परीकथाएं और विज्ञानगल्प

हिंदी बालसाहित्य में परीकथा संभवतः अकेला ऐसा विषय है, जिसे लेकर लंबी-लंबी बहसें चली हैं. बालसाहित्य मर्मज्ञ विद्वानों का एक वर्ग परीकथाओं को उच्च मानवीय गुणों एवं नैतिकता के अजस्र स्रोत के रूप में देखता है. वह संवेदना, सदगुण, सकारात्मक द्रष्टिकोण, तार्किकता और नए जीवनमूल्यों के अनुरूप लिखी गईं परीकथाओं का बालसाहित्य के रूप में समर्थन करता है. आलोचकों की माने तो जादुई घटनाओं, चमत्कारों, अतिकल्पनाशीलता एवं छिछली भावुकता से भरपूर परीकथाएं बालक को उस दिशा में ले जाती हैं, जिसका उसके जीवन से कोई संबंध नहीं होता. निरंतर उनके प्रभाव में रहने से बालमन में अकर्मण्यता पनपती है. इसलिए वास्तविक चुनौती से सामना होते ही उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. विषम परिस्थितियों में स्वतंत्र निर्णय लेने के बजाय वह किसी बाहरी शक्ति की मदद अथवा चमत्कार की आस करने लगता है. साहित्य विवेकसम्मत निर्णय लेने में उसकी मदद कर सकता है. इसलिए परीकथा के आलोचकों का विचार है कि बच्चों को चुनौतियों से स्वयं निपटने योग्य बनाने के लिए उन्हें आधुनिक भावबोध से भरपूर बालकहानियां, कविताएं आदि दी जानी चाहिए. तदनुसार परीकथा के विकल्प के रूप में वे ‘विज्ञान कथा’ एवं ‘विज्ञान गल्प’ को अपनाने की सलाह देते हैं. आलोचनाओं के बावजूद परीकथाएं आज भी लिखी जा रही हैं. उनका एक विशिष्ट पाठक वर्ग है. लोकसाहित्य की समृद्ध परंपरा के रूप में वे सहस्राब्दियों से, प्रायः हर समाज एवं संस्कृति में हिस्सा रही हैं. भारत और हिंदी दोनों की बात करें तो अपने वर्तमान रूपाकार में परीकथाएं, उनपर चलने वाली बहसों की तरह ही बाहर से आयातित हैं. इस लेख द्वारा हम विज्ञानपरक बालसाहित्य की अवधारणा के बीच परीकथाओं के अस्तित्व एवं उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित करने का प्रयास करेंगे.

परीकथाएं, विज्ञान एवं कल्पनाशक्ति

घटना 1954 के आसपास की है. बताया जाता है कि एक स्त्री आइंस्टाइन से मिलने पहुंची. नोबल पुरस्कार विजेता, विलक्षण प्रतिभा संपन्न वैज्ञानिक होने के कारण उनका मान-सम्मान पहले भी कम न था. मगर विश्वशांति के लिए किए गए अपने अनथक प्रयासों तथा 1952 में इजरायल के राष्ट्रपति पद का प्रस्ताव विनम्रतापूर्वक ठुकरा देने के बाद तो वे पूरी दुनिया पर छा चुके थे. मिलने पहुंची औरत आइंस्टाइन की प्रशंसक थी. वह चाहती थी कि आइंस्टाइन उसके बेटे को समझाएं. उन पुस्तकों की जानकारी दें, जिन्हें पढ़कर उसका बेटा उन जैसा महान वैज्ञानिक बन सके. उत्तर में आइंस्टाइन का कहना था—‘आप इसे परीकथाएं, अधिक से अधिक परीकथाएं पढ़ने को दीजिए.’ महिला चौंकी. उसको लगा आइंस्टाइन ने कोई मजाक किया है. उसने वैज्ञानिक से गंभीर होने की विनती की. बताया कि वह अपने बेटे से बहुत प्यार करती है तथा उसे जीवन में सफल देखना चाहती है. इसके बावजूद आइंस्टाइन का उत्तर पहले जैसा ही था. उनका कहना था—‘रचनात्मक कल्पनाशक्ति सच्चे वैज्ञानिक के लिए उसका अनिवार्य बौद्धिक उपकरण है.’ परीकथाएं बालक की कल्पनाशक्ति को प्रखर करती हैं. अतएव उन्होंने जोर देकर कहा था, ‘मैंने अपने सोचने-समझने के तरीके की पड़ताल की है. काफी चिंतन-मनन के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि मेरे लिए मेरी अद्भुत कल्पनाशक्ति वस्तुजगत संबंधी किसी भी बोध, यहां तक कि सकारात्मक सोच से भी कहीं अधिक लाभकारी है.’
उन्होंने महिला को पुनः समझाया—

‘यदि तुम्हें अपने बेटे को प्रतिभाशाली बनाना है तो उसको परीकथाएं पढ़ाओ. यदि तुम उसे और ज्यादा प्रतिभाशाली बनाना चाहती हो तो उसे और अधिक परीकथाएं पढ़ने को दो.’

उपर्युक्त प्रसंग का उल्लेख अनेक विद्वानों ने किया है. कितना सच है यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. यदि यह सच है तो आइंस्टाइन ने उस स्त्री से क्या कोई परिहास किया था? शोध एवं कल्पना का क्या कोई अंतःसंबंध है? क्या परीकथाओं को पढ़कर कोई बालक सचमुच वैज्ञानिक बन सकता है? यदि नहीं तो आइंस्टाइन ने ऐसा क्यों किया था? यदि हां, तो यह कैसे संभव है कि परीकथा जैसे निहायत कल्पनाशील किस्सों को पढ़कर कोई बालक वैज्ञानिक बन सके? जो लोग वैज्ञानिक प्रविधियों की जानकारी रखते हैं, जिन्हें विज्ञान और उसके इतिहास की समझ है, वे जानते हैं कि यह असंभव भी नहीं है. ज्ञान-विज्ञान एवं कल्पना का रिश्ता बड़ा करीबी होता है. तीव्र कल्पनाशक्ति संभावनाओं के नए वितान खोलकर वैज्ञानिक बोध को रचनात्मक दिशा देने में मददगार सिद्ध होती है. आइंस्स्टाइन ने खुद स्वीकार किया था कि उनके द्वारा किए गए शोध के पीछे उनकी अद्भुत कल्पनाशक्ति का योगदान था. आपेक्षिकता के सिद्धांत की परिकल्पना भी उनके प्रखर कल्पना-सामर्थ्य के दम पर संभव हो पाई थी. पाठक के रूप में यह जानना हमारे लिए रोमांचक हो सकता है कि पदार्थ एवं ऊर्जा की अंतपर्रिवर्तनीयता को दर्शाने वाला सूत्र तथा सापेक्षिकता का विचार उनके मानस में कल्पना के द्वारा ही उभरा था; अन्यथा यह तो कभी का प्रमाणित हो चुका था कि पृथ्वी समेत ब्रह्मांड के सभी ग्रह-नक्षत्र गतिमान हैं. उनकी गति चक्रीय एवं घूर्णन दो प्रकार की होती है. विराट अंतरिक्ष में किसी पिंड की स्थिति की कल्पना करनी हो तो क्षण-क्षण परिवर्तनशील होने के कारण उसकी स्थिति का सटीक अनुमान संभव ही नहीं है, क्योंकि अनेक गतिमान पिंडों के बीच में किन्हीं दो गतिशील पिंडों की स्थिति को लेकर सटीक गणना उस समय तक असंभव है, जब हम बाकी गतियों को कल्पना में ही सही, शून्य नहीं मान लेते. यही वह समस्या थी, जिसे सुलझाने में आइंस्टाइन ने कामयाबी हासिल की थी.

उस समय के भौतिक विज्ञानी एक जटिल पहेली से जूझ रहे थे. पहेली थी—‘मान लीजिए कोई अंतरिक्ष यात्री प्रकाशवेग जितने असंभव वेग से अंतरिक्ष यात्रा पर है. उसके हाथ में एक दर्पण है. तो क्या उस दर्पण में वह अपना प्रतिबिंब देख पाएगा? कोई और होता तो उस पहेली पर कुछ देर तक माथापच्ची करता. तीर-तुक्का चलाता. फिर हाथ झाड़कर आगे बढ़ जाता. जब से वह पहेली बनी थी, तब से यही होता आया था. साधारण मनुष्यों की भांति यदि आइंस्टाइन भी यही करते तो उन्हें जीनियस कौन कहता! इस पहेली का हल खोजने में आइंस्टाइन ने एक-दो दिन या महीने नहीं, 1895 से 1905 तक, पूरे दस वर्ष लगा दिए. इस बीच जो भी उन्हें मिला उससे पहेली के बारे में चर्चा की. उसका समाधान करना चाहा. मित्रों-गुरुजनों को पत्र लिखकर संवाद किया. मगर नाकामी हाथ लगी. आखिरकार उनकी तीव्र कल्पनाशक्ति उनके काम आई. उससे पहले प्रकाशवेग को भी परिवर्तनशील माना जाता था. मान्यता थी कि प्रेक्षक के अनुसार प्रकाश का वेग भी बदलता रहता है. आइंस्टाइन ने प्रकाश वेग को सृष्टि का उच्चतम वेग माना. साथ ही परिकल्पना की कि वह प्रेक्षक की स्थिति पर निर्भर नहीं करता. प्रेक्षक चाहे स्थिर हो अथवा गतिमान, प्रकाशवेग प्रत्येक स्थिति में अपरिवर्तित रहता है. यह उनकी मौलिक परिकल्पना थी. एक दूर की कौड़ी, जिसे वैज्ञानिक कसौटी पर प्रमाणित करने में स्वयं आइंस्टाइन को पूरे बीस वर्ष लग गए. इस खोज के फलस्वरूप खगोलीय पिंडों की स्थिति की सटीक व्याख्या के लिए क्षण को महत्ता प्राप्त हुई. समय को चैथे आयाम के रूप में स्वीकारा जाने लगा. न केवल आइंस्टाइन बल्कि न्यूटन, आर्कीमिडीज, लियोनार्दो दा विंसी, गैलीलियो, था॓मस अल्वा एडीसन, जेम्स वाट आदि अनेक वैज्ञानिक हुए हैं, जिनकी सफलता के पीछे उनकी विलक्षण कल्पना-शक्ति का योगदान था.

पृथ्वी में कोई शक्ति है यह विचार न्यूटन को कथित रूप से सेब के जमीन पर गिरने की घटना से सूझा था. ‘कथित’ इसलिए क्योंकि फल गिरने से आकर्षण शक्ति की परिकल्पना का उल्लेख न्यूटन से करीब नौ सौ वर्ष पहले लिखित ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ में भी मिलता है. यह मध्यकालीन आचार्य ब्रह्मगुप्त की रचना है. उनसे भी पहले वाराहमिहिर ने लिखा था—‘पृथ्वी उसी को आकृष्ट करती है, जो उसके ऊपर हो. क्योंकि यह सभी दिशाओं में नीचे है और आकाश सभी दिशाओं में ऊपर है.’ ब्रह्मगुप्त इसे और भी स्पष्ट कर देते हैं—

‘चारों तरफ आकाश बराबर रहने पर पृथ्वी ही के ऊपर बहुत पके हुए फल को गिरता हुआ देखकर भूपृष्ठ स्थित प्रत्येक बिंदू में आकर्षण शक्ति है—यह अनुमान किया गया.’

वैज्ञानिक शोध के लिए कल्पना का सहारा प्राचीनकाल से लिया जाता रहा है. शोध क्षेत्र में कामयाबी प्रायः उन्हीं के हाथ लगी, जिनकी कल्पना-शक्ति प्रखर थी. यह न्यूटन की अंतःप्रज्ञा ही थी जिसने उसको चेताया था कि यदि पृथ्वी में आकर्षण बल है तो उसका कुछ न कुछ परिमाण भी होना चाहिए! अपनी विलक्षण मेधा से उसने गुरुत्वाकर्षण बल की संकल्पना को नए सिरे से न केवल स्थापित किया, बल्कि उसकी परिगणना भी की. फलस्वरूप एक नई संकल्पना ने जन्म लिया कि पृथ्वी सहित ब्रह्मांड के सभी ग्रह-नक्षत्र एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं. आकर्षण बल की मात्रा उनके द्रव्यमान तथा बीच की दूरी पर निर्भर करती है. भारी पिंडों का आकर्षण बल उसी अनुपात में अधिक होता है. यह बल दूरी बढ़ने के साथ निरंतर घटता जाता है.

शोध-क्षेत्र में कल्पनाशक्ति का योगदान लक्ष्य की पूर्वपीठिका तैयार करने का है, जिसके बिना किसी यात्रा का शुभारंभ असंभव है. वैज्ञानिक शोध के प्रायः दो रास्ते होते हैं. आगमनात्मक प्रणाली, जिसमें उपस्थित विशिष्ट तथ्यों के आधार पर सामान्य सिद्धांत का अन्वेषण किया जाता है. न्यूटन का जड़त्व का सिद्धांत, एडवर्ड जेनर द्वारा चेचक की वैक्सीन, फ्लेमिंग द्वारा बादलों में बिजली इसी प्रकार के शोध हैं. दूसरी ‘निगमनात्मक प्रणाली’ में पहले सामान्य सिद्धांत की परिकल्पना कर ली जाती है, तदनंतर उसकी पुष्टि हेतु प्रमाण खोजे जाते हैं. पहली यानी ‘आगमनात्मक प्रणाली’ का उपयोग प्रायः वैज्ञानिक शोध के क्षेत्र में किया जाता है. इसका आशय यह नहीं है कि ‘निगमनात्मक प्रणाली’ विज्ञान के लिए सर्वथा वर्जित है. बल्कि ऐसे अनेक मामले हैं, जिनमें प्रमाणों के अभाव में वैज्ञानिक अपने बोध अथवा अनुभव के आधार पर सामान्य परिकल्पना कर लेते हैं. बाद में विभिन्न प्रयोगों, अन्वीक्षण आदि के आधार पर उस परिकल्पना को जांचा-परखा जाता है. इन दिनों चर्चित ‘हिग्स बोसोन’ के लिए यही पद्धति अपनाई जा रही है. वरना सार्वत्रिक बल की परिकल्पना तो आइंस्टाइन ने ही कर ली थी.

कुछ ऐसे शोध भी हैं जिनमें आगमनात्मक और निगमनात्मक दोनों ही प्रणालियों का उपयोग होता है. न्यूटन के गुरुत्त्वाकर्षण और आइंस्टाइन के सापेक्षिकता के सिद्धांत की खोज में आगमनात्मक और निगमनात्मक दोनों प्रणालियों का योगदान दिखाई पड़ता है. एक श्रेणी आकस्मिक रूप से होने वाली खोजों की भी है. उन आविष्कारों की जो किसी दूसरे प्रयोग अथवा घटना के दौरान अकस्मात हाथ लग जाते हैं, जैसे मैग्नेशिया के चरवाहों द्वारा चुंबक की खोज, मैडम क्यूरी द्वारा रेडियम, फीनीशिया के समुद्रतट पर सीरियाई व्यापारियों द्वारा कांच की खोज वगैरह. उनके लिए भी ऐसी सूझबूझ होना जरूरी है जो नएपन को पकड़ सके तथा उसके आधार पर सामान्य परिकल्पना गढ़कर आगे बढ़ सके. बुदापेस्ट विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. के. स्टेलजेर ने शोधकर्ता में अपेक्षित जिन आठ गुणों को जरूरी बताया है, वे हैं—तत्परता(5%), खुला मन(10%), दृष्टि की विशालता(15%), कल्पनाशक्ति(30%), निर्णय दक्षता(15%), विषय का सांकेतिक ज्ञान(10%), अनुभव(10%) तथा दायित्वबोध(5%). इस विश्लेषण को ध्यान से देखें तो नवीन शोध के लिए कल्पना को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है. कुछ ऐसे ही विचार जेरोम सिंगर के रहे हैं. पेशे से मनोविश्लेषक सिंगर का मानना है कि कल्पना स्वस्थ मनस् की ओजपूर्ण कार्रवाही है. उसके अनुसार कल्पना की ऊंची उड़ान यहां तक कि दिवास्वप्न भी हमारे आत्मविश्वास और धैर्य की वृद्धि में सहायक होते हैं. कुल मिलाकर हमारे वे हमारे विवेक एवं चारित्रिक गठन में सकारात्मक योगदान देते हैं. वह आगे लिखते हैं कि अच्छी-तरह सोची-विचारी गई कल्पना व्यक्ति-स्वातंत्र्य, यथार्थबोध, और आत्मविश्वास की वृद्धि में सहायक सिद्ध होती है.

उपर्युक्त विश्लेषण से इतना तो तय हुआ कि कल्पना और सृजनात्मकता के बीच कोई वैर नहीं है. उनमें न तो कोई स्पर्धा है और न कोई वैर. दोनों एक-दूसरे की पूरक, समानांतर और सहायक हैं. अतएव मात्र अतिकल्पनाशीलता का तर्क देकर परीकथाओं की आलोचना को नीतिसंगत नहीं ठहराया जा सकता. परीकथाएं बालक के कल्पना-सामर्थ्य को निखारकर उसे कई वैकल्पिक समाधान दे सकती हैं. वैज्ञानिक शोध को नई दिशाएं देने के लिए यह अत्यावश्यक है. वहीं विज्ञान परीकथा लेखकों को कल्पना के नए क्षेत्र, नए विषय और तार्किक आधार प्रदान कर सकता है. फिर परीकथाओं की आलोचना की वजह? क्या परीकथाओं का अपना कोई ऐसा लक्षण है जो उन्हें विज्ञान-विरोधी सिद्ध करता हो? यहां परीकथा के कथानक और पात्रों को जानबूझकर नजरंदाज किया रहा है. हालांकि साहित्यिक, विशेषकर कथारचना में पात्रों की प्रकृति का अपना महत्त्व होता है. फिर भी मेरा मानना है कि पात्र लेखक की मनोरचना होते हैं, रचना द्वारा उसका ध्येय किसी चरित्र की स्थापना करना नहीं होता, बल्कि उन जीवनमूल्यों की पुन:स्थापना अथवा व्याख्या करना होता है, जिन्हें वह मनुष्य एवं समाज के कल्याण हेतु आवश्यक मानता है. ऐतिहासिक, धार्मिक मामलों में स्थिति थोड़ी भिन्न हो सकती है. क्योंकि वहां जीवनमूल्य पात्रों के नाम से जुड़े होते हैं. उद्देश्य वहां भी किसी लोकोपयोगी सत्य को, तत्संबधी ऐतिहासिक चरित्र के माध्यम से कुछ और प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करना होता है. परीकथा-आलोचकों को सबसे अधिक आपत्ति उनके पात्रों तथा विचित्र घटनाक्रम से होती है. उनके अनुसार परीकथाओं के पात्र इस दुनिया से बाहर की चीज होते हैं, जादू-टोने और चमत्कार जिन्हें लेकर सामान्य परीकथाएं गढ़ी जाती हैं, कल्पना की मनगढ़ंत दुनिया है—आलोचकों के ये तर्क युक्तिसंगत कहे जा सकते हैं. मगर सच भी है कि साहित्य में कथानक अथवा पात्रों की असलियत महत्त्वपूर्ण नहीं होती. वे तो रचना का केवल बाह्यः कलेवर तैयार करते हैं. जिसे साहित्य कहते हैं, उसकी प्रतीति लेखकीय सदेच्छा तथा रचना द्वारा पाठक के मनस् पर डाले गए सकारात्मक प्रभावों तथा उनकी रचनात्मक प्रतिक्रिया द्वारा होती है.

साधारण लेखक यह कामना कर सकता है कि पाठक उसके गढ़े हुए पात्रों और कथानक को याद रखें. सच्चे साहित्यकार की दृष्टि सदैव शुभ पर केंद्रित होती है. वह व्यक्ति और समाज में जीवन-मूल्यों की स्थापना के लिए कलम उठाता है. अर्नेस्ट हेंमिंग्वे के उपन्यास ‘ए मेन आ॓न दि सी’ का उल्लेख करना चाहूंगा. परीकथाओं जैसी पृष्ठभूमि लिए इस लघु उपन्यास में एक नाव है, मछुआरा है, समुद्र है और है विशालकाय मछली. इन पात्रों को लेकर न जाने कितने लेखकों ने कलम उठाई है. खोजने पर हजारों रचनाएं ऐसे परिवेश और कथापात्रों के साथ मिल सकती हैं. लेकिन एक व्यक्ति की जिजीविषा, विषम परिस्थितियों से जूझने, धैर्य बनाए रखने की भावना और कर्तव्यनिष्ठा, जिस शिद्दत के साथ इस छोटे-से उपन्यास में उभरकर आती है, वैसी बाकी किसी रचना में नहीं. यही साहित्यत्व है, यही शुभ. इसी को रचना के माध्यम से पेश करना साहित्यकार का अभीष्ट होता है. यह रचना में पूरी तरह उभर आए तो वह ‘क्लासिक’ की श्रेणी में आ जाती है. अन्यथा उसकी नियति बोरे में भरे आलुओं में से किसी एक आलू जैसी होती है. ‘परी’ नाम को छोड़ दिया जाए तो कोई भी पात्र परीकथाओं के लिए अनिवार्य नहीं है. सक्षम साहित्यकारों ने तो परियों को बीच में लाए बिना भी लाजवाब परीकथाएं लिखी हैं. उन्हें पूरी दुनिया में सराहा गया है. हेंस एंडरसन की ‘स्नोमेन’ ऐसी ही मर्मस्पर्शी परीकथा है.

परीकथाओं की सामान्य विशेषता है कि वे बच्चों को केंद्र में रखकर लिखी जाती हैं. हालांकि साहित्यकार पर यह दबाव होता है कि वह मनोरंजन के साथ-साथ सोद्देश्यता को भी बनाए रखे. यदि कोई रचना साहित्यत्व ही गंवा देगी तो उसके लिखने का नैतिक उद्देश्य ही जाता रहेगा. संदेश और सोद्देश्यता परीकथाओं में भी होती है. लेकिन परीकथा लेखक केवल इन्हीं को ध्यान में रखकर नहीं लिखता. उसका ध्येय होता है कि बालक उसकी कल्पना के साथ-साथ उड़ान भरता हुआ, उस लोक में पहुंच जाए जहां कहानी की पात्र परियों का वास है; अथवा जहां वह अपने कथानक के माध्यम से उन्हें ले जाना चाहता है. इसके लिए सबसे पहले उसको अपने साहित्यकार होने के दर्प को किनारे कर बच्चों के मनोस्तर तक उतरना पड़ता है. बच्चों के साथ रहकर, उनके खेल-कूद, बातचीत, रहन-सहन, कोमल मनोभावों को समझ, उनकी चिंताओं और सपनों से बाबस्ता होने के बाद वह अपनी कल्पना के तार जोड़ता है. उस समय तक बालपाठक भी उसके साथ घुल-मिल जाता है. संक्षेप में परीकथा लेखक की वास्तविक सफलता बालक को अनूठी कल्प-यात्रा का सहयात्री बना लेने तथा बालक द्वारा लेखक को अपना सखा-सहयात्री स्वीकार लेने में है. यहां साहित्यकार का अनुभव काम आता है. सोद्देश्यता बनाए रखने के लिए वह साहित्यत्व को रचना में लाता है, किंतु अतिप्रच्छन्न रूप में. ऐसे कि बालक को आभास तक न हो.

उदाहरण-स्वरूप हम एंडरसन की परीकथाओं का उल्लेख कर सकते हैं. उनकी एक चर्चित कहानी है—‘टीन का सिपाही’. बहुत ही मार्मिक कहानी. ‘टीन का सिपाही’ एक पांव से लंगड़ा और दुबला-पतला था. इस कारण कोई उसको प्यार नहीं करता था. एक दिन गुड़िया उसको भा जाती है. गुड़िया पर बाजीगर की भी नजर है. वह टीन के सिपाही के लिए तरह-तरह की मुश्किलें खड़ी करता है. आखिर टीन का सिपाही जलती हुई अंगीठी में गिर जाता है. पीछे से गुड़िया भी उसमें कूद जाती है. यहां तक कहानी में परी की कोई भूमिका नहीं है. विचित्र कल्पना के रूप में टीन का सिपाही है. गुड़िया है और खलनायक के रूप में निर्दयी बाजीगर है, जो टीन के सिपाही और गुड़िया पर एक के बाद एक अत्याचार करता है. पर टीन के सिपाही को अंगीठी में जलते हुए देख परी अचानक उपस्थित होती है. वह दोनों को अंगीठी से निकालकर उन्हें स्त्री-पुरुष बना देती है. वह दोनों को निश्चिंत करती है कि बाजीगर आगे उन्हें कभी परेशान नहीं कर पाएगा. यह सब कल्पना में ही होता है, किंतु इसी बहाने व्यक्ति को यह विश्वास होता है कि एक न एक दिन उसकी दुरवस्था का निदान संभव है. प्रख्यात परीकथा लेखक, विचारक जी. के. चेटरसन लिखते हैं—

‘परीकथाओं का सच, यथार्थ से आगे का सच होता है. परीकथाओं में महत्त्वपूर्ण यह नहीं हैं कि वे हमें राक्षस की मौजूदगी से परचाती हैं. महत्त्वपूर्ण यह है कि वे हमें भरोसा दिलाती हैं कि राक्षस की पिटाई भी संभव है.’

साहित्य में प्रतीक महत्त्वपूर्ण होते हैं. एंडरसन की कहानी में ‘टीन का सिपाही’ और ‘गुड़िया’ दोनों आम आदमी का प्रतीक हैं. बाजीगर धर्मसत्ता और राजसत्ता के योग से बनी निरंकुश सत्ता का. निरंकुश सत्ताआम जन पर उसी समय तक अत्याचार कर पाती है, जब तक वे अपनी ताकत से अनभिज्ञ हों. ‘परी’ यहां नई ज्ञान-चेतना का प्रतीक है तथा अंगीठी प्रबोधीकरण की प्रक्रिया का. टीन के सिपाही और गुड़िया का जैसे ही विवेकीकरण होता है, उनमें नई ज्ञान-चेतना उमड़ने लगती है. दोनों के चेतनासंपन्न होते ही बाजीगर रूपी निरंकुश सत्ता की चालबाजियों का अंत स्वतः हो जाता है. यह परीकथाओं की खूबी है जो जिनमें पाठक तो पाठक, लेखक तक अपनी कुंठाओं का समाहार कर सकता है. परीकथाएं यह विश्वास दिलाती हैं कि बुरी से बुरी स्थिति का भी सार्थक समाधान संभव है. इसके लिए बालक को लगना चाहिए कि अजूबे पात्रों के माध्यम से जो कहानी कही जा रही है, वह कहीं न कहीं उसकी भी है. एक अच्छा परीकथा लेखक बाल-पाठकों को सिर्फ वह नहीं देता जो उसे पसंद हो. बल्कि वह अपनी रचना को इतनी बहुआयामी बना लेता है कि बालक उसमें से अपनी पसंद को चुन सके. यह कुशलता भाषा-शैली के स्तर पर भी होनी चाहिए, ताकि नाद के माध्यम से एक अतिरिक्त आकर्षण रचना में समा जाए. पढ़ते समय पाठक को सुनने का आनंद भी आए. लेखकीय कौशल अनूठी कल्पना के रूप में भी होना चाहिए, जिसके फलस्वरूप पाठक उसमें इतना डूब जाए कि अपने आसपास का उसे बोध ही न रहे. यदि श्रोता-पाठक रचना के पात्रों के साथ तादात्मय स्थापित कर लेगा तो वह रचना की अनेक कमजोरियों अथवा उन बिदुंओं को जिनमें उसकी अरुचि है, भुला देगा.

परीकथाएं एवं विज्ञान गल्प

साधारण नजर से देखने पर परीकथा एवं विज्ञान गल्प परस्पर भिन्न, दो विपरीत दिशाओं में खड़े टापुओं के समान दिखाई पड़ते हैं. ऐसा ही प्रचारित किया जाता है. यह सचाई का एक पहलू है. ध्यानपूर्वक विचार करने पर पाएंगे कि दोनों में आश्चर्यजनक एकरूपता है. परीकथा एवं विज्ञान गल्प का सृजन सामान्यतः दो घटकों के आधार पर होता है. उनमें एक विशिष्ट है, दूसरा सामान्य. सामान्य इसलिए कि अपने अस्तित्व एवं मौलिकता को बनाए रखने के लिए दोनों उसे अपरिहार्य मानते हैं. उसकी दोनों में समान उपस्थिति है. इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा समझा जा सकता है—

विज्ञानबोध   +   कल्पना   =   विज्ञान गल्प
करुणा अथवा करुणतत्व   + कल्पना   =   परीकथाएं

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि कल्पना की उपस्थिति जितनी परीकथा लेखन के लिए आवश्यक है, उतनी जरूरी विज्ञान गल्प के लिए भी है. अब यदि यह माना जाए कि विज्ञान-गल्प एवं परीकथा दोनों परस्पर विपरीत धुर्वी हैं, तब यह भी मानना पड़ेगा कि ‘विज्ञानबोध’ तथा ‘करुणा’ जो इनके विशिष्ट घटक हैं; अथवा जिनसे इन्हें भिन्न पहचान प्राप्त होती है—परस्पर विपरीतधर्मा हैं. या फिर कल्पना के साथ स्वतंत्र संयोग कर ये दोनों जो भिन्न-भिन्न संरचनाएं गढ़ते हैं, वे आपस में विपरीत-धर्मा है. प्रकट में समाज का काम न तो बिना ‘करुणा’ के चलता है, न ‘विज्ञानबोध’ के. सामाजिक संतुलन, विकास की निरंतरता हेतु ये दोनों ही अत्यावश्यक हैं. पिछले चार-पांच सौ वर्षों से विज्ञान जिस तेजी से सामाजिक विकास का मुख्य प्रवर्त्तक बनकर उभरा है, उससे लेखकों एवं बुद्धिजीवियों में उसके प्रति अतिरिक्त आस्था है. तथापि विज्ञान अथवा विज्ञानबोध की तुलना में ‘करुणा’ का प्रत्यय काफी पुराना है. लेखन का पहला स्फुरण ही आदि कवि के मुख से, उनके हृदय में उपजी करुणा के फलस्वरूप हुआ था. करुणा मानव-हृदय को नैतिक प्रेरणाओं से समृद्ध करती है. व्यक्तित्व को आवश्यक लचीलापन प्रदान करती है. विज्ञान करुणामय हो सकता है. उसके कई आविष्कार वैज्ञानिकों की मनुष्यता के प्रति आस्था एवं करुणा द्वारा संभव हो पाए हैं. इसके बावजूद करुणा विज्ञान का विषय नहीं है.

करुणा मूलतः संश्लेषणात्मक होती है. रचना की अंतरात्मा में प्रवेश कर उसे कोमल और हृदयग्राही बनती है. यह करुणा का ही विस्तार है जो हम विज्ञान के किसी आविष्कार को लेकर कामना करते हैं कि वह समाज के अंतिम छोर पर स्थित व्यक्ति के कल्याण में सहायक बनेगा. उसके कष्टों, विपत्तियों, बाधाओं, व्याधियों, अभावों आदि का समाहार कर सुख-सपनों के दरवाजे खोल देगा. अतीत में उसने ऐसा किया भी है. एडवर्ड जेनर, एलेक्जेंडर फ्लेमिंग के मन में करुणा का कोई छिपा अंश ही रहा होगा, जिसके फलस्वरूप अपना सबकुछ दांव पर लगा, यहां तक कि प्राणों का जोखिम उठाकर भी वे क्रमशः ‘वैक्सीन’ और ‘पेनिसिलीन’ का आविष्कार करने में कामयाब हुए थे. करुण-तत्व प्रमुख होने के कारण परीकथाएं पाठक के दिल में उतर जाती हैं. आमतौर पर वही परीकथाएं ज्यादा पढ़ी-सुनी जाती हैं, जिनमें दुख की सघन व्याप्ति तथा उसके व्यापक संदर्भ हों.

विज्ञान की प्रवृत्ति ज्ञान के संश्लेषण के बजाय, विश्लेषण की होती है. सत्य तक पहुंचने के लिए वह तथ्यों के परिवीक्षण और विश्लेषण की नीति को अपनाता है. इसके फलस्वरूप प्राप्त निष्कर्ष अधिक प्रामाणिक एवं भरोसेमंद माने जाते हैं. विज्ञान से हम अपेक्षा करते हैं कि उसकी उपलब्धियां मानवमात्र के लिए कल्याणकारी सिद्ध होंगी. दूसरे शब्दों में हम विज्ञान से अपेक्षा करते हैं कि वह करुण-तत्व को अपनाए, मानवमात्र के हितों को लेकर संवेदनशील रहे, तभी वह स्वयं को वृहद लोककल्याण के प्रति समर्पित कर सकता है. इसलिए ‘करुणा’ और ‘विज्ञानबोध’ जो क्रमशः परीकथाओं एवं विज्ञानगल्प के विशिष्ट घटक हैं, समाज के बहुआयामी विकास की दृष्टि से विपरीतगुणधर्मा न होकर, परस्पर पूरक-सहायक हैं. ऐसे में विज्ञान लेखक का दायित्व है कि वह समाज में यत्र-तत्र मौजूद विपुल ज्ञान-विज्ञान संपदा का रचनात्मक उपयोग करे. इस प्रकार कि वह सहज-सरल रूप में ढलकर अधिसंख्यक वर्ग के लिए लाभकारी सिद्ध हो सके.

परीकथाओं का विशिष्ट तत्व ‘करुणा’ मानवीकरण की उच्चाकांक्षा से अनुप्रेत होता है. अपने विनम्र अंदाज में परीकथाएं सामाजिक समानता का रूपक रचती हैं. वे समाज में व्याप्त अनेकानेक समस्याओं का काव्यात्मक समाधान देती हैं, जिसे परीकथा समर्थक उनका विशिष्ट गुण मानते हैं, विरोधी अवगुण. यह ठीक है कि कोरे रागात्मक समाधान से अपेक्षित परिवर्तन नहीं आता. उससे न तो किसी की भूख मिटती है, न सामाजिक असमानता खत्म हो पाती है, किंतु उससे खुद पर, आने वाले समय और समाज पर भरोसा बना रहता है. दरअसल, अनियोजित शहरीकरण ने समाज के समक्ष जो चुनौतियां पेश की थीं, उनमें बड़ी चुनौती व्यक्ति के केंद्र में ढल जाने की है. भारत की प्राचीन सभ्यता, भाईचारे की परंपरा का दावा करने वाले गांव भी उससे अछूते नहीं हैं. विज्ञान ने हमारी मदद की है. किंतु उसकी अपनी सीमाएं हैं. विज्ञान अकेलेपन द्वारा पैदा हुई मुश्किलों की भरपाई तो कर सकता है, करता आया है. किंतु उसके पास अकेलेपन की कोई दवा नहीं है. इसलिए सुख-सुविधाओं के जमघट के बावजूद मानवीय अवसाद की घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं. जो विद्वान अकेलेपन को आधुनिक सभ्यता की नियति मान बैठे हैं, उनका निराशा की शरण में जाना अवश्यंभावी है. उसका विकल्प वे विज्ञान और तज्जनित फंतासी की निष्प्राण दुनिया में खोजना चाहते हैं. उनसे इतर जो मनुष्य के रागात्मक जीवन तथा आधुनिक भावबोध में संतुलन चाहते हैं, वे परीकथाओं तथा साहित्य की अन्यान्य विधाओं के महत्त्व को समझकर उन्हें सहेजे रखना चाहते हैं. साहित्य अथवा उसकी किसी विधा की सबसे बड़ी चुनौती अपने समय से तालमेल बनाकर रखना है. नए-नए प्रयोगों द्वारा परिकथाओं ने ऐसा किया भी है. उनकी अपेक्षा विज्ञान कथाओं में प्रयोगधर्मिता कम देखने को मिलती है. खासकर विकासशील और अविकसित देशों में, जहां विज्ञानबोध की कमी के चलते विज्ञान साहित्य लोकजीवन का स्वाभाविक हिस्सा नहीं बन पाता. परिणामस्वरूप वह ऊपर से थोपा हुआ, कभी-कभी तो निखालिस टोटम लगने लगता है.

विज्ञान गल्प और परीकथाओं दोनों की खूबी उनका अतिकल्पनाशील होना है. यह विडंबना ही कही जाएगी कि अतिकल्पनाशीलता जो विज्ञान गल्प के लिए दोषरहित दिखाई पड़ती है, परीकथाओं के संदर्भ में वह आलोच्य मान ली जाती है. जो विज्ञान लेखक अरबों प्रकाशवर्ष दूर अंतरिक्ष में कल्पित ग्रह पर अच्छे और बुरे वैज्ञानिकों के बीच संघर्ष से युक्त आधारविहीन फंतासी को विज्ञान-सम्मत घोषित करते नहीं अघाते, वे परीकथाओं की परंपरागत फंतासी से भुन्नाने लगते हैं. विज्ञान लेखकों का तर्क होता है कि उनकी मुक्ताकाशी कल्पना के पीछे कोई न कोई स्वयंसिद्ध वैज्ञानिक आधार होता है. साथ में यह उम्मीद कि आज नहीं तो कल विज्ञान उस लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रहेगा. परीकथाएं प्रकट में ऐसा कोई आश्वासन नहीं देतीं.

परंपरागत परीकथाओं के साथ यह डर भी जुड़ा हुआ था कि उनके अधिकांश पात्र सामंती स्वभाव के होते थे. परियों में भी राजा और रानियां होती थीं. बौने होते थे, जिनकी हैसियत समाज के छोटे, दूसरों की दया पर जीने वाले, उपेक्षित कार्मिक वर्ग जैसी थी. इस तरह वे प्राचीन अलोकतांत्रिक और विभेदकारी समाज-व्यवस्था से पाठक के अनुकूलन का काम करती थीं. यहां परीकथाआंे की पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है. जान लेना चाहिए कि परीकथाओं का उद्भव लोकसाहित्य के हिस्से के रूप में हुआ है. इसलिए सामंतवाद, ब्राह्मणवाद सहित भारतीय समाज के तत्कालीन संस्कारों की उसमें उपस्थिति अवश्यंभावी थी. परीकथाओं की इस कमजोरी को यूरोपीय जागरण के दौरान समझ लिया गया था. अतएव अठारहवीं और उनीसवीं शताब्दी में वहां परीकथाओं को नए सिरे से लिखे जाने का चलन शुरू हुआ. हालांकि कुछ पश्चिमी लेखकों ने भारत को परीकथाओं के मूल देश की भांति देखा था. इसके बावजूद यहां आधुनिक युगबोध से संपन्न परीकथाओं के लेखन की रफ्तार काफी मंद रही. शायद इसलिए कि एक तो ‘परी’ की अवधारणा अभारतीय थी, जिससे प्रतिभाशाली लेखकों की उनके प्रति उपेक्षा बनी रही. दूसरे आरंभिक पारसियन और यूरोपीय विद्वानों ने जिन रचनाओं को भारतीय परीकथा के रूप में स्वीकारा था, उनमें से अधिकांश लोकसाहित्य का हिस्सा थीं. भारतीय उन्हें देसी परंपरा के रूप में देखने के अभ्यस्त थे. आगे चलकर पश्चिमी विद्वानों ने पंचतंत्र, वैताल पचीसी, सिंहासन बतीसी, लोकसाहित्य आदि के अलावा कुछ पौराणिक और वैदिक कहानियों को भी भारतीय परीकथाओं के रूप में मान्यता दी, जिन्हें भारतीय लेखकों ने करीब-करीब नकार दिया. शायद इसलिए कि अपनी साहित्यिक परंपरा को विदेशी पहचान के अंतर्गत देखा जाना उन्हें स्वीकार न था. इसके बावजूद समाज में परीकथाओं की लोकप्रियता बनी रही. उन्हें संवेदना, करुणा, मानवता, परोपकार के अजस्र स्रोत के रूप में देखा जाता रहा. यही उनकी लोकप्रियता की असली वजह थी. यही उनकी असली ताकत. शायद इसी को ध्यान में रखकर ‘स्टडी आ॓फ फेयरी टेल्स’ में लौरा एफ. क्रैडी ने लिखा था—

‘परीकथाओं का मूल संदेश है, मायावी दुनिया में सचमुच का जीवन, चाहे वह सामान्य बालक की असामान्य परिवेश में उपस्थिति के रूप में हो या असामान्य बालक की सामान्य परिवेश में. सामान्य और असामान्य का यह सुयोग ही ‘एलिस इन वंडरलेंड’ का मुख्याकर्षण है, जिसमें एक सामान्य बालिका कृत्रिम और मायावी दुनिया में विचरण करती है.’

परीकथाएं अर्से तक लोकजीवन का हिस्सा रही हैं. किंतु साहित्य की मान्यता उन्हें काफी विलंब से मिल सकी. यह जानना भी कम चैंकाऊ नहीं है कि आधुनिक परीकथा तथा विज्ञान-गल्प दोनों का जन्म एक ही ऐतिहासिक मोड़ पर करीब-करीब एक ही समय में हुआ था. विशेषकर आधुनिक परीकथाओं ने तो उस समय में अपनी पहचान बनाई थी, जब पूरा फ्रांस वैचारिक उद्वेलन से गुजर रहा था. जान ला॓क, चार्ल्स फ्यूरियर, इमानुएल कांट, जेरमी बैंथम, रूसो, ग्रीन, मिल आदि विचारकों ने महिला स्वातंत्र्य का समर्थन किया था. फलस्वरूप फ्रांसिसी महिलाओं में पढ़ने-लिखने की तीव्र होड़ पैदा हुई. औद्योगिकीरण से आमदनी बढ़ी तो उन्होंने पुरुषों के साये से हटकर, मनोरंजन के नए साधनों की खोज में घर से बाहर निकलना आरंभ किया. संभ्रांत परिवारों से संबंधित उन स्त्रियों ने महिला मनोरंजन सदनों की स्थापना की थी. वहां वे बारी-बारी से परीकथाएं सुनाती थीं. जिस महिला का कहानी सुनाने का नंबर आता, उसको ‘फी’ कहा जाता. उसी से आगे चलकर ‘फेयरी टेल्स’ शब्द की उत्पत्ति हुई. उस दौर में जब पूरा परिवेश सामंती था, रक्त शुद्धता के नाम पर स्त्रियों को चारदीवारी में कैद रखा जाता था—फ्रांसिसी महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से घर से बाहर निकलकर मनोरंजन सदनों की स्थापना करना क्रांतिकारी कदम था. वह ढलते सामंतवाद का दौर भी था. यूरोपीय दर्शन में सुखवाद एवं उयोगितावाद की धूम मची हुई थी. बैंथम, हीगेल, जेम्स मिल, जा॓न स्टुअर्ट मिल, ग्रीन और कांट जैसे विद्वान अपने सुखवादी दर्शन के साथ नई चेतना के निर्माण में लगे थे. विज्ञान साहित्य का अभीष्ट भी यही था कि वह मनुष्यता के कल्याणकारी अनुप्रयोगों की ओर बुद्धिजीवियों-वैज्ञानिकों का ध्यानाकर्षित करे तथा उनके समर्थन में खड़ा नजर आए. उसका असर साहित्य, समाज सभी पर एक साथ देखने को मिला. वैज्ञानिक खोजों को लेकर कहानी-उपन्यास लिखने का चलन बढ़ा तो परीकथाएं भी लोकसाहित्य से छिटककर स्वतंत्र पहचान बनाने लगीं. हालांकि उन्हें परंपरा से हटकर परिष्कृतरूप में ढालने की कोशिशें करीब-करीब नगण्य रहीं.

परीकथाएं बच्चों एवं बड़ों की कोमल भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं. प्रेम और नीतिवादी संदेश के साथ वे मानवीय संवेदनाओं को उनके उच्चतम स्तर तक ले जाकर उन्हें सामाजिक आदर्श का रूप दे देती हैं. समाज के संतुलित विकास के लिए उसे रागात्मक चेतना भी चाहिए और विज्ञान बोध भी. परीकथाएं मनुष्य की रागात्मक चेतना को समृद्ध करती हैं. अतः समाज को जितनी जरूरत विज्ञान साहित्य की है, परीकथाओं की भी उतनी ही हैं. लेकिन परीकथाओं के साहित्य होने की शर्त है कि वे मौलिक रहकर युगबोध से जुड़ी रहें. इसके बावजूद जो विद्वान परीकथाओं को विज्ञान गल्प से स्थानापन्न करना चाहते हैं, वे कदाचित वही हैं जो विकास और उपभोक्ता संस्कृति को एक-दूसरे का पर्याय मानते हैं. लेखन उनके लिए एक फैशन है. अतिरिक्त उत्साह में उन्होंने विज्ञान-लेखन को भी धर्म मान लिया है. प्रौद्योगिकी प्रदत्त सुविधाओं के जोश में वे भूल गए कि विज्ञान जितनी बड़ी ताकत है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी है. समाज में आर्थिक-सामाजिक समानता बनी रहे, विज्ञान के आधुनिकतम शोधों का लाभ पूरे समाज को मिले, यह पर्याप्त नैतिकताबोध के बगैर असंभव है. साहित्य अनुभूत सत्य तथा प्रयोगशाला में खरे उतरे सत्य को बराबर महत्त्व देता है. विज्ञान तथा उसके अनुप्रयोग को लेकर नैतिक दृष्टि साहित्य में होगी, तभी वह विज्ञान तथा उसके माध्यम से समाज में आएगी. कोरी वैज्ञानिक दृष्टि आइंस्टाइन के सापेक्षिकता के सिद्धांत से केवल परमाणु बम बनवा सकती है. विज्ञान के सदुपयोग के लिए मनुष्य का नैतिक संस्कार अनिवार्य है. इस कार्य को परीकथाएं शताब्दियों से करती आई हैं. दूसरे शब्दों विज्ञान और परीकथा दोनों के संकल्प मानवतावादी हैं, बशर्ते ये युगीन चुनौतियों का सामना करने के लिए, अपनी मौलिकता, उद्देश्यपरकता और मनोरंजन सामर्थ्य को को बनाए रहें.

© ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

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Filed under परीकथाएं और विज्ञानगल्प, बालसाहित्य

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