सापेक्षिक न्याय : राज्य और समाज का सदाचरण

धर्म और अभिजन संस्कृति — 14

 
ब्रह्मांड में ऐसा कोई सद्गुण नहीं है, जो सही मायने में इतना महान और ईश्वर-तुल्य हो, जितना न्याय….अतएव सर्वज्ञों और सर्वसत्तावादियों से प्रार्थना है कि वे समाज में न्याय की स्थापना हेतु यथासंभव प्रयत्न करें.’1— एडीसन.

राज्य नागरिकों का सर्वसम्मत विधान है. उसका औचित्य सबका बना रहने में है. यह तभी संभव है, जब लोगों का उसमें विश्वास हो. यह विश्वास हो कि राज्य उनकी अपेक्षाओं की पूर्ति करने में सक्षम है. यह काम राज्य और नागरिकों के बीच दूरी अथवा दुराव के रहते संभव नहीं. यदि राज्य तथा नागरिकों के बीच दूरी होगी तो नागरिक अपने मनोभावों, सपनों और सचाइयों को खुद तक सीमित रखेंगे. उन्हें राज्य या उसके प्रतिनिधियों के समक्ष खुलकर रख ही नहीं पाएंगे. इससे प्रकारांतर में राज्य की गतिविधियों में उनकी रुचि का हृास होगा. अवसर का लाभ उठाकर राज्य का कामकाज संभाल रहे लोग, स्वयं को साधारणजन से ऊपर रखकर अपने लिए विशिष्ट सुख-साधनों की मांग करने लगेंगे. परिणामस्वरूप राज्य में समाजार्थिक स्तरीकरण बढ़ेगा, जन तथा अभिजन के अविश्वास में वृद्धि होगी. उसका दोनों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. नागरिकों का राज्य में विश्वास अक्षुण्ण रहे. उसके साथ जुड़कर वे गर्व का अनुभव करें, इसके लिए राज्य की अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों की ओर सतत प्रयत्नशीलता अत्यावश्यक है. साथ में जरूरी है समाज द्वारा समान, स्थिर समाजार्थिक विकास के साथ सामाजिक समरसता की ओर अग्रसर रहना. सामाजिक अतर्द्वद्वों को न्यूनतम रखने हेतु ध्यान रखना कि राज्य में जन और अभिजन जैसे टापू न बनने पाएं. यदि कुछ बनें भी तो उनमें आपसी विश्वास, लेन-देन और संचरण का रिश्ता हो. लेकिन राज्य एक जटिल संरचना है. उसके बहुत-से मामले होते हैं, जिनके संचालन हेतु विशेषज्ञ योग्यता आवश्यक होती है. विकास के लिए भी नए ज्ञान और प्रौद्योगिकी की जरूरत पड़ती है. इसलिए राज्य को यह छूट देनी होगी कि विकास और उत्पादन-स्तर बनाए रखने हेतु उसे जिस तरह की तकनीक और प्रौद्योगिकीय कौशल चाहिए, उसका सर्वकल्याण हेतु उत्पादन और उपयोग करे. आवश्यकतानुसार वैज्ञानिक शोध और आविष्कारों को बढ़ावा दे. इस सावधानी के साथ कि समाज, राजनीति, शिक्षा, प्रौद्योगिकी अथवा किसी अन्य किस्म की विशेषज्ञता के आधार पर नागरिकों के बीच किसी भी प्रकार का स्थायी भेदभाव अथवा स्तरीकरण न पनप सके. नागरिकों को उनकी आवश्यकता की वस्तुएं आसानी से उपलब्ध हों, ताकि समाज में कल्याण के न्यूनतम स्तर को बनाए रखना संभव हो. यह लक्ष्य समानता और समरसता के बगैर संभव नहीं. कई बार, विकास की चुनौतियों तथा निरंतर बढ़ती लोकेष्णाओं के बीच, राज्य के लिए एक ही समय में अपने सभी नागरिकों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति कर पाना असंभव-सा होता है. विशेषकर तब जब समाज में अलग-अलग सोच, रुचि एवं असमान बौद्धिक सामर्थ्य वाले लोग रहते हों. उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग हो. ऐसे में राज्य के लिए अपने सभी नागरिकों के विकास के एक समान स्तर को बनाए रखना असंभव प्रतीत होने लगता है. उसमें से कुछ के लिए राज्य जिम्मेदार होता है. कुछ कारण उसके भी नियंत्रण से बाहर होते हैं. उनके समाहार हेतु राज्य केवल अनुकूल परिवेश का सृजन कर सकता है.

सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, संसाधनों की अतिरिक्त उपलब्धता, विरासत में प्राप्त शिल्प-कौशल, धन-संपदा आदि के आधार पर समाज में कुछ नागरिक दूसरों की अपेक्षा सदैव वरीयता की स्थिति में होते हैं. ऐसे में राज्य का समान, सर्वतोन्मुखी विकास सभी नागरिकों को बराबर संसाधन उपलब्ध करा देने-भर से संभव नहीं है. तदनुसार जो व्यक्ति संसाधन, शिल्प-कौशल, शिक्षा अथवा विशिष्ट पारिवारिक-सामाजिक पृष्ठभूमि, विरासत से प्राप्त संपदा-संसाधनों के मामले में दूसरों से आगे होंगे, अवसर मिलते ही वे उन्हें पीछे छोड़कर आगे निकल सकते हैं. उदाहरण के लिए उत्पादकता में सहायक योग्यताओं जैसे शिक्षा, संसाधन, पारिवारिक पृष्ठभूमि, तकनीक-कौशल, अनुभव आदि में से प्रत्येक को यदि एक-एक अंक दे दिया जाए तो ऊपरोल्लिखित पांचों गुणों से संपन्न व्यक्ति को पूरे पांच अंक प्राप्त होंगे. तब अनुभवहीन अथवा सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े हुए व्यक्ति को उपर्युक्त सभी विशेषताओं से संपन्न व्यक्ति की अपेक्षा कम अंकों से समझौता करना पड़ेगा. यदि आरंभिक बिंदू को बलपूर्वक एकसमान कर दिया जाए? कोई अनुदार अथवा कट्टर समानतावादी राज्य लोगों को परिवार एवं विरासत के आधार पर मिलनेवाले वाले लाभों से वंचित करते हुए, समस्त संपत्ति को राज्य की घोषित कर व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा को ही समाप्त कर दे तब? प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में अनुशंसा की है कि बालक को जन्म से ही परिवार से दूर रखकर राज्य के नियंत्रण में उनका पालन-पोषण किया जाए, संतान की पहचान को उसके माता-पिता से भी गोपनीय रखा जाए. उसी अवस्था में बच्चों को उनकी रुचि अनुसार अनुकूल शिक्षा के अलावा आवश्यक हस्त-कौशल की जानकारी दी जानी चाहिए. इस अतिसमानतावादी द्रष्टिकोण को अव्यावहारिक मानकर प्लेटो के शिष्य अरस्तु ने ही नजरंदाज कर दिया था. वह उचित भी था. इसलिए कि न्याय का उद्देश्य व्यक्ति को किसी भी प्रकार की दासता से बाहर लाकर मुक्ति का एहसास कराना है, ताकि समाज में रहकर वह अपनी योग्यता का भरपूर उपयोग कर सके तथा उसके माध्यम से अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सके. प्लेटो के विचारों से राज्य की तानाशाही झलकती थी, व्यक्ति की निजी पसंदों और रुचियों को उसमें उपेक्षित रखा गया था. इसके बावजूद समाजार्थिक वैषम्य को कम करने के लिए व्यक्तिगत संपत्ति के उन्मूलन की मांग समानतावादी विचारकों की ओर से निरंतर उठती रही है. उनीसवीं शताब्दी में तो बड़े-बड़े समाजवादी दार्शनिकों द्वारा इसका समर्थन किया गया था. तब, समानतावादियों की मांग के चलते आज भी क्या यह उचित होगा कि प्रत्येक बालक को उसकी रुचि के अनुसार शिक्षण-प्रशिक्षण के समान अवसर दिए जाएं और वयस्कता की उम्र में प्रवेश करते ही उसे सुविधाओं और संसाधनों के पूर्वनिर्धारित पैकेट के साथ समाज में आगे बढ़ने के लिए छोड़ दिया जाए? समाज में समानता की स्थापना की दिशा में यह प्रथम दृष्टया आदर्श प्रणाली हो सकती है. मगर इससे शत-प्रतिशत समानता के लक्ष्य को प्राप्त करना असंभव ही होगा. उस अवस्था में व्यक्ति की रुचियां, अनुभव, सीखने की प्रवृत्ति, परिवेश, राजनीति तथा परिस्थितियां भविष्य में उसकी प्रगति की दिशा को तय करेंगी.

आशय है कि किसी भी ज्ञात प्रविधि द्वारा समानता के लक्ष्य को शत-प्रतिशत प्राप्त करना नामुमकिन है. लोगों की, भले ही वे संख्या में कितने कम क्यों न हों, मर्जी के बगैर समानता के नाम पर की गई अतिवादी कार्रवाही राज्य का निरंकुश आचरण माना जाएगा. उसका प्रतिकूल असर लोगों की उत्पादन क्षमता पर पड़ेगा. ऐसे में सामाजिक समानता तथा व्यक्ति की अधिकतम उत्पादकता के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए राज्य का क्या कर्तव्य है? मनुष्य के व्यक्तिगत और सामाजिक कर्तव्य के बीच तालमेल कैसे संभव हो? कोई व्यक्ति तभी पूरी तरह स्वतंत्र कहा जा सकता है, जब उसका अपने श्रम पर अधिकार हो. सामाजिक नैतिकता भी यही कहती है कि अपने बुद्धि-कौशल तथा श्रम-सामर्थ्य से व्यक्ति जो अर्जित करता है, उसका लाभ उसे मिलना ही चाहिए. दूसरे शब्दों में यदि कोई व्यक्ति अपने पड़ोसी की अपेक्षा अधिक परिश्रमी और बुद्धिमान; तथा अपने श्रम और बुद्धि-कौशल द्वारा अतिरिक्त धनार्जन करने में सक्षम है—तब यह अनुचित होगा कि उसके द्वारा युक्तियुक्त ढंग से अर्जित की गई संपदा को ऐसे व्यक्तियों में बांट दिया जाए जो स्वभाव से ही कम परिश्रमी, आलसी तथा बुद्धि-कौशल में पिछड़े हुए हैं. यदि राज्य ऐसा करने का आदेश देता है, तो मानना होगा कि वह न केवल व्यक्ति-स्वातंत्रय की सीमाओं में अवांछित और अनैतिक हस्तक्षेप कर रहा है. साथ में व्यक्ति को अपने श्रम के लाभों से भी वंचित कर रहा है, जिनपर उसका नैतिक और सामाजिक अधिकार है. फिर भी आदर्श राज्य के लिए यह संभव नहीं कि सभी कुछ परिस्थितियों के हवाले कर दिया जाए. उस अवस्था में राज्य के संसाधन तथा विकास की बागडोर ऐसे लोगों तक सिमटने लगेगी, जो वरीयताक्रम में पहले से ही आगे हैं. यह न केवल राज्य के अस्तित्व की अवमानना होगी, बल्कि माना जाएगा कि राज्य व्यक्तिमात्र को विकास की धारा में दृढ़तापूर्वक बने रहने में सक्षम बनाने के अपने दायित्व को पूरा करने में भी असफल रहा है. तब ऐसी कौन-सी प्रेरणाएं हो सकती हैं, जो व्यक्ति को अपने और शेष समाज के हित में अधिकतम योगदान के लिए उत्सुक करें! इस तरह की सकारात्मक प्रेरणाओं की पहचान तथा उनका लोकहित में समयानुसार एवं न्यायपूर्ण ढंग से उपयोग, राज्य की सफलता को निर्धारित करता है. इसके लिए व्यक्ति तथा राज्य के बीच विश्वास और संबंधों की अंतरंगता आवश्यक है, जो राज्य की सत्ता पर आरूढ़ शक्तियों के अहंकार के कारण संभव नहीं हो पाती. प्रायः देखा जाता है कि व्यक्ति की अपने परिवार और समाज के साथ जैसी अंतरंगता होती है, वैसी निकटता राज्य के साथ नहीं बन पाती. लोग भूल जाते हैं कि राज्य समाज से पृथक न होकर, समाज की ही अधिरचना है. प्रबुद्ध नागरिक तथा जनसमाज आंतरिक-बाह्यः सुरक्षा, शांति, खुशहाली, विकास की निरंतरता तथा अंतरराष्ट्रीय संबंध हेतु राज्य का गठन करते हैं. व्यवस्था को बनाए रखने के लिए समाज राज्य को पर्याप्त मात्रा में कानून तथा संसाधनों के उपयोग का अधिकार प्रदान कर, सक्षम बनाता है. समाज की अनुमति से ही राज्य को कानून बनाने तथा उन्हें लागू करने के लिए आवश्यक संस्थाओं के गठन का अधिकार मिल जाता है. लोग सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकलापों को अपना समझकर उसमें हिस्सेदारी करते हैं, किंतु अज्ञानतावश यह मान लेते हैं कि राज्य का संचालन विशिष्ट लोगों का कार्य है. इसलिए वे राज्य के निर्णयों में हस्तक्षेप करने से उस समय तक दूर बने रहते हैं, जब तक कि उन्हें इसके लिए बार-बार आमंत्रित नहीं किया जाता. कई बार इसमें बहुत देर हो जाती है. अकसर धर्म के वायवी प्रलोभन व्यक्ति की प्राथमिकताओं को बदल देते हैं. उनमें फंसकर व्यक्ति राज्य के कार्यकलापों की ओर से उदासीन हो जाता है. जनसाधारण का राज्य की गतिविधियों का मूक दृष्टा बन जाना, सत्तारूढ़ शक्तियों को मनमानी का अवसर देता है. परिणामस्वरूप वे संस्थाएं जिनके गठन के लोककल्याण की प्रेरणा थी, अपने सरोकार भुलाकर स्वार्थी तत्वों की ख्वाबगाह बनने लगती हैं,

दरअसल हर समाज की विशिष्ट परंपरा और संस्कृति होती है. उन्हें वह किसी भी प्रकार के कानून और संविधान से अधिक महत्त्व देता है. निजी व्यवहार में वह उन्हीं से अनुशासित भी होता है. इसलिए राज्य की पैत्रिक संस्था होने के बावजूद समाज उसकी ओर से उदासीन बना रहता है. समाज के अंकुश, उपेक्षा अथवा अज्ञान के अभाव में राज्य स्वयं को स्वयंभू सत्ता समझने लगता है. भुला देता है कि वह समाज की ही संरचना है. व्यवहार में प्रत्येक व्यक्ति दो भिन्न संस्थाओं यथा राज्य एवं समाज से अनुशासित होने लगता है. चूंकि पुलिस, कानून, सैन्य-बल आदि राज्य के अधीन होते हैं, इसलिए प्रकारांतर में वह स्वयं को असीमित अधिकार संपन्न, समाज की अपेक्षा वरिष्ठ सत्ता मानने लगता है. चूंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, अपने रोजमर्रा के जीवन में मनुष्य का वास्ता राज्य की अपेक्षा समाज से ज्यादा पड़ता है, जहां जाति, धर्म, समुदाय जैसे प्रलोभन तथा दैनिक जीवन की समस्याएं उसे उलझाए रखती हैं. इसलिए राज्य के अधिकार-क्षेत्र पर कोई सवालिया निशान लगाने के बजाय वह सामाजिकता के अपने दायरे में ही खुश रहता है. राज्य की गतिविधियों की ओर से स्वाभाविक-सी उदासीनता उसे घेरे रहती है. वह मान लेता है कि राजनीतिक निर्णय लेना सरकार तथा उसके चुने हुए प्रतिनिधियों का कार्य है, जिन्हें उसने यह जिम्मेदारी सौंपी है. अवसर का लाभ उठाकर राज्य ऐसे कानून बनाने में सफल हो जाता है, जो उसकी अधिसत्ता को और ज्यादा मजबूत तथा समाज-निरपेक्ष बनाते हों. चूंकि राज्य के कानून सत्ता पर विद्यमान लोगों, जो जनता की उदासीनता के चलते उसे अपना अधिकार समझने का भ्रम पाल बैठते हैं, द्वारा बनाए जाते हैं, इसलिए वे शक्तिशाली का समर्थन करते हुए नजर आते हैं. फिर जैसे-जैसे राज्य शक्तिशाली होता है, वह न्याय, नीति और निष्पक्षता की भावना से निरंतर दूर खिसकता जाता है.

निष्पक्षता दो प्रकार से संभव है. एक तो राज्य स्वयं अपने नागरिकों के साथ समानतावादी द्रष्टिकोण अपनाए, उनके लिए ऐसा वातावरण विरचित करे, जिसमें व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का संपूर्ण अनुभव करते हुए अपने निर्बंध विकास की ओर अग्रसर हो सके. राज्य स्वयं व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए स्वयं प्रेरक सत्ता बना रहे. दूसरे उन कारकों का समाधान खोजे, जो परोक्ष रूप में व्यक्ति की उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं, जैसे धर्म, जाति, संप्रदाय, क्षेत्रीयतावाद, भाई-भतीजावाद आदि—और इनका निराकरण करते हुए बगैर किसी भेदभाव के सर्वांगीण विकास हेतु कार्य करे. किंतु राज्य की निष्पक्षता एकदम वस्तुनिष्ट नहीं हो सकती. दो और दो चार का सीधा-सा गणित यहां उपयोगी नहीं होता. हम ऊपर भी देख चुके हैं कि निरा समानतावादी द्रष्टिकोण समाज में न्याय की स्थापना के लिए अपर्याप्त है. खासकर तब जब समाज में जाति, धर्म, आय-विभाजन तथा संसाधनों के वितरण में पहले से ही घोर असमानताएं हों. हमें यह समझना होगा कि समाज में व्याप्त असमानता, स्वार्थपरकता, अलगाववाद के लिए केवल व्यक्ति या समाज जिम्मेदार नहीं होते. वे विभेदकारी, सांप्रदायिक राजनीति के चलते कई बार ऊपर से भी थोप दिए जाते हैं. मनुष्य समाज में रहकर जो विचारदृष्टि ग्रहण करता है, उसमें राज-समाज का भी बड़ा योगदान होता है. दूसरे शब्दों में व्यक्ति के सोच में अलगाव पैदा करने, उसे स्वार्थी और शंकालु बनाने में राज्य भी बराबर का जिम्मेदार होता है. ‘यथा राजा, तथा प्रजा’ के मुहावरे के साथ हर कोई शिखरस्थ शक्तियों का अनुसरण करना चाहता है. बकौल पाउलो फ्रेरा परिवर्तन के आरंभिक चरण में उत्पीड़ित जन उत्पीड़क का अंधानुकरण करता है. जाहिर है व्यक्ति कुछ अपने अनुभव से सीखता है, कुछ बाहरी प्रेरणाओं से तथा कुछ राज्य के स्वार्थपूर्ण आचरण के प्रतिकारस्वरूप सोचने-करने को बाध्य होता है. शंकालु अवस्था में वह उचित-अनुचित का निर्णय कर पाने में असमर्थ रहता है. राज्य का दायित्वों की ओर से भटकाव प्रकारांतर में व्यक्ति को जिम्मेदारियों से पलायन को उकसाता है, जिससे अव्यवस्थाएं जन्म लेती हैं.

उपर्युक्त विवेचन द्वारा समाज में न्याय की स्थापना में व्यक्ति और राज्य की भूमिकाओं को समझा जा सकता है. तदनुसार राज्य का प्रथम दायित्व है कि लोकहित तथा नागरिक इच्छाओं में तालमेल बनाया जाए. यदि मनुष्य को लगता है कि धन के आधार पर उसके हितों को सुरक्षा मिल सकती है और उसके द्वारा कमाए गए धन पर केवल उसी का अधिकार होना चाहिए, तब समाज का कर्तव्य है कि उसके विश्वास की रक्षा करे. कम से कम उस सीमा तक जब तक उसको लगता है कि व्यक्ति का योगदान शेष समाज के लिए भी मंगलकारी है. यदि समाज यह मानता है कि धन के बजाय, विशिष्ट सुविधाओं का पैकेज व्यक्ति और समाज दोनों के लिए अधिक लाभकारी है, तो वह उन व्यक्तियों को भी विश्वास के दायरे में लाने का प्रयास करे, जो धन को अपने सुख-साधन के लिए जरूरी मानते हैं. यह कार्य धैर्यपूर्वक और लोगों को विश्वास में लेकर किया जाना चाहिए. इस बीच राज्य को सामाजिक समानता एवं समरसता की दिशा में प्रयास करते रहना चाहिए. यह तभी संभव है, जब राज्य की निर्णय-प्रक्रिया पारदर्शी हो; और व्यक्तिमात्र को यह विश्वास हो कि कुछ भी ऊपर से थोपा नहीं जा रहा है. नागरिकों का विश्वास अर्जित करने के लिए आवश्यक है कि राज्य, कल्याण के विभाजन में एकदम निष्पक्ष, निरपेक्ष, कार्यसक्षम और न्यायसंगत बना रहे.

न्याय जैसा कि हम जानते हैं राष्ट्र और नागरिकों को एक-दूसरे के प्रति विश्वसनीय और संवेदनशील बनाता है. वह राज्य और समाज के बीच स्नायुतंत्र की भांति काम करता है. किसी भी संवेदनशील राज्य से उसके नागरिकों की समस्याएं छिपी नहीं रहतीं. समस्याओं के समाधान को वह न्याय के रूप में लौटाता है. समाज में न्याय की पैठ का स्तर, उसकी आत्मनिर्भरता के स्तर को दर्शाता है. उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि राज्य अपने दायित्व पालन की ओर कितनी गंभीरता से अग्रसर है. यह अन्यत्र भी साफ कर चुके हैं कि मनुष्य समाज में बेहतर जीवन की उम्मीद के साथ सम्मिलित होता है. उस समय मनुष्य अपनी स्वतंत्रता के एक हिस्से की बलि यह सोचकर चढ़ाता है कि समाज के साथ रहते हुए वह अपनों के सान्निध्य सुख के साथ-साथ, अपनी अवशिष्ट स्वतंत्रता को भली-भांति भोग सकेगा. अर्जित संपत्ति पर उसका अपना नियंत्रण होगा और समाज उसके जीवन और संपत्ति की सुरक्षा करेगा. समाज उसके लिए ऐसा वातावरण भी बनाएगा, जहां वह अपनी उत्पादकता के आदान-प्रदान द्वारा अधिकतम सुख और स्वतंत्रता भोग सके. दूसरे शब्दों में उत्पादकता के लाभों पर अधिकार व्यक्ति का सबसे बड़ा प्रेरक-तत्व है. लेकिन समाज के अपने लक्ष्य होते हैं. प्रत्येक व्यक्ति को मनमाना आचरण करने की छूट समाज नहीं दे सकता. इसलिए भी कि वह जानता है कि प्रत्येक व्यक्ति की रुचियों और कार्यक्षमता में अंतर होता है. दूसरे समाज के लिए ऐसी वस्तुएं भी जरूरी होती हैं, जिनका निर्माण काफी श्रम-साध्य, अप्रीतिकर और अल्पलाभकारी हो. यदि सभी व्यक्तियों को मनमानी करने की छूट दे दी जाए तो ऐसे कार्यों में जहां अत्यधिक श्रम के बावजूद उत्पादकता न्यूनतम है उन्हें, जब तक कोई मजबूरी न हो, कम ही लोग अपनाने को उद्यत होंगे. वह स्थिति न केवल आर्थिक, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक असमानता का कारण भी बनेगी.

राज्य चूंकि नागरिकों का सर्वसम्मत विधान, उनकी सम्मिलित चेतना की अनुकृति है, इसलिए होना यह भी चाहिए कि उसकी व्याप्ति लोगों की संचेतना और भावभूमि का हिस्सा बने. राज्य के गठन के पीछे जो औचित्य है, उसका नागरिकों को भली-भांति बोध हो. ताकि स्पर्धा के बीच भी उनमें अविकल सहयोग की भावना बनी रहे. लोग दूसरों को पीछे ढकेलकर खुद आगे निकल जाने की कोशिश करने के बजाय, सभी को साथ लेकर चलने को प्रतिबद्ध हों. इस तरह की प्रेरणा, उत्प्रेरणा के लिए राज्य की आवश्यकता पड़ती है. इसके बावजूद राज्य का संचालन कर रहे लोग, अनेक अवसरों पर खुद को दूसरों से विशिष्ट मानकर उसके संसाधनों पर अधिकार जमाने लगते हैं. उनके विशिष्टताबोध अथवा अभिजात संस्कारों के चलते जीवन और समाज में राज्य की उपस्थिति केवल सरकार तथा उसके द्वारा गढ़े गए पुलिस, कानून, सुरक्षाबल आदि संस्थाओं में नजर आती है. चूंकि सरकार और उसके सभी विधान, चुने हुए लोगों द्वारा गढ़े जाते हैं तथा प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के चलते उन्हें विशिष्ट महत्त्च प्राप्त होता है, अतएव समाज की सामूहिक चेतना का प्रतीक नजर आने के बजाए समस्त विधान तथा उनके आधार पर गठित संस्थाएं, जिनमें संसद और विधायिकाएं भी सम्मिलित हैं, शक्तिशाली समूह के हितों के संरक्षक नजर आते हैं. परिणामस्वरूप आमजन स्वयं को आहत और उपेक्षित समझने लगता है. प्रकारांतर में उसका राज्य की ओर से विश्वास घटने लगता है. धीरे-धीरे लोग भूलने लगते हैं कि राज्य उन्हीं का कार्य है. लोक-निगरानी घटने से सत्तारूढ़ शक्तियां निरंकुश आचरण करने लगती हैं, जिससे सामाजिक असंतोषों में वृद्धि होती है.

निष्पक्षतावाद या न्यायवाद कम से कम 2500 वर्ष पुराना विचार है. उसका आशय राज्य की सुख-समृद्धि तथा सुरक्षा के लिए नागरिक कर्तव्यों, अधिकारों तथा सामाजिक आचार-संहिताओं का समायोजन करना है. लेकिन जिस न्यायवाद पर हम यहां विचार करने जा रहे हैं, उसका सीधा-सा मंतव्य है कि न्याय कानूनी मर्यादाओं से आगे बढ़कर कार्य करे. उन लोगों के लिए कल्याण में भागीदारी सुनिश्चित करे जो जन्म, प्रकृति, धर्म, रंग-भेद या अन्य किसी कारण से विकास की धारा से बाहर हैं. यह अपने औचित्य में जनसाधारण का विश्वास लौटाने के लिए लिया गया राज्य का संकल्प है. उसके माध्यम से राज्य नागरिकों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास करता है कि वह सभी का है तथा बिना किसी भेदभाव के, अपने संपूर्ण सामर्थ्य के साथ, सभी के विकास हेतु सतत तत्पर है. उसकी निगाह में सभी नागरिक बराबर हैं. जो कुछ उसके अधिकार में है, उसपर सभी नागरिकों का समानाधिकार है. साथ ही ऐसे सभी व्यक्तियों पर राज्य की विशेष संवेदन-दृष्टि है, जो जन्म अथवा अन्य किसी सामाजिक या प्रकृतिजन्य कारण से विकास की स्पर्धा में पिछड़ चुके हैं. वितरणात्मक न्याय का यह उदार चेहरा है, जो विकास के अंतिम छोर पर मौजूद नागरिकों को अतिरिक्त सहायता देने का आश्वासन देता है. इसके विचारक जॉन राउल्स हैं. ‘जस्टिस फा॓र फेयरनेस’ अर्थात ‘निष्पक्षता के लिए न्याय’ नाम से प्रसिद्ध राउल्स का यह सिद्धांत असल में उपयोगितावाद का ही संशोधित संस्करण है. गौरतलब है कि बैंथम के बाद से ही उपयोगितावाद न्यायवादी विचारकों का पंसदीदा दर्शन था. धीरे-धीरे इस विचारधारा की कमजोरियां सामने आने लगीं, जो सैद्धांतिक कम, व्यावहारिक ज्यादा थीं. बैंथम समेत अधिकांश उपयोगितावादी विचारकों के मतानुसार सुख का आशय, दूसरों के सुख में अपना सुख खोजने से था. उसके कथन, ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख’ का यही निहितार्थ है. इसमें परोक्षतः सर्वकल्याण की भावना छिपी थी. कालांतर में पूंजीवादी होड़ के बीच व्यक्तिवादी दर्शन खूब पनपा, जिससे उपयोगितावादी मंतव्य दूसरों की चिंता से बेपरवाह, व्यक्तिगत सुख को महत्त्व देने वाली विचारधारा तक सिमटने लगा. यह मान लिया गया कि अगर उद्योग तथा आय के दूसरे साधन बढ़ेंगे तो उनका लाभ रिसकर निचले वर्गों तक भी पहुंचेगा. पूंजीवाद समर्थक अर्थशास्त्रियों ने इसका बढ़-चढ़कर प्रचार किया, जिसके चलते इसे पूर्णतः स्वाभाविक प्रक्रिया मान लिया गया. पूंजीपति उद्यमियों की मांग थी कि उत्पाद तथा उससे जुड़ी गतिविधियों पर सरकार का न्यूनतम हस्तक्षेप हो. इस विचार को अर्थशास्त्रियों ने मुहावरेदार भाषा में ‘लेजेज फेयर’ का नाम दिया. सरकार से कहा गया कि उसका उत्पादन तथा उससे जुड़ी गतिविधियों से दूर रहना ही श्रेयस्कर है. राजनीति अस्थिरता तथा राजसत्ताओं के शोषणकारी रवैये ने इसे खूब फैलाव दिया. भाड़े के बुद्धिजीवियों तथा अर्थशास्त्रियों की मदद से यह मुहावरा बीसवीं शताब्दी के दौरान लगातार चर्चा में बना रहा. उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि उत्पादन जरूरत के बजाय लार्भाजन को ध्यान में रखकर किया जाने लगा. इससे ऊपरले वर्गों की ओर पूंजी के प्रवाह में तेजी आई. छोटे-छोटे उद्योग दम तोड़ने लगे और उत्पादन कुछ हाथों तक सिमटता गया. आगे चलकर पूरी दुनिया उत्पादक और उपभोक्ता नाम के दो वर्गों में बंटती चली गई.

उपयोगितावाद और सुखवाद जैसे दर्शन भले ही पुराने हों, मगर इन्हें वास्तविक सम्मान बीसवीं शताब्दी में मिला. उस समय जब तीव्र मशीनीकरण से उत्पादन व्यवस्था में तेजी आई थी. नए उत्पादों को खपाने के लिए नए बाजारों की जरूरत थी. यह काम पुरानी विचारधाराओं के चलते, जिनका जन्म सामंतवाद और साम्राज्यवादी विस्तार के दिनों में हुआ था—असंभव था. इसलिए औपनिवेशीकरण को बल मिला. वैचारिक संक्रमण के बीच व्यक्ति-स्वातंत्रय, मानवाधिकार, सुखवाद, उपयोगितावाद जैसी विचारधाराओं ने उनीसवीं शताब्दी में जन्म लिया, जिनका उस शती के मानस को बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा. सामंतवादी दौर में टकराव सीधा और स्पष्ट होता था. औपनिवेशीकरण के बीच टकराव के मायने ही बदल गए. वहां समर्थन और विरोध साथ-साथ थे. बाजार पर छाए रहने के लिए इतनी महीन और कूटनीतिक चालें चली जातीं कि उनकी स्वतंत्र पहचान करना, अलग-अलग हों तो वे कब गड्ड-मड्ड हो जाएं—इसका अनुमान लगाना, बहुत ही कठिन था. पूंजीवाद सीधे-सीधे मुनाफे की संस्कृति पर टिका था. वही उसका एकमात्र मंत्र था. उससे अलग उसका कोई विचार ही नहीं था. मुनाफे के लिए हर विचारधारा को अनुकूल मोड़ देना, उससे काम लेना उसे बाखूबी आता था. नतीजा यह हुआ कि पूंजीवाद समर्थक विचारकों ने व्यक्ति-स्वातंत्रय, मानवाधिकार, उपयोगितावाद को निरे व्यक्तिवाद में ढालने की कोशिश की. उसमें वे सफल भी हुए. इसलिए आधुनिक सभ्यता को औद्योगिक क्रांति का कर्जमंद कहा जा सकता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि औद्योगिक क्रांति को सफल बनाने में पूंजीवाद की बड़ी भूमिका थी. लेकिन अधिक से अधिक लाभार्जन की लालसा ने पूंजीवाद को दुबारा उन्हीं सामंती संस्कारों के करीब ला दिया था, जिनसे मुक्ति की कामना, पूंजीवाद के समर्थन में उतरी आरंभिक प्रेरणाओं में से एक थी. स्मरणीय है कि पूंजीवाद के उठान को मशीनीकरण ने संभव बनाया था. उसके मूल में वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय क्रांति थी. वह स्वयं में वैचारिक क्रांति की देन थी. उसने यूरोप में अनेक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों को जन्म दिया था. लेकिन राज्य-प्रमुखों की निजी महत्त्वाकांक्षा तथा विश्व-युद्धों के बीच मिले अवसर ने पूंजीवाद को अनपेक्षित सफलता दी. परिणामस्वरूप परिवर्तनकामी विचारधाराओं का प्रभाव घटने लगा. उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए चलाए गए प्रचार अभियान मनुष्य को विवेकवान बनाने के बजाय, उसे भरमाने वाले सिद्ध हुए. उनके उभार के फलस्वरूप बने राज्यों की संख्या घटने लगी. इस सफलता से उत्साहित पूंजीवाद के समर्थक अवधूत, बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ‘विचारधारा के अंत’ की भविष्यवाणी करने लगे थे.

जॉन स्टुअर्ट मिल जैसे बाद के सुखवादी विचारकों ने सुखवाद और नैतिकता के बीच की दूरी को पाटने की भरपूर कोशिश की. शासन समाज की स्वैच्छिक अनुशासन पद्धति है. लोकानुभव से संपन्न राजनीतिक संस्थाएं विराट सामाजिक संदर्भों का हिस्सा होती हैं, वही संदर्भ उन्हें अनुशासित करते हैं. इसलिए यदि व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना है, साथ में यह तय करना है कि राज्य उसकी स्वतंत्रता में किसी प्रकार की बाधा न बने तो समाज में भी शांति, स्वतंत्रता और सहिष्णुता की भावना होनी चाहिए. मिल का मानना था कि उदारवादी शासन के पीछे उदारवादी समाज भी होना चाहिए. उसकी निगाह में स्वतंत्रता का महत्त्व इसलिए नहीं है कि वह मनुष्य के लिए सुखों को संभव बनाती है अथवा उसे भौतिक सिद्धियां अर्जित करने का अवसर देती है, बल्कि उसका महत्त्व इसलिए है कि वह उत्तरदायी मनुष्य की सहज और स्वाभाविक अवस्था है. लेकिन मिल की सामान्य उपभोग और सुख को नैतिकता से आबद्ध करने की तमाम कोशिशों के बावजूद, उपयोगितावाद और सामान्य नैतिकता के बीच उतनी ही दूरी बनी रही, जितनी व्यवहार और आदर्श के बीच होती है. इसकी संभावना मिल को भी थी. एक परिपक्व बुद्धिजीवी और संवेदनशील इंसान के रूप में वह व्यावहारिक राजनीति की समस्याओं से भी परिचित था. उसका मानना था कि समाज का लोकतंत्रीकरण, व्यक्तिगत गौरव के असंगत सिद्ध होगा. सत्ता-लोलुप समाजार्थिक, राजनीतिक शक्तियां व्यक्ति के विवेक को अपने स्वार्थ के अनुकूल मोड़ने की कोशिश करेंगी. आगे चलकर समाज में सत्ता, पूंजी और धर्म का जैसा गठजोड़ बना, उसने मिल की इस संभावना को पूरी तरह सच सिद्ध कर दिया. लोकतंत्र भीड़तंत्र में ढलते गए. उत्तरदायी राज्य का सपना धूमिल होता गया. यह औद्योगिक विकास की असफलता थी, जिसने ने बीसवीं शताब्दी में अनेक जनक्रांतियों को जन्म दिया. उनके स्वरूप भले अलग-अलग हों, ध्येय केवल एक था, समाज में न्याय की स्थापना. विकास से वंचित उसी से आगे चलकर वितरणात्मक न्याय की अवधारणा विकसित हुई. उसका ध्येय पूंजी और ताकत के इशारे पर नाचती राजसत्ताओं का नैतिक मार्गदर्शन करना था, उस सामाजिक नैतिकता को वापस लाना था जिसे साम्राज्यवाद के लंबे दौर में करीब-करीब बिसरा दिया गया था.

उपयोगितावादी न्याय के अनुसार समाज में सरकार की भूमिका व्यवस्थापक अथवा समन्वयक की होनी चाहिए. उसका दायित्व ऐसे परिवेश का निर्माण करना है, जिसमें सदस्य इकाइयां अपनी अधिकतम उत्पादकता को बनाए रख सकें. यह तभी संभव है जब सरकार कल्याण के वितरण हेतु संसाधनों को स्वयं खपाने के बजाय लोगों को उसके लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करे. ऐसे प्रबंध करे ताकि लोग पूरे आत्मविश्वास के साथ समाज और संसाधनों के प्रबंधन के लिए आगे आएं; और स्वयं-स्फूत्र्त भाव से अधिकतम उत्पादकता के लिए कार्य करें. विकास ऊपर से आरोपित न होकर लोगों के स्वैच्छिक सहयोग, आपसी विश्वास और आकांक्षाओं सहित स्वयं-स्फूत्र्त हो. वह कदाचित ऐसे समाज में संभव है, जहां आदर्श स्तर की समानता हो. समाज में न केवल संसाधनों और अवसरों की बराबरी हो, बल्कि वे शिक्षा, अनुभव, योग्यता, रुचि, विकास आदि के मामले में भी परस्पर तालमेल रखते हों. जहां ज्ञान और अनुभव का वैविध्य प्रतिस्पर्धी होने के बजाय एक-दूसरे का सहयोगी और सहायक हो. विकास के समांगीकृत अथवा अधिकतम समांगीकृत स्तर को बनाए रखने की ये आवश्यक शर्तें हैं. व्यवहार में ऐसा संभव नहीं है. विशेषकर ऐसे समाजों में जो विभेदकारी सामाजिक-राजनीतिक नीतियों के शिकार रहे हों, वहां समांगीकृत विकास के लिए असमानता के कारणों की खोज तथा उनका समयानुसार निराकरण जरूरी है. यह काम कानूनों के जखीरे में कुछ नए कानून शामिल कर देने से संभव नहीं है. प्रत्येक कानून, ऊपर से वह चाहे जितना सुरक्षित नजर आता हो, अपने भीतर अनेक छेद लिए रहता है. चालाक लोग उन्हीं का लाभ उठाकर अपने लिए सुरक्षित गलियारे बना लेते हैं. वास्तविक परिवर्तन हेतु लोगों के सोच और जीवनशैली में बदलाव जरूरी है. उदार जनसंस्कृति के विकास द्वारा इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि समाज की वास्तविक शोभा रुचि-वैभिन्न्य, चारित्रिक विविधताओं, संस्कृति तथा ज्ञान की अनेकानेक धाराओं को सहेजकर रखने में है. यही कारण है कि जीवंत समाजों में विकास की अनेक छटाएं विद्यमान होती हैं. व्यक्तिगत रुचियों के अलावा भौगोलिक और परिस्थितिगत कारण भी विकास की दर और दिशाओं को प्रभावित करते हैं. उस अवस्था में विकास को निरे उपयोगितावादी द्रष्टिकोण से परिभाषित करना, समाज की सतही या कहें कि निर्जीव व्याख्या करना है. इसलिए उपयोगितावादी विचारकों का जोर आमतौर पर आय के संसाधनों और अवसरों में समुचित तालमेल बनाए रखने तक सीमित रहता है. उन्हें लगता है कि न्यूनतम आय की सुनिश्चितता द्वारा समाज में अपेक्षित जीवन-स्तर को बनाए रखा जा सकता है. उनकी निगाह में प्रत्येक वस्तु जो मनुष्य के सुख में इजाफा करती है, उपभोग्य है. चूंकि वे मानते हैं निश्चित आय से सुख की निश्चित मात्रा या पैकेज खरीदा जा सकता है. इसलिए उनके अनुसार सुख के सातत्य हेतु उपयुक्त आय की निरंतरता अनिवार्य है. इस सिद्धांत का सामान्यीकरण करते हुए वे मान लेते हैं कि उपयुक्त आय होने पर आनुपातिक सुख की उपलब्धता भी बनी रहेगी. इससे हर कोई अधिकाधिक सुख की चाहत में अधिकाधिक आय के स्रोत तलाशने में जुट जाता है. इस तरह वे चाहे-अनचाहे समाज को अंतहीन स्पर्धा की ओर ढकेल देते हैं, जिसमें हर कोई सुख की दौड़ में दिखाई पड़ता है. वे आय को भी उपभोग्य इकाई के रूप में देखने लगते हैं. परिणामस्वरूप सहयोग, सहिष्णुता, उदारता, करुणा, संवेदना जैसे जीवनमूल्य गायब होने लगते हैं.

उपयोगितावादी मानते हैं कि समाज या व्यक्ति के अधीन उपभोग्य वस्तुओं की औसत मात्रा बढ़ने से सुख की समानुपातिक वृद्धि भी संभव है. चूंकि समाज का ध्येय सदस्य इकाइयों के लिए सुख-सुविधाओं के न्यूनतम स्तर को बनाए रखने के साथ-साथ उनके स्तर में निरंतर सुधार करना है, अतएव उनके सुख में वृद्धि के लिए वह सुविधाओं की आनुपातिक वृद्धि में जुटा रहता है. सुख को आय अथवा सुविधाओं के पैकेज पर आश्रित करते समय वे मान लेते हैं कि समाज की सभी इकाइयों में चाही-अनचाही एकरूपता है. लोग रुचियों, विचार-शक्ति, अनुभव, संसाधन, योग्यता आदि के मामले में एकसमान हैं. जबकि सचाई इसके ठीक उलट होती है. सुख एक अनुभूति है. कुछ खास सुविधाएं इस अनुभूति को उत्पे्ररित कर सकती हैं, किंतु सदैव ऐसा ही हो, यह असंभव है. यदि ऐसा होता तो समाज में असमानताओं के लिए खास जगह ही नहीं होती. उस अवस्था में संभव है, न्याय की आवश्यकता ही नहीं होती. ‘थ्योरी आ॓फ जस्टिस्स’ में जॉन राउल्स इसका कुछ यूं खुलासा करते हैं—

‘समाज में कुछ लोग बहुत जल्दी इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि उपयोगितावाद न्याय की सवार्धिक नीतिसंगत और तार्किक संकल्पना है. उदाहरण के लिए प्रत्येक मनुष्य चाहता है कि उसके हितों को किसी प्रकार का कोई नुकसान न पहुंचे. यदि उस कुछ खोना भी पड़े तो उसकी भरपाई के लिए वह बदले में कुछ न कुछ तत्काल प्राप्त कर लेना चाहता है. व्यक्तिगत-लाभ की दिशा में प्रयत्नरत मनुष्य किसी क्षण यदि कुछ त्याग भी करता है तो महज इसलिए कि वह सोचता है कि आगे चलकर उसकी भरपाई बहुत आसानी से कर सकेगा. देखा जाए तो मानव-मात्र की स्वार्थ की यह वांछा कहीं से भी अनुचित नहीं है. प्रत्येक मनुष्य को यह अधिकार है कि वह अपने अधिकतम हितों को आगे रखकर कार्य करे. दूसरे के हितों को आघात पहुंचाए बगैर जितनी भी संभव और तर्कपूर्ण है, उतनी सुख-सुविधाएं अपने लिए अर्जित करे. समाज व्यक्तियों से मिलकर बना है. उसका ध्येय भी अपनी सदस्य इकाइयों के कल्याण के स्तर को बढ़ाना है. इसलिए यदि व्यक्ति को अपने अधिकतम सुख की दिशा में प्रयत्न करने का अधिकार है तो समाज को भी यह अधिकार स्वतः प्राप्त है. जैसे मनुष्य के कल्याण का स्तर उसे अलग-अलग अवसरों पर, मिलने वाली आत्मतुष्टि, अथवा भोगे गए सुख-संसाधनों की मात्रा से आंकी जा सकती है. इसी तरह समाज के कल्याण का स्तर उसकी सदस्य-इकाइयों की सुखाकांक्षाओं तथा सम्मिलित सुख-साधनों की आपूर्ति से आंका जाता है. चूंकि अकेले व्यक्ति का लक्ष्य अपने कल्याण के उच्चतम स्तर को प्राप्त करना है, ठीक इसी प्रकार समाज का संगठित लक्ष्य सदस्य इकाइयों की कुल इच्छाओं, आकांक्षाओं को प्राप्त करना है. मानवमात्र अपने वर्तमान और भविष्य की प्राप्तियों एवं हानियों के बीच जिस प्रकार संतुलन बनाए रखना चाहता है, ठीक इसी प्रकार समाज भी अपने वर्तमान और भविष्य के लाभ-हानि के बीच संतुलन कायम करने को प्रतिबद्ध होता है. अंतर केवल इतना है कि व्यक्ति अकेला होता है. और समाज व्यक्तियों का समुच्चय. इसलिए समाज की इच्छा में उसकी सदस्य इकाइयों की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है. समाज की तरह उसकी इच्छा भी अनेक व्यक्तियों की इच्छाओं का समुच्चय अथवा पैकेज होती है. सुख की नैसर्गिक लालसा व्यक्तिमात्र को अपनी रुचि के अनुरूप सुख-प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है. ठीक इसी प्रकार एक समाज तभी संगठित और विकासरत रह सकता है, जब वह अपनी अपनी सदस्य इकाइयों की इच्छा-आकांक्षाओं तथा आत्मतुष्टि के बीच तालमेल कायम कर सके.’2

राउल्स के अनुसार व्यक्तिमात्र के सुख और समाज के सुख में केवल ‘एक’ और ‘अनेक’ का अंतर है. हम जानते हैं कि ‘अनेक’ में ‘एक’ भी समाया होता है. इसलिए यदि समाज की कोई एक इकाई भी सुख से वंचित रहती है, तो उससे ‘अनेक’ की मर्यादा पर असर पड़ता है. उसका कुल विकास, भले ही सीमित अंशों में हो, प्रभावित होता है. आदर्श समाज के लिए यह चुनौती कम नहीं होती. ‘एक’ की उपेक्षा ‘अनेक’ के आत्ममुग्ध और गैरजिम्मेदार होने की ओर संकेत करती है. साफ है कि व्यक्ति-स्वातंत्रय पर अतिरिक्त जोर देते हुए उपयोगितावादी विचारक समाज के कुल लक्ष्य को बिसरा देते हैं. समाज की व्यापकता और बहुलता से सम्मोहित हो, उसे बड़ी इकाई और वरीयता प्राप्त इकाई मानने लगते हैं तथा व्यक्ति और समाज के हितों को परस्पर पूरक की भांति प्रस्तुत करने के बजाय, ‘छोटी इकाई’ और ‘बड़ी इकाई’ के भिन्न-भिन्न हित के रूप में देखने लगते हैं. फलस्वरूप व्यक्ति और समाज के हित एक-दूसरे के पूरक, अन्योन्याश्रित लगने के बजाय, परस्पर प्रतिस्पर्धी नजर आने लगते हैं. इसका उपयोग कर स्वार्थी समाजार्थिक शक्तियां समाज और व्यक्ति को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने में कामयाब हो जाती है. धर्म इसमें मददगार की भूमिका निभाता है. परिणामस्वरूप दोनों के बीच अनबूझी प्रतिद्विंद्वता जन्म ले लेती है. उपयोगितावादी दर्शन की इस कमजोरी को जॉन राउल्स ने पकड़ा था. उसके अनुसार उपयोगितावाद की सीमा है कि वह मनुष्य के सुख का सबसे बड़ा हित-चिंतक होने का दावा करते-करते उसे, केवल सुख पैदा करने तथा भोगने की मशीन समझने लगता है. उसके ‘सिस्टम’ में मनुष्य भी पुर्जा बनकर रह जाता है. इस कोशिश में वह मानवीय उच्चादर्शों तथा लोकसंवेदनाओं से अकसर दूर खिसक जाता है, जिनका समाज में न्याय की व्याप्ति हेतु सुरक्षित रहना अत्यावश्यक होता है. राउल्स का निरपेक्ष न्याय का सिद्धांत व्यावहारिक रूप से सभी के सुख को केंद्र में रखते हुए राज्य समेत ऐसी संस्थाओं के गठन पर जोर देता है, जिनके माध्यम से अधिकाधिक लोगों को अधिकाधिक सुख पहुंचाया जा सके. चूंकि स्वतंत्रता, सुख-प्राप्ति एवं सुखोपभोग की प्रमुख अवस्था है, अतएव अधिक से अधिक व्यक्तियों को, अधिक से अधिक सुख पहुंचाने की नीति के चलते उपयोगितावादी अनुशासन के मामले में ढील देते जाते हैं. इससे राज्य में संपन्न, शीर्षस्थ अभिजात तथा सुविधा-साधन से वंचित जनसामान्य के बीच अघोषित स्पर्धा आरंभ हो जाती है. इस बेमेल स्पर्धा में जनसाधारण सदैव घाटे में रहते हैं. परिणामस्वरूप समाज में सुख-सुविधाओं के समान विभाजन के बजाय, उनके छोटे-बड़े टापू बनने लगते हैं. वर्चस्ववादी ताकतों के नेतृत्व में पल रहा राज्य चूंकि स्वयं सुख-सुविधा, वैभव विलास और शक्ति का अविचारी केंद्र होता है, इसलिए निहित स्वार्थों के लिए वह विषमता के प्रतीक उन टापूओं को संरक्षण प्रदान करता है. देखा यह भी जाता है कि पूरे समाज को सुखी बनाने की अपनी सिद्धांतनिष्ठा के चलते, उपयोगितावादी विचारक कुछ व्यक्तियों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने लगते हैं. सुख की उनकी अवधारणा आमजन एवं शिखरस्थ अभिजन के लिए अलग-अलग होती है. मनुष्य समाज के लिए उपयोगी है तो इसका परोक्ष अभिप्राय यह भी है कि उसकी उत्पादकता और कार्यकुशलता का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग को समान रूप से उपलब्ध होना चाहिए. दूसरे मानवमात्र की उत्पादकता और उत्साह बना रहे, इसके लिए समाज का अपनी प्रत्येक इकाई के साथ न्यायपूर्ण ढंग से पेश आना जरूरी है. उधर व्यक्तिमात्र को यह एहसास होना जरूरी है कि समाज और व्यक्ति का संबंध अन्योन्याश्रित है. समाज से कटे मनुष्य का आचरण पशुवत जान पड़ेगा तो मनुष्य के बगैर समाज मकड़ी के बहुत पुराने, धूल-अटे जाले की तरह बेजान दिखने लगेगा. इसलिए मनुष्यता का तकादा है कि प्रत्येक नागरिक अपने श्रम-कौशल एवं बुद्धि-सामर्थ्य का लाभ समाज के अधिकतम लोगों तक पहुंचाने के लिए कृतसंकल्प हो. दूसरी ओर समाज की जिम्मेदारी है कि वह व्यक्तिमात्र के सुखों और अधिकारों का ख्याल रखे तथा उन्हें अकेलेपन और उपेक्षा की अनुभूति न होने दे.

उपयोगितावादी विचारक उत्पादन और वितरण के सामान्य सिद्धांत को बिसराकर लोगों को अपने विकास के लिए प्रयत्नरत रहने की प्रेरणा देने से ज्यादा जोर इस बात पर देते हैं कि सरकार समाज में कल्याण के संवितरण पर ध्यान दे. इसके लिए वे सरकार से वस्तुनिष्ठ किस्म की तटस्थता की अपेक्षा करते हैं. परिणामस्वरूप उन लोगों के प्रति जो अतिरिक्तरूप से परिश्रमी तथा ईमानदार हैं, उत्पादकता के मामले में बाकी लोगों से बढ़कर हैं, किंतु जन्म, विरासत या किसी और कारण से विकास की धारा में पिछड़ चुके हैं—अन्याय होता है. उन्हें राज्य के विकास का पूरा लाभ मिल नहीं पाता. प्रायः उन्हें उन लोगों पर आश्रित रहना पड़ता है, जो उनके श्रम-कौशल का पूरा मूल्य चुकाए बगैर उनसे कार्य लेते हैं. नतीजा यह होता है कि पात्रता एवं विकास की जरूरतों के बावजूद वे विकास की मुख्यधारा में निरंतर पिछड़ते जाते हैं. राउल्स के अनुसार शासन को ऐसे लोगों पर विशेष ध्यान देना चाहिए जो जन्म के आधार पर ही सुविधा अथवा अवसरों से वंचित हैं. उदाहरण के लिए जो धनी परिवार में जन्म लेते हैं, उन्हें आगे बढ़ने के लिए संसाधनों की कमी नहीं झेलनी पड़ती. वे विकास की दौड़ में निर्धन परिवार में जन्मे व्यक्ति को आसानी से पछाड़ देते हैं. इसी तरह बचपन में बेहतर शैक्षिक वातावरण में पढ़े व्यक्ति उन लोगों को पीछे छोड़ देते हैं जिनके माता-पिता अनपढ़ हैं; या जिनमें शिक्षा के प्रति जागरूकता का अभाव है. शराब, जुए या ऐसी ही किसी लत से घिरे माता-पिता के बच्चों की भी यही दुर्दशा होती है. इस विसंगति को राउल्स उदाहरण के माध्यम से समझाने की कोशिश करता है. मान लीजिए उनमें से पहला अनुकूल परिस्थितियों में जन्म लेता है, जबकि दूसरे को जन्म से ही प्रतिकूल स्थितियों से जूझना पड़ा है. पहले को अच्छा भोजन, अच्छे वस्त्र और स्वास्थ्य के अनुकूल आवास मिलता है. परिवार की ओर से उसके लिए बेहतरीन शिक्षा की व्यवस्था भी कर दी जाती है. वह आजीविका की ओर से भी निश्चिंत होता है. अध्यापन पूरा होते ही उसके सक्षम माता-पिता उसकी सम्मानित आजीविका का प्रबंध कर देते हैं. दूसरी ओर वह गरीब है, जिसके माता-पिता अनपढ़ है. परिवार में शिक्षा का कोई माहौल नहीं है. न ही उसके माता-पिता अच्छी शिक्षा दे पाने की स्थिति में हैं. कष्टमय जीवन जीता हुआ वह आधी-अधूरी शिक्षा ही पूरी कर पाता है. आर्थिक समस्याओं के चलते पढ़ाई बीच में छोड़ जीविकोपार्जन के लिए जुटना पड़ता है. जाहिर है, कैरियर की स्पर्धा में पहले का आरंभ-बिंदू चूंकि दूसरे से बहुत आगे था, इसलिए वह शुरुआत से ही लाभ की स्थिति में होगा. वह न केवल बड़े सपने देखेगा, बल्कि उन्हें पाने की भरपूर कोशिश करेगा. समस्याओं से ग्रस्त दूसरा व्यक्ति स्पर्धा में उसके आगे टिक नहीं पाएगा. निष्कर्षतः दोनों के बीच का अंतर निरंतर बढ़ता जाएगा.

सत्ता और संसाधनों के आधार पर सामाजिक विभाजन की स्थिति को विल्फर्ड परेतो जॉन राउल्स से करीब एक शताब्दी पहले ही सिद्ध कर चुका था. अलग-अलग देशों के लगभग पांच सौ वर्ष के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए वह इस नतीजे पर पहुंचा था कि सभी युगों और लगभग सभी समाजों में 80 प्रतिशत आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शक्ति केंद्रों पर 20 प्रतिशत अभिजनों का अधिकार रहा है. अभिजनेत्तर समुदाय अपनी स्थिति से उबरने के लिए निरंतर प्रयास करते रहते हैं, लेकिन जब तक वे विकास की एक सीढ़ी को पार करते हैं, उस अवधि में अभिजन समुदाय जो संख्या में उनसे कम तथा संसाधनों के मामले में कई गुना आगे है—उनसे बहुत ऊपर उठ चुका होता है. इस विश्लेषण के आधार पर ही परेतो इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि ‘जनतंत्र महज भ्रम है. शिखरस्थ सत्ताधारी अभिजन सदैव लाभ की स्थिति में रहता है. परेतो वस्तुस्थिति से कुछ ज्यादा ही निराश था. उसने तानाशाह मुसोलिनी के शासन का स्वागत इस उम्मीद के साथ किया था कि वह ‘वास्तविक उत्पादक शक्तियों’ यानी श्रमिक वर्ग की स्वतंत्रता को संभव कर सकेगा. परेतो का अनुमान गलत सिद्ध हुआ था. एक तानाशाह से लोककल्याण की वांछा रखना, यह सोचना कि वह समाज के अधिसंख्यक वर्ग की वास्तविक स्वतंत्रता और समानता को लौटा सकेगा, पूरी तरह गलत था. परेतो के बाद एक शताब्दी में बहुत कुछ बदला था. हाब्स, ग्रीन, जॉन स्टुअर्ट मिल, थाॅमस पेन, जेफरसन जैसे स्वतंत्रतावादी-मानवतावादी विचारकों ने लोकतंत्र की जड़ें मजबूत की थीं, जिससे कालांतर में मानवाधिकारवादी आंदोलनों को बल मिला. यह बात अलग है कि इस बीच पूंजीवाद ने भी तेजी से पंख पसारे तथा अपनी पूंजी एवं प्रलोभनकारी नीतियों के दम पर, तमाम किस्म के अवरोधों के बावजूद वह निरंतर फलता-फूलता रहा.

अपनी महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘ए थ्योरी आ॓फ जस्टिस’, जिसे न्याय-शास्त्र के क्षेत्र में रूसो के ग्रंथ ‘दि सोशल कांट्रेक्ट’ जैसी महत्ता प्राप्त है—में राउल्स दुर्भाग्यों की सीमारेखा को चिन्हित करता है. उसमें प्रथम छोर पर जन्म दुर्भाग्य हैं, जो जन्म से ही मनुष्य के साथ चिपक जाते हैं. जिनमें व्यक्ति का अपना कोई योगदान नहीं होता. उनसे मुक्ति दिलाना, राज्य का दायित्व है. दूसरे छोर पर ऐसे ‘दुर्भाग्य’ हो सकते हैं, जो व्यक्ति की अपनी लापरवाही अथवा कमजोरी के कारण जन्म लेते हैं. उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति अपने जीवन भर की कमाई को शराब या जुए की लत पर गंवा सकता है. ऐसे ‘दुर्भाग्य’ के प्रति राज्य की सीधी जिम्मेदारी नहीं होती. इसके बावजूद समाज का यह दायित्व होता है कि वह अपनी सदस्य इकाइयों को ऐसा वातावरण उपलब्ध कराए, जिसमें नकारात्मक वृत्तियों के उभार के लिए कम से कम अवसर हों. साथ में जरूरी है कि लोगों को सामाजिक बुराइयों के बारे में समयानुसार चेतावनी देता रहे. राउल्स के अनुसार जो पहली श्रेणी के ‘दुर्भाग्य’ हैं, वे समाज में व्याप्त असमानता से जन्मते हैं. एक तरह से वह समाज की मूल संरचना पर सवाल उठाते हैं. उदाहरण के लिए यदि किसी समाज में जाति अथवा रंग-भेद के नाम पर विभाजन है, तो उसका दुष्प्रभाव समाज में आर्थिक-सामाजिक विषमता और सामाजिक असंतोषों के रूप में देखने को मिलेगा. दूसरे श्रेणी के ‘दुर्भाग्य’ के लिए व्यक्ति और समाज दोनों जिम्मेदार होते हैं. व्यक्ति अपने चारित्रिक विचलनों और समय पर उचित निर्णय न ले पाने के कारण नुकसान उठाता है, तो समाज इस बहाने कि वे व्यक्ति-विशेष की कमजोरियों का नतीजा थे, अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता. इसलिए कि व्यक्ति की मनोरचना पर उसके परिवेश का भी प्रभाव पड़ता है. समाज में व्याप्त स्तरीकरण संवेदनशीन मनुष्य को उकसाता है. निरंतर उपेक्षा और उत्पीड़न से उसके मन में आक्रोश पनपने लगता है. उसी से दूसरी कमजोरियां और विकार जन्म लेते हैं. वही प्रकारांतर में व्यक्ति के ‘दुर्भाग्य’ का कारण बनते हैं. जन्माधारित अभावों और बुरे वातावरण का बालक के भावी जीवन पर असर न पड़े, यह सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है. सरकार का यह भी दायित्व है कि वह ऐसे व्यक्तियों से जो जन्म के आधार पर आगे हैं, जिनके पास संसाधनों का अतिरेक है, कुछ सुविधाएं समाज के पिछड़े वर्गों तथा सुविधा-वंचित लोगों तक पहुंचाए.

राउल्स की निगाह में सामाजिक असमानताएं भी स्वीकार्य हैं, बशर्ते उनका समायोजन इस प्रकार किया गया है कि समय आने पर वे सुविधा-साधन वंचित वर्गों के विकास में मददगार सिद्ध होंगी. आखिर वे कौन-सी वस्तुएं हैं जिनके आधार पर एक व्यक्ति विकास के मामले में दूसरे से आगे मान लिया जाता है. राउल्स ने समाजार्थिक वरीयता के कारकों को सूचीबद्ध करने की कोशिश की है तथा उन्हें ‘प्राथमिक सामाजिक वस्तुएं’ का नाम दिया है. इसमें वे वस्तु और अवसर सम्मिलित हैं, जिनके अभाव में कोई व्यक्ति स्वयं को पिछड़ा मानने को तैयार होता है. यह बात किसी को भी चैंका सकती है कि राउल्स प्राथमिक सामाजिक वस्तुओं की श्रेणी में ‘स्वाधीनता’ को सम्मिलित नहीं करता. जबकि लोकतंत्र में समानाधिकार और अवसरों की समानता का लक्ष्य पहले से ही निर्धारित होता है. संभवतः वह स्वाधीनता को लोकतंत्र में अंतनिर्हित मान लेता है. अपने न्याय सिद्धांत में वह जिस तरह व्यक्ति के अधिकारों को विस्तार देता है, उसमें इसपर कोई संदेह भी नहीं रह जाता कि राउल्स के लिए लोकतंत्र और स्वाधीनता अलग-अलग न होकर, न्याय की मूलभूत अपेक्षाएं हैं. उसका न्याय-संबंधी दर्शन इन्हीं अपेक्षाओं को संभव बनाने की बौद्धिक छटपटाहट का नतीजा है.

समाज में न्याय की स्थापना के लिए राउल्स सामाजिक संस्थाओं के वर्तमान ढांचे से कोई उम्मीद नहीं रखता. बजाय इसके उसे राजनीतिक संस्थाओं से काफी अपेक्षाएं हैं. सार्वत्रिक कल्याण और वंचितों को न्याय की मुख्यधारा में लाने के लिए वह समाज की सभी प्रमुख संस्थाओं के पुनर्मूल्यांकन का सुझाव देता है. इस प्रक्रिया में भी उसका पूरा आग्रह स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करने के साथ, प्रशासनिक प्रणाली को और अधिक चुस्त-दुरुस्त, उत्तरदायी एवं पारदर्शी बनाने पर रहता है, ताकि उन नागरिकों के प्रति जो जन्म, परिवार, समाज, धर्म, समाज या राजनीतिक कारणों से विकास की मुख्यदारा में पिछड़ चुके हैं, उन्हें आवश्यक प्रोत्साहन, समर्थन, सहायता आदि देकर मुख्यधारा का हिस्सा बनाया जा सके. राउल्स लोकतंत्र समर्थित आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं को मनुष्य की स्वातंत्रय चेतना की परिणति मानता है. उसका विश्वास है कि ‘परिपक्व स्वातंत्रयबोध के साथ न्याय’ की अवधारणा विशुद्ध राजनीतिक है. उसको इसी रूप में बेहतर समझा जा सकता है. न्याय को धार्मिक और नैतिक प्रत्यय मान लेना राउल्स को स्वीकार न था. पुनश्चः वह कहना चाहता है कि न्याय की अवधारणा की सटीक व्याख्या केवल राजनीतिक मूल्यों के संदर्भ सहित संभव है. दूसरे शब्दों में राउल्स के लिए न्याय राज्य की विषयवस्तु है. लोकतंत्र-सम्मत, उदार राजनीतिक प्रणाली के माध्यम से उसको सर्वसुलभ बनाया जा सकता है. 1971 में प्रकाशित पुस्तक ‘दि थ्योरी आ॓फ जस्टिस’ में वह सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार, समान स्वतंत्रता, समान एवं पर्याप्त अवसर सहित, राज्य के निष्पक्ष आचरण पर जोर देता है. उसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी स्वाधीनता, मूलभूत अधिकार, भरण-पोषण हेतु पर्याप्त संसाधनों पर दावेदारी तथा उपयुक्त योजनाओं में हिस्सेदारी का पूरा अधिकार है. राज्य का दायित्व है कि जन्म, वर्ण, धर्म, संप्रदाय, कद-काठी, लिंग आदि के कारण जन्म लेने वाली सभी प्रकार की असमानताओं, चाहे वे कृत्रिम हों या प्रकृतिजन्य, जो पक्षपातपूर्ण आचरण के लिए जिम्मेदार हैं या उसका कारण बन सकती हैं—का निराकरण कर सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करे.

राउल्स के लिए न्याय सांस्कृतिक और नैतिक से ज्यादा राजनीतिक लक्ष्य है. उसी रूप में वह उसका समाधान चाहता है. उल्लेखनीय है कि अतीत में न्याय को अधिदैविक, अधिभौतिक, नैतिक-व्युत्पत्ति कहकर राजनीतिक दर्शन से परे सिद्ध करने की कोशिश की जाती रही है. राउल्स का मानना था कि इस तरह की आध्यात्म-केंद्रित और नीतिवादी अवधारणाएं व्यक्ति एवं समाज दोनों को भटकाती हैं. इससे राज्य को अपने दायित्वों से बच निकलने, कर्तव्य से पलायन करने का अवसर मिल जाता है. इस सर्वमान्य तथ्य को भुलाकर कि राज्य जनता की सम्मिलित इच्छा की अनुकृति है—पुराने साम्राज्यवादी राज्य अपनी सत्ता को लोकेच्छा के बजाय ईश्वरीय इच्छा अथवा वरदान की परिणति मानते थे. राज्य के विस्तार और सुरक्षा के लिए वे हजारों-लाखों सैनिकों को जो सामान्य परिवारों से आते थे, और निस्संदेह बहुत साहसी और बहादुर भी होते थे, बिना उनका खास एहसान माने, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की बलि चढ़ा देते थे. धर्म उनके पाखंडों का महिमामंडन करता था. चूंकि जनसाधारण धर्म के सम्मोहन में फंसा था, इसलिए राजकोष का बड़ा हिस्सा दैवी शक्तियों को प्रसन्न रखने में, उनकी अभ्यर्थना के नाम पर खर्च हो जाता था. उनकी देखा-देखी समाज का सुविधा-वंचित वर्ग भी अपने त्राण के लिए दैवीय कृपा की अपेक्षा रखने लगा. राज्य को दैवीय सत्ता तथा राजन्यों के वैभव-विलास को ईश्वरीय अनुकंपा मामने का कुफल ही था कि जनसाधारण की अपनी दुर्दशा के वास्तविक कारणों पर नजर ही नहीं जाती थी. अपनी दुश्वारियों के लिए भाग्य और परिस्थितियों को दोष देकर वह आजीवन कुढ़ता रहता था. दूसरी ओर कथित अधि-दैविक शक्तियों की कृपा से कल्याण के प्रबंधन का दावा करने वाला एक वर्ग ऐसा भी था, जो भौतिक सुख-सुविधाओं, वैभव और ताकत का भरपूर उपयोग करता था. धार्मिक शक्तियों का एक वर्ग न्याय को धार्मिक नैतिकता से जोड़कर देखता है. यद्यपि करुणा और दया जैसे मानवीय प्रत्यय धार्मिक नैतिकता से जुड़े हैं. दान, जकात, खैरात जैसे शब्द धार्मिक नैतिकता के चलते ही अस्तित्व में आए हैं. इनसे उपकार और करुणा की भावनाएं झलकती हैं, जो मानवीय उदारता का प्रतीक हैं. किंतु दान, जकात या खैरात के बहाने धार्मिक शक्तियां बड़ी चालाकी से समाजार्थिक असमानता, राजनीतिक-व्यापारिक लूट तथा उसके पीछे छिपे विभेदकारी सोच पर पर्दा डाल देती हैं. इसलिए धर्मसम्मत नैतिकता, जिसमें समाज का बड़ा वर्ग अपने विवेक को दूसरों के यहां गिरवी रख देता है, और अपने पुरुषार्थ के बजाय दूसरों की दया पर जीने का सपना पाल बैठता है, न्याय का प्रतीक नहीं कहा जा सकता.

समाज यदि मनुष्य का वरण है तो उसमें अधिकारों के आधार पर ऊंच-नीच या किसी और कारण से असमानता की भावना, अनैतिक और अप्राकृतिक मानी जाएगी. समानता के इस लक्ष्य को कोरी नैतिकता के सहारे प्राप्त कर पाना संभव नहीं है. उसके लिए समाज में पर्याप्त अधिकार चेतना भी चाहिए. न्याय को नैतिक, दार्शनिक अथवा धार्मिक मूल्यों से जोड़कर, उसका दैवीकरण करने से न्याय के जनसाधारण की पहुंच से दूर जाने की संभावना रहेगी. शताब्दियों से यही होता आ रहा है. ढाई-तीन हजार वर्ष पहले जब धर्म का उदय हुआ तो यह माना गया था कि धार्मिक आचार-संहिताएं, मनुष्य को अनुशासन तथा नैतिकता का पाठ पढ़ाती रहेंगी. परंतु आस्था, जिसे अंध-आस्था कहना भी अनुचित न होगा, पर टिका होने के कारण धर्म मनुष्य के विवेक को परिपक्व होने का अवसर ही नहीं देता. अंध-आस्था और जड़ विश्वासों से भ्रमित मनुष्य अनुसरण की वृत्ति अपना लेता है. अपने कर्तव्य और अधिकारों को बिसराकर वह भाग्य के भरोसे जीने लगता है. जाहिर है उसके परिणाम प्रतिगामी होते हैं, जिनकी निरंतरता राज्य को गुलामी को ढकेल देती है. भारत में इसका कुफल देश को लंबी गुलामी तथा सामंती संस्कारों के लंबे इतिहास के रूप में झेलना पड़ा था. आशय है कि न्याय की गहन दार्शनिक व्याख्याएं उसे आम आदमी के लिए दुरूह और जटिल बना देती हैं. इससे न्याय के रास्ते में आ रही अड़चनों से मुक्ति उसके लिए काफी कठिन होती है. समस्याओं के समाधान के लिए उसे ऐसे लोगों की शरण में जाना पड़ता है, जिनके अपने स्वार्थ प्रबल होते हैं. ऐसे लोग मदद करने या उचित राह दिखाने के बजाय स्थितियों की व्याख्या अपने स्वार्थ के अनुरूप करते हैं. उसी के आधार पर कालांतर में शोषण के नए-नए तरीके इंजाद कर लिए जाते हैं.

सुख की वांछा जितनी व्यक्ति में होती है, उतनी ही समाज में भी होती है. अंतर केवल इतना है कि व्यक्ति केवल निजी सुख तक सीमित होता है, अपनी सीमाओं में वह उन्हीं के लिए प्रयास करता है. जबकि समाज की इच्छा में उसकी सदस्य इकाइयों की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है. इस तरह राउल्स व्यक्ति और समाज को, परिमाण की दृष्टि से नजरंदाज करते हुए, न्याय की दृष्टि करीब-करीब बराबर मान लेता है. उसका मंतव्य यहां व्यक्ति और समाज के द्वंद्व अथवा उसकी मूलभूत समानताओं को दर्शाना नहीं है. बल्कि एक बारीक अंतर की ओर इशारा करना है. उसके अनुसार अपने वर्तमान के लाभ-हानि के लिए प्रयत्नरत अकेला व्यक्ति केवल एक इकाई होता है. अपने हानि-लाभ के लिए वह स्वयं उत्तरदायी होता है. यदि उसके किसी निर्णय से हानि होती है, तो उसे हानि का सामना स्वयं करना पड़ेगा. और यदि लाभ होता है, तो खुशी-खुशी वह स्वयं लाभ को घर ले जा सकेगा. सामान्य परिस्थिति में उसे किसी तीसरे व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं पहुंचता. लेकिन समाज के मामले में ऐसा नहीं है. समाज या सामाजिक समूहों में यह आवश्यक नहीं कि जो व्यक्ति किसी खास काम की शुरुआत करता है, उसकी सफलता या असफलता का लाभ या हानि उसी को हो. समाज व्यक्तियों का समुच्चय है. उसके प्रयास दीर्घायामी होते हैं. समाज के किसी निर्णय का लाभ या हानि तत्काल या कुछ समयांतराल से ऐसे लोगों को उठानी पड़ सकती है, जिनका उन निर्णय में कोई योगदान न हो.

यहां आकर उपयोगितावादी विचारधारा की सीमाएं स्पष्ट होने लगती है. जॉन राउल्स की खूबी थी कि उसने दर्शन और राजनीति विज्ञान दोनों को न्याय के पक्ष में खड़ा कर दिया था. उसके लिए न्याय का आशय कानून, अदालत और उस न्यायिक प्रक्रिया से एकदम भिन्न था, जिसे सामान्यतः समाज में न्याय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. न्याय से उसका अभिप्राय सुख और शुभता की सर्वोपलब्धता एवं सर्वव्याप्ति से था. न्याय को कल्याण के पर्याय के रूप में देखने वाला राउल्स हालांकि पहला विचारक नहीं था. स्वयं प्लेटो ने ‘दि लाॅज’ नामक विशाल ग्रंथ में न्याय के इसी कल्याणकारी स्वरूप की व्याख्या की थी. उसके बाद अरस्तु ने यह कहकर कि ‘राजनीतिक विज्ञान मानवीय ज्ञान-विज्ञान की सभी धाराओं में सर्वोत्तम है, वही समाज को शुभता के उस शिखर तक ले जा सकता है, जिसे हम न्याय कहते हैं’—समाज में न्याय की महत्ता की ओर संकेत किया था. अरस्तु के बाद इटली के विधिवेत्ता इनेरियस(लगभग 1050—1130) ने भी वितरणात्मक न्याय का पक्ष लिया. उससे लगभग पांच शताब्दी बाद जन्मे जोसेफ एडीसन, जिसे यूरोप में ‘न्यायशास्त्र का दीपस्तंभ’ कहा जाता है, ने यह कहकर कि ‘न्याय जैसा कोई सद्गुण नहीं है’, समाज में पुनः एकजुट होने का आवाह्न किया था. तदनंतर डेनियल बेवस्टर, इमानुएल कांट, हाब्स, जोसेफ हीगेल, जॉन लाक, जॉन स्टुअर्ट मिल, था॓मस जेफरसन जैसे विचारकों की लंबी संख्या है. जिन्होंने समाज में वितरणात्मक न्याय को सम्मान सहित स्थापित करने की कोशिश की थी. डेनियल बेवस्टर का मानना था कि, ‘न्याय धरती पर मानवमात्र का सबसे बड़ा लक्ष्य है. यह अस्थि-मज्जा का वह ढांचा है जो सभ्य मनुष्य तथा सभ्य समाज को परस्पर निकट लाता है. जहां-जहां जब तक उसके मंदिर और उनका सम्मान रहेगा, वहां-वहां सामाजिक सुरक्षा एवं शांति, सुखामोद तथा आनेवाली पीढ़ियों के विकास की गारंटी रहेगी.’3

© ओमप्रकाश कश्यप

1. There is no virtue so truly great and godlike as justice…. Omniscience and omnipotence are requisites for the full exercise of it.”-Addison,
2. ….there is…a way of thinking of society which makes it very easy to suppose that the most rational conception of justice is utilitarian. For consider: each man in realizing his own interests is certainly free to balance his own losses against his own gains. We may impose a sacrifice on ourselves now for the sake of a greater advantage later. A person quite properly acts, at least when others are not affected, to achieve his own greatest good, to advance his rational ends as far as possible. Now why should not a society act on precisely the same principle applied to the group and therefore regard that [decision- making procedure] which is rational for one man as right for an association of men? Just as the well- being of a person is constructed from the series of satisfactions that are experienced at different moments in the course of his life, so in very much the same way the well-being of society is to be constructed from the fulfillment of the systems of desires of the many individuals who belong to it. Since the principle for an individual is to advance as far as possible his own welfare, his own system of desires, the principle for society is to advance as far as possible the welfare of the group, to realize to the greatest extent the comprehensive system of desire arrived at from the desires of its members. Just as an individual balances present and future gains against present and future losses, so a society may balance satisfactions and dissatisfaction between different individuals. And so by these reflections one reaches the principle of utility in a natural way: a society is properly arranged when its institutions maximize the net balance of satisfaction.- John Rawls in A Theory of Justice (Cambridge, MA: Harvard University Press, 1971), pp. 23-4.
3. “Justice is the great interest of man on earth. It is the ligament which holds civilized beings and civilized nations together. Wherever her temple stands and so long as it is duly honored, there is a foundation for social security, general happiness, and the improvement and progress of our race.” Daniel Webster

टिप्पणी करे

Filed under धर्म और अभिजन संस्कृति, सापेक्षिक न्याय : राज्य और समाज का सदाचरण

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s