बालक और समाज

कोई भी समाज चाहे जितना उदार हो, वह हमेशा चाहता है कि भविष्य के नागरिक के रूप में बालक स्थापित मान्यताओं को समझे, उनका पालन करे. उसकी आचारसंहिता, रीतिरिवाजों को अपनाए तथा तयशुदा मर्यादाओं में रहकर व्यवहार करे. यह न तो अनुचित है न ही अस्वाभाविक. आखिर समाज किसी एक व्यक्ति या एक दिन की रचना तो नहीं! उसको बनने में सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं. हजारों लोग उसकी विकासमान अवस्था को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार होते हैं. जबकि लाखोंकरोड़ों व्यक्ति उसकी आचारसंहिता जिसे प्रायः पंरपरा अथवा रीतिरिवाज कहा जाता है, से जुड़े हो सकते हैं. यह डर भी अन्यथा नहीं है कि समाज यदि अपने प्रत्येक नागरिक को तयशुदा नियमों, मर्यादाओं के पालन से छूट देने लगे तो उसका मूलभूत ढांचा ही चरमरा जाएगा. सभ्यता और संस्कृति के तब कोई मायने ही नहीं रहेंगे. बालक को यह छूट न दिए जाने के संबंध में एक तर्क यह भी हो सकता है कि उसे समाज के बारे में बहुतकुछ सीखनासमझना होता है. किसी परंपरा या रीतिरिवाज की अंतर्निहित विशेषताओं, उसकी खूबियोंखामियों को समझने के बाद ही उसकी आलोचनासमीक्षा करना न्यायसंगत माना जाता है. तदनुसार बालक से अपेक्षा होती है कि स्वयं को योग्य शिष्य दर्शाते हुए उससे जितना बन पड़े, गुरुसमाज से ग्रहण करे. समाज का दिया लौटाने को तो उम्र पड़ी है.

 

सुनने में यह बहुत तर्कसंगत और आदर्श प्रतीत होता है. समस्या यह है कि जिसे हम सीखना कहते हैं, वह स्थापित मान्यताओं, रीतिरिवाजों, विभिन्न ज्ञानशैलियों का बोध तथा उसके प्रति अनुकूलन है. औपचारिक शिक्षा का अधिकांश विद्यार्थी को समाज अथवा समाजों की सभ्यता, सांस्कृतिक विशेषताओं, उपलब्धियों से परचाने पर खर्च होता है, उसमें बालक के मौलिक विकास की बहुत कम संभावना होती है. प्रकट में हर समाज मौलिक ज्ञान को बढ़ावा देने की बात करता है. इसके निमित्त भारीभरकम तामझाम भी रचता है, मगर तब उसका आयोजन एकपक्षीय होता है. उसकी खास सुविधाएं अभिजनवर्ग से आगे बढ़ ही नहीं पातीं. निर्णायक पदों पर विराजित अभिजन समाज के बहुसंख्यक वर्ग को बहुत आसानी से छोटेछोटे गुटों में बांट देते हैं. इतने छोटे कि संख्याबल में कहीं अधिक होने के बाबजूद जनसाधारण स्वयं को शक्तिविहीन मान लेता है. यही विश्वास उसको समझौतावादी बनाए रखता है. निर्णायक पदों पर विराजमान अभिजन वर्ग समाज की कुल पूंजी एवं संसाधनों का उपयोग अपने वर्गीय हितों की पूर्ति हेतु करता है. बालक के संबंध में अभिजन मानसिकता, उसको भविष्य का अभिजन बनाने के प्रलोभन के बहाने, फिलहाल निर्णय प्रक्रिया से किनारे कर देने की होती है. पूंजी आधारित समाजों में जहां हर नई खोज पूंजीपति की तिजोरी को भरने के काम आती है, समाज, सभ्यता और संस्कृति के कमजोर पक्षों पर चर्चा या तो की नहीं जाती अथवा उसके मायने इस प्रकार बदल दिए जाते हैं कि अपनी सत्ता और पहुंच के अनुचित इस्तेमाल से अभिजन वर्ग द्वारा अर्जित वैभवसंपदा, मानसम्मान आदि उसका अधिकार मान लिए जाते हैं. अभिजन वर्ग की चालाकी से अनजान जनसमाज दुरवस्था को अपनी नियति मानने लगता है. यह आवश्यक नहीं कि जिस चालाकी को बड़े समझ न पाएं उसको बालक एकाएक समझ ले, लेकिन यदि अपनी प्रखर बुद्धिचेतना से सब कुछ देखता, महसूस करता हुआ कोई बालक उस अवस्था में यदि कोई प्रतिक्रिया दर्ज कराना चाहे तो उसे युवा होने; कम से कम उस उम्र तक इंतजार करना पड़ता है, जब उसके निर्णय को कानून के दायरे में परखा जा सके. तब तक वह परिवार तथा अन्यान्य जिम्मेदारियों में इतना गहरा फंस चुका होता है कि समझौते और समर्पण से अलावा कुछ सोच ही नहीं पाता.

 

ज्ञान की खोज एवं संवितरण के लिए स्वयं को समर्पित मानने वाले आकादमिक सदनों का ढांचा भी इससे अलग नहीं है. परीक्षा में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में छात्र यदि अपनी मर्जी से कुछ लिख आए तो उसे पास होने की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए. बालक को ज्ञानार्जन के लिए उत्सुक करने के बजाय वह उसके सोच एवं आचरण की दिशा निर्धारित करने पर जोर देता है. शिक्षा का काम हैबालक की चिंतनशक्ति को ऊर्जस्वित करना, न कि उसको विशिष्ट दायरों तक सीमित करना. इसके बावजूद बालक की रुचि के क्षेत्रों की पहचानकर अपनी उदारता का दम भरनेवाले समाज भी शिक्षा और संस्कार के माध्यम से तयशुदा व्यवस्था से अनुकूलन की सीख ही दे पाते हैं. बालक के आलोचनात्मक विवेक को उभारने की कोशिश की ही नहीं जाती. अपनी ओर से वह कुछ मौलिक करना चाहे तो डांटकर चुप करा दिया जाता है. हंसकर टाल देना समझदारी कही जाती है. यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि मनुष्य बाल्यावस्था से लेकर किशोरावस्था तक सर्वाधिक सचेतन, संवेदनशील, जिज्ञासु एवं मौलिक होता है. अपने आसपास के परिवेश को समझने की उसकी जिज्ञासा इस अवस्था में चरम पर होती है. उसका जितना उपयोग ज्ञानार्जन और ज्ञान की विभिन्न पद्धतियों को सिखाने, संवारने, बालमन की कमजोरियों को सामने लाने में किया जा सके, उतना ही लोकहित में है. अब इसे हम अतीत के प्रति अपना अतिरेकी सम्मोहन कहें अथवा नएपन को अपनाने का डर, जो परंपरा के माध्यम से प्राप्त सुविधाओं, उन सुविधाओं के छिन जाने के भय से जन्मते हैं, जो हमारी अपनी योग्यता, कौशल के बजाय विरासत में प्राप्त हुई हैं—हम बालक को स्थापित परंपराओं एवं संस्कृति के मानकों से जोड़े रखने में ही अपनी भलाई समझते हैं. मामूली विचलन पर हमारी धड़कनें बढ़ जाती हैं. यह भूल जाते हैं कि जीवन केवल सामाजिक, सांस्कृतिक मानकों द्वारा अनुशासित नहीं होता. वह समाज की भौतिक संपदा, उत्पादन तथा उपभोग से भी नियंत्रित होता है. बालक घर से बाहर जाता है तो परंपरा एवं संस्कृति उसके मनस् पर सवार होते हैं, जबकि भौतिक सुविधाएं तथा अन्य प्रलोभन आंखों के सामने. उनका आकर्षण इतना जबरदस्त होता है कि व्यक्ति अपने मनोभावों की उपेक्षा करके भी उनमें डूब जाना चाहता है. सामाजिकसांस्कृतिक संरक्षण और विकास के नाम पर दी गई शिक्षा वहां बहुत कारगर नहीं होती. स्वयं को सफलता की दौड़ में बनाए रखने के लिए बालक चीजों को पूरी तरह समझने के बजाय केवल उसका नाटक करने लगता है. आरंभिक सफलता बौद्धिकता के इस छदम् को उत्तरोत्तर विस्तार देती है. बाजार के प्रलोभन व्यक्ति और समूह दोनों पर लगभग एक जैसा प्रभाव डालते हैं. विभिन्न प्रकार के दबावों के बीच केवल सूचना समृद्ध होने को ज्ञानवान होना मान लिया जाता है. बालक के मौलिक सोच, समाज के संपर्क में आने पर जन्मी मौलिक उद्भावनाओं की अक्सर अनदेखी कर दी जाती है. इस तरह समाज के लगभग एकचौथाई सदस्य निर्णय प्रक्रिया से कट जाते हैं.

 

जिस प्रकार मातापिता संतान में अपना भविष्य देखते हैं, समाज भी नागरिकों में अपना भविष्य सुरक्षित रखने का सपना देखता है. लोकतांत्रिक समाजों में बालक को जन्म के साथ नागरिकता संबंधी अधिकार प्राप्त हो जाते हैं. इनमें अभिव्यक्ति का अधिकार भी सम्मिलित है. यहां एक अतिस्वाभाविक प्रश्न छोड़ा जा सकता है कि लोकतांत्रिक समाजों में जो अधिकार बड़ों को प्राप्त होते हैं, क्या उतने ही अधिकार बच्चों को भी प्राप्त होते हैं? इसका तात्कालिक उत्तर नकारात्मक होगा. खुलेपन का दावा करने वाले समाजों में भी बालक के कार्यकारी अधिकार बहुत सीमित होते हैं. उसकी वास्तविक अधिकारिता 18 वर्ष का होने तक प्रतीकात्मक ही रहती है. इसके पीछे तर्क प्रायः एक जैसे होते हैं. उस समय हम यह बिसार देते हैं कि हमने जानेअनजाने मौलिक ज्ञान की आमद के लिए सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण दरवाजे बंद कर दिए हैं. यह ठीक है कि बालक बौद्धिक विकास की आरंभिक अवस्था में होता है. वह दुनियादारी के मामलों में, विशेषकर उन मामलों में जिन्हें उसका समाज मान्यता देता है, उतनी जानकारी नहीं रखता जितनी सामान्यतः बड़े रखते हैं, परंतु यह भी सच है कि उम्र की आरंभिक अवस्था में वह सर्वाधिक मौलिक और नैतिक होता है. उचित यही है कि उसकी मौलिकता का लाभ उठाया जाए. अपने परिवेश के बारे में बालक जो सोचता, महसूस करना है, उसको अभिव्यक्त करने के लिए उत्साहित किया जाए. इसके रास्ते क्या हों, उनका निर्धारण समाज अपनी परिस्थितियों के अनुसार कर सकता है. यह संभव है कि उन अनेक मामलों में जिन्हें दुनियादारी कहा जाता है, बालक की जानकारी अत्यल्प हो, कुछ न हो तो भी यह प्रक्रिया बालक को अपने समाज और राष्ट्र के बारे में सोचने, उसको जोड़े रखने में मददगार सिद्ध होगी. उसके आत्मविश्वास और नागरिकबोध, जिसका इन दिनों बड़ों में भी अभाव है, आशानुकूल वृद्धि होगी. तदनंतर छिटपुट टिप्पणियों के रूप में भी उसकी ओर से ज्ञान की जो आमद होगी, वह अनूठी होगी. मगर बालक को तब तक उपेक्षित रखा जाता है, जब तक उसकी ज्ञानपिपासा दुनियादारी के रंग में रंगकर मंद नहीं पड़ जाती.

 

बालक का जीवन अनुशासित हो इसके लिए जिम्मेदार परिवार एवं समाज मानवव्यवहार को संस्कृति एवं परंपराओं के अनुरूप बनाए रखने पर जोर देते हैं. ताकि इन संस्थाओं का स्थापित ढांचा क्षतिहीन बना रहे. उसमें किसी प्रकार का विकार उत्पन्न न हो. लेकिन जिन मूल्यों को आधार बनाकर बालक से संस्कृति एवं परंपराओं से जुड़े रहने का आग्रह किया जाता है, उनका किताबी आकर्षण यथार्थ के आगे बगलें झांकता नजर आता है. स्कूल में जब बालक को पता चलता है कि उसकी शिक्षा के लिए मातापिता को मोटी रकम का भुगतान करना पड़ा है….जिन बच्चों के मातापिता भुगतान करने में असमर्थ थे, वे बच्चे पाठशाला नहीं आ पाए हैं, अथवा जब वह घर आए कथावाचक को कर्मकांड के बीचबीच में दान के लिए आग्रह करते, दक्षिणा के वजन से पूजा का स्वरूप तय होते देखता है. फिर जब वह देखता है कि उसका एक निबुर्द्धि पड़ोसी केवल अपनी शानदार कोठी, बड़ी गाड़ी के कारण समाज में प्रतिष्ठित है. पुनः जब वह पाता है कि कोरा ज्ञानार्जन उसकी शिक्षा का अभीष्ठ नहीं है. मातापिता उसको डाॅक्टर, इंजीनियर या बड़ा अधिकारी बनाना चाहते हैं, जिसके लिए पढ़ाई जरूरी है; यानी ज्ञान का उसका आयोजन ज्ञान के लिए न होकर दूसरों से स्पर्धा में आगे बने रहने के लिए है. और जब वह पाता है कि किताबों में पढ़ी नैतिकता भरी बातें व्यवहार में कोई मायने नहीं रखतीं, तब पुस्तकों से उसका जी उचटने लगता है. जिज्ञासावृत्ति कमजोर पड़ जाती है. परीक्षा में किसी भी तरह अधिक से अधिक अंक लाना उसका लक्ष्य बन जाता है. प्रकारांतर में स्कूल स्पर्धा का मैदान बन जाता है, पढ़ाई महज औपचारिकता. ज्ञान और ज्ञानार्जन के अतिरिक्त बालक ऐसे वैकल्पिक और आसान मार्गों की खोज में जुट जाता है, जो उसको स्पर्धा में बनाए रख सकें. चूंकि वह स्वयं को अपने ही जैसे युवाओं से घिरा हुआ पाता है, जो स्वयं स्पर्धा में आगे निकलने को आतुर हैं. स्पर्धा धीरेधीरे प्रतिद्विंद्वता में ढलने लगती है. सामाजिकसांस्कृतिक मूल्यों, परंपराओं के प्रति उसका विश्वास कमजोर पड़ने लगता है. व्यक्ति सहयोगपूर्ण परिवेश में पूरा जीवन बिता सकता है, स्पर्धा के बीच वह अधिक लंबा नहीं चल पाता. आधाअधूरा ज्ञान मन में आत्महीनता की स्थिति को जन्म देता है. धीरेधीरे वह परिवार, पड़ोसी और मित्रसंबंधियों के प्रति संदेह करने लगता है. उनसे निपटने के लिए विकल्पों की तलाश करता है. परिणामस्वरूप ज्ञान की मौलिक साधना से उसका विश्वास उठ जाता है. शिक्षा के मायने केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित रह जाते हैं. उस अवस्था में धनार्जन की ललक सामाजिकसांस्कृतिक उपादानों पर भारी पड़ने लगती है. बालक उसी को अपना लक्ष्य मान लेता है.

 

किशोरावस्था के दौरान बालक में स्पर्धा की भावना जन्म ले लेती है. उसकी शुरुआत परिवार से होती है. पुत्र परिवार में स्वयं को पिता का उत्तराधिकारी मानने लगता है. वह चाहता है कि बड़े उसके निर्णय का सम्मान करें. लेकिन यदि उसको लगे कि बड़ों की निगाह में उसके निर्णय का कोई मूल्य नहीं है. तब उसे ठेस पहुंचती है. उस समय उसके सामने केवल दो रास्ते होते हैं. या तो वह बड़ों के निर्णय का सम्मान करते हुए अपने सोच और इच्छाओं को सीमित रखे तथा वयस्क होने तक बड़ों के मामलों में राय देने में संयम बरते. दूसरा यह कि किसी की भी परवाह न कर वह मनमानी करे. वही करे, जिसे उचित मानता है. अधिकांश मामलों में पहली स्थिति से समझौता कर लिया जाता है. लेकिन यदि वह अपने लिए दूसरा रास्ता अपनाता है तब समाज में विक्षोभ पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है. सर्वकुशल जैसे हालात पहली स्थिति में भी नहीं होते. इसलिए कि सर्वाधिक सक्रिय और जागरूक मानसिक अवस्था में दूसरों के निर्णय पर अवलंबित बालक धीरेधीरे अपना निर्णय सामर्थ्य खोने लगता है. सामाजिकसांस्कृतिक एकता और समरस विकास के लिए हितकर तो यही है कि बालक समाज, संस्कृति एवं परंपरा के आधार पर बने संबंधों को प्राथमिक एवं उत्पादन, उपभोग, विपणन आदि के आधार पर निर्मित संबंधों को द्वितीयक माने. मगर मौलिक सोच, आत्मविश्वास की कमी के कारण ऐसा अक्सर नहीं हो पाता. इससे प्राथमिकताओं की अदलाबदली होने लगती है तथा व्यक्ति वैयक्तिता को बढ़ावा देने वाले प्रलोलनों का शिकार हो जाता है.

 

अकादमिक शिक्षा प्राचीन एवं आधुनिक सभ्यता के अंतर को केवल समाज की भौतिक प्रगति तक सीमित कर देती है. बालक को यह तो बताया जाता है कि मानवसभ्यता के दसबारह हजार वर्षों में मनुष्य की भौतिक उपलब्धियां क्या हैं, इस बीच विकास की कितनी लंबी यात्रा उसने तय की है. पर दो लाख वर्ष पहले से लेकर बारह हजार वर्ष पहले तक; यानी जब सभ्यता की नईनई शुरुआत हुई थी, उत्तरजीविता के लिए मनुष्य के आदि वंशजों को प्रकृति के साथ कितने संघर्ष करने पड़े होंगे? यह जानकारी उसको या तो दी नहीं जाती या उसे एकदो वाक्यों में समेट दिया जाता है. भविष्य को लेकर भी हमारे समस्त आकलन तकनीक और प्रौद्योगिकीय विकास पर केंद्रित होते हैं. तदनुसार हम पचाससौ वर्ष बाद जिन नए उपकरणों के आविष्कार की संभावना है, का अनुमान तो आसानी से लगा लेते हैं. लेकिन इतनी अवधि में समाज, संस्कृति और परंपराओं में क्या बदलाव हो सकते हैं, या होने चाहिए इसे लेकर गंभीर विमर्श न केवल बालक बल्कि बड़ों के स्तर पर भी नदारद होता है. हम यह माने रहते हैं कि संस्कृति जड़ अवधारणा है. उसका जो स्वरूप आज है वही आगे पचाससौ वर्ष बाद भी बना रहेगा. संस्कृति और परंपराओं के वे प्रतीक जो समाज की एकजुटता के लिए जिम्मेदार कहे जा सकते हैं, जिनके आधार पर समाज संगठित होता आया है, क्या वे आगे भी इसी तरह बने रहेंगे? यदि नहीं तो उनका वैकल्पिक रूप क्या हो सकता है, इसपर हम चुप्पी साधे रखते हैं.

 

जवाब में कहा जा सकता है कि ये शिक्षा के ऐसे क्षेत्र हैं, जहां मनुष्य आज भी बहुत कम जान पाया है. उसका जितना भी ज्ञान है, वह अनुमानाधारित है. उसको प्रमाणिक सिद्ध करने के लिए उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्य बहुत कम या अपर्याप्त हैं. यह सच भी है. तब शिक्षा का एक दायित्व यह भी है कि बालक को उन क्षेत्रों की जानकारी भी दी जाए जहां, मनुष्यता की ज्ञानोपलब्धियां अत्यल्प अथवा नगण्य हैं. सुकरात का अपने बारे में यह कहना, ‘मुझे अपने अज्ञान का ज्ञान है’ इस संबंध में प्रेरक हो सकता है. दूसरे शिक्षा का काम केवल यह नहीं होता कि वह अपनी खोजों, उपलब्धियों और प्रगति से बालक को परचाए, उसका यह कर्तव्य भी होना चाहिए कि वह ज्ञान के अंधकूपों की ओर इशारा करते हुए बालक को उसकी निष्पत्ति के लिए प्रवृत्त करे. उसकी प्रश्नाकुलता को विस्तार दे. बालक अपने और समाज के अज्ञान के बारे में भी जाने, यह व्यवस्था भी किसी न किसी रूप में होनी चाहिए. इसका अभाव संस्कृति और भौतिक प्रगति के बीच लंबी संवादहीनता के रूप में सामने आता है.

 

भौतिक सुखसुविधाओं के साथ असुरक्षा एवं अस्थायित्व की भावना गहरे तक जुड़ी होती है, इसलिए सुरक्षा और स्थायित्व की चाहत में व्यक्ति समाज और संस्कृति से जुड़ा रहना चाहता है. जो स्वयं परिवर्तन की परंपरा से कटे हुए होते हैं. ज्ञान की मौलिक साधना से कटे समाज आत्मविश्वास की कमी के शिकार होते हैं. वे पूंजीवादी हमलों को झेल पाने में असमर्थ होते हैं. इसलिए वे या तो उसके आकर्षण में बहने लगते हैं अथवा उसको अपने लिए हानिकारक मानकर उससे किनारा कर लेते हैं. कई बार ऊहापोह और असमंजस की स्थिति बन जाती है. ऐसे हालात में समाज में यदि बदलाव आता भी है तो मात्र नवीन प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग को लेकर. वे इसी से संतुष्ट होकर बाजार के हाथों का खिलौना बने रहते हैं.

 

इस समस्या का समाधान क्या हो? संस्कृति की गतिशीलता को बनाकर कैसे रखा जाए? बालक की कोमलता, निश्छलता, नैतिकता और सहृदयता का लोकहित में लाभ कैसे उठाया जाए? क्या कोई ऐसा रास्ता भी संभव है जिसपर चलकर संस्कृति और सभ्यता की गतिशीलता के अंतर को पाटा जा सकता है? ऐसा कैसे संभव हो कि संस्कृति सभ्यता की अनुगामी न होकर सहगामी बन जाए! परिवर्तनप्रवाह अकल्पित और आकस्मिक न होकर आकल्पित हो! इसके लिए आवश्यक है कि बालक अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त रहे. उसके मन में डर और अकेलेपन जैसे मनोभाव पनपने न पाएं. शिक्षा व्यक्तित्व निर्माण और बौद्धिक उठान दोनों को एकसमान, एक साथ महत्त्व दे. ज्ञानार्जन आस्थावादी दुराग्रहों से पूरी तरह मुक्त हो. बालक की परवरिश विश्व नागरिक की तरह हो. ‘ज्ञान सत्य है और सत्य आत्मा की आवश्यकता’— आइंस्टाइन के ये शब्द उसके मनमस्तिष्क में उतर जाने चाहिए. लेकिन ज्ञानवान होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति विशिष्टताबोध का शिकार होकर रह जाए. खुद को बाकी लोगों से ऊपर समझने लगे और केवल अपनी सुखसुविधाओं को जीवन की सिद्धि मान बैठे. उसको जानना चाहिए कि अकेले व्यक्ति का न तो कोई वर्तमान है, न भविष्य. अहंकार हो या प्रेम, सौहार्द हो अथवा ईर्ष्या, मनुष्य को अपने मनोभावों के प्रदर्शन के लिए दूसरों की जरूरत पड़ती ही है.

 

मनुष्य ने अभी तक जो अर्जित किया है, वह उन महापुरुषों की देन है जो लोकहित को व्यक्तिसुख से बड़ा मानते थे. मानवजीवन की सुखमय बनाने के लिए जिन्होंने अपने सुख, सम्मान की कभी परवाह न की, बल्कि अक्सर उसकी उपेक्षा ही करते रहे. अतः जरूरी है कि ज्ञान का आयोजन, प्रदर्शन सर्वकल्याण के लिए हो. बगैर समानताबोध के यह संभव नहीं. इसलिए बालक को समझाया जाना चाहिए कि, ‘सब आंखें मनुष्य के विचारों तक पहुंचने के द्वार हैं….न तो मनुष्य जाति का अधिकांश भाग अपनी पीठ पर काठियां कसबा कर उत्पन्न हुआ है; और न कुछ थोड़े से विशेषाधिकार प्राप्त लोग ईश्वर की दया से बूट पहने और एड़ लगाए ही उत्पन्न हुए हैं कि वे उन लोगों पर तुरंत सवारी गांठ सकें.’ (थामस जैफर्सन). सत्ता का चरित्र सदैव अल्पसंख्यकवादी होता है. उसपर विराजमान लोग सदैव इस प्रयत्न में रहते हैं कि शिखर पर कम से कम लोगों की भागीदारी रहे. सत्ता के चरित्र को बालक उससे अनुकूलन करके नहीं सीख सकता. यह तभी संभव है, जब उसमें पर्याप्त आलोचनाविवेक हो.

 

बालक के संपूर्ण विकास के लिए आवश्यक है कि समाज उसके मौलिक विकास को बढ़ावा दे. उसमें समाज को समझने और बरतने की योग्यता स्वतः विकसित होने दे. ताकि वह अवसर पड़ने पर वह उनपर उठने सवालों पर तार्किक प्रतिक्रिया दे सके. उसे उसकी सीमाओं और क्षमताओं से साथसाथ परिचित कराए. उनका अधिकतम इस्तेमाल करने की प्रेरणा दे. बालक समाज एवं संस्कृति की उपयोगिता पर उठनेवाले प्रश्नों का उत्तर देने में स्वयं को असमर्थ पाता है या उस समय अपने भीतर ग्लानि, आत्मविश्वास की कमी या कुंठा का अनुभव करता है, तो वह द्वितीयक संबंधों को ही प्राथमिक समझने लगेगा. जैसा कि इन दिनों हो रहा है. इसलिए उसे समझाए कि उसकी तरह समाज भी विकासमान अवस्था में है. सभ्यता, संस्कृति या परंपराओं का कोई भी विधान ऐसा नहीं जिसकी समीक्षा न हो सके. सोच को पूर्वाग्रहमुक्त रखने के लिए उसको समझाया जाए कि धर्म एक कुटिल राजनीति है, जिसमें सत्ता का हासिल करने का सपना अगले जन्म तक टाल दिया जाता है. यह भी कि नैतिकता धर्म की चेरी नहीं है. वह मानवता का लक्ष्य है. धर्म तो उसका लक्षण मात्र है.

 

उपयुक्त अवसर पर बालक को यह भी बताएं कि धरती पर कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जो मनुष्य के लिए निषिद्ध हो. मगर उसका यह अधिकार दूसरों के अधिकार की सुरक्षा में ही संभव है. हम यदि कोई वृक्ष लगाते हैं, तभी हमें फल खाने का अधिकार है. दूसरों के श्रम पर जीना, किसी भी तरह परावलंबी होना मानवी गरिमा के प्रतिकूल है. बालक जब खुद को समझ लेगा तो समाज को भी समझ लेगा. तब उसकी प्रतिक्रिया सकारात्मक होगी. तभी वह अपने विवेक का अधिकतम उपयोग कर सकेगा. समाज आज जिस प्रकार भय, कुंठा, नैराश्य, हताशा, नकारात्मक सोच तथा सांस्कृतिक अपसंस्करण से त्रस्त है, उसके निदान का रास्ता भी स्वतः खुलता जाएगा. लेकिन बालक की शिक्षा अकेले उसका विषय नहीं है. वह हम बड़ों से भी जुड़ा है. इसलिए जो हम बालक से चाहते हैं, जिस रूप में उसको ढालना चाहते हैं, भविष्य में जिस तरह के समाज की कल्पना करते हैं, उसके लिए क्या हम स्वयं तैयार हैं? यही वह पहेली है, जिसमें बालक और समाज दोनों का भविष्य छिपा है. जिसके रहस्य को बूझना आज के समाजविज्ञानियों और शिक्षाशास्त्रियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

 © ओमप्रकाश कश्यप

 

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