जनसंस्कृति एवं न्याय

धर्म एवं अभिजन संस्कृति—11

न्याय की संकल्पना इतनी नैसर्गिक और मनुष्यता की इतनी सार्वभौमिक, सार्वजनीन चाहत है कि इसका स्थान सभी कानूनों, दलों तथा धर्मों से ऊपर दिखाई पड़ता है.वाल्तेयर.

जब सभी स्वतंत्र हैं, अधिकारों के मामले में एकदूसरे के बराबर हैं, एक ही मिट्टी में जन्मे, एक ही हवापानी पाकर पले हैं, तब समाज में इतनी विषमताएं क्यों हैं? यदि एक ओर करोड़ों ‘स्वतंत्र’ नागरिक भीषण विपन्नता का जीवन जीने के लिए विवश हैं, तब दूसरी ओर कुछ सौ या हजार लोगों को धनवैभव, विलासिता और अकूत सुखसमृद्धि से भरपूर जीवन जीने का अवसर कैसे मिल जाता है? यदि सामाजिक असमानता कड़वा सच है, और निस्संदेह वह है भी, क्योंकि एकदम साफ नजर आता है, तो स्वतंत्रता और समानाधिकारिता के दावों को संद्धिग्ध होना ही चाहिए. साफ है असमानता के शिकार करोड़ों नागरिक जिसे अपनी स्वतंत्रता मानते हैं, वह दरअसल यथास्थिति में बने रहने, मूक सहते जाने और जो, जैसा, जितना दिया गया हैउसी में संतोष करने की स्वतंत्रता है. सच कहें तो आभासी स्वतंत्रता. उसका मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त असमानता को लेकर उठने वाले प्रश्नों को टालते रहना है. ताकि वर्चस्वकारी सत्ताओं के स्वार्थ और शोषणकारी चरित्र पर कम से कम सवालात हों. उससे आगे यदि वे कामना करें तो यह आधीअधूरी स्वतंत्रता भी, जिसे इससे पहले हमने आभासी स्वतंत्रता कहा है, खतरे में पड़ सकती है. वरना यह क्या हुआ कि श्रम किसी का, मूल्यांकन कोई और करे. पसीना मजदूर बहाए और मुनाफा मालिक की जेब में चला जाए. और क्या यह स्वतंत्रता और समान अधिकारिता का लक्षण है कि जमीन किसान की, फसल उसके खूनपसीने की कमाई, अनाज की बोली सरकार या व्यापारी लगाएं! यदि यही स्वतंत्रता है तो ऐसी स्वतंत्रता के बारे में सोचना भी भद्दे मजाक जैसा है. लेकिन यह भी कटु सत्य है कि असमानताग्रस्त समाजों में, जहां निर्णय ऊपर से थोपे जाते हैं, आम आदमी के हिस्से महज आभासी स्वतंत्रता ही आती है—या यूं कहो कि स्वतंत्रता का कंकाल, अथवा पुरानी किस्सागोइयों में बंद तोता, जिसकी जान किसी राक्षस अथवा चालाक जादूगरनी की मुट्ठी में होती थी. असमानताग्रस्त समाजों में व्यक्ति राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होता है. मानसिक स्तर पर दास. दासता भी इकहरी नहीं, बहुरूपी और बहुआयामी. आस्था में डूबा हुआ एक व्यक्ति मंदिर जाता है. जिस आरती को पुजारी गाता है, उसे वह घर पर सुबहशाम संपूर्ण श्रद्धा और भक्तिभाव से गाता है. जिस दुकान से पुजारी मंदिर के लिए धूपदीपनैवेद्य आदि खरीदता है, उसी से वह श्रद्धालु भी घर में अपनी आस्था को खादपानी देता है. ईश्वर के बारे में पुजारी और भक्त दोनों के विचार भी समान हैं. दोनों उसे कणकण व्यापी और अंतर्यामी बताते हैं. बावजूद इसके उस व्यक्ति का पूजाधर्म मंदिर जाए बगैर संपन्न नहीं होता. मंदिर में पुजारी उससे सीधे पूजा का अधिकार छीन लेता है. देवता और भक्त के बीच मध्यस्थ बना पुजारी मंदिर की व्यवस्था में विशेषज्ञ है. क्यों? क्या यह अधिकार भक्तों ने उसे दिया है? शायद नहीं. यदि तथाकथित ईश्वर से मुलाकात ही पूजाअर्चना का एकमात्र अभीष्ट है तो हर भक्त उससे सीधे अथवा अपने प्रियजनों के साथ मिलना चाहेगा. जरूरी नहीं है कि पुजारी उसके प्रियजनों की सूची में सम्मिलित हो. पुजारी इन कर्मकांडों जो पीढ़ीदरपीढ़ी दोहराये जाते रहे हैं, और उन नैतिकतावादी कहावतों, बातचीत आदि जिन्हें समाज में लोग आपस में एकदूसरे से अकसर करते हैं, कुछ नया नहीं कह पाता. इसके बावजूद धर्म के मामले में उसका निर्णय अंतिम माना जाता है. यह बिना किसी गुण के स्वयंस्थापित विशेषज्ञता है, जिसकी जड़ें दो से तीन हजार वर्ष पुरानी हैं.

एक अन्य व्यक्ति है. समान अधिकारिता, स्वतंत्रता और बराबरी का दावा करते हुए, न्यायकामना के साथ वह प्रतिपक्षी को न्यायालय में चुनौती देता है. अपनी समस्या, मुकदमे की स्थितियों तथा अपनी व्यथा को जितनी प्रामाणिकता के साथ वह स्वयं अभिव्यक्त कर सकता है, वह दूसरों के लिए असंभव है. लेकिन अदालत के आगे उसके अनुभव की प्रामाणिकता और अभिव्यक्ति का कोई मोल नहीं. इसके बावजूद व्यक्ति को प्रेरित, कभीकभी तो बाध्य किया जाता कि वह सीधे अपना पक्ष प्रस्तुत करने के बजाय वकील की मदद ले. वही कहेबोले जैसी सलाह उसका वकील देता है. वकील के लिए प्रत्येक मुकदमा कानून की विशिष्ट धारा होता है. वह मुकदमे से जुड़े घटनाक्रम को ज्यों का त्यों बयान नहीं करता, बल्कि कानून की विभिन्न धाराओं के भीतर अपने हितानुकूल उसकी व्याख्या करता है. चूंकि एक सैद्धांतिक व्याख्या को दूसरी सैद्धांतिक व्याख्या आसानी से काट देती है, अतएव मामला सच की सुनवाई का न होकर कानूनी बहस तक सीमित हो जाता है. कहा जा सकता है कि सच को तोड़नेमरोड़ने अथवा उसको आवरण में प्रस्तुत करने की पहली प्रेरणा स्वयं को न्याय एवं कानून के संरक्षक होने का दावा करने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों की ओर से ही प्राप्त होती है. जनसाधारण देश के कानून को जानेसमझे, ऐसी कोई कोशिश सरकार अथवा अदालत द्वारा नहीं की जाती. यह व्यक्तिहित के नाम पर व्यवस्था को वर्गीय स्वार्थों के अनुकूल बनाए रखने का षड्यंत्र है, जो विशेषज्ञ संस्कृति की नींव पुख्ता करता है. अभिजन के मामले में स्थिति दूसरी होती है. उसकी समाजार्थिक हैसियत ही ऐसी होती है कि नियमकानूनों को अपने स्वार्थ के निमित्त इस्तेमाल कर सके. वह अदालत जाता है. कृपा बटोरने के लिए वकील स्वयं दौड़े चले आते हैं. यहां तक कि घर से ही उसका शिक्षणप्रशिक्षण आरंभ कर देते हैं. इसका उदाहरण पिछले दिनों तब देखने में आया जब एक मुकदमे में अनिल अंबानी को अदालत में गवाही देने हाजिर होना पड़ा. उस समय अदालत में मौजूद पक्षविपक्ष के वकील मामले को सुसंगत ढंग से रखने के बजाय अंबानी को प्रभावित करने में लगे थे. इतना कि खिन्न होकर जज महोदय को उन्हें टोकना पड़ा. मजे की बात यह है कि अरबों डालर का व्यवसाय संभालने वाले अंबानी तथा अगले दिन उसी न्यायालय में पहुंची उनकी पत्नी को मुकदमे से संबंधित कोई तथ्य याद नहीं था. यहां तक कि उस कंपनी का नाम भी वह भुला चुके थे, जिसका उन्होंने कुछ ही वर्ष पहले स्पेक्ट्रम की खरीद के लिए गठन किया था. यह उदाहरण अकेला नहीं है. ऐसे अनेक मामले हैं जिनमें अर्थशक्ति एवं राजनीतिक हैसियत के अनुसार अदालतों को दबाव में लाने की कोशिश की जाती है. अपवादस्वरूप कुछ निर्णय ऐसे भी होते हैं जब अभिजन शक्तियों के सारे दांवपेच विफल हो जाते हैं, तथा न्याय एवं कानून को खेल समझने वाले अभिजन स्वयं उसके चंगुल में फंस जाते हैं. प्रायः यह मामले के सुर्खियों में आने के बाद ही हो पाता है. उस समय अपनी वर्चस्वकारी सत्ता को बचाए रखने के लिए अभिजन समुदाय अपने ही समूह के कुछ सदस्यों की बलि सहर्ष दे देता है. सामान्यतः उसका निर्णय जनाक्रोश की संभावनाओं को न्यूनतम कर, अपनी उच्च स्थिति को बनाए रखना होता है, जिसमें वह कामयाब भी होता है.

संस्कृतियों के द्वंद्व में विशेषज्ञ संस्कृति का जनसंस्कृति पर प्रहार हमेशा सीधा हो यह आवश्यक नहीं है. कई बार परोक्ष मार ज्यादा पीड़ाकर एवं दूरगामी प्रभाव लिए होती है. एक किसान जमीन से अपनी जरूरत की जिंस उगाना चाहता है. एकाएक वह पाता है कि जो वस्तु वह उगाना चाहता है, उसे सरकार ने राष्ट्रहित का हवाला देते हुए आयातकर से मुक्त कर चुकी है. आयातित जिंस किसान द्वारा उत्पादित जिंस से सस्ती पड़ती है. किसान यदि अब भी अपनी जिद पर अटल रहता है तो उसे अपनी बाकी जरूरतें पूरी करने में समस्या होगी. उस समय उसके पास एकमात्र विकल्प शेष बचता है कि जैसे भी हो, आयातित जिंस से काम चलाए और खेती को बाजार के हवाले कर दे. भले ही बाजार के मामलों में उसका अनुभव अपर्याप्त हो. आखिर बाजार इतना ताकतवर कैसे बन जाता है? उसके पास न तो नैतिकबल होता है न ही कानून बनाने का अधिकार. बाजार के दूसरे छोर पर ग्राहक होता है. बाजार का सारा कारोबार उसके ग्राहक के कंधों पर टिका होता है. होना तो यह चाहिए कि अपने संख्याबल के आधार पर ग्राहक स्वयं बाजार को नियंत्रित और दिशानिर्देशित करें. मगर होता इसके विपरीत है. बाजार की दिशा निर्धारित करते समय ग्राहक एकदम अलगथलग पड़ जाता है. यह हैरानी की बात है कि बाजार को उत्पादन की दिशा तय करने की प्रेरणा ग्राहकों से नहीं मिलती. यह प्रेरणा उसे अभिजन समूहों के लालच, उनकी धनसंपदा, वैभवविलास तथा स्वयं पूंजीपतियों के एकाधिकारवादी द्रष्टिकोण से मिलती है, जो कम से कम समय और न्यूनतम लागत में अधिकतम सुखसुविधाएं, पदप्रतिष्ठा और मुनाफा बटोर लेना चाहते हैं. इसके लिए वे ग्राहक का उपभोक्ताकरण करते हैं, सरकार का कारपोरेटीकरण. परिणामस्वरूप पूंजी का घोड़ा बेलगाम दौड़ने लगता है. यह तब होता है जब निर्वाचित सरकार अपने समस्त कानून लोकहित के दावे के साथ, कथित रूप से आम आदमी को कल्याण को केंद्र में रखकर बनाती है. कानून बनने के साथ ही सरकार का अभिजन वर्ग के प्रति विशेषानुराग स्पष्ट हो जाता है. सरकार के साथ होने का भरोसा पाकर सत्ताधारी अभिजन अपने संवैधानिक दायित्वों की ओर से उदासीन होने लगता है. शुरुआत नियमों और कानूनों की स्वार्थानुकूल व्याख्या करने से होती है. बाजार जिसके पास न तो नैतिक बल रहता है, न ही कानून की सत्ता. सरकार के परोक्ष समर्थन तथा प्रोत्साहन के बल पर वह लोगों की पसंदों को निर्धारित करने लगता जाता है. अपने ध्येय में सफल होने के लिए वह ज्ञानविज्ञान, कला, संस्कृति एवं संचार के समस्त उपादानों की आवश्यकतानुसार मदद लेता है. फिर अपनी बहुव्यापी पैठ के बूते राजनीति, अर्थव्यवस्था एवं कानून को भी अपने हिसाब से मोड़ने में कामयाब रहता है.

उपभोक्ता अधिकार जैसी कुछ व्यवस्थाओं द्वारा कभीकभी कानून भी बाजार की मनमानी के विरोध में उपभोक्ता के साथ खड़ा नजर आता है. उससे एक उम्मीद जगती है. किंतु पर्याप्त लोक निगरानी के अभाव में अंततः वह भी बाजार का हितचिंतक सिद्ध होता है. उपभोक्ता विवाद के दायरे में आने के पश्चात मामला सीधे उत्पादकउपभोक्ता अथवा वितरक और उपभोक्ता के बीच सिमट जाता है. इससे उपभोक्ता समूह पुनः दो हिस्सों में बंट जाता है. पहला वे जो अपने उपभोक्ता अधिकार से परिचित है और सेवा में खामी के लिए दोषी के विरुद्ध उपयुक्त न्यायालय में दावा करने का साहस जुटा पाते हैं. दूसरी ओर वे जो या तो उपभोक्ता अधिकार से अपरिचित हैं, अथवा उत्पाद में कमी को सहजतापूर्वक पचा जाते हैं. न्यायालय के ‘धक्के खाना’ उन्हें गवारा नहीं होता. तीसरा वर्ग उस उत्पाद से संतुष्ट उपभोक्ताओं का भी हो सकता है. भारत जैसे अशिक्षित समाजों में सेवा में कमी के बावजूद उपभोक्ता विवाद को न्यायालय तक ले जाने वाला वर्ग बहुत छोटा, करीबकरीब नगण्य होता है. असंतुष्ट उपभोक्ताओं के उस छोटेसे वर्ग को संतुष्ट करना, पूंजीपति वर्ग के लिए कठिन भी नहीं होता. इससे उनका न्याय की प्रतिष्ठा का दावा पुष्ठ होता है, जिससे उन्हें अपनी शाख बनाने में मदद मिलती है. दूसरी ओर सरकार इसे दो पार्टियों का विवाद बताकर बड़ी आसानी से अपना दामन बचा ले जाती है. निर्माण की खामी आने के बावजूद अदालत केवल न्यायालय में फरियाद देने वाले को राहत देकर संतुष्ट हो जाती है. ऐसे उपभोक्ताओं, जिन्होंने समान बैच का उत्पाद खरीदा था, किंतु अपनी अज्ञानता, लापरवाही, उदासीनता या किसी अन्य कारण से अदालत का दावा खटखटाने में असमर्थ रहे हैं, उन्हें राहत पहुंचाने का कोई प्रबंध अदालत अथवा सरकार द्वारा नहीं किया जाता. जबकि अदालत की भले ही न हो, राज्य की यह जिम्मेदारी है कि अपने प्रत्येक नागरिक के लिए उसकी मांग के बिना भी न्याय की व्यवस्था करे. जागरूक उपभोक्ता के लिए भी अदालत में न्याय पाना आसान नहीं होता. अपनी आर्थिक ताकत के बल पर बाजार पहले विशेषज्ञों तथा विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों को अपने पक्ष में खड़ा कर लेता है. फिर उनके बूते जनसाधारण के जीवन में मनमाना हस्तक्षेप करने की ताकत भी पा लेता है.

जीवन में बाजार की घुसपैठ के और भी कई उदाहरण हैं—एक स्त्री है जो आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में घरेलू कारखाना लगाना चाहती है. वह काम शुरू करती है. सहसा उसको बताया जाता है कि जो वस्तु वह बना रही है, उसका उत्पादन क्षेत्रीय उत्पादननीति के तहत निषिद्ध है. अब उद्यमी बनने की चाहत रखने वाली स्त्री के पास एकमात्र विकल्प है. अपने हुनर को किनारे रख क्षेत्रीय उत्पादन नीति के अनुसार योजना बनाए, अथवा ऐसे उत्पादन क्षेत्र में जाकर कार्य करे, जहां उसकी अनुमति हो. तीसरा विकल्प यह भी हो सकता है कि अपना कारखाना लगाने का मोह त्यागकर किसी कारखाने में नौकरी कर ले. वहां मालिक के लाभ के लिए अपने हुनर को आजमाए. इनमें अंतिम विकल्प सबसे आसान और कम चुनौतीपूर्ण है. हालांकि उसमें शोषण की सर्वाधिक संभावनाएं हैं. यह भी जरूरी नहीं कि नौकरी करते हुए स्त्री अपनी कला और उद्यमशीलता का भलीभांति परिष्कार कर, आत्मतुष्टि हासिल कर सके. लेकिन उन सभी के लिए जो आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में अपने परिवार से, समाज और खुद से संघर्ष करतेकरते थक चुके हैं, यही अंतिम विकल्प शेष रह जाता है. विवश होकर व्यक्ति को उसी के लिए तैयार होना पड़ता है. यानी एक व्यक्ति जो आत्मनिर्भर और स्वावलंबी होने का इरादा रखता था, वह परिस्थितियों जो जानबूझकर समाज के विशिष्ट वर्गों को लाभ पहुंचाने के लिए पैदा की गई हैं, के चलते वर्चस्वकारी ताकतों के समक्ष घुटने टेकने को विवश हो जाता है. आशय है कि आम आदमी जिसे अपनी आजादी समझता है, वह उसकी आजादी नहीं होती. उसकी स्वतंत्रता बाबू की फाइलों, व्यापारी की तिजोरियों तथा नेताओं की खुदगर्जी में कैद रहती है. उसी के चलते मुट्ठीभर अभिजन बहुसंख्यक सामान्यजन को अपने स्वार्थ के अनुरूप निर्णय लेने को विवश करते रहते हैं. उसकी पसंदों को अपने स्वार्थ की दिशा मे मोड़ देते हैं. वही तय करते हैं कि सामान्य जन का निर्णय कितना उपयोगी है, कितना नहीं. या उसने जो श्रम किया है उसका क्या मोल होना चाहिए. ऐसी व्यवस्था विधि के शासन द्वारा मान्य होती है. इसी की ओट में वह अपने समर्थन में अभियान चलाने में सफल हो जाती है. यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि विधि का निर्माण मुख्यतः अभिजनों द्वारा अभिजन हितों की देखभाल के लिए किया जाता है.

लोकहित का दावा करने वाली सरकारें किस तरह अभिजन हित में काम करने लगती हैं, इसके अनेक उदाहरण हैं. एक पूंजीपति जब कारखाना लगाता है तो सरकार उसके लिए रियायतों की तिजोरी खोल देती है. सस्ती जमीन, सस्ते ऋण, करमुक्त आयातित मशीनों से लेकर वर्षों तक मिलने वाली कर छूट आदि. इसके लिए पूंजीपति भरोसा दिलाता है कि वह अमुक संख्या में रोजगार देगा. उससे राष्ट्र की सकल आय में वृद्धि होगी. निर्यात बढ़ेगा आदिआदि. नए रोजगार सृजन के आश्वासन के बाद जनता भी मान लेती है कि उससे समृद्धि का ऊपर से नीचे की ओर निस्सरण होगा. अर्थशास्त्री पूंजीवाद को आदर्श बतानेवाली ट्रिकिल डाउन थ्योरी के बहाने सरकार की हर नीतिअनीति का समर्थन करने लगते हैं. किसान जिन्होंने अपने पूर्वजों की जमीन कारखाने के लिए सौंपी थी, वे सपना देखने लगते हैं कि कारखाना चलने से उनके बच्चों को बेहतर रोजगार मिलेगा और वे बेहतर जीवन जो खेतीकिसानी की अनिश्चितता के चलते संभव नहीं था, जी सकेंगे. लेकिन जैसेजैसे समय बीतता है, पूंजीपति का असली रूप सामने आने लगता है. कारखाने में स्थिरता बनाए रखने के नाम पर सबसे पहले स्थानीय नवयुवकों की भर्ती पर पाबंदी लगा दी जाती है. दिखावटी घाटे और करचोरी का लंबा सिलसिला चलता रहता है. सरकार की मदद बटोरने के लिए नकली बैलेंस शीट बनवाई जाती है. किसानों को अनुदान, छूट, सस्ते ऋण के रूप में सहायता उपलब्ध कराने के नाम पर घाटे की बात करने वाली सरकारें पूंजीपतियों के लिए अपने खजाने और सुविधाओं के दरवाजे खोल देती है. शासनप्रशासन के समर्थन और सहयोग का भरोसा पूंजीपति को प्रोत्साहित करता है. इसी विश्वास के चलते वह अपने उत्पाद की खपत के लिए सुनियोजित कार्ययोजना बनाता है, जिसमें सबसे पहला हमला उपभोक्ता के दिमाग पर किया जाता है. जनसाधारण के पास भरणपोषण के लिए प्रायः अपना श्रमकौशल होता है. उसके मूल्यांकन के लिए भी वह दूसरों पर निर्भर करता है. रोजीरोटी की अनिश्चितता उसके आत्मविश्वास को चोट पहुंचाती है. उसे योजनाबद्ध आधार पर काम करने पर रोकती है.

बड़ा पूंजीपति दवाई का कारखाना लगाता है तो माल की खपत के लिए अस्पताल भी खुलवा देता है. वह डाक्टरों को प्रभावित कर उनसे मनचाहा काम लेता है. अपने पूंजीबल पर वह बाजार का कर्ताधर्ता और सर्वनियंता होता है. इस स्थिति में होता है कि अपने उत्पाद के दाम स्वयं निर्धारित कर सके. बाजार में हालांकि जनसाधारण के श्रमकौशल की भी पर्याप्त मांग होती है. लेकिन श्रमिक और पूंजीपति की स्पर्धा में मूलभूत अंतर होता है. पूंजीपतियों में लाभ को लेकर स्पर्धा होती है. प्रत्येक पूंजीपति अधिकतम लाभ की वांछा में दूसरे को मात देने पर तुला होता है. दूसरी ओर श्रमिक और कामगारों की स्पर्धा में सीधेसीधे उनका अस्तित्व दांव पर होता है. अपनी एकमात्र पूंजी श्रम के निवेश से श्रमिक को बस इतना मिल पाता है कि किसी प्रकार अपना और अपने परिवार का भरणपोषण कर, अगले दिन के श्रम के लिए तैयार हो सकें. अपने मुनाफे के लिए दूसरे के साथ गलाकटाऊ प्रतिस्पर्धा करने वाले उद्योगपति श्रम के मूल्यांकन को लेकर एकमत होते हैं. एकजुट होकर वे शोषण की एकसमान नीति अपनाते हैं. उनकी एकता के चलते श्रमिक को झुकना पड़ता है. मजदूरी के रूप में बंटने वाली धनराशि को मुनाफे में बदलने के लिए पूंजीपति तकनीक के स्वचालीकरण पर ज्यादा से ज्यादा खर्च करता है. विशेषज्ञ अभिजनों के सहयोग के बल पर वह कामयाब भी होता है. दूसरी ओर मजदूर और कामगार वर्ग की स्वतंत्रता पूंजीपतियों के यहां गिरवी रखी होती है. उसके लिए न्याय बगैर ‘अभिजन कृपा’ के आगे नहीं बढ़ पाता. सरकार पूंजीपति को अधिकार देती है कि वह अपने उत्पाद को दुनिया की किसी भी मंडी में बेचे. अवसर मिले तो निर्यात भी करे. निर्यात पर प्रोत्साहन सुविधाएं भी उसे सरकार की ओर से प्राप्त होती हैं. किंतु किसान को अपने उत्पाद की बिक्री के लिए सरकार की शर्तों का अनुपालन करना पड़ता है. उनका उल्लंघन अपराध की श्रेणी में आता है. दमन की ऐसी घटनाएं कभीकभी जनक्रांति की उत्प्रेरक सिद्ध होती हैं. ये जनता को विरोध का ठोस आधार प्रदान करती हैं. सभ्यताओं के इतिहास से परिचित लोग जानते हैं कि ‘जनमत के आगे घुटने टेक देना अभिजन सरकारों की विशेषता होती है.’ इसलिए वे यह भी जानते हैं एक किसान यदि सरकारी मोल पर अनाज बेचने से इन्कार कर दे तो सरकार उसकी ओर सामान्यतः ध्यान न देगी. किसी इलाके के किसान अनाज बेचने से इन्कार कर दें तो वह बगावत कही जाएगी. सरकार वहां बल प्रयोग द्वारा, राष्ट्रहित एवं कानून का हवाला देते हुए किसानों को अपनी शर्तों पर अनाज बेचने के लिए विवश कर सकती है. हालांकि यह तभी संभव है जब किसान बंटे हुए हों. उनके बीच हितों को लेकर मतभेद हों. यदि किसी एक प्रदेश या देशभर के किसान अपने हितों को देखते हुए सस्ते मोल अनाज न बेचने का निर्णय ले लें तो वह क्रांति होगी. दूसरे शब्दों में जिसे क्रांति कहते हैं, वह हितों के सामान्यीकरण और अनुचित निर्णय के आगे, चाहे वह सरकार का हो अथवा किसी और शक्तिशाली वर्ग का, न झुकने तथा उसके संगठित प्रतिरोध के रूप में सामने आती है. उसके लिए बलप्रयोग आवश्यक नहीं है. बल्कि अहिंसक क्रांतियां अधिक प्रभावकारी एवं दीर्घजीवी सिद्ध होती हैं. उनमें अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है, किंतु उनका परिणाम भी उतना ही सुदीर्घ एवं बहुआयामी होता है.

विकृत लोकतंत्रों, यानी ऐसे लोकतंत्रों में जहां सामूहिक चेतना व्यापक लोकहित के बजाय धर्म, जाति, क्षेत्र, संप्रदाय, जमीनजायदाद, बाहुबल आदि से प्रभावित होती है, सरकारें दिखावे के लिए आमजन के मताधिकार से बनती हैं. असल में वे अभिजन द्वारा, अभिजन हित के लिए बनीं, अभिजन सरकारें होती हैं. जनता की फूट और अज्ञान का लाभ उठाकर स्वार्थी तत्त्व सत्ताशिखर तक पहुंच जाते हैं. ऐसी सरकारें अपने नागरिकों के साथ पक्षपातपूर्ण ढंग से पेश आती हैं. संवैधानिक प्रक्रियाओं को उत्तरोत्तर जटिल बनाकर वे आमजन तथा सरकार के बीच की दूरी को बढ़ाती रहती हैं. परिणामस्वरूप विशेषज्ञ संस्कृति को प्रोत्साहन मिलता है. विशेषज्ञ यूं तो जनता के बीच से ही उभरकर आते हैं, किंतु विशिष्टताबोध के मारे वे स्वयं को आमजन से ऊपर समझने लगते हैं. सरकार चुनते समय जनता की अपेक्षा होती है कि निर्वाचित सदस्य उसके सामान्य सपनों को सच करने के लिए उपयुक्त कदम उठाएंगे. किंतु सरकार बनते ही निर्वाचित सदस्यों की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं. आमजन की इच्छाआकांक्षाओं को समझकर उनके लिए समुचित प्रयास करने के बजाय वे अपनी इच्छाएं समाज पर लादने लगते हैं. जनसाधारण के मनोभावों को समझने के बजाय वे उसे समझाने में ज्यादा यकीन करते हैं. इस कार्य में भी उनकी सफलता संद्धिग्ध होती है. क्योंकि अतिबौद्धिकता के दबाव में उनकी भाषा आमजन की पहुंच से दूर निकलती जाती है. उसे समझना तथा उससे लाभान्वित होना आमजन के लिए अत्यंत कठिन होता है. इस समस्या को समझकर उसका निदान करने के बजाय अभिजन सत्ताधीश, जनसाधारण की राय को ‘साधारण’ कहकर उसकी उपेक्षा करने लगते हैं. यह मान लेते हैं कि साधारण मेधा सदैव साधारण बनी रहती है. अतएव ज्ञान के नए आविष्कारों को आमजन तक तत्काल पहुंचाने तथा उसका बौद्धिक परिष्कार करने की कोई कोशिश तक नहीं की जाती.

अभिजन बुद्धिजीवियों की अति बौद्धिकता निरुद्देश्य अथवा स्वयं स्फूत्र्त नहीं होती. यह प्रकारांतर में उनकी निष्ठा के खोखलेपन को ही उजागर करती है, जो लोककल्याण की आड़ में स्वार्थसिद्धि का आयोजन रचता है. इसलिए उन विचारों की अभिव्यक्ति हेतु जिन्हें वह लोकहितकारी मानता है, ऐसी भाषा का उपयोग करता है जो जनसाधारण के अनुभव तथा शैक्षिक स्तर से काफी ऊपर की हो. आमजन के लिए ऐसी भाषा को समझना तथा असमानता एवं भेदभाव के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ना बहुत कठिन हो जाता है. नतीजन न्याय उनके लिए निरंतर जटिल होता जाता है. उन्हें गफलत में देख शीर्षस्थ अभिजन अपने विशेषाधिकारों का उपयोग सीमित स्वार्थों के लिए करने लगते हैं. राज्य के इकतरफा आचरण से उसके गठन का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. न्याय के जनसामान्य के पहुंच से दूर होते ही राज्य की समस्त उपलब्धियां, धनसंपदा और सुखसाधन शीर्ष पर विराजमान अभिजन की इजारेदारी बन जाते हैं. एक समय ऐसा भी आता है जब कामयाबी के नशे में डूबे अल्पसंख्यक अभिजन को लगता है कि आगे उसकी यात्रा निर्विघ्न है. चुनौतियां समाप्त हो चुकी हैं. जनसाधारण भी लगभग मान लेता है कि अल्पसंख्यक अभिजन की मनमानी को सहते जाना ही उसकी नियति है. इस थोपे गए नियतिवाद को धर्म निरंतर हवा देता रहता है. वह बदलाव की संभावना को मृत्योपरांत स्वर्ग की लालसा तथा ईश्वरीय कृपा में बदल देता है. वर्तमान की दुर्दशा के लिए भाग्य और पूर्वजन्मों के कर्मों को जिम्मेदार ठहराकर वह लोगों के विचारकर्म की दिशा ही मोड़ देता है. इसके बावजूद शीर्षस्थ शक्तियों के षड्यंत्र तथा उनकी स्वार्थलिप्साओं के विरोध में जनमानस के बीच थोड़ीबहुत सुगबुगाहट शुरू से ही बनी रहती है. अनुकूल परिस्थितियों में वही सार्थक विरोध का रूप ले लेती है. यह बात अलग है कि छोटेछोटे समूहों में बंटे होने के कारण उसकी आरंभिक सफलता संद्धिग्ध रहती है. विशेषरूप से वैकल्पिक जनसंस्कृति के उदय तक. वैकल्पिक जनसंस्कृति लोकचेतना के स्वतंत्र विकास की वह अवस्था है, जब व्यक्तिमात्र को अपनी स्वतंत्रता की पूर्णानुभूति होने लगती है. वह किसी भी प्रकार के बाहरी दबावों और दखल से मुक्त होता है. इस अवस्था को स्थायी बनाने के लिए वह ऐसी जीवनपद्धति विकसित कर लेता है, जो उसकी स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता, निर्भीकता और सामूहिक संपन्नता को दर्शाती है. उस अवस्था में अल्पसंख्यक अभिजन की चालांकियां उजागर हो चुकी होती हैं. चैतन्य, विवेकवान, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और संगठित जनसमाज के मनमस्तिष्क में शासक और शासित का भेद समाप्त हो जाता है.

वास्तविक बदलाव की शुरुआत राज्य के स्वार्थपूर्ण आचरण की प्रतिक्रियास्वरूप नागरिकों के मन में पनपे अविश्वास से होती है. यह लोकतंत्र की ही विडंबना है कि जिस राज्य को नागरिक अपनी मर्जी से चुनते हैं, उससे शासित बनना स्वीकार कर राज्य की अधिसत्ता को संभव बनाते हैं, कालांतर में उन्हीं को राज्य की उपस्थिति खलने लगती है. राज्य तथा नागरिकों के बीच अविश्वास पनपने से लोग आहिस्ताआहिस्ता राज्य द्वारा बनाए गए कानूनों की ओर से उदासीन होने लगते हैं. चूंकि शीर्षस्थ अभिजन जिसपर कानून बनाने और उन्हें लागू करने की सर्वाधिक जिम्मेदारी होती है, स्वयं कानून के पालन के प्रति उदासीन और लापरवाह होता है, इसलिए उसके द्वारा बनाए गए कानून शेष समाज के लिए भी कोई आदर्श रह पाते. अभिजन की देखादेखी जनसाधारण भी कामना करता है कि उसके जीवन में राज्य तथा उसके द्वारा बनाए गए कानूनों का हस्तक्षेप न्यूनतम हो. राज्य अपना काम करे, वह अपना. अपनी स्वतंत्रता को वह स्वच्छंदता की सीमा तक भोग लेना चाहता है. चाहता है कि उसपर कोई बाहरी नियंत्रण न हो. कानून का सार्थक हस्तक्षेप वह तभी चाहता है जब सरकार कोई संस्था अथवा व्यक्ति उसके अधिकारक्षेत्र पर सवाल उठाता है; तथा कानूनी या गैरकानूनी तरीके से उसके आगे समस्याएं खड़ी कर देता है. दूसरे शब्दों में जब किसी व्यक्ति को अपने अस्तित्व अथवा अधिकारक्षेत्र पर संकट दिखाई पड़ता है, तब वह अपेक्षा करता है कि कानून अपने प्रभावी हस्तक्षेप द्वारा उसे संकट से उबारने की जिम्मेदारी निभाए. कानून को लेकर यह अविश्वास या दुराव कमोबेश प्रत्येक नागरिक के मन में होता है. लोग आमतौर पर यह भी चाहते हैं कि राज्य द्वारा बनाए गए कानून भी प्रभावी हों, मगर उनके प्रति कानून बनाने वाले भी उतने ही उत्तरदायी हों, जितनी वे सामान्य नागरिकों से अपेक्षा करते हैं. किंतु जब वे देखते हैं कि समाज में अभिजन का चालचलन उसी के द्वारा स्थापित मापदंडों के विरुद्ध है, तब उनका कथित ‘कानून के राज’ से विश्वास उठने लगता है. समाज में कानून को लेकर द्वंद्व की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. लोग एक ओर जीवन में कानून का न्यूनतम हस्तक्षेप चाहते हैं. दूसरी ओर वे कामना करते हैं कि कानून इतना शक्तिशाली हो कि यदि कोई उनके हितों को नुकसान पहुंचाता है तो वह उनकी तत्काल रक्षा कर सके. आशय है कि सामान्य दिनचर्या में कानून के हस्तक्षेप को अनावश्यक मानने तथा उसको बोझ की तरह देखने वाले लोग भी अपने हितों की सुरक्षा हेतु कानून और न्याय की दुहाई देने लगते हैं. यह समाज में बढ़ते अविश्वास और चरित्र के दुहरेपन को दर्शाता है. यह तब होता है जब शीर्षस्थ शक्तियों की निर्णयप्रक्रिया पर उनके स्वार्थ हावी हो जाते हैं. परिणामस्वरूप सत्तापक्ष के प्रति आमजन का विश्वास डिगने लगता है. इसके साथ ही लोगों का ध्यान कानून के सकारात्मक पक्ष से हटकर उसके निषेधात्मक पक्ष पर केंद्रित हो जाता है, जो कानून का पालन करने के बजाय उससे बचने के लिए प्रेरित करता है. यह प्रवृत्ति राष्ट्र और समाज दोनों के प्रति उदासीनता का माहौल तैयार करती है. आम आदमी को लगता है कि शासनप्रशासन के स्तर पर उसकी समस्याएं सुनी नहीं जा रही हैं. वहीं शासनप्रशासन जनसंख्या में वृद्धि, सामाजिक अंतर्द्वंद्व, संसाधनों की कमी, अशिक्षा, उद्यमशीलता का अभाव आदि का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारियों को वापस जनसमाज पर थोपने लगते हैं. लोकतांत्रिक परिवेश का लाभ उठाकर कभीकभी जनसमाज भी आगे बढ़कर शासन में हस्तक्षेप की योजनाएं बनाता है. किंतु राजनीतिक अनुभव का अभाव, आपसी तालमेल की कमी, जीवन की मामूली सुविधाओं के लिए बड़ेबड़े संघर्ष उसे तात्कालिक जरूरतों से आगे बढ़कर सोचने का अवसर ही नहीं देते.

कभीकभी यह भी होता है कि लोकतंत्र की खूबियों का लाभ उठाकर जनसाधारण के वास्तविक प्रतिनिधि चुनकर संसद तक पहुंच जाते हैं. आरंभ में उनकी वर्गीय निष्ठाएं प्रबल होती हैं. जिस संकल्प को लेकर वे संसद तक पहुंचे हैं, उसे जल्दी से जल्दी पूरा कर लेना चाहते हैं. लेकिन उनकी आगे की यात्रा भी आसान नहीं होती. संसद में उनका सामना, अभिजन वर्ग के अनुभवसिद्ध प्रतिनिधियों से होता है. आमूल परिवर्तन के लक्ष्य, जिसके लिए उनके समाज ने उन्हें निर्वाचित किया है, को प्राप्त करने के लिए जनसाधारण के वास्तविक प्रतिनिधियों को यथास्थितिवादी अभिजात्य प्रतिनिधियों के सहयोग एवं समर्थन की अपेक्षा होती है. उल्लेखनीय है कि साधारणजन संसद के बाहर भले ही बहुमत में हो, संसद में उसके चुने हुए प्रतिनिधि अभिजात वर्ग का ही प्रतिनिधित्व करते हैं. अभिजात प्रतिनिधियों के बीच जनसाधारण के वास्तविक प्रतिनिधि अपने समूह की वांछाओं को केवल अपने बल पर पूरा करने में असमर्थ होते हैं. इस बीच संसद के अभिजात्य प्रतिनिधि जनसाधारण के सच्चे प्रतिनिधियों का अनुकूलन करने में जुटे रहते हैं. उन्हें बारबार यह एहसास दिलाया जाता है कि वे अपने वर्ग और बिरादरी को बहुत पीछे छोड़ आएहैं, अब वे विधायिका के लिए चुने गए सदस्यों की बिरादरी के सम्मानित सदस्य हैं. इसलिए उनका आचरण भी उनके पद की गरिमा के अनुकूल होना चाहिए. चूंकि शासनप्रशासन दोनों का परिवेश अभिजात मनोवृत्ति के अनुकूल होता है. अतः अकेले पड़ जाने का डर, जरूरत पड़ने पर समर्थन की लालसा जैसे कारण जनसामान्य के वास्तविक प्रतिनिधियों को उस वातावरण से तादात्म्य स्थापित करने के लिए प्रेरित करते हैं. उन्हें यह भी लगता है कि अपने समूह की आकांक्षाओं की पूर्ति संसद के बहुसंख्यक सदस्यों की अनुमति या समर्थन के बगैर असंभव है, इसलिए भी चाहेअनचाहे वह उनके करीब आने लगता है. जरूरत के समय अभिजन सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो, इसके लिए इच्छा अथवा अनिच्छा से भी, उन्हें विशुद्ध अभिजनहित के मुद्दों पर सहयोग करना पड़ता है. हालांकि उनमें से कुछ उसके अपने समूह यानी जनसाधारण के हितों के प्रतिकूल हो सकते हैं. संसद में अकेला पड़ जाने का डर, अभिजात्य प्रतिनिधियों का समर्थन प्राप्त करने की विवशता, विधायिकाओं में अल्पसंख्यक होने का एहसास, राजनीतिक अस्थिरता तथा संसाधनों पर प्रभुवर्ग के अधिकार को कानून का समर्थन—जैसे परोक्ष दबावों के बीच, जनसामान्य के प्रतिनिधि व्यवस्था में आमूल परिवर्तन को बहुत कठिन—यहां तक कि असंभव मानने लगते है. विपरीत परिस्थितियां अंततः उन्हें हताश कर देती हैं.

साफ है कि लोकप्रिय राजनीति में पहले से ही पांव जमाए अभिजनों के बीच स्थान बनाने के लिए जनसाधारण को काफी संघर्ष और समझौतों से गुजरना पड़ता है. इस जद्दोजहद से बचने के लिए संसद में पहली बार निर्वाचित होकर पहुंचे अधिकांश जनप्रतिनिधि, अभिजन सदस्यों के अनुसरण की लीक अपना लेते हैं. बदलाव की उम्मीद छोड़कर वे अपने लोगों को वैसे ही बहलाने लगते है, जैसे दूसरे प्रतिनिधि. इस बीच उनका कार्यकाल भी पूरा होने के करीब होता है. पुनः जनसमर्थन हासिल करने के लिए उन्हें नए सिरे से चुनाव में उतरना पड़ता है. चूंकि अपने पहले कार्यकाल में वे जनाकांक्षाओं पर खरा उतरने में असमर्थ रहे हैं, इसलिए अपने मतदाताओं के कटु प्रश्नों से बचने के लिए उन्हें तरहतरह से बरगलाते और बहाने बनाते हैं. धीरेधीरे वे अभिजनवर्चस्व से युक्त उस लोकप्रिय राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं, जिसके विरोध में उन्होंने अपना राजनीतिक अभियान शुरू किया था. जनता की एकीकृत शक्तियों के कमजोर पड़ने से अभिजन वर्ग को मनमानी करने का अवसर पुनः मिल जाता है. माहौल का फायदा उठाकर वह व्यापक जनसमुदाय को बांट देता है. लोगों की प्राथमिकताओं को ऐसे बदल देता है, जिसका उनके विकास से दूर तक का संबंध नहीं होता. यही नहीं, संसाधनों की कमी का बहाना बनाकर वह जनसाधारण के बीच अस्तित्व की स्पर्धा को जन्म देता है, जिससे आम आदमी अपने ही संगीसाथी को संदेह की नजर से देखने लगता है. आशय है कि जनसाधारण के मतों के आधार पर शिखर पर पहुंचने वाले जनप्रतिनिधि भी प्रकारांतर में अभिजन हितों के संरक्षक सिद्ध होते हैं. इस बीच अभिजन अधिकतम को समेटने, बाजार पर छा जाने की कोशिशों में होता है. कानून, धर्म, राजनीति तथा पूंजी के साथ गठबंधन कर वह खुद को लगातार ताकतवर बनाता रहता है. वहीं जागरूकता एवं संगठन के अभाव में जनसाधारण, जिसे रोजमर्रा की जरूरतों के लिए अपने ही वर्ग के प्रतिनिधियों से कठिन स्पर्धा करनी पड़ती है, अभिजन के मुकाबले निरंतर पिछड़ता रहता है.

प्रत्युत्तर में कहा जा सकता है कि संविधान के अनुसार तो सभी बराबर हैं. सभी को समान मताधिकार है. जनादेश के लिए देश के राष्ट्रपति और साधारण नागरिक को एक ही कतार में देखा जा सकता है. फिर कैसे मान लिया जाए कि देश में लोकतंत्र दिखावटी और तत्प्रदत्त समानता आभासी है? यह भी क्यों स्वीकारा जाए कि सरकार पक्षपात करती है तथा अभिजन सामान्यजन की समाजार्थिक दुर्दशा एवं संकटों के लिए जिम्मेदार होते हैं? अभिजनों को नेतृत्व का अवसर इसलिए दिया जाता है कि वे बुद्धिसामर्थ्य में दूसरों से आगे होते हैं और दूसरों के विकास की जिम्मेदारी उठाकर एक प्रकार से वे समाज का ही भला करते हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि अभिजन बुद्धिसामर्थ्य में जनसाधारण से आगे तथा व्यवहारकुशल होते हैं. कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने की उनकी क्षमता भी अधिक होती है. अतएव प्राप्त अवसरों का उपयोग करते हुए वे दूसरों से आगे निकल जाते हैं. प्रकृति में भी उत्तरजीविता का सिद्धांत चलता है. वहां जो दूसरों से बलशाली है, जो अपनी सूझबूझ से प्राकृतिक चुनौतियों का सामना अधिक कुशलतापूर्वक कर सकता है, वही दीर्घजीविता को प्राप्त होता है. इस तर्क पर विश्वास किया जाए तो अभिजन वही प्राप्त करते हैं, जिसके वह योग्य हैं. योग्यता के आधार पर वे जो अर्जित करते हैं, वह उनका अधिकार है. ऐसे तर्कों का एकाएक खंडन संभव भी नहीं है.

खास बात यह नहीं है कि अभिजन बुद्धिसामर्थ्य, व्यवहारकौशल एवं शिक्षादीक्षा के मामले में जनसाधारण से काफी आगे होते हैं और इस कारण उनका आत्मविश्वास बहुत बढ़ा हुआ होता है. खास बात यह है कि श्रेष्ठत्व का दावा करते समय वे अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता और व्यवहारकुशलता का जिक्र तक नहीं करते. अपने बौद्धिक श्रेष्ठत्व पर वे न तो स्वयं चर्चा करते हैं, न ही जनसाधारण में उसे चर्चा का विषय बनने देते हैं. बजाए इसके वे ऐसे तर्क चुनते हैं, जिससे जनसाधारण ज्ञान की शक्ति से अपरिचित बना रहे. इस काम में धर्म, राजनीति और बाजार तीनों उसके मददगार होते हैं. धर्म अभिजन की शोषणकारी नीतियों पर पर्दा डालते हुए उसकी उपलब्धियों को ‘दैवी कृपा’ की श्रेणी में ले आता है. वह जनसाधारण को समझाता है कि उसकी समस्याओं की वजह उसकी अपनी गलतियां तथा आसपास के लोगों की ईष्र्या है. राजनीति उन्हें धर्म, जाति और क्षेत्रीयता के ऐसे मुद्दों में उलझा देती है, जिसका उनके विकास से कोई संबंध नहीं होता. वह जीवन की जटिल वास्तविकता को लोकप्रियता के उपादानों तक सीमित कर देती है, परिणामस्वरूप विकास के रास्ते की वास्तविक अड़चनों की ओर उनका ध्यान ही नहीं जा पाता. बाजार की निगाह में हर व्यक्ति पहले एक उपभोक्ता होता है. उसकी दृष्टि कभी भी अपने लाभ से आगे नहीं जाती. इसके चलते अभिजन विशेषज्ञ, जिन्हें उपर्युक्त तीनों का समर्थन प्राप्त होता है, अपनी उस छलपूर्ण स्थापना को समाज में बनाए रखने में सफल हो जाते हैं, जिसके अनुसार अपने जीवन की विसंगतियों, दुखों और अभावों के लिए आम आदमी को स्वयं जिम्मेदार माना जाता है. इससे जनसमूह के भीतर अविश्वास को बल मिलता है. दूसरे उनके भीतर चल रही अस्तित्व की स्पर्धा स्वाभाविक मान ली जाती है.

अपनी वर्गीय श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए अभिजन वर्ग द्वारा गढ़े गए तर्क प्रायः सुनने में बहुत सुंदर और तर्कसंगत प्रतीत होते हैं. ऐसे ही तर्कों के आधार पर शीर्षस्थ शक्तियां समाजीकरण का मूल रही, सहयोग की सहस्राब्दियों पुरानी भावना को स्पर्धा में बदलने में सफल हो जाती हैं. जैसे मजदूरी के संबंध में पूंजीवादी अभिजन का सामान्य तर्क, कानूनी रूप से मान्य, ‘अतिरिक्त कार्य के लिए अतिरिक्त मजदूरी’ के सिद्धांत पर टिका होता है—‘‘मान लीजिए दो मजदूरों को एक ट्रक पर कुछ बंडल चढ़ाने के लिए काम पर लगाया जाता है. मजदूरी तय कर दी जाती है—दस रुपये प्रति बंडल. अब एक मजदूर यदि बारह बंडल चढ़ा पाता है, जबकि दूसरा उतनी ही देर में पंद्रह बंडल चढ़ाने में सफल हो जाता है. ‘अतिरिक्त कार्य के लिए अतिरिक्त मजदूरी’ के सिद्धांत के अनुसार तो पंद्रह बंडल चढ़ाने श्रमिक को अधिक मजदूरी मिलनी ही चाहिए. श्रमकानूनी में भी यही वैध माना जाएगा. प्रथमद्रष्टया इसमें अनीति कहीं है ही नहीं. किए गए काम के अनुसार पहले को 120 रुपये मजदूरी मिलेगी, दूसरे को 150 रुपये. मजदूरों को भी इससे शिकायत न होगी. अनीति तो अधिक कार्य करने वाले को अतिरिक्त कार्य के लाभ से वंचित कर देना है.’ इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए वे कहेंगे—‘ईख के खेत में घुसे दो हाथियों में से एक सौ गन्ने खाता है, दूसरा एक सौ दस. तो यह उनकी क्षमता या आवश्यकता है. एक हाथी ज्यादा गन्ने खाने में सक्षम है तो इसका कारण है कि प्रकृति ने ही उसे ऐसा बनाया है.’’

ऐसे ही अनर्गल और आधारहीन तर्कों के आधार पर अभिजन बुद्धिजीवी मनुष्य की आभासी स्वतंत्रता को वास्तविक सिद्ध करने में सफल हो जाते हैं. वे इस तथ्य को जानबूझकर नजरंदाज कर देते हैं कि व्यक्ति की नैसर्गिक भिन्नताएं जो छोटे स्तर पर अस्तित्व की स्पर्धा को जन्म देती हैं, शीर्ष पर उन्हीं से विशेषज्ञ संस्कृति को पनपने का अवसर मिलता है. न्याय संगत यही है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसकी योग्यता और परिश्रम का पूरापूरा लाभ मिले. यदि कोई व्यक्ति सामाजिक संपदा की वृद्धि में स्वेच्छापूर्वक अधिक योगदान देता है तो समाज का भी कर्तव्य है कि उसे प्रोत्साहित करने के लिए जो भी उचित समझे कदम उठाए. प्रोत्साहन नकद पारिश्रमिक अथवा पुरस्कार के रूप में हो सकता है; अथवा किसी अन्य सम्मानित ढंग से भी. किंतु समाज की जिम्मेदारी मात्र इसी से पूरी नहीं हो जाती. बल्कि यह तो समाज की जिम्मेदारी और उसके औचित्य की कसौटी की शुरुआतभर है. समाजीकरण की पहली शर्त थी कि समाज अपनी सदस्य इकाइयों के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा. जो समाज का है, वह सबका होगा और जो सबका है, उसका लाभ समाज की प्रत्येक इकाई तक पहुंचाने की व्यवस्था समाज की ओर से की जाएगी. इसके पीछे सोचासमझा, व्यावहारिक दृष्टिकोण था. यह माना गया था कि हर व्यक्ति अपने गुण एवं स्वभाव में दूसरों से भिन्न होता है. उसकी रुचि के साथसाथ कार्यक्षमता भी दूसरों से अलग होती है. यह अंतर नैसर्गिक भले हो, मगर पर्याप्त अनुभव, प्रशिक्षण के माध्यम ये इसे आसानी से पाटा जा सकता है. यही समाजीकरण का मूल उद्देश्य भी रहा है. इसी के लिए व्यक्ति स्वेच्छापूर्वक समाज से जुड़ने को उत्सुक होता है तथा अपनी नैसर्गिक स्वाधीनता के बड़े हिस्से का बलिदान कर, सामाजिक मर्यादाओं में रहने को तैयार हो जाता है. अतएव समाज का कर्तव्य है कि वह अपनी इकाइयों के प्रति समानता स्थापित करने के लिए जो भी आवश्यक हो करे, न कि मनुष्य की नैसर्गिक भिन्नताओं को आधार बनाकर समाज में समाजार्थिक वैषम्य को बढ़ावा दे. पिछले उदाहरण की बात करें, जिसमें एक व्यक्ति अपनी शारीरिक सीमाओं के कारण मात्र 120 रुपये प्रतिदिन कमा पाता है, जबकि उतनी ही अवधि में दूसरा व्यक्ति 150 रुपये अर्जित करने में सक्षम है. ऐसे में समाज का दायित्व है कि उन कारणों का पता लगाए जो व्यक्ति की उत्पादकता को प्रभावित करते हैं, तथा समयानुसार उन्हें दूर करने की योग्यता भी बनाए. यही न्याय का वह रूप है जो किसी भी कल्याणकारी समाज में अपेक्षित होता है. इसके अभाव में समाज में असमानता पनपती है और अभिजन संस्कृति को बढ़ावा मिलता है. समानता के लक्ष्य की स्थापना केवल अभिजन की दया अथवा परोपकारभाव के द्वारा संभव नहीं है. सामान्यतः इसके दो लक्ष्य हो सकते हैं

. जनसंस्कृति अर्थात समावेशी आधुनिक संस्कृति की स्थापना.

. सामाजिक दायित्व के रूप में न्याय का संवितरण.

क्रमशः….

©ओमप्रकाश कश्यय

opkaashyap@gmail.com

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Filed under जनसंस्कृति एवं न्याय, धर्म और अभिजन संस्कृति, न्याय की अवधारणा

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