भारतीय दर्शनों में समय की अवधारणा

समय का दर्शन : चार

समय को लेकर आज भले ही हम नियतिवादी द्रष्टिकोण से आगे कुछ न सोच पाते हों, परंतु हमेशा ऐसा नहीं था. मानवीय चेतना में विकास के साथ समयसंबंधी अवधारणा में भी परिवर्तन होते रहे हैं. वैदिक युग में जब मनुष्य प्रकृति के सान्निध्य में जीवनयापन करता था, अपने चारों ओर बिखरी विपुल प्राकृतिक संपदा नदियां, पहाड़, झरने, महासागर, फलफूल, वनवनस्पतियों को देखकर अभिभूत था….जीवनमृत्यु, दिनरात और ग्रहनक्षत्रों को देख चमत्कृत रह जाता था. तब समय को लेकर उसका सोच भी लगभग नियतिवादी था. वह मानता था जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी आदि जैसे दूसरे भौतिक पदार्थों का अस्तित्व है, वैसे ही समय का भी है. समय की सीधे प्रतीति भले न हो, परंतु दिनरात, धूपछांव, जीवनमृत्यु के अंतर से उसकी उपस्थिति का एहसास होता था. इतना स्वाभाविक कि यह मानकर भी कि परिवर्तन वस्तुओं की सहज प्रवृत्ति है, उसे लगता था कि वस्तुओं के अपने गुण के अलावा भी कुछ ऐसा है जो उन्हें नियंत्रित रखता है. उनके रूपाकार को बदलते हुए देखता है. इसी गुण को कभी ‘समय’ की संज्ञा दी गई, तो कभी ‘काल’ कहकर संबोधित किया गया. फिर घटनाओं की सटीक परख, आवृत्ति, अंतराल आदि की जांच के लिए समय के घंटा, मिनट, सैकंड, पल, अनुपल, वर्ष, संवत्सर जैसे मात्रक गढ़े गए. कालांतर में धूपवर्षाताप आदि के उपादान कारणों की भांति समय को भी देवता का दर्जा दिया गया था. यज्ञ में उसके नाम समिधा अर्पित की जाने लगी. उष्मा और प्रकाश बांटने वाले सूरज तथा परिवर्तन के प्रतीक ‘द्यौ’(दिन, उजास) की गिनती भी वैदिक देवताओं में होने लगी. उसको ‘प्रकृति पूजा की पहली श्रेणी का उपलक्ष्य’ माना गया. विकास की आरंभिक बेला में यह अप्रत्याशित भी नहीं था. दिनारंभ के साथ शरीर में नई स्फूर्ति आ जाती है. नवीन ऊर्जा से ओतप्रोत मनुष्य अपना काम शुरू कर देता है. उजास प्रकृति में नई चेतना भर लाता है. जीवजगत से लेकर जड़जंगम, वनस्पति आदि सभी पर उसका प्रभाव बहुआयामी होता है. यह सब बिना किसी दैवीसामर्थ्य के संभव नहीं. इसलिए वह देवता है. सभी को हर्षित, ऊर्जस्वित, उमंगित एवं आलोकित करनेवाला. प्राणिमात्र को नई स्फूर्ति एवं चेतना से भर देने वाला. पूरी तरह प्रकृतिआश्रित जीवन में यह विश्वास स्वाभाविक ही था. एक अन्य स्थान पर ऋग्वेद में समय को शक्तिरूप कहा गया है. ऐसी सचेतन शक्ति जो जीवनसंघर्षों, आपदाओं के बीच सबकी रक्षा करती है. जीवनचक्र को आगे बढ़ाती और उसका संवर्धननिर्देशन आदि करती है.

समय का प्रत्यय मानवीय बोध के साथ ही जन्म ले चुका था. उसको उतना ही पुराना माना गया, जितनी सृष्टि. हालांकि सृष्टि के विकास में समय का योगदान जल के बाद आंका गया. नासदीय सूक्त के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति जल से मानी गई है. वही आदिमहाभूत है. इस मान्यता के अनुसार सृष्टि निर्माण में सहायक बने पंचमहाभूतोंअग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश में जल सर्वप्रथम आया. उसी से बाकी तत्वों का विकास हुआ है. यह सीधेसीधे अनुभव से जन्मा दर्शन था. जल से प्रकृति हरियाती है. जीवन संभव हो पाता है. वह प्राणतत्व की पहली आवश्यकता है. ऋग्वेद में प्राकृतिक सत्ताओं के प्रति श्रद्धाभाव से विकसित बहुदेववाद है. मगर सृष्टि की प्रथम कारक सत्ता होने के कारण जल सबसे महत्त्वपूर्ण है. डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार—‘ऋग्वेद की प्रवृत्ति एक सीधासादासरल यथार्थवाद है….(वह) केवल एक जल की ही परिकल्पना करता है. वही आदिमहाभूत है, जिससे धीरेधीरे दूसरे तत्वों का विकास हुआ.’ (भा. . पृष्ठ 83). लेकिन सृष्टि की रचना अकेले जल द्वारा संभव न थी. जल की अवस्था से आकाश, अग्नि, जल, वायु के विकास के बीच सुदीर्घ अंतराल है. नासदीय सूक्त के अनुसार आरंभ में न दिन था न रात. इसलिए समय का बोध कराने वाले भूतभविष्य आदि का भी लोप था. इस तरह महाशून्य अवस्था से दिनरात से भरपूर ब्रह्मांड में आने के बीच जो लाखों, करोड़ों वर्ष बीते, उनसे समय की उपस्थिति स्वतः सिद्ध है. कह सकते हैं कि सृष्टि के निर्माण में पंचतत्वों के सहयोग के अलावा समय का भी योगदान रहा. वैदिक ऋषियों को लगा होगा कि सतत परिवर्तनशील जगत की व्याख्या के लिए अंतरिक्ष अपर्याप्त है. उससे सृष्टि के विस्तार और व्याप्ति की परिकल्पना तो संभव है, मगर चराचर जगत की परिवर्तनशीलता एवं क्रमानुक्रम की व्याख्या के लिए, कुछ ऐसा भी होना चाहिए जो अंतरिक्ष जैसा अनादिअनंत होकर भी वस्तुजगत की गतिशीलता की परख करने में सक्षम हो. अंतरिक्षनुमा होकर भी उससे भिन्न हो. जिसमें वह अपने होने को सार्थक कर सके. अपनी चेतना को दर्शा सके. जिसके माध्यम से घटनाओं के क्रम तथा उनके वेग आदि की व्याख्या भी संभव हो. जो सकल ब्रह्मांड के चैतन्य का साक्षी, उसकी गतिशीलता का परिचायक एवं संवाहक हो.

अंतरिक्ष आभासी संरचना है. वह ग्रहनक्षत्रों तथा तरहतरह के गतिमान पिंडों को अपने भीतर समाए रहता है. कह सकते हैं कि गतिमान पिंडों की स्थिति तथा उनका अंतराल हमें अंतरिक्ष का आभास कराते हैं. तदनुसार अंतरिक्ष वह त्रिविमीय आभासी संरचना है जो विभिन्न प्रकार के छोटेबड़े पिंडों, कणों को अपने भीतर समाहित रखता है. उनके भीतरीबाहरी, भौतिक अथवा काल्पनिक अंतराल की प्रतीति कराता है. उनकी गतिशीलता के लिए पर्याप्त आकाश देता है. दूसरी ओर समय महज एक विमीय सरंचना है. उसका गुण है कि वह ब्रह्मांड में पलछिन घटने वाली कोटिक घटनाओं का साक्षी बन सके. वह दो या उससे अधिक घटनाओं के क्रमानुक्रम, बारंबारता, अंतराल तथा उनके आपसी संबंधों का बोध कराता है. यह भी कह सकते हैं कि घटनाओं का वेग, मानवमस्तिष्क द्वारा उन घटनाओं को सहेजने का क्रम तथा उनका अंतराल समयबोध का निर्माण करते हैं. व्यवहार में समय आभासी मगर सापेक्ष सत्ता है. दूसरी ओर समय की निरपेक्षता के समर्थन में भी अनेकानेक उल्लेख शास्त्रों में मौजूद हैं. यह माना जाता रहा कि समय बाह्यः प्रभावों, दृश्यअदृश्य घटनाओं से मुक्त है. वह घटनाओं पर नियंत्रण रखता है, मगर स्वयं किसी से प्रभावित नहीं होता. इसलिए उसकी गति सदैव एकसमान बनी रहती है. यह धारणा भी बनी रही कि चराचर जगत में जो कुछ बनतामिटता है, समय उसका साक्षी है. काल नहीं मिटता, हम ही बनतेमिटते हैं—कहकर समय की परमसत्ता को स्वीकृति दी गई. उसे अजेय माना गया. एकेश्वरवादी चिंतन में ईश्वर के अतिरिक्त समय या उस जैसी शाश्वत सत्ता की परिकल्पना, ईश्वर की सर्वोच्चता पर प्रश्नचिह्न लगाती थी. अतएव परमात्मा की सर्वोच्चता को दर्शाने के लिए गीता में श्रीकृष्ण के मुख से कहलवाया गया—कालोऽस्मि.’ ‘मैं ही समय हूं.’ यहां काल समस्त घटनाओं के आगार, विराट ब्रह्मांडीय विस्तार का द्योतक है. वह श्रीकृष्ण के मुख से उच्चारित हुआ है, इसलिए वह विराट शक्ति का भी बोध देता है. समय के साथ बीतना, गुजरने, घटित होने जैसी प्रतीतियां सहजरूप से जुड़ी हुई हैं. उसे परिवर्तनशील माना गया है. मगर परमसत्ता की महत्ता को रेखांकित करने के लिए यत्रतत्र उसको कालातीत भी कहा जाता है. सृष्टि निर्माण में समय के योगदान को स्वीकार करते हुए प्राचीन आचार्यों ने लिखा—‘जल की अवस्था से उन्नत होकर इस जगत का विकास समय, संवत्सर अथवा वर्ष, इच्छा या काम, एवं बुद्धिरूपी पुरुष तथा तप की शक्तियों से हुआ था.’ (भा. . पृष्ठ 83). इसमें समय तथा ‘संवत्सर अथवा वर्ष’ को अलगअलग लिखा हुआ है. जबकि व्यवहार में संवत्सर और वर्ष समय के ही मात्रक हैं.

उपर्युक्त से सिद्ध होता है कि समय को लेकर वैदिक आचार्यों की दो स्पष्ट प्रतीतियां थीं. पहली उसे अनंत, ब्रह्मांडनुमा सत्ता मानती थी. उसके अनुसार समय को स्थिर, विचलनहीन और अनंत विस्तारयुक्त सत्ता माना गया. जिसमें सबकुछ घटता रहता है. जो घटनाओं का क्रमानुक्रम मात्र न होकर अंतहीन त्रिविमीय फैलाव है. चराचर जगत का सहयात्री न होकर सर्वस्व द्रष्टा है. जिसका न आदि है न अंत. जो इतना विस्तृत है कि कोटिक कोटि ग्रहनक्षत्रनीहारिकाएं उसमें सतत गतिमान रहती हैं—या जो कोटिक घटनाओं, गतियों का एकमात्र द्रष्टा एवं साक्षी है. दूसरी प्रतीति के अनुसार समय भूत, वर्तमान तथा भविष्य के रूप में परिलक्षित होने वाली, नदीसम निरंतर प्रवाहशील एकविमीय संरचना है. घटनाओं के साथ घटते जाना उसका स्वभाव है. वह न केवल घटनाओं के क्रमानुक्रम का साक्षी है, बल्कि उनका हिसाब भी रखता है. मगर है आदिअंत से परे. उनकी न शुरुआत है न ही अंत. समय को लेकर ये दोनों ही धारणाएं कमोबेश आज भी उसी रूप में विद्यमान हैं. इस तरह यह संभवतः अकेली अवधारणा है जिसके बारे में मनुष्य के विचारों में शुरू से आज तक बहुत कम परिवर्तन हुआ है. इतना अवश्य है कि समय जब तक दर्शन का विषय था, तब तक उसे लेकर वस्तुनिष्ठ ढंग से विचार होता रहा. विशेषकर जैन और बौद्ध दर्शन में समय की सत्ता पर गंभीर चिंतन हुआ. कालांतर में समय के दार्शनिकवैज्ञानिक पक्ष पर विचार करने के बजाय केवल उसके व्यावहारिक पक्ष पर विमर्श होता रहा. आगे चलकर जीवन में स्पर्धा और सामाजिक विभाजनकारी स्थितियां बढ़ीं तो पोंगा पंडितों ने समय को प्रारब्ध से जोड़ दिया. एक निरपेक्ष सत्ता को नियामक सत्ता मान लिया गया. इससे मानवमन में समय के प्रति अतिरिक्त श्रद्धाभाव उमड़ने लगा. उसके पीछे समय को जानने की वांछा कम, डर और समर्पण का अंश कहीं अधिक था. समय के प्रति डर, अविश्वास एवं स्थूल चिंतन का दुष्प्रभाव यह हुआ कि उसे लेकर दार्शनिक चिंतन लगभग ठहरसा गया. इससे उन पोंगापंथियों को सहारा मिला जो समय को लेकर लोगों को डराते थे.

 

 

समय का बोध मानवीय बोध के साथ जन्मा और उतना ही पुराना है. सवाल है कि समय की उत्पत्ति कब हुई? क्या समयबोध के साथ? अथवा उससे पहले? इस मामले में वैदिक ऋषि और वैज्ञानिक दोनों एकमत थे कि समय का जन्म सृष्टि के जन्म के साथ हुआ. उससे पहले समय की कोई सत्ता नहीं थी. हालांकि दोनों की मान्यताओं का आधार अलगअलग है. स्वाभाविक रूप से वैज्ञानिक इसकी व्याख्या तार्किक आधार पर करना चाहते हैं, जबकि वैदिक आचार्यों का द्रष्टिकोण अध्यात्मप्रेरित था. अंतरिक्षीय महाविस्फोट द्वारा सृष्टिरचना के सिद्धांत में विश्वास रखने वाले वैज्ञानिक मानते हैं कि उससे पहले ब्रह्मांड अतिउच्च संपीडन की अवस्था में था. इस तरह विज्ञान की दृष्टि में ब्रह्मांड और समय दोनों एक ही घटना का उत्स हैं, जिसे वैज्ञानिक महाविस्फोट का नाम देते हैं. इसलिए ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ लिखने के बहाने स्टीफन हाकिंग जैसे वैज्ञानिक प्रकारांतर में इस ब्रह्मांड का ही इतिहास लिख रहे होते हैं. ब्रह्मांड के जन्म की घटना से पहले समय की उपस्थिति को नकारना वैज्ञानिकों की मजबूरी थी. क्योंकि उससे पहले समय की उपस्थिति स्वीकार करने के लिए उनके पास कोई तार्किक आधार नहीं था. समय ही प्रतीति ‘घटित होने’ से जुड़ी हुई है और उच्च संपीडन की अवस्था में घटना का आधार ही गायब था. ऐसा कोई कारण नहीं था जिससे समय की उपस्थिति प्रमाणित हो सके. समय के बारे में एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक द्रष्टिकोण आइंस्टाइन के शोध में मिलता है. सापेक्षिकता के सिद्धांत की खोज के बाद घटना विशेष के संदर्भ में दिक् और काल को अपरिवर्तनशील एवं निरपेक्ष मानना संभव नहीं रह गया था. वे प्रभावशाली मात्राएं बन गई थीं, जिनका स्वरूप पदार्थ और ऊर्जा पर निर्भर था. सापेक्षिकता का सिद्धांत महाविस्फोट से पहले समय की संभावना को नकारता है. उसके अनुसार समय और दिक् की परिकल्पना केवल ब्रह्मांड के भीतर रहकर संभव है. उससे पहले चूंकि घटनाओं के बारे में कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा सकता, अतएव यह माना गया कि समय की परिकल्पना केवल ब्रह्मांड की संभावनाओं में संभव है. इसके बावजूद समय की निरपेक्ष तस्वीर कुछ वैज्ञानिकों को आज भी लुभाती है. हालांकि 1915 में आइंस्टीन द्वारा ‘जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी’ का क्रांतिकारी सिद्धांत पेश होने के बाद उसपर दृढ़ रहना आसान नहीं रह गया था. सापेक्षिकता के सिद्धांत को स्वीकृति मिलने के बाद स्पेस और टाइम किसी घटना के स्थिर आधार जैसे अपरिवर्तनशील और निरपेक्ष नहीं रह गए. बल्कि वे बेहद प्रभावशाली मात्राएं बन गईं, जिनकी रूपरेखा पदार्थ और ऊर्जा से तय होती है. यह मान लिया गया कि दिक्, काल की व्याख्या केवल ब्रह्मांडीय सीमाओं में संभव है. तदनुसार ब्रह्मांड के जन्म से पहले दिक्, काल की परिकल्पना करना बिल्कुल बेमानी हो गया. इस निरीश्वरवादी परिकल्पना थी, जिसके समर्थक जैन और बौद्ध दर्शन थे.

वैदिक मनीषियों का द्रष्टिकोण सर्वथा भिन्न था. समय और सृष्टि की उत्पत्ति को एकदूसरे से जोड़ना उनके आस्थावादी मन के लिए जरूरी था. जहां वैज्ञानिक महाविस्फोट से पहले समय की परिकल्पना करने से इसलिए हिचकते हैं कि उसके लिए उनके पास उपर्युक्त तर्कों का अभाव है, और उसको सिद्ध कर पाना फिलहाल असंभव, वहीं आस्थावादी दार्शनिकों की समस्या थी कि समय को पूर्व अथवा समानांतर सत्ता मान लेने से उसकी सर्वेश्वरवादी व्याख्याएं संकट में पड़ने लगती हैं. सर्वशक्तिमान परमात्मा की परिकल्पना तो असंभव हो जाती है. इसलिए ऋग्वेद में कहा गया, ‘वह काल की, देश की, आयु, मृत्यु और अमरता आदि सबकी पहुंच के बाहर और उनसे परे है. हम इसकी ठीकठीक व्याख्या नहीं कर सकते, सिवाय इसके कि यह अस्तित्व रखती है.’(. . पृष्ठ – 81). यह एक प्रकार का रहस्यवाद ही था. इस संकट से उबरने की कोशिश बौद्ध दर्शन में दिखाई पड़ती है. उसके अनुसार समय चिरंतन है. मनुष्य की भांति वस्तुजगत का भी समय निर्धारित है. समय के सुदीर्घ अंतराल में ब्रह्मांड भी बनतेमिटते रहे हैं.

नासदीय सूक्त में उद्गाता ऋषि ब्रह्मांड की उत्पत्ति की कल्पना शून्य से करता है—नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्, किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीन्दहनं गभीरम्.’ इसका सरल पद्यात्मक अनुवाद यशदेव शल्य द्वारा किया गया है. लेकिन हम मैक्समूलर द्वारा किए गए अनुवाद को लेना चाहेंगे, जिसे डॉ. राधाकृष्णन ने ‘भारतीय दर्शन’ खंड—एक में उद्धृत किया है. उसके अनुसार—‘उस समय न तो सत था, न ही असत्. न आकाश विद्यमान था, न ही उसके ऊपर अंतरिक्ष. तब किसने उसे आवृत कर रखा था. वह कहां था? किसके आश्रय में रखता था? क्या वह आदिकालीन गहनगंभीर जल था? जिसमें समाहित था सबकुछ. मृत्यु का अभाव था. इस कारण अमरताबोध अजन्मा ही था. जिसके माध्यम से दिन और रात का होना निश्चित किया जा सके. केवल और केवल ब्रह्म था, बिना श्वांसप्रश्वांस की प्रक्रिया के जीवित रहने वाला. बाकी था अंधकार, घोर अंधकार….तब फिर कौन जानता है कि सृष्टि कहां से हुई? जिससे इस सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ, उसने इस सृष्टि को बनाया या नहीं बनाया, ऊंचे से ऊंचे अंतरिक्षलोक लोक में, ऊंचे से ऊंचा देखने वाला, वही यथार्थरूप में जानता है, अथवा क्या वह भी नहीं जानता?’(भा. . पृष्ठ 81). सृष्टि के उत्स को जानने के बहाने असल में यह निराकार ब्रह्म की कल्पना थी, जो बहुदेववाद की आलोचनाओं के बीच आवश्यक हो चुकी थी. परमात्मा सृष्टि की कारक सत्ता है. इसलिए वह उससे पहले है. किसी को कोई संदेह न हो, इसलिए ऋग्वेद में यह नासदीय सूक्त से पहले, हिरण्यगर्भ सूक्त के माध्यम से स्पष्ट कर दी जाती है. हिरण्यगर्भ सूक्त में उद्गाता मुनि ब्रह्मांड की उत्पत्ति से पहले की स्थिति की कल्पना करते हुए लिखता है—हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्. स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय् हविषा विधेम.’ वह था. परंतु क्या था? किस रूप में था? इस बारे में दावे के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता….हम उसकी अभ्यर्थना करते हैं. यह भी एकेश्वरवाद की ओर संकेत रहस्यवादी कल्पना है. उद्गाता ऋषि कल्पना की उड़ान भरतेभरते विराट शून्य में तल्लीनसा प्रतीत होता है और अव्याख्येय को परमात्मा का नाम देकर तसल्ली कर लेता है.

वैदिक साहित्य में समय को लेकर जो आस्थावादी द्रष्टिकोण बना, वह सहòाब्दियों तक बना रहा. उपनिषदों में समय को लेकर चर्चा हुई, परंतु उसी समर्पण भाव के साथ. समय की सत्ता को स्वीकारते हुए. ब्रहदारण्यक उपनिषद में याज्ञव्ल्क्य भी समय के बारे में वैदिक द्रष्टिकोण को ही आगे रखते हैं—‘‘हे गार्गी! वह जो अंतरिक्ष से ऊपर है, और वह जो पृथ्वी के भी नीचे है, वह जिसे मनुष्य भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं, उस सबकी रचना अंदर और बाहर देश के अंतर्गत है. किंतु फिर इस देश की रचना भीतर और बाहर किसके अंदर हुई? हे गार्गी! सत्य के अंदर, इस अविनाशी के अंदर, सब देश के अंदर और बाहर गुंथा हुआ है’’ बृहदारण्यक 3-6-7). एक अन्य स्थान पर ऋग्वेद में ब्रह्म का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि वह काल की मर्यादा से स्वतंत्र है. अर्थात वह अनित्य है, जिसका न आदि है न अंत. अथवा वह एक तात्कालिक अवधि है जिसे एक नियमित कालव्यवधान की आवश्यकता नहीं है. वह भूत् और भविष्यत् के विचार से मुक्त है(भा. . 142). वेदादि धर्म ग्रंथों में अनादि, अनश्वर, कालातीत, अमर जैसे विशेषण बारबार आते हैं. उसके पीछे एकमात्र कारण था, मृत्यु का भय. इसलिए आस्थावादी दर्शन का बड़ा हिस्सा मृत्यु के चंगुल से बाहर निकल जाने की कोशिश तक सिमटा हुआ है. साफ है कि ‘अमरताबोध’ जैसी परिकल्पना के पीछे भी मृत्युभय निहित था. मृत्यु तथा आकस्मिक रूप से आ धमकने वाली आपदाओं ने ही समय के प्रति डर को जन्म दिया था. अमरत्व की कल्पना का एकमात्र आशय था, समय के साथ अनंतकाल तक बने रहने की सुविधा; या फिर समय की पकड़ के बाहर आकर अनंत में बने रहने की प्रतीति. लेकिन जब आप मृत्यु अथवा उसके पार जाने के लिए कथित अमरता की कल्पना कर रहे होते हैं, तो प्रकारांतर में अंतहीन समय की परिकल्पना कर, उसे भी अमरत्व प्रदान कर रहे होते हैं. आस्थावादी दार्शनिकों के लिए यह कोई समस्या ही नहीं थी. इसलिए ऐसी कल्पनाएं प्रायः हर धर्म ग्रंथ का हिस्सा बनी हैं. श्वेताश्वरोपनिषद कतिपय बाद की रचना है. मगर उसमें भी समय को लेकर इसी प्रकार का आस्थावादी द्रष्टिकोण सामने आता है. परमसत्ता की स्थिति की कल्पना करते हुए उपनिषदकार लिखता है—‘वहां फिर न दिन रहता है, न रात रहती है, न कोई अस्तित्व रहता है, और न कोई अनस्तित्व रहता है—केवल ईश्वर रहता है.’(भा. . 160). इसका भी सीधा सा अर्थ है कि ईश्वर पर समय का कोई असर नहीं पड़ता. वह उसकी पकड़ से बाहर है.

दरअसल समय पर निरपेक्ष सत्ता के रूप में विचार करना वैदिक ऋषियों की प्राथमिकता था भी नहीं. गंभीरतापूर्वक विचार करने पर हम पाएंगे कि वैदिक काल में दर्शन का स्तर अपेक्षाकृत स्थूल था. भारतीय दर्शनों में समय को लेकर थोड़ाबहुत वस्तुनिष्ट चिंतन मिलता भी है तो केवल बौद्ध और जैन दर्शन में. जैन दर्शन में संसार की समस्त वस्तुओं को ‘जीव’ और ‘अजीव’ दो श्रेणियों में रखा गया है. ‘जीव’ में समस्त प्राणी समुदाय आता है. ‘अजीव’ वर्ग में आकाश, पुद्गल, धर्म, अधर्म के अलावा ‘काल’ को भी सम्मिलित किया गया है. ‘अजीव’ को कहींकहीं अर्धद्रव्य की से भी संबोधित किया गया है. तदनुसार ‘काल’ भी अर्धद्रव्य है, ‘यह विश्व की वह सर्वव्यापक आकृति है, जिसके द्वारा संसार की समस्त गतियां सूत्रबद्ध हैं. यह एक व्यवधानपूर्ण परिवर्तनों की शृंखलाओं का केवल जोड़मात्र नहीं है, किंतु स्थिरता की एक प्रक्रिया है—भूत् एवं वर्तमान काल को चिरस्थायी बनाना है(भा. . 256).’ इसमें समय संबंधी दोनों धारणाओं का सम्मिलन दिखाई पड़ता है. सर्वदर्शन संग्रह में अंतरिक्ष और काल को समानधर्मा माना गया है. उसके अनुसार अंतरिक्ष और काल दोनों सर्वव्यापी हैं. इसके बावजूद दोनों में अंतर है. अंतरिक्ष चतुर्विमीय संरचना है. जबकि काल एकपक्षीय विस्तार. सर्वदर्शन संग्रह के अनुसार काल का अस्तित्व तो है, किंतु उसमें कायत्व अथवा विशालता का अभाव है. एक पक्षीय होने के कारण इसमें विस्तार नहीं है.(भा. . 256) जैन ग्रंथ ‘पंचास्तिकारसमयसार’ में समय को लेकर गहन चिंतन मिलता है. देखा जाए तो यही वह ग्रंथ है जिसमें समय के बारे में आधुनिक चिंतन की सच्ची झलक मौजूद है. पंचास्तिकारसमयसार समय को नित्यकाल और सापेक्षकाल में बांटता है. नित्य काल निराकार एवं आदिअंत से सर्वथा मुक्त है. जबकि सापेक्षकाल समय के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण. नित्यकाल का न आदि है न ही अंत. दूसरी ओर सापेक्षकाल का आदि भी है तथा अंत भी. सुविधा के लिए उसको घंटे, मिनट आदि में भी विभाजन किया जा सकता है, ‘नित्यरूप काल को हम ‘काल’ के नाम से एवं सापेक्षकाल को ‘समय’ के नाम से पुकारते हैं. काल समय का महत्त्वपूर्ण कारण है. वर्तन अथवा परिवर्तनों की निरंतरता परिणाम द्वारा अनुमान की जाती है. (पंचास्तिकायसमयसार-89) सापेक्ष समय का निर्णय परिवर्तनों अथवा वस्तुओं के अंदर गति के द्वारा होता है. यह परिवर्तन अपने आपमें निरपेक्षकाल के कार्य हैं. (पंचास्तिकायसमयसार-107-108). काल को चक्र अथवा पहिया या घूमने वाला कहा जाता है. चूंकि काल की गति से सब पदार्थों की आकृति का विलयन संभव होता है, नई आकृतियां जन्म ले पाती हैं—अतएव काल को संहारकर्ता भी कहा गया है. बौद्ध मतावलंबी भी समय को अंतविहीन मानते हैं. बौद्ध विद्वान धर्मकीर्ति के अनुसार संसार सतत प्रवाह है. इसका न आदि है न ही अंत. इसलिए समय का भी न आदि है न अंत.

 

 

प्रकट में, अपनेअपने आग्रहों के फलस्वरूप विज्ञान और दर्शन दोनों ही सृष्टि पूर्व समय की उपस्थिति को नकारते हैं. विज्ञान मानता है महाविस्फोट से पहले समय का कोई अस्तित्व नहीं था. ब्रह्मांड अतिउच्च संपीडन की अवस्था में. रातदिन का अस्तित्व ही नहीं था. महाविस्फोट के साथ ब्रह्मांड का जन्म हुआ और अगले ही क्षण वह तेजी से फैलने लगा. सेकंड के बेहद सूक्ष्म हिस्से के भीतर ब्रह्मांड का आकार दोगुना हो गया. उसके बाद तो यह और भी तीव्र गति से फैलने लगा. आगे चलकर आकाशगंगाएं बनीं. सौरमंडल अस्तित्व में आया. लेकिन वैज्ञानिक भी इतना तो मानते ही हैं कि महाविस्फोट से पहले ब्रह्मांड उच्च संपीडित अवस्था में था. भले ही इतनी सघनावस्था में कि दिनरात आदि का अस्तित्व ही संभव न हो. परंतु महाविस्फोट से पहले भी कुछ था. भले ही वह उच्च संपीडित अवस्था में, बिंदुरूप में हो. वैज्ञानिक यह जानने के लिए सिर नहीं खपाते कि उच्चतम संपीडन की अवस्था कब से थी? क्यों थी? इस बारे में उनकी परिकल्पनाएं मौन दिखाई पड़ती हैं. असल में ब्रह्मांड के अस्तित्व से पहले समय को ले जाने की कठिनाई है कि तब हमें एक और ब्रह्मांड की कल्पना करनी पड़ेगी, भले ही उसका आकार लघुत्तम अथवा बिंदुसम क्यों न रहा हो. जैसा कि बौद्ध दर्शन में किया गया है. वह ब्रह्मांड की नश्वरता के सिद्धांत पर विश्वास रखता है. बौद्ध दर्शन के लिए यह आसान है. इसलिए कि वह आत्मा और ईश्वर के अस्तित्व पर मौन रहने की सलाह देता है. ब्रह्मांड के सातत्य का सिद्धांत उसके लिए कोई मुश्किल खड़ी हीं करता. मगर सर्वेश्वरवादियों के लिए यह संभव नहीं है.

आस्थावादी ब्रह्मांड की उत्पत्ति से पहले परमात्मा की सत्ता को स्वीकारते हैं. उनके अनुसार समय की कोई बाहरी प्रतीति नहीं है. वह परमात्मा का ही गुण है, उसके भीतर समाया हुआ—‘यह सब भूत और भविष्यत् जगत् पुरुष ही है.’(10/90/2). ऐसे में समय की सत्ता को चुनौती देना, उसके ऊपर सवाल खड़े कर देता है—स्वयं परमात्मा की सत्ता के ऊपर सवाल खड़े करता है. सर्वेश्वरवादी तो परमात्मा को ही सब कुछ मानते हैं. उनके अनुसार यह चराचर जगत, दृश्यअदृश्य सभी सत्ताएं ईश्वरीय चेतना का ही विस्तार हैं. परमात्मा उनके लिए वह अनंत शुभ का पर्याय है. यह सृष्टि उसका अनंत विस्तार है. सीमित ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से मनुष्य इसको समझने का प्रयत्नमात्र कर सकता है. इसी को विस्तार देते हुए ऋग्वेद में आगे लिखा गया है—‘हमारे भौतिक विभाग केवल इंद्रियगम्य भौतिक जगत की व्याख्या देश, काल और कारणों से आबद्ध आकृतियों के रूप में कर सकते हैं. किंतु यथार्थ सत्ता इस सबसे परे है. देश को वह अपने अंदर धारण करते हुए भी स्वयं काल की सीमा में बद्ध नहीं, यह काल से ऊपर है. ’ (भा. . – पृष्ठ 142). समय की स्वतंत्र सत्ता सर्वेश्वरवादी मान्यताओं के आगे प्रश्नचिह्न लगा देती है. ईश्वर यदि समय है, अथवा समय ईश्वर की विशिष्टता है तो क्या समय की भांति ईश्वर भी बीतता है? ईश्वर का बीतना अथवा उसकी परिवर्तनकारी अवस्था प्रकारांतर में उसमें विक्षोभ की ओर इशारा करती है. इससे बचने के लिए परमात्मा को मृत्यु और काल की सीमाओं से परे माना गया.

हालांकि समय पूर्व परमात्मा की उपस्थिति अथवा परमात्मा में समय को स्थित मानकर अध्यात्मवादी अपने ही तर्कों के जाल में फंसे नजर आते हैं. होना अपने आप में घटना का प्रतीक है. आस्थावादियों के अनुसार यदि सृष्टि की कारक सत्ता के रूप में ईश्वर पहले से ही अस्तित्व में था तो उसके होने की क्रिया स्वयं सिद्ध है. चाहे वह ईश्वरीय सत्ता के विस्तार के रूप में हो अथवा उसके समानांतर एक स्वतंत्र सत्ता. दूसरे शब्दों यदि सृष्टि से पहले परमात्मा की सत्ता को स्वीकार कर लेते हैं और उससे समस्त घटनाओं की अन्विति मान लेते हैं तो परमात्मा के एक गुण के रूप में अथवा उसके समानांतर, भले ही कितनी ही अवधि के लिए क्यों न हो, समय की उपस्थिति को भी स्वीकार करना पड़ेगा. उस अवस्था में नए सवालों का सिलसिला शुरू हो जाता है. सृष्टि से पहले परमात्मा यदि परमशांत अवस्था था, जैसा कि अध्यात्मवादी स्वीकार करते हैं, तो उसके कथित निष्क्रिय अवस्था से सक्रिय अवस्था में आने तक कुछ न कुछ अंतराल अवश्य रहा होगा. यदि वह निरपेक्ष निष्क्रिय सत्ता के रूप में मौजूद था, तो भी उसके होने की क्रिया अपने आप में स्वयं एक घटना है. आशय है कि दोनों अवस्थाओं में चाहे वह महाविस्फोट से पहले अंतरिक्ष के उच्च संपीडन की अवस्था हो अथवा सृष्टि की प्रमुख कारक शक्ति परमात्मा के रूप में—व्यावहारिक समय की मौजूदगी से इन्कार नहीं किया जा सकता. क्योंकि ऐसी अनेकानेक वस्तुएं हैं जिनके होने की क्रिया से हमारा सीधा परिचय नहीं है. इसके बावजूद हम उनके होने को स्वीकार करते हैं. जैसे अंतरिक्ष.

उस अवस्था में विकास की अभी तक ज्ञात समस्त परिकल्पनाएं सवालों के घेरे में आ जाती हैं. इससे बचाव का दूसरा उपाय भी है कि यह कि समय की सत्ता और उसके अस्तित्व को ही चुनौती दी जाए. यह मान लिया जाए कि अंतरिक्ष की भांति वह भी एक भ्रांति है. घटनाओं की क्रमिकता और मानवस्मृति के योग से बना एक एहसास मात्र है. प्रत्येक घटना अपनी विशिष्ट गति से संपन्न होती है. उसके अनुसार हमारे मनस् पर स्मृति के योग से बना प्रभाव समयांतराल की प्रतीति देता है. यहां एक सामान्यसा प्रश्न उठाया जा सकता है कि घटनाओं के प्रभाव, क्रमानुक्रम अथवा उनकी अन्वति से परे समय क्या है? यदि यह माना जाए कि समय भूतभविष्य, वर्तमान आदि न होकर अंतरिक्षसम संचरना है और घटनाएं उसके भीतर घटती रहती हैं, तो घटनाओं की आवृत्ति, क्रमानुक्रम से परे भी क्या समय की प्रतीति संभव है? यदि हां, तो तब समय की प्रतीति और अंतरिक्ष की प्रतीति के बीच भेद कैसे संभव होगा. वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्मांड के जन्म से पहले उच्च संपीडन की अवस्था तथा अध्यामवादियों की दृष्टि में ब्रह्मांड से पहले परमात्मा की मौजूदगी अपने आप में स्वयं एक घटना थी. तदनुसार किसी न किसी रूप में सृष्टिपूर्व समय की उपस्थिति भी अवश्य रही होगी, भले ही अपनी सीमाओं में हमारा मस्तिष्क उसकी कल्पना कर पाने में असमर्थ हो. समय की सत्ता को मान्यता प्रदान करना, ऐसी ही उलझनों से दोचार होना है. दर्शन का कार्य ऐसी ही चुनौतियों से संवाद करते रहना है.

समय को लेकर मौलिक चिंतन पश्चिम में इमानुएल कांट के दर्शन में प्राप्त होता है. विशेषकर समय और ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में. क्या ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई? अथवा यह हमेशा ऐसा ही था? इमानुएल कांट के लिए यह विवेचना का विषय था. कांट जीवन में नैतिक मूल्यों को महत्त्व देता था और विचारों से उसका द्रष्टिकोण समन्वयवादी था. उसको लगता कि समय के प्रति लोगों के मन में समाया डर अनेक नैतिक समस्याएं खड़ी कर देता है. भयभीत मनुष्य दूसरों को भूलकर केवल अपनी चिंता करने लगता है. इसलिए समय और ब्रह्मांड के अस्तित्व को लेकर तत्कालीन चिंताएं उसके दर्शन का हिस्सा भी बनीं. दोनों पर विचार करने के बाद उसको लगा कि दोनों ही विचारधाराओं में न केवल अंतर्विरोध हैं, बल्कि वे अतिवादी भी हैं. यदि यह माना जाए कि किसी बिंदू पर ब्रह्मांड की शुरुआत हुई तो फिर कर्ता ने शुरुआत के लिए अनंतकाल तक प्रतीक्षा क्यों की? आखिर क्या कमी थी, जो अपने संरचना को लंबे समय तक दबाए रखा. और यदि यह मान लिया जाए कि ब्रह्मांड अनंतकालीन सत्ता है, उसमें बस परिवर्तन होते रहते हैं हैं तो ब्रह्मांड ने अपनी पुरानी स्थिति से, इसको बिग बैंग कहें या कुछ और, वर्तमान अवस्था तक आने में इतना लंबा समय क्यों लिया? कांट ने इन दोनों धारणाओं को क्रमशः ‘थीसिस’ और ‘एंटीथीसिस’ का नाम दिया. लेकिन समय को लेकर वह किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सका.

कांट के समय तक भी अधिकांश दार्शनिकों का विचार था कि समय निरपेक्ष और अपरिवर्तनशील सत्ता है. वह अनंत भूतकाल से अनंत भविष्य की ओर अग्रसर है. महाविस्फोट(बिग बैंग) सैद्धांतिकी ने भले ही समय को ब्रह्मांड की उत्पत्ति से पहले मानने से इन्कार कर दिया था, मगर अधिकांश दार्शनिकों का कहना था कि समय अनंत भूतकाल से अनंत भविष्य की ओर अग्रसर है. वह इससे अप्रभावित है कि उसकी पृष्ठभूमि में किसी ब्रह्मांड का अस्तित्व है या नहीं? इन्हीं चुनौतियों ने आइंस्टाइन को समय को चौथा आयाम स्वीकारने के लिए प्रेरित किया था. प्रयोगों के आधार पर आइंस्टाइन ने सिद्ध किया कि समय पर भी ब्रह्मांड की दूसरी गतिविधियों का प्रभाव पड़ता है. समय संबंधी उसके दो प्रयोग चौंकानेवाले थे—पहला यह कि यदि स्रोत और प्रेक्षक दोनों के बीच वेग की स्थिति है और विस्थापन बढ़ रहा है, उस अवस्था में यदि स्रोत टार्च का प्रकार प्रेक्षक पर डालकर देखता है, तो स्रोत और प्रेक्षक के बीच वेग की चाहे जो स्थिति हो, प्रकाशवेग दोनों के लिए एकसमान रहेगा. दूसरा समय की सिकुड़न का विचार था. आइंस्टाइन से पहले माना जाता था कि समय का वेग हर स्थिति में एक ही होता है. मगर आंइस्टान ने अपने सापेक्षिकता के सिद्धांत द्वारा सिद्ध किया था कि यदि अलगअलग पिंडों पर मौजूद दो व्यक्ति समय का आकलन करते हैं और उनमें से एक अतिउच्च वेग, प्रकाशवेग के बराबर से गमितान है तो गतिशील पिंड पर मौजूद प्रेक्षक के लिए समय ठहरा हुआ प्रतीत होगा. यह मानते हुए कि प्रकाश वेग से उच्च वेग असंभव हैं और समय के वेग को प्रकाशवेग से कम आंकने पर दूसरी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं, आइंस्टाइन ने समय के वेग को प्रकाशवेग के बराबर माना.

आइंस्टाइन के शोध से आगे बढ़ते हुए पेनरोज और स्टीफन हाकिंग इस नतीजे पर पहुंचे थे कि यदि सापेक्षिकता का सिद्धांत सही है तो ‘परमबिंदू’(सिंगुलैरिटी) की अवस्था भी होनी चाहिए, जिसमें उन्होंने अनंत घनत्व और दिक्काल कर्वेचर वाले ऐसे बिंदू की कल्पना की थी, जहां से समय की शुरुआत होती है. यदि हम समय को प्रकाश जैसा वेगवान मान लेते हैं या फिर हाकिंग के शब्दों में परमबिंदू की कल्पना करने लगते हैं तो, प्रकाश की ही भांति समय भी भौतिक पदार्थ सिद्ध हो जाता है. जैसा निरीश्वरवादी जैन दर्शन मानता है. उसमें समय को अर्धद्रव्य माना गया है. मगर इससे भी शंकाओं का समाधान नहीं हो पाता. क्योंकि द्रव्य हो या अर्धद्रव्य, दोनों ही नश्वर हैं. उस अवस्था में समय को भी एक न एक दिन नष्ट हो जाना चाहिए. परंतु समय ऐसी कोई प्रतीति नहीं देता. वह हमारे चारों और घट रही घटनाओं के रूप में निरंतर अपने होने का एहसास कराता है. यदि ध्यानपूर्वक देखें तो हाकिंग द्वारा प्रस्तुत परमबिंदू की अवस्था घटनाओं की परमशून्यता की स्थिति भी है, जहां समय की परख के लिए संभावनाएं ही समाप्त हो जाती हैं. कुल मिलाकर समय एक पहेली के रूप में हमारे सामने आता है. सुलझाने के लिए यदि हम पीछे की ओर लौटते हैं तो उसकी पैठ सुदूर अतीत में दिखाई पड़ती है. यदि भविष्य की ओर झांकते हैं तो वह हम सबसे कहीं आगे चल रहा मुसाफिर जान पड़ता है.

क्रमशः….

© ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

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