सद्य: प्रकाशित पुस्तक “समाजवादी चिंतन के विविध आयाम’” की भूमिका

एक समय था जब सभी स्वतंत्र थे. इतने स्वतंत्र कि स्वतंत्रता के कोई मायने ही नहीं थे. और इतने सुखी कि सुख क्या है, इसे शब्दों में शायद ही बता पाते. परिवार की भांति सब समूह-बद्ध होकर रहते. मिल-जुलकर शिकार करते. शिकार न मिलने पर प्रकृति-प्रदत्त कंद-मूल-फल से गुजारा कर लेते. मौसम सताता तो गुफाओं की शरण लेते. नहीं तो खुले अंचल में जीवन का उत्सव मनाते थे. प्रकृति की गोद में रहते हुए उन्होंने पृथ्वी की उर्वरा शक्ति को जाना. फलस्वरूप कृषि-योग्य ठिकानों पर बड़ी-बड़ी बस्तियां बसने लगीं. समय के साथ सभ्यता और सभ्यता के साथ समाज का दायरा बढ़ता चला गया. इसी के साथ उलझनें भी बढ़ी. सामाजिक जरूरतें आसानी से पूरी हों, इसके लिए श्रम-विभाजन को अपनाया गया. इस बीच अपनी स्थिति का लाभ उठाकर समाज का एक वर्ग संसाधनों पर अनैतिक अधिकार का दावा करते हुए मालिक बन बैठा. सभ्यता के नाम पर, संस्कृति के नाम पर, धर्म, राष्ट्र और कुल-परंपरा के नाम पर इस वर्ग ने नियमों, कानूनों और आचार संहिताओं का ऐसा पहाड़ खड़ा किया कि वह वर्ग जिसने पूरे समाज के भले के लिए श्रम-संस्कृति को अपनाया था, जो अपना पसीना बहाकर दूसरों का पेट भरता, उनके सुख और विलासिता की वस्तुएं पैदा करता था, वह भृत्य और मजदूर कहलाने लगा. उसका अपने मन-मस्तिष्क तो दूर श्रम तक पर अधिकार न था. दूसरी ओर जिसने प्राकृतिक संसाधनों पर अनैतिक कब्जा किया हुआ था, जो दूसरों के श्रम पर जीने वाला, परजीवी और परावलंबी था—वह खुद को स्वामी बताकर दूसरों के श्रम का मूल्यांकन करने लगा. धर्म, राजनीति, अर्थतंत्र सब उसके अधिकार में आ गए. समय-समय पर इसके विरुद्ध आवाज भी उठी. हर युग में ऐसे उदारचेता विचारक हुए जिन्होंने समाज के अनैतिक स्तरीकरण को धिक्कारा. मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को अप्राकृतिक और अमानवीय कहकर उसकी भर्तस्ना की. महाभारतकार ने कहा, ‘न हि मानुषात श्रेष्ठतरं हि किचिंत’—सृष्टि में मनुष्य से श्रेष्ठतर कुछ भी नहीं है.’ बौद्धकाल में सम्राट से अपेक्षा की जाती थी कि वह खुद प्रजा का योग्य पालनकर्ता, संरक्षक और निदेशक सिद्ध करे. उसका आचरण नियमों से आबद्ध हो. जातक कथा के अनुसार एक बार एक राजा की मुंह लगी पटरानी ने राजा से यह वर मांगा—

‘महाराज, मुझे राज्य पर अमर्यादित राज्य करने के अधिकार प्रदान किए जाएं.’ इसपर राजा ने महारानी को समझाया—
‘भद्रे राज्य के संपूर्ण निवासियों पर मेरा कोई भी अधिकार नहीं है. मैं उनका स्वामी नहीं हूं. मैं तो केवल उनका स्वामी हूं जो राजकीय कर्तव्यों का उल्लंघन करते हुए, न करने योग्य कार्य कर दूसरों के जीवन में व्यवधान खड़े करते हैं. अतः मैं तुम्हें राज्य के समस्त निवासियों पर स्वामित्व प्रदान करने में असमर्थ हूं.’

उस समय सारी संपत्ति राज्य की मानी जाती थी. राजा उसका एकमात्र कर्ता-धर्ता-स्वामी था, इसलिए उसे ‘भू-पति’, ‘भू-पालक’, ‘भूपेश’ आदि कहा जाता था. संपत्ति पर सामूहिक अधिकारिता का विचार, जो आरंभिक कबीलाई जीवन का गुण था, समाप्त हो चुका था. ऋषियों के आश्रम तक उनकी व्यक्तिगत संपदा कहे जाते थे. व्यक्तिगत संपत्ति का निषेध पहली बार बौद्ध दर्शन में देखने को मिलता है. बुद्ध ने जो बौद्ध विहार स्थापित किए, वे निजी अधिकारिता से बाहर थे. उन्होंने गणतांत्रिक पद्धति की भी सराहना की. हालांकि दुनिया के अन्यान्य हिस्सों की भांति, तत्कालीन भारतीय गणतंत्र एक प्रकार का कुलीनतंत्र ही था. उसमें केवल विशिष्ट लोग हिस्सा ले सकते थे. समाजवाद के बीजतत्व हमें प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ में दिखाई पड़ते हैं. आदर्श राज्य की कल्पना करते हुए उसने राज्य का कार्य-भार दार्शनिकों के निर्वाचित मंडल को सौंपने का सुझाव दिया था. प्लेटो का आदर्श राज्य का सपना किताबी पन्नों से बाहर भले न आ सका, लेकिन परिवर्तन का सपना देखने वाले दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों को प्रभावित हमेशा करता रहा. सत्ता की तानाशाही के विरुद्ध आवाज चीन में भी उठी थी. कन्फ्युशियस के समकालीन ताओ जू को समाज के आंतरिक सामथ्र्य पर पूरा भरोसा था. उसका मानना था कि सरकार को सरलतम और न्यूनतम होना चाहिए. सामाजिक मर्यादा और अनुशासन के नाम पर बने कानून और आचारसंहिताओं की आलोचना करते हुए उसने कहा था कि उनकी संख्या ‘बैल के शरीर के बालों से भी अधिक हैं.’ चूंकि शिक्षा और उत्पादन के वैकल्पिक संसाधनों का अभाव था और अर्थव्यवस्था के एकमात्र स्रोत कृषि-भूमि पर सामंत वर्ग अधिकार जमाए था. अतः उसकी मनमानी के चलते मानवीय स्वतंत्रता, मान-सम्मान और गरिमा को महत्त्व देने वाले विचार पुस्तकों से बाहर अपना स्थायी प्रभाव न छोड़ सके. इसके लिए उन्हें अठारवीं शताब्दी तक प्रतीक्षा करनी पड़ी जब औद्योगिक क्रांति ने बहुमुखी हस्तक्षेप द्वारा रोजगार के अवसर पैदा किए. फलस्वरूप हुनरमंद शिल्पकारों, पेशेवरों की मांग बढ़ी और वे सामंती चंगुल से बाहर आ सके. शिक्षा के विस्तार ने उनके भीतर आजादी की ललक पैदा की, जिसने परिवर्तनकामी आंदोलनों, विचारों को जन्म दिया.

साम्राज्यवादी परिवेश और सामंती सोच के दिनों में व्यक्ति का अस्तित्व गौण था. नए सोच में व्यक्ति-स्वातंत्र्य पर जोर दिया जाने लगा. थॉमस पेन ने लिखा कि मनुष्य ने समाज को अपने कल्याण के लिए चुना है. समाज की सर्वोच्चता तभी संभव है, जब निर्णय के समस्त अधिकार उसके अधीन हों. संसाधनों पर उसका कब्जा हो. हालांकि उसने माना कि समाज की संसाधनों पर अधिकारिता निःशर्त न होकर अनेक कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के साथ आती है. संसाधनों का उपयोग करते समय समाज को समझना चाहिए कि वह प्राकृतिक सत्ता नहीं है, बल्कि मनुष्यों द्वारा मनुष्य के कल्याण हेतु गठित किया गया है. मनुष्य समाज में इसलिए सम्मिलित होता है कि वह अपने सुख में वृद्धि कर सके. यदि ऐसा नहीं होता, समाज का कोई नागरिक मूल-भूत सुविधाओं से वंचित रह जाता है, तो समाज के गठन का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. समाज का दायित्व है कि वह संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करे ताकि उनका लाभ समाज के प्रत्येक नागरिक को प्राप्त हो सके. प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास हो कि समाज उसकी इच्छाओं की पूर्ति करने में सक्षम है. जहां इच्छाओं का सर्वमान्य निर्धारण संभव न हो, वहां समाज इच्छाओं के सामान्यीकरण की नीति को अपना सकता है. इच्छाओं के चयन के लिए गणतांत्रिक प्रणाली उपयुक्त पाई जाती है, बशर्ते उसमें जन्म, भाषा, क्षेत्रीयता, धर्म, संप्रदाय आदि के नाम पर कोई विशेषाधिकार न हों. सर्वसम्मति के अभाव में समाज बहुमत के आधार पर इच्छाओं का सामान्यीकरण कर सकता है. उस समय भी यह ध्यान रखना होगा कि समाज में जन्म, वर्ण, रंग, कुल-परिवार, भाषा आदि के नाम पर किसी को विशेषाधिकार प्राप्त न हों. इच्छाओं के सामान्यीकरण अथवा सामान्य इच्छा के चयन के लिए गणतांत्रिक प्रणाली सर्वोपयुक्त पाई गई है. यह समाज या उसके किसी भी वर्ग को मनमानी का अधिकार नहीं देती. बल्कि निरंतर यह बोध कराती है कि उनमें से प्रत्येक के बस उतने ही अधिकार हैं जो समाज के किसी भी अन्य नागरिक को प्राप्त हैं. यह शीर्षस्थ सत्ताओं, को उनकी जिम्मेदारियों से आबद्ध करती है. उसकी सफलता के लिए आवश्यक है कि सदस्यों के बीच असहमति का साहस और सहमति का विवेक हो. लोग अपना पक्ष रखने और दूसरे की सुनने में जितने निपुण और धैर्यवान होंगे, उतने ही परिपक्व निर्णय ले पाएंगे.

समाजवादी के अनुसार राज्य सामूहिक इच्छा की अभिव्यक्ति है. उसका कर्तव्य राज्य-संपदा की सुरक्षा एवं संवर्धन द्वारा समाज को विकास की ओर अग्रसर करना है. इसके बावजूद यह विडंबना ही कही जाएगी कि बीसवीं शताब्दी के पूवार्ध में समाजवाद ने जितनी तेजी से पांव पसारे था, उत्तरार्ध में वह उतनी ही तेजी से सिकुड़ने लगा था. सोवियत संघ के पतन के बाद तो हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. समाजवाद की चर्चा करना, सामान्य अर्थों में प्रतिक्रियावादी होना और दिवास्वप्नों में जीना रह गया है. आखिर क्यों? क्या कारण है कि साम्यवादी आदर्श, दर्जनों प्रभावकारी दर्शन और अपने समय के श्रेष्ठतम बुद्धिजीवियों के खुले समर्थन के बावजूद समाजवाद को पूंजीवाद से अपनी अधिकांश जंगे हारनी पड़ीं? दरअसल पूंजी-प्रेरित बाजार ने लोगों को ऐसी अंध-स्पर्धा की ओर ढकेल दिया है, जहां व्यक्ति अधिकाधिक अर्थोपार्जन से कुछ और सोच ही नहीं पाता. सामान्य नैतिकता केवल व्यावसायिक संबंधों तक सिमट जाती है. जनसाधारण में अपनी पैठ बनाने के लिए पूंजीवाद लोकप्रिय उपादानों का सहारा लेता है. फिर चाहे राजनीति हो या धर्म, वह सभी का सुविधानुसार उपयोग करता है. मानवाधिकार, व्यक्ति-स्वातंत्र्य जैसे नारों के साथ वह व्यक्तिगत सुखाकांक्षाओं को इस विनियोजित करता है मानो मनुष्य कोई समाज-निरपेक्ष प्राणी हो. उसके प्रभाव में व्यक्ति को केवल अपने अधिकार याद रहते हैं. भूल जाता है कि समाज के साथ उसका अनुबंध एकतरफा नहीं है. यह सही है कि व्यक्ति अपने सुख के लिए समाज में शामिल होता है. मगर उसको यह भी समझना होता है कि उसका सुख समाज के सम्मिलित आनंद से परे नहीं है. इसलिए समाज की ओर से उसके अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्य भी निर्धारित हैं. लोकप्रियता के आधार पर कामयाबी हथियाने की होड़ में पूंजीवादी मीडिया व्यक्ति को केवल उसके अधिकारों की याद दिलाता है, और उसकी दुरवस्था के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराता है. संचार माध्यमों की पीठ पर सवार पूंजीपति जनता को बड़ी आसानी से यह विश्वास दिला देते हैं कि उसे उसकी दुरावस्था और संकटों से बचाने की जिम्मेदारी सरकार की है. सरकार का दायित्व है कि कराधान के रूप में जुटाई गई धनराशि का उपयोग लोककल्याण के कार्यों में करे. यदि असफल रहती है तो लोगों को गुस्सा करने का पूरा अधिकार है. इससे वह जनाक्रोश के निशाने पर आ जाती है. विभिन्न प्रकार के दबावों से घिरी, अस्थिर, बौखलाई हुई सरकार से पूंजीपति मनमाने निर्णय कराने में सफल रहते हैं. स्वार्थी और नाकारा तत्वों की कमी सरकार में भी नहीं होती, लेकिन पूंजीवादी मीडिया के दबाव के चलते वे येन-केन-प्रकारेण सरकार में बने रहते हैं. हालात में वास्तविक परिवर्तन शायद ही आता है.

विचार के क्षेत्र में लोकप्रियता की अपेक्षा दुराग्रहों की ओर ले जाती है और वैचारिक कठमुल्लापन अच्छे-खासे विचार को संकुचित कर देता है. कई बार अक्षम्य किस्म की गलतियां भी हो जाती हैं. उदाहरण के लिए एडम स्मिथ के मूल्यांकन को लें. अठारहवीं शताब्दी के इस प्रतिभाशाली अर्थशास्त्री को पूंजीवाद का आदि उत्प्रेरक माना जाता है. इसके लिए प्रायः ‘लेजेज फेयर’ के समर्थन का उदाहरण दिया जाता है. मंजे हुए अर्थशास्त्री के रूप में स्मिथ ने वही कहा या लिखा था जो समाज के आर्थिक विकास को गति देने में सक्षम हो. उपलब्ध संसाधनों को अधिकतम उत्पादन सक्षम कैसे बनाया जाए, यह उसके चिंतन का विषय था. एक वैज्ञानिक की दृष्टि और दार्शनिक जैसी वस्तुनिष्ठता से उसने इसपर विचार किया. फिर जो उसको जंचा वही अभिव्यक्त किया. उसने माना कि प्रत्येक मनुष्य पहले अपना सुख देखता है, ‘हमारा भोजन कसाई या पावरोटी बनाने वाले की सौगात नहीं है. उनकी गर्ज थी जो उन्होंने मीट बेचने या रोटी बनाने का धंधा चुना.’ इस उक्ति से उसके द्रष्टिकोण की व्यावहारिकता का अनुमान लगाया जा सकता है.

उपलब्ध संसाधनों द्वारा अधिकतम उत्पादकता की वांछा समाजवाद के लिए भी निषिद्ध नहीं है. अंतर बस इतना है कि समाजवादी की निगाह में सामाजिक लाभ महत्त्वपूर्ण होते हैं. मौद्रिक लाभ की कीमत पर सामाजिक लाभों की उपेक्षा वह नहीं कर पाता. इसके बरक्स पूंजीवाद का सारा तामझाम उद्योग स्वामी के अधिकतम लाभ को समर्पित होता है. वहां शिखर की ओर जाते हुए लाभानुपात निरंतर बढ़ता जाता है. जबकि लाभ के विभाजन हेतु समाजवाद ‘अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख’ की नीति अपनाता है. समस्त संपत्ति राज्य के अधीन होती है. ‘प्रत्येक को उसकी योग्यता के अनुसार काम, हरेक को उसकी जरूरत के बराबर दाम’—के अनुसार वह उसका उपयोग करता है. व्यक्तिगत संपत्ति के बारे में भी स्मिथ के विचार समाजवादी भावना के अनुरूप हैं—‘जैसे ही किसी राष्ट्र की भू-संपदा निजी संपत्ति ठहरा दी जाती है, भू-सामंत और सत्ता के अन्य ठेकेदार दूसरों की मेहनत की फसल काटने में जुट जाते हैं. स्वार्थ के वशीभूत हो वे प्राकृतिक संसाधनों को भी मंडी में उतार देते हैं.’ उत्पादन प्रविधियों की चर्चा के बाद वह उत्पादन प्रवृत्ति पर आता है. इस बारे में उसका सोच एकदम स्पष्ट है—‘यह सरासर अन्याय है कि पूरा का पूरा समाज उस दिशा में काम करने लग जाए, जिससे समाज के मुट्ठी-भर लोगों का भला होता है.’ उत्पादन का स्वरूप जनसाधारण की जरूरतों के अनुसार तय होना चाहिए. इसके लिए वह साफ शब्दों में कहता है—‘अनाज जरूरत है, चांदी विलासिता.’ उपयुक्त मूल्यांकन के अभाव में स्मिथ के अर्थदर्शन में अंतर्निहित नैतिकतावादी मूल्यों की उपेक्षा हुई. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि पूंजी-केंद्रित अर्थतंत्र की नैतिक संभावनाओं की पड़ताल का काम भी पीछे छूट गया.

इसका मतलब यह नहीं कि पूंजीवाद सर्वथा निर्दोष प्रणाली है या वह समाजवाद जैसी ही कल्याणकारी व्यवस्था है. दरअसल विकासोन्मुखी एवं महत्त्वाकांक्षी समाजों में सरकार को लोगों की अपेक्षाओं पर जल्दी से जल्दी खरा उतरने के लिए त्वरित उत्पादन प्रणालियां अपनानी पड़ती हैं. नवीनतम प्रौद्योगिकी का लाभ समाज के अधिकांश लोगों तक कैसे पहुंचे? जिन लक्ष्यों को पूंजीवाद स्पर्धा के जरिये कैसे प्राप्त करता आया है, उन्हें सहयोग के आधार पर कैसे प्राप्त किया जाए? यानी पूंजीवादी उत्पादन त्वरा समाजवाद आदर्श के साथ कैसे संभव हो—बुद्धिजीवियों के समक्ष यह चुनौती हमेशा से रही है. उस दृष्टि से अपेक्षित काम न हो पाने का एक कारण तो पूंजीवाद पर मौलिक लेखन का अभाव है. बकौल अयन रेंड, ‘पूंजीवाद का कोई दार्शनिक आधार नहीं है.’ जबकि समाजवाद के समर्थन में लेखन गत दो शताब्दियों से निरंतर होता रहा है. हाल की शताब्दियों में मनुष्यता को किसी न किसी रूप में प्रभावित करने वाले जितने भी दार्शनिक, विचारक आदि हुए, उनमें से अधिकांश समाजवाद के समर्थक थे. दार्शनिकों के दुराव के कारण पूंजीवाद के समर्थन में जो लेखन मिलता है, वह समग्र अर्थदर्शन न होकर उत्पादन प्रविधियों का विश्लेषण है. उसका मूल विषय पूंजी के सफलतम उपयोग द्वारा अधिकतम उत्पादकता के लक्ष्य पर विचार करना है. चूंकि वह आर्थिक गतिविधियों की वस्तुनिष्ट व्याख्या करता है, इसलिए साधारणजन की हैसियत उसकी निगाह में उपभोक्ता तक सीमित रह जाती है. पूंजीवादी चाहता है कि उपभोक्ता उसका विनम्र अनुगामी बने. इसलिए वह जन-प्रबोधीकरण की राह में तरह-तरह के अवरोध, प्रलोभन आदि ले आता है. वह दिखावे के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करता है. मगर प्रकट में चाहता है कि वह जैसा चाहे लोग वैसा सोचें, जो सपने वह दिखाना चाहे वैसे सपने देखें. संबंध औपचारिकताओं में तक सिमट जाएं. लोग मित्रों-रिश्तेदारों और पड़ोसियों के रहते खुद को असुरक्षित महसूस करें. इससे उत्पन्न शून्य को भरने के निमित्त उसका सारा कारोबार चलता है. स्वार्थपरता के कारण पूंजीवादी समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महज छलावा बनकर रह जाती है. मुक्त सोच को न तो तानाशाही स्वीकार करती है, न पूंजीवाद.

पिछली कुछ शताब्दियों में पूंजीवाद को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. इसके बावजूद यदि वह फलता-फूलता रहा है तो इसका कारण है कि अपने अभिजात्य समर्थन के बल पर वह प्रतिरोधी गुटों को छोटे-छोटे वर्गों में बांट देता है और विभाजित समूहों की आपसी स्पर्धा और द्वंद्व के बीच अपना वर्चस्व बनाए रखता है. इसके बावजूद समाजवाद समर्थकों, उसके लिए संघर्ष करनेवालों तथा पूंजीवाद के आलोचकों की फेहरिष्त बहुत लंबी है. बल्कि यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि पूंजीवाद जब-जब निरंकुश हुआ है, तब-तब उसे चुनौती देनेवाले पैदा हुए हैं. इटली का तानाशाह मुसोलिनी. अंतोनियो ग्राम्शी को कैद करके बहुत प्रसन्न था. उसे गुमान था कि उसने अपने सबसे बड़े विरोधी और प्रखरतम विचारक को काबू में कर लिया है. भरोसा था कि जेल की तंग कोठरी में ग्राम्शी का दिमाग भी बंधकर रह जाएगा. उसका दुनिया से कटना अपने आप से भी कट जाने जैसा होगा. परंतु हुआ एकदम उल्टा. जेल की अंधेरी दीवारों ने ग्राम्शी के दिलो-दिमाग को और भी रोशन कर दिया. उसकी सुतीक्ष्ण मेधा दमन के उन रूपों को भी देखने-समझने लगी, जो बाहर की भागम-भाग में संभव न थे. अंधेरे-बंद कमरों में भी उसने अपना लेखन जारी रखा. सरकार ने कागज-कलम पर नजर रखनी शुरू की तो वे चोरी-छिपे जेल में आने-जाने लगे. तानाशाह और उसके नौकरशाह उसके शब्दों से इतने घबराए कि सरकारी वकील को अदालत में अपील करनी पड़ी—‘हुजूर हमें इस आदमी के दिमाग पर बीस वर्ष के लिए रोक लगा देनी चाहिए.’

यह घटना 1928 की है. ग्राम्शी आगे बीस वर्ष जी न सका. क्योंकि जेल की सलाखों ने उसके स्वास्थ्य को बहुत नुकसान पहुंचाया था. परंतु जब तक जिया, तानाशाह की ताकत उसके दिमाग को कैद कर पाने में असमर्थ रही. जेल में रहकर उसने 2848 नोट्स लिखे. आगे चलकर वे साम्यवादी चिंतन के नए अध्याय सिद्ध हुए. लगे हाथ एक उदाहरण और. चे ग्वेरा का जन्म अर्जेंटाइना में हुआ था. प्रशिक्षित डाॅक्टर होने के नाते वह चाहता तो मजे की जिंदगी जी सकता था. मगर दक्षिण अमेरिकी देशों में पूंजी आधारित साम्राज्यवाद के कुरूप चेहरे से उसको ऐसी नफरत हुई कि उसने अपने जीवन का मकसद ही बदल दिया. अब उसका एकमात्र जुनून था, पूंजीवाद का समूल नाश. फिदेल कास्त्रो उसे पूंजीवाद के विरुद्ध लड़ाई में सर्वाधिक सशक्त नेता और योद्धा नजर आया तो वह उससे जुड़ गया. भले ही कास्त्रो की लड़ाई उनके अपने देश क्यूबा की आजादी के लिए थी. यह सोच कर कि एक भी देश यदि पूंजीवादी जबड़ों से बाहर निकलने में कामयाब हो जाता है तो वह समाजवाद की ही जीत होगी, उसने अपने देश से बाहर जाकर छापामार युद्ध का संचालन किया और क्यूबा की आजादी का सबसे जांबाज योद्धा बना. जीत के बाद कास्त्रो देश के नव-निर्माण में जुट गए. चे को भी मंत्रीपद सौंपा गया. मगर वह ठहरा समाजवादी योद्धा. पूंजी के साम्राज्य को उखाड़ फैंकने को उद्धत. सरकार में दूसरी स्थिति में होने के बावजूद एक दिन वह अचानक गायब हो गया. आखिर युद्ध-भूमि में उसने प्राण तजे.

ग्राम्शी ने साम्यवाद को अपना आदर्श माना था. मार्क्स से वह प्रभावित था, परंतु उसके विचारों को ज्यों का त्यों अपनाने के बजाय उसने उनकी नए सिरे से व्याख्या की. मार्क्स का कहना था कि पूंजीवादी समाजों में वर्ग-संघर्ष अपरिहार्य है. बीसवीं शताब्दी में विकसित देशों को पूंजीवाद के हाथों में खेलते देख मार्क्सवाद की यह आधारभूत अवधारणा गलत सिद्ध होने लगी थी. तो क्या मार्क्सवाद झूठ है? उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं? ग्राम्शी ने इसी तथ्य से आगे विचार करना आरंभ किया था. आखिर वह इस नतीजे पर पहुंचा कि पूंजीवाद समाज की आर्थिक संपदा को ही कब्जे में नहीं ले लेता, वह लोगों के दिलोदिमाग पर भी अधिकार जमा लेता है. वह सभ्यता और विकसित संस्कृति का सपना लोगों के दिमागों में रोपता है. इससे उत्पीड़ित वर्ग में उत्पीड़क स्थितियों को समाप्त करने के बजाय उत्पीड़क की स्थिति में आने की होड़ मच जाती है. ग्राम्शी ने इसको सांस्कृतिक आधिपत्य का नाम दिया. उसने जोर देकर कहा था—‘आदमी तो सभी बुद्धिमान हैं, किंतु समाज में सभी का व्यवहार बुद्धिमानों जैसा नहीं होता. कारण है कि सत्तासीन अभिजात जनसाधारण के मस्तिष्क का अपने हितों के अनुरूप अनुकूलन कर लेता है. विपुल जनशक्ति को वह छोटे-छोटे समूहों में इस तरह बांट देता है कि विरोधी जनसमूह सदैव अल्पमत में होता है. इसका निदान क्या हो? सर्वहारा वर्ग को सांस्कृतिक आधिपत्य के चंगुल से बाहर कैसे लाया जाए? इसके लिए ग्राम्शी ने सुझाव दिया कि यदि शोषित वर्ग सचमुच अपनी मुक्ति चाहता है तो पहले उसे बुर्जुआ के सांस्कृतिक वर्चस्व से बाहर आना होगा. समाज के शीर्षस्थ लोग जिनमें राजनेता, पुरोहित, व्यापारी और नवधनाढ्य बुर्जुआ वर्ग सम्मिलित है, परस्पर संगठित हो निजी हितों की सुरक्षा हेतु अभिजन संस्कृति को जन्म देते हैं. उसके प्रति सर्वजन का आकर्षण अंततः उसकी आर्थिक-सामाजिक पराधीनता का कारण बनता है. वर्चस्व से मुक्ति समांतर श्रमसंस्कृति के विकास के बाद ही संभव है.

कार्ल मार्क्स की भांति मिखाइल बकुनिन भी अपने समय का चर्चित श्रमिक नेता था. पेरिस क्रांति के दौरान दोनों एक साथ थे, मगर ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के दौरान उनके बीच वैचारिक दूरियां इतनी बढ़ीं कि रास्ते अलग करने पड़े. मार्क्स वर्ग-संघर्ष पर विश्वास करता था. उसका मानना था कि वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए सर्वहारा क्रांति आवश्यक है. प्रूधों से प्रभावित बकुनिन ऐसे राज्य का सपना देखता था, जिसमें सत्ता पूरी तरह विकेंद्रीकृत, लोग संगठित, जागरूक एवं आत्मानुशासित हों. साथ में इतने प्रबुद्ध और अनुशासित कि राज्य की आवश्यकता ही न रहे. अ-राजकता यानी ‘बिना राजा का राज्य’ जैसी अवधारणा नई न होकर भी लोगों को असंभव जान पड़ती थी. शताब्दियों से शासित होते आए, राज्य के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दमन के अनुरूप अनुकूलन कर चुके लोगों का ऐसा विश्वास नामुमकिन भी नहीं था. इसलिए अराजकतावादी विचारधारा की ओर जनसाधारण का रुझान कम रहा. फिर मार्क्स के समर्थन में उसका विपुल लेखन था. ‘दि कैपीटल’ में उसने पूंजीवादी के शोषणकारी चरित्र और उसकी जटिल प्रविधियों की गहन विवेचना की थी. उसकी प्रखर मेधा से उसके आलोचक भी अचंभित थे. उसके दम पर मार्क्स को बकुनिन से कहीं अधिक प्रतिष्ठा मिली. दुनिया-भर में साम्यवाद के प्रति जबरदस्त रुझान के बावजूद अपने उच्चादर्शी स्वप्न के बल पर अराजकतावाद बुद्धिजीवियों को लुभाता रहा. बीसवीं शताब्दी में लियोन ट्राट्स्की, पीटर क्रोप्टोकिन, एम्मा गोल्डमेन ने अपने प्रखर लेखन द्वारा इस विचारधारा को आगे लाते हुए उसको साम्यवाद का विकल्प सिद्ध करने की कोशिश की. समकालीन बुद्धिजीवियों में ना॓म चा॓मस्की इसके समर्थक विद्वान हैं. अराजकतावाद के अलावा समिष्टवाद, सहजीवितावाद, श्रमिकसंघवाद, संघवाद आदि दर्शन समाजवाद के विकल्प के रूप में आए. मार्क्सवाद की अपेक्षा इन्हें थोड़ा सकारात्मक माना जा सकता है तो इसलिए कि ये शिखर को कमजोर कर बराबरी करने का नहीं सोचते, बल्कि धरातल को इतनी सुदृद्धता और उठान देने का सपना पालते हैं कि बुर्जुआ सत्ताएं अपना तेज गंवा इतिहास की चीज बन जाएं.

बीसवीं शताब्दी के मध्याह्न तक दुनिया में जो साम्यवादी-समाजवादी राज्य गठित हुए उनकी कमजोरी थी कि वह इच्छाओं के चयन की प्रणाली पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. एकदलीय व्यवस्था में वहां लोककल्याण के नाम पर अल्पमत की इच्छाओं को थोपा जाता रहा है. इसको दलीय तानाशाही भी कहा जा सकता है. ऐसी व्यवस्था नागरिकों के बहुमुखी विकास को अवरुद्ध करती है. पूंजीवाद जनसाधारण को उपभोक्ता मानकर उनकी उपेक्षा करता है, दलगत तानाशाही उसको श्रम-इकाई तक सीमित कर देती है. माओ के कथन, ‘सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है’—के पक्ष में ऐतिहासिक साक्ष्य हो सकते हैं, किंतु इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि बलप्रयोग द्वारा समाज में वास्तविक परिवर्तन लाना सरासर असंभव है. उससे केवल मुखौटे बदले जा सकते हैं. एक को मारकर दूसरा गोलीबाज सत्ता पर सवार हो जाता है और समाज का ढांचा ज्यों का त्यों बना रहता है. ऐसे अतिकामी विचारों के महिमामंडन की चूक इतिहास भी करता आया है, इस कारण उसको ‘अभिजन वर्ग की कब्रगाह’ कहा गया है……

मेरा विश्वास है कि लेखन एक नैमत्तिक कर्म है. प्रत्येक लेखक अपने समाज और परिवेश से कच्चामाल उठाता है और अपनी कल्पना और सृजनात्मकता के साथ उसको रचना का रूप देकर वापस लौटा देता है. इस काम में उसे अपने मित्रों, परिजनों के अलावा उन लोगों से भी मदद मिलती है जिन्हें वह शायद जानता तक न हो….

आ नो भद्रा कृत्वो यन्तु विश्वतः!

ओमप्रकाश कश्यप
64वां गणतंत्र पर्व, 2013

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