धर्म एवं निरंकुश पूंजीवाद

धर्म एवं अभिजन संस्कृति– – चार

जीवन की अंतहीन मुश्किलों से बचाव के लिए जनसाधारण के पास केवल तीन रास्ते होते हैं. पहला शराब की दुकान की ओर निकल जाना, दूसरा धर्म की शरण लेना और तीसरा सामाजिक क्रांति के रास्ते राह प्रशस्त करना.1मिखाइल बकुनिन

पंद्रहवीं शताब्दी में यूरोप और एशियाई देशों में जो परिवर्तनकामी आंदोलन खड़े हुए उनमें परिस्थितिगत अंतर भले हो, मगर लक्ष्य सभी का कमोबेश एक था. वह अस्वाभाविक भी नहीं था. इसलिए कि अर्थव्यवस्था के वैकल्पिक साधनों के अभाव में सभी देशों की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित थी. कृषिकर्म के लिए सबको प्रकृति पर आश्रित रहना पड़ता था. हालांकि भौगोलिक परिस्थितियां भिन्न थी और तज्जनित चुनौतियां भी. किंतु उत्पादन के साधनों में समानता के कारण उनके विकास का स्तर लगभग समान था. थोड़ाबहुत अंतर रहा तो उसका कारण भौगोलिक और स्थानीय परिस्थितियां थीं. दुनिया के सभी समाजों में आरंभिक अभिजन या तो भूस्वामी थे, अथवा वे लोग जो किसी न किसी कारणवश धर्म के संरक्षण और प्रसार से जुड़े थे. जिन्होंने जनसाधारण के हृदय में पैठे डर, प्रकृतिआधारित जीवन की अनिश्चितता एवं सत्ता से निकटता का लाभ उठाकर अपनी स्थिति मजबूत की थी. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक और तज्जनित औद्योगिक क्रांति ने वैकल्पिक अर्थव्यवस्था के रास्ते उपलब्ध कराए. फलस्वरूप उन लोगों को जो अपने हस्तकौशल और बुद्धिबल के आधार पर सामंती व्यवस्था में आश्रित जैसा जीवन बिता रहे थे. अपने बुद्धिकौशल का बाजिब मूल्य वसूलने तथा स्वतंत्र होकर आगे बढ़ने का अवसर मिला. औद्योगिक आवश्यकता के चलते मध्य वर्ग की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई. वही प्रकारांतर में परिवर्तनकामी आंदोलनों का प्रमुख सूत्रधार बना. उन आंदोलनों का पहला लक्ष्य था सामंती ताकतों के चंगुल से आमजन की मुक्ति. यद्यपि सामंतवाद के मूल में आर्थिक असमानता थी, तथापि इस लक्ष्य को केवल आर्थिक विकास के बूते प्राप्त करना असंभव था. इसलिए कि लंबे समय तक उत्पीड़नकारी स्थितियों में जीवन जीने वाला जनसाधारण उस व्यवस्था से अनुकूलन कर चुका था. शोषण को वह अपनी नियति मानने लगा था. धर्म, संस्कृति एवं समाज के नाम पर उत्पीड़क शक्तियों ने नियमों, विधानों की एकतरफा व्यवस्था खड़ी की थी. उसमें अधिकारों का जखीरा अभिजन वर्ग के पास था और कर्तव्य की पोटली गैर अभिजन के. समानता की चर्चा रूमानियत भरे किस्सेकहानियों जैसी थी, जो मन को लुभाती हैं, तसल्ली देती हैं, मगर हकीकत से कोसों दूर होती हैं. उनसे मुक्ति का एकमात्र उपाय था, लोगों को आर्थिक एवं सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना. ऐसा वैचारिक तेज प्रदान करना, जिसके सहारे वे सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक वर्चस्ववाद की चुनौतियों को झेल सकें. इसी सामान्य ध्येय के साथ उस दौर के परिवर्तनकामी आंदोलनों का कारवां आगे बढ़ा था. उन आंदोलनों के अपने संघर्ष, परिस्थितियां और तनाव थे. कई जगह उनके लक्ष्य गड्मड थे. परिवर्तनकामी आंदोलनों की वास्तविक पहचान उनीसवीं शताब्दी में मार्क्स साथ ही संभव हो सकी. अपनी विलक्षण मेधा से मार्क्स ने पूंजीवादी, सामंतवादी अर्थव्यवस्था का विशद्गंभीर विवेचन किया. फलस्वरूप उसके शोषणकारी चरित्र को समझना आसान होता गया.

प्रौद्योगिकीकरण की शुरुआत तक आर्थिक संबंधों के विकास के लिए व्यक्ति की जरूरतें जिम्मेदार थीं. वे उत्पादक और उपभोक्ता के लाभ एवं सहयोगभावना पर निर्भर रहती थीं. कालांतर में जब धर्म, राजनीति और अर्थसत्ता का गठबंधन बना तो अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए शीर्षस्थ शक्तियां अपनी पसंद के व्यक्तियों को केंद्र में लाने लगीं. प्रतिभा की उपेक्षा का सर्वाधिक नुकसान जिज्ञासातत्व को उठाना पड़ा था. ईसा से पांचछह सौ वर्ष पहले मौलिक प्रतिभा का जो अद्भुत प्रस्फुटन भारत, यूनान और चीन में लगभग एक समान दिखाई पड़ता था, सहस्राब्दी के समापन तक वह शिथिल पड़ा तो शताब्दियों तक अपने पुराने वैभव को प्राप्त न कर सका. उसने करवट ली सोलहवी शताब्दी में. उसके बाद तो फ्रांसिस बेकन, जान लाक, रेने देकार्त्त, वाल्तेयर, रूसो, प्रूधों आदि के मौलिक चिंतन द्वारा समाज में नई ज्ञानशैलियों का आगमन हुआ. धार्मिक सुधार की वास्तविक कोशिश पंद्रहवीं शताब्दी से हुई, जब तर्क एवं लोककल्याण को प्रधानता देते हुए मार्टिन लूथर ने बाईबिल की 95 उत्पत्तियों का चयन कर उन्हें एक पोस्टर के रूप में चर्च के दरवाजे पर टांग दिया. यह एक क्रांतिकारी कदम था, जिसने कट्टरपंथ की चूलें हिलाने का काम किया. धर्मग्रंथों की आलोचना आज भले सामान्यसी बात मानी जाए, मगर उस जमाने में वह युगप्रवर्तनकारी कदम था. उन पदावलियों में लूथर ने धर्म के नाम पर पादरी वर्ग द्वारा जनसाधारण के शोषण की ओर संकेत किया था. यह कहते हुए कि चर्च के अपने आदमी ही धर्म के वास्तविक संदेश को आमजन तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं, उनका ध्यान केवल ओर केवल गरीबों से चंदा, दान आदि के नाम पर धन ऐंठने पर है—उसने यूरोपभर में खलबली मचा दी थी. लूथर का सीधासा प्रश्न था‘चर्च के नाम पर गरीबों से धन उगाहने के बजाय, पोप जिसका धन सम्राट से भी कहीं ज्यादा है, अपने धन से एक विशाल और भव्य चर्च का निर्माण क्यों नहीं करा लेता?2 लूथर के उत्तरवर्ती विचारक जान काल्विन का जोर भी धर्म के नाम पर समाज में व्याप्त कट्टरपंथ और शोषण से जनसामान्य की मुक्ति पर था. उसने यह कहकर कि सृष्टि में कुछ भी ऐसा नहीं है जो मनुष्य के लिए वर्जित हो, ईसाइयों की ‘पवित्र अपराध’ वाली सैद्धांतिकी पर खुला प्रहार किया था. जियोदार्नो ब्रूनो और काल्विन में यद्यपि परस्पर अनबन थी, लेकिन ब्रूनो ने भी धर्म के कट्टरपंथी रवैये की आलोचना की थी. इससे चिढ़कर धार्मिक अतिवादियों ने उसे जिंदा जला दिया गया था. मार्टिन लूथर, काल्विन, जियोदार्नो ब्रूनो के प्रयासों का इतना असर हुआ कि चर्च की व्यवस्था में सुधार की मांग जोर पकड़ने लगी. कुछ ही अवधि में वह प्रगतिशील और परंपरागत चर्च में बंट गया.

भारत में परिस्थितियां भिन्न थीं. शताब्दियों लंबी दासता ने भारतीयों से न केवल उनका आत्मबल छीना था, बल्कि अतीत की उसकी उपलब्धियों की ओर से भी ध्यान हटा दिया था. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो पूरी अठारहवीं तथा उनीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक इस देश की मेधा आमतौर पर वही पढ़गुन रही थी, जो अंग्रेज बुद्धिजीवी उसको पढ़ा रहे थे. देश की इस समाजार्थिक दुर्दशा के लिए केवल बाह्यः शक्तियां जिम्मेदार न थीं. कुछ बड़े कारण थे—समाज का जातीय आधार पर विभाजन तथा धर्म के नाम पर फलताफूलता कर्मकांड जो व्यक्ति के विवेक का हनन कर, उसको अंधानुयायी बनाते थे. उल्लेखनीय है कि समाज के बहुआयामी विकास एवं मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु समाज के विभाजन का सुझाव प्लेटो ने भी दिया था. उसके द्वारा आकल्पित नगरराज्य की विशेषता थी कि उसमंे व्यक्ति की पैत्रिक पहचान खत्म कर दी जाती थी. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने बच्चों का पालनपोषण मातापिता से अलग, राज्य के संरक्षण में करने की अनुशंसा की थी. संपत्ति राज्य के अधीन थी. इस कारण जाति, कुल या संपत्ति के आधार पर किसी व्यक्ति का सत्तासीन होना मुश्किल था. उस व्यवस्था में व्यक्ति के गुणों का महत्त्व था. व्यक्ति की योग्यता के आधार पर व्यापक समाजहित में उसे जिम्मेदारियां सौंपी जाती थीं. फलस्वरूप योग्यतम व्यक्ति समाजहित में अपना अधिकतम योगदान दे पाने में सक्षम होगा—ऐसी परिकल्पना प्लेटो की थी. वह व्यवस्था कामयाब न हो सकी तो इसलिए कि तत्कालीन यूनान छोटेछोटे राज्यों में बंटा था. उनके बीच हमेशा युद्ध की स्थिति बनी रहती थी. प्लेटो के नीतिवादी सोच का प्रभाव अरस्तु पर पड़ा. आगे भी वह किसी न किसी रूप में आने वाले विचारकों को प्रभावित करता रहा.

भारत में सामाजिक समानता सैद्धांतिक स्तर पर भी संभव न थी. इसलिए कि जातीय आधार पर समाज को अलगअलग हिस्सों में बांट देने के बीजतत्व वेदों में मौजूद थे, जिन्हें दैवीय माना जाता था. उन्हीं की स्तुति करते हुए चारणनुमा पुरोहितवर्ग ने सत्ता के इर्दगिर्द रहकर अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी. स्वार्थ की एकरूपता के कारण उन्हें राजसत्ता का भी भरपूर समर्थन मिला. इससे पूरा समाज आर्थिक, सामाजिक स्तर पर बंटता चला गया. ऊंचनीच की खाइयों में बंटे समाज में एक वर्ग वह था, जिसके पास अधिकार ही अधिकार थे, कोई चुनौती न थी. दूसरा वर्ग अधिकारशून्य अवस्था में पहले वर्ग के लिए रातदिन खटता रहता था. आज वर्णविभाजन के औचित्य को लेकर उसके अंधभक्त चाहे जितने तर्क दें, मगर राज्य जब उत्तराधिकार में दिए जाते हों, समस्त भूमि ब्राह्मणों की घोषित हो, जीवन विवेक के बजाय रूढ़ियों, जड़ परंपराओं तथा कर्मकांडों द्वारा अनुशासित होता हो, ज्ञानार्जन के अवसरों और संसाधनों पर समाज के मुट्ठीभर लोगों का अधिकार हो, दूसरे वर्ग को उससे बलात् अलग रखा जाता हो—तब समानताआधारित समाज की स्थापना महज दिवास्वप्न थी. वर्गीय शोषण की अवधि इतनी लंबी थी कि उत्पीड़क अपनी दुरवस्था को ही अपनी नियति मानने लगा था. ऐसी स्थिति में परिवर्तन की मांग तो दूर यदि उसकी बात भी चले तो पहला विरोध अपने ही लोगों का झेलना पड़ता था.

पंद्रहवी शताब्दी ने यूरोप और भारत दोनों में परिवर्तन के साथ दस्तक दी थी. मगर यूरोप की वैचारिक क्रांति वैकल्पिक अर्थव्यवस्था के कंधों पर सवार होकर आई थी. इसीलिए उससे कामयाबी की इबारत लिखी जा सकी. उसी कालखंड के दौरान भारत में हुई सामाजिक क्रांति, जिसे भक्ति आंदोलन जैसे ठूंठ नाम से नवाजा जाता है, का लक्ष्य जाति और धर्म के तले पिस रहे वर्गों में आत्मचेतना का विस्तार करना था. भक्त कवियों का नेतृत्व संत कवियों के हाथों में था. मगर जिस समाज का वे प्रतिनिधित्व करते थे, वह समाजार्थिक रूप से प्रभु वर्ग पर आश्रित था. वह क्रांति अंततः असफल हुई तो इसलिए कि सामाजिक समानता का सपना देखने वाले संतकवियों के पास शोषित वर्ग की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए कोई रास्ता ही न था. उनमें से अधिकांश अशिक्षित या अल्पशिक्षित थे. कबीर, दादू आदि आरंभिक संत कवि उस वर्ग से थे जिसे वेदादि ग्रंथों को पढ़ने की मनाही थी. मंदिर की सीढ़ियां वे नहीं चढ़ सकते थे. यदि वे किसी को छू भी लें तो सरेआम अपमानित और दंडित होना पड़ता था. दलित वर्ग के आत्मविश्वास को वापस लाने के लिए उन्होंने लोगों को समझाया कि देवता न तो मंदिर की दीवारों में है, न ही पंडितों द्वारा रचे गए धर्म ग्रंथों में. इसलिए वे अपना परमात्मा यदि देवालय के अंधेरे बंद कोने में खोजने के अभ्यस्त हैं तो यह नादानी उन्हीं को करने दो. ‘पत्थर पूजने से तो घर की चक्की को पूजना बुद्धिमानी है.’ परमात्मा को खोजने के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं है. वह मानवमात्र के हृदय में वास करता है. इस तरह संत कवियों ने मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने और सामाजिक संबंधों में नैतिकता की वापसी पर जोर दिया. उन्होंने धर्म और जाति के नाम पर भेदभाव का भी विरोध किया. संत कवियों की नीयत और सामथ्र्य पर संदेह करने की गुंजाइश नहीं है. मगर यह मानना पड़ेगा कि उनके चिंतन का दायरा उनके अनुभवक्षेत्र तक सीमित था. यह अनुभव क्षेत्र जातिवादी समाज में रहते हुए बना था. जिसके कारण कबीर जैसे क्रांतिधर्मा कवि को भी ब्राह्मणकुल में जन्म न लेने का अफसोस था—‘पूरब जनम हम बांभन होते, ओछे करम तप हीना. रामदेव की पूजा चूका पकरि जुलाहा कीना.’ हालांकि कबीर अपनी इस कुंठा से जल्दी ही बाहर निकल आते हैं. मगर इससे इतना तो प्रमाणित होता है कि संत कवियों की चेतना भी समाज के जातिवादी चरित्र से प्रभावित थी. आमूल परिवर्तन हेतु समाजार्थिक एवं राजनीतिक स्तर पर जिस क्रांतिधर्मी चेतना और बोध की जरूरत पड़ती है, उसका उनके पास अभाव था. उनकी आरंभिक पैठ भी समाज के निचले वर्गों तक सीमित थी, जो आर्थिक रूप से विपन्न और पूरी तरह पराश्रित थे. इसलिए ब्राह्मण समेत तथाकथित ऊंची जातियों ने आरंभ में संत कवियों की न केवल उपेक्षा की, बल्कि उन्हें तरहतरह से अपमानित करने का प्रयास भी किया. इस कारण उनकी सुधारवादी चेतना केवल जाति और धर्म की जकड़न से मुक्ति की मांग से आगे न बढ़ सकी. ऐसा केवल भारत तक सीमित न था. यूरोप में भी आरंभिक परिवर्तनकामी आंदोलन धार्मिक सुधारवाद तक सीमित थे.

वेंदांतियों के मायावाद तथा सूफी परंपरा से प्रभावित संत कवियों ने सांसारिक सुखों के प्रति उपेक्षा का रवैया अपनाया. कबीर जैसे युगदृष्टा कवि ने ‘रूखीसूखी खाकर ठंडा पानी पीने’ में ही भलाई समझी तो रविदास ने इस देह और भोगविलास को झूठा बताकर सादगी और संतोष के साथ जीवनयापन का उपदेश दिया. झूठ रे यहु तन झूठी माया/झूठा रे मंदिर भोगविलासा.’कहकर कबीर की बात को ही पानी दिया. अपनी तरह से संत कवियों ने जीवन में अर्थ की महत्ता को कम करने का भरसक प्रयास किया. मगर सांप को सामने देख आंख मूंदकर रस्सीरस्सी रटने से जैसे सांप रस्सी नहीं बन जाता, वैसे ही संत कवि के जीवन में मोहमाया का तिरस्कार करने से समाज में वैसा होना संभव न था. कम से कम उस समय तक तो नहीं, जब तक समाज में भारी आर्थिक विषमता हो. एक वर्ग दूसरे के श्रम और संसाधनों पर विलासितापूर्ण जीवन जीता हो; और दूसरे वर्ग को पूरे दिन पसीना बहाने के बावजूद भरपेट रोटी के लिए शीर्षस्थ वर्ग पर आश्रित रहना पड़ता हो. उपदेश से आक्रोश का शमन एक बार तो संभव है, जिंदगीभर नहीं. मनुष्य सामान्यतः अपने से ऊपर के वर्ग को ललचायी दृष्टि से देखता है, उस जैसा होना चाहता है, जहां तक संभव हो उसका अनुसरण भी करता है. अतएव संत कवियों की वाणी गरीब मन को तसल्ली तो देती रही, मगर वह समाज के चरित्र में न ढल सकी. जिन वर्गों में संत कवियों की पैठ बनी, उनके आर्थिक रूप से परावलंबी होने के कारण, भक्ति आंदोलन बहुत जल्दी सामंतवादी शक्तियों का शिकार हो गया. निराकार भक्ति के रूप में अध्यात्म चेतना के प्रति झुकाव से आरंभ हुआ वह आंदोलन कुछ ही शताब्दियों में साकार भक्ति में ढलकर उन सब कुरीतियों, परंपराओं, बौद्धिक जड़ताओं का समर्थक और बढ़ानेवाला सिद्ध हुआ, जिनके विरोध में वह खड़ा हुआ था. जीवन की मूलभूत समस्याओं के प्रति पलायनवादी दृष्टिकोण के कारण वह समाज के प्रभुवर्ग के आगे निर्णायक चुनौती न बन सका. समाज की नेतृत्वकारी मेधा धर्म को जीवनपद्धति का आधार मानती रही. ‘धर्मो रक्षति रक्षतः’—धर्म की रक्षा में ही सबकी रक्षा है, कहने वाले लोग समाज में अग्रणी बने रहे. चूंकि शताब्दियों से धर्म लोगों की जीवनशैली को अनुशासित करता आया था, इसलिए जीवन में उसके अभाव की वे कल्पना भी नहीं कर पाते थे. नैतिकता को धर्म के अधीन, उसपर आश्रित मानने का चलन था. सच इसके उलट है. नैतिक मूल्य मानवमात्र के लिए कहीं अधिक कल्याणकारी एवं शाश्वत हैं. अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए दुनिया के हर धर्म ने इन्हें अपनाया था.

उल्लेखनीय है कि दुनिया के किसी भी ज्ञात धर्म का आधार चारपांच हजार वर्ष से पुराना नहीं है. दूसरी ओर मानवमन में नैतिकताबोध का विकास उसके विवेकबोध के जन्म से जुड़ी घटना है. अपनी सीमाओं के भीतर धर्म यदाकदा आम जनमानस में नैतिक मूल्यों की स्थापना तथा उन्हें बनाए रखने का माध्यम जरूर बना, मगर अधिकांश मामलों में वह समाज के विभिन्न वर्गों के बीच दूरी और वैमनस्य को ही बढ़ावा देता रहा. संदेह ज्ञान का मूल, जिज्ञासा का आधार है. ‘संदेह से हम जांचपड़ताल की और उन्मुख होते हैं, जांचपड़ताल हमें सत्य तक ले जाती है.’—पीटर अबेलार्ड का हजार वर्ष पुराना कथन आज भी पहले जितना ही प्रासंगिक है. उल्लेखनीय है कि परंपराओं पर संदेह हो सकता है, लेकिन जहां परंपराओं की अंधस्वीकृति है, वहां संदेह के लिए बहुत कम गुंजाइश रह जाती है. परंपरा को अंधस्वीकृति देने वाला समाज ज्ञान की परंपरा से कट जाता है. उस अवस्था में वह अपने बौद्धिक परिष्कार की ओर बहुत कम ध्यान दे पाता है. वह मनुष्य और उसके कल्याण के बीच में ईश्वर को ले आता है. चूंकि ईश्वर का अपना कोई अस्तित्व नहीं है, इसलिए उसके नाम पर पुरोहितों, पेशेवर कथावाचकों और कर्मकांडियों की पूरी जमात बीच का स्थान ले लेती है. धर्म पुरोहित वर्ग के हाथों का सम्मोहनास्त्र है, जिसका उपयोग वह शोषण के वास्तविक कारणों की ओर से ध्यान हटाने के लिए करता है. इससे व्यक्ति और कल्याण के बीच दूरी निरंतर बढ़ती जाती है. सामंतवाद के फलनेफूलने का कारण भी यही है.

भक्ति आंदोलन की निराकारवादी धारा किसी न किसी रूप में वर्चस्ववाद का निषेध करती थी. इसलिए आरंभिक संत कवि ईश्वर के प्रति बेपरवाह से थे. उनका सारा जोर आचरण की पवित्रता पर था. कबीर, रविदास, दादूदयाल, नानक जैसे संतकवियों की ओजपूर्ण वाणी के फलस्वरूप समाज में जातिबंधन शिथिल पड़े. मगर भक्ति आंदोलन की लोकप्रियता का लाभ उठाकर संत कवियों के उत्तराधिकारी के रूप में जो नए कवि उसमें दाखिल हुए उनमें अधिकांश सवर्ण जातियों से थे, पारंपरिक धर्म और शिक्षा प्रणाली से निकले हुए. वे एक ओर तो भक्ति आंदोलन की रसात्मकता से प्रभावित थे, दूसरे उनपर भारतीय वर्णव्यवस्था, परंपरा तथा धार्मिक कर्मकांडों का भी प्रभाव था. उनकी साधना व्यक्ति केंद्रित थी. भक्ति आंदोलन के मुख्य प्रवत्र्तक कवियों सूर और तुलसी ने तो ज्ञानमार्गी परंपरा की जमकर खिल्ली उड़ाई थी. जिससे प्रकारांतर में कर्मकांडों तथा वर्णव्यवस्था को नया जीवन प्राप्त हुआ. एक नियतिवादी द्रष्टिकोण जो पुराणों, स्मृति और ब्राह्मणग्रंथों के प्रभावस्वरूप फैला था, वह और भी प्रगाढ़ होता गया.

पंद्रहवीं शताब्दी तक पश्चिमी सभ्यता का हाल भी करीबकरीब ऐसा ही था. यूनानी सभ्यता के दौर से चली आ रही दास प्रथा कृषि मजदूरों, छोटे किसानों के शोषण का माध्यम बनी थी. जो भूसामंत थे, जमींदार थे, येन केनप्रकारेण राजसत्ता पर उन्हीं का दखल था. चूंकि आरंभिक दार्शनिक विचारक आदि भी कुलीन परिवारों से आए थे, इसलिए उनके द्वारा दासप्रथा का समर्थन स्वाभाविक ही था. प्लेटो के अलावा जिसने निकृष्ट कहकर दासप्रथा की आलोचना की थी—उस समय के सभी प्रमुख विचारक उसके समर्थक थे. अपनी विद्वता दर्शाने के लिए यूनानी शासक जानेमाने दार्शनिकों को अपने राज्य में ससम्मान रखते थे. इससे केंद्रीय सत्ता इतनी भड़कीली और भारीभरकम दिखने लगती थी कि उसके काले, अंधियारे कोनों पर किसी की निगाह तक नहीं जाती थी. चालाक सम्राट दार्शनिकों, विद्वानों के सान्निध्य के नाम पर शेष समाज के साथ मनमाना व्यवहार करते थे. इस कमी को प्लेटो ने समझा था. इसलिए उसने कहा था कि सत्ता दार्शनिकों के समूह द्वारा संचालित होनी चाहिए. दार्शनिक समूह से उसका आशय मानवीय उच्च गुणों से संपन्न व्यक्तियों के निर्वाचित मंडल से था. पर वह प्लेटो का आदर्शलोक था, जिसका खाका उसने अपने ग्रंथ ‘रिपब्लिक’ में खींचा था. व्यवहार में किसानों, दासों एवं मजदूरवर्ग का शोषण सामान्य बात थी. उन्हें शोषणकारी व्यवस्था के प्रति भरोसेमंद और समर्पित बनाए रखने का काम धर्मसत्ता का था.

भारत में यह जिम्मेदारी पुरोहित वर्ग की थी. यहां जनसाधारण के पास मौलवियों, धर्मावलंबियांे की शरण लेने के अलावा और कोई रास्ता न था. वे सांसारिक सुखों के प्रति स्वाभाविक मोहासक्ति को उसके कष्टों, अभावों आदि का कारण बताकर वास्तविक समस्या पर परदा डालने का काम करते. दूसरी ओर उन्हीं सुखों की प्रचुरता के नाम पर स्वर्ग का महिमामंडन करने लगते थे. चार्वाक, लोकायतों एवं आजीवकों द्वारा जीवन में भौतिक सुखों को महत्ता देने के लिए उनकी तीखी आलोचना करने वाले वेदांती, स्वर्ग में उनकी अफरात बताकर उसका महिमामंडन करते न अघाते थे. यह सीधा षड्यंत्रकारी सोच था. जिसके चलते स्वादिष्ट भोजन, अच्छे वस्त्राभूषण, रहनसहन, आमोदप्रमोद आदि जो इहलोक में विलासिता और इंद्रिय सुख के नाम पर त्याज्य एवं मुक्ति में बाधक समझे जाते हों, वे कथित स्वर्ग में प्रवेश करते ही श्रेष्ठ और सर्वोत्तम मान लिए जाते थे. स्वर्ग नाम की छलना की अवधि भी सीमित काल के लिए थी. आत्मा वहां उतने ही समय तक वास कर सकती थी, जो उसने अपने सद्कर्मों के जरिये अर्जित की है. इससे अधिकतम पुण्यार्जन के लिए व्यक्ति पूरा जीवन अभाव, संत्रास उत्पीड़न और शोषण के बीच बिता देता था.

उल्लेखनीय है कि स्वर्ग के ये सुख उस आत्मा के लिए भोग्य थे, जो कथित रूप प्रलोभन रहित, अचंचल, निर्व्यसना, निर्लेप आदि है. असल में यह समाज के प्रभुवर्ग द्वारा सामान्यजन को जीवन के मूलभूत सुखों से वंचित कर, उसको अपना आर्थिक, सामाजिक रूप से आश्रित बनाए रखने की चाल रही है. पश्चिम इस षड्यंत्र के प्रति जल्दी जागरूक हुआ. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति के साथ आए वैचारिक उभार के फलस्वरूप धर्म के सांस्थानीकरण तथा उसके माध्यम से समाज के बहुतायत के शोषण उत्पीड़न के विरोध में वहां जोरदार आवाज उठी. शुरुआत वाल्तेयर ने की जो वोलनी, मैक्स बेबर, प्रूधों, रूसो, फायरबाख, बू्रनो बायर से लेकर कार्ल मार्क्स तक लगातार दमदार होती गई. अठारहवीं शताब्दी में बौद्धिक आंदोलनों को मिली सफलता का एकमात्र कारण भी यही था लोग पूंजी और धर्म के संयोग से बने सामंती शोषण से तंग आ चुके थे. शोषण की जमीन पर टिके अभिजात्यवर्ग की आलोचना होने लगी थी. लोग यह समझने लगे थे कि संगठित जनशक्ति के बल पर प्रभुवर्ग के आतंक और अनाचार से मुक्ति संभव है. इस एहसास ने उन्हें उत्पीड़क वर्ग की आंख में आंख डालकर बात करने का हौसला दिया था. वोलनी की पुस्तक ‘दि रयून’ का एक संवाद देखिए जिसमें जनचेतना के उभार को स्पष्ट किया है—

जनता : सम्राट सिवाय जनता के शुभत्व के कुछ नहीं है. वास्तविक संप्रभुता केवल कानून के राज्य में संभव है.

राजप्रतिनिधि : कानून सिर्फ आपको आज्ञाकारी बना सकता है.

जनता : लोकेच्छा से परे कानून कुछ नहीं है. और हम लोकहित में नया कानून गढ़ेंगे.

राजप्रतिनिधि : तब तुम देशद्रोही कहे जाओगे.

जनता : नागरिक धोखा नहीं देते. केवल तानाशाह देशद्रोही है.

राजप्रतिनिधि : सम्राट हमारी ओर है, वह तुम्हें आत्मसमर्पण को विवश कर देगा.

जनता : सम्राट राष्ट्र से भिन्न नहीं है. हमारा सम्राट आपका साथ हरगिज नहीं देगा. तुम केवल उसके प्रेत से संतोष करो.

कुछ देर बाद इस संवाद में सेनाध्यक्ष भी शामिल हो जाता है. वह कहता है कि जनता डरपोक होती है. वह अपने सिपाहियों को आदेश देता है कि जनता को सबक सिखाएं. इसपर जनता सिपाहियों से कहती है—

सिपहियो, तुम तो हमारा ही खून हो. क्या तुम अपने भाइयों और सगेसंबंधियों पर वार करोगे? यदि जनता ही नहीं रही तो सेना का भरणपोषण कौन करेगा?’ इतना सुनते ही सैनिक हथियार डाल देते हैं—

हम तो जनता में से ही एक हैं, आप हमें हमारे दुश्मन से मिलवाएं.’

यहां लगता है कि जनता जीत गई. लेकिन उत्पीड़क अभिजन के पास एक और हथियार अभी बाकी है. वह है धर्म का. धर्म के नाम पर व्याप्त रूढ़ियों तथा अंधविश्वास का. सेनानायक के परास्त होते ही धर्माधिकारी उपस्थित हो जाता है. वह राजप्रतिनिधि को आवासन कहता है कि जनता अंधविश्वासी है. हम उससे ईश्वर और धर्म के नाम पर निपट लेंगे. धर्माचार्य लोगों को समझाता है—

प्यारे भाइयो, परमात्मा ने हमें आदेश दिया है कि तुमपर शासन करें.’

जनता : जरा अपना परिचयपत्र तो दिखाओ जो तुम्हें परमात्मा ने दिया है.

पुजारी : तुम्हें विश्वास करना चाहिए? सवालजवाब करना धर्मभ्रष्ट होने की निशानी है.

जनता : क्या तुम बिना किसी तर्क के शासन करते हो.

पुजारी : शांति परमात्मा से मिलेगी….धर्म विनम्र और आज्ञाकारी बनाता है.

जनता : शांति न्याय से मिलती है. आज्ञाकारी होने का अर्थ है, अपने कर्तव्य का पालन करना.

पुजारी : इस संसार में दुख ही दुख हैं.

जनता : हमें कुछ उदारहण दो.

पुजारी : क्या तुम बिना सम्राट अथवा परमात्मा के रहोगे?

जनता : हम बिना उत्पीड़क के खुश रहेंगे.

पुजारी : तुम्हें मध्यस्थ और बीच के संवादी की आवश्यकता पड़ेगी.

जनता : परमात्मा और सम्राट के बीच मध्यस्थ! राजदूतो और पुजारियो, तुम्हारी सेवाएं बहुत ही खर्चीली हैं. आप हमें हमारे हाल पर छोड़ दें. आगे अपने मसले हम स्वयं संभाल लेंगे.

इसी के साथ अभिजन अल्पसंख्यक यह मान लेते हैं कि वे परास्त हुए. लोग जाग चुके हैं. उनका जादू अब और नहीं चलने वाला. उनके चिंता प्रकट करने पर जनता की ओर से जवाब मिलता है—‘घबराओ मत, तुम सुरक्षित हो. चूंकि अब हम जाग चुके हैं, इसलिए हम आगे कोई हिंसा नहीं करेंगे. हम सिर्फ अपने अधिकारों का दावा करेंगे. हम आपसे भले ही नाराज हों, लेकिन हम इसको भूल जाना चाहते हैं. हम गुलाम थे. हम चाहें तो शासन भी कर सकते हैं. लेकिन हम अपनी मुक्ति और स्वाधीनता चाहते हैं, जो न्यायपूर्ण है.

वोलनी की यह पुस्तक अठारहवीं शताब्दी के समापन पर उस समय आई जब फ्रांस क्रांति के दौर से गुजर रहा था. फ्रांसिसी क्रांति को उत्प्रेरित करने के लिए इसने चिंगारी का कार्य किया. पूरा यूरोप उससे प्रभावित हुए बिना न रह सका. दरअसल उनीसवीं शताब्दी जो भारत में पुनर्जागरण का दौर है, उस समय तक पश्चिम में राबर्ट ओवेन, पियरे जोसेफ प्रूधों, जाॅन स्टुअर्ट मिल, कार्ल मार्क्स, मिखाइल बकुनिन के विचार बौद्धिक जगत पर अपनी पकड़ बना चुके थे. पूंजीवाद के प्रति समालोचकीय समझ समाज में विकसित हो चुकी थी. धर्म के नाम पर शताब्दियों से सत्ता पर काबिज विशेषाधिकार प्राप्त लोगों पर सवाल किए जाने लगे थे. वाल्तेयर ने ईश्वर को ऐसा घेरा बताया था, जिसका केंद्र हर जगह है, मगर परिधि नदारद है. इससे कुछ और आगे बढ़ते हुए फायरबाख ने ईश्वर को ‘व्यक्तिगत अनुभूति’ तक सीमित कर दिया था—‘ईश्वर प्राणिमात्र की व्यक्तिगत अवधारणा है….वह मानवीय संचेतना एवं अनुभूतियों के दायरे से बाहर है.’ फायरबाख ने धर्म को लेकर व्यक्ति के आचरण को पहेलीनुमा माना था. उसका कहना था कि खुद को धर्म के सांचे में ढालने का प्रयत्न करतेकरते व्यक्ति अपनी ही कल्पनाओं का मूर्तिकरण करने लग जाता है. ‘दि एसेंस आफ क्रिश्चनिटी’ में उसने ईसाई धर्म के नैतिकतावादी द्रष्टिकोण की प्रशंसा भी की थी. फायरबाख का धर्मसंबंधी विश्लेषण उसके शोषणकारी रूप की अकादमिक व्याख्या थी. उसके विचार अकादमिक क्षेत्र और बुद्धिजीवियों के काम के थे.

मार्क्स की चिंतनशैली में ‘एक्टीविस्ट’ जैसी प्रहारात्मकता थी. फायरबाख द्वारा ईश्वर को मानवीय संचेतना की उत्पत्ति कहना उसे रुचा नहीं. प्राचीन दर्शन, इतिहास, राजनीति तथा अर्थशास्त्र के गहन अध्ययन द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अपने व्यापक प्रभाव में धर्म केवल अंतश्चेतना की विषयवस्तु नहीं रह जाता, बल्कि वह समाज के शीर्षस्थ वर्ग के हाथों में शोषण का हथियार बनकर उभरता है, जिसकी प्रहारात्मकता दूसरे किसी भी हथियार से कहीं अधिक घातक तथा दूरगामी होती है. वह ऐसा सम्मोहनास्त्र है, जिसके माध्यम से वह जनसाधारण का ध्यान उसकी दुर्दशा से हटाकर अंधी, बंद सुरंग की ओर मोड़ देता है, जहां आजीवन प्रयास के बावजूद उसे कुछ नहीं मिल पाता. मार्क्स ने धर्म को सीधे ‘अफीम’ की संज्ञा दी थी. अपने चिंतन द्वारा वह समकालीन हीगेलियन दार्शनिकों ब्रूनो बायर, प्रूधों, फायरबाख आदि के विचारों को आकादमिक क्षेत्र से बाहर ले आया था. इसके फलस्वरूप वे आगे चलकर सर्वहारा के विद्रोह का आधार बन सके. उससे पहले तक धर्म की आलोचना करीबकरीब आकादमिक ही थी. छायावादी गीतों की भांति केवल उच्चशिक्षित अभिजात वर्ग उसे समझ सकता था. ऐसी अकादमीय आलोचनाएं समाज में आक्रोश के शमन हेतु सेफ्टी वाल्व जैसा काम करती थी. इसलिए उन्हें जरूरी माना जाता था. मार्क्स ने धर्म की मदद से जनसाधारण के शोषण की जो तस्वीर पेश की वह तर्कों पर आधारित थी, उससे शीर्षस्थ वर्ग का तिलमिला उठना स्वाभाविक ही था. ‘थीसिस आन फायरबाख’ के रूप में लिखे गए अपने संक्षिप्त नोट्स जो किसी बड़ी पुस्तक की रूपरेखा लगते हैं, में एक दार्शनिक की भांति फायरबाख के विचारों की आलोचना करतेकरते उसका एक्टीविस्ट सामने आ जाता है. उसकी शैली में अन्वीक्षण, विश्लेषण, तर्क और प्रहारात्मकता एक साथ मौजूद है—

प्राचीन भौतिकवाद का दृष्टिकोण शिष्ट नागरिक समाज गढ़ना था, जबकि आधुनिक दृष्टिकोण मानवीय समाज अथवा सामाजिक मनुष्यता का लक्ष्य पाना है.3

मार्क्स अपने उद्देश्य को न तो गोलमोल शब्द देता है, न ही उसे छिपाता है. उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता स्फटिकसी चमकती है. ‘थीसिस आॅन फायरबाख’ में फायरबाख के भाववादी तर्कों का आकलन यथार्थ की जमीन पर करते हुए उसने बुद्धिजीवियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं का सीधेसीधे आह्वान किया था—‘अभी तक दार्शनिकों ने संसार की तरहतरह से व्याख्या की है, जरूरत इसको बदलने की है.’4 मार्क्स के तर्क दमदार थे. उसकी बातें दिल को छूती थीं. श्रमिक वर्ग को उस समय ऐसे ही ओजस्वी दर्शन की आवश्यकता थी. इसलिए उसने मार्क्स के विचारों को हाथोंहाथ लिया. ‘दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के अलावा कुछ नहीं है, जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है.’—नई दुनिया का सपना देखने वालों के लिए मार्क्स के ये शब्द बीजमंत्र बन गए. एक कंठ से दूसरे कंठ तक उभरते हुए नारे पूंजीपतियों को चेतावनी देने लगे. एक समय ऐसा भी आया जब विश्व के आधे देश मार्क्स के वर्गहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य को समर्पित हो चुके थे. समाज के दबकुचलेसताए हुए लोगों के लिए वह एक उम्मीद था. उसके शब्दों में बेलाग प्रहारात्मकता थी. पूंजीपतियों, धर्मप्रमुखों एवं सामंतों का उनसे तिलमिला उठना स्वाभाविक ही था. मार्क्स के विचार और वर्गहीन समाज की स्थापना का सपना, उसका आदर्श लोगों के निशाने पर आ गया. इस काम में सर्वाधिक मदद की धर्म ने.

उल्लेखनीय है कि मार्क्स धर्म का वैसा विरोधी नहीं था, जैसा उसको उसके विरोधियों ने सिद्ध करने की कोशिश की. उसका मकसद किसी आध्यात्मिक समस्या का समाधान करना भी नहीं था. वह धर्म के पलायनवादी पक्ष को सामने रखकर बुर्जुआ समाज की नीयत को उजागर करना चाहता था. वह उस स्वामी संस्कृति का आलोचक था जो एक व्यक्ति को बिना श्रम किए मालिक होने का अधिकार देती है. दूसरी ओर श्रमिक से उसके श्रम का वास्तविक मूल्य तक हड़प लेती है. जिसमें उत्पादन का आधार व्यक्ति अथवा समाज की जरूरतें नहीं, बल्कि कारखानेदार का मुनाफा होता है. अपने मुनाफे के लिए जहां वह अनापशनाप वस्तुओं की खेप बाजार में उतार देता है, वहीं व्यक्ति की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने वाली कम मुनाफादेय वस्तुओं के उत्पादन से मुंह मोड़ लेता है. धर्म की शोषणकारी भूमिका की ओर संकेत करने वाला मार्क्स अकेला भी न था. उससे पहले भी अनेक विचारकों ने धर्म की प्रतिक्रियावादी भूमिका को आलोचकीय दृष्टि से देखा था. मगर मार्क्स का विश्लेषण उन सबसे हटकर तथ्यपरक, तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक था. अपने पूर्ववर्त्तियों से आगे बढ़कर उसने धनपतियों, भूसामंतों के वर्गीय चरित्र पर सीधा प्रहार किया था. उससे सर्वहारा को एकजुट होने की प्रेरणा मिली. इससे पहले औद्योगिक सहकारिताओं की टक्कर से भी पूंजीवादी ताकतों को संगठित जनशक्ति के सामथ्र्य का एहसास हो चला था. अपनी प्रवृत्ति में गैरस्पर्धात्मक होते हुए भी सहकारिताएं पूंजीवाद के समानांतर अपने विकास में भरोसा रखती थीं. जबकि मार्क्स का साम्यवादी चिंतन वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए सर्वहारा के संगठित प्रतिरोध द्वारा पूंजीवाद को उखाड़ फैंकने का सीधेसीधे आवाह्न करता था. इसलिए पूंजीपतियों द्वारा मार्क्स का विरोध स्वाभाविक ही था. अपनेअपने हितों को दांव पर लगा देख धर्मसत्ता और राजसत्ता ने भी उनकी मदद की. तत्कालीन परिस्थितियों ने भी उन्हें सहारा दिया. उस समय तक एडम स्मिथ द्वारा Laissez-faire के आधार पर अर्थनीति की समीक्षा को करीब डेढ़ सौ वर्ष से अधिक हो चुका था. मगर उसके सही परिणाम आगे आने वाले थे.

                                                                                      जारी…..

© ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

अनुक्रमणिका

1. There are but three ways for the populace to escape its wretched lot. The first two are by the routes of the wine-shop or the church; the third is by that of the social revolution.- M.A. Bakunin.

2. Why does not the pope, whose wealth is today greater than the wealth of the richest Crassus, build this one basilica of St. Peter with his own money rather than with the money of poor believers?”- Martin Luther’s “95 Theses”

3. The standpoint of the old materialism is civil society; the standpoint of the new is human society or social humanity.KARL MARX THESES ON FEUERBACH, Translated: by Cyril Smith.

4. Philosophers have hitherto only interpreted the world in various ways; the point is to change it.Ibid.

 

1 टिप्पणी

Filed under दार्शनिक, धर्म एवं निरंकुश पूंजीवाद, धर्म और अभिजन संस्कृति

One response to “धर्म एवं निरंकुश पूंजीवाद

  1. sudarshansingh

    Reblogged this on Sudarshansingh’s Weblog and commented:
    ya suturmurg ki tarah sir gada ke jina, pashuo ki tarah se jeewan jina.

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