आम आदमी पार्टी और 2014 से उम्मीदें

2014 के स्वागत के पर्याप्त कारण हैं. इनमें से कुछ 2013 की कोख से जन्मे हैं. कुछ 2014 अपने साथ लाने वाला है. उन्हें लेकर उम्मीदें बंधी हैं. जो मुद्दे 2013 में जन्मे उनकी भूमिका 2010 में ही रची जा चुकी थी. 2013 महत्त्वपूर्ण इसलिए रहा कि उसमें हमने उन्हें साकार होते देखा. ‘आम आदमी पार्टी’ के संयोजक के रूप में अरविंद केजरीवाल का संकल्प इतनी जल्दी फलीभूत होगा, इसकी संभावना किसी को नहीं थी. उसी हर्षोल्लास और उम्मीदों के बीच 2014 को लेकर नए-नए सपने सजाए जा रहे हैं. ‘आम आदमी पार्टी’ की सफलता से उत्साहित-अचंभित हर कोई यह अनुमान लगाने पर तुला है कि प्रसुप्त जनाकाक्षांओं के उभार प्रतीक बन चुकी यह पार्टी, आसन्न चुनावों में क्या चमत्कार दिखाती है. हालांकि जिस पार्टी की उम्र बामुश्किल साल-भर हो. गांवों में जहां देश की 65 प्रतिशत आबादी रहती है, जिसे अभी पैठ बनानी हो, उससे सिर आ चढ़े चुनावों में बहुत बड़े चमत्कार की अपेक्षा रखना असंभव कामना होगी. फिर ‘आम आदमी पार्टी’ की अप्रत्याशित सफलता, जन-ज्वार का अकेला उदाहरण नहीं है. पूर्वोत्तर प्रदेशों से लेकर सुदूर दक्षिण तक ऐसे चमत्कार पहले भी हो चुके हैं. हर बार आरंभ में सबकुछ अनोखा-सा लगा था. युग-परिवर्तन की प्रतीति हुई थी. लेकिन सत्ता काजल की कोठरी ठहरी. उसमें जो गया, बेदाग नहीं निकल पाया. फिर भी ‘आम आदमी पार्टी’ को इस बात का श्रेय दिया ही जाना चाहिए कि उसने आगामी चुनावों को नितांत ‘व्यक्ति-केंद्रित’ होने से बचा लिया है. वरना राजनीतिक पार्टियों और मीडिया की पूरी-पूरी साजिश उन्हें ‘मोदी बनाम राहुल’ बना देने की थी. यदि दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी बाकी तीन राज्यों की भांति ‘भारतीय जनता पार्टी’ को बहुमत मिला होता तो ‘नमो-नमो’ की दुंदभि पहले की अपेक्षा कहीं जोर की बज रही होती. व्यक्ति पूजा इसलिए ताकि महंगाई, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, परिवारवाद, बेरोजगारी, मुद्रा-स्फीति जैसे मुद्दों की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाए. अब हालात बदल चुके हैं. ‘भारतीय जनता पार्टी’ के रणनीतिकार ‘आम आदमी पार्टी’ की बढ़ती लोकप्रियता से चिंतित नजर आने लगे हैं. उनका असर पार्टी के विज्ञापनों तथा फेसबुकिया अभियान पर भी नजर आ रहा है.

‘आम आदमी पार्टी’ की इस सफलता पर चौंकने जैसी बात कतई न होती, यदि हमारे राजनीतिक विश्लेषकों का व्यवहार, उनके सोचने-समझने का नजरिया लोकतांत्रिक होता. यदि वे सचमुच मान रहे होते कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है. देश लोगों से बनता है, किसी भू-भाग से लोग नहीं बना करते. राष्ट्र जनता की सामूहिक चेतना की परिणति होता है, उसका निर्माता नहीं. कहीं न कहीं सत्ता का प्रभाव हमारे विश्लेषकों के दिलो-दिमाग पर भी रहता है. इसलिए लोकतंत्र के प्रबुद्ध नागरिक की तरह व्यवहार करने के बजाय वे अपने आकाओं के पिछ-लग्गू नजर आते हैं. अपना अधिकांश समय सत्ताधीशों की विरुदावलि गाने और विपक्षी को गरियाने में बिताते हैं. जनमानस को गहराई से समझना उनके लिए असंभव होता है. इसलिए जनता के बीच उठने वाले स्वाभाविक ज्वार उसकी पहचान से छूट जाते हैं. उनका सामंती सोच एवं अलोकतांत्रिक संस्कार उन्हें भरमाए रखते हैं. वे वैचारिक प्रतिबद्धता को ताक पर रखकर, स्वार्थ के वशीभूत हो सत्ता के निकट आते हैं. भूल जाते हैं कि पीढ़ियों से सत्ता पर सवार लोग उनकी अपेक्षा कहीं ज्यादा चालाक और काइयां हैं. वे उनसे मनचाहा काम लेते हैं. अपनी कमजोरी और स्वार्थपरता को वे उनकी विचारधारा की आड़ में छिपा ले जाते हैं. भारतीय लोकतंत्र की असफलता का प्रमुख कारण भी यही है कि आजादी के बाद जिन लोगों पर समाज के लोकतांत्रिक प्रशिक्षण का दायित्व था, वे केवल स्वार्थ-सिद्धि तक सिमट गए. उन्होंने भुला दिया कि विकास एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. सत्ता उसको उत्प्रेरित अथवा अवमंदित कर सकती है, चाहे तो उसकी दिशा भी बदल सकती है. लेकिन उसे पूरी तरह रोक नहीं सकती. नादानी में वे ऐसे विकास का समर्थन करने लगते हैं, जिससे विषमता बढ़ती है. विकास के नाम पर कहीं भीषण रेगिस्तान तो कहीं फलते-फूलते नखलिस्तान नजर आते हैं.

कमी उनकी भी नहीं है. दरअसल शिखर की ओर देखते रहना हममें से अधिकांश का स्वभाव बन चुका है. हम प्रायः ऊंचाई पर मौजूद लोगों को पहचान पाते हैं. हमारे स्वार्थी मन में बराबर वालों के प्रति ईर्ष्या होती है, छोटों के प्रति तिरष्कार. जनमानस में मौजूद परिवर्तन के प्रति आकुलता, सुगबुगाहट, बेचैनी और असंतोष की ओर से हम प्रायः नजरें फेर लेते हैं. नजर पड़ भी जाए तो हमारी समझ वहां काम नहीं करती. इसका एकमात्र कारण है, अभ्यास की कमी. जनसमूह की हलचल को परखने के लिए जितना धैर्य और निष्पक्षता चाहिए, उसे हम जुटा नहीं पाते. बुद्धिजीवी होने का दावा करते हुए भी हम आसान रास्तों की खोज में लगे रहते हैं. हमारी असफलता और विकलता का कारण भी यही है. सरलीकरण के इसी स्वभाव के चलते हम 2013 में दिल्ली के सत्ता-परिवर्तन को केजरीवाल या ‘आम आदमी पार्टी’ की सफलता मान लेते हैं.

मेरी राय में दिल्ली में वह हुआ, जैसा यहां की जनता उनसे चाहती थी. केजरीवाल की अल्पमत सरकार का बनना भी उसी का निर्णय है. वरना बहुमत तो भाजपा के पास था. केजरीवाल और उनके साथियों की खूबी रही कि वे जनता की सोई आकांक्षाओं को जगाने में कामयाब रहे. इसमें अन्ना हजारे का योगदान भी रहा. जनलोकपाल आंदोलन के पीछे भले ही केजरीवाल की ‘इंजीनियरिंग’ ने काम किया हो, उसे नैतिक उठान अन्ना हजारे की अगुवाई से मिला था. चौतरफा मिलती चुनौतियों के बीच केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाने का निर्णय लिया. लेकिन दूसरे दलों की भांति समझौते नहीं किए. उनकी खूबी रही कि एक जनांदोलन के नैतिक उठान और ऊर्जा को राजनीति में बनाए रखा. फलस्वरूप राजनीति की उस खोई प्रतिष्ठा को लौटाने का काम भी उन्होंने किया, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों के बीच कभी की गायब हो चली थी. जनसाधारण के मुद्दे, जनसाधारण जैसी बोली-बानी और जनसाधारण जैसी वेशभूषा ने उन्हें जनाकांक्षा की राजनीति का प्रतिनिधि बना दिया. इसी के बूते वे लोगों को अपनी राजनीति का हिस्सा बनाने में कामयाब रहे. आज अन्ना भले ही राजनीति में न हों, भले ही वे केजरीवाल और ‘आम आदमी पार्टी’ ने दूरी का ऐलान कर चुके हैं. मगर जनता केजरीवाल को राजनीति में उनका नैतिक उत्तराधिकारी मान चुकी है. बड़े-बड़े नेताओं को अपनी सभाओं के लिए श्रोता ‘मैनेज’ करने पड़ते हैं, केजरीवाल के लिए उनकी कोई समस्या नहीं रहती. ‘आम आदमी पार्टी’ की छोटी से छोटी सभा में लोग स्वयं-स्फूर्त्त भाव से सहभागी बनते हैं. सहभागिता की राजनीति के पहले जादूगर गांधी थे. उनके बाद विनोबा, जयप्रकाश नारायण और कुछ सीमा तक विश्वनाथ प्रताप सिंह ने वही किया. आगे चलकर राजनीति व्यवसाय बनी तो नेता और जनता के बीच आत्मीयता घटना लगी. केजरीवाल ने अपनी सहजता और विश्वसनीयता के बल पर ‘आम आदमी पार्टी’ के माध्यम से राजनीति में खोई आत्मीयता को लौटाने का चमत्कार कर दिखाया है. इस बीच उनपर लांछन भी लगे, किंतु उन्होंने अपने चरित्र की पारदर्शिता को बनाए रखा. अंततः आमजन वाली छवि का जादू चला और बाजी ‘आम आदमी पार्टी’ के हाथ लगी.

अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व हुए हालिया चुनावों ने नैतिकता को सांस्थानिक दर्जा दिया. यही कारण है कि चुनावों में पहले नंबर पर रहकर भी भाजपा को सत्ता से पांव पीछे खींचने पड़े. वह जानती थी कि विपक्ष का नैतिक आधार कहीं ज्यादा मजबूत है. यह सच से जनता भी परिचित है. नैतिकता की कसौटी पर खरा विपक्ष सत्ता को असली चुनौती पेश करेगा. तब समर्थन की बैशाखियों पर टिकी सरकार उसके ताप को सह नहीं पाएगी. ऊपर से गर्दन पर लटकती आम चुनावों की तलवार. यदि वहां भी केजरीवाल की उच्च नैतिकता फलीभूत हुई तो ‘नमो-नमन’ की केसरियां कवायदें धरी-की-धरी रह जाएंगी. यह सोचते हुए भाजपा को सरकार बनाने से अपने पांव पीछे खींचने पड़े तो कांग्रेस अपने बचे-कुछे दमदमे को लेकर समर्थन में उतर आई. यह उनकी उदारता न होकर सोची-समझी चाल थी—किसी भी तरह आआप के नेताओं को सत्ता के रूपमहल का दरवाजा दिखाकर उनके ईमान को डिगा दिया जाए. यदि हम्माम में सब नंगे सिद्ध हुए तो फिर कोई चुनौती बाकी न रहेगी. रेबड़ियों का स्वाद मिल-बांटकर, बारी-बारी से मिलता रहेगा. लेकिन जनता इतनी भी नादान नहीं है कि वह ईमानदार इच्छा और वायवी प्रलोभनों का अंतर न समझ सके. इसलिए एक कूटनीतिक फैसले के तहत केजरीवाल सरकार बनाने के मुद्दे पर जनता की राय लेने निकले तो लोग उनकी सभाओं में हिस्सेदारी के लिए एक बार फिर सड़क पर उतर आए.

लोकसभा चुनावों में अब केवल पांच महीने बाकी हैं. इस अल्पावधि में यह नई-नई उभरी पार्टी देश की जनता से जुड़ने के लिए कितना विस्तार कर पाती है, इस बारे में उसकी सफलता इस बात पर ज्यादा निर्भर करेगी कि जनसाधारण देश की राजनीति में दखल देने के लिए स्वयं कितना उत्सुक है और ‘आम आदमी पार्टी’ राष्ट्रीय स्तर पर उसके विश्वास को कितना जीत पाती है. वैसे भी चेतनशील समाज को विकल्पों की दरकार नहीं होती. विकल्प स्वयं उस तक चलकर आते हैं. यदि लोग सचमुच बदलाव को उत्सुक हैं तो ‘आप’ के अनुपस्थित रहते भी वे रास्ते निकाल सकते हैं. उनकी सफलता की कसौटी जनतंत्र के प्रति उनकी निष्ठा और समझ से आंकी जाएगी. साथ में यह विश्वास भी कि लोकतंत्र में नेता की शक्ति प्रतीकात्मक होती है. वास्तविक शक्ति जनता के अधीन होती है. यदि लोग जनतंत्र के इस मूल मंत्र को आत्मसात कर लें तो स्वयं सरकार की उपस्थिति भी प्रतीकात्मक रह जाएगी.

यह भी जरूरी नहीं है कि प्रत्येक बदलाव के लिए राजनीति की ओर देखा जाए. समाज चेतना-संपन्न होगा तो कम से कम नागरिक जीवन में राजनीति अप्रासंगिक मान ली जाएगी. आजादी के समय देश में सामाजिक जागरूकता और राजनीतिक चेतना का स्तर कमोबेश समान था. दोनों ही समान रूप से परिवर्तनोन्मुखी थे. आजादी के बाद सामाजिक चेतना का हृास होने लगा. गांधी सामाजिक आंदोलनों का महत्त्व जानते थे, इसलिए उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को गांवों में सुधार कार्यक्रम चलाने की जिम्मेदारी सौंपी थी. ताकि समाज में आपसी सौहार्द और मेल-मिलाप बढ़े. उस समय के समाचार-पत्र पत्रिकाओं ने गांधीजी का साथ दिया था. आज स्थिति बदली हुई है. अखबारों की जगह मीडिया ने ले ली है. पहले पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी. अब वह उद्यम बन चुकी है. मीडिया संस्थानों पर पूंजीपतियों का कब्जा है. उनके दबाव में मीडिया वही करता है, जिससे कारपोरेट घरानों का हित-साधन होता हो.

आजादी के बाद राजनीतिक गतिविधियों पर तो जोर रहा, मगर सुधारवादी कार्यक्रमों से करीब-करीब किनारा कर दिया गया. इससे समाज सुधार से जुड़े आंदोलनों का ताप घटता गया. इस बीच प्रतिक्रियावादी ताकतें निरंतर अपनी जकड़ बढ़ाती गईं. इस बीच सामाजिक संस्थाओं का जितनी तेजी से हृास हुआ है, उससे राजनीति का दखल उन क्षेत्रों में भी बढ़ा, जो सामाजिकता के दायरे में आते थे. यह राजनीति की किसी खूबी के कारण नहीं, बल्कि सामाजिक संस्थानों के शिखर पर जातिवादी, वर्चस्वादी, सांप्रदायिक ताकतों के सवार हो जाने से हुआ है. निहित स्वार्थ की खातिर उन्होंने परिवर्तन के दरवाजे उन लोगों के लिए बिलकुल बंद कर दिए थे, जिन्हें उनकी दरकार थी. जो यह सपना पाले बैठे थे कि आजादी के बाद उनकी मुक्ति के रास्ते प्रशस्त होंगे. अवमूल्यन राजनीति का भी हुआ. संविधान में धर्मभेद, जातिभेद, मुक्त भारत बनाने का आग्रह संविधान निर्माताओं का था. लेकिन उल्टे वे राजनीति का ही शिकार होते गए.

इसमें कोई दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, सांप्रदायिकता, परिवारवाद और काहिली में डूबी सरकारों ने आम आदमी पार्टी या प्रतिबद्धता और ईमानदारी की राजनीति करने वाले किसी भी दूसरे दल के लिए खुला मैदान छोड़ दिया है. जिस डगर पर आज केजरीवाल हैं, उसे केवल वामपंथी दलों की ओर से टककर मिल सकती थी. परंतु भारतीय वामपंथ की विडंबना है कि उसकी बागडोर आरंभ से ही बुर्जुआ सोच वाले नेताओं के हाथों में रही. जो स्वयं वर्गभेद की उपज थे और निहित स्वार्थ के लिए उसे बनाए रखने में ही अपना भला समझते थे. उन्होंने वामपंथ की राजनीति करने के बजाय, उसका अपने स्वार्थ के अनुसार अनुकूलन करने के लिए ज्यादा उपयोग किया. परिणाम यह हुआ कि वामपंथ देश में अपनी प्रासंगिकता लगातार खोता गया. भारतीय मतदाता के हृदय में वामपंथी राजनीति को लेकर संदेह हमेशा बना रहा. पश्चिमी बंगाल और दक्षिण के कुछ राज्यों में वामपंथ को पांव टिकाने लायक जगह मिली तो इसलिए कि भारतीय वामपंथी चेतना के उभार के दिनों में वहां ईमानदारी से काम किया गया था. पश्चिमी बंगाल में मानवेंद्रनाथ राय और दक्षिण में सिंगारवेलु चेट्टियार, अमृत डांगे जैसे कुछ समर्पित विचारकों, नेताओं ने वामपंथ को निष्ठापूर्वक जिया था. इसलिए उन राज्यों में वामपंथी राजनीति आज भी एक बड़ी ताकत मानी जाती है.

बहरहाल, आम आदमी पार्टी की जीत के जश्न और 2014 की उम्मीदों के बीच अरविंद केजरीवाल को यह श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने गांधी की ‘अंतिमजन’ की अवधारणा को राजनीति में प्रासंगिक बना दिया है. हालांकि उत्तरी भारत के दो अन्य दल भी खुद को अंतिमजन की अवधारणा से जोड़ने का दावा करते हैं. उनमें पहला नंबर मायावती का है. दूसरा मुलायम सिंह यादव का. मायावती जननायक डाॅ. अंबेडकर को अपना प्रेरणास्रोत मानती हैं. वहीं मुलायम सिंह खुद को लोहिया का उत्तराधिकारी बताते हैं. मगर दोनों की राजनीति स्वार्थपूर्ण विचलनों से भरी है. खुद को सत्ता में बनाए रखने के लिए दोनों ने कदम-कदम पर समझौते किए हैं. प्रतिबद्धता को ताक पर रखकर सत्ता की गोटियां खेलीं हैं. मायावती ने देश की सत्ता में बने रहने के लिए ऐसे दलों के साथ अनाप-शनाप समझौते किए, जिनकी राजनीति में सामाजिक न्याय के लिए सिवाय राजनीतिक मजबूरी के कोई स्थान न था. वहीं मुलायम सिंह का समाजवाद जातिवाद और परिवारवाद की देहरी को कभी लांघ ही नहीं पाया. इन दोनों को यदि अपनी राजनीतिक शाख को बचानी है तो निजी महत्त्वाकांक्षाओं को लांघकर समाज के बड़े वर्ग के हितों पर अपनी राजनीति को केंद्रित करना होगा. जिसकी फिलहाल कोई उम्मीद नहीं दिखती. इसलिए निकट भविष्य में उनसे किसी भी प्रकार की उम्मीद करना फिजूल होगा.

‘आम आदमी पार्टी’ ने परिवर्तनकारी राजनीति की उम्मीद जताई है. उसकी शुरुआत है. क्या दिल्ली की सफलता को पूरे देश में दोहराया जा सकता है? इसे लेकर हम आशंका से परे नहीं हैं. लेकिन ऐसा सोचते-लिखते समय हम उन्हीं बुद्धिजीवियों की कतार में सम्मिलित हो रहे हैं, जिनपर यह लांछन लगाया जाता है कि वे सत्ता के नजरिये से सोचते-करते हैं. राजनीतिक पार्टी भी एक सत्ता है. और इस देश में ऐसी अनेक मिसालें हैं जब राजनीतिक पार्टियों ने लोकतंत्र को अंगूठा दिखाया है. देश की कुल राजनीतिक पार्टियों में कुछ निजी उद्यम, कुछ प्राइवेट लिमिटेड कंपनी तो कुछ कारपोरेट घरानों की तरह काम कर रही हैं. ऐसे में उनमें आंतरिक लोकतंत्र की खोज करना, भूसे से सुई तलाशने जैसा है. रही केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की सरकार की कार्यशैली की बात. यहां केजरीवाल अपने प्रतिद्विंद्वयों पर भारी ही दिखते हैं. सरकार बनने के साथ ही उन्होंने बीमारी की हालत में भी जिस त्वरा से निर्णय लिए हैं, उससे लगता यही है कि वे पारंपरिक राजनीति को बड़ी चुनौती देने वाले हैं. किंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि देश-भर में पार्टी ने जो बदलाव की आहट सुनाई दी है, उसके प्रति देश-भर में बहुत उत्सुकता है.

ओमप्रकाश कश्यप

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