परिवर्तन का तीसरा मोर्चा

धर्म एवं अभिजन संस्कृति6

हर बार चुनावों के आते ही तीसरे मोर्चे के गठन की चर्चाएं गर्म हो जाती हैं. अखबारों में संपादकीय लिखे जाते हैं. चमचा लोग खबरें उगलने लगते हैं. फूली तोंद, चिकने चेहरे वाले नेताजी गले मिलकर फोटो खिंचवाने लगते हैं. लेकिन चुनाव आतेआते मामला टांयटांय फिस्स हो जाता है. मुद्दों के अकाल के बीच तीसरे मोर्चे के गठन की अफवाह फैलाना भी एक मुद्दा है. मूल्यविहीन राजनीति में, ऐसे अवसर कोई छोड़ना नहीं चाहता. कम से कम इसी बहाने चर्चा में आने और खुद को दूसरों से अलग सिद्ध करने का अवसर मिल जाता है. यह काम चुपकेचुपके और बड़ी शाइस्तगी के साथ किया जाता है. ‘हम उन जैसे नहीं हैं’, ‘हम उनसे अलग हैं’, ‘वे नेष्ठ, हम श्रेष्ठ.’ ऐसा दिखावा किया जाता है. सब अलगअलग अपनी ढपली अपना राग अलापते हैं, लेकिन आमनासामना होते ही अनजान बन जाते हैं. इसलिए कि उन्हें केवल मुद्दे उछालना आता है, सुलझाना नहीं. न ही सुलझाने की उनकी इच्छा होती है. चाहते हैं कि जनता हमेशा उनपर निर्भर बनी रहे. अपनी रीढ़ के बल कभी खड़ी न हो. छोटीसेछोटी समस्या के लिए उन्हीं की ओर देखे. अपने मकसद में वे प्रायः कामयाब भी हो जाते हैं. अनजान जनता भी नहीं है. वह जानती है कि लोकतंत्र की शुरुआत कहां से हुई थी; और आज वह कहां है? इस पतन के लिए जिम्मेदार लोगों को भी वह जानती है. बस लिहाज की मारी चुप बनी रहती है. इसमें सारा दोष नेताओं का भी नहीं है. उन्हें कंधों पर उठाकर संसद और विधानसभा तक पहुंचा देने वाली जनता भी उतनी ही दोषी है.

साफ है तीसरा मोर्चा खबर से आगे नहीं बढ़ पाता तो इसलिए कि उसके गठन कोशिश करने वाले नेताओं के मन में स्वार्थ भरा होता है. वे केवल राजनीति करते हैं. वरना इस देश में तीसरे मोर्चे के गठन की आवश्यकता हमेशा रही है. तब से रही है जब से आदमी ने राजनीतिक नजरिये से सोचना आरंभ किया था. आजादी के बाद तो उसकी तत्काल आवश्यकता थी. इसके लिए इच्छाशक्ति की कमी हमेशा रही. समस्या यह भी रही कि तीसरे मोर्चे के प्रभावी घटकों की पहचान कैसे की जाए! उसकी दार्शनिकी क्या हो! कौन हैं जो तीसरा मोर्चा गठित कर सकते हैं! उसकी आवश्यकता किसे है! कुछ लोग सुनकर कहेंगे, इसमें क्या कठिन है? तीसरे मोर्चे को पहले से मौजूद दो मोर्चों पर फतह पानी होगी. उनमें पहला मोर्चा सत्ताधारी दल कांग्रेस तथा सहयोगियों का है, दूसरा भाजपा और उसके सहयोगी दलों का. जो लोग दक्षिणपंथी विचारधारा के हैं वे भाजपा को अगला तथा कांग्रेस को पिछला स्थान दे सकते हैं. लेकिन जानने वाले जानते हैं कि भाजपा और कांग्रेस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. एक ही धातु, एकसमान अस्थिमज्जा से बने. जो काम भाजपा डंके की चोट करती है, कांग्रेस उसे अपने गठन के बाद से चोरीचुपके करती आई है. उनमें कोई अंतर है ही नहीं. एक बड़बोला है, दूसरा मनघुन्ना. तीसरा मोर्चा यदि इन्हीं दोनों दलों को अपनी चुनौती मान लेगा तो उलझकर रह जाएगा. वह लकीर पीटने से ज्यादा कुछ कर ही नहीं पाएगा. यदि तीसरे मोर्चे को सामाजिक परिवर्तन का वाहक बनना है! परिवर्तन के लिए आवाज उठाने के बजाय जमीनी काम करना है! तब उसे इन सबसे ऊपर उठकर सोचनाकरना पड़ेगा. उसकी व्याप्ति संस्कृति, समाज एवं राजनीति तीनों क्षेत्रों में एकसमान प्रभावी होगी. वह आर्थिक कार्यकलापों पर भी नजर रखेगा और लोकहित में जितना आवश्यक हो, उनपर उतना नियंत्रण भी रखेगा. यही तीन प्रमुख क्षेत्र मानवजीवन को प्रभावित करते हैं. तो फिर तीसरे मोर्चे के गठन की आधार संरचना क्या हो? वे कौनसे कारण हैं जो तीसरे मोर्चे के गठन को जरूरी बनाते हैं? इसे समझ लिया जाए तो तीसरे मोर्चे की जरूरत, उद्देश्य तथा उसकी भावी रूपरेखा साफ होने लगेगी.

मनुष्य आजाद जन्मा है. लेकिन वह हर जगह बेड़ियों में है.’ रूसो के इन शब्दों में लक्ष्य एकदम साफ झलकता है. यानी तीसरे मोर्चा के गठन का ध्येय होना चाहिए—मानवमात्र की अधिकतम स्वतंत्रता. यह स्वतंत्रता केवल बाहरी ही न हो. बल्कि ऐसा हो जिसमें व्यक्ति अपने कर्म और चिंतन के क्षेत्र में भी स्वतंत्र अनुभव कर सके. मानवमात्र की नैसर्गिक स्वच्छंदता में बस इतनी कटौती हो, जितनी समाज के गठन और उसको चलाने के लिए अपरिहार्य है. आप कहेंगे कि भारत एक स्वयंभू राष्ट्र है. और देश में लोकतंत्र है. ये दोनों ही देश और व्यक्तिमात्र की स्वाधीनता की सुरक्षा करने के लिए पर्याप्त हैं. आपका प्रतिवाद करने का मेरा कोई इरादा नहीं है. देश की स्वयंप्रभुता को लेकर भी मैं कोई सवाल नहीं करूंगा. बस कुछ बातें आपके समक्ष रखूंगा और निर्णय आपके ऊपर छोड़ दूंगा. तब शायद आप जान जाएं कि जिसे आप देश कहते हैं, जिसे एकराष्ट्र के विशेषण से नवाजते हैं, वह दरअसल मुट्ठीभर लोगों की इजारेदारी है. उसकी स्वयंप्रभुता सवा सौ करोड़ नागरिकों के बजाए कुछ लोगों तक सीमित है. उन्हीं के लिए वह सोचता, करता है. बाकी जनता तो नेताओं द्वारा भाषण पिलाने और आश्वासन बांटने के लिए है. क्या इसमें सारा दोष सरकार का है?

सबसे पहले मनुष्य की स्वतंत्रता को लेते हैं. ठीक है देश स्वतंत्र है. पर क्या इस स्वतंत्रता का लाभ उसके प्रत्येक नागरिक को प्राप्त है? क्या राजनीतिक स्वतंत्रता ही मनुष्य के लिए सबकुछ है? देश में आज जातिव्यवस्था है. मनुष्य के निजी मामलों में हस्तक्षेप न करने की आड़ में सरकार भी इसको स्वीकार कर चुकी है. सेना में जाति के नाम पर अलग रेजीमेंट हैं. धर्म उसको मजबूती प्रदान करता है. मनुष्य के व्यवहार में, सामाजिकव्यक्तिगत एवं राजनीतिक कार्यकलापों में, आपको इसके द्वारा पैदा की गई घोर असंगतियां और दुश्वारियां साफ नजर आएंगी. जाति एक ऐसा पट्टा है जो गर्भ से ही बच्चे के गले में डाल दिया जाता है. अजन्मे बच्चे के पिता का नाम भले ही किसी को मालूम न हो, किंतु उसकी जाति बीजदान के समय ही तय कर दी जाती है. फिर पूरा जीवन उन्हीं बेड़ियों में रहकर काटना पड़ता है. ऐसे बहुत से कार्य हो सकते हैं, जिन्हें बड़ा होने के बाद उसका विवेक अस्वीकार करता हो. फिर भी मजबूरी में उन्हें निभाना पड़ता है. जाति की जकड़न के आगे मानवाधिकार जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं भी बेअसर सिद्ध होती हैं. थोपे गए कार्यविभाजन में मनुष्य अनमने भाव से हिस्सा लेता है. परिणामस्वरूप काम की गुणवत्ता पर विपरीत असर पड़ता है. उत्पादन में गिरावट आने लगती है.

जाति से कहीं अधिक नुकसानदेह है, जाति—व्यवस्था को मानवनियति मान लेना. उसके बाद इस सड़ी हुई, प्रगति विरोधी व्यवस्था से अनुकूलन होने लगता है. मनुष्य समझौते पर उतर आता है. जातीय स्तरीकरण का ही कमाल है कि इसके निचले स्तर पर मौजूद व्यक्ति भी अपनी जाति को दूसरी जातियों से श्रेष्ठ दिखाने के बहाने ढूंढ लेता है. दरअसल यह नफरत की व्यवस्था है जो शीर्ष स्तर से शेष समाज पर थोप दी जाती है. ऐसा नहीं है कि इस व्यवस्था से केवल निचले क्रम पर मौजूद जातियों को हानि पहुंची हो. उन्हें तो ऊपरले वर्गों के अत्याचार और मनमानी के कारण नारकीय जीवन बिताना ही पड़ा है. इससे कथित ऊंची जातियों को भी कम नुकसान नहीं पहुंचा. बीसतीस पृष्ठ के गलेसड़े पत्रे को रट लेने, उसे जजमान के आगे पढ़ देने को कुछ लोग भले ही पांडित्य का प्रतीक मान लें, और फिर पूरा जीवन इसी भ्रम में क्यों न गुजार दें—लेकिन हम यदि इस देश के गत बारहतेरह शताब्दियों का इतिहास देखें, और यह भी कि इस अवधि में भारत की बौद्धिक उपलब्धियां लगभग अकालग्रस्त होकर शून्यसम हैं, तब हमें उपर्युक्त पांडित्य का खोखलापन सहज ही नजर आने लगेगा. थोडे़ सुख, स्वार्थ एवं अकर्मण्यता के चलते शीर्षस्थ वर्गों ने इसे अपनाया और खुद को एक लकीर पीटने वाली व्यवस्था के अनुसार ढाल लिया. इसका लाभ उन लोगों को मिला, जो एकाधिकारवादी थे. जो चालाकी और धूर्त्तता के दम पर सबकुछ हड़प लेना चाहते थे. उन्होंने धर्म, परंपरा, जाति, वर्ग आदि के नाम पर संसाधनों को कब्जाना जारी रखा. इसी स्वार्थी उच्चस्थ वर्ग ने अंततः असमानता की प्रतीक अभिजन संस्कृति को जन्म दिया.

शीर्ष स्तर पर विराजमान अभिजन संख्या में अल्पसंख्यक होकर भी बहुसंख्यक पर शासन करते हैं और तरहतरह की समस्याओं, उत्पीड़न, अनाचार, उपेक्षा, अवहेलना आदि से जूझ रहे बहुसंख्यक जनसमाज को, जिसे उनके कारण दुश्वारियों का शिकार होना पड़ता है, घृणा के साथ देखते हैं. चूंकि बहुसंख्यक जनसमाज अभिजन अल्पसंख्यक की ओर ललचाई दृष्टि से देखता है, इसलिए वह उसकी नफरत और घृणा को भी अपने आचरण में उतार लेता है. अभिजन अल्पसंख्यक के प्रति घृणा का सरेआम प्रदर्शन उसे अव्यावहारिक लगता है. अतः अपने अंतर्मन की घृणा जो उसने अभिजन अल्पसंख्यक से प्रेरणा के तौर पर प्राप्त की है, अपने ही जैसे उपेक्षित, वंचित एवं उत्पीड़ित लोगों के प्रति तरहतरह से फूटती है. बहुसंख्यक जनसमाज की एकता और विकास में यह सबसे बड़ी बाधा है. अपने ही जैसे लोगों से साथ स्पर्धा, विपन्नों के साथ रोजीरोटी के संघर्ष के बीच उनकी इंसानियत दांव पर लग जाती है. उनके लिए विकास बड़ा मुद्दा नहीं होता. कई बार तो उसका ख्याल तक नहीं आता, बस जीवनसंघर्ष से जैसेतैसे गुजरते जाने की हड़बड़ी बनी रहती है. इस कारण वे अपनी कार्यक्षमताओं का पूरा उपयोग करने में असमर्थ रहते हैं. वर्गीय हित की बात तो कभी सोच भी नहीं पाते. असमानताकारी व्यवस्था में अपने ही जैसे विपन्नों से स्पर्धा करते हुए वे जैसेतैसे अपने अस्तित्व को बचाने का प्रयास करते रहते हैं.

धर्म की स्थिति यहां ऐसे बिचैलिये की होती है, जो अल्पसंख्यक अभिजन और बहुसंख्यक जनसमाज दोनों का हिमायती बनता है. हालांकि वह स्वयं अभिजन अल्पसंख्यक समाज का ही हिस्सा होता है. किंतु खुद को बहुसंख्यक जनसमाज का सबसे बड़ा हितरक्षक होने का दावा करता है. वह बहुसंख्यक समाज को बताता है कि वे ईश्वर की सबसे प्रिय संतान हैं. कि एक ऊंट का सुईं के छेद से निकल पाना संभव है, लेकिन एक धनी व्यक्ति का स्वर्ग के दरवाजे को पार करना असंभव है. और इस जन्म में उसको जो अभाव, दुश्वारियां, कष्ट आदि सहने पड़ रहे हैं, उसके लिए कोई दूसरा व्यक्ति जिम्मेदार नहीं है. बल्कि उसके पूर्वजन्मों के कर्म रहे हैं. जिनका दंड उसे इस जन्म में भोगना पड़ रहा है. कि पूर्वजन्मों के कर्मफल को इस जन्म में धैर्यपूर्वक, ईश्वर को धन्यबाद देते हुए सह लेना ही अच्छा है. वरना बकाया दंड अगले जन्म में भोगना पड़ सकता है. कि पूर्वजन्मों के कर्मफल सह लेने के बाद, पूर्णतः पापमुक्त होने पर वह स्वर्ग का सुखोपभोग कर सकेगा. वहां ऐसे अलौकिक सुख मिलेंगे जो इस लोक में अल्पसंख्यक अभिजन के लिए भी दुर्लभ हैं. धर्म कर्मफल के सिद्धांत का सहारा लेकर अल्पसंख्यक अभिजन के अन्याय, उत्पीड़न, अनैतिकता एवं अनाधिकार को मान्यता प्रदान करता है. उनके मूल कारणों पर पर्दा डालकर वह व्यक्ति का ध्यान ऐसी दिशा की ओर मोड़ देता है जिसका उसके वास्तविक विकास से दूर तक का संबंध नहीं होता. तुच्छ प्रलोभनों में फंसा, छोटेछोटे समूहों में बंटा हुआ निराश, हताश, दिशाहीन बहुसंख्यक जनसमाज, धर्माचार्य के इन शब्दों पर आंख मूंद कर भरोसा कर लेता है. इस तरह धर्म असमानताकारी व्यवस्था का सबसे बड़ा समर्थक, तारणहार सिद्ध होता है. गरीबी अभिशाप है, लेकिन कई बार जहां उससे मुक्ति की संभावना दूर तक धूमिल हो, विपन्नता के शिकार लोगों के आक्रोश से बचने के लिए धर्म खुद को माहौल के अनुकूल ढाल लेता है. यह भी कह सकते हैं कि अपने धार्मिक विश्वासों को जिलाए रखने के लिए दीनहीन, सर्वहारा कंगाली के प्रतीकों से ही ईश्वरीय कृपा पाने का उद्यम करने लगते हैं. पुराने गंदेगले कपड़े से खुश हो जाने वाले गूदड़ पीर, बोतल के ढकन्न से बहल जाने वाले ढक्कन पीर, कंकड़ पीर, मामूली धागे से कृपा लुटाने वाले वाले धर्म स्थान ऐसे भ्रमों को जिलाए रखने में सहायक होते हैं.

तो तीसरे मोर्चे के गठन का सबसे पहला ध्येय यह होगा कि वह धर्म और उसके नाम पर की जा रही चालबाजियों से बहुसंख्यक जनसमाज को परचाए. सावधान करे, और जो लोग अज्ञानतावश उसके चंगुल में फंसे हुए हैं, उन्हें बाहर ले जाने का उद्यम करे. यहां कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है. वे कह सकते हैं कि धर्म मनुष्य की स्वयं को जानने की उत्कंठा का परिणाम है. मनुष्य की यह स्वाभाविक इच्छा होती है कि वह जीवन के बारे में जाने. यह वांछा भी आज की नहीं है. बल्कि सहस्राब्दियों से मनुष्य इस दिशा में सोचता रहा है. वे यह भी कहेंगे कि धर्म लोगों की जीवन प्रदाता शक्ति के प्रति स्नेह और सम्मान से उत्पन्न आस्था का नाम है. कि समाज को एकसूत्र में बांधने में धर्म की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है. कि धरती धर्म पर टिकी है. समाज में जो नैतिकता है, वह धर्म की ही देन है. और धर्म सामान्य नैतिकता का एकमात्र संबल है. उसके अभाव में समाज को एकसूत्र में बांध पाना कठिन हो जाएगा. उनके इस कथन में कुछ सचाई तो अवश्य है. मैं इसे स्वीकार करूंगा. इस संशोधन के साथ कि नैतिकता धर्म की चेरी नहीं है. बल्कि धर्म स्वयं लोगों के दिलों में पैठ बनाने के लिए नैतिकता का सहारा लेता है. धर्म के बिना भी नैतिकता कारगर है. वह कारगर रह सकती है, किंतु नैतिकता के अभाव में धर्म मरी हुई बिल्ली नजर आएगा. इसके बावजूद धर्म के धंधेबाज बौद्धिक जड़ता को समाज पर थोपने के लिए धर्म का सहारा लेते आए हैं. आस्था के नाम पर उन्होंने लोगों के विवेकीकरण की स्वाभाविक प्र्रक्रिया को ही अवरुद्ध कर दिया. उन्होंने अध्यात्म का इतना साधारणीकरण किया कि जिस काम में मनस्वी लोग अपना पूरा जीवन खपा देते थे, वह कुछ आरतियों, तंत्रमंत्र, कर्मकांड, मूर्तिपूजा तथा पंद्रहसोलह पृष्ठों की लुगदी पुस्तक में सिमटकर रह गया.

इसलिए मेरी समझ का परिवर्तनकामी मोर्चे का अगला मोर्चा वह होगा जो लोगों में धर्म, अध्यात्म और नैतिकता को अलगअलग करके देखने की योग्यता पैदा कर सके. उन्हें समझा सके कि अध्यात्म और नैतिकता की गति उध्र्वमुखी होती है. दोनों ही मनुष्य का परिष्करण चाहते हैं. अपनीअपनी तरह से ये उसके लिए समर्पित भी होते हैं. दोनों मनुष्य द्वारा प्रणीत हैं. नैतिकता जीवनमूल्यों की वह उच्चतम अवस्था है जो अनगिनत मनस्वियों ने लंबे अनुभव तथा विचारविमर्श के उपरांत मानवमात्र के कल्याण के निमित्त स्वीकार की है. अपने आदर्शरूप में नैतिकता सदैव लक्ष्य होती है. मनुष्य जितना उसके एक स्तर को प्राप्त करता है, तब वह कुछ और ऊपर उठ जाती है. नैतिकता की ओर मनुष्य की अविरत यात्रा, उसके शुभ के संकल्प को सार्थक एवं संभव बनाती है. अध्यात्म मनुष्य को जीवन और सृष्टि के रहस्यों को समझने की योग्यता प्रदान करता है. वह चिर जिज्ञासु और नित युवा है. उसकी शान तर्क में है, मतवैभिन्न्य में है. चीजों को गहराई से समझने में है. नैतिकता मनुष्य को दुनिया की सभी सत्ताओं से ऊंचा स्थान देती है. चरअचर के प्रति करुणा का भाव बनाए रखकर वह मनुष्य से मनुष्य को जोड़े रखने का माध्यम बनती है. बकौल वेदव्यास ‘न मानुषात श्रेष्ठतम् हि किंचित.’ कि ‘सृष्टि में मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है.’ इससे इतर धर्म दो मनुष्यों के बीच तीसरी सत्ता जिसका अस्तित्व ही अप्रामाणिक है, ले आता है. परिणामस्वरूप मनुष्य अनसुलझे भ्रमों में जीने लगता है.

अध्यात्म और नैतिकता से भिन्न धर्म की गति लोकोन्मुखी होती है. व्यवहार में वह लोगों की जीवनचर्या का हिस्सा होता है. समाज की धारा के साथ सहज रूप से गतिमान रहता है. यह सरलता ही उसकी विशेषता है. आप किसी श्रद्धालु को देखिए. उसके धैर्य की दाद देनी पड़ेगी. प्रतिदिन एक लोटा पानी, माला फेरते, इक्कादुक्का आरती को गातेदोहराते वह पूरा जीवन बिता देता है. यह कतई आवश्यक नहीं कि जिस आरती को वह प्रतिदिन वर्षदरवर्ष गाता आया है, उसका अर्थ भी जानता हो. और आरतियां क्या हैं! उनमें आराध्य की वेशभूषा, देह सौष्ठव, अस्त्रशस्त्र अथवा उन कर्मों का बखान होता है, जो वास्तविकता से परे, पोंगापंथियों की कपोलकल्पना होते हैं. आप इसे उसकी श्रद्धा और संयम का नाम देंगे? परंतु मुझे ऐसा मानने में संकोच होगा. आप फिर भी इसे श्रद्धा और संयम कहने पर अड़े रहेंगे तो मैं अपनी बात पर दृढ़ रहते हुए कहूंगा कि यह ओढ़ा हुआ संयम है. क्योंकि ऐसे संयम और श्रद्धा कर्मकांड से बंधे होते हैं और उनसे बाहर कहीं प्रकट नहीं हो पाते. यह विवेकहीन आस्था है. धर्म का लोकप्रिय संस्कार व्यक्ति को व्यक्ति के करीब रहने, उसके साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करने से अधिक कथित ईश्वर के निकट रहने को लालायित करता है. अपने पड़ोसी को भूखा रहकर भी देवता को जिलाए रखता है. एक ही तरह के कर्मकांड को बारबार लगातार दोहराने से उसे ऊब नहीं होती. ऊपर से यह भी चाहता है कि उसके बाद आने वाली पीढ़ियां उस क्रम को बनाए रखें. धर्म में परिवर्तन के लिए कोई स्थान नहीं है. वह खंडहरों को पूजता है. जो जितना पुराना है, अपरिवर्तनीय है, वह धर्म की राह में उतना ही सम्मानेय है. इस तरह धर्म लोकव्यवहार का हिस्सा भले हों, अपने असली प्रभाव में वह अधोगामी होता है. वह व्यक्ति को उसके मूल स्वभाव, जो उसके मनुष्य होने की शर्त से जुड़ा है, यानी विवेकीकरण की प्रक्रिया से काट देता है. इसलिए तीसरे मोर्चे के रूप में मैं ऐसे जनसंगठन की कल्पना करूंगा जो मानवीय प्रबोधीकरण का समर्थक हो. जो उसको नैतिकता और अध्यात्म की ओर प्रवृत्त कर सके.

तीसरे मोर्चे का अगला मोर्चा राजनीति होगा. व्यक्ति और समाज का संबंध अन्योन्याश्रित है. बहुसंख्यक होने के कारण ही समाज का स्तर सचमुच बड़ा है. किंतु इस आधार पर उसे व्यक्ति के अधिकारों में कटौती का अधिकार नहीं मिल जाता. इसलिए कि व्यक्ति अपनी स्वाधीनता की सुरक्षा के लिए समाज में सम्मिलित हुआ है, ताकि वह अपने सुख, शांति, सपनों और संकल्पों को सच में बदल सके. समाज के संचालन के लिए उसने अपने ही बीच के कुछ व्यक्तियों को जिम्मेदारी सौंपी थी. लेकिन जिन व्यक्तियों को उसने यह दायित्व सौंपा था, उनमें से कुछ ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग करना आरंभ कर दिया. मनुष्य की बनाई गई व्यवस्था सरल थी. वह उसकी आजादी की रक्षा करती थी. किंतु व्यवस्था के नाम पर, सामाजिक शांति और विकास के नाम पर मनुष्य को हर बार अपनी स्वतत्रंता का एक हिस्सा बलिदान करना पड़ा. आज हालात सामने हैं. आम आदमी महज एक कठपुतली है, कभी धर्म उसको नचाता है, कभी समाज तो कभी राजनीति.

श्रेष्ठ राजनीति वह है जिसका व्यक्ति के जीवन में न्यूनतम हस्तक्षेप हो. जो अपने नागरिकों को भयमुक्त करती हो. इतनी सरल भी हो कि उसके बारे में प्रत्येक व्यक्ति की स्फटिकसी समझ हो. इतनी पारदर्शी हो कि उसका प्रत्येक निर्णय नागरिकमात्र को अपना निर्णय लगने लगे. उल्लेखनीय है कि वैकल्पिक राजनीति स्वयं एक विचारधारा है. परिवर्तनकारी राजनीति का आसान रास्ता नहीं है, बल्कि सर्जना डगर है. उसके लिए न जातीय दमखम जरूरी है न जुगाड़ की राजनीति. बस सबको अपने विवेक के साथ चलने की जरूरत है. इधर यह मान लिया गया है कि लोकतंत्र अभी तक आजमायी गई शासनप्रणालियों में सर्वोत्तम है. कुछ तो इससे इतने ज्यादा सम्मोहित हैं कि ‘विचारधारा के अंत’ की बात कहने लगे हैं. लोकतंत्र से मैं भी अभिभूत हूं. लेकिन आधुनिक लोकतंत्र में जो विकृतियां हैं यदि वह इन्हें दूर करने में असमर्थ रहता है तो मेरा उससे विश्वास जाता रहेगा. आधुनिक लोकतंत्रात्मक राजनीति की दुर्बलता भी यही है कि वह बेहद जटिल संरचना है. आम आदमी तो दूर, साधारण पढ़ेलिखों की समझ से भी परे. उसकी जटिलता से विशेषज्ञ तंत्र को पनपने का मौका मिलता है. ये विशेषज्ञ आमतौर पर अभिजन समुदाय के सदस्य होते हैं. अपनी मेधा से अधिक वे बुद्धिचातुर्य और समझौतापरस्ती से काम चलाते हैं. विशेषज्ञ संस्कृति में उन्हें अपनी बुद्धि जिसे बुद्धिकौशल कहना ही उपयुक्त होगा, का अधिकतम मूल्य वसूलने का अधिकार मिल जाता है. चूंकि निर्णय के अधिकांश अधिकार इसी वर्ग के अधीन होते हैं, इसलिए उनके निरंतर दुरुपयोग द्वारा वह अपनी स्थिति को उत्तरोत्तर मजबूत करता जाता है. परिणामस्वरूप जनसाधारण के अधिकारों में कटौती बढ़ती ही जाती है. शासनप्रशासन की ये चालाकियां साधारणजन की समझ से परे होती हैं. इसलिए आवश्यकता पड़ने पर उसे भी घोषित विशेषज्ञों की शरण में आना पड़ता है. चूंकि उसका क्रय सामर्थ्य अभिजन की अपेक्षा बहुत कम, करीबकरीब नगण्य होता है, अतएव न्याय की स्पर्धा में शोषण एवं पराजय उसकी नियति बन जाते हैं. उत्तरजीविता के संघर्ष में अभिजन समाज पर उसकी निर्भरता बढ़ती ही जाती है. इस स्थिति का उपयोग अभिजन समाज स्वयं को और मजबूत करने के लिए करता है.

लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सरकार बनाने का अधिकार यद्यपि आम नागरिक के पास होता है. इस कार्य को कभी जोश तो कभी अनमने भाव से वह करता भी है. किंतु उदार लोकतंत्र का दावा करने वाले समाजों में भी नागरिकों को न तो भूलसुधार के अवसर प्राप्त होते हैं, न सरकार बनने के बाद उसको नियंत्रित करने के. सिवाय कुछ कानूनी प्रावधानों के जो अत्यधिक जटिल, समयखाऊ एवं खर्चीले होते हैं. आम आदमी उन तक पहुंच ही नहीं पाता है. खुद को उदार कहनेवाले लोकतंत्र आम मताधिकार की प्रशंसनीय व्यवस्था तो करते हैं. किंतु जनमत के आधार पर बनी सरकारें जनाकांक्षाओं पर खरी उतरें, जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के साथसाथ कल्याण के समविभाजन हेतु उनके प्रयास ईमानदार करें, यह सुनिश्चित करने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की जाती. नतीजा यह होता है कि लोकतंत्र कुछेक वर्गों की इजारेदारी बन जाता है. वही बाकी शीर्षस्थ सत्ताओं के सहयोग से समाज को मनमर्जी से हांकने में सफल रहते हैं.

तो मेरी समझ में तीसरा मोर्चे का अगली चुनौती यह होगी कि वह राजनीतिक एकाधिकारवाद के विरुद्ध कार्य करते हुए सत्ता को लोकेच्छा के अनुरूप संचालित कर सके. जो शासन की नीतियों की समीक्षा और अधिकारों का निचले वर्ग की ओर अंतरण करने में सक्षम हो. जो आमजन में भरोसा पैदा कर सके कि अपने हितों की रक्षा के लिए वही बेहतर प्रयास कर सकता है. निजी कल्याण के लिए स्वयं आगे आना होगा. ऐसा उसे अविलंब करना भी चाहिए. सरकार कैसी हो इस बारे में थोरो के विचार बहुत काम के हैं. उसने कहा था—‘सरकार वही भली जो कम से कम शासन करे.’ जिसकी शक्तियां विकेंद्रीकृत हों. फैसलों में पारदर्शिता हो. जो अपनी संरचना में सरलतम हो. तो तीसरे मोर्चे का एक काम यह भी होना कि वह सत्ताओं के पूर्ण विकेंद्रीकरण के लिए कार्य करे. समाज में बड़े शक्तिपीठ न पनपने दे. व्यापक सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से जनशक्ति को जाग्रत कर, इसे संभव किया जा सकता है.

तीसरे मोर्चे की अगली चुनौती आर्थिक पहलू को लेकर भी होगी. प्राकृत अहेरी अवस्था में अर्थ जैसी कोई चीज न थी. मनुष्य समूहबद्ध होकर शिकार करता था. प्राप्त भोज्यसामग्री का मिलजुलकर भोग कर लेता था. भोजन को लेकर छोटेमोटे झगड़े उस समय भी होते होंगे. संभव है इसे लेकर कबीला बंट जाने की नौबत आ जाती हो. इसके बावजूद, चूंकि पशुअवशिष्ट को लंबे समय तक संरक्षित कर पाना आसान न था, व्यक्तिगत संपत्ति जैसी अवधारणा तब संभव न थी. कालांतर में मनुष्य पशुओं को पालने लगा. पशुओं की संख्या समृद्धि का पर्याय बन गई. पशुधन को अपेक्षाकृत लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता था. प्राकृतिक संसाधन निजी वैभव का पर्याय बने तो विचार भी पहले से निर्मैल्य न रह सके. समाज में छोटेबड़े, ऊंचनीच का भाव फैलने लगा. धर्म के नाम पर, समाज एवं न्यायव्यवस्था के नाम पर बेगार प्रणाली आकार लेने लगी. धीरेधीरे मनुष्य ने खेती में महारत हासिल की. अनाज को लंबे समय तक संरक्षित रखा जा सकता था. प्रकृति मेहरबान हो तो खेतखलिहान सोना उगलने लगते थे. तब अतिरिक्त अनाज के प्रबंधन के लिए समाज के ही चुने हुए व्यक्तियों को उसकी देखरेख की जिम्मेदारी सौंपी जाने लगी. खेती के विकास के साथ सहायक उद्यमों का भी विकास हुआ. इस बीच व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा और गहराने लगी. भूमि वैभव का प्रतीक थी. नश्वर मनुष्य उसके बहाने सतत परिवर्तनशील किंतु अनश्वर प्रकृति से होड़ का भ्रम पाल सकता था. इससे उसके अहं को संतुष्टि मिलती थी. कुल मिलाकर जीवन और समाज में भूसंपदा का महत्त्व लगातार बढ़ता गया.

अतिरिक्त अन्न की देखभाल जैसे कार्यों ने समाज में मुखिया की उपस्थिति को महत्त्वपूर्ण बना दिया था. बाद में उनकी मदद के लिए कुछ आदमी साथ कर दिए गए. धीरेधीरे मुखिया के इर्दगिर्द एक शक्तिपीठ उभरने लगा. घोषित रूप में मुखिया सारा काम समूह एवं बस्ती के विकास के नाम पर कर रहा था. इस कारण अपने निर्णयों के लिए लोग मुखिया पर निर्भर होते चले गए. यह व्यक्ति द्वारा व्यक्ति की दासता की शुरुआत थी. एक व्यक्ति के पास अधिकारों का बाहुल्य था, जबकि दूसरा वर्ग अधिकार और संसाधन दोनों के मामले में पूरी तरह विपन्न था. समाज अभिजन और सामान्यजन में ढलने लगा था. फिर जिस दिन गुमान से भरे मुखिया या उसके उत्तराधिकारी ने विस्तृत भूभाग को देखकर कहा होगा, ‘वह भूमि मेरी है.’—सही मायने में वही आर्थिकराजनीतिक साम्राज्यवाद की शुरुआत थी.

अर्थ, धर्म एवं राजनीति के गठजोड़ से उभरते नएनए सत्ताकेंद्र ऊपर से भिन्न दिखने के बावजूद, स्वार्थ को लेकर एकजुट थे. मनु ने यह कहकर कि समस्त सृष्टि ब्राह्मण की है, वही इसका स्वामी है. बाकी लोग उसी का दिया हुआ खाते हैं, धर्मसत्ता के नाम पर ब्राह्मणवाद की नींव रखी, तो व्यास ने धर्म के साथ राज्यसत्ता को भी पूरा सम्मान दिया. महाभारत में युधिष्ठिर के मुख से उन्होंने कहलवाया कि ‘राजा कभी गलती नहीं करता’. यक्ष द्वारा यह पूछने पर, ‘काल राजा का कारण है कि राजा काल का’, व्यास ने कहलवाया….‘इसमें जराभी दुविधा नहीं कि राजा ही काल का कारण है’—

कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम्

इति ते संशयो मा भूत् राजा कालस्य कारणं.’

भारत ही क्यों? ‘दि किंग इज आ॓लवेज राइट’—कहकर पश्चिम में भी वर्चस्ववाद को तजरीह दी जाती रही. उस समय पूरी दुनिया में आर्थिक संसाधनों पर राज्य का अधिकार होता था. अपने सर्वाधिक वैभवशाली दिनों में रोम की कुल तीन लाख जनसंख्या में से दोतिहाई संख्या दास और अर्धदास की थी. भारत में सत्ता ऊपर के तीन वर्गों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की अधीन थी. ये तीनों वर्ग मिलकर शूद्र से काम लेते थे. जिसकी जनसंख्या इन तीनों वर्गों की कुल जनसंख्या से अधिक थी. राजा के आदेश पर ही जमींदार और सामंत लगान आदि लेकर किसानों से खेती करवाते थे. जो किसान नहीं थे, उनसे बेगार ली जाती थी. शूद्रों में अनेक हुनरमंद शिल्पकर्मी और मेहनतकश लोग थे. वही सेना के लिए हथियार, खेती, व्यापार के लिए संसाधन और प्रभुवर्ग के लिए विलासिता की वस्तुओं का उत्पादन करते थे. देखा जाए तो वही असली उत्पादक थे. इसके बावजूद वह व्यवस्था ऐसी थी उन्हें अपनी कला के मूल्यांकन के लिए बाकी तीनों वर्गांे पर निर्भर रहना पड़ता था. ‘सवै भूमि गौपाल की’ दुहाई देने वाला धर्म इस व्यवस्था के लिए चुनौती बनने के बजाय सहायक की भूमिका में था. आय के वैकल्पिक साधन के रूप में व्यापार और शिल्पकला का विकास बहुत पहले हो चुका था. परंतु किसी न किसी रूप में वे सभी राजसत्ता एवं धर्मसत्ता से अनुशासित होते थे. ‘सर्वे सुखिन भवंतु’ कहने वाली जाति और धार्मिक संप्रदायों के ये स्वाभाविक अंतर्विरोध थे.

15वीं शताब्दी तक यही स्थिति बनी रही. न्यूटन और का॓परनिकस की शोधों ने पहली बार धर्म की जड़ताओं को चुनौती दी. विज्ञान ने आगे चलकर औद्योगिक क्रांति का जन्म दिया. फलस्वरूप उत्पादन के वैकल्पिक साधनों का विकास हुआ. नई शिक्षा ने धर्म, राजनीति और अर्थ के परंपरागत ढांचे पर चोट की थी. प्रगतिगामी विचारों की रोशनी में साम्राज्यवाद के गढ़ एकएक कर ढहने लगे. उल्लेखनीय है कि पश्चिम की भांति भारत में भी पंद्रहवीं शताब्दी में सुधारवादी आंदोलन खडे़ हुए थे. कबीर, दादू, रविदास, मलूका जैसे कवियों ने धर्म सत्ता एवं राजसत्ता दोनों के अन्याय एवं अनाचार के विरुद्ध आवाज उठाई थी. पंद्रहवींसोलहवीं शताब्दी में जन्मी सामाजिक क्रांति अपने भीतर धार्मिक सुधारवाद की विपुल संभावनाएं लिए हुए थी. आर्थिक मुद्दों पर वह या तो मौन थी, अथवा अर्थ को नैतिकता की राह में बाधा मानती थी. उससे धार्मिकसामाजिक सुधार की हवा चली, किंतु उसका असर अल्पकालिक ही रहा. कबीर, दादू, रविदास की अगली पीढ़ी के रूप जो कवि आए, चाहे वे तुलसी हों या सूर, सभी ने संतकाव्य की क्रांतिचेतना को निचोड़ने का काम किया. सगुण भक्ति के रूप में वे व्यक्तिपूजा और आडंबरवाद की पुनस्र्थापना करने वाले कवि सिद्ध हुए.

बहरहाल, पश्चिम की वैचारिक क्रांति का लाभ वहां के समाज को पहुंचा, किंतु जैसेजैसे तकनीक में सुधार हुआ, बढ़े उत्पादन को खपाने के लिए नए बाजारों की खोज जरूरी हो गया. बढ़ती स्पर्धा ने उपभोक्ता की पसंद को किनारे कर दिया. विज्ञापन लोगों को चयन को प्रभावित करने लगे. महंगी होती तकनीक ने बाजार में एकाधिकार को बढ़ावा दिया. उत्पादन लोगों की जरूरत के बजाय मुनाफे के लिए होने लगा. यह नए किस्म का सामंतवाद है. इसमें और पुराने सामंतवाद में अंतर बस इतना है कि उसमें संपत्ति का मुख्य आधार जमीन थी. नई व्यवस्था में जमीन की जगह आधुनिक तकनीक ने ले ली है. पूंजीपति इस व्यवस्था का प्रमुख कर्णधार है. इतना मुंहफट कि राजसत्ता से कह सकता था—‘लैजेस फेयर!’ बीच से हटो. हमें हमारा काम करने दो. यह समाज में अर्थसत्ता के बढ़ते दखल का द्योतक है, जिसने बीसवीं शताब्दी में ही तेजी से पांव पसारते हुए पूरी दुनिया को अपने प्रभाव में ले लिया था.

सही मायने में तो यह पूंजीवाद भी नहीं है. क्योंकि जिस एडम स्मिथ को आधुनिक पूंजीवाद का जन्मदाता माना जाता है, उसने अपनी पुस्तक का नाम ‘वैल्थ आ॓फ दि नेशनस्’ रखा था, न कि ‘वैल्थ आ॓फ दि पर्सनस्.’ पुस्तक के माध्यम से उसका ध्येय समाज के समक्ष ऐसी अर्थनीति को पेश करना था, जो संपूर्ण राष्ट्र, न कि कुछ व्यक्तियों या व्यक्ति समूहों, को समृद्धि की ओर अग्रसर कर सके. दूरद्रष्टा स्मिथ पूंजी और राजसत्ता के गठजोड़ की संभावना से परिचित था. उसके दुरुपयोग की ओर संकेत करते हुए उसने इस पुस्तक में लिखा है—

जन सरकारों का गठन (राष्ट्र की) परिसंपत्तियों की सुरक्षा हेतु किया गया था. किंतु वे अपने इस लक्ष्य से बहुत दूर हैं. असल में वे अमीरों की गरीबों से अथवा जिनके पास कुछ संपत्ति है उनकी, जिनके पास कुछ भी नहीं है—से सुरक्षा हेतु गठित की गई है.’1

सच तो यह है कि धर्म, राजनीति और अर्थसत्ता के गठजोड़ से बनी सत्ताएं एकदूसरे को समर्थन देने तथा स्वार्थसिद्धि में जुटी थीं. निजी स्वार्थ को आड़ देने के लिए उन्होंने मानवाधिकार, उपभोक्ता कानून जैसे चलताऊ मुहावरे गढ़ लिए थे. इसके बावजूद एक डर भी उनके भीतर था. ऐसा डर जो लुटेरे, डाकुओं और भ्रष्ट आदमी के मन में हमेशा बना रहता है. पकड़ लिए जाने का डर. वे जानते थे कि जो कर रहे हैं, वह प्रकृति के आचरण के विरुद्ध है, अनैतिक है. प्रकृति ने सभी को आजादी दी है. बराबरी से जीने का अधिकार दिया है. वे जानते थे कि गुलामी का एहसास गुलाम को नया हौसला देता है. धर्म, मानवाधिकार, जैसे आयोजन व्यक्ति को भरमाए रखने के लिए थे. लेकिन नई चेतना के साथ जैसेजैसे अपनी दुर्दशा का वास्तविक कारण लोगों की समझ में आया, वे लूट और शोषण की वर्चस्ववादी व्यवस्थाओं के विरुद्ध सिर उठाने लगे. अठारहवीं शताब्दी के फ्रांसिसी विद्वान इमानुएल जोसेफ सीयेस ने ‘व्हा॓ट इज थर्ड स्टेट’ में लिखा—

 ‘यह थर्ड एस्टेट क्या है?’

कुछ नहीं!’

इसको क्या होना चाहिए?’

सब कुछ.’

राजा क्या है?’

जनता का सेवक’

यदि राजा हमारा सेवक है तो उसका कर्तव्य है हमें रिपोर्ट करे, हमारा आदेश माने.’

यदि वह हमें रिपोर्ट करता, हमारा आदेश मानता है तो वह हमारे नियंत्रण में है.’

यदि वह हमारे नियंत्रण में है तो उसकी कुछ जिम्मेदारियां हैं.’

यदि उसकी कुछ जिम्मेदारियां हैं तो उसको दंडित किया जा सकता है.’

यदि उसको दंडित किया जा सकता है तो उसको उसके अपराध के अनुसार ही दंड दिया जाएगा.’

यदि उसको अपराध के अनुसार दंड दिया जाना है तो उसको मृत्युदंड भी संभव है.’

यह फ्रांसिसी क्रांति से पहले की बात है. उसके बाद तो वहां परिवर्तन की ऐसी लहर उठी थी कि उसकी गमक पूरी दुनिया में सुनाई दी. जितने भी पुराने निजाम थे, जो स्वयं को अजेय, अजस्र, अविनाशी मानते थे. जिन्हें अमरत्व प्राप्त होने के भ्रम था, एकएक कर वे सब ढहने लगे थे.

बीसवीं शताब्दी में मानवतावादी संगठनों के बंटने से पूंजीवाद एक बार पुनः हावी हुआ है. बल्कि कुछ दशकों में तो यह और भी मजबूत हुआ है. इकीसवीं शताब्दी का पूंजीवाद उनीसवीं शताब्दी के पूंजीवाद से भिन्न है. तब का पूंजीवाद परंपरागत सामंतवादी लक्षणों से युक्त था. बाजारों की तलाश तो उसे भी थी, किंतु उसको नए खरीददारों की तलाश होती थी. क्रेता को उपभोक्ता समझने की धृष्टता वह नहीं करता था. नया पूंजीवाद व्यक्ति की पसंदों का निहित स्वार्थ के अनुसार अनुकूलन करता है. उपभोक्ता को भ्रम में डाल देने वाले लुभावने विज्ञापनों के माध्यम से वह उसे चयन का अवसर तक नहीं देता. वह पहले की अपेक्षा कहीं अधिक शक्तिशाली है. उसकी पहुंच अंतरराष्ट्रीय, और पैठ इतनी गहरी है कि जब चाहे दो देशों को युद्ध की आग में ढकेल सकता है. अमेरिका द्वारा जापान पर परमाणु बम गिराने का मसला केवल राजनीतिक या सामरिक नहीं था, उसके पीछे उन पूंजीपतियों का भी योगदान था, जिन्हें मंदी से गुजर रही अर्थव्यस्था को उबारने के लिए नए बाजारों की तलाश थी. दुनिया को युद्धों में उलझाकर वे हथियारों का बड़ा बाजार देख रहे थे. परमाणु अस्त्रों ने आमनेसामने के युद्ध की संभावनाओं को कम कर दिया है. यूं भी नए युद्ध अर्थव्यवस्था की जमीन पर लड़े जाते हैं. उनमें जीतहार किसी की हो, जनसाधारण के हिस्से महंगाई और मुश्किलें ही आती हैं.

तो मेरी समझ में तीसरे मार्चे का तीसरा और आखिरी मोर्चा यह होगा कि वह दुनिया को बराबरी और समानता का संदेश दे सके. वह देश की जनता को ‘थर्ड स्टेट’ के मायने समझा सके. जो पूरे समूह को एक इकाई के रूप में देखने का जज्बा अपने देशवासियों में भर सके. जो उन्हें आर्थिक आत्मनिर्भरता के मायने सिखाए. लोगों को यह भी बताए कि देह चाहे अमीर की हौ या गरीब की, वह एक समान प्राकृतिक तत्वों की बनी है. उसकी जरूरतें समान हैं. जो प्रकृति लोगों को जीवन देती है, काया का संस्कार देती है, उसपर उसी की बनाई देह कब्जा करे, उसको मनमर्जी से हांकने की कोशिश करे, उसे वह न दे जो नैसर्गिक समानता के सिद्धांत के चलते उसका अधिकार है, तो यह सरासर अनैतिकता है. यह सब करने के बाद ही तीसरा मोर्चा परिवर्तन का असली मोर्चा बन सकेगा.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. Civil government, so far as it is instituted for the security of property, is in reality instituted for the defence of the rich against the poor, or of those who have some property against those who have none at all.” Adam Smith, The Wealth of Nations:An Inquiry into the Nature & Causes of the Wealth of Nations.

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Filed under धर्म और अभिजन संस्कृति, परिवर्तन का तीसरा मोर्चा

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