हमारा नायक फिसड्डी क्यों

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।।*   –     कठोपनिषद्, अध्याय 1, वल्ली 3, मंत्र 14.

हालांकि केजरीवाल प्रकट में कभी यह स्वीकार नहीं करेंगे कि वे अन्ना के प्रतिद्वंद्वी या उनके विरुद्ध हैं. सीधेसीधे अन्ना भी शायद ही मानेंगे कि केजरीवाल के प्रति उनके दिल में जो स्नेहानुराग था, उसमें कमी आई है. मगर हाल का घटनाक्रम बताता है कि दोनों के रास्ते अलगअलग हो चुके हैं. एक साल पहले तक दोनों साथसाथ थे. सूचना अधिकार अधिनियम से लेकर जनलोकपाल के मुद्दे तक, दोनों ने कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलन को आगे बढ़ाया था. बाद में अरविंद केजरीवाल सिस्टम के भीतर घुसकर भ्रष्टाचार पर प्रहार करने का संकल्प लेकर सक्रिय राजनीति में चले आए. जनलोकपाल आंदोलन से जुड़े साथियों के साथ ‘आम आदमी पार्टी’ बनाई. दिल्ली विधानसभा चुनावों में उतरकर भारतीय जनता पार्टी के विजय अभियान में रोड़ा बने और 15 वर्षों से जमीजमाई कांग्रेस पार्टी की सरकार को उखाड़कर लोगों में नई राजनीति की उम्मीद जगाई. अरविंद केजरीवाल को मिल रही चैतरफा वाहवाही के बीच अन्ना ने लोकपाल विधेयक को अविलंब लागू करने के लिए आमरण अनशन रखा. अब उनकी ओर से बयान आया है कि वे लोकपाल बिल के सरकारी मसौदे से संतुष्ट हैं, जबकि ‘आम आदमी पार्टी’ के नेता जनलोकपाल के पुराने प्रारूप पर अटल हैं. वे अन्ना के गलत सहयोगियों द्वारा घिर जाने पर क्षोभ जता रहे हैं. दिल्ली विधानसभा के चुनावों से बाकी देश का कोई लेनादेना भले न हो, मगर उनकी गूंज न केवल देश, बल्कि पड़ोसी देशों तक भी पहुंची है. पाकिस्तान से इमरान खान का केजरीवाल की प्रशंसा से भरा बयान आया है. केजरीवाल और ‘आम आदमी पार्टी’ की बढ़ती प्रतिष्ठा से कांग्रेस और भाजपा बुरी तरह घबराई हुई हैं. इसलिए कांग्रेस के जो नेता लोकपाल बिल को बरसाती मच्छर बता रहे थे, आज उसे देश के लिए जरूरी मानकर उसकी तरफदारी में जुटे हैं. राहुल गांधी आम आदमी पार्टी से सीख लेने की घोषणा कर चुके हैं. नानुकर की राजनीति के साथ भाजपा भी चाहती है कि लोकपाल बिल पास हो, ताकि केजरीवाल तथा ‘आम आदमी पार्टी’ को जो देशव्यापी प्रशंसा मिल रही है, उसपर लगाम लगे तथा आगामी लोकसभा चुनावों में ‘आम आदमी पार्टी’ लोकपाल बिल के नाम पर किसी प्रकार का राजनीतिक लाभ न उठा सके. अनशन पर बैठे अन्ना का लोकपाल बिल के समर्थन में आ जाना, कांग्रेस और भाजपा की बड़ी जीत कही जा रही है. अभी तक किसी न किसी बहाने लोकपाल बिल को टालती आईं, राजनीतिक पार्टियां यदि लोकपाल बिल के मसले पर अन्ना हजारे को अपने पक्ष में कर लेने को यदि अपनी जीत बता रही हैं, तो दूसरे अर्थों में यह अन्ना हजारे की हार है, क्योंकि सिवाय ‘आम आदमी पार्टी’ की ओर से मिली चुनौती के इन पार्टियों ने ऐसा कुछ नहीं किया है, जिससे देश में स्वच्छ राजनीति करने की इनकी इच्छाशक्ति जाहिर होती हो. और संसदीय समिति की जिन सिफारिशों के साथ लोकपाल बिल के प्रति अन्ना हजारे सहमति दर्शा रहे हैं, वे सालभर पहले ही आ चुकी हैं. बहरहाल, देश की सत्ता की बड़ी साझेदार दोनों पार्टियां लोकपाल बिल को इसी सत्र में पास करवा कर किसी भी तरह ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के ‘गुब्बारे’ की हवा निकाल देना चाहती हैं. उनकी दूसरी कोशिश है कि केजरीवाल दबाव में आकर अपनी पार्टी की सरकार बना लें. ताकि राजनीति के तपे, घाघ नेता ‘आप’ के अपेक्षाकृत युवा और अनुभवहीन नेताओं से बनी पार्टी को किसी न किसी तरह बदनाम कर, उनकी पैठ को दिल्ली तक सीमित कर सकें. विधानसभा चुनावों में भाजपा का सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सरकार बनाने से पीछे हटना, इसी कूटनीति का हिस्सा है. अभिजन राजनीति का प्रतीक रही कांग्रेस और भाजपा इस मुद्दे पर एक हैं.


निस्संदेह अन्ना केजरीवाल के मुकाबले अनुभव तपे नेता हैं. सेना की नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने अपने गांव को प्रयोगशाला बनाया और वहां रहकर ग्राम्यः सुधार के कार्यक्रम चलाए. खुद को गांधी का अनुयायी और अंहिसा में विश्वास करने वाला बताया, लेकिन लोगों को सुधारने के लिए पेड़ से बांधकर पिटाई करने का रास्ता अपनाने से गुरेज नहीं किया. गांधी ‘साध्य’ और ‘साधन’ की पवित्रता पर जोर देने वाले आदर्शवादी नेता थे. अन्ना का गांधीवाद ‘अंत भला सो सब भला’ की उपयोगितावादी चाल तक सिमट जाता है. इसके बावजूद ग्रामस्तर पर किए गए अन्ना के प्रयोगों को सर्वत्र सराहना मिली, जिससे अन्ना की ख्याति रालेगण सिद्धि से बाहर निकलकर देशव्यापी बनी. उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के मंत्रियों के भ्रष्टाचार के प्रति भी आंदोलन किए. बावजूद इसके 2010 तक, विचार और कर्म की दृष्टि से अन्ना हजारे रालेगण सिद्धि तक सिमटे सर्वोदयी नेता ही थे. हालांकि उनकी ख्याति देशविदेश तक थी. उन्हें महाराष्ट्र से बाहर भ्रष्टाचार मुक्ति, सूचना अधिकार तथा जनलोकपाल आंदोलन के बहाने, दूसरे नायक ही लाए, जिनमें अरुणा राय, अरविंद केजरीवाल आदि प्रमुख हैं. कालांतर में राजनीतिक क्षेत्र में व्याप्त गंदगी को ‘अंदर से साफ’ करने के संकल्प के साथ केजरीवाल सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेने के लिए अन्ना से अलग हुए तो चर्चांओं का बड़ा हिस्सा उनपर केंद्रित होता चला गया. उस समय तक अन्ना तो क्या स्वयं अरविंद को भी विश्वास नहीं था कि ‘आम आदमी पार्टी’ को इतनी बड़ी सफलता मिल सकती है. इसीलिए सत्ता से दूर रहने की गांधीजी की परंपरा के निर्वाह तथा जनांदोलनों की अपनी कमाई को सहेजे रखने के लिए अन्ना केजरीवाल से अलग ही रहे. उसके बाद सालभर तक जब केजरीवाल ‘आम आदमी पार्टी’ के लिए नई जमीन तलाश रहे थे, वे अपने गांव रालेगण सिद्धि में जो उनकी प्रयोगशाला रही है, खुश थे. परंतु दिल्ली विधानसभा के चुनावों में ‘आप’ को मिली भारी सफलता के बाद जनता उसमें कांग्रेस और भाजपा का साफसुथरा विकल्प देखने लगी है. इससे उन लोगों के कान भी खड़े हो गए, जो केजरीवाल को अभी तक हल्के में ले रहे थे. फिलहाल एक ओर तो कांग्रेस और भाजपा लोकपाल बिल को आननफानन में पास कराने पर तुली हैं, दूसरी ओर अन्ना और केजरीवाल के बीच की दूरी को बढ़ाकर ‘आम आदमी पार्टी’ के प्रभाव को हल्का करने की कोशिश की जा रही है.

आम आदमी पार्टी’ को देश की राजनीति में सैद्धांतिक प्रयोग कहा जाएगा, जो अभी कच्ची अवस्था में है. इसके सहीसही परिणाम अभी सामने आने बाकी हैं, जो अरविंद केजरीवाल तथा उनके साथियों के सत्साहस और विवेक पर निर्भर करेगा. इसके बावजूद इसमें कोई संदेह नहीं है कि ‘आम आदमी पार्टी’ के माध्यम से केजरीवाल ने लोगों के दिलों में साफसुथरी राजनीति की एक उम्मीद जगाई है. लोकपाल बिल का श्रेय चाहे राहुल लें या अन्ना, सचाई यही है कि ‘आम आदमी पार्टी’ का राजनीति के क्षेत्र में उभार, साठ से ऊपर वर्षों से अदलबदल कर सरकार बनाते आए, यथास्थति के पोषकसमर्थक दलों को रास नहीं आ रहा है. चूंकि जनलोकपाल आंदोलन और भ्रष्टाचार ‘आम आदमी पार्टी’ के उभार का प्रमुख बिंदू रहा है, इसलिए लोकपाल बिल लाकर वे उस कारण को ही समाप्त कर देना चाहते हैं, जिससे ‘आम आदमी पार्टी’ तपकर निकली है. मगर यहीं वे भूल भी कर रहे हैं. दरअसल केजरीवाल की राजनीति केवल भ्रष्टाचार विरोध तक सीमित नहीं है. कुछ महीनों के अंतराल में ही उन्होंने बड़ी बुद्धिमत्ता पूर्वक आम आदमी को सत्ता की राजनीति से जोड़ा है. उनके भीतर सत्ता का आकर्षण पैदा किया है. फलस्वरूप वह वर्ग जो अभी तक दूसरों के अधीन राजनीति करता आया था और जिसे धर्म, जाति, क्षेत्रीयता के नाम पर लोग एकदूसरे से उलझा दिया करते थे, पहली बार उसके मन में विश्वास जागा है कि वह खुद भी सत्ता में आ सकता है. ‘अभिजन’ के बरक्स ‘जन’ को खड़ा करने का जैसा सत्साहस केजरीवाल ने दिखाया है, उसका उदाहरण भारत के स्वातंत्रयोत्तर इतिहास में दुर्लभ है. उसमें जाति, धर्म, सांप्रदायिकता, तुष्टिकरण जैसे विभेदकारी राजनीति के पुराने औजार कारगर हो ही नहीं सकते थे. इसलिए यदि वे धैर्य और बुद्धिमत्तापूर्वक आगे बढ़ें तो यहां से भारतीय राजनीति की नई राहें निकल सकती हैं.

अन्ना और केजरीवाल भले साथ रहे हों, और केजरीवाल ने स्वयं को अन्ना का विनम्र अनुयायी ही माना हो, इसके बावजूद सचाई यही है कि दिल्ली विधान सभा के हालिया चुनावों में लोगों ने अन्ना के नाम पर नहीं, केजरीवाल और उसके साथियों की मेहनत और आश्वासन से प्रभावित होकर एक उम्मीद के साथ ‘आम आदमी पार्टी’ को वोट दिया है. इसलिए इस समय केजरीवाल उनकी आंखों के तारे हैं, और उन्हें लेकर भावी राजनीति का आदर्शवादी मुहावरा गढ़ने में लगे हैं. कह सकते हैं कि ‘आम आदमी पार्टी’ राजनीति के जंगल में उपजा उम्मीद का खुशनुमा पौधा है. उस बिरवे को असमय ही कुचल देने की जमीजमाई पार्टियों की ओर से की जा रही है. यही कारण है कि दिल्ली विधानसभा में सबसे बड़ा दल होने के बावजूद भाजपा सरकार बनाने से पीछे हट जाती है और कांग्रेस ‘आप’ को बिना मांगे समर्थन देने का ऐलान कर देती है. ताकि उस पार्टी के कंधों पर जो अभी चलना सीख ही रही है, अपेक्षाओं का भारी बोझ लाद दिया जाए. उन्हें भारतीयों का स्वभाव की बहुत अच्छी समझ है. जानते हैं कि लोग लोग यहां दिमाग से ज्यादा दिल से काम लेते हैं. नेताओं की बातों में आकर उन्हें बहुत जल्दी कंधों पर बिठा लेते हैं. फिर जरासी बात बिगड़ने पर तुनकमिजाजी के साथ उतार भी देते हैं. इसलिए वे उस कारण को समाप्त कर देना चाहते हैं, जो नई उम्मीद और संभावनाओं की राजनीति का जन्मदाता है.

आम आदमी पार्टी’ को मिली अप्रत्याशित सफलता केवल भाजपा और कांग्रेस का सिरदर्द नहीं है, वह केजरीवाल के उन साथियों के भी गले नहीं उतर रही है, जो अन्ना के आंदोलन से उनके साथ थे और खुद को परिवर्तन के बड़े पुरोधाओं में शुमार करने लगे थे. ऐसे लोग अरविंद को धोखेबाज, अतिमहत्त्वाकांक्षी, स्वार्थी आदि और न जाने क्याक्या कहे जा रहे हैं. जहां तक धोखा देने की बात है, अरविंद पर ऐसा इल्जाम नाइंसाफी होगी. ‘आम आदमी पार्टी’ के गठन के समय उन्होंने अपने सभी साथियों को उसमें सम्मिलित होने का नियंत्रण दिया था. किरन बेदी को तो ‘आप’ की ओर से मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनने का न्योता था. यदि वे केजरीवाल के साथ नहीं जा सकीं तो यह उनका अपना निर्णय था. इसके पीछे पहला कारण तो यही था कि किसी को उम्मीद नहीं थी कि दिल्ली में ‘आम आदमी पार्टी’ सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती है. दूसरे किरन बेदी का भाजपा से लगाव आरंभ से ही रहा है. इसलिए जब उनके दिल के करीब की पार्टी ‘नमोनमो’ भज रही हो, और देशभर का मीडिया उसके सुर में सुर मिला रहा हो, तो वे उसके लिए किसी प्रकार की समस्या खड़ी नहीं करना चाहती थीं. कुल मिलाकर अरविंद केजरीवाल को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

अरविंद केजरीवाल के आलोचक उन्हें अत्यंत महत्त्वाकांक्षी बताते हैं. लेकिन महत्त्वाकांक्षी या अतिमहत्त्वाकांक्षी होना बुरा नहीं है. बल्कि एक सद्गुण है, जिसको विकास के लिए जरूरी माना जाता है. महत्त्वाकांक्षा के अंग्रेजी पर्याय ‘एंबीशन’ को लें. रोमन ambition शब्द ambitio से निकला है, जिसके मूल में ‘चारों दिशाओं पर कब्जा जमा लेने’ का भाव है. इस शब्द का अपना ऐसा ही कुछ अतीत भी है. प्राचीन यूनान में उस नेता को जो चारों दिशाओं में अपना प्रभाव जमाने की साध रखता हो और उसके लिए सभी तरह से निरंतर सतत प्रयत्नशील हो, ambitio कहा जाता था. चूंकि धर्म की निगाह में सांसारिक उपलब्धियों का कोई महत्त्व न था, इसलिए धर्माचार्यों की निगाह में ‘एबिशियो’ होना, पापलिप्त होना था. लेकिन समय के साथ शब्दों के अर्थ भी बदलते रहते हैं. कभीकभी शब्द के मायने और निहितार्थ बिलकुल बदल जाते हैं. एक समय में ‘नास्तिक’ होना वेदों में अविश्वास रखने वाले व्यक्ति या विचार से था. कालांतर में नास्तिक को ईश्वर में अविश्वास रखने वाले व्यक्ति तक सीमित कर दिया. दूसरा ऐसा ही महत्त्वपूर्ण शब्द ‘अराजकता’ है. अब अराजकता को अव्यवस्था, अशांति, उच्छ्रंखलता और राजनीतिक उथलपुथल का पर्याय माना जाता है. जबकि ‘अराजकता’ का मूल अर्थ जनसमाज का एकता, सामंजस्य, विवेक और आत्मनिर्भरता के स्तर पर इतना ऊपर उठ जाना है कि वह इतना आत्मानुशासित और लोकसमर्पित हो जाए, जिससे बाहरी शासन या सरकार की आवश्यकता ही न पड़े. दूसरे शब्दों में प्रबुद्ध और स्वतंत्रचेता समाज के लिए ‘अराजक’ होना सम्मानजनक स्थिति है, जहां मनुष्य अपनी संपूर्ण स्वतंत्रता के साथ निर्विघ्न रह सकता है. आज बदले अर्थ के साथ ‘अराजकता’ को लोकतांत्रिक समाजों में भी हेय दृष्टि से देखा जाता है.

इसी तरह महत्त्वाकांक्षी होना भी आजकल उदात्त गुण है. विद्वानों ने महत्त्वाकांक्षाओं को सकारात्मक और नकारात्मक श्रेणियों में बांटा है. सकारात्मक महत्त्वाकांक्षा एक सद्गुण है, जो मनुष्य में विकास की प्रथम प्रेरणाएं जगाती हैं, साथ ही उसे कर्तव्य की दिशा में उत्प्रेरित करती रहती हैं. महत्त्वाकांक्षा की सामान्यतः दो कोटियां होती हैं—निजी और सार्वजनिक. एक विद्यार्थी यदि पढ़लिखकर आइएस, उच्चाधिकारी बनने का सपना देखता है; या कारखानेदार बड़ा उद्योगपति बनना चाहता है तो ये उनकी निजी महत्त्वाकांक्षाएं हैं. इनमें उनका स्वार्थ छिपा है. जीवन में व्यक्तिगत उपलब्धियां भी महत्त्व रखती हैं, उनसे कहीं न कहीं समाज का हित भी सधता है, लेकिन उनका प्रथम ध्येय व्यक्ति की निजी इच्छाओं का पोषण करना होता है, इसलिए ऐसी महत्त्वाकांक्षाओं को ‘प्रेय’ की जनक कहा जा सकता है. दूसरी किस्म की महत्त्वाकांक्षाएं सार्वजनिक महत्त्व की होती हैं. ये महत्त्वाकांक्षाएं लोकोपकार की राह पर चलते हुए सार्वजनिक जीवन की कामयाबी को लेकर बनती हैं. उनमें परिवर्तन की आस छिपी होती है. ऐसा व्यक्ति व्यवस्था से असंतुष्ट होता है. बदलाव की कामना उसका जुनून होता है. चूंकि उसकी अपनी सफलता शेष समाज से मिले समर्थन और सहयोग पर निर्भर होती है, जिसपर यथास्थितिवादियों का कब्जा होता है, इसलिए उसकी राह कंटकभरी होती है. हर पल उसे सफलताअसफलता के झूले में झूलना पड़ता है. ऐसे में उनकी अपनी उत्कंठा, आत्मविश्वास और बदलाव की चाहत आगे बढ़ने का संबल बनती हैं. कई बार तो सब कुछ कुहरे और अनिश्चितता में लिपटा होता है. इसके बावजूद अपने जुनून के बल पर व्यक्ति आगे बढ़ता जाता है. ऐसे व्यक्ति देरसबेर अप्रत्याशित सफलता का वरण कर ही लेते हैं, नहीं तो समाज को ऐसे पड़ाव तक ले जाते हैं, जहां एक बड़ा कारवां उनकी संकल्पयात्रा को आगे बढ़ाने के लिए तैयार होता है. पहली किस्म के महत्त्वाकांक्षी लोगों की समाज में कोई कमी नहीं होती. ज्यादातर इसी प्रकार के होते हैं. वे प्रेय के लिए महत्त्वाकांक्षाओं की खेती करते हैं. समाज में मानप्रतिष्ठा और सुखसंपदा बटोरते हैं. आर्थिक उदारीकरण के दौर में ऐसी ही महत्त्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देने के लिए अनेक पुस्तकें रची गई हैं. दूसरी किस्म यानी परिवर्तनकामी महत्त्वाकांक्षी होना बहुत कम लोगों के बस की बात होती है. इसलिए धर्म, जाति, संप्रदाय, राजनीति के क्षेत्र में जमे बहुत से यथास्थितिवादी ऐसे हैं जो ऐसी महत्त्वाकांक्षाओं को सराहना करना तो दूर, उन्हें अपराध तक मानने लगते हैं.

अरविंद केजरीवाल को मैं दूसरी कोटि का महत्त्वाकांक्षी मानता हूं. जो ‘प्रेय’ की अपेक्षा ‘श्रेय’ को महत्त्व देते हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसे महत्त्वाकांक्षी समाज में विरले ही होते हैं. इस तरह की महत्त्वाकांक्षाओं की खूबी होती है कि उनका कोई एक स्वरूप नहीं होता. व्यक्ति महत्त्वाकांक्षाओं के एक चरण को पार करता है, तो उसकी महत्त्वाकांक्षाएं मनुष्यता के हित में नया उठान ले लेती हैं. उनमें व्यक्ति की प्रतिभा और समर्पण के नएनए रूप सामने आते हैं. उदाहरण के लिए यदि कोई विद्यार्थी आईएएस बनना चाहता है तो उस लक्ष्य को पाते ही उसकी महत्त्वाकांक्षा समाप्त हो सकती है. हो सकता है उसके बाद वह घरगृहस्थी में रमकर रह जाए. यह भी हो सकता है कि उच्च पद पर पदासीन हो, भ्रष्टाचार के चालू तरीकों को अपनाकर अंधाधुंध कालाधन जमा करे, ऐसे ही एक महत्त्वाकांक्षी कारखानेदार बड़ा उद्यमी बनकर कई कंपनियों का स्वामी बन सकता है. लेकिन कुल मिलाकर वे अपने ‘प्रेय’ का ही विस्तार करते हैं, जिसमें व्यक्तित्व का केवल क्षैतिज विस्तार संभव होता है. दूसरी किस्म के महत्त्वाकांक्षी यानी श्रेय को महत्त्व देने वाले देरसवेर लोगों का समर्थन पाकर ‘उर्ध्व’ एवं ‘क्षैतिज’ दोनों तरह से विस्तार पाते हैं. हालांकि धारा के विपरीत बहने के कारण उन्हें अनेक परीक्षाओं और संघर्ष के कठिन दौर से गुजरना पड़ता है. ऐसे महत्त्वाकांक्षी समाज में विरले ही होते हैं.

अरविंद केजरीवाल ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग से आईआईटी की. देश के बड़े औद्योगिक घराने टाटा स्टील में काम किया. लेकिन उनके भीतर रहा महत्त्वाकांक्षी प्राणी उन्हें कुछ नया करने की निरंतर प्रेरणा दे रहा था. अगर वे इंजीनियर ही रहते तो सरकार और सार्वजनिक जीवन में पैठे अनाचार के किसी एक रूप से ही परिचित हो सकते थे. एक इंजीनियर का वास्ता मशीनों से होता है. सरकारी निकाय से जुड़े तो भी सीमित अनुभव प्राप्त कर सकते थे. मगर राजस्व विभाग की नौकरी ने उन्हें सार्वजनिक जीवन में पैठे पर्तदरपर्त पैठे भ्रष्टाचार से रूरू कराया. सूचना अधिकार के आंदोलन के दौरान बहुत से समाजकर्मियों की भांति उन्हें भी लगा कि सूचना का अधिकार मिलते ही लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठ खड़े होंगे. सरकारी कर्मचारी को पता हो कि लोग अपनी फाइल और उसमें की गई कार्रवाही को जानने का अधिकार रखते हैं तो उनकी रिश्वत मांगने की हिम्मत ही नहीं पड़ेगी. इस तरह सूचना का अधिकार का हथियार बनकर एक दिन भ्रष्टाचार को धराशायी कर देगा. मगर उस दौर के आतेआते पूंजीवाद बेलगाम होकर दौड़ने लगा था. संचारक्रांति के लुभावने नारे के साथ बहुत शातिराना ढंग से उसने लोगों के दिलोदिमाग को कब्जाना आरंभ कर दिया. धर्म नाम की अफीम तथा विकास के नाम पर उन्मुक्त व्यापती उपभोक्ता क्रांति ने लोगों के दिलोदिमाग पर अपना कब्जा जमा लिया. धर्म ने लोगों को ‘स्वर्ग’ और ‘मुक्ति’ के नाम पर स्वार्थी बनाया तो पूंजीवाद प्रेरित उपभोक्तावाद ने स्वार्थ को विस्तार देते हुए लोगों से लिखनेपढ़ने का संस्कार ही छीन लिया. अब कोई हथियार चाहे जितना कारगर हो, यदि व्यक्ति को उसे चलाने का हुनर नहीं आता तो उसका होना व्यर्थ है. कुछ ऐसा ही सूचना अधिकार अधिनियम के साथ हुआ. बड़े जोश के साथ, संसद के अधिकार से लागू सूचना अधिकार अधिनियम की धार भी धीरेधीरे भौंथरी पड़ने लगी थी. वैसे भी सूचना अधिकार अधिकार फाइल में लिखी इबारत को पढ़ने की इजाजत तो देता था, लेकिन उसे लिखते समय यदि किसी कर्मचारी ने गलत मंशा से काम लिया है, तो उसपर कार्रवाही करने की इजाजत कानून के अंदर नहीं थी. जनलोकपाल के समर्थक मान रहे थे कि भ्रष्टाचारी को दंडित करने का कार्य ऐसी संस्था द्वारा लिया जा सकता था जो अधिकारसंपन्न होने के साथसाथ स्वायत्त भी हो. इससे जनलोकपाल आंदोलन का जन्म हुआ.

सूचना अधिकार को हवा देने के लिए अरविंद ने परिवर्तन नाम की संस्था खोली थी. मगर सूचना अधिकार के शिथिल पड़ते दिनों में ही जनलोकपाल आंदोलन चला तो अरविंद उसमें कूद पड़े. अन्ना उस आंदोलन के मुखिया बने, लेकिन जनलोकपाल बिल के नाम पर राज्य सभा में जो राजनीतिक नाटक हुआ, उससे पूरा देश यह जान गया कि देश के घाघ नेता ऐसा कोई काम नहीं करना चाहते, जिससे उनकी सत्ता पर खतरा नजर आए. मगर अन्ना और केजरीवाल के आंदोलन का इतना असर तो हुआ था कि जनता राजनेताओं के नकली मुखौटों को पहचानने लगी थी. विशेषकर युवावर्ग जो आर्थिक उदारीकरण के बावजूद देश के दिवालियेपन जैसी स्थिति देख, स्वयं को छला हुआ महसूस कर रहा था. विशेषकर 2007 में पूंजीवाद का गुब्बारा फूटने के बाद आई मंदी के बाद से. मोहभंग का शिकार वही युवावर्ग अरविंद केजरीवाल से जुड़ता चला गया. ‘आम आदमी पार्टी’ की सफलता में उसका बड़ा योगदान है.

सवाल है कि रास्ता किसका अच्छा है. अन्ना का कि अरविंद का? जैसा अन्ना हजारे और किरन बेदी मानना है, सत्ता से दूर रहकर एक दबाव गु्रप की भांति काम करना अच्छा रहेगा; या फिर दलदल में घुसकर उसकी सफाई करने का—जैसाकि अरविंद केजरीवाल करना चाहते हैं. इसका जवाब ढूंढने के लिए हमें बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है. गीता(5/2) में बहुत पहले कह दिया गया है—संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ/तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते.

हो सकता है दलदल में पांव रखने से कुछ छींटे दामन पर आएं. लेकिन जो अपने लिए नया रास्ता चुनते हैं, उनके लिए यह स्वाभाविक ही है. अब यह अरविंद पर है कि वे छींटों की परवाह किए बिना आगे बढ़ते हैं या किनारेकिनारे रहकर केवल राजनीति करना चाहते हैं. वैसे अब तक उन्होंने जो किया है उससे लगता है कि वे चुनौतियों से बचकर चलनेवाले नेता नहीं हैं. यही बात उन्हें दूसरों से अलग बनाती है. यही उनकी दिनोंदिन बढ़ती ख्याति का प्रतीक है. वे भारतीय राजनीति के नए मिथक हैं, जिसमें आदर्श भी है और भरपूर लोकप्रियता भी. दोनों को साधना बड़ी तपस्या का काम है. पर जो साध ले जाते हैं, वे इतिहास नया गढ़ ही लेते हैं. विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल के साथी अपने हाथों में फिल्म ‘नायक’ का पोस्टर लेकर चलते थे. उस फिल्म में दिखाया गया था कि यदि सचमुच कुछ करने का संकल्प हो तो 24 घंटे का समय भी पर्याप्त होता है. लोग नहीं चाहते कि आम आदमी का नायक फिल्मी नायक से ‘फिसड्डी’ साबित हो. सच्चे कर्मयोगी पलछिन नहीं गिनते, केवल अवसर देखते हैं, तभी तो वे छोटेसे सफर को भी यादगार बना जाते हैं. और अंत में दिनकर की प्रेरणादायी कविता की पंक्तियां जो उन्होंने जयप्रकाश नारायण के लिए लिखी थी—

सेनानी करो प्रयाण अभय, भावी इतिहास तुम्हारा है

ये नखत अमा के बुझते हैं, सारा आकाश तुम्हारा है.

© ओमप्रकाश कश्यप

* उठो, जागो, और जानकार श्रेष्ठ पुरुषों के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्त करो । विद्वान् मनीषी जनों का कहना है कि लक्ष्य प्राप्ति का मार्ग उसी प्रकार दुर्गम है जिस प्रकार छुरे के पैना किये गये धार पर चलना.

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