को, अपरिग्रह की जगह संग्रह की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाली है. निर-मानवीकरण की यह समूची कवायद लोकतंत्र, व्यक्ति-स्वातंत्र्य जैसे गरिमामय जीवनमूल्यों तथा मानविकी संस्थाओं के नाम पर की जा रही है. अभी तक अहिंसा, परोपकार, अपरिग्रह जैसे नैतिक मूल्यों से आमजन का परिचय कराने तथा उन्हें मनुष्य के आचरण का हिस्सा बनाने के लिए प्रेरित करने की जिम्मेदारी धर्म की थी. कुछ सीमा तक धर्म ने उसका निर्वाह भी किया. फलस्वरूप समाज में धर्म के प्रति स्वीकार्यता निरंतर बढ़ती गई. धर्म का प्रधान कर्तव्य मनुष्य के आध्यात्मिक विश्वास को सहेजे रखना था. लेकिन उसकी बढ़ती स्वीकार्यता के बीच, उसको नैतिकता से जोड़कर सामाजिक अनुशासन और मानवीकरण जैसे काम उससे लिए जाने लगे. जिससे वह धर्म और आस्था दोनों का प्रतीक बन गया. भिन्न देशों में शासन-प्रशासन के नियम भिन्न होते हैं. लेकिन उनके नैतिक मूल्यों में गजब की एकता होती है. इसलिए थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ वे किसी न किसी रूप में दुनिया के सभी धर्मों में पाए जाते हैं. देखने में यह भी आया है कि हाल के वर्षों में लोगों की अपने-अपने धर्म के प्रति आग्रहशीलता जिस तेजी से बढ़ी है, उसी तेजी से धर्म अपने नैतिक मूल्यों से कटा है. चालबाज लोगों द्वारा धर्म की सांगठनिक शक्ति का मनमाना दुरुपयोग जारी है. जीवन में मानव-मूल्यों का उत्तरोत्तर पतन दर्शाता है कि लोग जिन अर्थों में धर्माचरण को अपना रहे हैं, वह दुनिया के किसी भी धर्म की मूल सैद्धांतिकी से काफी परे है. नैतिक मूल्य जो धर्म को वास्तविक अर्थों में प्रासंगिक बनाते हैं, से धर्म को तकरीबन काट दिया गया है. इस तरह धर्म उन अपेक्षाओं से काफी परे है, जिनके आधार पर धर्माचरण को जीवन का उद्देश्य बताया गया है. इसका मुख्य कारण है कि धर्म के प्रचार-प्रसार में जुड़ी शक्तियों का उसके मूल स्वरूप तथा उसको समग्रता में लागू करने से कोई लेना-देना नहीं है. जनसाधारण को धार्मिक प्रलोभनों में फंसाकर वे केवल अपनी स्वार्थ-सिद्धि चाहती हैं. प्रकारांतर में ये सारी कोशिशें राजनीति और बाजार के बड़े से बड़े हिस्से पर कब्जा जमाने के लिए की जा रही हैं.

सामाजिक विभ्रमों के एक छोर पर परंपरा और संस्कृति के प्रति हमारी तीव्र आग्रहशीलता है. उन्हें हम उनकी उसी पुरातनता के साथ स्वीकारना चाहते हैं. ‘प्राचीनतम ही श्रेष्ठतम है’—धर्म और संस्कृति के आकलन का हमारा कुछ यही पैमाना होता है. इसके समानांतर ज्यादा भरोसे और चमक-दमक के साथ मीडिया और बाजार द्वारा परोसा जा रहा सुखवाद है. उल्लेखनीय है कि सुख की लालसा अपने आपमें हेय नहीं है. सुख पुरुषार्थ का संकल्प है. मनुष्य का प्राथमिक उद्देश्य खुद को अधिकतम सुख की स्थिति तक ले जाना है. उसके सारे प्रयास इसी के निमित्त होते हैं. समाज मनुष्य की सुखाकांक्षा की निर्मिति है. किंतु अपने लिए सुख का आयोजन करने के लिए दूसरों के सुख की बलि चढ़ाना नैतिक अपराध है. दूसरों के सुख का ख्याल रखते हुए अपने सुख को बढ़ाते जाना ही मनुष्यता का अभीष्ट है. जान स्टुअर्ट मिल ने इसी को ‘सुख का नैतिक आचरण’ कहा है. इस दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय समाज, विशेषकर नागरी समाज की स्थिति लगभग उलट ही है. सुख की अंतहीन लालसा हमें उत्तरोत्तर व्यक्तिवाद की ओर ले जा रही है. जबकि सामूहिकता में त्राण पाने वाली हमारी परंपरा और संस्कृति व्यक्तिवाद को तब तक पसंद नहीं करती, जबतक उसका ध्येय लोककल्याण न हो. यहां ऋषि-मुनियों की एकांत साधना के सैकड़ों उदाहरण हैं. समाज उन्हें अपने त्राता की तरह याद करता है. इस तरह पूरा समाज अपने ही अंतर्विरोधों के बीच संघर्ष और तनाव की स्थिति में जी रहा है. जाहिर है, इन अंतर्विरोधों का प्रतिगामी प्रभाव सामाजिक गतिशीलता पर भी पड़ा है.

किसी समाज के अपने ही अंतर्विरोधों से जूझने और तथा उनमें खप रही ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने की योग्यता ही उसके विकास की धारा को तय करती है. एक सचेतन समाज अंतर्विरोधों में खप नही ऊर्जा का इस्तेमाल अपने निर्माण के लिए करता है. लेकिन अंतर्विरोधों से सर्वथा-मुक्ति किसी भी समाज के लिए संभव नहीं होती. बात बहुत कुछ बौद्ध दर्शन के दुख के सिद्धांत से मेल खाती है. जिसके अनुसार दुख है, दुख का कारण है और उससे मुक्ति का मार्ग भी है. लेकिन दुख से मुक्ति के लिए सार्थक प्रयत्न भी आवश्यक हैं. समाज में रहते हुए अंतर्विरोधों से पूर्ण मुक्ति भले ही संभव न हो, उनसे निरंतर संघर्ष करते हुए स्थितियों का अपने पक्ष में अनुकूलन अवश्य किया जा सकता है. इसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति और समाज दोनों में अपने अंतर्विरोधों से जूझने तथा उनके कारणों को पहचानने की भरपूर क्षमता हो. जागरूक समाज अपने अंतर्विरोधों को पहचानकर उसमें खप रही ऊर्जा का उपयोग अपने विकास के लिए करता है. जब कोई समाज अपने अंतर्विरोधों को पहचानने लगता है तो देर-सवेर उनसे त्राण के रास्ते खोज ही लेता है.

आजादी के बाद जिस तेजी से हमारा समाज विकास की ओर बढ़ा, सामाजिक अंतर्विरोधों की वृद्धि-दर अपेक्षाकृत ज्यादा रही है. हमारी समस्या है कि हम अपने अंतर्विरोधों को पहचानकर उन्हें अपने हितानुकूल दिशा देने में नाकाम रहे हैं. हमारी सामाजिक असफलताओं और भटकावों का यह मुख्य कारण है. सामाजर्थिक मोर्चे पर असफल रही सरकारें सत्ता में बने रहने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाती हैं, जो मानव-अस्मिता के लिए नुकसानदेह सिद्ध होते हैं. गौरतलब है कि सरकारें चाहे लोकतांत्रिक हों या सामंतवादी विचारधारा का अनुसरण करने वाली, भले ही वे तानाशाह के इशारों पर नाचनेवाली क्यों न हों—जनमत से हमेशा घबराती हैं. गैरलोकतांत्रिक और अकल्याणकारी सरकारों के समक्ष जनविद्रोह की संभावना सदैव बनी रहती है. अतएव सत्ता-शिखर पर विराजमान रहने के लिए ऐसी सरकारें, जनभावनाओं का अधिकाधिक दोहन करती हैं. वास्तविक समस्याओं की ओर से जनता का ध्यान हटाने के लिए ऐसे मुद्दे बार-बार उछाले जाते हैं जिनपर बुद्धि के बजाय भावना-प्रधान निर्णयों की आवश्यकता पड़ती है. उसके लिए संचार-तंत्र पर कब्जा कर उसकी जनोन्मुखता को बाधित किया जाता है. आंतरिक और बाह्य खतरों का हवाला देते हुए, जनता के बीच कृत्रिम भय का माहौल पैदा किया जाता है. जिनसे पूरा समाज अधैर्य और अविश्वास के माहौल में जीने को बाध्य हो जाता है. सामाजिकता छिन्न-भिन्न होने लगती है. परिणामतः सामाजिक चेतना आंतरिक संघर्षों, निरर्थक विवादों में पड़कर प्रभावशून्य हो जाती है. इस तरह अक्षम सरकारें सामाजिक अंतर्विरोधों की खाई को पाटने के बजाय ‘येन-केन-प्रकारेण’ उनका उपयोग सत्ता को बनाए रखने के लिए करती हैं.

दोष जनता का भी है. स्वाधीनता संग्राम के दौरान उसने जिस राष्ट्र-प्रेम, एकता और आत्मविश्वास का परिचय दिया था—आजादी मिलते ही उससे किनारा कर खुद को पूरी तरह से नेताओं के हवाले कर दिया. मामूली बातों के लिए भी सरकार का मुंख देखने लगी. उसने सरकार को स्वयं से ऊपर मान लिया. जबकि लोकतंत्र में सरकार की उपस्थिति ऐसी होनी चाहिए कि उसकी प्रतीति तक न हो. उसे सही मायने में जनता की चेरी होना चाहिए. इसका निहितार्थ है कि केवल, ‘श्रेष्ठ जनता ही श्रेष्ठ शासन दे सकती है’—तो जनता की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है. श्रेष्ठतव की प्राप्ति के लिए उसे आत्मपरीक्षण, पुनःजागरण के दौर से निरंतर गुजरते रहना पड़ता है. भारत में आजादी मिलते ही जनता ने अपनी शक्ति और सामर्थ्य को बिसरा दिया था. परिणामस्वरूप उसे उसी तंत्र की मनमानी का शिकार होना पड़ रहा है, जिसे उसने अपने भले के लिए खड़ा किया था. हमारे समय और समाज यह भारी विडंबना है.

स्वाधीन भारत में हम अकसर अपनी सार्वजनिक असफलताओं और भटकावों के प्रति चिंतित दिखते हैं. इसके बावजूद यह सिलसिला थमा नहीं है. इसलिए कि स्वतंत्र भारत में सामाजिक पुनर्निर्माण के लिए हमने जो विकल्प अपनाए उनके प्रति हम स्वयं एकमत नहीं थे. हमारे नेताओं और बुद्धिजीवियों पर यूरोप की छाप थी, सो उन्होंने उधार के पैटर्न को विकास का माध्यम बनाया, जिसमें जनता की कोई भागीदारी नहीं थी. केवल उसका उपयोग हो सकता था. सो आजादी के बाद जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा जनता का उपयोग कभी सस्ते श्रम, तो कभी उपभोक्ता के रूप में होता रहा. दूसरी ओर शीर्षस्थ वर्ग जो पहले अंग्रेज सरकार के समर्थन में था और उनकी निकटता का लाभ उठाता था, वह स्वतंत्र भारत में भी अपनी उसी हैसियत को बनाए रखना चाहता था. यह तभी संभव था जब जनता का विश्वास जीत सके. इसके लिए वह नए रूप में सामने था.

आधुनिक तकनीक के साथ गति शब्द सहज ही जुड़ चुका है. वेगवान होना उसकी विशेषता है. यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो हाल की दो शताब्दियों में इतने परिवर्तन एकसाथ देखने को मिले हैं, जितने उससे पहले पूरी सहस्राब्दी में संभव नहीं थे. सवाल है कि किसी समाज का प्रौद्योगिकीय विकास क्या सचमुच उसे आगे ले जाता है. यह तो सच है कि तकनीक ने जीवन को गतिशील बनाया है. आज इंटरनेट, मोबाइल, टेलीफोन जैसे त्वरित संसाधन हैं जो पल-भर में सूचनाओं को इधर से उधर कर सकते हैं. सवाल है कि क्या तकनीक-प्रदत्त गतिशीलता को सामाजिक गतिशीलता माना जा सकता है. अथवा कालखंड विशेष में सामाजिक विकास की दर क्या विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र की विकास दर क्या बराबर होती है? यह सच है कि पश्चिमी देशों में विकास का श्रेय वहां तकनीकी और प्रौद्योगिकीय क्रांति को जाता है. फिर भी यह बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती कि उसका लाभ बिना किसी भेदभाव के, समाज के सभी लोगों को एक-समान मिला है. तकनीक की उपयोगिता के आकलन का एक मापदंड यह भी हो सकता है कि उससे जनसाधारण को कितना लाभ पहुंचा है? आम आदमी के जीवन-स्तर को ऊपर उठाने में उसका कितना योगदान रहा है. लेकिन तकनीक विकास के आकलन की यदि यह पद्धति अपना ली जाए तो आधुनिक विज्ञान के अधिकांश बड़े उत्पाद उपयोगिता के आधार पर धूल चाटते हुए नजर आएंगे. गौरतलब है कि उच्च तकनीक ने समाज को तीन टापुओं में बांट दिया है. एक टापू उन लोगों का है जो चांदी की चम्मच के साथ जन्मते हैं. अपने पूंजीबल से दुनिया के उत्पादकता को प्रभावित करने में सक्षम होते हैं. ऐसे लोगों का ज्ञान से सीधा वास्ता भले न हो, मगर व्यावहारिक कौशल में दूसरे वर्गों से कहीं आगे होते हैं. दूसरे टापू पर पढ़े-लिखे, तकनीक शिक्षा संपन्न होते हैं. जो पहले वर्ग के लोगों के लिए भोज्य सामग्री और उसका मनोबल बनाए रखने का काम करते हैं. संख्या के मामले में तीसरे टापू पर बसे लोग अधिक संख्या में होते हैं. वे न तो इतनी बुद्धिकौशल से संपन्न होते हैं कि सीधे किसी को प्रभावित कर सकें. पहले वर्ग द्वारा तीसरे वर्ग का उपयोग उपभोक्ता के रूप में किया जाता है. उसे यह समझाने की कोशिश की जाती है कि उत्पादन का सारा दारोमदार उसी पर होता है. यह बात इतने प्रभावी ढंग से समझाई जाती है कि बहुत जल्दी अप्रासंगिक होने लगती है.

यहां कोई भी शंका कर सकता है कि सोवियत संघ के विकास का मा॓डल तो मौलिक था. फिर वह क्यों तबाह हुआ? प्रश्न अपने आप में बड़ा महत्त्व का है. सोवियत संघ का गठन रक्त-क्रांति के माध्यम से हुआ था. उसमें किसान और श्रमिक संगठनों की समान भागीदारी थी. उसके फलस्वरूप सोवियत समाज में समानतावादी द्रष्टिकोण तो पनपा, मगर व्यक्ति-स्वातंत्र्य को वहां पूरी तरह उपेक्षित रखा गया. अभिव्यक्ति की आजादी को तरह-तरह से बाधित किया गया. व्यक्तिवाद को पूंजीवाद का मददगार मानकर उससे किनारा कर लिया गया. मनुष्य समाज में अपने सुख के लिए सम्मिलित होता है. प्रबुद्ध होते विकासमान समाज में वह अपने सुख और स्वतंत्रता में भी वृद्धि होते देखना चाहता है. स्वतंत्रता के अभाव में उसे अपना हर सुख अधूरा लगने लगता है. सोवियत संघ में भी यही हुआ था. लोगों को साम्यवादी शासन एक दलीय तानाशाही लगने लगी थी. परिणाम यह हुआ कि ऊपर से एक दिखनेवाले समाज में भीतर ही भीतर आक्रोश पनपने लगा. सरकार के अंतर्विरोध उनके सामने आने लगे थे. 1991 में जनता को जैसे ही अवसर मिला, उसने साम्यवाद के पहले प्रयोग से तौबा कर ली. लोहिया का कथन सत्य हुआ. सोवियत संघ के पतन जो अवश्यंभावी घटना मानते थे. कालांतर में पूंजीवाद दबे पांव रूस में कदम रखने लगा. अमेरिका का धुर विरोधी रहा देश आर्थिक नीतियों के मामले में उसी के नक्शेकदम पर संशोधन करने को विवश हो गया. यह अपने आप में भारी विसंगतिपूर्ण घटना थी.

भारत ने भी पश्चिम की ताकतों के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया था. विकास के नाम पर फिर पश्चिमी देशों की राह पकड़ लेना, कहीं न कहीं हमारे आत्मविश्वास को चुनौती देता था. भारत ने स्वाधीनता अपने ढंग से प्राप्त की थी. सो देश के पुनर्निर्माण का रास्ता भी अपने ढंग का, बाकी सबसे अलग होना चाहिए था. महात्मा गांधी ने इसकी ओर संकेत भी किया था. मगर कांग्रेस के, गांधी के काफी करीबी सत्ता-सुख को उतावले नेताओं ने उनकी सलाह को अनसुना कर दिया गया. भारत को आजादी अहिंसक क्रांति के दम पर प्राप्त हुई थी. स्वतंत्रता संग्राम में गांधीजी का साथ देने वे साधारण लोग आगे आए थे, जिन्हें समाज किसी न किसी बहाने उत्पीड़ित करता आया था. भारत की आजादी में उन साधारण सूरमाओं के योगदान की अवहेलना संभव ही नहीं है. इसीलिए आजाद भारत के संविधान में व्यक्तिमात्र के हितों और स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए पर्याप्त गारंटी की व्यवस्था की गई. मगर व्यवस्था बनाने और व्यवस्थित करने में रात और दिन का अंतर है. शासन-प्रशासन के स्तर पर शिथिलता बढ़ी तो आजादी उल्टे पांव चलती नजर आने लगी. आम आदमी को लगने लगा कि सत्ता पर काले अंग्रेजों ने कब्जा जमा लिया है. उनपर कोई जोर न चलता देख त्राण के लिए पंडा-पुजारियों की शरण में जाने लगे. भूल गए कि निचले वर्गों आजादी का लाभ न पहुंचने का कारण केवल ऊपर के वर्गों की मनमानी नहीं, निचले समूहों में व्याप्त उदासीनता भी होती है. सोवियत संघ में सामाजिक-राजनीतिक समानता का अधिकार देकर अभिव्यक्ति की समानता का अधिकार छीन लिया गया था, यहां अभिव्यक्ति का अधिकार था, लेकिन सामाजिक स्तर पर मनुष्य के आगे अनेक प्रकार के बंधन थे, जिससे राजनीतिक आजादी को सामाजिक स्वतंत्रता में बदलना असंभव प्रतीत होने लगा था. भारतीय राजनीति की विडंबना है कि इस तरह की कोशिशें भी कम रहीं. बल्कि ओछी राजनीति के चलते नेताओं को जब लगा कि लोगों को जाति और धर्म के नाम पर फुसलाया जा सकता है, तो उसी को हथियार बनाया जाने लगा.

भारतीय समाज, जैसा कि हम सभी जानते हैं, विभिन्न संस्कृतियों, सभ्यताओं का संकुल है. दूसरे समाजों की अपेक्षा हमारे समाज की अंतःरचना कहीं अधिक जटिल और बहुआयामी है. ध्यातव्य है कि आज से डेढ़-दो-सौ वर्ष पहले तक पश्चिमी समाज भारतीय समाज की भांति सामंतवाद जैसी कुरीतियों, रूढ़िवाद आदि से ग्रस्त थे. लेकिन बाद के वर्षों में आई औद्योगिक-सामाजिक और वैचारिक क्रांति के फलस्वरूप वे अपना कायाकल्प करने में सक्षम सिद्ध हुए. जबकि अपनी नीतिगत दुर्बलताओं के चलते भारतीय समाज आज भी सामंतवादी प्रवृत्तियों से त्रस्त है. लोकतंत्र अभी तक हमारे आचरण का स्वाभाविक हिस्सा नहीं बन पाया है. ऐसे में समाज में अंतर्विरोधों का होना अस्वाभाविक घटना नहीं है. सच यह भी है कि सामाजिक अंतर्विरोधों की जड़ें बहुत गहरी और परंपरा से अभिसिंचित होती हैं. उन्हें एकाएक दूर कर पाना संभव नहीं होता है. जैसा कि ऊपर के आकलन से स्पष्ट है, सामाजिक अंतर्विरोधों के जन्मदाता कारक धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, स्पष्ट-अस्पष्ट किसी भी प्रकार के हो सकते हैं. अंतर्विरोधों का समापन तो महात्मा गांधी जैसे महानायक भी नहीं कर पाए थे. उन्होंने जनता का विश्वास जीतकर अंतर्विरोधों को किसी सीमा तक निष्प्रभ अवश्य कर दिया था.

सामाजिक गतिशीलता के भारतीय संदर्भों को समझने के लिए हमें अपने समाज के वर्गीय चरित्र को भी समझना पड़ेगा. जिसकी सामाजिक अंतर्विरोधों को उभारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है. स्वाधीन भारत में लोकतांत्रिक प्रणाली का चयन इस उम्मीद के साथ किया गया था कि यह समाज के सभी वर्गों को विकास के एक समान अवसर उपलब्ध कराएगी. जिससे समाज में सहअस्तित्व की भावना का विकास होगा. समाज के अप्रासंगिक हो चुके समाज के परंपरागत वर्गीय ढांचे में बुनियादी परिवर्तन आएगा. यह सोच बुरा नहीं था. जनसाधारण इसी उम्मीद के साथ स्वाधीनता-समर में उतरा था, किंतु सहस्राब्दियों से सामंतवाद के साये में जीती आई अशिक्षित और गरीब जनता को जिस लोकतांत्रिक प्रशिक्षण की आवश्यकता थी, उसके लिए गंभीर प्रयास कभी नहीं किए गए. सामाजिक समरसता के लिए कोई प्रभावकारी प्रयास सरकार या राजनीतिक दलों द्वारा नहीं किया गया.

संभवतः यह सब लोकतंत्र से अधिक अपेक्षाओं के चलते हुआ. हमने मान लिया कि लोकतांत्रिक प्रणाली सामाजिक परिवर्तनों को अनुकूल दिशा देगी. सत्ता हस्तांतरण के साथ लोकतंत्र समाज के वर्गीय चरित्र में भी अनुकूल बदलाव लाने में सक्षम सिद्ध होगा. देखा जाए तो यह वांछा अनुचित भी नहीं थी. किंतु असमान वितरण, गरीबी और अशिक्षा से ग्रस्त समाज में ऐसी संस्थाओं, सिद्धांतों का जो हश्र होता है, वही भारत में लोकतंत्र का हुआ. सच तो यह है कि सहस्राब्दियों से सत्ता के शिखर पर विराजमान रही शक्तियों की, जनता तक वास्तविक सत्तांतरण की कोई इच्छा ही नहीं थी. यहां हमारा मकसद लोकतंत्र को भारतीय संदर्भ में अप्रासंगिक सिद्ध करना नहीं है. लोकतंत्र आज भी शासन की बेहतरीन प्रणाली है. लेकिन यह एक राजनीतिक प्रणाली है. एक राजनीतिक प्रणाली सामाजिक प्रणाली की भूमिका को निभाए ऐसी कामना करना ही फिजूल है. चूंकि ऐसी उम्मीदें हम बहुत पहले ही बांध चुके थे, इसलिए उसका खामियाजा हमें आज तक भुगतना पड़ रहा है.

अनुभव सिखाते हैं कि सत्ता का हस्तांतरण समग्र सामाजिक परिवर्तन, वास्तविक परिवर्तन का विकल्प कभी नहीं बन सकता. गांधीजी इस तथ्य को भली-भांति समझते थे. इसलिए आजाद भारत में उन्होंने कांग्रेस को सलाह दी थी कि वह राजनीति का मोह छोड़कर सामाजिक चेतना लाने के लिए आवश्यक कदम उठाए. लेकिन सत्ता के लिए उतावले कांग्रेसी नेताओं ने गांधीजी की सलाह को ठुकरा दिया. हाल के वर्षों में समाज में राजनीतिक चेतना बढ़ी है. विशेषकर आम आदमी पार्टी के उभार के बाद से लोगों में जनतांत्रिक उभार एकदम साफ नजर आ रहा है. एक तरह से यह भी भारत में प्रबुद्ध होते लोकतंत्र का लक्षण है. यह और भी लाभकारी भी होता, बशर्ते राजनीतिक समानता के साथ-साथ सामाजिक समानता पर भी उतना ही जोर दिया जाता. लोकतांत्रिक समानता का विचार समाज के रोजमर्रा के व्यवहार पर भी उसी तरह लागू होता. फलस्वरूप जाति-बंधन शिथिल पड़ते तथा धर्म के नाम पर होने वाली राजनीति को सदा-सदा के दफनाया जा सकता. उल्लेखनीय है कि भारतीय जनमानस के वर्गीय चरित्र का लाभ उठाने हेतु विभिन्न पूंजीवादी और राजनीतिक शक्तियां, संस्कृति और अन्य सामाजिक प्रकल्पों की अपने स्वार्थानुकूल व्याख्या करती रही है. ये शक्तियां संचार माध्यमों का अनुचित या सीमित संदर्भों में उपयोग करते हुए, दीर्घकालिक लाभों के लिए शुरू किए गए आंदोलनों को अल्पकालिक लाभों तक सीमित करने में सफल हो जाती है. बढ़ते रोजगार अवसरों के बावजूद आरक्षण और आरक्षण में से आरक्षण, आर्थिक आधार पर आरक्षण जैसी व्यवस्थाओं को ऐसी ही कोशिशों के रूप में लिया जाना चाहिए. ऐसे अल्पकालिक लाभ व्यवस्था में युगांतरकारी आमूल परिवर्तन करने, सामाजिक अंतर्विरोधों की खाई को पाटने में अक्षम सिद्ध होते हैं.

विडंबना है कि सत्ता-शीर्षों पर विराजमान शक्तियां इन अल्पकालिक परिवर्तनों को भी अपने अस्तित्व के संकट के रूप में देखती हैं. इसलिए वे उन प्रणालियों से जो इन परिवर्तनों के मूल में कार्यरत हैं, या तो उदासीन हो जाती हैं अथवा उनका उपयोग अपने निहित स्वार्थों के लिए करने का प्रयत्न करती हैं. जिससे उन प्रणालियों में भीतरी और बाहरी अंतर्विरोध पनपने लगते हैं. परिणामतः सामाजिक विकास की गति अवरुद्ध होती है. और वह वर्ग जो विकास से अछूता रहा है, कुंठा तथा असंतोष का शिकार होने लगता है. सामाजिक आंदोलनों की गैर मौजूदगी में परिवर्तन की लालसा इस वंचित वर्ग को राजनीति की शरण में ले आती है. यही कारण है कि आम चुनावों के दौरान जहां अभिजात वर्ग में मतदान के प्रति गहरी उदासीनता व्याप्त रहती है, वहीं सत्ता से वंचित वर्ग में इन्हें लेकर उत्सव जैसा माहौल रहता है. दक्षिणी दिल्ली की पाश कालोनियों और शेष दिल्ली की झुग्गी-झौपड़ी बस्तियों में मतदान के प्रतिशत में भारी अंतर से यह परिवर्तन साफ देखा जा सकता है. यह बात अलग है कि स्वार्थी और अक्षम राजनेता जनसामान्य की परिवर्तन के प्रति इस स्वाभाविक ललक का भी भावनात्मक दोहन करते हैं. और बड़ी चालाकी से वे मतदाताओं का ध्यान जनहित के सामान्य मुद्दों से हटाकर वर्गीय और स्थानीय मुद्दों तक ले आते हैं. इस तरह जनतंत्रीय और वैज्ञानिक सोच को परंपरा और रुढ़ि में ढाल देने की कोशिशें उतनी ही तेजी से चलती रहती हैं, जितनी किसी समाज को अंधविश्वास और वर्गीय चरित्र से मुक्त कराने के प्रयास. सामाजिक विकास की प्रक्रिया इन्हीं के द्वंद्व से संपन्न होती है.

सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों में धर्म और प्रौद्योगिकी भी सम्मिलित हैं. उत्पादन प्रणाली में प्रौद्योगिकी तथा अन्य कारणों से सामाजिक जटिलताओं को जन्म देती है. प्रौद्योगिकी का अपरिष्कृत यानी कम जटिल रूप मनुष्य को मनुष्य के करीब लाने में सहायक था. अभी कुछ दशक पहले तक लुहार, बढ़ई आदि ग्रामीण शिल्पकार अपनी निम्न सामाजिक-आर्थिक प्रस्थिति के बावजूद ग्रामीण समाज-व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण हिस्सा माने जाते थे. इनमें से यदि एक भी कम पड़ जाए तो उसको बाहर से लाकर बसाया जाता था. प्रौद्योगिकी विकास का प्रारंभिक दौर उत्पादन प्रक्रिया में श्रम घटाने और उसको आरामदेय बनाने पर जोर देता था. जबकि अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी को मानवीय श्रम और उसके तकनीकी कौशल की ज्यादा परवाह नहीं होती. स्वचालीकरण की अधुनातन कोशिशें उत्पादन प्रक्रिया का शत-प्रतिशत मानवीकरण करने पर उतारू हैं. ऊपर से नवीन आविष्कारों पर समाज के मुट्टी-भर लोगों का नियंत्रण तथा उससे होने वाले लाभ का वर्ग विशेष तक सिमटकर रह जाना, कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के सर्वथा विरुद्ध है. प्रौद्योगिकी का सीमित हितों के लिए उपयोग समाज की मेधा के उपयोग को एकतरफा बना देता है. सामाजिक असंतोषों में वृद्धि का यह भी एक कारण है. इसका आशय यह नहीं है कि नई प्रौद्योगिकी को अपनाया ही न जाए. विकास की चुनौतियों और सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए नई प्रौद्योगिकी की उपयोगिता किसी से छिपी नहीं है. किंतु उसका उपयोग ऐसा होना चाहिए, जिससे समाज में किसी भी प्रकार के एकाधिकार अथवा वर्चस्ववाद में वृद्धि न हो और प्रौद्योगिकीय विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों को बिना किसी भेद-भाव के प्राप्त हो सके.

प्रौद्योगिकी के साथ-साथ धर्म भी सामाजिक गतिशीलता पर प्रतिकूल असर डालनेवाला प्रमुख कारक है. धर्म यद्यपि व्यक्ति की निजी अवधारणा तक सीमित होता है. किंतु इसका सामूहिकीकरण कभी-कभी आक्रामकता को बढ़ाने वाला भी सिद्ध होता है. प्रकट में हर धार्मिक संप्रदाय यही मानता और घोषणा करता है कि सभी धर्मों का मूल स्वरूप एक जैसा है. किंतु वास्तविकता इस समतावादी द्रष्टिकोण से सर्वथा भिन्न होती है. समूह के रूप में धर्म शक्ति का प्रतीक होता है. अतः शक्ति-केंद्र में सर्वोपरि स्थान पाने की लालसा प्रायः सभी धर्मावलंबियों की होती है. इस कारण विधर्मी को उसकी इच्छा या अनच्छिा से अपने धर्म या संप्रदाय में खींच लेने की प्रवृत्ति प्रायः सभी समाजों में पाई जाती है. धर्मांतरण को विकास का प्रतीक बताकर सामूहिक धर्मांतरण की कोशिशें प्राचीनकाल से ही दुनिया-भर में होती रही हैं. किंतु आध्यात्मिक निष्ठा में परिवर्तन और तदनुरूप स्वयं-स्फूत्र्त धर्मांतरण के मामले बहुत कम देखे जाते हैं. जो हिंदू से मुसलमान बनते हैं, या मुसलमान से हिंदू धर्म की ओर आते हैं, वे इसलिए नहीं कि इस्लाम का भ्रातृत्व या हिंदू धर्म की दार्शनिक गहनता उन्हें अपनी ओर खींचती है. प्रायः सत्ताकेंद्रों के निकट बने रहने की लालसा ही धर्मांतरण का कारण रही है. दूसरी ओर अपवादस्वरूप ही सही ऐसे महामानव भी दुनिया-भर के देशों में हुए हैं, जिन्होंने धार्मिक आस्था और विश्वास खुशी-खुशी बलिदान किया है.

धर्म, राजनीति और प्रौद्योगिकी आदि के लाभों का वृहत्तर समाज के लाभ के बजाय अल्प समूहों तक सिमटकर रह जाना, समाज में व्याप्त गरीबी, अशिक्षा, जनसामान्य की भाग्यवादिता और सक्रिय बचाव की प्रवृत्ति के कारण ही संभव हो पाता है. जनसामान्य की यही कमजोरियां स्वार्थी शक्तियों को मनमानी करने की प्रेरणा देती हैं. वहीं वे समाज के भीतर आक्रोश एवं कुंठा भी जगाती हैं. जो अंततः अंतर्विरोधों को बढ़ावा देनेवाली सिद्ध होती है. बहरहाल, अब तक की तमाम निराशाओं के बावजूद भारतीय समाज में चल रही उथल-पुथल यह विश्वास जगाती है कि हम कोई जड़ समाज नहीं हैं और जब तक समाज के वंचित और उत्पीड़ित जन की आंखों में असंतोष और सुनहरे कल का सपना शेष है, तब तक सामाजिक परिवर्तनों की धारा को न तो कोई रोक पाएगा, न ही इनकी दिशा बदलने की कोशिशें लंबे समय तक कामयाब हो पाएंगी. हां उतार-चढ़ाव जरूर संभव हैं, मगर वे तो विकास की स्वाभाविक लक्षण होते हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

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