अराजकतावादी दर्शन और केजरीवाल का ‘स्वराज’

ऐसा चाहूं राज मैं यहां मिले सभन को अन्न
छोटे-बड्डे सभ सम्म बसें, रविदास रहे प्रसन्न
रविदास

अरविंद केजरीवाल स्वयं को अराजकतावादी मानते हैं. उनकी नीयत पर संदेह करने की मेरी कोई मंशा नहीं है. कुछ दिनों पहले उनके द्वारा केंद्र सरकार के विरोध में दिए गए धरने और जनलोकपाल बिल को लेकर केंद्र को चुनौती देने, गैस दोहन जैसे मामलों में मुकेश अंबानी सहित तीन केंद्रीय मंत्रियों के विरुद्ध एफआईआर की सिफारिश करने जैसे मामलों से उन्होंने सिद्ध भी किया है कि वे लोकतंत्र के परंपरागत ढांचे में विश्वास नहीं करते. अपनी मांगों के समर्थन अति की सीमा तक जा सकते हैं. मैं यह भी कहना चाहता हूं कि जनतंत्र में जिदें नहीं जनसहमति चलती है. इसके बावजूद यदि केजरीवाल स्वयं को अराजकतावादी मनवाने पर तुले हैं, तब मेरे सामने यह मान लेने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है कि खुद को अराजकतावादी घोषित करने अथवा वैसा आचरण करने से पहले उन्होंने इस दर्शन को भली-भांति पढ़ लिया होगा. मेरी अपेक्षा अन्यथा भी नहीं है. वे विनम्र हैं, सुशिक्षित हैं. जनलोकपाल आंदोलन तथा चुनावी सभाओं में भाषण के जरिये उन्होंने लोगों के मन पर जो छाप छोड़ी है, उससे इसमें कोई संदेह नहीं कि वे पूर्ण अराजकतावादी भले न हों, किंतु लोकतांत्रिक आस्था से गहरे जुड़े हैं. यदि यह निष्ठा आगे भी बनी रही तो जनता का प्यार और विश्वास निस्संदेह आगे भी उनमें बना रहेगा. जिद और संकल्प के बीच न्यूनतम दूरी रखने की उनकी राजनीतिक शैली को देखकर अराजकतावाद नए सिरे से विमर्श में आया है. यह बात अलग है कि कतिपय पूर्वाग्रहों के कारण हमारे यहां अ-राजकता को अच्छे अर्थों में नहीं लिया जाता. प्रायः उसे अव्यवस्था, अशांति, उपद्रव-ग्रस्त राज्य तथा शासन की नाकामी का पर्याय मान लिया जाता है. ऐसे में यदि कोई मुख्यमंत्री स्वयं को खुलेआम अराजकतावादी कहता है, तो वह अलोकप्रिय होने का खतरा उठाता है. साथ ही विपक्षी दलों को अवसर देता है कि अराजकता और अराजकतावाद के बारे में प्रचलित जन-पूर्वाग्रहों का लाभ उठाकर उसकी छवि को मलिन करने की कोशिश कर सकें. इस आधार पर केजरीवाल की खूब आलोचना भी हुई है. लेकिन यहां बात व्यक्तिगत प्रशंसा या आलोचना की नहीं, अराजकतावाद को लेकर है. अराजकतावाद अंग्रेजी राजनीतिक दर्शन ‘अनार्की’ का पर्याय है. जिसका सामान्य अर्थ है—‘बिना राजा का राज्य.’ यह विचार लगभग उतना ही पुराना है, जितना समाज. यह आश्चर्यजनक सत्य जैसी स्थिति है कि अ-राजकता राज्य से पहले ही अवस्था है. अराजकतावाद के आलोचक यह भी भूल जाते हैं कि लाला हरदयाल, सरदार भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के अलावा गांधी और जयप्रकाश नारायण जैसे बड़े नेता जिनकी लोकतांत्रिक निष्ठा असंद्धिग्ध थी, ने भी स्वयं को समय-समय पर अराजकतावादी घोषित किया था. क्रांतिकारी ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए अराजकतावाद का नारा देते थे तो गांधी समेत आधुनिक नेता सर्वसाधारण से अपनी निकटता तथा उसके कल्याण से जुड़े मुद्दों के प्रति अपनी निष्ठा दर्शाने के लिए स्वयं को अराजकतावादी कहने का खतरा उठाते थे. प्रश्न उठता है कि क्या सचमुच अराजकता या अराजकतावाद अशांति, अव्यवस्था और सामाजिक उच्छ्रंखलता का प्रतीक है? क्या शासन के अधीन, चिर-शासित रहना ही मानव-नियति है?

राजनीतिक दर्शन के रूप में अराजकतावाद लोकतंत्र जितना ही पुराना, किंतु जनोन्मुखता को लेकर उससे आगे का परमलोकतंत्रवादी दर्शन है. यह मनुष्य की अच्छाई पर भरोसा करता है. मानता है कि मनुष्य मूलतः निष्कपट, न्यायप्रिय, शांतिप्रिय और विवेकवान प्राणी है. यदि उसके व्यवहार में गिरावट आती है, तो उसके पीछे समाज में व्याप्त असमानता, अविश्वास और अन्यायकारी स्थितियां हैं. परिस्थितियां अनुकूल हों, समाज में न्यायकारी और समानतापूर्ण वातावरण हो तो प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन को शांतिपूर्वक ढंग से बिताना पसंद करेगा. ऐसे में बाहरी शासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. अराजकतावादी मानते हैं कि शासन अथवा कानून के नाम पर राज्य की उपस्थिति जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप है. ताकत का प्रतीक होने के कारण उसका झुकाव शक्तिशाली वर्गों की ओर होता है. इससे जनसाधारण के लिए मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं. उल्लेखनीय है कि शासन को लेकर यह समझ आज नहीं बनी. ईसापूर्व छठी शताब्दी में जन्मा चीनी विद्वान लाओत्से अराजकतावादी था. उसके शिष्य झुआंग्जी ने राजशाही और दूसरे सर्वसत्तावादी तंत्रों की आलोचना करते हुए लिखा था कि न्याय और कानून के नाम पर गठित अतिवादी राज्य, ‘मामूली चोर को जेल में डाल देता है, जबकि बड़े-बड़े डाकू, बटमार खुलेआम घूमते रहते हैं.’ पश्चिम के देश भी अराजकतावाद(अनार्की) की प्रशंसा के मामले में पीछे नहीं हैं. अराजकतावाद के उद्गम की खोज करते ‘क्रिश्चन अनार्किस्ट’ ईसा मसीह तक चले जाते हैं. जार्ज बुडकाक ने अपनी पुस्तक ‘अनार्किस्म: ए हिस्ट्री आ॓फ लिबरटेरियन आइडियाज एंड मूवमेंट’ में फ्रांसिसी इतिहासकार जार्ज लेकार्शियर को उद्धृत करते हुए लिखा है, ‘अराजकतावाद के वास्तविक संस्थापक ईसा मसीह थे. प्रथम अराजकतावादी समाज की स्थापना उनके अनुयायियों द्वारा की गई थी.’1 अराजकतावाद के माध्यम से राज्य नामक संस्था के निषेध के पीछे विद्वानों की यह धारणा रही है कि राज्यसत्ता का स्वरूप चाहे जैसा हो, उसकी निगाह अपने स्वार्थ से आगे नहीं जा पाती. सत्ता की अंतिम परिणति शोषण के रूप में सामने आती है. जितनी बड़ी सत्ता, उतना ही भयावह शोषण. उसके शोर में जनसाधारण की न्याय के लिए उठी आवाज नक्कारखाने में तूती बनकर रह जाती है. बीसवीं शताब्दी के महान मानवाधिकारवादी चिंतक थामस पेन ने राज्य का वैसा निषेध नहीं किया, जैसा अराजकतावादी करते थे, मगर उसने राज्य को एक आवश्यक बुराई स्वीकार किया—‘कुछ विद्वान समाज और सरकार दोनों को एक होने की भ्रांति पाल लेते हैं, अथवा दोनों के बीच बहुत कम अंतर कर पाते हैं. जबकि दोनों न केवल अलग हैं, बल्कि उनका उद्गम स्रोत भी अलग-अलग है. प्रत्येक राज्य में समाज मनुष्यता का आशीर्वाद है, लेकिन सरकार, भले ही सर्वश्रेष्ठ राज्य में क्यों न हो, एक आवश्यक बुराई है और निकृष्ट राज्य में तो वह असहनीय हो सकती है.’2

भारत में अराजकतावाद के समर्थक विद्वान उसकी खोज के लिए वेदों तक चले जाते हैं. वे दावा करते हैं कि लोकप्रशासन अथवा पूर्ण विकेंद्रीकृत राज्य के संकेतों की वैदिक साहित्य में भरमार है, ‘वेदों से पता चलता है कि बिलकुल आरंभिक काल में भी….राष्ट्रीय जीवन के सब कार्य सार्वजनिक समूहों और संस्थाओं आदि के द्वारा हुआ करते थे. इस प्रकार की सबसे बड़ी संस्था हमारे पूर्वजों की समिति थी.’ (हिंदू राजतंत्र: काशीप्रसाद जायसवाल). महाभारत के शांतिपर्व में युधिष्ठिर ने कहा है कि पहले न राजा था न राज्य. लोग मिल-जुलकर काम चला लेते थे. स्थानीय तंत्र इतना सुगठित था कि बाहरी प्रशासन की आवश्यकता ही नहीं थी. आशय है कि अराजकतावादी यानी ‘बिना राजा का राज्य’ एक प्राचीनतम अवधारणा है. इसका इतिहास सभ्यता के इतिहास जितना ही पुराना है. अराजकतावाद को सबसे सुंदर ढंग से थोरो ने अभिव्यक्त किया है—‘‘मेरा दृढ़ विश्वास है कि—सरकार वही सर्वोत्तम है जो न्यूनतम शासन करे. प्रत्येक सरकार को मैं इस रास्ते पर निरंतर प्रयत्नरत देखना चाहता हूं. उसका लक्ष्य उस ऊंचाई को प्राप्त करना होना चाहिए, जिसके बारे में मुझे विश्वास है कि—सरकार वही सर्वश्रेष्ठ है जो कतई शासन नहीं करती.’ नागरिकों को उसके लिए तैयार रहना चाहिए. सही मायने में वही ऐसी सरकार होगी, जिसको उन्हें प्राप्त ही चाहिए.’3

अराजकतावाद परिपक्व नागरिक तंत्र का पर्याय है. उसमें नागरिक आपसी समझौते, सहयोग और स्वेच्छा के आधार पर परस्पर जुड़े होते हैं. सभी का ध्येय होता है समेकित विकास. आपसी जरूरतों, भावनाओं का सम्मान करते हुए विकासरत रहना. फिर क्या कारण है कि लोग राज्य-सत्ता को अपरिहार्य मान लेते हैं? क्यों उन्हें लगता है कि बगैर राजा के राज्य चल ही नहीं सकता है? क्यों वे स्वयं को भेड़ मान लेते हैं, जिन्हें घेरने के लिए गड़हरिया का होना उन्हें जरूरी लगता है? क्या यह आत्मविश्वास की कमी है? क्या यह सत्ता के आगे समर्पण की भावना है, अथवा ऐसा ही कुछ और? सवाल यह भी है कि अराजकतावाद यदि लोकतंत्र से आगे की व्यवस्था है तो पिछली शताब्दियों में उसके समाजवाद, साम्यवाद यहां तक कि लोकतंत्र जैसी समानधर्मा विचारधाराओं के मुकाबले पिछड़ जाने की वजह क्या है? इसके अनेक कारण हो सकते हैं. उनमें से एक यह है कि समाज सहस्राब्दियों से शासक और शासित में बंटा रहा है. लंबे समय तक शासित-शोषित रहा मनुष्य, इस विभेदकारी व्यवस्था से अनुकूलन कर चुका है. निरंतर शासित होने से उसका आत्मविश्वास क्षीण हुआ है. ऊपर से शासकवर्ग, जिनमें धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तीनों शक्तियां सम्मिलित हैं, द्वारा उसे बार-बार समझाया जाता है कि शांतिपूर्ण जीवन के लिए बाहरी नियंत्रण आवश्यक है! कि अकेला व्यक्ति सुरक्षित नहीं रह सकता! इस तरह वे अनजाने ही मानव-समाज की गरिमा पदावनत कर उसकी गणना पशु समाज के तुल्य रखकर करने लगते हैं. अपने समर्थन में वे उन मनोवैज्ञानिकों तर्कों का सहारा लेते हैं जिनका मानना है कि मनुष्य में नकारात्मक प्रवृत्तियां जन्मजात होती हैं. कि शासक होना जन्मजात गुण है. और जिनमें शासक होने की योग्यता नहीं है, शासित होना उनकी नियति है. उनपर नियंत्रण के लिए पुलिस और कानून बल आवश्यक है. ‘सद् रक्षणाय—खल निग्रहाय’ तथा ‘परित्राणाय् साधुनाम् विनाशाय् च दुष्कृताम्’ जैसे कथन, मनुष्य और उसकी स्वाभाविक अच्छाइयों पर इसी अविश्वास के चलते अस्तित्व में आए हैं. उसमें सुधार के बजाय दंड पर जोर दिया जाता है. वेदों में अनार्यों से समझौता या उनके सुधार की संभावना तलाशने के बजाय सीधे-सीधे उन्हें मिटा देने की प्रार्थनाएं इंद्र से की गई हैं. विभेदकारी व्यवस्था से अनुकूलन हेतु कभी धर्म का सहारा लिया जाता है, कभी राष्ट्र-भक्ति का तो, कभी विकास और सुख-शांति का. इस तरह सत्ता की मौजूदगी को सुख, शांति और सामाजिक विकास की आवश्यकता के रूप में देखने की सहस्राब्दियों लंबी परंपरा रही है. उसका जनमानस पर इतना गहरा प्रभाव है कि उनके बिना भी सफल नागरिक जीवन जिया जा सकता है, ऐसी कल्पना तक संभव नहीं लगती. यहां हम रूसो को याद करना चाहेंगे. उसका कहना था कि मनुष्य आजाद जन्मा है, लेकिन हर जगह वह बेड़ियों में है. इस कथन का निहितार्थ यह भी है कि मानवीय स्वतंत्रता की अवरोधक ये बेड़ियां राज्य और समाज द्वारा विनिर्मित होती हैं. ये ऐसे समाज के लिए बड़ी चुनौती हैं जो मानवाधिकारों के सम्मान का दावा करते हुए मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता को अधिकतम लौटा देना चाहता है. उनकी धारणा जान लाक, रूसो, बैंथम जैसे विचारकों की मान्यता के भी विपरीत है, जो बालक के मस्तिष्क को कोरी स्लेट, उसे निश्छल, निर्मैल्य, निष्पाप, निष्पक्ष, पवित्र आदि मानते थे. यूं भी नकारात्मक वृत्तियों को नैसर्गिक कहकर, उन्हें मानव-व्यवहार की स्थायी विशेषता मान लेना, मानव-व्यक्तित्व पर परिवेश के प्रभाव के साथ-साथ उसके आत्मोत्थान की संभावना तथा उसके लिए की जाने वाली नैतिकतावादी कोशिशों को भी नजरंदाज कर देना है. इसे अधिसत्तावादियों की चाल भी कह सकते हैं, जो मनुष्य से सामान्य जीवन और चयन के नैसर्गिक अधिकारों को पहले ही छीन लेती है. उस अन्याय से मनुष्य जब छटपटाता है, प्रतिकार की सोचता है तो उसके सोच और आजादी के लिए किए जाने वाले प्रतिकार को नकारात्मक कहकर उसका मनोबल गिराने की कोशिश की जाती है.

अराजकतावाद में शासन अथवा बाह्यः सत्तातंत्र का आकार सिकुड़ता जाता है. उसकी जिम्मेदारी सहयोगाधारित संस्थाएं एवं प्रबुद्ध नागरिक संगठन संभाल लेते हैं. आदर्श अराजकतावादी राज्य में शासनतंत्र की उपस्थिति शून्य अथवा नगण्य हो जाती है. वहां व्यक्तिमात्र की क्षमताओं, विशेषताओं को समष्ठि और व्यैक्तष्ठि में उपयोग करने तथा उनके बीच समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया जाता. जिसमें सामूहिक नैतिकता और विवेक कानून के सार्थक विकल्प की तरह काम करते हैं. वह एक दुष्कर लक्ष्य है. जिसके लिए अभिजन मानसिकता तथा उसे बढ़ावा देने वाले तंत्र का सर्वत्र बहिष्कार अनिवार्य होता है. अराजकतावादी राज्य की शक्तियां उसके नागरिकों में केंद्रित होती हैं. उल्लेखनीय है कि सरकार को ताकत उसके नागरिकों की ओर से प्राप्त होती है. लोग अपनी शांति के लिए, सुरक्षा के लिए, अपनी स्वतंत्रता और निर्णयाधिकार का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा सरकार नामक सामूहिक तंत्र को सौंप देते हैं. वे सरकार अथवा निर्वाचित प्रतिनिधियों पर भरोसा करते हैं. यह मान लेते हैं कि उनका अपना होने का दावा कर संसद अथवा विधायिकाओं तक पहुंचे जनप्रतिनिधि ऐसे निर्णय लेंगे, जैसा अपने कल्याण के लिए वे स्वयं लेना चाहते हैं. उनका निर्णय इस सहज विश्वास की अभिव्यक्ति होता है कि निर्वाचित प्रतिनिधि अपने निर्वाचकों की सामान्य इच्छा का अधिवक्ता सिद्ध होगा. प्रायः वे मान लेते हैं कि उनके प्रतिनिधि स्वार्थ-भाव से कोसों दूर हैं. उस समय वे इस सामान्य-बोध से परे होते हैं कि घोड़े को सही दिशा देने, उसे अनुकूल गति तक साधने के लिए सवार को लगाम अपने हाथों में रखनी पड़ती है. जनता की बेध्यानी अथवा अपने प्रतिनिधियों पर अंध-विश्वास अथवा अतिविश्वास को निर्वाचित प्रतिनिधि दूसरे ही अर्थ में लेते हैं. यह भूलकर कि वे जनप्रतिनिधि हैं, उन्हें उनके अधिकार एवं शक्तियां जनता की ओर से प्राप्त हैं, यह मानने लगते हैं कि उन्हें जनता ने उनके गुणों और शक्तियों से सम्मोहित होकर अपना प्रतिनिधि स्वीकार किया है. यानी उनकी शक्तियां और अधिकार जनता का संदाय न होकर उनकी अपनी खूबियां हैं. वे यह भुला देते हैं कि जिस ज्ञान, कार्यकौशल अथवा व्यवहार-कुशलता के बूते वे उस स्थान तक पहुंचे हैं, वह समाज की सम्मिलित चेतना की धरोहर है और समाज में अनेक व्यक्ति खूबियों के मामले में उनसे कहीं आगे हो सकते हैं. बावजूद इसके वे स्वयं को जनता का भाग्य-विधाता मानने की भूल लगातार करते जाते हैं. यह स्थिति जनमानस में उनके और लोकतंत्र के प्रति अनास्था को बढ़ावा देती है.

लोकतंत्र में जनता अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ ले, सत्ता का नियामक होने के बजाय उसपर आश्रित होकर रह जाए, वहां यही होता है. सवार यदि लगाम को ढीला छोड़कर ऊंघने लगे तो घोड़ा मनमानी करेगा ही. स्वाभाविक रूप से उसे जिधर हरियाली दिखाई देगी, उस दिशा में मुड़ जाएगा. इस तरह आगे की यात्रा घोड़े की मर्जी पर निर्भर होकर रह जाएगी—इस तथ्य को जनता समझे न समझे, सरकार में बैठे हुए लोग भली-भांति जानते हैं. बेलगाम दौड़ते रहने के लिए वे जनता की आंखों पर पट्टी बांधने, उसे तरह-तरह से भरमाए रखने का प्रयास करते हैं. प्राचीन समाजों में जाति और धर्म जैसी संस्थाओं की खोज जनसाधारण को भरमाए रखने के लिए ही की गई थीं. समाजीकरण के लिए जरूरी नैतिकताओं को स्थायित्व देने के लिए धर्म का सहारा लिया गया था. आरंभ में एक समान आस्था, लोकविश्वास तथा सामाजिक आचारसंहिता के समर्थक एक ही धर्म के अनुयायी कहे गए. मगर कुछ ही अवधि में धर्म ने स्वयं को अभिजन हितों का संरक्षक और व्याख्याता सिद्ध कर दिया. प्रकट में वह सांसारिक सुखों को हेय बताकर उनकी उपेक्षा करता था, किंतु उसके मापदंड सामान्य जन और विशिष्ट जन के लिए अलग-अलग थे. जो धर्म जनसाधारण को त्याग और तपश्चर्य का उपदेश देकर संसार को निस्सार, मनुष्य के सहज रागानुराग को माया और भव-प्रपंच बताता था, वही राजा, पुरोहित आदि को दैवी-सत्ता का प्रतिनिधि मानकर उनके लिए असीमित अधिकार एवं भोगविलास के रास्ते खोल देता था. कहने को तो धर्म और समानता के नाम पर कुछ शास्त्रीय प्रावधान भी थे. अपेक्षा की जाती थी कि शिखर पर बैठे लोग उनका पालन करेंगे. मगर व्यवहार में सबकुछ शीर्षस्थ वर्गों द्वारा उनकी मर्जी पर निर्भर था. इसलिए विचलन की अवस्था में विक्षोभ की संभावना न्यूनतम थी. यही कारण था कि अर्जन, उपार्जन से लेकर भोग के स्तर तक समाज में आर्थिक-सामाजिक विषमता लगातार बनी रही. उसी के आधार पर बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में विद्वानों की धारणा बनी कि केवल धर्म अथवा उसकी नैतिकतावादी अवधारणाओं की मदद द्वारा जनसाधारण को खुशहाल, न्यायपूर्ण एवं समान जीवन दे पाना असंभव है. उसके लिए राजनीतिक आधार पर प्रयास करने होंगे. अराजकतावादी विचारधाराओं का नए सिरे से चर्चा में आना इसी सोच का परिणाम था. यह मानते हुए कि सत्ता का स्वरूप कोई भी हो, उसकी अंतिम परिणति शोषण में होती है, राज्य की शक्तियों को विक्रेंद्रीकृत कर पुनः जनता को लौटाने के सुझाव दिए जाने लगे. निहितार्थ था कि किसी को इतने अधिकार ही न दिए जाएं जिससे वह अपने दायित्वों को भुलाकर कालांतर में मनमानी करने लग जाए. अंतरराष्ट्रीय कानून, बाह्यः सुरक्षा, व्यापार आदि मामले में यदि किसी व्यक्ति या संस्था को अतिरिक्त अधिकार देना अत्यावाश्यक हो तो नागरिक संस्थाओं को इतना सजग और चेतना-संपन्न बनाया जाए कि जनहित के मुद्दों से विचलन अथवा मनमानी की अवस्था में उसपर तत्क्षण नियंत्रण संभव हो सके.

एक राजनीतिक दर्शन के रूप में अराजकतावाद पश्चिम से आयातित है. उसका जन्म उस दौर में हुआ था, जब औद्योगिक क्रांति के आगमन के पश्चात सामंतवाद सवालों के घेरे में था; तथा जिस अपेक्षा के साथ लोगों ने उसका स्वागत किया था, वह पूरी नहीं हो पाई थी. बल्कि उच्छ्रंखल पूंजीवाद के रूप में एक नए किस्म का सामंतवाद जन्म ले चुका था, जो पहले की अपेक्षा कहीं अधिक खतरनाक था. आर्थिक स्तरीकरण में तेजी आने से ऊपर से नीचे तक असंतोष व्याप्त था. उल्लेखनीय है कि पश्चिम में औद्योगिक क्रांति की सफलता सुखवादी विचारधारा से जुड़ी तथा उसपर निर्भर थी. वह मानवीय स्वतंत्रता का सम्मान करती थी. धर्म की विभेदकारी नीतियों, लोगों को लोक-परलोक संबंधी भ्रांतियों में उलझाकर खुद को सुख और विलासी जीवन जीने की प्रवृत्ति का विरोध वहां 16वीं से, वैज्ञानिक प्रबोधन के साथ ही होने लगा था. कालांतर में मशीनीकरण ने रफ्तार पकड़ी तो ऐसा धर्म जो लोगों को सांसारिक सुखों से बचने की सीख देता था, पूंजीपतियों और कारखानेदारों के आड़े आने लगा. धर्म सांसारिक सुखों के बजाय दिव्य आनंद को जीवन का लक्ष्य मानता था. जबकि साधारण कारखानों के उत्पाद केवल सुख की अनुभूति करा सकते थे. उनकी तेज खपत के लिए आवश्यक था कि अधिकाधिक लोग अधिकाधिक उपभोग करें. उसके लिए धर्म की सांसारिक सुखों को हेय समझनेवाली प्रवृत्ति पर हमले किए गए. इससे सुखवादी विचारों को नया आधार मिला. लेकिन समानता-आधारित समाज की स्थापना में धर्म की ओर से दी जाने वाली चुनौतियां केवल यहीं तक सीमित नहीं थीं. उसका विकास सामंतवाद और राजशाही के संरक्षण में हुआ था. धर्म पर उनका गहरा प्रभाव था. इस कारण वह समाजार्थिक, राजनीतिक असमानता का भी पोषण करता था. वह एक ओर तो ‘कण-कण में भगवान’, ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंजिंचज्जगत्यां जगत्’ के नारे लगाता था, वहीं दूसरी ओर वह राजा को दैवीय प्रतिनिधि बनाकर उसे असीमित अधिकार सौंप देता था. औद्योगिक विकास के दौर में निहित स्वार्थ के लिए पूंजीपतियों ने धर्म की सांसारिक सुखों को हेय बनाने वाली प्रवृत्ति को तो चुनौती दी, किंतु उसकी नियतिवादी स्थापनाओं को ज्यों का त्यों अपना लिया. यानी मनुष्य असीमित भोग को तो उत्सुक हो, किंतु समाजार्थिक विषमता के कारणों की ओर से आंखें मूंदे रहे, इससे श्रम के मूल्यांकन का अधिकार जो उसका एकमात्र स्वामी होने के कारण संबंधित व्यक्ति के पास होना चाहिए, उत्पादक के हाथों में चला गया. परिणामस्वरूप पूंजी-केंद्रित साम्राज्यों के उभार को बढ़ावा मिला. उन्होंने धर्म-संस्थानों को मोटे चंदे देकर अपने बस में कर लिया. परिणामस्वरूप सांसारिक सुखों को हेय बतानेवाली प्रवृत्ति को छोड़कर धर्म स्वयं उसकी व्यवस्था में जुट गया. पुरोहितों ने ऐसे अनेक कर्मकांड निर्धारित किए जिनके द्वारा सांसारिक सुखों में वृद्धि का दावा किया जा सकता था. धर्म ने प्रेय को लेकर व्यवस्थाओं में छूट अवश्य दी थी, किंतु नियतिवादी सोच से वह अब भी पूरी तरह बंधा हुआ था. इस आधार पर हो रहे शोषण से उसको कोई शिकायत न थी. चूंकि वह शोषण के कारणों पर विचार ही नहीं करता था, इसलिए धार्मिक व्यापार में लगी शक्तियां आसानी यह समझाने में सफल हो गईं कि जिन सुखों को समाज में चल रही स्पर्धा अथवा अन्य किसी कारण से पाने में असमर्थ है, उसको दैवी कृपा से आसानी से पाया जा सकता है. इससे उनकी धर्म की दुकानदारी पहले से ज्यादा भी जमने लगी. वर्चस्वकारी ताकतों का स्वार्थाधारित धार्मिक-आर्थिक गठजोड़ लगातार मजबूत होता गया. कई बार वह इतना शक्तिशाली हो जाता था कि राजनीतिक शक्तियों को भी अपने समर्थन में झुका सकता था.

वैज्ञानिक चेतना एवं नए विचारों की रोशनी में धर्म की वह चतुराई विचारकों की समझ में आने लगी थी. इसलिए ब्रूनो बायर, लुडबिग फायरबाख आदि हीगेल समर्थक विचारकों ने सीधे-सीधे धर्म को शोषण का हथियार माना. लेकिन बू्रनो और फायरबाख ने धर्म की आलोचना चाहे जितनी तल्ख भाषा और अकाट्य तर्कों के साथ की हो, उससे पूंजीपतियों तथा उनके समर्थक राजतंत्रों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था. क्योंकि उन दोनों की पैठ बौद्धिक हलकों में विशेषकर उन अभिजन बुद्धिजीवियों तक सीमित थी, जो एकाधिकारवादी शक्तियों की मौखिक आलोचना चाहे जितनी कर कर लें, प्रकट में वे उनसे बहुत दूर नहीं जा सकते थे. वे स्वयं एकाधिकारवादी सोच का शिकार होते हैं, तथा अपने बौद्धिक साम्राज्य को फैलते हुए देखना चाहते हैं. उनकी स्वाभाविक चेतना अभिजनोन्मुखी होती है. ऐसे विचारकों से एकाधिकारवादी शक्तियों को कोई नुकसान न था. इसलिए ब्रूनो और फायरबाख के क्रांतिकारी चिंतन का उतना असर नहीं हुआ, जितना कार्ल मार्क्स के विचारों का. मार्क्स संभवतः पहला विचारक था जिसने अर्थसत्ता और राजसत्ता को परस्पर पूरक मानते हुए वैकल्पिक समानतावादी समाज की परिकल्पना की थी. उसने सर्वहारा वर्ग से आवाह्न भी किया था कि वह संगठित प्रतिरोध द्वारा वर्चस्वकारी सत्ताओं को बेदखल कर शक्तिकेंद्रों को हथिया ले. मार्क्स प्रणीत ऐतिहासिक-भौतिकवाद का सिद्धांत बताता था कि किसी समाज में राजनीति की दशा-दिशा उस समाज की उत्पादन प्रणाली पर निर्भर करती है. इस विचार को सर्वत्र सराहना मिली. कालांतर में मार्क्स के चिंतन के आधार पर जो दल बने उनपर मुख्यतः ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ का असर था, जिसके पीछे हीगेल के द्वंद्ववादी दर्शन की प्रेरणा थी. मार्क्स की आंखों में वर्गहीन समाज की स्थापना का सपना था, किंतु वर्ग-संघर्ष की अवधारणा जो सर्वहाराक्रांति का मुख्य आधार थी, कम से कम इस मायने में परंपरागत राजनीति से प्रेरित थी कि बदलाव हेतु सत्ता में आने के लिए दूसरों को उससे बेदखल करना जरूरी है. मार्क्स सर्वहारा क्रांति को वास्तविक परिवर्तन यानी वर्गहीन समाज की स्थापना की दिशा में पहला कदम मानता था. पेरिस क्रांति की असफलता श्रमिक संगठनों की प्रशासन संबंधी मामलों में अनुभवहीनता का परिणाम थी. मार्क्स समझ चुका था कि सर्वहारा क्रांति द्वारा सत्ता तो प्राप्त की जा सकती है, किंतु उसको स्थायी बनाने और साम्यवादी लक्ष्य के अनुरूप वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए लोगों को पूंजीवाद की कमजोरियों तथा उसके शोषण के तरीकों के बारे में समझाना पड़ेगा. यही कारण था जिससे ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ में वर्ग-संघर्ष का आवाह्न करने वाला मार्क्स परिवर्ती जीवन में, पूंजीवादी शोषण के तरीकों और उनके बहुआयामी प्रभाव की ही गवेषणा करता है.

सैद्धांतिक दृष्टि से देखा जाए तो मार्क्स के वर्गहीन समाज और अराजकतावादी समाज में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है. सिवाय इसके कि मार्क्स जहां सत्ता को श्रमिक संगठनों के हाथों में सौंपकर कदाचित उसे बचाए रखना चाहता है, या वर्गहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य की प्राप्ति तक—सर्वहारा के अधीन सत्ता रहने का समर्थन करता है. मार्क्स वर्गहीन समाज की स्थापना के समर्थन में जोरदार साम्यवादी तर्क देता है, जबकि अराजकतावाद का आदर्श राज्य की आवश्यकता के तिरोहण में है. दूसरे द्वंद्ववाद समर्थक मार्क्स क्रांति के लिए वर्ग संघर्ष को आवश्यक मानता है. इसके लिए उसे हिंसा के उपयोग से भी गुरेज नहीं है. जबकि कुछ आरंभिक अराजकतावादी विचारकों को छोड़ दें तो अधिकांश इस लक्ष्य को समाज के विवेकीकरण, संगठन और व्यापक लोकचेतना के माध्यम से प्राप्त करना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि समाज बौद्धिकरूप से परिपक्व हो, ताकि उसको बाहरी नियंत्रण की आवश्यकता ही न हो. इसके लिए उसका ज्ञान की बहुविध शाखाओं में पारंगत होना आवश्यक है. साथ में इस विश्वास को वापस लौटाना कि शासन आवश्यक बुराई है और समाज बिना शासकवर्ग भी सुगठित हो सकता है. इस तरह साम्यवाद और अराजकतावाद के व्यावहारिक भेद सामने आ जाते हैं. मार्क्स का समकालीन और श्रमिक आंदोलन में वर्षों तक साथ रहा अराजकतावादी मिखाइल बकुनिन उसका मुखर आलोचक था. बकुनिन को सत्तावाद की परिकल्पना ही दोषपूर्ण लगती थी. उसका मानना था कि सत्ता चाहे एक के अधिकार में हो या पचास के, शिखर पर मौजूद लोग अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते ही हैं. मार्क्सवादियों की आलोचना करते हुए उसने लिखा था, ‘वे केवल तानाशाही फैला सकते हैं. संभव है उनकी तानाशाही के साथ कुछ जनभावनाएं भी जुड़ी हुई हों. इसके बावजूद उसके विरोध में हमारी एकमात्र और जोरदार प्रतिक्रया होगी कि तानाशाही चाहे जिसकी और जैसी भी हो, तानाशाह का एकमात्र उद्देश्य होता है, येन-केन-प्रकारेण खुद को सत्ता-शिखर पर टिकाए रहना. यह व्यापक जनसहमति और तानाशाह द्वारा आरोपित दासता को स्वीकारे बगैर असंभव है. स्वतंत्रता प्राप्त करने का एकमात्र रास्ता स्वतंत्रता है. तदनुसार विद्रोह के लिए चिर-तत्पर एवं नीचे-से ऊपर तक कारगर और मुक्त श्रम-संगठनों का स्वतंत्र आचरण जरूरी है.’4 बकुनिन की कल्पना ऐसे राज्य की थी जिसमें निर्णायाधिकार पूरी तरह नागरिक-संगठनों के अधीन हों. उसके अनुसार अराजकतावाद स्वयं-अनुशासित, विवेकवान, सर्व-समन्वयी, साहचर्य आधारित समाज का मुक्ति-स्वप्न है, जिसमें राज्य की शक्तियां या तो पूरी तरह क्षीण हो जाती हैं, अथवा बड़ी मात्रा में क्षीण होकर निःशेष होने की तरफ बढ़ रही होती हैं.

अराजकतावाद की सफलता स्वयं अनुशासित, विवेकवान, अंत:प्रज्ञायुक्त तथा समन्वयकारी, सहयोगी संगठनों पर निर्भर है. यह चाहे जितना जरूरी हो, किंतु एक दुष्कर कार्य था. इसके अनेक कारण, उनमें धर्म भी एक है. सत्ता के विकेंद्रीकरण द्वारा विकासगति अवरुद्ध न हो, इसके लिए जनविवेकीकरण आवश्यक था. चूंकि धर्म मनुष्य की विभेदकारी सत्ताओं के अनुकूलन में भारी भूमिका निभाता है. इसलिए यह मानते हुए कि स्वतंत्र समतावादी और सहयोगकारी संगठनों के गठन के लिए लोगों को धर्म के चंगुल से बाहर लाना आवश्यक है, बकुनाइन ने ‘गाड आफ स्टेट’ जैसी क्रांतिकारी पुस्तक लिखी थी, जो मार्क्स की ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ जितनी ही महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली रचना है. इसके बावजूद मार्क्स का प्रभाव गहरा बना रहा तो इसलिए कि मजदूर संगठनों पर उसका प्रभाव अधिक था. श्रमिक उसे अपना परमहितैषी मानते थे. इसलिए ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के दौरान बकुनिन के साथ स्पर्धा में जीत मार्क्स की हुई थी. 1876 में बकुनिन की मृत्यु हुई. उसके सातवें वर्ष में मार्क्स भी चल बसा. 1895 में पूंजी के ऐंगल्स के संपादन में ‘पूंजी’ का दूसरा खंड सामने आया. उस समय तक 1871 में मात खाए श्रमिक संगठन पुनः सक्रिय होने लगे थे. इसलिए मार्क्स का पुनः सक्रिय हो उठना स्वाभाविक ही था. सर्वहारा क्रांति में एक राजनीतिक अपील थी. उसकी अपेक्षा अराजकतावाद अपेक्षाकृत भावुक और आदर्शोन्मुखी चिंतन था. चूंकि परिवर्तनकामी दलों, सर्वहारा संगठनों का नेतृत्व कर रहे नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षाएं उफान पर थीं, इसलिए वे मार्क्सवाद की ओर झुकते गए, जिसमें जोरदार राजनीतिक अपील थी और जो अपेक्षाकृत शीघ्र परिणाम, यहां तक कि बुर्जुआ शक्तियों के तख्तापलट तक का आश्वासन देता था. राजनीतिक अपील होने के कारण उग्र परिवर्तनकामी दलों ने मार्क्सवाद की शरण में जाना आसान समझा. उसी के आधार पर रूस, चीन, जर्मनी, अफ्रीका आदि देशों में श्रमिक नए सिरे से संगठित होने लगे थे. इस बार उनका नेतृत्व लेनिन, लियोन ट्राट्स्की जैसे महत्त्वाकांक्षी नेताओं के हाथों में था. बीसवीं शताब्दी का आरंभ मार्क्सवाद की जीत से हुआ था. और शताब्दी के मध्य तक आते-आते मार्क्सवाद दुनिया के आधे से अधिक देशों पर छा चुका था.

इसमें कोई संदेह नहीं कि साम्यवाद मानवीय स्वतंत्रता और समानता का सपना देखने वालों के लिए आदर्श सपना था, लेकिन जिन महत्त्वाकांक्षाओं के साथ उसको लाया जा रहा था, उनके पीछे राजनीतिक चेतना अधिक थी. इससे शीर्ष के स्तर पर सुख, सम्मान, प्रतिष्ठा की चाहत और वर्चस्ववादी मानसिकता पनपने लगी. दूसरे शब्दों में परिवर्तनकामी राजनीति के नारे के साथ सत्तारूढ़ हुए दलों में वे सब विकृतियां आने लगी थीं, जिनके विरुद्ध उन्होंने संघर्ष आरंभ किया था. परिणामस्वरूप साम्यवादी लक्ष्य के बीच निरंतर दूरी बढ़ने लगी. नतीजा यह हुआ कि कुछ ही वर्षों में साम्यवादी सपने का रंग फीका पड़ने लगा. इससे पूंजीवादी शक्तियों को बढ़ावा मिला. जनसाधारण की धर्म के प्रति आस्था को देखते हुए उन्होंने मार्क्सवाद का फैलाव रोकने के लिए से लोगों की धार्मिक आस्था को हथियार बनाया. पूंजीवादी-साम्राज्यवादी ताकतें मार्क्स के कथन, ‘धर्म अफीम है’ को आधार बना, उसे धर्म-विरोधी घोषित कर, निरंतर उसकी आलोचना करने लगीं. इसमें उन्हें कामयाबी भी मिली. अराजकतावाद से लड़ने के लिए उन्होंने मानवीय कमजोरियों को हथियार बनाया. उनके द्वारा बार-बार यह प्रचारित किया गया कि केवल कानून के राज्य में शांति और खुशहाली संभव है. सघन प्रचार तंत्र का लाभ उठाकर पूंजीवादी ताकतें मार्क्स और मार्क्सवाद को धर्मविरोधी तथा अराजकतावाद को शांति और व्यवस्था विरोधी सिद्ध करने में कामयाब हुईं.

आज व्यक्ति उपभोक्तावाद और धर्म दोनों के चंगुल में है. उपभोक्तावाद इस जन्म के सुखों के लिए व्यक्ति को अकेला होने का बोध कराता है. धर्म कहता है कि मृत्यु बाद केवल आत्मा होगी, संगी, साथी, परिजन काम नहीं आएंगे, इसलिए तरह वह परलोक के नाम पर व्यक्ति को अकेला बना देता है. यह अकेलेपन का बोध, अपने आसपास रह रहे नागरिकों के प्रति अविश्वास अराजकतावाद का आदर्श है. अराजकतावादी समाज को गढ़ने में सबसे बड़ा दुश्मन है, यह लोगों को सार्वजनिक हितों के लिए एकजुट होने से रोकता है. इसलिए अरविंद केजरीवाल यदि स्वयं को अराजकतावादी मानते हैं तो उन्हें तय करना होगा कि क्या उन्हें सचमुच अपने नागरिक बोध में विश्वास है. यदि हां तो धर्म और पूंजीवाद ने अपने-अपने स्वार्थ के कारण नागरिकों के बीच जो अविश्वास और दूरियां कायम कर दी हैं, उन्हें पाटने के लिए कौन-सा वैकल्पिक कार्यक्रम उनके पास है? उनके ‘स्वराज’ में पंचायती राज्य का सपना है, जिसे भारत में अकसर नारे की तरह उछाला जाता है. व्यावहारिक धरातल पर यह हर बार असफल सिद्ध हुआ कार्यक्रम है. गांधी, नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक पंचायती राज्य की मांग करते आए थे. लेकिन जैसे ही ये मांगे उठती हैं, सहस्राब्दियों से जातीय शोषण और उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों के मन में संदेह उभर आता है. पंचायती राज्य का सीधा आशय आर्थिक और राजनीतिक शक्तियों, अधिकारों के विकेंद्रीकरण से है. यदि वे सचमुच विकेंद्रीकरण और स्वराज में विश्वास रखते हैं, तब उन्हें समझाना होगा कि ‘स्वराज’ जिम्मेदारी का विधान है. उसमें आलसी घुड़सवार होने से काम नहीं चल सकता. उसके लिए जनता को बौद्धिक और शारीरिक दोनों किस्म की सक्रियता चाहिए. इसलिए केजरीवाल के ‘स्वराज’ में कोई कार्यक्रम नजर नहीं आता. वे सत्ता को विकेंद्रीकृत कर जनता को अधिकार संपन्न करना चाहते हैं, बहुत अच्छा विचार है. जिन देशों में विकेंद्रीकृत शासन है, वहां स्थानीय तंत्र मजबूत हैं. चीन में कम्यून, श्रीलंका, जर्मनी और इजरायल में ‘किबुत्ज’, रूस में ‘सोवियत’ आदि स्थानीय निकायों के ही नाम हैं. भारत में ऐसे प्रयोग नाकाम हैं तो इसलिए कि यहां की दो-तिहाई जनता जिसमें शूद्र और दलित दोनों सम्मिलित हैं, जातीय शोषण के शिकार रहे हैं.

जनता यदि केजरीवाल में अपना नायक देखती है तो उसे समझना चाहिए कि ऊपर से थोपा हुआ विकास नीचे तक आते-आते चुकने लगता है. अराजकतावादी समाज के गठन के लिए आवश्यक है कि जनता स्वयं अपना नेतृत्व संभाले. नेता की भांति आचरण करते हुए अपने प्रतिनिधियों को जरूरी निर्देश दे. लोकतंत्र में सफलता केवल श्रेष्ठतम प्रतिनिधियों को संसद भवन तक पहुंचा देने से पूरी नहीं हो जाती. निर्वाचित प्रतिनिधि श्रेष्ठतम कार्य करें, इसी में लोकतंत्र की सफलता है. संसार का कल्याण है. यह तभी संभव है जब जनता भी अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सचेत हो. जनप्रतिनिधियों से श्रेष्ठतम काम लेना भी जनता का दायित्व है. अभी तक जनता यह मानकर चलती रही है कि उसके प्रतिनिधि अपने दायित्वों के प्रति जागरूक रहकर निष्ठापूर्वक उनका पालन करेंगे. किंतु व्यवहार में उसका उल्टा हुआ है. देखा यह गया है कि जनता के प्रतिनिधि संसद में जाकर अपना कर्तव्य बिसरा देते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में ऐसा होता है, इसलिए माना जाना चाहिए कि जिन्हें जनता श्रेष्ठतम के नारे के साथ चुनती है, वे संसद में जाकर वैसे नहीं रह जाते. वहां जाते ही उनपर अभिजन संस्कार हावी होने लगते हैं. स्वयं को जनता का सेवक बताकर चुनकर आए लोग खुद को उसका मालिक समझने लगते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में ऐसा होता है, अधिकांश अपना कर्तव्य बिसार देते हैं, इसलिए माना जाना चाहिए कि जिन्हें जनता श्रेष्ठतम के नारे के साथ चुनती है, वे संसद जाकर श्रेष्ठतम नहीं रह जाते. वे स्वयं को आमजन से ऊपर समझने लगते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में हमारे ‘श्रेष्ठतम’ साधारण या उससे भी कम, अर्थात ‘निकृष्टतम’ सिद्ध होते हैं. जनता को यह भी समझना होगा कि श्रेष्ठतम प्रतिनिधि जैसी अवधारणा में ही खोट है. इसलिए यदि जनता को शासन का श्रेष्ठतम रूप चाहिए तो उसे स्वयं सक्रिय रहकर श्रेष्ठतम निगरानी व्यवस्था कायम करनी पड़ेगी. ताकि तयशुदा लीक से हटने की किसी जनप्रतिनिधि की हिम्मत ही न पड़े. इसे यूं भी कह सकते हैं कि ‘श्रेष्ठतम प्रतिनिधि’ एक भ्रांत अवधारणा है. केवल श्रेष्ठतम जनता ही शासन को श्रेष्ठतम स्तर तक ले जाती है.

यहां एक पेंच है. आम जनता अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करे या शासन चलाए? किसान यदि अपना वक्त शासन-प्रशासन की देखभाल करेगा तो हल चलाने के लिए समय कहां से निकाल पाएगा? ऐसी शंकाएं वाजिब हैं, लेकिन यदि आपने इस सिद्धांत कि श्रेष्ठतम जनता ही श्रेष्ठतम शासन दे सकती है’—को भली-भांति समझ लिया है तो मुझे पूरा विश्वास है कि आपके लिए शासन संबंधी कोई समस्या ही नहीं होगी. इसलिए आपके दिमाग में यह विचार आना ही नहीं चाहिए. यदि जनता ही शासन है और प्रतिनिधित्व के शासन को उसकी कमजोरी के कारण नकार चुकी है, तो किसी बाहरी शासन की आवश्यकता ही नहीं रह जाती. फिलहाल ‘बिना राजा का राज’ या ‘बिना शासन के शासन’ जैसी अवधारणा दूर की कौड़ी या फिर दिमागी शगल लग सकती है. वह इसलिए कि गत चार-पांच हजार वषों के बीच जनता शासित होते-होते, अपने आपको, अपनी शक्ति और योग्यता को बिसरा चुकी है. इन चार-पांच हजार वर्षों में उसने हर प्रकार की राज्य प्रणाली को आजमाया है. पहले कबीलाई शासन देखा, राजा आए, फिर महाराजाधिराज और चक्रवर्तित्व का जमाना आया. उसके बाद औपनिवेशिक शासन और अब लोकतंत्र, उसे सभी में छला गया है. लेकिन लोकतंत्र में छला जाना जनता को ज्यादा मर्माहत करता है, क्योंकि वह अपनों द्वारा छले जाने की प्रतीति कराता है. उसमें सत्ता जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में रहती है. यह अपेक्षा की जाती है कि निर्वाचित प्रतिनिधि अपने मतदाताओं के प्रति जिन्होंने उनपर भरोसा करते हुए अपना प्रतिनिधित्व सौंपा है, ईमानदार होंगे तथा उनके विकास एवं समस्याओं के समाधान हेतु पूर्णतः प्रतिबद्ध होंगे. लेकिन सत्ता प्राप्त होते ही प्रतिनिधि अपनी स्वार्थ-सिद्धि के आयोजनों में जुट जाते हैं. उससे जनता को अपने ही प्रतिनिधियों द्वारा छले जाने की आत्महंता पीड़ा से गुजरना पड़ता है.

केजरीवाल के प्रस्तावित ‘स्वराज’ की कमजोरी है कि उसमें, जनविवेकीकरण और सत्ता के वास्तविक विकेंद्रीकरण की कोई योजना नहीं है. इसलिए वे भीड़ तो जुटा लेते हैं, उसे विवेकवान जनशक्ति में परिवर्तित करने का रास्ता उनके पास नहीं है. रही फेसबुकिया समर्थन और अभियान की बात, जिसे वे युवा चेतना से जोड़ते हैं, वह स्वयं दिग्भ्रमित है. कुछ समय पहले तक युवाओं को अपना मसीहा मोदी में नजर आता था, दिल्ली में ‘आआप’ की अप्रत्याशित जीत के बाद अब वह केजरीवाल को मसीहा के रूप में देखने लगे हैं. दूसरे जिस सोशल साइटस पर उनका प्रभाव है, असल में वह सामाजिकता से कोसों दूर है. वह असल से बहुत दूर ऐसा वर्चुअल समाज है जिसका वास्तविकता से कोई नाता नहीं है. फिर उसकी डोर पूरी तरह पूंजीपतियों के हाथों में है. अभी तक वे इसमें छूट दे रहे थे तो इसलिए वह उत्पाद को घर-घर पहुंचाने के लिए सबसे सस्ता और प्रभावी माध्यम है. सरकार के प्रति असंतोष एवं जनाक्रोश को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करना उनका पुराना शगल है. जैसे ही उन्हें उससे अपने अस्तित्व पर संकट महसूस होगा, वे युवा आक्रोश को एकदम विपरीत दिशा में मोड़ देंगे. अतएव केजरीवाल समेत दूसरे लोगों की परिवर्तनकामी आंदोलनों या राजनीति की सफलता इसपर निर्भर करेगी कि समाज की वर्चुअल एकता को वास्तविक समाज की एकता में कैसे ला पाते हैं. इसके लिए परंपरागत शक्तियों के साथ आधुनिक पूंजीवादी शक्तियों से भी लोहा लेना पड़ेगा. इसमें कामयाबी ही उनकी अराजक होने की वास्तविक पहचान होगी. लोकतंत्र में नागरिक की हैसियत केवल केवल टैक्स भरने और बूथ पर जाकर ठप्पा लगाने तक सीमित नहीं है? उसे सरकार के काम पर निगरानी करने और आवश्यकता पड़ने पर उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार मिलना चाहिए. उसको यह अधिकार भी होना चाहिए कि यदि कहीं अव्यवस्था और अनाचार देखे तो उसे उन अधिकारियों तक पहुंचा सके, जिन्हें उसके लिए नियुक्त किया गया है. यह नागरिक प्रशासन की वह उच्चतम अवस्था है जिसमें राज्य की आवश्यकता न्यूनतम हो जाती है. अ-राजकता ही क्यों, विवेकवान नागरिक तो लोकतंत्र के लिए भी जरूरी हैं. आआप के आंदोलन के माध्यम से जो विचार स्पष्ट रूप से सामने आया है, वह है जनसाधारण का प्रशासन में दखल बढ़ाने का विचार. यह अपने आपमें एक विचार है. हालांकि आआप के नेता इसे किसी विशेष विचारधारा से जोड़ने से इन्कार करते हैं. शायद वे स्थापित विचारधाराओं का हश्र देख खतरा उठाने से डरते हैं. हो सकता है इसमें भी कोई राजनीति हो. लेकिन सुदीर्घ और परिवर्तनकारी राजनीति के लिए ठोस विचारधारा आवश्यक है. आआप को यदि कभी खतरा होगा तो इसी वैचारिक ढुलमुलपन के कारण. यह संभव है कि विचारधारा की शरण लेने से आआप की विकासगति धीमी पड़ जाए. क्योंकि विचारधारा को लोकमानस में जगह बनाने और कारगर बनने में समय लगता है. उसमें व्यवधान भी आ सकता है. इसके बावजूद वह परिवर्तन स्थायी होगा. फिर भी यदि केजरीवाल के आने से राजनीति में थोड़ी-सी भी संवेदनशीलता आई है तो इसके लिए उनकी प्रशंसा करनी चाहिए. उन्हें यह भी श्रेय दिया जाना चाहिए कि आगामी लोकसभा चुनावों में चेहरों की लड़ाई को उन्होंने विकल्प देने की कोशिश की है. इसलिए जरूरी है कि आआप में जो अच्छा हो रहा है उसका समर्थन करते हुए उसपर नैतिक दबाव बनाना चाहिए ताकि विचलन की संभावना न्यूनतम रहे और यदि अपनी ही कमजोरी ये यह प्रयोग ढहता भी है तो भविष्य में नई वैचारिकता, नए आंदोलन को जमीन देने के लिए तैयार रहे. अंत में 14 अगस्त 2013 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक रिपोर्ट, अफ्रीका के जनजातीय समाज की एकता और एक-दूसरे के प्रति उदात्त समर्पण का अनूठा उदाहरण है—

दक्षिण अफ्रीका की झोसा प्रजाति के बच्चों के साथ एक मानव विज्ञानी ने एक गेम खेला. उन्होंने बच्चों से थोड़ी दूर एक फलों से भरी डलिया रख दी. बच्चों से कहा कि आपमें से जो भी इन फलों तक पहले पहुंचेगा मैं यह सारे फल उसे दे दूंगा. इस पर सभी बच्चे हाथ पकड़कर एक साथ उस डलिया तक गए. यह पूछने पर कि उन्होंने ऐसा क्यों किया जबकि उनमें से कोई एक जीत सकता था. इस पर बच्चों ने जवाब दिया उबन्टू. झोसा प्रजाति में इसका अर्थ होता है कि हम एक हैं. उनका कहना था कि अगर बाकि सब दुखी हैं तो हममें से कोई एक खुश कैसे हो सकता है. वे सारे घेरा बनाकर फल खाने के लिए बैठ गए.

क्या स्पर्धा को विकास का मूलमंत्र मानने वाले आधुनिक पूंजीवादी समाजों में यह संभव है?

 – ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका:

1. The true founder of anarchy was Jesus Christ and… the first anarchist society was that of the apostles.”-GEORGE WOODCOCK, Anarchism : A History Of Libertarian Ideas And Movements, P 37.
2. Some writers have so confounded society with government, as to leave little or no distinction between them; whereas they are not only different, but have different origins … Society is in every state a blessing, but Government, even in its best state, is but a necessary evil; in its worst state, an intolerable one. -Thomas Paine,Common Sense.
3. “I heartily accept the motto, – “That government is best which governs least;” and I should like to see it acted up to more rapidly and systematically. Carried out, it finally amounts to this, which I also believe, – “That government is best which governs not at all;” and when men are prepared for it, that will be the kind of government which they will have.” -Henry David Thoreau, On the Duty of Civil Disobedience.
4. They [the Marxists] maintain that only a dictatorship — their dictatorship, of course — can create the will of the people, while our answer to this is: No dictatorship can have any other aim but that of self-perpetuation, and it can beget only slavery in the people tolerating it; freedom can be created only by freedom, that is, by a universal rebellion on the part of the people and free organization of the toiling masses from the bottom up. -Mikhail Bakunin, Statism and Anarchism.

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