गांधी और आइंस्टाइन

अहिंसा और इंसानियत के दो दावेदार

उन दोनों के देश अलग थे, धर्म अलग थे, भाषाएं और कार्यक्षेत्र अलगअलग थे. दोनों आमनेसामने कभी मिल भी न पाए थे. आपसी पत्रव्यवहार भी न के बराबर था. इसके बावजूद उनके मन में एकदूसरे के प्रति अगाध श्रद्धा थी. उनमें से एक विज्ञान के क्षेत्र की शिखरतम प्रतिभा था. नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर वह विश्व का विलक्षण मेधासंपन्न वैज्ञानिक माना गया. विज्ञान जगत उसकी अकूत मेधा और अद्वतीय कल्पनाशीलता से इतना अभिभूत था कि उसकी बौद्धिक विलक्षणता को समझने के लिए मरणोपरांत उसके मस्तिष्क को संरक्षित रखा गया. दूसरा पुरस्कारसम्मान से बहुत ऊपर था. इतना ऊपर कि हर सम्मान, पुरस्कार उसके नाम से जुड़कर सम्मानित होता था. वह लोगों के दिलों पर आजीवन राज करता रहा. दोनों ही विश्वशांति के समर्थक थे. एक के शोध को आधार बनाकर कुछ सिरफिरे वैज्ञानिकों ने परमाणु बम का निर्माण किया, जो दूसरे विश्वयुद्ध में तबाही का कारण बना. दूसरे की कथनीकरनी में एकता थी. वह आजीवन सत्य और अहिंसा की बात करता और उस पथ पर चलता रहा. फिर भी उसकी मृत्यु एक सिरफिरे राष्ट्रवादी की गोली से हुई. एक को नवगठित देश का राष्ट्रपति बनने का न्योता मिला. तब उसने यह कहकर कि वह राजनीति के लिए नहीं बना है, प्रस्ताव विनम्रतापूर्वक लौटा दिया. दूसरा बना ही राजनीति के लिए था. उसके लिए राजनीति समाजसेवा थी और समाजसेवा राजनीति. अतः आजादी के बाद जब उसके देश में अपनी सरकार बनी तो जनसेवा के प्रति अपनी संकल्पबद्धता दोहराकर वह सत्ता के प्रलोभन से हमेशा के लिए मुक्त हो गया. वह हर समय अपने समर्थकों, कार्यकर्ताओं से घिरा रहता था. उसके समर्थकों में हर वर्ग के आदमी थे. वह उनके सुखदुख और संघर्षों को समझता था. इस कारण लोगों का उससे गहरा जुड़ाव था. दूसरे को ‘एकांतसेवी’ कहा जाता है. गणित और भौतिक विज्ञान की जटिलतम गुत्थियों को सुलझाने में संलिप्त रहने हेतु उसका आमजन से कटाव स्वाभाविक ही था. पहला जिस ओर कदम बढ़ाता सैकड़ों लोग कतार बांधे उसका अनुसरण करने लगते. दूसरे की कल्पनाशक्ति जब मुक्ताकाश में डोलती तो उसमें हजारों ग्रहनक्षत्र और ब्रह्मांडीय स्फुर्लिंग ज्योतिवान हो उठते थे. दोनों में अनेक समानताएं थीं और अंतर भी. उनमें से प्रत्येक ने अपने समय और समाज को गहराई से प्रभावित किया. बेशुमार ख्याति, मानसम्मान पाया. अपने जीवनआचरण में दोनों मनुष्यता के पक्षधर, पवित्रता, सादगी, नैतिकता की मिसाल और इंसानियत के दावेदार बने रहे.

इतने विवरण के बाद अपने समय की इन विरलतम प्रतिभाओं का नामोल्लेख आवश्यक नहीं है. पाठकगण जान चुके होंगे कि उनमें से एक का नाम थामोहनदास करमचंद गांधी, दूसरे का—अल्बर्ट आइंस्टाइन. आइंस्टाइन का जन्म 1879 में हुआ था. गांधी के जन्म के दस वर्ष बाद. बचपन में दोनों ही संकोची थे. विद्यार्थी भी साधारण ही माने गए. आइंस्टाइन को स्कूल में साथियों का उपहास सहना पड़ता था. गांधी पोरबंदर के दीवान के बेटे थे. इसलिए उनका वैसा उपहास तो नहीं होता था, मगर विद्यार्थी वे औसत ही थे. दोनों की शुरुआत साधारण ही थी. पढ़ाई पूरी करने के बाद आइंस्टाइन ने पेटेंट कार्यालय में नौकरी कर ली. लंदन से बैरिस्टर बनकर लौटे अवश्य, किंतु वकालत के लिए जरूरी लंदफंद से दूर रहने के कारण आरंभ में असफलता ही उनके हिस्से आई. दोनों ने अपनी दुर्बलताओं को हथियार बनाया. आइंस्टाइन कल्पनाजगत में डूबे रहने वाले विद्यार्थी थे. औपचारिक पढ़ाईलिखाई पर कम ध्यान दे पाते थे. सापेक्षिकता के सिद्धांत की खोज उनकी अद्वितीय कल्पनाशक्ति के बल पर संभव हो सकी थी. प्रकाशवेग की अपरिवर्तनीयता, पदार्थ और ऊर्जा की अंतःपरिर्वतनीयता(E=MC2) प्रारंभ में परिकल्पना के रूप में ही जन्मे थे. गांधी ने अपनी सहनशक्ति को ताकत बनाया था. अपने आचरण से उन्होंने सिद्ध किया कि अहिंसा, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा जैसे विचार केवल कागजी नहीं हैं. पर्याप्त नैतिक सामथ्र्य हो तो उन्हें आचरण में भी उतारा जा सकता है. दोनों को अपने ऊपर अटूट विश्वास था. आइंस्टाइन ने सापेक्षिकता के सिद्धांत की परिकल्पना दुनिया के सामने रखी तो उनका खूब मजाक उड़ाया गया. अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना था कि डॉप्लर प्रभाव जैसे ध्वनि पर असरकारक होता है, वैसे ही प्रकाश पर भी उसका असर पड़ता है. लेकिन आइंस्टाइन अपनी धारणा पर अडिग रहे. खिल्ली उड़ाने वालों को उनका एक ही जवाब था—‘गलत सिद्ध करके दिखाओ?’ गांधी की अहिंसा को आलोचकों ने भीरूपन कहा था. मगर वे स्थिरमना अपने काम में लगे रहे. आखिर खुद को दुनिया की महाशक्ति समझने वाला ब्रिटिश साम्राज्य एक अधनंगे फकीर के आगे घुटने टेकने को मजबूर हो गया. आइंस्टाइन विलक्षण की सीमा तक अंतर्मुखी थे. वे खुद से घंटों संवाद कर सकते थे. मस्तिष्क गणित की पहेलियों को हल करने में उलझा रहता था. अकेलापन उन्हें पसंद था मगर उनका काम, अनूठी उपलब्धियां उन्हें बारबार लोगों के बीच ले आती थीं. गांधी अपने अनूठे प्रयोगों, कथनीकरनी की एकता तथा आचरण की पवित्रता के दम पर, लोगों के चहेते थे. इसलिए भीड़ में सबसे अलग नजर आते थे.

गांधी और आइंस्टाइन के बीच सीधी मुलाकात तो कभी संभव न हो सकी. पत्रव्यवहार भी अत्यल्प था. उनके अहिंसावादी दृष्टिकोण, जीवन की सादगी, सत्य के प्रति अटूट निष्ठा, जनांदोलनों की गहरी समझ तथा लोगों के दिलों में पैठ बनाने के अकूत सामथ्र्य ने आइंस्टाइन को प्रभावित किया था. संभवतः ऊर्जा के अजस्र, विराट स्रोत की खोज के रूप में दुनिया को परमाणु बम का आधारसिद्धांत देने वाला भावुक, संवेदनशील, मनुष्यता का हितचिंतक, नैतिकबोध से संपन्न सरलमना वैज्ञानिक अपने आविष्कार के दुरुपयोग की संभावनाओं की कल्पनामात्र से खुद को दोषी मान बैठा था. स्मरणीय है कि सापेक्षिकता के सिद्धांत की व्याख्या करते समय आइंस्टाइन ने सिद्ध किया था कि ऊर्जा और पदार्थ परस्पर अंतपर्रिवर्तनीय हैं. पदार्थ को ऊर्जा में बदला जा सकता है. इस प्रक्रिया में विपुल ऊर्जा उत्पन्न होती है. इसके बाद से ही परमाणु विखंडन द्वारा ऊर्जा के चिरंतन स्रोत को प्राप्त करने की कोशिशें तेज हो चली थीं. प्रथम विश्वयुद्ध में चोट खाए देश गुपचुप अपनी ताकत का विस्तार करने में लगे थे. 1933 में हिटलर द्वारा जर्मनी की सत्ता संभालते ही उनमें और भी तेजी आई. राष्ट्रों के बीच हथियारों की अंधस्पर्धा तथा भीतर ही भीतर उमड़ता असंतोष, नए विश्वयुद्ध की भविष्यवाणी कर रहा था. अपनी दूरद्रष्टि से आइंस्टाइन ने शायद यह भांप लिया था कि कोई सिरफिरा वैज्ञानिक परमाणु ऊर्जा संबंधी उनके शोध का दुरुपयोग कर, मनुष्यता के समक्ष भयावह संकट प्रस्तुत कर सकता है. इसीलिए गांधी, जो दक्षिणी अफ्रीका में सत्याग्रह का सफल प्रयोग कर चुके थे और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व करते समय भी अहिंसा पर पूर्णतः अडिग थे, का मानवतावादी द्रष्टिकोण उन्हें आकर्षित करता था. विश्वशांति की चाहत रखनेवाले आइंस्टाइन निरस्त्रीकरण के सबसे मुखर समर्थकों में थे. उसके पीछे बर्ट्रेंड रसेल, रवींद्रनाथ ठाकुर के अलावा गांधी की प्रेरणा भी प्रमुख थी. विश्वशांति के प्रति आइंस्टाइन की प्रतिबद्धता का एक और प्रमाण था—अनिवार्य सैन्यसेवा एवं युद्ध प्रशिक्षण के विरोध में जारी घोषणापत्र, जिसपर उनके और महात्मा गांधी के अलावा रवींद्रनाथ ठाकुर, सिगमंड फ्रायड, रोमन रोलेंड, एच. जी. वेल्स आदि के हस्ताक्षर थे.

आइंस्टाइन का विज्ञान पर भरोसा था. वह मानते थे कि विज्ञान की मदद से विश्व की भीषण समस्याओं यथा गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा आदि का उपचार संभव है. इसके लिए पर्याप्त जनसहभागिता और नियोजित कार्यक्रम जरूरी हैं. अनियोजित मशीनीकरण की आलोचना करते हुए आइंस्टाइन ने कहा था कि पूंजीवादी तंत्र के नेतृत्व में होने वाली प्रौद्योगिकीय क्रांति ने लोगों की गरीबी और अन्यान्य समस्याओं का समाधान करने के बजाय उन्हें बेरोजगारी की ओर ढकेला है. ऐसे तंत्र में उत्पादक का ध्यान केवल अपने मुनाफे पर होता है. इससे समाज में पूंजी का निचले वर्ग से ऊपर के वर्ग की ओर अंतरण लगातार बढ़ता जाता है. फलस्वरूप शीर्षस्थ वर्ग की खुशहाली बढ़ती जाती है, जो पूरी तरह से निम्नस्थ वर्गों के श्रम और कौशल की देन होती है. उच्च स्तर पर बढ़ती स्पर्धा निचले वर्गों के लिए और बड़ी चुनौतियां पेश करती है, जिससे बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है. उच्च प्रौद्योगिकीकरण की सबसे बड़ी बुराई है कि वह अपनी कीमत मनुष्य की कार्यक्षमता एवं कौशल से वसूलता है. जिससे श्रम के मूल्यांकन का अधिकार श्रमिक के हाथों से खिसककर पूंजीपति के अधीन चला जाता है. वे उस अधिकार का मनमाना दुरुपयोग करते हैं. अपने ही जैसे शोषितों, उत्पीड़ितों के साथ स्पर्धा और शोषणकारी स्थितियों से घिरा श्रमिक खुद को उनके आगे पंगु और लाचार अनुभव करता है. आपसी अविश्वास, कुंठा, हताशा, दैन्य और अवसाद जैसे अवगुण उसे घेर लेते हैं. पूंजीवादी समाज की ऐसी अनेकानेक नकारात्मक स्थितियों और संभावनाओं के बीच सर्वोदय, अहिंसा, आर्थिक आत्मनिर्भरता तथा विश्वबंधुत्व को समर्पित गांधी के विचार, उनका समाज के प्रति सकारात्मक और नीतिसम्मत सोच आइंस्टाइन को उम्मीद के ताजे झोंके की तरह लगता था.

आइंस्टाइन के मन में गांधी के प्रति सम्मान भाव पहली बार जुलाई-1929 में ‘क्रिश्चन सेंच्युरी’ को दिए गए साक्षात्कार में प्रकट हुआ, जिसमें उन्होंने गांधी द्वारा अहिंसापूर्ण ढंग से चलाए जा रहे आंदोलन की सराहना की थी. हालांकि उस समय तक दोनों के बीच कोई संवाद नहीं था. उनके बीच इकलौते पत्रव्यवहार की शुरुआत आइंस्टाइन की ओर से होती है. घटना 1931 की है. गांधी उस दिनों लंदन की यात्र पर थे. वहां भारत में संवैधानिक सुधारों को लेकर गोलमेज सम्मेलन की तैयारियां चल रही थीं. गांधी भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. आइंस्टाइन उन दिनों बर्लिन में थे. वहीं, उनके आवास पर गांधी का शिष्य सुंदरम उनसे मिला. उसके माध्यम से आइंस्टाइन ने एक पत्र गांधी को भेजा था. 27 सितंबर, 1931 को लिखे उस पत्र में उन्होंने गांधी के प्रति अपनी श्रद्धा को बिना लागलपेट प्रस्तुत किया था—

परम आदरणीय गांधी जी,

इस पत्र को आप तक पहुंचाने के लिए मैंने आपके मित्र का सहारा लिया है, जो इस समय मेरे घर मेरे मेहमान हैं. अपने कार्यकलापों द्वारा आपने दिखा दिया कि उन सभी आदर्शों को जिनकी हम केवल कल्पना कर सकते हैं, हिंसा का सहारा लिए बिना भी प्राप्त किया जा सकता है और उन्हें जिनको हिंसा पर भरोसा है, अहिंसा के माध्यम से आसानी से जीता जा सकता है. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि आपका संदेश आपके देश की सीमाओं के पार भी फैलेगा. उसके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मतभेदों का स्थायी समाधान संभव होगा. यही एकमात्र रास्ता है जो वैश्विक शांति एवं खुशहाली की ओर जाता है, जिससे हम अपने मतभेदों को आसानी से सुलझा सकते हैं.

पुनश्चः आपके प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा और सम्मानभाव के साथ मैं उम्मीद करता हूं कि बहुत जल्दी हम आमनेसामने होंगे.’(गांधी सेवा फाउंडेशन).1

पत्र में गांधी के अहिंसावादी द्रष्टिकोण के प्रति एक उदारमना वैज्ञानिक के उद्गार थे. गांधी विश्वशांति हेतु आइंस्टाइन के कार्यकलापों से परिचित थे. उनके प्रति मन में अगाध श्रद्धा भी थी. इसलिए पत्र का त्वरित प्रत्युत्तर देते हुए उन्होंने 18 अक्टूबर को आइंस्टाइन को लिखा—

सुंदरम के हाथों आपका खूबसूरत पत्र मुझे मिला. मुझे यह जानकर अत्यधिक संतोष है कि आप मेरे कार्यों का समर्थन करते हैं. मेरी उत्कट अभिलाषा है कि हमारी आमनेसामने की भेंट हो और आप भारत में मेरे आश्रम का आतिथ्य ग्रहण करें.’(गांधी सेवा फाउंडेशन).2

आइंस्टाइन गांधी के आमंत्रण पर भारत भले न आ सके, मगर गांधीजी द्वारा भारत में किए जा रहे सत्य एवं अहिंसा के प्रयोगों से निरंतर प्रेरणा लेते रहे. वे मूलतः वैज्ञानिक थे. विज्ञान के उपयोग को लेकर उनका मत ‘पश्चिमी विज्ञान का पितामह’ कहे जाने वाले दार्शनिक फ्रांसिस बेकन(1561—1626) से मेल खाता था. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति से उत्साहित बेकन का कहना था कि मशीनें मनुष्य को जानलेवा श्रम से मुक्ति दिलाकर उसके कल्याण की राह प्रशस्त करेंगी. ‘ज्ञान ही शक्ति है’ कहकर उसने विज्ञान और प्रौद्योगिकीय सुधारों का स्वागत किया था. आगे चलकर विज्ञान ने खूब तरक्की की. लेकिन उसके लोकोपकारी उपयोग को लेकर बेकन की भविष्यवाणी पूर्ण सच न हो सकी. खर्चीला उद्यम होने के नाते वैज्ञानिक शोधों की धारा उस दिशा में अग्रसर रही, जो केवल समाज के प्रभुवर्ग की स्वार्थानुरूप थी, या जैसा पूंजीपति और सरमायेदार वर्ग चाहता था. इससे श्रमविरोधी मशीनों के विकास को बढ़ावा मिला. कालांतर में उससे समाजार्थिक स्तरीकरण और बेरोजगारी में वृद्धि हुई. पूंजी की मनमानी के फलस्वरूप हुए मशीनीकरण ने उन कारीगरों और शिल्पकर्मियों के समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया था, जो परंपरागत अर्थव्यवस्था में, सामंतवादी दबावों के बावजूद अपने श्रम एवं कौशल के दम पर सम्मानित जीवन जीते आए थे. यह बेकन की उस मनोवांछा के विपरीत था, जो वैज्ञानिक क्रांति का स्वागत करते हुए प्रकट हुई थी. वस्तुतः वैज्ञानिक शोधों का लाभ देश के आमजन तक कैसे पहुंचाया जाए, यह चिंता अठारहवीं शताब्दी से ही समाजविज्ञानियों और दार्शनिकों को परेशान करने लगी थी. कालांतर में यह चुनौती और भी कठिन, कठिनतर होती गई. आगे चलकर इसी ने यूरोप के वैचारिक आंदोलनों के लिए नई जमीनें तैयार कीं.

उल्लेखनीय है कि पश्चिम में अनियंत्रित मशीनीकरण के विरुद्ध आवाजें सतरहवीं शताब्दी से ही उठने लगी थीं. उनीसवीं शताब्दी आतेआते उसमें और भी तेजी आ चुकी थी. पूंजीवाद के प्रति विरोधी वातावरण और चौतरफा आलोचनाओं के बावजूद पश्चिम को अपनी प्रगति पर गर्व था. वह इसको आधुनिकता की निशानी मानता था. इसका कारण भी था. अठारहवीं शताब्दी में नए बाजारों की तलाश में निकले व्यापारी काफिलों ने ब्रिटेन के लिए नए उपनिवेश निर्मित किए थे. ब्रिटेन की आर्थिक समृद्धि में उसके उपनिवेशों का बड़ा योगदान था. औपनिवेशिक शोषण के लिए जिम्मेदार और विज्ञान के इकतरफा लाभों पर इतराने वाली कथित पश्चिमी सभ्यता को गांधी ने ‘शैतानी सभ्यता’ कहा था. यह बात अलग है कि पूरब में जाति, धर्म, परंपरा और संस्कृति के नाम पर फैला हुआ मकड़जाल, मानवमात्र की स्वाधीनता और खुशहाली की राह में, कथित ‘शैतानी सभ्यता’ से कहीं अधिक नुकसानदेह था. और गांधी जिसे शैतानी सभ्यता कहते थे, उसमें मानवाधिकारवादी आंदोलनों के विस्तार की भारत की दैवी सभ्यता से अधिक संभावनाएं थीं. गांधी की प्रमुख राजनीतिक, आर्थिक प्रेरणाएं धर्मदर्शन से निकली थीं. वैज्ञानिक बोध के बजाय उनमें भावबोध प्रबल था. पूंजी की मनमानी और तज्जनित बेलगाम मशीनीकरण को वे धार्मिक और सांस्कृतिक संकट के रूप में देखते और उसके निदान के लिए रहरहकर परंपरा की शरण में लौट जाते थे. यही कारण है कि आर्थिक विषमताओं तथा उसके कारणों को लेकर उनकी आलोचना वैसी तथ्यात्मक, तर्कसंगत और तेजवंत न थी जैसी बर्ट्रेंड रसेल, मार्क्स, बकुनिन, पीटर क्रोप्टोकिन, मानवेंद्रनाथ राय आदि विचारकों की. धर्म, विज्ञान एवं समाजवाद के बारे में आइंस्टाइन का विश्लेषण तुलनात्मक रूप से अधिक सुसंगत, वैज्ञानिक, तथ्यपरक एवं पारदर्शी है. लेकिन अपने विचारों, मान्यताओं को जिस गंभीरता और सत्यनिष्ठ भाव से गांधी अपने रोजमर्रा के आचरण का हिस्सा बना लेते हैं, यह आइंस्टाइन से संभव नहीं हो पाता.

गांधी के सत्य और अहिंसा के आदर्श के प्रति आइंस्टाइन की अटूट श्रद्धा थी. उत्तरोत्तर बढ़ते वैश्विक तनाव तथा वैमनस्यकारी स्थितियों के बीच गांधी का रास्ता उनकी एकमात्र उम्मीद थी. बावजूद इस श्रद्धाभाव के कुछ मुद्दों को लेकर गांधी से उनका मतभेद था. ऐसा ही मुद्दा उत्पादन क्षेत्र में मशीनों के प्रयोग को लेकर है, जिनका पश्चिमी देशों की आर्थिक प्रगति के पीछे बड़ा योगदान था. गांधी मशीनीकरण का विरोध करते हैं. उसे समाज में व्याप्त अनेकानेक बीमारियों की जड़ बताते हैं. ‘हिंद स्वराज’ में वे लिखते हैं—‘मशीनें यूरोप को उजाड़ने में लगी हैं. वहां की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है.’ मशीनों की आलोचना से उन्हें यहीं तोष नहीं. आगे वे चेतावनी वाले अंदाज में लिखते हैं, ‘मशीन की हवा अगर ज्यादा चली तो हिंदुस्तान की बुरी दिशा होगी….यंत्र तो सांप का ऐसा बिल है जिसमें एक नहीं बल्कि सैकड़ों सांप होते हैं.’ गांधी द्वारा मशीनों का विरोध केवल उत्पादकता जुड़े यंत्रों तक सीमित नहीं रहता. आगे बढ़कर रेलों, डॉक्टरों और वकीलों को भी अपने दायरे में समेट लेता है. ट्राम को वे स्वास्थ्य रक्षा से जोड़कर देखते हैं. उनकी दृष्टि में जहां मशीनें हैं, वहां अव्यवस्था है, दुख और सांस्कृतिक संकट हैं. मशीनें बीमारी और कमजोर स्वास्थ्य का कारण हैं—‘जहां रेलगाड़ी, ट्राम गाड़ी वगैरह साधन बढ़े हैं, वहां लोगों की सेहत गिरी होती है….यूरोप के एक शहर में जब पूंजी की तंगी हो गई थी तब ट्रामों, वकीलों और डॉक्टरों की आमदनी घट गई थी.’ इसके तुरंत बाद वे फैसलाकुन अंदाज में लिखते हैं, ‘यंत्र का गुण तो मुझे एक भी याद नहीं आता, मगर उसके अवगुणों पर मैं पूरी किताब लिख सकता हूं.’ यहां साफ कर दें कि मशीनों की आलोचना करने वाले गांधी पहले व्यक्ति न थे. उनसे पहले रूसो, थोरो, एडवर्ड कारपेंटर, इमर्सन आदि प्रख्यात विचारकों ने जीवन में मशीनों के बढ़ते दखल को गैरजरूरी माना था.

मानवीय स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक, ‘मनुष्य आजाद जन्मा है, लेकिन हर जगह वह बेड़ियों में है’ कहनेवाले रूसो ने भी कला एवं विज्ञान के विकास को मनुष्य के नैसर्गिक विकास में बाधक बताया था. यूरोप की वैज्ञानिक उपलब्धियों पर कटाक्ष करने हुए अपने सुप्रसिद्ध निबंध ‘डिस्कार्स आन दि आर्ट एंड साइंसिज’ में उसने कहा था कि विज्ञान एवं आधुनिक कलाओं के विकास ने मनुष्य और समाज के आगे नैतिक संकट खड़े किए हैं. मानवीय गरिमा और शुभत्व की स्थापना के लिए उनके पास न तो कोई कार्यक्रम है, न ही तैयारी. विकास के नाम पर मची आपाधापी ने मनुष्य और समाज के बीच दीवार खड़ी कर दी है. ऐसे संद्धिग्ध, विश्वासशून्यता से भरे समाज में, ‘हमारे पास भौतिक विज्ञानी हैं, गणितज्ञ हैं, रसायनज्ञ, कवि, संगीतकार यहां तक कि पेंटर भी भारी संख्या में हैं. ये सब हैं बस मनुष्य’ की कमी है. यदि वह हैं भी तो वे देश के विभिन्न समाजों में यहांवहां छिपे हुए हैं. इस व्यवस्था ने उन्हें उपेक्षित, बेचारा और अकेला बनाकर रख दिया है.’3 दरअसल रूसो जब सवाल करता है तो उसके जहन में मनुष्यमात्र की स्वतंत्रता और अस्मिता की सुरक्षा जैसे बड़े सवाल होते हैं. अपनी शीर्ष स्थिति का लाभ उठाते हुए पूंजीपति वर्ग विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुए शोध एवं आविष्कार का उपयोग अपनी स्वार्थसिद्धि हेतु करना चाहता था. रूसो के अनुसार ज्ञान के नाम पर रचे गए आयोजन प्रकारांतर में केवल समाज के शीर्षस्थ वर्ग लिए लाभकारी सिद्ध होते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि वैज्ञानिक आविष्कारों का जितना लाभ समाज के शीर्षस्थ वर्गों को मिला, उतना जनसाधारण के हिस्से में नहीं आ पाया था. इसके बावजूद यातायात, चिकित्सा, शिक्षा, आवास आदि क्षेत्रों में विज्ञान के माध्यम से जो तरक्की हुई थी, उसका कम ही सही, जनसाधारण को भी लाभ पहुंचा था. गांधी विज्ञान की सभी उपलब्धियों की उपेक्षा कर उच्च प्रौद्योगिकी को परंपरा और संस्कृति पर संकट के रूप में देखते थे. मानते थे कि किसी कारीगर से उसका रोजगार छीन लेना भी हिंसा है. इसलिए उन्होंने रोजगार के लिए नुकसानदेह सिद्ध हो चुकी मशीनों को चलनबाह्यः कर उनकी जगह ग्रामोद्योगों लाने का समर्थन किया था.

गांधी का निजी संपत्ति से दुराव न था. वे मात्र इतना चाहते थे कि ‘वे(जमींदार और राजामहाराजा) अपने लोभ और संपत्ति के बावजूद उन लोगों के समकक्ष बन जाएं जो मेहनत करके रोटी कमाते हैं. मजदूरों को भी यह समझना होगा कि मजदूरों का काम करने की शक्ति पर जितना अधिकार है, मालदार आदमी का अपनी संपत्ति पर उससे भी कम है.’ (हरिजन सेवक 3 जून, 1939). गोया समझ लेने मात्र से हकीकत बदल जाएगी! गांधी पूंजीवादी विकृतियों का समाधान संरक्षकता के सिद्धांत में खोजते थे. उन्होंने पूंजीपतियों से अपील की थी वे खुद को संपत्ति का स्वामी मानने के बजाय उसका संरक्षक समझें और लोककल्याण के निमित्त उसका उपयोग करें. हालांकि यह बात भी दूर की कौड़ी के समान थी कि कोई पूंजीपति अपनी संपत्ति स्वेच्छा से छोड़ने को तैयार हो जाएगा. स्वयं गांधी को भी इसमें संदेह था, इसलिए वे व्यवस्था करते हैं कि कोई पूंजीपति यदि अपनी संपत्ति का उपयोग लोककल्याण के लिए करने में कतराता है तो राज्य को उसकी संपत्ति न्यूनतम बलप्रयोग के आधार पर हस्तगत कर लेने का अधिकार है—‘लोग स्वेच्छा से ट्रस्टियों की तरह व्यवहार करने लगें तो मुझे सचमुच बड़ी खुशी होगी. लेकिन यदि वे ऐसा न करें तो मेरा ख्याल है कि हमें राज्य के द्वारा भरसक कम हिंसा का सहारा लेकर उनसे उनकी संपत्ति (मुआवजा देकर अथवा मुआवजा दिए बगैर, जहां जैसा उचित हो) अपने हाथ में कर लेनी चाहिए(मेरे सपनों का भारत).’

आइंस्टाइन सामाजिक विकास की व्याख्या के लिए वैज्ञानिक द्रष्टिकोण अपनाते हैं. इतिहास की वस्तुपरक व्याख्या करते हुए वे लिखते हैं—‘इतिहास का बड़ा हिस्सा आक्रामकों ने कब्जाया हुआ है. उसमें शक्तिसंपन्न वर्ग की स्तुतियां और उनका गुणगान है. साम्राज्यवादी मंसूबों से भरी वे ताकतें अवसर मिलते ही दूसरे राज्यों पर अधिकार कर वहां की भूमि तथा उत्पादन के संसाधनों पर कानूनी, सामाजिक अधिकार प्राप्त कर लेती थीं. समाज के बौद्धिक निदेशन, उसकी शिक्षादीक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाला पुजारी वर्ग साम्राज्यवादी शक्तियों से हाथ मिलाकर उनकी अधिसत्ता को धार्मिकसामाजिक एवं कानूनी रूप से स्वीकार्य बनाता था. संस्कृति और धर्म के प्रलोभनों से यह वर्ग समाज के बहुसंख्यक वर्ग को अपने साथ जोड़े रखता था. पुजारी वर्ग की समाज पर पकड़ का लाभ उठाने के लिए साम्राज्यवादी शक्तियां उन्हें तरहतरह के प्रलोभन देकर अपने साथ मिलाए रखती थीं—

पुजारी, शिक्षा पर नियंत्रण के माध्यम से समाज के वर्गविभाजन को स्थायी रचना का रूप दे देता है. तथा सामाजिक आचार संहिता के नाम पर ऐसा ढांचा तैयार करता है, जिसमें समाज का बहुसंख्यक वर्ग सामाजिक मामलों में भीड़ की तरह आचरण करने लगता है.’4

आइंस्टाइन के अनुसार समाजवाद का लक्ष्य समाज को नैतिक सामाजिक लक्ष्य की ओर अग्रसर करना है. जबकि पूंजीवादी केवल और उद्योगस्वामी के लाभ की उच्चाकांक्षा से संचालित होता है. उसमें बड़ी मछली छोटी को निगलती जाती है. इसलिए पूंजीवादी व्यवस्था में शीर्षस्थ वर्ग की ओर लाभानुपात निरंतर बढ़ता जाता है. जिसके परिणामस्वरूप उसमें पूंजी का पलायन उच्च वर्ग की ओर होता रहता है. गांधी अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में बड़ी मशीनों के उपयोग को लेकर संकोची थे. आइंस्टाइन ने हालांकि समाज कल्याण के क्षेत्र में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल को जरूरी माना है. उसका विश्वास था कि विज्ञान की सहायता से सामाजिक समस्याओं का निदान खोजना अतिरेकी कामना है. समाजवाद व्यक्ति एवं समाज दोनों को सामाजिकनैतिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रयत्नरत रहता है. जबकि पूंजीवाद अपने एकमात्र लक्ष्य पूंजीस्वामी के लाभ पर जोर देता है. जिसमें लाभार्थी वर्ग निरंतर सिकुड़ता जाता है. आइंस्टाइन के अनुसार यह जानना बहुत जरूरी है कि केवल नियोजित अर्थव्यवस्था समाजवाद का उद्दिष्ट नहीं है. बल्कि उसका लक्ष्य मानवमात्र की मुक्ति है. ऐसा कहते हुए वे विचारदर्शन में गांधीवाद के करीब चले आते हैं.

निजी पूंजी को लेकर आइंस्टाइन के विचार अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं. सीमा से अधिक व्यक्तिगत संपत्ति के वे विरोधी थे. मानते थे कि संपत्ति के कुछ हाथों में सिमट जाने से उसपर प्रभावी नियंत्रण असंभव हो जाता है. उन्होंने माना कि पूंजी की ताकत के आगे लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा चुनी गई सरकारें भी बेबस सिद्ध होती हैं. इसलिए कि लोकतांत्रिक समाजों में जो भी जनप्रतिनिधि चुनकर आते हैं, वे किसी न किसी रूप में पूंजीपतियों पर निर्भर होते हैं. इससे वे गरीब और शोषित वर्ग के अधिकारों का संरक्षण करने में असफल सिद्ध होते हैं. अपने ऐतिहासिक लेख ‘समाजवाद क्यों?’ में वे कुशल आर्थिक व्याख्याकार की भांति पूंजीवादी समाज की विकृतियों पर न केवल गंभीर विचार करते हैं, बल्कि उससे निदान की राह भी सुझाते हैं. आइंस्टाइन के अनुसार पूंजीवादी समाज की कमजोरी है कि वहां ‘उत्पादन का आधार पूजीपति द्वारा लाभ की अंतहीन कामना’ होती है, न कि लोगों की जरूरत. ‘उत्पादन लाभार्जन की दृष्टि से निर्धारित किया जाता है न कि उपयोगिता और लोगों की आवश्यकता के आधार पर’. पूंजीवादी उत्पादन तंत्र में श्रमिकों पर प्रायः छंटनी की दीवार अटकी रहती है—

पूंजीवादी समाज में ऐसा कोई रास्ता नहीं कि उन सभी लोगों को रोजगार मिल सके, जो काम करना चाहते हैं. श्रमिकों के दिल पर छंटनी की तलवार तनी होती है….जैसेजैसे प्रौद्योगिकीय विकास होता है, बेरोजगारों की संख्या भी लगातार बढ़ती जाती है. लाभकेंद्रित उत्पादन व्यवस्था पूंजीपतियों के बीच आभासी स्पर्धा खड़ी कर देती है….असीमित स्पर्धा श्रम की बरबादी को बढ़ावा देती है, जिससे उनकी संवेदना और सामाजिकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. पूंजीवादी की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह पूरे शिक्षातंत्र को प्रदूषित कर देता है. विद्यार्थियों के बीच स्पर्धा नामक बुराई का प्रवेश होने से शिक्षा का मकसद ही बदल जाता है….’5

मतवैभिन्नय के बावजूद गांधी और आइंस्टाइन इस बात पर एकमत हैं कि समस्या का निदान बलप्रयोग या हिंसा नहीं है. केवल अहिंसक समाधान ही सर्वाधिक स्थायी और बहुउपयोगी हो सकता है, लेकिन विकास, अर्थनीति और आदर्श समाज की स्थापना को लेकर आइंस्टाइन का विश्लेषण तुलनात्मक रूप से अधिक संतुलित एवं उपयोगी जान पड़ता है. वे विज्ञान के लोकहित में प्रयुक्त करने के समर्थक थे. ज्ञान यदि शक्ति है तो उसका अधिकतम लाभ पूरे समाज को पहुंचना चाहिए. इस बिंदू पर आतेआते दोनों के बीच मतवैभिन्नय साफ झलकने लगता है. ‘ग्राफिक सर्वे’ के लिए दिए 1935 के एक इंटरव्यू में आइंस्टाइन के माध्यम से उद्धृत किया गया है—

मैं गांधी से अत्यधिक प्रभावित हूं. मगर उनके कार्यक्रम में दो कमजोरियां मुझे एकदम साफ नजरआती हैं. असहयोग हालांकि अपने विरोधियों से निपटने का बुद्धिमानीभरा रास्ता है. लेकिन यह केवल आदर्श स्थितियों में ही संभव है. यह भारत में अंगे्रजों के विरुद्ध उपयोगी हो सकता है, लेकिन जर्मनी में नाजियों के विरुद्ध इसका कारगर प्रयोग संभव नहीं है. गांधी उस समय भी गलत है, जब वे आधुनिक सभ्य समाज में मशीनों के बहिष्कार अथवा उनको न्यूनतम बनाए रखने पर जोर देते हैं. मशीनें समाज की जरूरत बन चुकी हैं, यह उन्हें स्वीकार लेना चाहिए.’6

गांधी के प्रति अपनी सम्मानभाव के बावजूद उनकी आलोचना आइंस्टाइन की वैचारिक दृढ़ता की ओर इशारा करती है. गांधी की भांति आइंस्टाइन का चिंतन भी बहुआयामी था. तभी वे गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ और मशीनीकरण विरोध की सुस्पष्ट और शालीन आलोचना कर पाते हैं. वे मानते थे कि समाजवाद पूंजीवाद की कमजोरियों का समाधान करने में सक्षम है. वह मानवीय नैतिकता का दर्शन है, जो ‘सामाजिकनैतिक लक्ष्य की ओर निरंतर अग्रसर’ रहता है. ध्यातव्य है कि श्रमिक या कारीगर की मूल समस्या मशीनें नहीं हैं. वास्तविक समस्या प्रौद्योगिकी तथा उत्पादन के अन्य साधनों का कुछ लोगों के हाथों में सिमट जाना है, जिससे उनकी उपयोगिता के मायने ही बदल जाते हैं. न केवल उनका लाभ मुट्ठीभर सरमायेदारों तक सीमित रह जाता है, बल्कि प्रकारांतर में वे समाज के बहुसंख्यक वर्ग के शोषण का कारण भी बनते हैं. उनकी मदद से पूंजीवादी तंत्र पहले तो श्रमकौशल को खुद पर निर्भर बनाता है, फिर उसके संभावित विकल्पों को शून्य कर श्रम के मूल्यांकन का अधिकार अपने हाथों में ले लेता है. परिणामस्वरूप शोषण श्रमिक की नियति बन जाता है. पूंजीपति वर्ग की मनमानी के कारण श्रमिक को उसके श्रमकौशल का वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता. प्रौद्योगिकी के विकास के साथसाथ बेरोजगारी बढ़ती है, साथ में कारीगरों, श्रमिकों का शोषण और उत्पीड़नकारी परिस्थितियां भी. एक कुशल समाजविज्ञानी की भांति आइंस्टाइन इन स्थितियों को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं—

मेरी दृष्टि में पूंजीवादी समाज की आर्थिक अराजकता, आधुनिक समाज में व्याप्त समस्त बुराइयों की असली जड़ है. हम देख सकते हैं कि हमारे सामने उत्पादकों की बड़ी संख्या है जिसके सदस्य एकदूसरे की मेहनत की कमाई को हड़प लेने पर उतारू हैं. यह कार्य वे ताकत के बूते नहीं, बल्कि कानूनी तौर पर स्थापित विधिसम्मत व्यवस्थाओं की मदद से कर रहे हैं.’7

उल्लेखनीय है कि आइंस्टाइन के समाजवाद विषयक विचार उस समय सामने आए थे जब सोवियत संघ की प्रेरणा से चीन, लातिनी अमेरिका, वियतनाम आदि देशों में समाजवादी क्रांति का बिगुल बजा हुआ था. आहत मनुष्यता परमाणु बम की विभीषिका से कराह रही थी. प्रथम विश्वयुद्ध की स्थितियों का लाभ उठाकर पूंजीवाद अपनी जड़ें पक्की कर रहा था. राष्ट्रों के बीच व्याप्त हिंसा, प्रतिहिंसा तथा साम्राज्यवादी होड़ के बीच उसे अपना भविष्य सुरक्षित जान पड़ता था. बड़ेबड़े पूंजीपति जिन्होंने सतरहवींअठारहवीं शताब्दी में मशीनीकरण के कारण लोहे और इस्पात की बढ़ती मांग के कारण उसके कारखाने लगाए थे, उनमें से कई हथियार निर्माण की ओर मुड़ चुके थे. पूंजीवादी स्पर्धा से समाज में आर्थिकसामाजिक विषमता की खाई उत्तरोत्तर चैड़ी हो रही थी. इसके फलस्वरूप सामाजिक असंतोष बढ़ता ही जा रहा था. नई शिक्षा एवं लोकतांत्रिक विचारों की रोशनी में लोग अपने अधिकारों की रक्षा हेतु एकजुट होने लगे थे. समाज में नए विचारों का आगमन बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार कर चुका था.

गांधी चाहते थे कि ग्राम स्वावलंबी हों. वहां के लोग आत्मनिर्भर बनें. ताकि अपनी सीमित अर्थक्षमता से सम्मानित जीवन जी सकें. यह आवश्यक भी है. इससे अर्थव्यवस्था और प्रकारांतर में सत्ता के विकेंद्रीकरण का स्वप्न सच होता है. लेकिन जब पूरी दुनिया में प्रौद्योगिकीय क्रांति का नगाड़ा गूंज रहा हो, विज्ञान के क्षेत्र में नित नए आविष्कार सामने आ रहे हों—तब कोई समाज, सभ्यता या समूह उससे वंचित भला कैसे रह सकता है. विशेषकर तब जब संचार प्रौद्योगिकी ने दुनिया को जोड़ दिया हो, यातायात के साधनों द्वारा समस्त विश्व एक परिवार में ढल चुका हो. फिर बढ़ती जनसंख्या के साथ गांवों में जोतें सिकुड़ रही हैं, जिससे कृषिभूमि पर दबाव बढ़ता ही जा रहा है. यदि मान लिया जाए कि ग्रामोद्योग अतिरिक्त श्रमऊर्जा को खपाने में मददगार सिद्ध होंगे तो भी एक समस्या बनी रहेगी कि जब बड़ी संख्या में ग्रामोद्योग होंगे तब उनके उत्पाद की खपत के लिए अतिरिक्त बाजार की आवश्यकता भी पड़ेगी. चीन का ही उदाहरण लें. वहां उत्पादन का बड़ा हिस्सा स्थानीय इकाइयों के माध्यम से होता है. भारत समेत दुनिया के अनेक विकसित और विकासशील बाजारों में उसे खपाया जाता है. इस काम में राज्य उनकी मदद करता है. यदि गांव बाहर बाजार की खोज करना अपरिहार्य हुआ तो स्वाभाविक रूप से ग्रामोद्योग इकाइयों के बीच बाजार को कब्जाने की होड़ भी पैदा होगी. तब स्पर्धा में बने रहने के लिए वे नई वैचारिकी और प्रौद्योगिकी के संपर्क में आएंगे ही. उस समय जो समस्याएं पैदा होंगी, गांधी का अर्थशास्त्राीय दृष्टिकोण हमें उसका निदान नहीं देता. दूसरे गांधीवाद के अपने अंतर्विरोध हैं. उनसे यह प्रतीति भी संभव है कि अपने संरक्षकता के सिद्धांत की ओट में गांधी पूंजीपतियों को बचाए रखना चाहते हैं. जब बड़े उद्यमी, भले ही संरक्षक के रूप में, रहेंगे तो बड़ी मशीनें और उनकी प्राणवायु उच्च प्रौद्योगिकी भी रहेगी ही. उन्हें भी अपने उत्पादों को खपाने के लिए बाजार की आवश्यकता पड़ेगी. उस समय छोटी पूंजी वाले ग्राम एवं कुटीर उद्योग जो पहले ही अपने अस्तित्व के संकट एवं आपसी स्पर्धा से जूझ रहे हैं, बड़ी पूंजीवाले उद्योगों के सामने बाजार में कैसे टिक पाएंगे—संरक्षकता का सिद्धांत इसका कोई समाधान नहीं देता.

कामगार को बेहतर उत्पादन परिस्थितियां देना, जानलेवा श्रम से उसे मुक्ति दिलाना प्रत्येक उधोमुखी सभ्यता का लक्ष्य होता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि उच्च प्रौद्योगिकी अपने साथ अनेक समस्याएं और चुनौतियां लेकर आई थी. इसके बावजूद समाज को उसकी देन कम न थी. शिक्षा और रोजगार के वैकल्पिक संसाधनों के माध्यम से उसने सामंतवाद और उसकी मददगार धार्मिक संस्थानों पर गहरी चोट की थी. जिससे सतरहवींअठारहवी शताब्दियों का वैचारिक विस्फोट संभव हो सका. नए विचारों ने परंपरा एवं संस्कृति के नाम पर शताब्दियों से चली आ रही रूढ़ियों पर चोट की थी, जिससे परंपरावादी शक्तियों का तिलमिला उठना स्वाभाविक था. आइंस्टाइन पर नई वैचारिक चेतना का प्रभाव था, जबकि धर्म और परंपरा से आबद्ध गांधी का संस्कारग्रस्त मन बारबार अतीत की शरण में लौट जाता है. हालांकि वे स्वयं बैरिस्टर थे. फिर भी शिक्षा के प्रति उनके विचार दकियानूसी की भांति परंपरा से बंधे थे. आधुनिक सभ्यता की भांति आधुनिक शिक्षा भी उन्हें अस्वीकार्य थी‘धर्मिक शिक्षा जरूरी मानी जाए. वह शिक्षक के आचरण और उसके मुंह से निकलनी चाहिए. एवं उसके आचरण द्वारा निकलनी चाहिए.’

चूंकि महान व्यक्तित्वों की चूकों का प्रभाव भी बड़ा होता है. इसलिए गांधी के देखतेदेखते प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की परिस्थितियों का लाभ उठाकर देश में एक नवउद्योगपति वर्ग तेजी से उभरा था. बिरला, टाटा, डालमिया, बजाज जैसे औद्योगिक घराने उसके प्रमुख कर्णधारों में से थे. वे सब कांग्रेस के प्रमुख संरक्षकों में से थे. और कांग्रेस से वे इसलिए नहीं जुड़े थे कि उन धनकुबेरों को देश की आजादी से कुछ लेनादेना था. ना ही गांधी के संपर्क से उनका कायाकल्प हुआ था, वे गांधी से इसलिए जुड़े थे क्योंकि रूस और बरास्ते चीन से आती समाजवादी क्रांति की गर्म हवाएं उन्हें भयभीत करती थीं. गांधी उनके लिए सुरक्षित आड़ थे. यह डर आजादी मिलते ही जाता रहा. 1947 के बाद धनकुबेरों को ऐसे माहौल आवश्यकता थी, जिसमें वे खुलकर पांव पसार सकें. उस समय गांधी को किनारे कर दिया गया. दूसरे शब्दों में गांधी के संरक्षकतावाद के विचार को कांग्रेस और उनके करीबी धनकुबेरों ने उसी समय नकार दिया था.

आइंस्टाइन की खूबी है कि वे समाजवाद का समर्थन करते हैं, मनुष्यमात्र के विकास के लिए उसे अपरिहार्य मानते हैं, मगर इसके लिए किसी भी प्रकार की हिंसा उन्हें अस्वीकार्य है. इस लक्ष्य को वे लोकतांत्रिक परिवर्तनों के माध्यम से साधना चाहते हैं. समाजवाद, बरास्ते अहिंसा—उनका स्वप्न है. उनकी निगाह में मनुष्य सर्वोपरि है. अपनी इस धारणा पर वे अडिग हैं. गांधी के लेखों में समाजवाद का जिक्र आता है. मगर इसके लिए वे समाज और अर्थव्यवस्था के मूल ढांचे में अधिक बदलाव के पक्षधर नहीं हैं. अहिंसा, धर्म और परंपरा की सीमाओं में जितना संभव हो, उससे वे संतोष कर लेते हैं. ध्यातव्य है समाजवाद की जड़ों की खोज के लिए धर्म की शरण में चले जाने वाले दार्शनिक विचारकों में गांधी अकेले न थे. जार्ज बनार्ड शॉ, विलियम मॉरिस, जॉन रस्किन, इमर्सन, एडवर्ड कारपेंटर आदि विद्वानों की समाजवाद प्रेरणाएं बाइबिल तथा अन्य ईसाई धर्मग्रंथों से ही निकली थीं. स्वयं गांधी का ‘अंत्योदय’ का विचार रस्किन की पुस्तक ‘अन्टू दिस लास्ट’ से प्रभावित था, जबकि रस्किन को यह प्रेरणा बाइबिल से मिली थी. ‘अनटू दिस लास्ट’ के आरंभ में बाइबिल का एक पद उद्धृत किया गया है, जिसके अनुसार एक किसान यह तर्क देते हुए कि जरूरतें तो सभी की समान हैं, देर से आए श्रमिक को भी दूसरे मजदूरों के बराबर मजदूरी देता है.8 समाजवाद के विश्लेषण हेतु आइंस्टाइन वैज्ञानिक की दृष्टि से काम लेते हैं. उनके लिए समाजवाद संसाधनों, अवसरों की समानता और समान भागीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्यता के उच्चतम आदर्शों से युक्त नैतिक व्यवस्था है. गांधी संरक्षतावाद के शास्त्रीय नाम से, नए विचारों की रोशनी में संदेह के घेरे में आ चुकी दान और शोषण के सांस्कृतिकरण की परंपरा को पुनर्जीवित करना चाहते थे. माजवाद बरास्ते अहिंसा का समर्थन करते हैं. वे संसाधनों और अवसरों के समान वितरण पर उतना जोर नहीं देते जितने कल्याण के संवितरण पर—

यदि समाजवाद बिना किसी हिंसा के आए तो हम उसका स्वागत करेंगे. क्योंकि तब मनुष्य किसी भी तरह की संपत्ति जनता के प्रतिनिधि की तरह और जनता के हित के लिए ही रखेगा; अन्यथा नहीं. करोड़पति के पास उसके करोड़ रहेंगे तो सही, लेकिन वह उन्हें अपने पास धरोहर के रूप में जनता के हित के लिए ही रखेगा.’9

इस लक्ष्य को पाने के लिए गांधी अहिंसा और मानवीय प्रेम की तरफदारी करते हैं—‘मैं घृणा से नहीं अपितु प्रेम की शक्ति से लोगों को अपनी बात समझाऊंगा और अहिंसा के द्वारा आर्थिक समानता पैदा करूंगा.’ विश्लेषण के दौरान गांधी घूमफिरकर धर्म और परंपरा की शरणागत होते हैं. संभवतः यहीं वे चूक जाते हैं. इसलिए कि दुनिया के प्रायः सभी धर्मों का स्वरूप सामंतवादी और केंद्रोन्मुखी रहा है. खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए धर्म नैतिकता का सहारा लेता है, लेकिन अवसर मिलते ही वह नैतिक प्रतिबद्धताओं को बिसराकर सत्तापक्ष की गोद में जा बैठता है और प्रायः उसके हर धत्कर्म का साक्षीसमर्थक बनता है.

आइंस्टाइन के लिए परंपरा का महत्त्व तभी तक है जब तक वह तर्कसम्मत हो और विज्ञान की कसौटी पर खरी उतर सके. उनकी प्राथमिकता विज्ञान का लाभ जनसाधारण तक पहुंचाने की थी. विज्ञान की सीमाओं से भी वे परिचित थे. विज्ञान मनुष्य की सभी समस्याओं का निदान कर सकता है—इस प्रकार का कोई भ्रम उन्हें नहीं था. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. जैविक इकाई के रूप में जहां वह अपने सुख की कामना करता है, बौद्धिक प्राणी होने के नाते वह अपना मानसम्मान और अस्मिता की सुरक्षा चाहता है, वहीं सामाजिक प्राणी के रूप में वह दूसरों के हर्षविषाद में सम्मिलित भी होता है. अकेले व्यक्ति की उपलब्धियां अर्थहीन होती हैं. अतः अपने सामथ्र्य और उपलब्धियों के प्रदर्शन के लिए मनुष्य समाज का सदस्य बनने को बाध्य होता है. मनुष्य और समाज का संबंध एकदूसरे की सामान्य आवश्यकताओं और सामाजिक नैतिकता के आधार पर बनता है. संबंधों में स्थायित्व एवं सफलता के आवश्यक है कि उनका नैतिक आधार आवश्यकताओं की अपेक्षा विस्तृत हो. क्या समाजवाद से मानव जीवन की समस्याओं का समाधान संभव है. आइंस्टाइन इससे आश्वस्त हैं,

इन गंभीर बुराइयों से बचाव का एकमात्र रास्ता है, लोकोन्मुखी शिक्षा प्रणाली की स्थापना तथा अर्थव्यवस्था का समाजवादी नजरिये के अनुरूप निर्धारण, जिसमें उत्पादन के साधन समुदाय के अधीन हों. उत्पादन का स्वरूप लोगों की आवश्यकता के अनुसार तय होना चाहिए और काम का विभाजन इस तरह से हो कि स्त्रीपुरुष, बच्चे जो भी काम कर सकते हैं, उन्हें काम मिले और किसी के सामने आजीविका संबंधी संकट न हो.’10

आइंस्टाइन ने समाजवाद का पक्ष लिया था. परंतु उसके नाम पर समाज में जो हो रहा है, उसके प्रति वे बहुत आश्वस्त नहीं थे. वे मान रहे थे कि समाज में समाजवाद को लेकर अत्यधिक अस्पष्टता है. सबसे बड़ा संकट ईमानदार विमर्श का है. उन्हें लगता था कि समाजवाद के नाम पर प्रचलित विभिन्न परिभाषाओं, अवधारणाओं तथा अर्थहीन बहसों ने उसको बहुत नुकसान पहुंचाया है. जिससे समाजवादी राज्य का सपना एक टोटम में सिमट चुका है. आइंस्टाइन के इस तर्क से उपन्यासकार जार्ज आरवेल की याद आने लगती है. समाजवाद को लेकर बुद्धिजीवियों की अनर्थक बहसों पर कटाक्ष करते हुए आरवेल ने कहा था—‘अंग्रेज बुद्धिजीवियों के साम्यवाद को समझने की कोशिश की जाए तो वह बहुत कुछ पागलों की देशभक्ति के समान है.’11 यह कोई नई बात नहीं है, समाजवाद और उसके विविध संकायों को लेकर इस प्रकार की अचरजनुमा टिप्पणियां शताब्दियों से होती आ रही हैं. आइंस्टाइन का आशय उदार और विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था से था. ऐसे समाजवादी राज्य का सपना उनके दिमाग में था जो अधिकतम लोकतांत्रिक और आर्थिकसामाजिक समानता के सिद्धांत पर टिका हो. जिसमें राज्य की नियंत्रणकारी शक्तियां अधिक जिम्मेदार और लोकप्रतिबद्ध हों.

गांधी की भांति आइंस्टाइन की करुणा भी मानव समाज तक सीमित न थी. उसमें प्राणिमात्र के प्रति करुणाभाव अंतर्निहित था. गांधी शाकाहार के समर्थक थे. भारतीय आमतौर पर, शाकाहारी न हों तो भी, उसे लेकर संवेदनशील होते हैं. इस संबंध में आइंस्टाइन की भावनाएं गांधी से मेल खाती थीं. शाकाहार का समर्थन करते हुए उन्होंने लिखा था—‘मानवीय स्वास्थ्य एवं पृथ्वी पर जीवन की उत्तरजीविता के निमित्त कोई भी इतना सहायक नहीं है, जितना शाकाहार को बढ़ावा देना.’12 इसलिए कि मनुष्यता की कसौटी वर्चस्व में न होकर सहयोगभावना में है. सबके साथ मिलजुलकर रहने में है. अपने साथसाथ दूसरे के अस्तित्व की रक्षा और मानसम्मान में है. न केवल मनुष्य, बल्कि प्राणिमात्र के प्रति करुणा की भावना से भरपूर यह नैतिक संदेश प्रायः हर संस्कृति का मूल स्वर रहा है. ‘सर्वे सुखिन भवंतु, सर्वे संतु निरामया’—गांधी इस औपनिषदिक कामना को राष्ट्रराज्य की प्रमुख पहचान के रूप देखना चाहते हैं. यह भावना गांधी द्वारा शाकाहार के समर्थन से भी अभिव्यक्त होती है—‘किसी राष्ट्र की महानता उसके द्वारा पशुओं के प्रति किए गए व्यवहार से आंकी जा सकती है.’13 जीवदया के प्रति धार्मिक द्रष्टिकोण इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना करुणा का संस्कार. करुणा का यही संस्कार गांधीवाद की आत्मा है. यही वह गुण है जो आइंस्टाइन को बारबार गांधी की ओर खींच लाता था. गांधी के प्रति अपनी श्रद्धा और सम्मान को आइंस्टाइन ने कई अवसरों पर व्यक्त किया था. आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एस. राधाकृष्णन गांधी के सत्तरवें जन्मदिन पर एक पुस्तक संपादित करना चाहते थे. उन्होंने पत्र लिखकर आइंस्टाइन से उसमें सहयोग देने को कहा. उस अवसर पर आइंस्टाइन ने गांधी की प्रशस्ति में लिखा—

राजनीतिक इतिहास के क्षेत्र में महात्मा गांधी का योगदान अन्यतम है. उन्होंने अपने देश के गरीब, वंचित एवं दमित लोगों की स्वतंत्रता हेतु एकदम नए और मानवीय औजार विकसित कर उनका प्रयोग अपनी संपूर्ण निष्ठा और कर्तव्यबोध के साथ किया है. दुनिया के आधुनिक सभ्य समाजों तथा उनके चिंतनधर्मा बुद्धिजीवियों पर उनका जो प्रभाव पड़ा है, वह तलवार के जोर पर की गई कार्रवाहियों की अपेक्षा कहीं अधिक गहरा और स्थायी है. इस कसौटी पर केवल उन्हीं राजनयिकों का योगदान सराहनीय हो सकता है जो शिक्षा, लोकचेतना तथा नैतिकता की स्थापना द्वारा अपने लोगों के लिए नैतिक राज्य की स्थापना कर सकते हैं. यह हम सभी के लिए अत्यंत प्रसन्नता और सम्मान का विषय है कि हम ऐसी महान, प्रतिभा संपन्न शख्सियत से सीधे संवाद करने में सक्षम हैं.’14

गांधी की कथनी और करनी में अद्भुत एकता थी. उन्हें अपने ऊपर विश्वास था और खुद के निर्णयों पर वे इतने दृढ़ रहते थे कि उनके अपने ही साथी कभीकभी उन्हें हठी और दुराग्रही तक कह देते थे. अपवादस्वरूप ही सही परिस्थितियों के आगे गांधी को भी झुकना पड़ा और आइंस्टाइन को भी. दूसरी ओर यह भी सच है कि जब भी इन महापुरुषों को समझौते के लिए बाध्य किया गया, उसका नुकसान पूरे समाज को झेलना पड़ा. गांधी देश के विभाजन के विरोधी थे. उन्होंने कहा था कि हिंदुस्तान का बंटवारा उनकी लाश से गुजरकर होगा. मगर तत्कालीन नेताओं के आगे उनकी एक न चली. आजादी के बाद तो वे पूरी तरह किनारे कर दिए गए. जिन धनकुबेरों से वे कामना करते थे कि वे आजाद भारत में सरंक्षकतावाद के आदर्श को अपनाएंगे, खुद को संपत्ति का सरंक्षक मानकर व्यवहार करेंगे, जो गांधीवादी होने का दिखावा करते थे, वे अपने ही जैसे स्वार्थी नेताओं के संग मिलकर आजादी के बाद के माहौल को भुनाने में लग गए. इससे आजादी के बाद देश के वास्तविक निर्माण का जो सपना गांधी ने देखा था, और जिसकी कामना इस देश का आम नागरिक करता था, वह उत्तरोत्तर दूर होता चला गया. नवनिर्माण के बहाने देश के संसाधन धनकुबेरों के हवाले किए जाने लगे. इससे देश में आर्थिक विभाजन में तेजी आई और वह आर्थिकराजनीतिक विकेंद्रीकरण के लक्ष्य से दिनांेदिन दूर होता गया. सत्ता चंद राजनीतिक परिवारों तक और संसाधन मुट्ठीभर धनकुबेरों तक सिमटते चले गए.

कुछ ऐसा ही आइंस्टाइन के साथ हुआ. वे नहीं चाहते थे कि उनकी खोज का उपयोग परमाणु बम के लिए किया जाए. लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्थितियां इतनी तेजी से बदलीं कि उन्हें उसके लिए अनुमति देनी ही पड़ी. जर्मनी में हिटलर परमाणु शक्ति हासिल करने के लिए रातदिन एक किए था, जिसने अमेरिका की चिंता बढ़ा दी थी. एक प्रकार से वह भी स्पर्धा ही थी, मारक हथियारों की होड़ में आगे निकलने की. दूसरे विश्वयुद्ध की आहट के बीच अमेरिकी भौतिक विज्ञानी लियो सिजलॉर्ड तथा यूजीन विगनर राष्ट्रपति रूजवेल्ट का संदेश लेकर आइंस्टाइन से मिले. उन्होंने उनसे परमाणु बम बनाने के लिए सहमतिपत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा था. आइंस्टाइन से कहा गया कि बम दुनिया में शक्ति संतुलन कायम करने के काम आएगा. परमाणु बम होगा तो किसी दुश्मन की युद्ध छेड़ने की हिम्मत ही नहीं पड़ेगी. आइंस्टाइन उसके लिए भी तैयार न थे. लेकिन जब उनसे कहा गया कि यदि अवसर चूके तो हिटलर अमेरिका से पहले परमाणु बम बनाने में सफल हो जाएगा, तो वे सोच में पड़ गए. यहूदी होने के कारण उन्हें जर्मनी छोड़कर अमेरिका में शरण लेनी पड़ी थी. इसका उन्हें मलाल था. ‘तानाशाह के हाथों में अकूत ताकत आने से अच्छा है कि बम अमेरिका के हाथों में रहे, जो एक लोकतांत्रिक राज्य है.’ आइंस्टाइन का कुछ ऐसा ही सोचना था. असल में यह उनका खुद को दिया गया भरोसा था. यह आभास उन्हें था कि यदि हस्ताक्षर न भी करेंगे तो भी युद्धोन्मत्त शक्तियां एक न एक दिन बम का आविष्कार कर ही लेंगी. इसलिए पत्र पर हस्ताक्षर कर लौटा दिया. रूजवेल्ट को लिखे पत्र के बाद अमेरिका में मेनहट्टन परियोजना में गति आई. आखिर बम बना. उस समय उन्होंने शायद ही यह कल्पना की हो कि उनकी खोज हिरोशिमा और नागसाकी की भीषण तबाही, मनुष्यता के कलंक का कारण बनेगी. यह अपराधबोध उन्हें आजीवन बना रहा. नबंवर 1954 में अपनी मृत्यु से पांच महीने पहले परमाणु बम बनाने की अनुमति देने को आइंस्टाइन ने जीवन की सबसे बड़ी भूल स्वीकार किया था. हालांकि यह भी माना कि वह उस समय की परिस्थितियों की मांग थी. इसके बावजूद वे इस आत्मग्लानि से कभी न उबर सके. इसी ने उन्हें गांधी के करीब लाने का काम किया. उन्हें लगता था कि युद्धोन्मत्त राजसत्ताओं के बीच गांधी का अहिंसा रास्ता ही श्रेय की ओर ले जा सकता है. उसी पर चलकर लोकतंत्र को बचाया जा सकता है. जापान में बमबारी के वर्षों बाद वहां के एक दैनिक ‘कैजो’ ने आइंस्टाइन से परमाणु बम के प्रयोग पर टिप्पणी करने को कहा. प्रत्युत्तर में पत्र संपादक के नाम 1952 में आइंस्टाइन ने जो पत्र लिखा, उसमें एक बार फिर गांधी के प्रति आस्था और विश्वास झलकता था. हालांकि उस समय तक गांधी की हत्या को तीन वर्ष बीत चुके थे. पत्र में आइंस्टाइन गांधी को सम्मानपूर्वक याद किया था—

गांधी, हमारे समय के महानतम राजनीतिज्ञ प्रतिभा ने हम सत्य और अहिंसा के उस रास्ते से परचाया है, जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए. उन्होंने यह प्रमाणित कर दिया कि एक व्यक्ति के मन में सत्य के लिए उत्सर्ग की भावना हो तथा रास्ता सही हो तो वह कुछ भी प्राप्त कर सकता है. भारतीय स्वाधीनता के लिए उनका कार्य इस बात का स्वतः प्रमाण है कि अदम्य विश्वास से युक्त मनुष्य की दृढ़ इच्छाशक्ति अजेय समझी जाने वाली सैन्य ताकतों से कहीं अधिक ताकतवार है.’15

एक वैज्ञानिक के रूप में आइंस्टाइन को जो लोकप्रियता मिली, वह अद्वितीय थी. उतनी ख्याति मानसम्मान उससे पहले शायद ही किसी और वैज्ञानिक को मिला हो. यूं भी जनसाधारण प्रायः ऐसे चरित्रों को पूजतासराहता है, जिनका उसके अपने जीवन से वास्ता हो. या जो लोकप्रियता की उसकी कसौटी पर खरे उतरते हों. आइंस्टाइन, उनके द्वारा प्रस्तुत सापेक्षिकता का सिद्धांत, समय का वेग आदि जनसाधारण की समझ से ऊपर की चीजें थीं. फिर भी आइंस्टाइन को इतनी मिली असाधारण ख्याति के आगे न्यूटन की चमक भी फीकी पड़ गई, जिनकी पुस्तक ‘दि प्रंसीपिया मैथेमेटिका’ को वैज्ञानिकों के धर्मग्रंथ का दर्जा प्राप्त है. और जिसके आविष्कारों ने पंद्रहवींसोहलवीं शताब्दी की वैज्ञानिकसामाजिक क्रांति की नींव तैयार की थी. लोकहित के हिसाब से देखा जाए तो एडवर्ड जेनर(1749—1823) द्वारा वैक्सीन तथा एलेक्जेंडर फ्लेमिंग(1881—1955) द्वारा पेनसिलीन की खोज मनुष्यता के इतिहास की सबसे चामत्कारिक और कल्याणधर्मी खोजें थीं. उनकी सहायता से महामारियों पर काबू पाना संभव हो सका. आइंस्टाइन के बाद भी अनेक प्रतिभासंपन्न वैज्ञानिक हुए हैं, जिन्होंने चिकित्सा, भौतिक विज्ञान और जीन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विलक्षण आविष्कार किए हैं. इसके बावजूद एडवर्ड जेनर, फ्लेमिंग, लुई पाश्चर, नील रदरफोर्ड अथवा आइंस्टाइन से पहले और बाद में जन्मे अन्य वैज्ञानिकों को वैसी लोकप्रियता प्राप्त न हो सकी, जो उन्हें सहज रूप से प्राप्त थी. उन्हें शताब्दी का ‘जीनियस’ कहकर पुकारा गया. उससे पहले यह सम्मान शायद ही किसी को मिला था. इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि आइंस्टाइन ने समय के वेग के बारे में जो अनूठी जानकारी दी थी, उसमें परीकथाओं जैसा रोमांच था. अतः समय की जादुई गति को आधार मानकर विश्वविख्यात उपन्यास लिखे गए. समय को तेज गति से दौड़ते हुए दर्शाना, उसके वेग का आकलन करना फंतासीनुमा खोजें थीं. उनके फलस्वरूप आइंस्टाइन को भी लोकप्रियता हासिल हुई. दूसरे वे खुद अच्छे लेखक थे. उनके लिखे गए करीब 500 शोधपत्रों में से लगभग 150 समाजविज्ञान तथा मानविकी की दूसरे विषयों पर थे. तीसरा और महत्त्वपूर्ण और बड़ा कारण था—डर का मनोविज्ञान. आइंस्टाइन की खोज के फलस्वरूप परमाणु ऊर्जा के रूप में एक विराट शक्ति मनुष्य के हाथ में आ गई, जो मनुष्य को सहलाती नहीं, डराती थी. और डर का प्रभाव अपेक्षाकृत स्थायी होता है. इसलिए आइंस्टाइन का नाम जनसाधारण के दिलोदिमाग पर छाता चला गया. इसी तरह देखा जाए तो ‘सविनय अवज्ञा’, ‘सत्याग्रह’ अथवा ‘अंत्योदय’ जैसे विचार भी गांधी की मौलिक खोज भले न हों, मगर जिस निष्ठा और अटल विश्वास के साथ उन्होंने उनको जीवन में उतारा उससे इतना तो कहा ही जा सकता है कि यदि गांधी न होते तो ये विचार भी पुस्तकों में कैद अनगिनत विचारों की भांति कहीं दबे रह गए होते.

डरा हुआ आदमी दूसरों को सावधान रहने की सलाह देता है. आइंस्टाइन का आविष्कार लोगों को डराता था. परंतु यह डर खुद आइंस्टाइन का भी था. उनका डर अकारण भी नहीं था. अल्फ्रेड नोबेल का उदाहरण उनके आगे था. प्रसंगवश बता दें कि मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मा अल्फ्रेड नोबेल बड़ा होकर अपने समय का सबसे हथियार निर्माता बना. एक कामयाब पूंजीपति जिसने युद्धोन्मत्त शक्तियों को हथियार बेचकर बेशुमार दौलत बटोरी थी. विस्फोटक ‘डायनामाइट’ के अलावा करीब 350 हथियारों के पेटेंट नोबेल के हाथ में थे. परंतु एक घटना ने नोबेल का ऐसा हृदयपरिवर्तन किया कि उसका मकसद ही बदल गया. वह घटना 1888 की है. अल्फ्रेड नोबेल का भाई लुडविग नोबेल फ्रांस में केंस की यात्र के लिए पहुंचा हुआ था. वहीं उसका देहांत हो गया. एक फ्रांसिसी समाचारपत्र को यह समाचार मिला तो बगैर ज्यादा जांचपड़ताल किए, उतावलेपन में समाचार छाप मारा. यह समझकर कि डायनामाइट का आविष्कारक स्वयं अल्फ्रेड नोबेल मारा गया है, अपने समाचारपत्र में मोटे हरफों में छापा. शीर्षक था—‘मौत के सौदागर की मौत.’ संयोगवश वह समाचारपत्र नोबेल के हाथों में पहुंचा. पढ़ते ही उसके दिल को जबरदस्त धक्का लगा. तब मृत्योपरांत अपनी प्रतिष्ठा और मानसम्मान को बचाए रखने तथा समाज के बुद्धिजीवी वर्ग को अपने अधिकार में रखने के लिए उसने एक ट्रस्ट का गठन किया, उसके माध्यम से नोबेल पुरस्कारों की शुरूआत हुई. अल्फ्रेड नोबेल के साथ घटी इस घटना ने आइंस्टाइन को भी प्रभावित किया. परमाणु शक्ति के आविष्कारक होने के कारण उनके आलोचक भी कम न थे. ऐसे लोग भी थे जो उनके शांति प्रस्तावों को दिखावा कहा करते थे. 1933 में मैकुले रेमंड ने उनका एक कार्टून बनाया था. जिसमें आइंस्टाइन के हाथ में तलवार थी. और वे ताकत के मद में अपनी बांह चढ़ाते दिखाए गए हैं. वह आइंस्टाइन के शांतिप्रस्तावों पर आलोचक की नजर थी, जिसमें उनकी शांतिवादी नीतियों पर कटाक्ष किया था. आलोचक गलत नहीं हैं, यह आइंस्टाइन भी समझते थे. अपने आविष्कार के दुरुपयोग का डर उन्हें गांधी के करीब लाता रहा. इसके लिए जब, जहां भी उन्हें अवसर मिला, गांधी के प्रति अपने स्नेहसम्मान का उन्होंने मुक्तकंठी बयान किया. अपनी पुस्तक ‘आउट आॅफ माई लेटर ईयर्स’ में गांधी पर प्रशंसात्मक टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा है—

जनसाधारण का नेता, जिसको लगातार कमजोर पड़तीं औपनिवेशिक शक्तियों का समर्थन प्राप्त है. एक ऐसा जननेता जिसकी सफलता कूटनीति, राजनयिक चातुर्य अथवा दूसरों पर अधिकार जमाने के लिए छिछले राजनीतिक दांवपेंच पर निर्भर नहीं है. उसके पास केवल सच को अभिव्यक्त करने की कला है, एक काया है जिनमें इंसानियत और ज्ञान दोनों साथसाथ विद्यमान हैं. उसके हथियार संवेदना और सहिष्णुता हैं, जो उसने अपने समाज को सुरक्षित और सुदृढ़ बनाने के लिए गढ़े हैं. ऐसा इंसान जो आमजन का प्रतीक है. जिसने यूरोपीय नृशंसता और क्रूरता का सामना किया है, और जो जनसाधारण का मसीहा है. इस तरह उसका प्रभाव अमिट है….पीढ़ियों के बाद इस बात पर शायद ही कोई विश्वास करेगा कि इस प्रकार का सचमुच जीताजागता मनुष्य इस धरती पर था. इस तरह वह सार्वकालिक उदीयमान सितारा है.’16

गांधी नेता भी थे और सामाजिक कार्यकर्ता भी. लोकमानस से जुड़े मुद्दों पर उनकी कितनी गहरी पकड़ थी, वैसी शायद ही किसी और नेता की रही हो. उन्होंने कुशल राजनयिक की भांति सरकार और जनता से संवाद किया और एक दक्ष समाजविज्ञानी की भांति लोकहित से जुड़े विषयों पर बोलते रहे. गांधी के व्यक्तित्व की भांति उनकी शैली भी सरल है. चाहे भाषण हों या पत्रकारिता, हर जगह उनका कुशल शैलीकार छाया रहता है. उनकी बनिस्पत आइंस्टाइन लेखनशैली विवेचनापरक है. उसमें गंभीरता है. वाक्य अपेक्षाकृत लंबे हैं, भाषा अपेक्षाकृत जटिल. इसके बावजूद एक प्रवाह उनकी शैली में है, जिसके कारण वे पठनीय बने रहते हैं. गांधी एक प्रवाह से साथ अपने विचारों में बहा ले जाते हैं, आइंस्टाइन की शैली में मुग्ध कर देने वाली परिनिष्ठता है. अपनी बहुमुखी प्रतिभा से दार्शनिकवैज्ञानिक आइंस्टाइन हमें उस युग की याद दिला देते हैं, जब विज्ञान, इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्रा आदि सब एक ही विषय के अंतर्गत आते था—वह था दर्शन. पारमेनिडिस, डेमोक्रिटिस, पाइथागोरस, अरस्तु, जेनो आदि आरंभिक यूनानी दार्शनिकों की जितनी पैठ दर्शन के क्षेत्र में थी, उतनी ही विज्ञान में. आइंस्टाइन को विज्ञान और धर्म के सहसंबंध से बड़ी उम्मीद थी. ईश्वर उनके लिए रूढ़ विश्वास न होकर, आध्यात्मिक विवेचना का विषय था, जिसे वे अपने लेख ‘धर्म और विज्ञान’ में विस्तार देते हैं. ‘समाजवाद क्यों?’ में वे चारों और व्याप्त आर्थिक विसंगतियों तथा उनके कारण जनसाधारण को जो दुश्वारियां झेलनी पड़ती हैं, उनके प्रति चिचिंत नजर आते हैं. आइंस्टाइन को गांधी का अहिंसापथ स्वीकार्य है तो अर्थदर्शन को लेकर वे बर्ट्रेंड रसेल के बहुत करीब नजर आते हैं. रसेल की पुस्तक ‘ए रोड टू फ्रीडम’ में जिस लोकतांत्रिक, विकेंद्रीकृत, समानताधारित और जनसहयोगात्मक अर्थव्यवस्था की ओर संकेत किया गया है, आइंस्टाइन के लेखों में उसी चेतना का प्रवाह है. विज्ञान और दर्शन के समन्वय से उन्हें जो उम्मीदंे थीं, उनकी छाया आइंस्टाइन के चिंतन पर एकदम साफ नजर आती है.

आइंस्टाइन के दिलोदिमाग पर गांधी कितने छाए हुए थे, इसका एक और उदाहरण नीचे दी गई टिप्पणी है. यूरोशलम की हिब्रू यूनीवर्सिटी के आइंस्टाइन संग्रहालय से प्राप्त यह टिप्पणी जिस कागज पर है, उसके आधे से अधिक हिस्से पर वे गणित की पहेली को हल करने में जुटे हैं. निचले हिस्से पर एकदम अनौपचारिक और आकस्मिक ढंग से लिखी गई यह टिप्पणी है, मानो गणित में डूबा हुआ मन अचानक गांधी की ओर बढ़ चला हो. ऐसा तभी होता है, जब व्यक्ति अपने को आदर्श मान चुका हो. आइंस्टाइन की गांधी के प्रति श्रद्धाभाव कुछ ऐसा ही था—

राजनीति के इतिहास में महात्मा गांधी की उपलब्धियां अद्वितीय हैं. उन्होंने एक पराधीन देश की स्वतंत्रता के लिए नए और इंसानियत से भरपूर रास्ते की खोज की. तथा उसपर अपनी निष्ठा और संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ बढ़ते गए. मानवता पर उनके विचारों का प्रभाव हमारी कल्पना से, जो अन्यायी की ताकत का बढ़चढ़कर आंकने की अभ्यस्त है, से कहीं अधिक चिरस्थायी है. क्योंकि अंत तो केवल उस राजनेता का होगा जिसने अपने लोगों को अपनी शिक्षा और नैतिक आचरण से ऊपर उठाने की कोशिश की है. हमें इस बात के लिए खुश होना चाहिए कि उन्होंने जो नैतिक ऊंचाई हमें दी है, वह आने वाली पीढ़ियों को भी प्रभावित करेगी. उनके लिए आदर्श होगी.’17

गांधी के प्रति आइंस्टाइन का सम्मान इस मृत्युलेख से भी होता है, जो उन्होंने गांधी की हत्या के तीन सप्ताह बाद वाशिंग्टन में आयोजित एक स्मृतिसभा के लिए लिखा था, ‘केवल सत्यानुयायी, अहिंसक और पवित्र समाजवादी ही दुनिया में या हिंदुस्तान में समाजवाद फैला सकता है. जहां तक मैं जानता हूं, दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है जो पूरी तरह समाजवादी हो. मेरे बताये हुए साधनों के बिना ऐसा समाज कायम करना असंभव है.’ आगे गांधी को सम्मानपूर्वक याद करते हुए आइंस्टाइन लिखते हैं—‘हर वह इंसान जो मनुष्यता की बेहतरी का सपना देखता है, उसको गांधी की असामयिक, त्रसद हत्या ने हिला दिया है. उन्होंने अपने आदर्शों के लिए, अहिंसा के पक्ष में मृत्यु का वरण किया है, इसलिए उन्हें मार डाला गया. इसलिए भी कि देश में अशांति और अव्यवस्था के वातावरण के बावजूद वह किसी भी प्रकार की सुरक्षा लेने को तैयार न था. यह उसका अटूट विश्वास था कि ताकत का उपयोग अपने आप में ही बुराई है.’ आज न तो गांधी हैं न आइंस्टाइन, परंतु आइंस्टाइन की बौद्धिक प्रखरता और गांधी की सत्य को परखने और उसके लिए हर जोखिम उठाने का साहस हमें निरंतर कुछ नया सोचने, आगे बढ़ने और मनुष्यता में विश्वास रखने की प्रेरणा देता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

अनुक्रमणिका

1. You have shown by all you have done that we can achieve the ideal even without resorting to violence. We can conquer those votaries of violence by the non-violent method. Your example will inspire and keep humanity to put an end to a conflict based on violence with international help and cooperation guaranteeing peace of the world. With this expression of my devotion and admiration I hope to be able to meet you face to face. Einstein and the Indian minds: Tagore, Gandhi and Nehru, Rasoul Sorkhabi.

2. I was delighted to have your beautiful letter sent through Sundaram. It is a great consolation for me that the work I am doing finds favor in your sight. I do indeed wish that we could meet face to face and that too in India at my Ashram. 10 October 1931.—Ibid.

3. We have physicists, geometricians, chemists, astronomers, poets, musicians, and painters in plenty; but we have no longer a citizen among us; or if there be found a few scattered over our abandoned countryside, they are left to perish there unnoticed and neglected. Such is the condition to which we are reduced, and such are our feelings towards those who give us our daily bread, and our children milk.- Rousseau, Discourse on the Arts and Sciences

4. The priests, in control of education, made the class division of society into a permanent institution and created a system of values by which the people were thence forth, to a large extent unconsciously, guided in their social behavior.— Albert Einstein in Why Socialism?, Monthly Review (May 1949).

5. Production is carried on for profit, not for use. There is no provision that all those able and willing to work will always be in a position to find employment; an “army of unemployed” almost always exists. The worker is constantly in f ear of losing his job. Since unemployed and poorly paid workers do not provide a profitable market, the production of consumers’ goods is restricted, and great hardship is the consequence. Technological progress frequently results in more unemployment rather than in an easing of the burden of work for all. The profit motive, in conjunction with competition among capitalists, is responsible for an instability in the accumulation and utilization of capital which leads to increasingly severe depressions. Unlimited competition leads to a huge waste of labor, and to that crippling of the social consciousness of individuals which I mentioned bef ore. This crippling of individuals I consider the worst evil of capitalism. Our whole educational system suffers from this evil. An exaggerated competitive attitude is inculcated into the student, who is trained to worship acquisitive success as a preparation for his future career.—Albert Einstein, Monthly Review (May 1949).

6. I admire Gandhi greatly but I believe there are two weaknesses in his program; while nonresistance is the most intelligent way to cope with adversity, it can be practiced only under ideal conditions. It may be feasible to practice it in India against the British but it could not be used against the Nazis in Germany today. Then, Gandhi is mistaken in trying to eliminate or minimize machine production in modern civilization. It is here to stay and must be accepted. —‘Peace Must Be Waged,’ Interview with Robert Merrill Bartlett in the Survey Graphic, August 1935, Nathan and Norden (1968), ref. 15, p. 261.

7. The economic anarchy of capitalist society as it exists today is, in my opinion, the real source of the evil. We see before us a huge community of producers the members of which are unceasingly striving to deprive each other of the fruits of their collective labor—not by force, but on the whole in faithful compliance with legally established rules. In this respect, it is important to realize that the means of production—that is to say, the entire productive capacity that is needed f or producing consumer goods as well as additional capital goods—may legally be, and f or the most part are, the private property of individuals.—Why Socialism?

8. Friend, I do thee no wrong.

Didst not thou agree with me for a penny?

Take that thine is, and go thy way.

I will give unto this last even as unto thee.”

“If ye think good, give me my price;

And if not, forbear.

So they weighed for my price thirty pieces of silver.”— John Ruskin‘s Unto This Last.

9. हरिजन, 13 मार्च 1937, मेरे सपनों का भारत, पृष्ठ—31

10. I am convinced there is only one way to eliminate these grave evils, namely through the establishment of a socialist economy, accompanied by an educational system which would be oriented toward social goals. In such an economy, the means of production are owned by society itself and are utilized in a planned fashion. A planned economy, which adjusts production to the needs of the community, would distribute the work to be done among all those able to work and would guarantee a livelihood to every man, woman, and child.—Why Socialism?

11. The Communism of the English intellectual is something explicable enough. It is the patriotism of the deracinated. Orwell, George, Inside the Whale(1940)

12. Nothing will benefit human health and increase chances for survival of life on Earth as much as the evolution to a vegetarian diet”. ~Albert Einstein.

13. The greatness of a nation…can be judged by the way its animals are treated”. –Mahatma Gandhi.

14. Mahatma Gandhi’s life’s work is unique in political history. He has devised a quite new and humane method for fostering the struggle for liberation of his suppressed people and has implemented it with greatest energy and devotion. The normal influence which it has exerted on the consciously thinking people of the entire civilized world might be far more lasting than may appear in our time of overestimation of brutal methods of force. For only the work of such statesmen is lasting who by example and educational action awaken and establish the moral forces of their people. We may all be happy and grateful that fate has given us such a shining contemporary, an example for coming generations. –Radhakrishnan, S. (ed.), Birthday Volume to Gandhi, George Allen & Unwin, London, 1939. (Mahatma Gandhi: s and Reflections on His Life and Work: Presented to Him on His Seventieth Anniversary, 2 October 1939, 2nd edn, 1949, p. 557).

15. Gandhi, the greatest political genius of our time, indicated the path to be taken. He gave proof of what sacrifice man is capable once he has discovered the right path. His work in behalf of India’s liberation is living testimony to the fact that man’s will, sustained by an indomitable conviction, is more powerful than material forces that seem insurmountable.-Reply to the Editor of Kaizo”, 1952, Rowe 488-489.

16. A leader of his people, unsupported by any outward authority: a politician whose success rests not upon craft nor the mastery of technical devices, but simply on the convincing power of his personality; a victorious fighter who has always scorned the use of force; a man of wisdom and humility, armed with resolve and inflexible consistency, who has devoted all his strength to the uplifting of his people and the betterment of their lot; a man who has confronted the brutality of Europe with the dignity of the simple human beings, and thus at all times risen superior.

Generations to come, it may be, will scarce believe that such a one as this ever in flesh and blood walked upon this earth. – Einstein, A., Out of My Later Years, Philosophical Library, New York, 1950, p. 240.

17. Mahatma Gandhi’s life achievement stands unique in political history. He has invented a completely new and humane means for the liberation war of an oppressed country, and practised it with greatest energy and devotion. The moral influence he had on the conciously thinking human being of the entire civilized world will probably be much more lasting than it seems in our time with its overestimation of brutal violent forces. Because lasting will only be the work of such statesmen who wake up and strengthen the moral powerof their people through their example and educational works.We may all be happy and grateful that destiny gifted us with such an enlightened contemporary, a role model for the generations to come. source : http://streams.gandhiserve.org/einstein.html.


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Filed under गांधी और आइंस्टाइन, दर्शन, भारतीय समाजवाद

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