गत्यात्मक जनसंस्कृति यानी समावेशी आधुनिकता

धर्म एवं अभिजन संस्कृति—12

ऐसा चाहूं राज मैं यहां मिले सभन को अन्न
छोटे-बड्डे सभ सम्म बसें, रविदास रहे प्रसन्न
— संत रविदास

जनसंस्कृति का अभिप्राय आधुनिकता से पलायन नहीं है. न उन अतिरेकी मान्यताओं को महत्त्व देना है जिनके अनुसार जो पुराना तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है; अथवा जिसे बहुसंख्यक माने वही सर्वदा वरेण्य है. न यह दर्शाना है कि पिछला समय ही श्रेष्ठ था और अब यह पूरा समाज पतनशील अवस्था में, निरंतर सांस्कृतिक अपसंस्करण की ओर बढ़ रहा है. इससे भारतीय समाज के आगे जो अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता पर गर्व करता आया है, कोई बड़ा संकट खड़ा होने वाला है. सच तो यह है कि पिछली संस्कृतियों की भांति आधुनिक संस्कृति में भी बहुत कुछ श्रेष्ठ है. इसमें यदि कुछ कमियां हैं तो परंपरागत संस्कृतियां भी सर्वथा दोषमुक्त नहीं थीं. यह भी भ्रांति ही है कि भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठतम छटा गांवों में देखने को मिलती है; तथा वैज्ञानिक क्रांति एवं प्रौद्योगिकीय विकास के फलस्वरूप विकसित हुई आधुनिक नागरीय सभ्यता में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है. सच यह है कि गत चार-पांच हजार वर्षों से मानव-संस्कृतियां निरंतर विकासमान अवस्था में रही हैं. संभव है उन दिनों के समाजों में सकारात्मक तत्वों की उपस्थिति आनुपातिक रूप से ज्यादा हो. शायद इसलिए कि तत्कालीन जीवन आज जितना जटिल नहीं था. मनुष्य की आवश्यकताएं सीमित थीं. उनके अनुपात में प्रकृति का प्रांगण बहुत विशाल था. इंसान संपत्ति-संग्रह की बुरी लत से भी दूर था. इसके बावजूद तत्कालीन समाजों की आपेक्षिक श्रेष्ठता को लेकर कोई भी बात सप्रमाण नहीं कही जा सकती. तब से आज तक राजनीतिक, सामाजिक विचारधाराओं के साथ उत्पादन-प्रविधियों में भी वैश्विक स्तर पर बदलाव आया है, जिसने लोगों की जीवन-शैली और सोच में व्यापक बदलाव किया है. तमाम विवादों और असहमतियों के बावजूद यह विकास की स्वाभाविक अवस्था है. विकास कभी इकहरा नहीं आता, अतः यदि प्राचीन संस्कृति और सभ्यता में कुछ अनुकरणीय था, तो सामंतवाद, निरंकुश साम्राज्यवाद तथा पूंजीवाद की शोषणकारी प्रवृत्तियों से निरंतर संघर्ष के उपरांत आधुनिक मनुष्य ने भी ऐसा बहुत-कुछ अर्जित किया है, जिसके आदर्शों पर नए समाज का ढांचा खड़ा किया जा सकता है. कमियां आधुनिक संस्कृति में भी हैं. वे मुख्यतः इसलिए हैं कि शिखर पर विराजमान शक्तियां सामाजिक-राष्ट्रीय हितों के आगे स्वार्थ को वरीयता देती रही हैं. व्यवस्था कोई रही हो, शिखरस्थ शक्तियों के वर्चस्वकारी चरित्र में बहुत कम बदलाव आया है. परिणामस्वरूप जनसाधारण को सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों का लाभ उतना नहीं मिल पाया है, जितना अपेक्षित था. यह दोषपूर्ण समाजीकरण का परिणाम है, मगर इसकी पूरी जिम्मेदारी किसी एक वर्ग के कंधों पर डाल देना अनुचित होगा. यदि एक वर्ग को बहुसंख्यक के उत्पीड़न का अपराधी कहा जाए तो दूसरे वर्ग का दोष उस व्यवस्था से अनुकूलन कर लेना, अन्याय को सहते जाना है. उसमें यदि कभी कोई हलचल हुई भी तो उत्पीड़ित द्वारा उत्पीड़क की स्थिति में पहुंचने के लिए—समाज को बदलने के लिए नहीं.

समाजीकरण का उद्देश्य परंपराओं और जीवनमूल्यों को सहेजकर रखना तथा बदलती परिस्थितियों के अनुकूल आदर्शों का सृजन करना है. इस प्रक्रिया से गुजरते हुए मनुष्य अपने समाज की परंपराओं, सांस्कृतिक भाव-भूमियों, आदर्शों, जीवनमूल्यों को आत्मसात करता है. इस बीच समाज में अपनी उपयोगिता दर्शाने के लिए शिक्षा-दीक्षा, अनुभव आदि के माध्यम से वह अपनी कार्यक्षमताओं में भी निखार लाता रहता है. विकासमान अवस्था में पुराने जीवनमूल्य अप्रासंगिक होते जाते हैं. रिक्त स्थान की पूर्ति हेतु नए जीवनमूल्य समयानुसार जन्मते रहते हैं. उनकी प्रतिष्ठा के लिए सामाजिक व्यवस्था में कुछ परिवर्तन अपरिहार्य हो जाते हैं. समाजीकरण और मानवीकरण के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए अपेक्षित होता है कि समाज अपने सभी नागरिकों के साथ समानतापूर्ण व्यवहार करे. बिना किसी भेदभाव के अपनी सुविधाओं, संसाधनों और अवसरों को सभी के लिए खुला रखे. समाजीकरण की प्रक्रिया को आत्मसात करने, उसके अनुसार अपने विकास हेतु सामंजस्य बिठाने तथा आवश्यकतानुसार मोड़ देने की सभी को स्वतंत्रता हो. मगर मनुष्यता के ज्ञात इतिहास की हमेशा यह विडंबना रही है कि समाजीकरण की प्रक्रिया कुछेक वर्गों द्वारा नियंत्रित-निर्देशित होती है. उसका ढांचा ऐसा बना है कि शिखर पर विराजमान कुछ अतिसक्रिय, चालाक किस्म के लोग बहुसंख्यक जन के निर्णय-सामर्थ्य को प्रभावित करने तथा उसको अपने स्वार्थानुरूप दिशा देने में कामयाब हो जाते हैं. खासकर मानवीय विकास के क्षेत्रों में. चूंकि संसाधनों पर शीर्षस्थ अभिजन वर्ग का अधिकार होता है, अतएव उसके निर्णय को स्वीकार करना, अभिजनेत्तर वर्गों की विवशता होती है. उन्हें अपने आसपास विकास के चिह्न भले ही दिखाई न दें, लेकिन बार-बार आश्वासन दिए जाने पर वे शीर्षस्थ अभिजनों के झांसे में आ ही जाते हैं. विकल्पहीन अवस्था में उनकी बातों पर विश्वास करने के अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता ही नहीं होता.

लोक अमूर्त्तन और रूमानी अवधारणा है. उसका नाम लेते समय मनुष्यता का कोई खास चेहरा हमारे दिमाग में नहीं आता, न हमें ऊंच-नीच से ग्रस्त समाजों का सच तथा विरूपताएं नजर आती हैं. उस समय मानव-समाज का काल्पनिक, कुछ-कुछ ब्रह्मांड जैसा निरा काल्पनिक चित्र हमारे मस्तिष्क में बनता है. दूसरे शब्दों में केवल ‘लोक’ के माध्यम से हम वास्तविक जगत का आकलन करने में असमर्थ रहते हैं. दूसरी ओर समाजीकरण को मनमाफिक दिशा देने के लिए शीर्षस्थ शक्तियां जनसाधारण को निरंतर यह विश्वास दिलाती रहती हैं कि वे लोक का प्रतिनिधित्व करती हैं और उनका प्रत्येक कार्य लोककल्याण की भावना से अनुप्रेत है. ऐसा वे जनसाधारण का विश्वास जीतने के लिए करती हैं. हालांकि उनकी परिकल्पना ‘जन’ का, जिसे ‘कल्याण’ की वास्तविक जरूरत है, जो जीवन-संघर्ष में बुरी तरह उलझा हुआ है, भूख और बेकारी जैसी व्याधियां जिसे सदैव त्रस्त रखती हैं—का वास्तविक हित साधना नहीं होता. इसलिए उनके नेतृत्व में आया विकास ‘जन’ को प्रभावित किए बगैर उसके ऊपर से गुजर जाता है. इस हकीकत को अभिजन शक्तियां भी समझती हैं, अतएव ‘जन’ को भरमाए रखने के लिए वे तरह-तरह के प्रपंच रचती हैं. इससे उनके दिलों में पैठे डर का अनुमान लगाया जा सकता है. इसका अभिप्राय यह भी है कि अभिजन शक्तियों का शिखरत्व भले वे कितनी ही संगठित और ताकतवर हों, असंगठित अभिजनेत्तर वर्गों के सहयोग और समर्थन पर निर्भर होता है. कोई और विकल्प न देख जनसाधारण उनपर विश्वास कर भी लेता है. शीर्षस्थ शक्तियों का जादू हमेशा चले, लोग अमूर्त्तन विकास के फरेब पर हमेशा भरोसा किए रहें—यह अनिवार्य नहीं है. निरंतर छले जाने से जनसाधारण शीर्षस्थ अभिजन की धूर्त्तताओं को समझने लगता है. अभिजनेत्तर समूहों में चल रही हलचलों से अभिजन शक्तियां अनजान नहीं होतीं. अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए वे हर संभव-असंभव तरीका अपनाती हैं. तरह-तरह के षड्यंत्रों द्वारा वे अभिजनेत्तर वर्गों में फूट डालने में सफल हो जाती हैं. अभिजन शक्तियों की सफलता में अभिजनेत्तर समूहों की फूट तथा समान हितों के मुद्दों पर एकता का अभाव होता है. चूंकि समाज से भागना उसके परिवर्तन की संभावनाओं को कम करना है, अतएव समाज में रहते हुए उसकी विकृतियों को समझकर, उनका समाधान खोजना ही वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती है. इसके लिए अभिजन वर्ग की उस शब्दावली को समझना आवश्यक है, जिसके माध्यम से वह जनसाधारण को बरगलाने में सफल होता है. और परंपरा के दबावों के चलते, जिनमें अपनी समस्याओं के समाधान हेतु साधारणजन शासन-प्रशासन अथवा समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ओर देखता आया है—अभिजनेत्तर समूह पुनः शीर्षस्थ अभिजनों की शरण में लौटने लगते हैं. समाजीकरण की प्रक्रिया के ये अनपेक्षित विवर्तन, समाज में असमानता, अविश्वास एवं असुरक्षा की भावनाएं पनपाते हैं.

जनसंस्कृति को मैं आत्मविश्वास से भरे, आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर बहुसंख्यक अभिजनेत्तर समूहों की कार्यशैली कहना चाहूंगा, जिसमें वे अपने विकास हेतु शीर्षस्थ वर्गों की ओर देखने के बजाय अपने ही बूते आगे बढ़ने का संकल्प लेते हैं. यह जनसाधारण की एकता और हितों को लेकर प्रतिबद्धता का नवगीत, मानवीकरण की चिर-परिचित शैली है. वर्तमान समाज में व्याप्त ऊंच-नीच समेत जो अनेकानेक विसंगतियां, विरूपताएं विद्यमान हैं, उनके पीछे समाजार्थिक विषमताओं का बहुत बड़ा योगदान है. शीर्षस्थ वर्ग जिसपर समाज के नेतृत्व और विकास की जिम्मेदारी होती है, वह अपने स्वार्थ से हटकर उसी समय सोचता है, जब उसे उससे भी बड़ी स्वार्थ-सिद्धि की संभावना हो. अतएव अपने विकास के लिए जनसाधारण को शीर्षस्थ अभिजन अथवा किसी दैवी सत्ता की अनुकंपा की प्रतीक्षा किए बिना अपने ही भरोसे प्रयास करना होगा. यह कार्य पूर्णतः आत्मनिर्भर, विकासमान और परस्पर सहयोगात्मक जनसंस्कृति के माध्यम द्वारा संभव है. उसकी सफलता के लिए ऐसी समावेशी आधुनिकता की आवश्यकता है जो नए-पुराने उच्चादर्शों तथा मानवीय संवेदनाओं पर टिकी हो. आदर्श जनसंस्कृति को खुला, परिवर्तनोन्मुखी और विकासमूलक किंतु जनसंख्या, राजनीति, अर्थव्यवस्था के तात्कालिक परिवर्तनों से मुक्त होना चाहिए. उसमें यह सामर्थ्य होना चाहिए कि इन स्वाभाविक बदलावों को बिना किसी विक्षोभ के झेल सके.

वर्तमान विश्व सभ्यता और संस्कृति के अनगिनत खानों में बंटा है. उसमें धर्म, राष्ट्रीयता, राजनीति, अर्थनीति आदि को लेकर अनेकानेक भेद और तज्जनित अंतर्द्वंद्व हैं. सही मायने में ये आधुनिक असमानताग्रस्त समाज और संस्कृति की विफलताएं भी हैं. सभ्यताकरण के दौर में मनुष्य नए और पुराने के बीच चयन को लेकर सदैव ऊहापोह का शिकार रहा है. परिणामस्वरूप परिवर्तनों की गति अनेक स्तरीय रही है. यह स्तरीकरण सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न उपादानों के बीच भी साफ नजर आता है. जनसंस्कृति में इन कृत्रिम परिवर्तनों से ऊपर उठकर एक समरस समाज की स्थापना का गुण होना चाहिए. उसे इतना व्यापक भी होना चाहिए कि हर सदस्य को लगे कि समाज के संचालन और दिशा-निर्धारण में उतना ही योगदान है, जितना दूसरों का. उसमें छोटे-छोटे जनसमूह मिलकर समाज की दीर्घजीविता एवं अधिकतम के कल्याण हेतु, स्थानीय मुद्दों को लेकर ऐसी संस्थाओं का गठन करेंगे, जिनकी कार्यशैली एवं रूपरेखा सामान्य सहमति के आधुनिकतम सिद्धांत के अनुसार स्वैच्छिक सहभागिता एवं सर्वांगीण विकास के आधार पर निर्धारित की जाएगी. उन संस्थाओं की सफलता का आधार ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम विकास’ की कसौटी होगी. इस तरह जनसंस्कृति का आशय जनसामान्य के आचार-विचार, रहन-सहन, जीवन-शैली, रीति-रिवाज, हितों की प्रतिबद्धता सहित उन सभी कृत्यों-व्यवहारों से है, जिन्हें वह समाज का सदस्य होने के नाते अपनाता तथा आवश्यक संशोधन, परिवर्धन अथवा उनके बगैर भी आगामी पीढ़ी को सौंपता चला जाता है. न्याय की सर्वसुलभता हेतु आमूल परिवर्तन यदि वर्तमान की जरूरत है तो उसका लक्ष्य ऐसी जनसंस्कृति की स्थापना हो सकता है, जिसमें आदर्श स्वतः समाहित हों, लोग स्वयं-स्फूर्त्त भाव से उन्हें अपनाएं और एक-दूसरे का साथ देते हुए सामान्य हितों की प्राप्ति हेतु सहर्ष तत्पर हों.

जनसमाज के बारे में सामान्य धारणा है कि वह प्रौद्योगिकी के साथ-साथ विचारधारा के स्तर पर भी पिछड़ा हुआ होता है, इस कारण बुद्धि के मामले में अग्रणी अभिजन आसानी से केंद्र में जगह बना लेते हैं. अभिजन अभिजनेत्तर से बुद्धि-विवेक में सदैव अग्रणी हों, यह आवश्यक नहीं है. मगर उस अवस्था में वे अपने संसाधनों के बल पर, समाज की विशिष्ट प्रतिभाओं को अपने साथ जोड़ लेते हैं तथा उनके सहयोग-समर्पण द्वारा अभिजनेत्तर समूहों से आगे निकलने में सफल हो जाते हैं. दूसरी ओर गैर अभिजन अपनी विशिष्ट पृष्ठभूमि, शिक्षा तथा संसाधनों के अभाव जैसे कारणों से आधुनिक उत्पादन प्रौद्योगिकी तथा ज्ञान-विज्ञान के उपयोग में पिछड़ जाता है. बावजूद इसके सामाजिक सौहार्द, समानता, बंधुत्व, स्वैच्छिक सहयोग, सहअस्तित्व आदि अनेक जीवनमूल्य ऐसे हैं, जिनके अनुपालन में वह अपने समकालीन नागरीय समाजों से कहीं आगे होता है. इसकी भरपाई यानी अपनी सामाजिकता का प्रदर्शन करने हेतु नागरीय समाज विभिन्न प्रकार के औपचारिक संगठनों की मदद लेते हैं. उनमें किसी न किसी रूप में पूंजी का हस्तक्षेप होता है, जो समय के साथ-साथ बढ़ता ही जाता है. अभिजन शक्तियां उनपर अधिकार जमाकर उनका संचालन अपने स्वार्थानुरूप करने लगती हैं. इससे उनका उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है. बहुत-से सदस्य पूंजीगत लाभ न देख संस्था के लक्ष्य की ओर से उदासीन होने लगते हैं. इस कारण वे संगठन एक न एक दिन अपने उद्देश्य से भटकने को अभिशप्त होते हैं.

सामान्य व्यवहार में प्रायः ग्रामीण संस्कृति को ही जनसंस्कृति का पर्याय मान लिया जाता है, जबकि जनसमाज केवल गांवों तक सीमित नहीं होता. शहरों में भी ‘जन’ को जीवन-संघर्ष में उलझते तथा अभिजन हितों के लिए पसीना बहाते देखा जा सकता है. अपने जीवन में वह प्रायः अभिजन के पक्षपातपूर्ण निर्णयों का शिकार होता है, फिर भी वर्गीय चेतना के अभाव, संगठन की कमी, अपने अज्ञान एवं भ्रांतियों के चलते वह अभिजन का समर्थन करता है. दूसरे शब्दों में अभिजन के श्रेष्ठत्व पर भरोसा करके और यह जानते हुए कि उसकी विकास-दृष्टि स्वार्थ की सीमाएं लांघने में असमर्थ रहती है, ‘जन’ उसे खुशी-खुशी अपने ऊपर शासन करने का अधिकार सौंप देता है. ग्रामीण समाज भी, भले ही ऊपर से एक दिखे, भीतर से वह भी ‘जन’ और ‘अभिजन’ में बंटा होता है. यह भी देखने में आया है कि ग्रामीण अभिजन, शहरी अभिजन की अपेक्षा कहीं अधिक मुखर तथा आक्रामक होते हैं. उनका अभिजात्यबोध धर्म, जाति, कुल-गोत्र, वंशानुक्रम, भूमि-स्वामित्व, सामंती संस्कार जैसे परंपरागत प्रतीकों से प्रकट होता है. पुरोहित, जमींदार, सरकार तथा उसके शीर्षस्थ अधिकारी जो गांव में बसते अथवा उससे किसी भी प्रकार का संबंध रखते हों, ग्राम्यः समाज के अभिजन की श्रेणी में आते हैं. शहरी अभिजन की भांति वे भी निर्णयकारी भूमिका में होते हैं. अपनी पक्षपातपूर्ण कार्यशैली द्वारा वे ग्रामीण जीवन में असमानता और वर्चस्व की स्थापना करते हैं. ग्रामीण अभिजनेत्तर समाज में किसान, मजदूर, दस्तकार, साधारण नौकरीपेशा लोग आते हैं. उन्हें अभिजन के निर्देश अथवा उसकी इच्छा के अनुरूप अपनी जीवनशैली को साधना पड़ता है.

अभिजनेत्तर समाज में आर्थिक विकल्प बहुत सीमित होते हैं. उत्पादक के रूप में उसके सदस्य परंपरागत अथवा पिछड़ी उत्पादन प्रणाली से जुड़े होते हैं. जीविकोपार्जन हेतु उनमें से अधिकांश का सहारा या तो उनका श्रम होता है, अथवा हस्त-कौशल. इस कारण जनसंस्कृति हालांकि नागरिक संस्कृति की अपेक्षा सरल और कम उलझी हुई होती है, लेकिन आर्थिक पिछड़ेपन के कारण उन्हें उत्पाद और समाज की दिशा-दशा तय करने के अवसर नहीं मिल पाते. शीर्ष पर विराजमान अभिजन अपनी स्थिति का फायदा उठाते हुए शासन-प्रशासन में मनमाना हस्तक्षेप करते रहते हैं. श्रम तथा अपने सामान्य उत्पादों की खपत के लिए भी जनसामान्य अभिजन अथवा अभिजन हित हेतु कार्य करने वाली संस्थाओं का अनुकरण करते हैं. संसाधनों के अभाव में वे आधुनिकतम प्रौद्योगिकी का उपयोग भी ढंग से नहीं कर पाते. यद्यपि वे ऐसे उद्योगों और व्यवसायों से संबद्ध हो सकते हैं, जहां प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन के आधुनिकतम सिद्धांतों का उपयोग होता हो. मगर वहां उनकी उपस्थिति एक निर्जीव उपकरण जैसी होती है. निर्णयकारी अवस्था में न होने के कारण वे अपने प्रौद्योगिकीय कौशल का अपने हितों के अनुसार उपयोग करने से वंचित रह जाते हैं. इस कारण उनके जीवन में अपेक्षाकृत ठहराव होता है. यद्यपि शिक्षण-प्रशिक्षण, व्यापारिक सूझबूझ जैसी विशिष्ट योग्यताओं के बल पर जनसामान्य के बीच से कुछ सदस्य अभिजन वर्ग में सम्मिलित होते रहते हैं, किंतु अभिजनेत्तर से अभिजन की ओर संचरण प्रायः बहुत धीमी गति से—श्रेणीबद्ध आधार पर होता है. सामान्य स्थिति में अभिजन तक पहुंचने के लिए ‘जन’ को ‘मध्यवर्ग’ अथवा ‘अर्ध-अभिजन’ के स्तर से गुजरना पड़ता है.

अर्ध-अभिजन अभिजनेत्तर वर्ग से निकले होते हैं, जो अपनी शिक्षा अथवा अन्य किसी विशिष्ट योग्यता के बल पर अभिजन को प्रभावित कर, समाज में विशिष्ट स्थान बना लेते हैं. उन्हें अपने मूल वर्ग यानी अभिजनेत्तर समूहों के विकास से ज्यादा खुद को जल्दी से जल्दी अभिजन की कतार में सम्मिलित करने का उतावलापन होता है. अतः अभिजन का विश्वास जीतने के लिए वे उसे यथासंभव सहयोग प्रदान करते हैं. अभिजन वर्ग के स्थायित्व तथा उनके अबाध विकास में इन अर्ध-अभिजन सदस्यों का बहुत योगदान होता है. अभिजनेत्तर समूह से अर्ध-अभिजन अथवा अभिजन के स्तर तक उठकर पहुंचे सदस्य, कायाकल्पन की त्वरित प्रक्रिया से गुजरकर अपने मूल समूह से अलंघ्य दूरी बना लेते हैं. प्रकारांतर में वे अभिजन संस्कृति के सच्चे उपासक सिद्ध होते हैं. इस तरह ‘जन’ से ‘अभिजन’ की श्रेणी तक पहुंचे सदस्यों की प्रतिभा का लाभ उनकी श्रेणी के लोगों को नहीं पाता. परिणामस्वरूप जनसमाजों में विकास की दर अभिजन समाजों की अपेक्षा कम होती है. कई बार अभिजन समाज के सदस्य भी परिस्थितियों से टकराकर अथवा दूसरे अभिजन समूहों द्वारा बहिष्कृत होकर निम्नस्थ समूहों में खिसक जाते हैं. इस तरह चाहे-अनचाहे ‘जन’ और ‘अभिजन’ के बीच अंतरण का सिलसिला बना रहता है. अंतरण की इस सहज-स्वाभाविक प्रक्रिया में ‘जन’ और ‘अभिजन’ का अनुपात लगभग अपरिवर्तित रहता है. विल्फ्रेड परेतो अपनी पुस्तक ‘माइंड एंड सोसाइटी’ में इसे ‘दोनों स्तर, अर्थात अभिजन एवं अभिजनेत्तर व्यक्तियों के बीच संचरण’ की संज्ञा देता है. इसे वह समाज के विकास एवं स्थायित्व के लिए अत्यावश्यक मानता है. उसके अनुसार संचरण की प्रक्रिया में अवमंदन की अवस्था में समाज में विक्षोभ की संभावना बनी रहती हैं. यहां विक्षोभ का अभिप्राय समाज में परिवर्तन की उथल-पुथल से है. उससे समाज में वास्तविक परिवर्तन हों, यह आवश्यक नहीं है. इसका कारण है कि लंबे समय तक एक समान स्थितियों में रहने के कारण जनसाधारण अपनी स्थिति से अनुकूलित हो जाते हैं. वे अपना आत्मविश्वास खो देते हैं. मान लेते हैं कि वे केवल अभिजन के संरक्षण में ही सुख-समृद्धि-भरा जीवन जी सकते हैं. उस अवस्था में उन्हें परिवर्तन की संभावना से ही घबराहट होने लगती है. परिवर्तन की सामान्य प्रक्रिया में एक अभिजन समूह का स्थान दूसरा अभिजन समूह ले लेता है. परिणामस्वरूप समाज का ढांचा लगभग अपरिवर्तनीय बना रहता है. समाज में नए वर्गों के उदय एवं पुराने वर्गों के पराभव की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए परेतो लिखता है—

‘व्यक्ति के इस परिसंचार की मंदता के परिणामस्वरूप शीर्षस्थ वर्गों में विकृत तत्वों की भरमार हो सकती है. दूसरी ओर निरंतर शासित हो रहे वर्गों में श्रेष्ठतर तत्वों की वृद्धि हो सकती है. उस अवस्था में समाज में असंतोष की वृद्धि होती है और छोटा-सा आघात भी अवस्था में परिवर्तन में ला सकता है. एक देश के दूसरे देश पर प्रभुत्व अथवा आंतरिक क्रांति से भी सत्ता-शिखर पर उथल-पुथल हो सकती है, इससे जो शासक हैं, वे शासित होकर निम्नस्थ स्थिति में पहुंच सकते हैं, दूसरी और परिस्थितियों का साथ मिलने पर शासित स्वयं को शासक अभिजन के रूप में स्थापित कर सकते हैं.’ (दि सोश्लिष्ट सिस्टम, पृष्ठ 30).

कभी-कभी जनक्रांतियों के माध्यम से शीर्ष पर तीव्र बदलाव होते हैं. अवसर का लाभ उठाते हुए अभिजनेत्तर वर्गों के वास्तविक प्रतिनिधि सत्ता-शिखर पर आसीन हो जाते हैं. अपने अतीत से वे अभिजनेत्तर वर्गों से संबद्ध होते हैं. प्रायः अपने ही वर्गों का विश्वास जीतकर, उन्हें यह भरोसा दिलाते हुए कि सत्ता केंद्र पर कब्जा कर लेने के बाद वे अभिजन और अभिजनेत्तर समूहों के बीच की दूरी को पाटने का प्रयत्न करेंगे तथा सत्ता के अभिजनोन्मुखी चरित्र में आमूल बदलाव लाकर उसे जनोन्मुखी बनाएंगे—वे अपना शासकीय ‘कैरियर’ आरंभ करते हैं. किंतु जनमत के सीधे दबाव के अभाव में, शासनाधिकार प्राप्त होते ही वे अपने वचन और प्रतिबद्धताओं से पीछे हटने लगते हैं. ऐसा हमेशा उनके स्वार्थवश नहीं होता. शक्ति केंद्रों का वर्चस्वकारी माहौल और उसमें अकेला पड़ जाने का डर उन्हें परिस्थितियों से सामन्जस्य बनाने के लिए बाध्य करता है. क्योंकि वहां पहले से ही विद्यमान अभिजन सदस्य अपने हितों को लेकर एकजुट होते हैं. सत्ताकेंद्रों पर प्रतिगामी शक्तियां हावी न हों, अभिजनेत्तर समूहों के निर्वाचित सदस्य निश्चिंत होकर कार्य कर सकें, इसके लिए उनकी अपने समूह के प्रति आस्था और विश्वास जरूरी है. वैकल्पिक जनसंस्कृति के माध्यम से अभिजन वर्गों की मनमानी पर अंकुश लगाया जा सकता है. ऐसी संस्कृति जो न केवल अभिजन संस्कृति के दबावों से सर्वथा मुक्त रहे, बल्कि स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता एवं लोकतंत्र को अनुकूल विस्तार दे सके. ऊपर से इतनी गत्यात्मक भी हो कि समकालीन परिवर्तनों, ज्ञान-विज्ञान संबंधी अधुनातन खोजों, रीति-रिवाजों, परंपराओं तथा लोकेषणाओं को आत्मसात कर उनका लाभ उठा सके. यह कार्य वर्तमान आभासी लोकतंत्र को वास्तविक जनतंत्र में बदलने तथा अभिजनेत्तर समूहों के जनशक्ति के सामर्थ्य से परचाने पर संभव है.

इस अनुच्छेद में हम समावेशी आधुनिकता की अवधारणा पर विचार करेंगे. आधुनिकता नवीनतम ज्ञान, विचार-शैलियों, उत्पादन पद्धतियों को अपनाते हुए निरंतर विकासमान रहने अथवा दिखने की अवस्था है. यह जीवन की गतिशीलता का पर्याय होती है. यह दर्शाती है कि प्राकृतिक रूप से उपलब्ध संसाधनों का शोधन-परिशोधन कर मनुष्य ने उन्हें अपने सुख-स्वार्थ के अनुरूप किस स्तर तक परिवर्तित, परिमार्जित किया है. यह जरूरी नहीं कि संसाधनों के शोधन-परिशोधन का लाभ समाज के सभी वर्गों को समानरूप से प्राप्त हो, किंतु लाभ की मात्र से ही आधुनिकता की कसौटी तय होती है. तदनुसार जो व्यक्ति वैज्ञानिक-तकनीकी आविष्कारों का जितना अधिक लाभ अपने स्वार्थ के लिए उठाता है, वह उतना ही आधुनिक मान लिया जाता है. आधुनिकता सामान्यतः दो प्रकार की हो सकती है. पहली विचारगत, दूसरी परिवेशगत. विचारगत आधुनिकता में नवीनतम ज्ञान तथा उसके अनुप्रयोग को सम्मिलित किया जा सकता है. उसका दायरा बड़ा होता है. विचारगत आधुनिकता व्यक्ति के विवेक, अनुभव, शिक्षा-दीक्षा तथा अन्यान्य स्थितियों पर निर्भर करती है. विचारगत आधुनिकता का दायरा विस्तृत होता है. आवश्यक नहीं कि अभिजन जिसके पास संसाधनों का प्राचुर्य है वह वैचारिक रूप से भी आधुनिक हो. कई बार तो संसाधनों का प्राचुर्य ही अभिजन को ज्ञानार्जन की ललक से दूर ले जाता है. पुराने नवाब, जमींदार, सामंत आदि पढ़ने-लिखने या ज्ञानार्जन की दूसरी गतिविधियों में स्वयं हिस्सा लेने से इसलिए बचते थे, क्योंकि वे मानते थे कि ज्ञानार्जन उनके मातहत वजीर, मंत्री, महामंत्री आदि का धर्म है, जिन्हें वे अपनी हैसियत के अनुसार आसानी से जुटा सकते हैं. वे मानते हैं कि केवल राज करने के लिए बने हैं और उनका यह अधिकार ही उनका गुण है. अपनी वेशभूषा, रहन-सहन आदि में आधुनिक दिखने वाले बहुत से लोग असल जीवन में बेहद कर्मकांडी, रूढ़िवादी और वैचारिक स्तर पर अत्यंत पिछड़े हो सकते हैं. इसके बावजूद विचारगत आधुनिकता यानी ज्ञानानुभव के आधुनिकतम साधनों का सर्वाधिक लाभ अभिजन समूह को प्राप्त होता है. क्योंकि अपने समय के ख्यात बुद्धिजीवी एवं दक्ष पेशेवर निहित स्वार्थ के लिए अभिजन की सेवा के लिए सहर्ष खिंचे चले आते हैं. अभिजनेत्तर समूहों के इन बुद्धिजीवियों की कोशिश अपने समूह के समग्र विकास हेतु आमूल परिवर्तन के बजाय येन-केन-प्रकारेण स्वयं को अभिजन अथवा अर्ध-अभिजन समूह में शामिल कर लेने की होती है. अभिजन शक्तियों की निकटता प्राप्त करने के लालच में वे जनसाधारण के हितों से समझौते करने लगते हैं. अवसर आने पर वे अपने ही वर्ग के बुद्धिजीवियों से स्पर्धा करने में पीछे नहीं रहते. शीर्षस्थ शक्तियों वे आर्थिक, राजनीतिक अथवा धार्मिक चाहे जो हों—की सफलता का रहस्य भी यही होता है कि अपने-अपने मकसद को लेकर वे ऊपर से चाहे जितनी भिन्न और परस्पर असंगत नजर आती हों, भीतर से पूर्णतः एकजुट तथा लक्ष्योन्मुखी होती हैं.

दूसरी ओर अभिजनेत्तर समाज अपनी शिक्षा, तकनीकी कौशल, धर्म, जाति आदि को लेकर छोटे-छोटे अनेक टुकड़ों में बंटा होता है. उदाहरण के लिए एक धर्माचार्य अपने धर्म के समर्थन में विधर्मी आचार्य की आलोचना करेगा, उसके धर्म और मान्यताओं में मीन-मेख निकालेगा. दोनों अपने विचारों के अनुसार समाज को अलग-अलग समूहों में बांटकर परस्पर प्रतिद्वंद्वी नजर आएंगे. उनपर विश्वास करके बहुसंख्यक वर्ग की कुल शक्तियां छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटकर प्रभावहीन हो जाती हैं. दूसरी ओर शिखर पर विराजमान धर्माचार्यों में उन्हीं मुद्दों को लेकर एक-दूसरे से न झगड़ने, सहयोगी रवैया अपनाए रखने तथा एक-दूसरे के अस्तित्व को समर्थन देने का आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित समझौता होता है. यही बात राजनीतिक, आर्थिक शक्तियों के बारे में कही जा सकती है. बाजार कब्जाने के लिए दो उद्योगपति आपस में गलाकाट स्पर्धा करते नजर आते हैं. विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च कर वे उपभोक्ता के दिलोदिमाग पर छाने की हर-संभव कोशिश भी करते हैं. दोनों ही बार-बार यह दावा करते हैं कि उन्होंने उपभोक्ता के हितों तथा जरूरतों का ध्यान रखा है. लेकिन उनमें से एक भी न तो उपभोक्ता तक सस्ती वस्तु पहुंचाने के लिए अपने मुनाफे में कटौती करता है, न ही पूंजीगत लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ से संतुष्ट हो जाने का आश्वासन देता है. दोनों उपभोक्ता हितों के संरक्षक होने का दावा करते हुए लाभ को अधिकार मानकर उत्पादन गतिविधि में हिस्सा लेते हैं. अभिजन उत्पादक समूहों की ये चालाकियां उपभोक्ता आमतौर पर समझता है. इसके बावजूद संगठन अथवा सार्थक प्रतिरोध के तरीकों से अनजान होने के कारण वह चुपचाप सहता जाता है. परिर्वतनकामी आंदोलनों की सफलता अभिजनेत्तर समूहों की एकता पर निर्भर करती है. उसके लिए वर्गीय हितों की पहचान कर उनके बीच सामंजस्य बनाए रखना जरूरी है. इसके लिए उन्हें बौद्धिक समर्थन की आवश्यकता पड़ती है. दूसरे शब्दों में वैकल्पिक संस्कृति अथवा जनसंस्कृति की नींव ऐसी आधुनिकता पर निर्भर करती है, जो अभिजनेत्तर वर्गों को हितों की एकता तथा उनके लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देती हो.

परिवेशगत आधुनिकता, आधुनिकता का प्रदर्शनकारी रूप है. उसमें नवीनतम ज्ञान, उत्पादन पद्धतियों तथा प्रौद्योगिकीय लाभों को सम्मिलित किया जा सकता है. यह अभिजन वर्ग के जीवन-स्तर, रुचियों, आपसी व्यवहार, सामाजिक, लाभाकांक्षा आदि से प्रकट होती है. अपनी त्वरा और सफलता के लिए यह भी आधुनिक ज्ञान पर निर्भर होती है. अतः इसकी निरंतरता को बनाए रखने के लिए अभिजन सदैव ज्ञान के नवीनतम स्रोतों की तलाश में रहते हैं. नया ज्ञान जहां भी, जैसे भी मिले, उसको अपने स्वार्थानुरूप प्रयुक्त करना—इसी पर उनकी सफलता निर्भर करती है. जनसाधारण के पिछड़ेपन का यह भी कारण है कि वह ज्ञान के आधुनिकतम प्रकल्पों का अपने वर्गीय हितों के अनुरूप इस्तेमाल करने में अक्षम होता है. इसलिए नहीं कि उसमें प्रतिभा की कमी होती है, बल्कि जैसा ऊपर भी संकेत किया गया है, अभिजन जो कार्य संपादित करता है, अथवा अपनी व्यावसायिक सफलता हेतु योजना-निर्माण से लेकर लार्भाजन तक वह जितने भी कार्यक्रम संचालित करता है, सभी के लिए आवश्यक प्रतिभाएं जनसामान्य के बीच से ही उभरती हैं. अभिजनेत्तर समूहों की कमी होती है कि वे अपने ज्ञान और अनुभव का अपने हितों के अनुरूप उपयोग करने से कतराते हैं. इसके प्रमुख कारणों में से एक संसाधनों की कमी भी है. अन्य कारण है आत्मविश्वास की कमी, जो निरंतर शासित होने, दमन और उत्पीड़न को सहते जाने, गरीबी, बेरोजगारी, संगठन की कमी तथा आपसी अविश्वास के चलते पैदा होता है. संसाधनों की कमी तथा संकट की स्थिति में मदद की अनिश्चितता अभिजनेत्तर वर्गों को खतरा उठाने से रोकती है. परिणामस्वरूप वह अपनी स्थिति से समझौता करने में ही अपनी भलाई समझने लगता है. वर्ग चेतना का अभाव भी अभिजनेत्तर समूहों की एकता में बाधा बनता है. जबकि संगठन एवं ठोस विचार-दृष्टि द्वारा संसाधनों की कमी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है. उनीसवीं शताब्दी के मध्य में लंदन के रोशडेल कस्बे के 28 गरीब बुनकरों का उदाहरण हमारे सामने है. उन्होंने अपने उपभोक्ता भंडार की शुरुआत मात्र 28 पाउंड की पूंजी से की थी. गरीब बुनकरों को सदस्यता राशि के रूप में एक पाउंड जुटाने के लिए भी दो से तीन महीने तक अतिरिक्त श्रम करना पड़ा था. उसके बाद अपनी सामूहिक निष्ठा, संगठन सामर्थ्य और संकल्प के बल पर उन्होंने उपभोक्ता भंडार सहित अनेक सहयोगाधारित उद्यमों की शुरुआत कर बेमिसाल कामयाबी प्राप्त की. फलस्वरूप वे दुनिया-भर के सहकार-प्रेमियों की प्रेरणा बने. उनकी सफलता अधिलाभ की संकल्पना; यानी मौद्रिक लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ को वरीयता देने पर निर्भर थी. ऐसा नहीं है कि रोशडेल पार्यनियर्स के उन सदस्यों को उपभोक्ता भंडार से कोई आर्थिक लाभ नहीं पहुंचा था. समिति के सदस्यों ने अपनी सदस्यता राशि से कई गुना मौद्रिक लाभ अर्जित किया था, किंतु सहकारी उपभोक्ता भंडार के माध्यम से लाभार्जन उनका ध्येय नहीं था, उनका मकसद गरीब बुनकरों, मजदूरों को बड़े दुकानदारों, पूंजीपतियों की मनमानी से छुटकारा दिलाना था, जो मिलावटी सामान को मनमाने दामों पर बेचते थे. उनकी सफलता से एक नए विचार की स्थापना हुई, जिसके अनुसार संगठन के दम पर वड़ी से वड़ी सत्ता को न केवल चुनौती दी जा सकती है, बल्कि उसको अपने हितों के अनुरूप बदला भी जा सकता है. इसके साथ-साथ सहकार संस्कृति को बल मिला जो प्राचीनतम समाजों की विशेषता थी, मगर कालांतर में साम्राज्यवाद, सामंतवाद और पूंजीवाद के वर्चस्वकारी दौर में यह नेपथ्य की ओर खिसकती गई.

दरअसल इतिहास में ऐसे अवसर बहुत कम आते हैं, जब परिवर्तन की इच्छा को उत्सुक समाज के असंतुष्ट वर्ग अपनी दुर्दशा के कारणों को जानने को उत्सुक हो जाते हैं. इस कोशिश में वे परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझने तथा उनका लाभ उठाने की कोशिश करते हैं. उस समय यदि सही नेतृत्व एवं परिवर्तनकामी विचारधारा का साथ मिले तो वे अपने हितानुकूल परिवर्तन लाने में कामयाब भी होते हैं. फ्रांस, रूस, चीन, क्यूबा, वियतनाम आदि देशों की जनक्रांतियां इसी जागरण का सुफल थीं. जनक्रांतियों की सफलता क्रांति के आवेग, नेतृत्व कुशलता, जनसमर्थन तथा तत्कालीन परिस्थितियों पर निर्भर करती है. किंतु क्रांति के बाद आए बदलावों को दीर्घकालिक और जनोन्मुखी बनाए रखना, पूरी तरह अभिजनेत्तर समूहों की बौद्धिक सक्रियता, एकता, क्रांति के लक्ष्य के प्रति निष्ठा तथा नेतृत्वकारी शक्तियों की सदेच्छाओं पर निर्भर करता है. उसके अभाव में क्रांति का प्रभाव धुंधला पड़ने लगता है. उसके फलस्वरूप सत्ता में आए लोग अभिजन समूहों में ढलने लगते हैं. इस बीच अभिजन भी शांत नहीं बैठता. क्रांति की संभावना को टालने के लिए शीर्षस्थ अभिजन योजनाबद्ध तरीके से काम लेते हैं. वे धर्म, मीडिया, राजनीति, शासन-प्रशासन सहित खरीदे गए बुद्धिजीवियों के सभी वैध-अवैध तरीकों का उपयोग करते हैं. जनसामान्य के हितों का सामान्यीकरण कर उसको एकजुट करने के बजाय वे उसे छोटे-छोटे अनगिनत समूहों में बांट देते हैं. उससे उनकी प्रभावी शक्ति छिन्न-भिन्न हो जाती है. समान परिस्थितियों में जी रहे समूह एक हों, इस संभावना को टालने के लिए अभिजन उनके बीच हितों की स्पर्धा पैदा करने का दुष्चक्र चलाता है. फलस्वरूप वे समूह आपस में ही टकराने लगते हैं. उसका सीधा असर उनके आत्मविश्वास पर पड़ता है. इसके चलते वे अपने विकास के लिए स्वतंत्र निर्णय लेने अथवा समान परिस्थितियों में रह रहे अपने ही जैसे लोगों के साथ मिलकर समाधान हेतु संगठित प्रयास करने के बजाय सरकार अथवा समाज के शिखरस्थ वर्गों से मदद की उम्मीद करने लगता है. इस प्रवृत्ति को स्थायी रूप देने, व्यक्ति का स्वभाव बनाकर स्थितियों से अनुकूलन कराने में पूंजीवाद-पोषित-संरक्षित मीडिया का भी बड़ा योगदान होता है. किंचित विषयांतर का खतरा उठाते हुए, मीडिया के अभिजनोन्मुखी चरित्र की चर्चा, अभिजनेत्तर समूहों की चौतरफा जकड़बंदी को समझने के लिए जरूरी है.

उनीस सौ पचास-साठ के दशकों को याद करने की याद करने की कोशिश करें. पूरा देश आजादी के पश्चात देश के नवनिर्माण में जुटा था. गांधी के अधूरे सपनों को पूरा करने की आस लेकर विनोबा भूदान यात्रा पर निकल चुके थे. लोग उनकी बातों से प्रभावित होकर खुले दिल से भूदान आंदोलन को सफल बनाने में जुटे थे. भूदान की भावना घनीभूत होते-होते ‘ग्रामदान’ तक व्यापक हो चुकी थीं. मात्र एक दशक की यात्रा में विनोबा चालीस लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि भूमिहीनों के लिए जुटा चुके थे. यह पूरी दुनिया में किसी भी अहिंसक प्रयास के माध्यम से किया गया, अब तक सबसे बड़ा भू-अंतरण था. लेकिन गांव में सभी के पास तो जमीन न थी. विनोबा के आवाह्न पर यदि भू-स्वामी भूमिहीनों की सहायता के लिए आगे आ रहे थे, तो भूमिहीनों की भी इच्छा थी कि वह अपने गांव-ज्वार के विकास में अपना योगदान दे सकें. गरीब मजदूर, भूमिहीन किसान, जिनके पास उनकी एकमात्र पूंजी उनका श्रम था, अभी तक दूसरों के कहने पर पसीना बहाते आए थे. ऐसे लोगों का गांव के विकास के लिए स्वैच्छिक योगदान क्या हो? इसी से श्रमदान का विचार सामने आया. फिर क्या था, भूदान, ग्रामदान के साथ श्रमदान की लहर भी उठने लगी. इनमें श्रमदान सवार्धिक सुलभ था. इसलिए मेहनतकश लोग श्रमदान को निकल पड़े. धीरे-धीरे उनके साथ गांव के दूसरे स्त्री-पुरुष भी सम्मिलित होते गए. कालांतर में स्कूल के विद्यार्थियों को भी उससे जोड़ दिया, ताकि उनमें सामुदायिकता की भावना बलवती हो. यह कार्य गांवों में सातवें-आठवें दशक तक चलता रहा. मुझे याद है 80 के दशक में पॉलिटेक्नीक के अंतिम वर्ष में एक पर्चा रचनात्मक कार्य का होता था. जिसमें विद्यार्थियों को अपनी संकल्प-भावना विकेंद्रीकृत विकास के संदर्भ में दर्शानी पड़ती थी. 1980 में हमारे टीम भी एक गांव में पहुंची थी. दल का उद्देश्य ग्रामीण लोगों की समस्या जानने के अलावा उनके बीच ‘श्रमदान’ का प्रचार-प्रसार करना था, ताकि छोटे-छोटे कार्यों के लिए सरकार का मुंह देखने के बजाय अपने बूते उनका समाधान खोज सकें. गांव जाने के बाद जो देखने को मिला उसने हमें चौंकने को मजबूर कर दिया. जिस ‘श्रमदान’ के संदेश को हम ग्रामीणों तक पहुंचाना चाहते थे, गांववाले उससे भलीभांति परिचित थे, गांव में एक नाला श्रमदान के अंतर्गत परस्पर सहयोग के आधार पर बनाया जा रहा था. यह वह दौर था जब लोगों के मनोमस्तिष्क पर स्वाधीनता संग्राम के नैतिकतावादी आंदोलन का असर था और उसके आधार पर एक सहयोगात्मक, एक-दूसरे पर भरोसे का सम्मान करने तथा समस्याओं के बीच से ही समाधान खोज निकालनेवाली जनसंस्कृति पनप चुकी थी. कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दलों में अभिजन चरित्रों की भरमार थी, इसके बावजूद अभिजनेत्तर वर्गों का उनमें भरोसा था. लोग अपने नेता के आवाह्न पर कुछ भी त्याग करने को तैयार थे. गांधी और विनोबा को मिली अप्रत्याशित सफलता का रहस्य भी यही था कि दोनों ने अपने अभिजात्य चरित्र का परित्याग कर अभिजनेत्तर समूह के रहन-सहन और साधारण जीवन-शैली को अपनाया था. फलस्वरूप अभिजन और अभिजनेत्तर समूहों के बीच की दूरियां घटी थीं. जनता का आत्मविश्वास वापस लौटा था. जो लोग कभी ‘कोऊ नृप होय हमें का हानि’ कहकर राजनीति से मुंह मोड़ लिया करते थे, वे निहत्थे ही दुनिया की महाशक्ति कहलाने वाले अंगे्रजों को ललकारने लगे थे.

उन दिनों समाचारपत्रों में भी देश समाज को अलग-अलग खंडों में बांटकर देखने की परंपरा न थी. उनके पूरे देश में एक अथवा अधिक से अधिक प्रांतवार संस्करण होते थे. मगर नव्वे के दशक में नई अर्थनीतियों के लागू होने के पश्चात उनका तेजी से स्थानीयकरण हुआ था. स्थानीयता पर जोर देते हुए एक शहर के कई-कई परिशिष्ट निकलने लगे. एक क्षेत्र की समस्या तथा उसके विरोध में चल रही हलचलों के बारे में दूसरे क्षेत्र के नागरिकों को भी जानकारी हो, यह अब अनिवार्य नहीं रह गया था. समाचारपत्रों द्वारा यह कार्य स्थानीय समस्याओं को प्रशासन की नजर में लाने के नाम पर किया गया था. इसका जनता को कितना लाभ हुआ, यह तो आकलन का विषय है, लेकिन समाचारपत्र मालिकों को इससे अवश्य दुहरा लाभ पहुंचा था. एक तो स्थानीय मुद्दों पर जोर देने से नए पाठक बनाना आसान था. इससे उनकी आय में जबरदस्त तेजी आई. अखबार निकालना जो कभी मिशन हुआ करता था, उसे इस दौर में लाभकारी उद्यम के रूप में देखा जाने लगा. लोकतंत्र के चैथे स्तंभ के रूप में ख्यात पत्रकारिता उद्योग में ढलने लगी. अब उनका नियंत्रण संपादकों और पत्रकारों के हाथों से खिसककर बड़े पूंजीपतियों के हाथों में जा पहुंचा था, जिनका हित सरकार को चारों ओर से घेरकर राजनीतिक अस्थिरता बनाए रखने में था, ताकि उसके माध्यम से सरकार और उनके नेताओं को ब्लेकमेल कर सकें. दूसरा लाभ उन नेताओं को हुआ जो किसी न किसी बहाने सत्ता प्राप्त करना चाहते थे. अखबारों में प्रोपेगेंडा कर वह अपनी राजनीति को चमका सकते थे. बहरहाल, स्थानीयता के आधार पर समस्या खंड-खंड में सामने आती थी. यदि दूसरे क्षेत्र में भी वैसी ही समस्या हो, तो भी उसके समाधान के लिए पूरे समाज के एकजुट होने की संभावना कम थी. यह अल्पसंख्यक अभिजन द्वारा बहुजन अभिजनेत्तर समूहों को टुकड़ों में बांट देने की रणनीति का नतीजा था. उल्लेखनीय है कि जनता की समस्याओं की ओर सरकार का ध्यान दिलाना अनुचित न था. किंतु जलभराव, गंदगी, आपसी झगड़े, गुटबंदी, जातिगत भेदभाव आदि कुछ ऐसी समस्याएं हैं जो स्थानीय लोगों द्वारा बिना किसी बाहरी सहायता के, निजी संसाधनों, सहयोग आदि के आधार पर आसानी से दूर की जा सकती हैं. चूंकि संगठन-शक्ति का बोध जनसाधारण को आत्मविश्वास से भर देता है. प्रकारांतर में वह बड़े प्रतिरोधों की संभावनाओं को जन्म दे सकता है. यह डर अभिजन ताकतों को था. इसलिए उन्हीं के इशारे पर शीर्षस्थ ताकतों द्वारा समाचारपत्रों के माध्यम से अभिजनेत्तर समूहों को बांट देने की रणनीति सफल हुई. लोग उनके बहकावे में आकर स्थानीय समस्याओं का समाधान स्वयं तलाशने के बजाय उनके समाधान के लिए सरकार का मुंह ताकने लगे. अब एक जैसी समस्याओं के बावजूद उनके लिए सरकार के आगे फरियाद करने वाले अलग-अलग थे. इससे हितों की स्पर्धा तथा आपसी अविश्वास को बढ़ावा मिला. अपने ही समूहों पर संदेह करने की प्रवृत्ति बढ़ी, साथ ही संगठित प्रतिरोध की भावना उत्तरोत्तर कमजोर पड़ती गई. उन गांवों में भी जहां सामुदायिक भावना प्रबल थी, लोगों ने भूदान, श्रमदान जैसे जनांदोलनों में आगे बढ़कर सहर्ष हिस्सेदारी की थी, जो अपनी समस्याओं का समाधान मिल-जुलकर सामुदायिक भावना के साथ खोज लिया करते थे. खेतों की बुवाई, कटाई से लेकर त्योहारों, उत्सवों आदि में सहकार-भाव के प्रदर्शन से बड़े-बड़े कार्य अपने बूते साध लेते थे, वे भी छोटी और मामूली समस्याओं के समाधान हेतु सरकार की ओर देखने लगे. अखबार सहित बाकी संचार माध्यमों का दायित्व समाज में अच्छे विचारों की खेती करना भी था. लेकिन लोगों को उनके कर्तव्य की याद दिलाने के बजाय वे मामूली समस्याओं के लिए भी सरकार पर निर्भर होने तथा उसपर दबाव बनाए रखने को उकसाने लगते हैं. इसके पीछे पूजीपतियों की मंशा थी कि सरकार कमजोर और ढुलमुल नजर आए, ताकि उसकी अनमनस्यकता लाभ उठाकर उससे अपने स्वार्थानुकूल कानून बनवा सकें. आशय है कि जनसाधारण जिसे सहज-स्वाभाविक मान लेता है, वह सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. उसे बनाए रखने के लिए वैसे ही सुविचारित, सुव्यवस्थित प्रबंध अभिजन वर्ग की ओर से किए जाते हैं, ताकि बहुसंख्यक अभिजनेत्तर वर्गों के श्रम-कौशल तथा प्राकृतिक संसाधनों पर अभिजन वर्ग का एकाधिकार बना रहे तथा उसे कम से कम चुनौतियां मिलें.

इन धूर्त्तताओं के बावजूद अल्पसंख्यक अभिजन सत्ताकेंद्र पर छाया रहता है तो इसलिए नहीं कि बहुजन में नेतृत्व का अभाव होता है. नेतृत्व तो वह किसी न किसी रूप में करता ही रहता है. असल में खुद को वड़ी जिम्मेदारी के अयोग्य मानकर पीछे हटने लगता है. अपने भीतर छिपी प्रतिभा को परिष्करण का अवसर ही नहीं देता. वह अपने भविष्य के प्रति असावधान हो, नेतृत्व का दायित्व उस वर्ग को सौंप देता है, जिसकी निगाह में उसका मूल्य एक श्रम-इकाई अथवा उपभोक्ता से अधिक नहीं है. ज्ञान की परंपरा से कटकर या काट दिए जाने पर अभिजनेत्तर समूह अभिजन के हाथों का औजार बनकर रह जाते हैं. जिसका राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक अभिजन अपनी-अपनी तरह से दुरुपयोग करते हैं. धार्मिक अभिजन उसकी समस्याओं के समाधान हेतु दैवी-कृपा को अपरिहार्य बताकर समस्या के मूल कारणों से उसका ध्यान हटा देते हैं. आर्थिक अभिजन की दृष्टि में उसकी हैसियत एक श्रम-इकाई या उपभोक्ता की होती है. जबकि राजनीतिक अभिजन उसे खुद को सत्ता-शिखर तक पहुंचाने वाली सीढ़ी के एक पायदान से ज्यादा महत्त्व नहीं देते. उनकी निगाह शिखर की ओर होती है. जैसे ही एक पायदान चढ़ता है, छूट गए पायदानों को बिसरा देता है. सामाजिक अभिजन उसके समक्ष बार-बार संस्कृति तथा परंपरा का राग अलापते हैं. धर्म, संस्कृति, परंपरा, संस्कार आदि की प्राचीनता का हवाला देते हुए, वे उससे अनुकूलन की जिम्मेदारी निभाते हैं; और इस तरह समाज में यथास्थिति बनाए रखने में मददगार सिद्ध होते हैं. विडंबना है कि लोकतंत्र में भी, जिसे ‘जनता पर, जनता द्वारा जनता के लिए शासन’ जैसा गरिमामय पद दिया जाता है, कोई खास सुधार नहीं हो पाता. लोकतंत्र यह कमजोरी ऐसी भी नहीं है, जिसके बारे में पहले से सोचा न गया हो. प्लेटो के जमाने से लेकर आज तक जनप्रतिनिधियों का विचलन बुद्धिजीवियों को उसके सार्थक विकल्प की खोज के लिए प्रेरित करता आया है. लोकतंत्र की यह कमी संभवतः उसकी मूल अवधारणा में ही निहित है. लोक एक अमूर्त्तन संकल्पना है. समाज की भांति वह भी नियमों, विधानों का समुच्चय है. उसमें एक बार चुन लेने के पश्चात जनता का अपने प्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर नियंत्रण नहीं रह जाता. निर्वाचन के समय जनता बहुमत में होती है. किंतु उस प्रक्रिया के गुजर जाने के बाद मतदाता अल्पसंख्यक बन जाता है तथा निर्वाचित प्रतिनिधि दूसरे जनप्रतिनिधियों तथा अन्य शिखरस्थ शक्तियों के साथ मिलकर बहुमत का रूप ले लेते हैं. वे यदि किसी के प्रति जवाबदेही महसूस करते भी हैं, तो उन संस्थाओं के प्रति जिन्हें प्रत्यक्षतः अथवा परोक्ष रूप में विधायिका ने गढ़ा था. ऐसी अवस्था में कर्तव्यच्युत जनप्रतिनिधि को दोषी ठहरा पाना आसान नहीं होता. अतएव जिस ध्येय के लिए सरकार का गठन किया गया था, वह अधूरा रह जाता है. कह सकते हैं कि सामाजिक न्याय की उम्मीद में जनसाधारण जिन संस्थाओं का चयन करता है, वे पर्याप्त निगरानी व्यवस्था के अभाव में वर्गीय हितों के पोषक-संवर्धक होकर रह जाती हैं. ऐसी व्यवस्था जिसमें सरकार बनाने वाली जनता को शासन के आगे दोयम दर्जे का समझा जाता हो, लोकतांत्रिक हो जी नहीं सकती. सुकरात, प्लेटो, अरस्तु से लेकर मार्क्स, प्रूधों, परेतो तक सभी ने ऐसे लोकतंत्र की कटु आलोचना की है. परेतो ने तो उसे ‘फ्राड’ तक कहा है. जाहिर है, केवल लोकतंत्र सत्ता के चरित्र में परिवर्तन का एकमात्र विकल्प नहीं है. सत्ता के अधिकतम मानवीकरण हेतु लोकतंत्र को जनतंत्र में बदलना होगा, ताकि उसपर नागरिक संस्थाओं का प्रत्यक्ष नियंत्रण संभव हो सके. इसके लिए जनसंस्कृति के दायरे में विस्तार अपरिहार्य है. उसके दायरे में अभी तक सामाजिक लोकाचार, परंपरा, कला-साहित्य, रीति-रिवाज, मानवीय संबंध आदि आते हैं.

अभिजन प्रायः लोकलुभावन नारों और वायदों के साथ सत्ता में आते हैं. अभिजनेत्तर समूहों को विश्वास दिलाते हैं कि वे उनके सबसे बड़े और कदाचित एकमात्र हितैषी हैं. दर्शाते हैं कि उनकी छत्रछाया में वह अपने विकास की ओर से निश्चिंत हो सकता है. नेता जनसेवक होने का दावा करता है. संसद में प्रवेश करते समय वह प्रतिज्ञा करता है कि वह जनकल्याण के प्रति सत्यनिष्ठ भाव से कार्य करेगा. व्यापारी इस मामले में कुछ ज्यादा साफ होता है. वह अकसर कह देता है कि उसका सारा व्यापारिक लाव-लश्कर मुनाफे के लिए है. साथ में वह यह भी दावा करता है कि उसका मुनाफा बाकी समाज के भी हित में है. मगर वह कभी जाहिर नहीं होने देता कि उसका मुनाफा जिसे वह अपना अधिकार बताता है, सीधे जनता की जेब से आ रहा है. अपने लाभ के सामाजिक औचित्य को सिद्ध करने के लिए वह लाभ का एक हिस्सा सार्वजनिक कार्यों में लगाता है. इससे लाभार्जन के नाम पर की जा रही लूट के प्रति जनसहमति बनाने लगती है. यही बातें दूसरे अभिजन समूहों के बारे में भी सही है. सभी प्रत्यक्ष अथवा परोक्षरूप में लोककल्याण के दावे के साथ अपने औचित्य को स्थापित करते रहते हैं, किंतु शिखर पर पहुंच जाने के बाद अपने वास्तविक उद्देश्य को बिसराकर स्वार्थसिद्धि में लिप्त हो जाते हैं. जनाक्रोश की संभावनाओं को न्यूनतम रखने के लिए वे तरह-तरह के आडंबर रचते हैं. परिणाम यह होता है कि विकास का दस प्रतिशत हिस्सा साधारणजन के हिस्से आता है तथा 90 प्रतिशत अभिजन हड़प ले जाते हैं. उदाहरण के लिए 5000 रुपये मासिक वेतन पाने वाला औसत भारतीय वर्ष में 60000 रुपये जुटा लेता है. दूसरी ओर शिखरस्थ अभिजनों की आय करोड़ों में होती है. यदि इसे एक करोड़ रुपये मासिक भी मान लिया जाए तो वर्ष भर में उसकी कुल आय 12 करोड़ रुपये होगी. अब यदि दोनों की आय में 10 प्रतिशत वृद्धि होती है तो श्रमिक को वर्ष में मात्र 6000 रुपये वर्ष अतिरिक्त प्राप्त होंगे. दूसरी ओर उसी दूर से मुनाफा बढ़ने पर अभिजन को एक करोड़ बीस लाख रुपये की अतिरिक्त आमदनी होगी. श्रमिक से सीधे 2000 गुना अधिक. महंगाई और मुद्रास्फीति से भी प्रभावित होगा. किंतु वह अपनी अतिरिक्त आय को व्यापार में निवेश कर नए लाभ के अवसरों का सृजन कर सकेगा. जबकि श्रमिक की अतिरिक्त आय मुद्रास्फीति और महंगाई की भेंट चढ़ जाएगी.

समानतामूलक विकास के लिए आवश्यक है कि अभिजनेत्तर समूह इस भ्रांति से बाहर निकलें कि वे केवल शासित होने के लिए बने हैं. कि शासक और शासित प्रकृति ने निर्धारित किए हैं तथा राष्ट्र और समाज का भला कुशल शासक या सरकार पर निर्भर होता है. ऐसा ‘कुशल शासक’, जो लोगों के विवेक के बजाय भ्रांतियों या पूर्वाग्रहों द्वारा चुना गया हो, वह केवल राज्य के साम्राज्यवादी मनसूबों को पूरा कर सकता है. विकास को आंकड़ों की कारीगरी के रूप में दर्शा सकता है. समाज में व्याप्त ऊंच-नीच को मिटाने के बजाए उसे संरक्षण दे सकता है. स्वार्थ के लिए समाज को बांट सकता है और लोगों को बीच ऐसे मुद्दों को लेकर स्पर्धा करा सकता है, जिनका उनके विकास से कोई नाता न हो. अभी तक वह यही करता आया है. समाज में शासक की उपस्थिति और उसकी सर्वोच्चता के प्रति जनस्वीकृति सामाजिक विषमता और बहुआयामी स्तरीकरण का मूल कारण है. अभिजनेत्तर समूहों की शोषण से मुक्ति तभी संभव है जब वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सचेत हों. रूसो के अनुसार बहुजन को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह अल्पजन पर शासन करें. यानी जो सरकार बने उसके प्रति बहुजन की सहमति हो. समानता और बराबरी की राह में रूसो का यह संदेश बिसरा गया. जनांदोलनों के दबाव में लोकतंत्र को अपनाया गया, कितु वह प्रभावी हो, जनता लोकतंत्र की भावनाओं के अनुसार स्वयं को ढाल पाए उससे पहले ही जनचेतना को धर्म, जाति, संपद्राय, गोत्र और क्षेत्रीयता के छोटे-छोटे खानों में बांट दिया गया. संस्कृतिकरण के नाम पर गुरुडम परोसा गया, अध्यात्म की जगह लेने पहले धर्म आया, फिर उसकी जगह कर्मकांडों, रूढ़ियों, खोखले आदर्शों और पाखंड ने ले ली. जिंदगी की जद्दोजहद में डूबे साधारणजन के पास इस षड्यंत्र को समझने का समय ही नहीं था. जो समझते थे, वे भी किसी न किसी दबाव में आकर सहते जाने को विवश थे. जनता को नकारात्मक, प्रगति-विरोधी कार्यक्रमों में उलझाकर अभिजन अपनी स्थिति को निरंतर मजबूत करते गए.

इन हालात से बचने का एकमात्र रास्ता है—समांगीकृत विकास. लोक-संस्कृति को स्वस्थ्य, चैतन्य, आत्मनिर्भर, समानता और सद्भाव की पोषक जनसंस्कृति में बदलना. समाज को परंपरा के गैरजरूरी दबावों से बाहर लाकर उसमें न्याय, समानता, मानवाधिकार, सहयोग एवं साहचर्य जैसे आधुनिक जीवनमूल्यों की स्थापना करना. मान लेना कि प्राकृतिक संसाधनों पर प्रत्येक नागरिक का समान अधिकार है. आवश्यकता से अधिक पर किसी का, किसी भी वस्तु पर अधिकार अवैध और अनैतिक है. इसलिए जो है, जितना है, सभी उसका परस्पर भोग करें. विकास को लेकर पूरे समाज का एक सपना हो. उसके लिए सभी मिल-जुलकर प्रयत्न करें. जो समस्याएं आड़े आएं उनका मिल-बैठकर सर्वसम्मत समाधान खोजें. दूसरों से विकास की उम्मीद करते हुए सबकुछ उसके भरोसे छोड़ देंगे तो समाज के मुट्ठी-भर लोग खुद को ‘सबकुछ’ मानकर बाकी को ‘कुछ नहीं’ मानने लगेंगे. अभिजन संस्कृति का बोलबाला, ऊंच-नीच, छोटे-बड़े का बोध बना रहेगा. शिखर पर बैठे अभिजन मनमानी करते रहेंगे. कभी बौद्धिक संपदा, कभी धर्म, कभी राष्ट्रीयता तो कभी पैत्रिक-अधिकार के नाम पर वे उसकी पूरी कीमत वसूलेंगे. न्याय और कानून के नाम पर संस्थाओं का अंबार खड़ा करने से अच्छा है, समाज में न्याय की प्रतिष्ठा करना. निरंतर गतिमान जनसंस्कृति में लोगों के भरोसे को लौटाना. जनसाधारण के भीतर पैठे उस संशय और अविश्वास को समाप्त करना, जिससे वह निर्णय लेने में कतराता है. अपने जीवन की बागडोर दूसरे के हाथों में सौंपकर स्वयं नियति का दास बन जाता है. इसके लिए ऐसे समावेशी समाज का गठन करना होगा जिसमें कानून की अव्वल तो जरूरत ही नहीं पड़े. यदि कानून हों भी तो ऊपर से थोपे हुए नहीं. न ऐसे जिन्हें समझने के लिए विशेषज्ञों को दावत देनी पड़े. कानून ऐसे हों जिन्हें हर कोई आसानी से समझ सके. जिन्हें लोगों ने अपनी समझ और सुविधा से अपने समाज के भले के लिए बनाया हो. जिनका परिपालन आसान हो. जो निष्पक्ष हों और जिनमें सभी की आस्था हो. इसलिए उनसे डरने के बजाय लोग उनका पालन करने में गर्व की अनुभूति करें. ‘लोक’ की भांति ‘लोकतंत्र’ भी अमूर्त्तन है. उसमें जनता से मताधिकार पाए नेता सत्ताकेंद्र पर कब्जा जमा लेते हैं. उसके बाद वे सत्ता को अपनी बपौती मान लेते हैं. जनता का उनपर कोई दखल नहीं रह जाता. इसलिए वास्तविक न्याय के लिए ‘लोकतंत्र’ को ‘जनतंत्र’ में बदलना होगा. यह कार्य निर्वाचित प्रतिनिधियों पर छोड़ देने से संभव नहीं है. उसके लिए निचले यानी जनसाधारण के स्तर पर सक्रिय होना पड़ेगा. इस बात की पक्की व्यवस्था हो कि निर्वाचित प्रतिनिधि स्वयं को समाज के प्रति उत्तरदायी मानें. ऐसी आधुनिकता जिसमें सभी की भागीदारी हो. जो भी निर्णय लें, मिल-जुलकर लें. लिए गए फैसलों के प्रति अधिकतम की सहमति हो.

अभी तक जनता यह मानकर चलती रही है कि उसके प्रतिनिधि अपने दायित्वों के प्रति जागरूक रहकर निष्ठापूर्वक उनका पालन करेंगे. किंतु व्यवहार में उसका उल्टा हुआ है. देखा यह गया है कि जनता के प्रतिनिधि संसद में जाकर अपना कर्तव्य बिसरा देते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में ऐसा होता है, इसलिए माना जाना चाहिए कि जिन्हें जनता श्रेष्ठतम के नारे के साथ चुनती है, वे संसद में जाकर वैसे नहीं रह जाते. वहां जाते ही उनपर अभिजन संस्कार हावी हो जाते हैं. स्वयं को जनता का सेवक बताकर चुनकर आए लोग खुद को उसका स्वामी मानने लगते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में ऐसा होता है, इसलिए माना जाना चाहिए कि जिन्हें जनता श्रेष्ठतम के नारे के साथ चुनती है, वे संसद जाकर श्रेष्ठतम नहीं रह जाते. चूंकि अधिकांश मामलों में हमारे ‘श्रेष्ठतम’ साधारण या उससे भी कम, अर्थात ‘निकृष्टतम’ सिद्ध होते हैं. इसलिए जनता को समझना होगा कि श्रेष्ठतम प्रतिनिधि जैसी अवधारणा में ही खोट है. जनता को शासन का श्रेष्ठतम रूप चाहिए तो उसे स्वयं सक्रिय रहकर निगरानी की सर्वोत्तम व्यवस्था कायम करनी पड़ेगी. ताकि तयशुदा लीक से हटने की किसी जनप्रतिनिधि की हिम्मत ही न पड़े. उसे जानना होगा कि जनतंत्र की सफलता श्रेष्ठतम प्रतिनिधियों को संसद भवन तक पहुंचा देना नहीं है. निर्वाचित प्रतिनिधि श्रेष्ठतम कार्य करें, तब जनतंत्र का उद्देश्य पूरा होगा. इसलिए अपने प्रतिनिधियों से श्रेष्ठतम काम लेना भी जनता का दायित्व है. जनप्रतिनिधि का रिपोर्ट-कार्ड तैयार करने का प्रथम अधिकार उसके निर्वाचकों को होना चाहिए, न कि सांसदों को अपनी ही पीठ थपथपाने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए. इसके लिए लोगों का अपने अधिकारों को जानना, समझना तथा आवश्यकता पड़ने पर उनके लिए संघर्ष को तैयार रखना भी जरूरी है. इसे यूं भी कह सकते हैं कि ‘श्रेष्ठतम प्रतिनिधि’ एक भ्रांत अवधारणा है. केवल श्रेष्ठतम जनता ही शासन को श्रेष्ठतम स्तर तक ले जाती है.

यहां एक पेंच है. आम जनता अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करे या शासन चलाए. किसान यदि अपना वक्त शासन-प्रशासन की देखभाल करेगा तो हल चलाने के लिए समय कैसे निकाल पाएगा! इसका उत्तर बहुत आसान है. यदि जनता इस सिद्धांत कि ‘श्रेष्ठतम जनता ही श्रेष्ठतम शासन दे सकती है’—को भली-भांति समझ लें तो फिर कोई चुनौती रह ही नहीं जाती. अभी तक जनता शासन का अधिकार दूसरों के हाथों में सौंपी आई है. सभ्यता के आरंभ से आज तक वह संघवाद, राजशाही, सामंतवाद, तानाशाही, पूंजीवाद, लोकतंत्र, जैसी व्यवस्थाओं से अनुशासित होती है. इसके बावजूद उसकी समस्याएं आज भी जस की तस हैं. बल्कि हर बार उसके चारों और घेरा कसता ही रहा है. इससे मुक्ति हेतु ऐसी जनसंस्कृति की जरूरत इस देश को है जो केवल रीति-रिवाज, परंपरा, साहित्य, कला, सामाजिक आचार-व्यवहार तक सीमित न हो. जिसमें समानता, विकास, ज्ञान-विज्ञान, राजनीति, प्रशासन जैसे नए जीवनमूल्य भी सम्मिलित हों. जिसमें परपंरा और आधुनिकता का सुंदर समावेश हो. उनमें से प्रत्येक के श्रेष्ठतम जीवनमूल्य जिसमें समाहित हों. ऐसे समाज की जरूरत है जिसमें लोग समान हितों के आधार पर एक-दूसरे से जुड़े हों तथा सम्मिलित कल्याण के लिए मिल-जुलकर काम करना जानते हों. यह ‘बिना राजा का राज’ या ‘बिना शासन के शासन’ जैसी अवधारणा है, जो नई न होकर भी वर्तमान परिस्थितियों में दूर की कौड़ी या फिर दिमागी शगल लग सकती है. इसलिए कि गत चार-पांच हजार वषों के बीच शासित होते-होते, हम अपने आपको, अपनी शक्ति और योग्यता को बिसरा चुके हैं. इतने वर्षों में हमने हर प्रकार की राज्य प्रणाली को आजमाया है. पहले कबीलाई शासन देखा, राजा आए, तदनंतर महाराजाधिराज और चक्रवर्तित्व का जमाना आया. उसके बाद बादशाहत देखी, फिर औपनिवेशिक शासन और अब लोकतंत्र. जनता को सभी ने, बार-बार छला है. इतने दबाव सहे हैं कि सिर उठाकर चलने की आदत ही छूट गई है. ऐसे में समाज में न्याय तभी संभव है, जब उसे दूसरों से मांगने की अपेक्षा जनता स्वयं समाज में उसकी प्रतिष्ठा करे. कुछ लोग इसे ‘कल्पनालोक’, ‘यूटोपिया’ यह निरा आदर्शवादी द्रष्टिकोण भी कह सकते हैं. मुझे इससे भी इन्कार नहीं है, किंतु मनुष्यता की मुक्ति का रास्ता इसी ओर से जाता है. वर्तमान परिस्थितियों में यह विकल्पहीन पथ है.

© ओमप्रकाश कश्यप

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Filed under गत्यात्मक जनसंस्कृति यानी समावेशी आधुनिकता, धर्म और अभिजन संस्कृति, न्याय की अवधारणा

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