‘समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि’ पुस्तक की भूमिका

लगभग पांच वर्ष पुरानी यह घटना दिमाग से उतरती नहीं. अपनी पुस्तक ‘सहकारिता आंदोलन: उद्भव एवं विकास’ के प्रकाशन को लेकर राजधानी के जाने-माने प्रकाशक से संपर्क साधा था. संस्थान स्वामी का छूटते ही कहना था—‘आजकल सहकारिता को कौन पढ़ता है!’ मैंने सहकारिता को लेकर कुछ छिटपुट आलेख 1997 से लिखने आरंभ किए थे. कहा जा सकता है कि 2007 में तैयार हुई वह पांडुलिपि लगभग 10 वर्ष के स्वाध्याय और परिश्रम की देन थी. जबकि प्रकाशक महोदय वे थे जिन्होंने पूंजीवाद विरोधी विचारधारा पर केंद्रित विदेशी पुस्तकों के अनुवाद प्रकाशित कर खूब वाहवाही बटोरी थी. रूस के क्रांतिकारी साहित्य के अनुवाद के अलावा मार्क्स, लेनिन, रोजा लेक्समबर्ग, चे ग्वेरा जैसे क्रांतिकारी समाजवादियों पर केंद्रित उनकी कई पुस्तकें बाजार में थीं. उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा उन्हीं की बिक्री से आता था. वे बाजारवाद के विरोध में चल रही बहसों से बने बाजार को तो कब्जाए रखना चाहते थे, परंतु उसके सबसे सार्थक विकल्प पर उन्हें भरोसा न था. जिस सहकारिता आंदोलन से विश्व के अस्सी करोड़ नागरिक जुड़े हों. भारत के बीस और अमेरिका जैसे महापूंजीवादी देश के चालीस प्रतिशत नागरिकों का जिससे आत्मीय संबंध हो—उसके बारे में हिंदी प्रकाशक का व्यंग्यात्मक लहजे में बातें करना, सिर्फ उसका दिमागी खोखलापन नहीं, हिंदी प्रकाशन-जगत की विडंबना भी है. इसको एक प्रकाशक की बौद्धिक अल्पज्ञता मानकर भुला पाना आसान भी नहीं है. खासकर तब जबकि उदारवाद, भूमंडलीकरण, बाजारवाद, विनिवेशीकरण गत दो दशकों में सर्वाधिक चर्चित शब्द रहे हैं. इनके बनिस्पत सहकारिता, समाजवाद, सहजीवितावाद और समष्ठिवाद जैसे उपक्रमों, जो पूंजीवाद का सार्थक विकल्प रचने की क्षमता रखते हैं, की चर्चा मीडिया में ‘न’ के बराबर हुई है. सहकारिता का यदा-कदा उल्लेख होता भी है, तो उसके आधार पर गठित संगठनों में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर, उन्हें बदनाम करने के लिए. इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हमारे अखबार, मीडियाकर्मी तथा उनके द्वारा पोषित, स्थापित बुद्धिजीवी सार्थक विकल्पों की चर्चा कम, प्याले में तूफान ज्यादा खड़ा करते हैं. इसलिए बाजारवाद, भूमंडलीकरण, आर्थिक उदारीकरण जैसे शब्द तथा इनके बहाने होने वाले विमर्श महज प्रतिक्रियावादी सिद्ध होते हैं और सार्थक विकल्पों की खोज बार-बार पटरी से उतरती रहती है.

प्रस्तुत पुस्तक की रचना के दौरान भी कई अनुभव हुए. उन दिनों प्रसंगवश जिससे भी इसका जिक्र किया, एकाध को छोड़कर प्रायः सभी ने भारतीय वाङमय का अध्ययन करने का परामर्श दिया. किसी ने कहा—वेदों का प्रणयन करो, वे समाजवादी प्रेरणा के आदिस्रोत हैं. किसी ने जैन और बौद्ध दर्शन के विशिष्ट अध्ययन की सलाह दी. खासकर उनकी नैतिक व्यवहार संबंधी मान्यताओं को लेकर. एक मित्र से तो जब भी मिला, हर बार उनके दिमाग की घड़ी की सुई शंकराचार्य पर अटकी हुई मिली—‘वेदांत से परे समाजवाद क्या है?’ कोई उनकी इस स्थापना की गहराई में जाने की कोशिश करे, उससे पहले ही वे आगे बढ़ जाते. बार-बार वही धुन, वही टेक, वही लगन—‘जिस दर्शन ने मान लिया कि कण-कण में भगवान हैं, उससे परे सोचने की गुंजाइश ही कहां रह जाती है….क्या बचा रह जाता है आगे सोचने को!’ वेदांत के प्रति इस सम्मोहन के शिकार वे अकेले नहीं हैं. परंपरा के प्रति जड़ आसक्ति ने भारत के मौलिक चिंतन को बहुत नुकसान पहुंचाया है. परिणामस्वरूप गत बारह सौ वर्षों में एक भी नया दर्शन नहीं जन्मा है. आखिर क्यों? इस पर उन्होंने शायद ही कभी विचार किया हो! अध्यात्म जैसे परम जिज्ञासु विषय को धर्म और परंपरा के नाम पर अतार्किक और कर्मकांडी बनाए रखने की स्वार्थपूर्ण कोशिश में ‘न्याय’ और ‘वैशेषिक’ जैसे दर्शन जो, ज्ञानार्जन को मोक्ष का माध्यम बताते थे, एक षड्यंत्र की भांति नेपथ्य में ढकेले जाते रहे. उस पर तुर्रा यह कि हम विश्वगुरु थे, विश्वगुरु हैं….मैं मानता हूं कि मित्र द्वारा भारतीय समाजवाद की मूल प्रेरणाओं की पड़ताल हेतु वेदों, उपनिषदों के अलावा जैन और बौद्ध साहित्य को पढ़ने की सलाह देना निस्संदेह सदाशयतापूर्ण था. मैंने उनकी सलाह के अनुसार बरतने की कोशिश भी है. भारतीय समाजवाद की पृष्ठभूमि पर केंद्रित पूरा एक खंड इस पुस्तकमाला में लाने की योजना है. हैरानी मात्र इस बात की है कि दो-ढाई वर्ष के अंतराल में जब तक इस पुस्तक की लेखन प्रक्रिया चली, किसी ने भी भारत के भक्ति आंदोलन की सामाजिकी के बारे में जानने की सलाह नहीं दी. किसी ने नहीं कहा कि समाजवादी आंदोलन को महज आर्थिक मुक्ति का आंदोलन समझ लेना भारी भूल होगी. समाजवाद मनुष्य की सर्वतोन्मुखी स्वाधीनता और समानता का संपूर्ण मानवतावादी दर्शन है. उसके साथ सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता भी जुड़ी हुई है. भारत में इसके स्वर पहली बार भक्त-कवियों की ओजपूर्ण वाणी में सुनाई पड़े थे.

पश्चिम में पंद्रहवीं शताब्दी में आरंभ हुए सुधारवादी आंदोलनों का लक्ष्य मनुष्य की राजनीतिक, सामाजिक आजादी को वापस लाना था. आर्थिक समानता का विचार उस समय तक अजन्मा था. धर्म को समस्त जीवनमूल्यों का आधार माना जाता था. उसका नियंत्रण उन शक्तियों के अधीन था, जो इस संसार और यहां उपलब्ध प्रत्येक सुख-सुविधा को मायाजाल बताकर जनसाधारण को पाप-पुण्य, लोक-परलोक की भ्रांत धारणाओं में उलझाए रखना चाहती थीं. उनमें अधिकांश बेहतर जीवन जीते थे और कुछ का जीवन तो अत्यंत विलासितापूर्ण था. निहित स्वार्थ के लिए धर्मसत्ता आततायी एवं विभेदकारी सामंती शक्तियों का समर्थन करती थी. इसलिए आरंभिक समानतावादी आंदोलनों का प्रमुख लक्ष्य मानवमात्र को पुरोहितवाद, आडंबरवाद और पोंगापंथी से मुक्ति दिलाना था. पश्चिम में उसकी शुरुआत मार्टिन लूथर द्वारा हुई, जिसे जॉन कॉल्विन, सरवाइंतिस, जियादार्नो ब्रूनो, संत साइमन, वाल्तेयर, रूसो आदि विचारकों ने गति दी. लगभग इसी कालखंड में धार्मिक सुधारवादी आंदोलन भारत में भी जन्मे, परंतु यहां की परिस्थितियों में वे उतने कारगर सिद्ध न हो सके. भारत में भक्ति आंदोलन का विकास एक क्रांतिकारी विचारधारा के रूप में हुआ था. आरंभिक दिनों में उसको यथास्थितिवादियों से टकराना भी पड़ा. परंतु संत कवियों का नैतिक आभामंडल, उनका उच्च मानवीय सरोकार जैसे कुछ कारण थे, जिनसे लोगों के बीच उनकी प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ती गई. वह सही मायने में सामाजिक आंदोलन था. उसमें ऐसे लोग सम्मिलित थे, जिन्हें परंपरागत धर्मायोजनों में भाग लेने की मनाही थी. जिनके लिए वेदाध्ययन पाप था. मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने से जिन्हें रोक दिया जाता था. जो धर्म और जाति के नाम पर शताब्दियों से उत्पीड़न सहते आए थे.

भक्त कवियों ने धर्म के नाम पर व्याप्त कर्मकांड और बलिप्रथा को चुनौती दी. कहा कि परमात्मा निर्मल हृदय में निवास करता है. ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’. तब आदमी को मंदिर-मस्जिद जाने, तीरथ नहाने, दान-पुण्य का नाटक करने, व्यर्थ का चढ़ावा चढ़ाने के ढकोसलों की आवश्यकता ही क्या है! ‘एक नूर से सब जग उपज्या’ कहकर उन्होंने जाति के नाम पर भेदभाव करने वालों को ललकारा. उससे पहले जितने भी धर्म, संप्रदाय पनपे थे, सबके पीछे किसी न किसी राजा का समर्थन था. पुरोहितवर्ग सत्तावर्ग से हाथ मिलाए रहता था. आपद्कर्म के बहाने वह उनके हर धत्कर्म में न केवल सहयोगी बनता, बल्कि अपनी ऊल-जुलूल मान्यताओं, रूढ़ियों के आधार पर उसे बढ़ावा भी देता था. अकेले संतकवि ऐसे थे जो अपनी नैतिक सत्ता के बूते ‘कहा मोको सीकरी सौ काम’ कहकर बादशाह अकबर को भी ठेंगा दिखा सकते थे. बड़े-बड़े सरदारों, मुल्ला-मौलवी, पंडित ओझाओं को राजदरबार में सिर झुकाए देखने वाला जनसमाज संतकवियों के फक्कड़पन, वाणी के ओज, साफगोई भरी ललकार और सीधी-सरल भाषा में ज्ञान संप्रेषण की कला पर सम्मोहित था. उनकी बातें उलझाव से दूर, सीधी और व्यावहारिक होती थीं. आरंभिक भक्त कवि समाज की निचली जातियों से आए थे. वे निर्गुण के उपासक थे. मूर्तिपूजा, जातिभेद, कर्मकांड आदि का विरोध करते थे. भक्ति आंदोलन की उस आरंभिक सफलता ने काफी लोगों को आकर्षित किया. कबीर, दादू दयाल, रविदास, मलूका, पीपा जैसे संत कवियों की वाणियां घर-घर गूंजने लगीं. इन कवियों के लिए साहित्य जीवन का सार, लोकाचार का हिस्सा था. उनसे प्रभावित होकर दूसरे वर्ण के लोग भी भक्ति आंदोलन से जुड़ने लगे. वे अपने साथ अपने संस्कार भी लाए थे. परिणामस्वरूप निराकार अराधना साकार पूजा-पाठ में ढलने लगी. प्रकारांतर में उसने जातिवाद, धार्मिक आडंबरवाद के पोषण को बढ़ावा दिया. उसने भक्ति आंदोलन के समस्त क्रांतिकारी सोच पर पानी फेरने का काम किया, जिससे वह मठों और दरगाहों में सिमटने लगा. सतरहवीं-अठारवीं शताब्दी का वह समय जब पश्चिम में वाल्तेयर, रूसो, वोलेनी, मिल, बैंथम आदि जड़ रूढ़ियों और बंजर परंपराओं पर जमकर प्रहार कर रहे थे, भारतीय मेधा अपने पराभव के कदाचित अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही थी. इसलिए जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय शासकों की मदद से देश को धीरे-धीरे कब्जाना आरंभ किया तो उसकी चाल को भांप, उनके संगठित विरोध के लिए आवाज उठाने वाला एक भी सूरमा इस देश में नहीं था.

अभी तक समाज का सामान्यबोध धर्म से अनुशासित होता आया है. धर्म की नींव अध्यात्म पर आधारित होती है. जनसाधारण को अपने अनुभवों पर सर्वाधिक अविश्वास इसी क्षेत्र में होता है. यह उसकी दूसरों पर निर्भरता बढ़ाता है. चूंकि आध्यामिक प्रेरणाओं का कोई स्पष्ट रूप नहीं है, इसलिए इसके नाम पर आरंभ से खूब घालमेल होता रहा है. इस घालमेल को महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, अजित केशकंबलि आदि विचारकों ने समझा था. परंतु असली चुनौती मिली बौद्ध दर्शन की ओर से. उन्होंने धर्म और अध्यात्म के नाम पर यज्ञों के औचित्य पर सवाल उठाए. कर्मकांड, पशुबलि तथा पुरोहितवाद के रूप में समाज में व्याप्त एक वर्ग की मनमानी का विरोध करते हुए उन्होंने सबको साथ लेकर चलने की सलाह दी. गौतम बुद्ध ने मगध जैसे भारी-भरकम साम्राज्य के आगे वैशाली जैसे आकार में काफी छोटे राज्य को अजेय बताया. परिणाम यह हुआ था कि छोटे-छोटे व्यापारी, उद्यमी, दस्तकार और शिल्पी संगठित होकर देश-देशांतर तक व्यापार करने लगे. फलस्वरूप स्पर्धा के बजाय सहयोग और सहकार विकास के मूल-मंत्र बन गए. देश समृद्धि की ओर अग्रसर होने लगा. जिसे भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है, वह वही दौर था जब देश प्रपंची पुरोहितों तथा उनके द्वारा पोषित आडंबरवाद से मुक्त था. बाद में बौद्ध धर्म में भी वही विकृतियां आने लगीं, जो वैदिक धर्मों के पराभव का कारण बनी थीं. राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने से राज्यों का आकर भी सिकुड़ने लगा था. राजनीतिक स्वार्थपरता इतनी बढ़ी कि अपने प्रतिद्वंद्वी को सिर नीचा दिखाने या खुन्नस मिटाने के लिए राजा-सामंत विदेशी आक्रामकों को न्योतने लगे. इस प्रवृत्ति ने मुगलों को जमीन दी थी. इसी से ईस्ट इंडिया कंपनी को पांव जमाने का अवसर मिला.

आखिर क्या कारण है कि पश्चिम के सुधारवादी आंदोलन कामयाब हुए और अठारहवीं शताब्दी तक आते-आते उसने स्वयं को पूरी तरह बदल डाला. यहां तक कि वह अपनी सहस्राब्दियों पुरानी दास प्रथा के कलंक से भी छुटकारा पाने में सफल हुआ. इस बीच भारत मुगलों की झोली से छिटककर अंग्रेजों की पॉकिट में समा गया. दो-चार को छोड़कर अधिकांश राजे-रजबाड़े चांदी की थाली में सजाकर अपना-अपना राज्य उनके सुपुर्द करते गए. इसका एक कारण तो भारतीय समाज की विशिष्ट जातीय संरचना थी, जो समाज के बड़े वर्ग को शिक्षा, संसाधन और निर्णय-प्रक्रिया से काट देती थी. दूसरा कारण भी कम महत्त्वपूर्ण न था. यूरोप में धार्मिक सुधारवाद औद्योगिक क्रांति के कंधों पर सवार होकर आया था. वैज्ञानिक चेतना उसकी बांह में बांह डाले साथ चल रही थी. सोलहवीं शताब्दी के दार्शनिक-वैज्ञानिक फ्रांसिस बेकन ने यह कहकर कि ‘ज्ञान ही शक्ति है….मशीनें आने वाले समय में मनुष्यता की उद्धारक सिद्ध होंगी’—प्रौद्योगिकी पर आधारित नई समाज-व्यवस्था का सपना लोगों की आंखों में भरा था. इसके फलस्वरूप वहां वैज्ञानिक शोधों को बढ़ावा मिला. मशीनें न केवल कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था का बेहतर विकल्प बनकर आई थीं, बल्कि उन्होंने कृषिक्षेत्र में भी अपनी महत्ता सिद्ध कर, श्रम पर लोगों की निर्भरता कम कर दी थी. हालांकि नई अर्थव्यवस्था की भी अपनी विसंगतियां थीं. उसके कारण समाज में बेरोजगारी बढ़ी थी. शिल्पकार वर्ग मशीनों के आने से पहले सम्मान का जीवन जीता आया था, उसको अब उद्योगपतियों की चाकरी करनी पड़ रही थी. सघन उत्पादन-क्षम मशीनों के आने के बाद उसके श्रम-कौशल की अवमानना का जो सिलसिला आरंभ हुआ था, वह बढ़ता ही जा रहा था. लेकिन नई अर्थव्यवस्था अपने साथ शिक्षा का उपहार लेकर आई थी. पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग हालांकि अधिकांश मामलों में पूंजीपतियों के साथ था. उनके हर निर्णय को आप्त-वचन मानकर शिरोधार्य कर लेता था. परंतु उनके बीच कुछ दूरंदेश ऐसे भी थे, जिन्होंने पूंजीवाद के कुटिल चेहरे को समय रहते पहचान लिया था. अपने गुस्से का इजहार वे विभिन्न मंचों से करते थे. सामंतकालीन अर्थव्यवस्था में लोगों को मुंह खोलने की आजादी न के बराबर थी. नई अर्थव्यस्था से श्रमिकों-कामगारों को संतुष्टि भले न हो, फिर भी उसमें ऐसा बहुत कुछ था, जो लोगों को उससे समझौता करने को प्रेरित करता था. चैतरफा आलोचनाओं से घिरे पूंजीवाद का आकर्षण इतना गहरा था कि मन से कोई भी पुराने दौर में लौटने को तैयार न था. हालांकि संघर्ष और परिवर्तन का सिलसिला निरंतर बना हुआ था.

सवाल उठता है कि समाजवाद ही क्यों? यह प्रश्न सोवियत संघ के पराभव के बाद से और जोर देकर उठाया जाने लगा है. हाल में चीन का नाम भी यह कहकर जोड़ दिया जाता है कि उसने भी अपनी साम्यवादी निष्ठाओं को त्याग, अपने दरवाजे पूंजीवादी उद्यमों के लिए खोल दिए हैं. इसका उत्तर आसान है. समाजवाद केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं है. उसका अभिप्राय सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बराबरी को बढ़ावा देने वाले पूरी तरह लोकतांत्रिक-समानतावादी तंत्र से है. आर्थिक संसाधन किसी एक के हाथों में रहें अथवा सरकार के, उनका लोकोपकारी उपयोग तब तक असंभव है, जब तक लोक का उनपर वास्तविक नियंत्रण न हो. बहुसंख्यक के हितों की सुरक्षा का दायित्व किसी एक को सौंप देने के अनेक खतरे हैं. ऐसी व्यवस्था लंबे समय तक निरापद नहीं हो सकती. इसलिए चालीस वर्ष की उम्र में दार्शनिक सम्राट का समर्थन करने वाला प्लेटो पैंसठ का होते-होते दार्शनिकों के समूह को सत्ता सौंपने का समर्थन करने लगता है. व्यावहारिक रूप में यह असंभव है कि सभी लोग सभी दायित्वों का निर्वहन कर सकें. अतएव दायित्व-विभाजन अपरिहार्य हो जाता है, जिसके अंतर्गत शासन-व्यवस्था चुने हुए प्रतिनिधियों को सौंपने की अनुशंसा की जाती है. ऐसे निर्वाचित तंत्र की सफलता तभी तक संभव है, जब तक लोक यह न भूले कि वह अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से स्वयं शासित है तथा उसके प्रतिनिधि हर समय उसकी इच्छानुसार आचरण करने को बाध्य हैं. लोक को यह भी समझना चाहिए कि लोगों की इच्छाएं अस्थिर और परिवर्तनशील होती हैं. बदलती परिस्थितियों में उनमें परिवर्तन अवश्यंभावी है. समाज में समरसता और विकास की निरंतरता को बनाए रखने के लिए लोगों की इच्छाओं के बीच तालमेल की आवश्यकता प्रत्येक समाज में हर समय होती है. यह तभी संभव है जब वह सदैव जागरूक एवं चैतन्य बना रहे.

इस पुस्तक में एडम स्मिथ की मौजूदगी कुछ पाठकों को चौंका सकती है. लेकिन यहां उसे काफी सोच-विचार के बाद सम्मिलित किया गया है. यह तय है कि आधुनिक पूंजीवाद स्मिथ के विचारों से प्रेरणा लेकर खड़ा हुआ है. तो भी उसको पूंजीवाद का समर्थक नहीं कहा जा सकता. इस शब्द को जन्म ही स्मिथ के बाद हुआ. कुछ विद्वानों ने स्मिथ को पूंजीवाद के शब्द-मंत्र Laissez-faire का जन्मदाता माना है. यह शब्द भी उसकी पुस्तकों में सर्वथा अनुपस्थित है. बाजार और उत्पादकता के संबंधों की व्याख्या के लिए वह नए पद ‘अदृश्य हाथ’(इन्वीजिविल हेंड) का प्रयोग करता है. उसका मानना था कि बाजार में स्वतः अनुशासन की क्षमता होती है. बाजार की परमस्वातंत्रय की अवस्था उसे परमसमानता की ओर अग्रसर करती है. डेविड वार्समेन के साथ एक साक्षात्कार में नाम चाॅमस्की बड़े काम की बात कहता है—‘वह(एडम स्मिथ) अठारवीं शताब्दी के प्रबोधनयुग का महत्त्वपूर्ण विचारक है. उस समय तक पूंजीवाद का जन्म ही नहीं हुआ था. जिसे आज हम पूंजीवाद कहते हैं, सही मायने में उसने उसका तिरष्कार ही किया था.’ नोम चॉमस्की के अनुसार, ‘लोग स्मिथ को लेकर स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ाई जाने वाली बातों को लेकर राय बना लेते हैं. हर कोई ‘दि वेल्थ आ॓फ नेशन्स्’ के आरंभिक पैराग्राफ को पढ़कर निष्कर्ष निकाल लेता है, जिसमें उसने श्रम विभाजन को चामत्कारिक रूप से लाभकारी बताया है. जबकि इसी पुस्तक में आगे वह श्रम-विभाजन के पूंजीवादी सिद्धांत की आलोचना करता है. वह लिखता है कि श्रम-विभाजन मनुष्यता के लिए नुकसानदेह है. वह लोगों को इतना ज्यादा मूर्ख और लापरवाह बना सकता है, जितने वे बन सकते हैं. इसलिए किसी भी सभ्य समाज में सरकार को श्रम-विभाजन को एक सीमा तक ही मान्यता देनी चाहिए.’

पूंजीवाद ने आरंभ से प्रत्येक उपलब्ध ज्ञान, उसके हरेक अनुशासन का उपयोग निहित स्वार्थ के हित किया है. कभी वह विरोधी विचारों को अपना बनाकर प्रस्तुत करता है, तो कभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उनके समर्थन में उतर आता है. यह कार्य वह लोगों का व्यवस्था से अनुकूलन करने, उनके मन में यह विश्वास जाग्रत करने के लिए करता है कि वही सर्वाधिक हितैषी है. ध्यान रहे नियंत्रण-मुक्त उत्पादन अकेले पूंजीवादी उद्यमों की मांग नहीं है. सहकारी समितियां भी यही मांग करती रही हैं. छोटे से छोटा कारीगर भी उम्मीद करता है कि उसके काम में अड़चन न डाली जाए. उत्पादकता के हक में यह शर्त मान भी ली जाती है. फिर पूंजीवादी उत्पादन और समाजवादी उत्पादन तंत्र में क्या भेद है? अधिकतम लाभ के लिए पूंजीवादी उत्पादन श्रमिक से लेकर उपभोक्ता तक सभी का अवमूल्यन करता है. उसके लिए सामाजिक लाभ गौण होते हैं. दूसरी ओर समाजवादी संस्थान सामाजिक लाभों को भी पूंजीगत लाभ जितनी महत्ता देते हैं. उनके लिए उपभोक्ता की इच्छा का महत्त्व होता है, इसलिए उत्पाद और उत्पाद का चयन समाज की मूलभूत आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाता है.

एक अर्थशास्त्री के रूप में अधिकतम उत्पादकता के हक में स्मिथ ने जैसा सोचा, वैसा ही लिखा है. साथ में कार्य-विभाजन के खतरे भी गिनाए हैं. कुशल अर्थविज्ञानी की भांति वह उत्पादन तंत्र की कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिए सुझाव देता है. वह अर्थविज्ञानी है. न कि राजनयिक, जो सभी को संतुष्ट दिखने का नाटक रचा सके. अधिकतम उत्पादकता की अर्थ-वैज्ञानिकी का उपयोग जितना पूंजीवादी तंत्र के लिए जरूरी है, उतना समाजवादी उत्पादन तंत्र के लिए भी है. यह सरकार चलाने वालों की जिम्मेदारी है कि वे अधिकतम उत्पादकता और स्पर्धा के नाम पर उत्पादन एवं विपणन के क्षेत्र में एकाधिकार एवं अंध-स्पर्धा न पनपने दें. वे उत्पादकों को विवश करें कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कच्चे माल के शोधन के लिए अनुकूल तकनीक विकसित करें. लोगों की कार्यकुशलता में सुधार के लिए प्रशिक्षण दिलवाएं. जो सरकारें चलाते हैं, उनकी जिम्मेदारी दूसरों से कहीं बड़ी होती है. उनकी दायित्व है कि वे पूंजीपतियों से कहें कि वे कच्चेमाल, श्रम, तकनीक आदि का उपयोग ‘अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख’ की कामना के साथ करें. सरकार चलाने वाले केवल—‘ज्ञान ही शक्ति है’ पर न ठहर जाएं.बेकन ने इसके अलावा जो कहा था उसपर भी ध्यान दें—‘ज्ञान-विज्ञान और तकनीक का उपयोग जनसाधारण के कल्याण, उसके कष्टों को दूर करने के लिए किया जाना चाहिए.’ सरकार को ब्लैंक का वह कथन भी याद रखना होगा, जिसके अनुसार सरकार का कर्तव्य है—‘हर व्यक्ति से उसकी क्षमता के अनुरूप काम ले और उसकी जरूरत के अनुसार भुगतान करे.’ इसलिए उसे चाहिए कि जीवन की सामान्य आवश्यकताओं तथा श्रम के बीच स्पर्धा हरगिज न पनपने दे. सरकार का यह भी कर्तव्य है कि वह जेफरसन और थामस पेन की सुने और मानवाधिकारों की रक्षा करे. कुछ ऐसा करें जिससे मनुष्य अपनी स्वतंत्रता में स्वच्छंदता का आनंद ले सके. शासन-प्रणाली को इतनी भारी-भरकम न बनाए कि वह मनुष्य के मूल-भूत अधिकारों का ही हनन करने लगे. यहां थोरो उसका मार्गदर्शक बन सकता है—‘सरकार वही भली है जो शासन बिलकुल न करे’.

लियोनार्दो दा विंसी को लेकर भी कुछ विद्वान आपत्ति कर सकते हैं, किंतु हमें याद रखना चाहिए कि समाजवादी विचारधारा का विकास एक साथ नहीं हुआ है. यदि सामंतकालीन व्यवस्थाओं की बात करें तो उसमें समाज के सुख-संसाधनों पर मुट्ठी-भर लोगों का अधिकार होता था. शेष लोगों को भाग्य के भरोसे जीने के लिए विवश कर दिया जाता था. स्वयं सुख-संपन्नता में आकंठ डूबे मुट्ठी-भर लोग दूसरों को त्याग का उपदेश देते रहते थे. भौतिक सुखों को लेकर लोगों के मन में अजीब किस्म की कुंठा समाई होती थी. इसलिए सुधारवादी आंदोलनों का आरंभिक ध्येय था, धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से सर्वथा मुक्ति तथा सुख में साधारणजन की हिस्सेदारी बढ़ाते हुए उसको लेकर समाज में व्याप्त भ्रांत धारणाओं का समाधान करना था. लियोनार्दो ने यह कार्य एक कलाकार के रूप में किया. जिस समय कला का काम केवल देवालयों तथा राजदरबारों और सामंतों की हवेलियों की शोभा बनना था, लियोनार्दो ने ‘मोनालिसा’, दि बैपटिस्ट’ जैसे दर्जनों चित्र बनाए. उनमें अतिसाधारण चरित्रों को लाकर विंसी ने लोगों की इस भ्रांति को तोड़ा. आमजन के प्रति उसकी संवेदना उसकी रचनाओं से झलकती है, जो संख्या में कम होने के बावजूद महत्त्वपूर्ण हैं…..

अंत में बाबा चाणक्य के कथन को दोहराते हुए कि शास्त्र अनंत हैं, विद्याएं ढेरी सारी, समय अल्प और विघ्न हजार. ऐसे में जो सारभूत है वही वरेण्य है. जैसे हंस दूध को पानी से अलग करके पी जाता है.

अनन्तशास्त्रं, बहुलाश्च विद्याः, अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
यद्सारभूतं तदुपासनीयम्, हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्।।

ओमप्रकाश कश्यप

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