धर्म और अभिजन संस्कृति : तीन

 धर्म : प्रासंगिकता का सवाल

धर्म शानदार प्रलोभन है, जो जनसाधारण का मुंह बंद रखने के काम आता है. यह वह वस्तु है जो गरीब को अमीर की हत्या करने से रोकती है.1 नेपोलियल बोनापार्ट

अभिजन संस्कृति के प्रमुख सूत्रधार धार्मिक अभिजन के उदय के बारे में चर्चा हमने इस लेख के आरंभिक हिस्से में की. हमने सामाजिक स्तरीकरण के क्षेत्र में धर्म की भूमिका को जाना. यह समझने की कोशिश की कि धर्म किस प्रकार समाज की अभिजन मानसिकता का विकास करने, उसे बनाए रखने तथा शेष समाज में उसके प्रति सहानुभूति पैदा करने का काम करता है. हमने यह भी देखा कि धर्म अभिजन समाज की वर्चस्वकारी नीतियों का न केवल अंधसमर्थन करता है, बल्कि समाज में उन्हें बनाए रखने, स्थायित्व देने तथा उनके माध्यम से समाज के बड़े वर्ग को सत्ता एवं संसाधनों से वंचित कर देने का खेल भी खेलता है. आर्थिकसामाजिक स्तरीकरण के लिए जिम्मेदार इस खेल में धर्म की सीधे भूमिका यदि न हो, तो भी उसके नाम पर यह कौतुक प्रायः चलता जाता है. आखिर धर्म को यह ताकत कहां से मिलती कहां से है? जिस जिज्ञासा तत्व को विवेकवान मनुष्य का लक्षण कहा जाता है, वह धर्म और आस्था के नाम पर एकाएक निस्तेज कैसे हो जाता है? हमने देखा कि धर्म गाहेबगाहे मनुष्य की स्वाभाविक प्रश्नाकुलता को दबाने का काम करता है. उसकी कोशिश मनुष्य को ज्ञान की समकालीन धाराओं से काटकर भीड़ में ढाल देने की होती है. इसके बावजूद उसकी लोकप्रियता अक्षुण्ण बनी रहती है. यह धर्म का जादू ही है कि गरीब हो या अमीरधर्म की डगर को छोड़ना कोई नहीं चाहता. हालांकि इसके कारण अलगअलग हैं. अभिजन धर्म को अपनाने का नाटक करता है, ताकि उसके माध्यम से वह सबकुछ पा सके, जिससे उसका वर्चस्व कायम रहे. साधारणजन के पास सिवाय धर्म के दूसरा कोई रास्ता, कोई विकल्प नहीं होता. इसलिए वह अपने इस जन्म के सपनों को अगले जन्म में सूद सहित लौटने के भ्रम में पुजारी के यहां गिरवी रख देता है. यदि कोई ऐसा न करना चाहे, इससे बाहर निकलना भी चाहे तो यह संभव नहीं. क्योंकि परिवार से लेकर समाज तक धर्म की व्याप्ति इतनी गहरी और विविधतापूर्ण है कि किसी न किसी अवसर पर धार्मिक मूल्यों, कर्मकांडों के साथ दिखना उसकी मजबूरी बन जाता है.

धर्म की सत्ता बहुमान्य भले हो, निर्विवाद कभी नहीं रही. तमाम लोकप्रियता एवं बहुस्वीकार्यता के बावजूद उसके आलोचक हमेशा, प्रत्येक युग में रहे हैं. आलोचना का सिलसिला वेदों के जमाने से चला आ रहा है. आजीवक, चार्वाक और लोकायतियों की विचारधारा में भले अंतर हो, ईश्वरीय सत्ता के बहाने निरर्थक वितंडा, धर्म के नाम पर व्याप्त टोटमवाद तथा कर्मकांड के सहारे फलतेफूलते पाखंड के वे सभी समान विरोधी थे. चार्वाकों ने तो वैदिक कर्मकांड की जमकर खिल्ली उड़ाई थी. परिपक्व बौद्धिकता एवं आत्मविश्वास का परिचय देते हुए उन्होंने मौलिक दर्शन की अभिकल्पना की. चार्वाक दर्शन को भारतीय षड्दर्शन के साथसाथ विश्वभर के भौतिकवादी दर्शनों में शीर्ष स्थान प्राप्त है. उसकी लोकप्रियता रही है. आस्तिक विचारधारा के समर्थकों में भी समयसमय पर ऐसे व्यक्ति उभरे जिन्होंने धर्म की आलोचना का जोखिम उठाया. विरोध सहा, नुकसान भी झेले. फिर लगातार संघर्ष के बल पर सफलता भी प्राप्त की. सच यह भी है कि पश्चिम के मुकाबले भारत में धर्म के सार्थक विरोध अथवा उसके विकल्प की तलाश के उदाहरण कम ही रहे हैं. पश्चिम में धार्मिक आडंबरवाद का विरोध करते हुए सुकरात ने जहर का प्याला पिया. ब्रूनों को जिंदा जला दिया गया. मूर को मृत्युदंड की सजा मिली. वाल्तेयर ने ईश्वर को ‘बंद घेरा’ कहा तो चरमपंथी उनसे नाराज हो गए. ‘मनुष्य आजाद जन्मा है, मगर वह हर जगह बेड़ियों में है’ कहकर मनुष्य की धार्मिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता का पक्ष लेने वाले रूसो को जीवन के कई महत्त्वपूर्ण दिन कारावास में बिताने पड़े. धर्म के नाम पर हुए उत्पीड़न और हत्याकांड के उदाहरणों से इतिहास रंगा पड़ा है. इससे धर्म सर्वथा अप्रभावित रहा हो, ऐसा भी नहीं है. धीरेधीरे ही सही धर्म की कुप्रवृत्तियों पर निरंतर प्रहार का असर हुआ. फलस्वरूप पश्चिम में चर्च जो कभी राज्य की निदेशक सत्ता हुआ करता था, व्यक्ति की निजी आस्था तक सिमट गया.

सुधारवाद की हवा भारत में भी चली. हवा का रुख बदलने में सक्षम सुधारक, विद्वान लेखक यहां भी हुए. धर्म की सीमारेखा को लांघने का साहस उनमें न था. इसलिए यहां चले सुधारवादी आंदोलन परंपरा से बोझिल थे. सुधारवादी नेताओं ने सामाजिक कुरीतियों, आडंबरवाद और पौरोहित्यवाद का विरोध करते हुए अध्यात्म संबंधी विचारों को व्यक्तिगत बनाए रखने पर जोर दिया. धर्म को हर किस्म के आडंबरवाद से निकाल देने के लिए ज्ञानमार्गी धारा की राह प्रशस्त की. बताया कि मनुष्य को जितनी जरूरत समाज की है, उतनी ही जरूरत समाज को मनुष्य की है. दोनों परस्पर अन्योन्याश्रित हैं. इन सुधारकों की सीमा थी. वे समाधान धर्म के दायरे में खोज रहे थे. धर्म की सीमारेखा को लांघने का साहस उनमें न था. धर्म जिन संबंधों को लोकहित में निबाहने का दावा करता है, वे नैतिकता के अनुपालन द्वारा आसानी से और कहीं अधिक सफलता के साथ निभाए जा सकते हैं. अपनी उपयोगिता दर्शाने के लिए धर्म नैतिकता को बैशाखी की तरह इस्तेमाल करता है, लेकिन इससे नैतिकता का प्रभाव आधाअधूरा रह जाता है. इसलिए कोई भी धर्म मनुष्य से ऊपर नहीं है. ‘‘अष्ठादश पुराणेशु व्यासस्य वचनं द्वियम्. परोपकाराय पुण्याय, पापाय परिपीड़नम’—अठारह पुराणों का सार व्यास के दो वचनों में छिपा है, परोपकार पुण्य है, दूसरे को सताना महापाप.’’ यह उक्ति परोक्ष में नैतिकता का ही महिमागान करती है. बगैर नैतिक हुए मानवीय होना असंभव है. इसलिए महात्मा बुद्ध से लेकर आज तक, समयसमय पर धर्म में नैतिकता की स्थापना के प्रयास लगातार होते रहे हैं. लेकिन बौद्धधर्म के अलावा शायद ही कोई दूसरा रास्ता अधिक कारगर रह पाया. कारण साफ था कि बौद्ध दर्शन के अपनी विचारधारा में जनसाधारण के कल्याण की अभिकल्पना की थी. उसी के अनुरूप उनका दर्शन था. अपने मौलिक और व्यावहारिक दर्शन के कारण बौद्ध दर्शन देशविदेश की सीमाओं को लांघकर पूरी दुनिया में फैला. और जैसा कि प्रत्येक संस्था के साथ होता है, अर्से के बाद उसमें भी वैचारिक शिथिलता आने लगी. जिससे वह अप्रासंगिक होने लगा. इसने जहां धर्म के विकल्पों की मांग प्रशस्त की. यह भी सच है कि धर्म के सार्थक विरोध की गंभीर परंपरा हिंदुस्तान में कभी रही ही नहीं. यदि कभी, कहीं हुई भी तो उसको दबा दिया गया. कभीकभी उसको धार्मिकता का ऐसा गाढ़ा रंग दे दिया गया कि उसकी सारी क्रांतिधर्मिता हवा हो गई. गौतम बुद्ध, स्वामी दयानंद, विवेकानंद जैसे महान धार्मिक सुधारवादी नेताओं ने धर्म की मानवतावादी व्याख्या के लिए रूढ़ धर्मावलंबियों की आलोचना का जोखिम भी उठाया था. संयोग देखिये कि इन सभी की मृत्यु संद्धिग्ध परिस्थितियों में हुई है. उनकी मृत्यु का रहस्य दुनिया के सामने नहीं आ पाया है.

मध्य काल में कबीर, दादू, नानक, कुंभादास आदि ने धर्म के नाम पर पल रहे छिछले पोंगापंथ, कर्मकांड एवं पौराणिक वितंडा के विरोध में आवाजें उठाईं. लेकिन वे भी धर्म को कर्मकाड और आडंबरवाद की जकड़बंदी से बाहर न निकाल सके. उन्हें स्थायी न मिलने का प्रमुख कारण था कि वे धर्म द्वारा पैदा की गई समस्याओं का समाधान उसके दायरे में ही खोजना चाहते थे. इसलिए जैसे ही इनके प्रवत्र्तकों का प्रभाव घटा, यथास्थितिवादी शक्तियां अवसर देखकर पुनः सक्रिय हो गईं. पत्थर को ईश्वर का नाम देकर लोगों को सदियों से भरमाती आई शक्तियों के लिए व्यक्तिविशेष को देवता बनाकर मठों में कैद कर देना कठिन न था. सो यही उन्होंने किया भी. इसके चलते गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित किया गया. चार्वाक, आजीवक एवं लोकायत जैसे भौतिकवादी विचारकों के बारे में तरहतरह के किस्सेकहानियां गढ़कर उन्हें वैदिक परंपरा से जोड़ा गया. ऐसा ही एक गढ़ा हुआ किस्सा कर्णघंट अजामिल का है. कर्णघंट को ‘नारायण’ नाम से ही नफरत थी. इतनी अधिक नफरत कि वह सनक का रूप ले चुकी थी. ‘नारायण’ नाम कान में न पड़े, इसलिए वह दोनों कानों के पास दो घंटियां लटकाए रहता था. यदि कोई ‘नारायण’ कहता भी तो वह झट से गर्दन हिला देता. घंटियों के शोर में वह शब्द दब जाता. कहानी की बुनावट और पुराणलेखकों की अद्भुत किस्सागोई के लिए उनकी सराहना कीजिए कि नारायण नाम से नफरत करने वाला कर्णघंट अपने बेटे का नाम ‘नारायण’ रखने को तैयार हो जाता है. वृद्धावस्था में एक बार वह बीमार पड़ा. मृत्यु सन्निकट देख अंतिम संबोधन के लिए बेटे को आवाज दी—‘नारायण’. अजामिल भले ही अपने बेटे को बुला रहा हो, परंतु कहीं लोग यह न मान लें कि वह सचमुच नारायण को ही बुला रहा था और उन्होंने अनसुना कर दिया—विष्णु क्षीरसागर से दौड़ पड़े. बेटा चाहे सुने या अनसुनी करे, परंतु नारायण को नाम की चिंता. तो नाम के लोभी विष्णु ने अजामिल की पुकार सुनी. इस डर से कि लोग कहीं नाम लेना कम न कर दें, चले आए अजामिल का उद्धार करने. तो ऐसे देवता पंडितों ने गढ़े जो सिर्फ अपना नाम रटाने में बड़प्पन मान लेते थे. साम्राज्यवादी युग में जहां राजा को चापलूसों की पूरी भीड़ चाहिए. भगवान भी ऐसा ही अहंकारी गढ़ा गया. ताकि आमजन सत्तालोलुप सम्राटों की निरंकुशता को पचा सके. साम्राज्यवादी दौर में इससे बेहतर भगवान गढ़ा ही नहीं जा सकता था. उस युग में अजामिल अकेला नास्तिक नहीं था. वह विपुल संख्या में फैले नास्तिकों का प्रतीक था. वह नास्तिक अजामिल का प्रभाव कम करने, उसे तथा उसके अनुयायियों को अपने मायाजाल में बांध लेने की चिंता थी. गोया एक धमकी भी थी कि एक विचार को स्थापित करने में तुम चाहे अपना जीवन खपा दो, अवसर मिलते ही हम तुम्हें अपने पाखंडटोली में मिला ही लेंगे. इसे हम विरोधी परंपराओं को पनपने न देने, उनकी सारी मौलिकता और क्रांतिकारिता को सोख लेने की चाल भी कह सकते हैं. इस चाल के अनेक रूप थे. कुछ स्पष्ट तो कुछ इतने महीन की उन्हें समझना कतई आसान न था.

रामानंद ने कबीर को टालना चाहा था. परंतु कबीर जब गले पड़ ही गए तो ‘मरामरा’ रटने को कहकर आगे बढ़ गए. हो सकता है रामानंद ने शूद्र कबीर को काशी के गंगाघाट की सीढ़ियों पर ‘जा मर’ कहकर धिक्कारा हो. जैसी कि उस समय तक परंपरा थी. यह कबीर की प्रतिभा थी जो उन्होंने जान लिया कि ‘मरामरा’ रटने से ‘रामराम’ की भ्रांति देने लगता है. इससे उन्होंने शब्द की ताकत को समझा. ‘नादबह्म’ की गहराई में झांका. व्यंग्य की मीठी मार को पकड़ा. समझ गए कि जीवन और मृत्यु में कोई खास अंतर नहीं हैं. वह भी प्रकृति की परिवर्तनशीलता का एक उदाहरण है. एक वृक्ष सूखकर गिरता है तो नया पौधा अंकुराने लगता है. पुराना वृक्ष नए के लिए खादपानी बनता है. एक तरह से यह उसका भी पुनर्जन्म है. मृत मानवदेह मिट्टी में समाकर नए जीवन का स्रोत बनती है. लेकिन इसकी व्याख्या किसी भाग्यवादी या नियतिवादी द्रष्टिकोण से करना अनुप्रयुक्त है. यही सृष्टि चक्र है. सबका देखाभाला. सीधीसादासरल. इसे चमत्कार बताकर पुरोहित वर्ग समाज को मूर्ख बनाता रहा है. जनता तक इस सच को पहुंचाने के लिए कबीर ने उलटबांसियां लिखीं. पोंगापंथी साधुओं, मौलवियों को ललकारा. तिरस्कार के जरिये ही सही, कबीर को कबीर बनाने में रामानंद का बड़ा हाथ था. काशी की सीढ़ियों पर रामानंद की जो ठोकर उन्होंने खाई थी, उसको वे जिंदगीभर भुला नहीं पाए. भुला देते तो इतने सिद्ध कैसे बन पाते. इसलिए सजग रहकर भी गुरु के गढ़े ईश्वर को लगातार धिक्कारते रहे. जब भी मौका मिला धर्म के नाम पाखंड फैलाने वालों पर उन्होंने जमकर कटाक्ष किया—

संतो पांडे निपट कसाई/बकरी मार भैंसे पर धावैं, दिल में दर्द न आई/कर स्नान तिलक कर बैठे, बिधि से देव पुजाई/आतम राम क्षण भर में मारा, रक्त की नदी बहाई/अति पवित्र ऊंचा कुल कहिए, सभाओं में अधिकाई/इनसे दीक्षा सब कोई मांगे, हंसी आवे मुझे भाई/पाप काटन को कथा सुनाएं, कर्म करावें नीचा/हम तो दोउ परस्पर देखा, जम लाए हैं खींचा/गऊ मारे उसे तुरक कहिए, इनसे क्या वे छोटे/कहें कबीर सुनो भई संतो, कलि में ब्राह्मण खोटे.’

धर्म ज्ञान का विरुपण करता है. यह वास्तविक बोध को सीमित कर, उसको टोटम में ढाल देता है. आस्था पर इतना जोर देता है कि विवेक सर्वथा उपेक्षित होकर रह जाता है. धर्म के राजनीतिकरण के चलते अंधश्रद्धा को धार्मिकता का पर्याय मान लिया जाता है—‘धर्म का मतलब है, बुद्धिमत्ता की मौत. जब हम किसी सिद्धांत पर जड़ हो जाते हैं, विवेक हमारा साथ छोड़ देता है.’2 सवाल उठता है कि धर्म की आखिर वह कौनसी खूबी है, जिससे वह सदियों से जनअभिजन का कंठहार बना हुआ है. तमाम आलोचनाओं के बावजूद उसकी लोकप्रियता पर आंच नहीं आती. जिसके चलते सुधारवादी आंदोलनों का प्रभाव भी अल्पकालिक सिद्ध होता है, महात्माओं, विद्वानों और दार्शनिकों की बात अनसुनी रह जाती है और समाज थोड़ीबहुत हलचल के बाद वह फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौटने लगता है. आसान शब्दों में कहें तो यह परंपरा के दबाव के कारण होता है. जीवन में सरलीकरण की प्रवृत्ति के चलते होता है. प्रबोधीकरण की लीक छोड़ देने की वजह से होता है. भविष्य की चुनौतियों से डरे समाज परंपरा को ही अपना आदर्श मान लेते हैं. इससे वे ज्ञानविज्ञान की आधुनिकतम प्रणालियों की उपेक्षा करने लगते हैं. यही नहीं असुरक्षा की भावना के चलते वे उपलब्ध ज्ञानविज्ञान का परंपराकरण करने से भी नहीं चूकते. अपने निर्णय के बीच वे बारबार अतीत को ले आते हैं. अतएव चुनौतियों के बीच उन्हें अक्सर पराजय का सामना करना पड़ता है; या उनके हिस्से आती है तो केवल हताशा. हालांकि उन्हीं में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो परंपरा का अनुसरण करने के बजाय उनका उपयोग करने में दक्ष होते हैं. ऐसे लोग परंपरापूजन के सामान्य खेल को अपने हितों के अनुसार ढालते रहते हैं. लोगों की भावनाओं तथा उनके अतीतमोह का लाभ उठाकर वे समाज के निर्णायक पदों पर आसीन हो जाते हैं. तदनंतर समाज को अपने स्वार्थ के अनुकूल हांकने लग जाते हैं. दूसरी ओर परंपरानुगमन को जीवन का अभीष्ट मानने वाला आमजन इस स्पर्धा में निरंतर पिछड़ते जाते हैं. उल्लेखनीय है कि ज्ञान व्यक्ति को आत्मविश्वास से लैस करता है. जबकि धर्म का संपूर्ण आयोजन दूसरों की सलाह पर, दूसरों के लिए होता है. यहां व्यक्ति को अपने ही अस्तित्व पर शंका होने लगती है. ऐसे में उसके समस्त प्रयास अनमन्यस्कता से भरे होते हैं. उल्लेखनीय है कि आस्था में न तो स्पर्धा होती है, न सहयोग. इसलिए उसका कोई नैतिक या सामाजिक मूल्य नहीं होता. वह भीड़ को एकजुट करती है, चुनौतियों से पलायन कर जाती है. संकट में वह परमात्मा के साथ होने का भरोसा देती है. नुकसान होने पर नियति बन पसर जाती है. उस अवस्था में व्यक्ति अपने भाग्य को कोसता है. त्राण के लिए छाया के पीछे भागता है. वह इतनी निजी होती है कि हर आदमी उसे अपनी मनोभूमि के अनुसार ढाल सकता है. उसे इच्छित रंग दे सकता है. दूसरी ओर इतनी व्यापक भी होती है कि हजारों व्यक्तियों को एक साथ प्रभावित कर सके. इस कारण उसका राजनीतिक दुरुपयोग भी संभव है. राजनीति में ढलकर, राजनीतिज्ञों को हाथ का औजार बनकर आस्था को अंधआस्था बनते, सांप्रदायिकता में ढलते देर नहीं लगती.

धर्म की लोकप्रियता का दूसरा कारण जीवन की चुनौतियां हैं. शताब्दियों से आमजन अभिजन के शोषण एवं उत्पीड़न का शिकार रहा है. अपनी स्थिति का लाभ उठाकर अभिजन वर्ग समस्त निर्णायक शक्तियां अपने हाथों में रखता है, जिससे आमजन चाहकर भी मुक्त नहीं हो पाता. वास्तविक शोषकों, उत्पीड़कों तथा उत्पीड़न के असली कारणों से बचाए रखने के लिए आमजन को समझाया जाता है कि ‘दुख इस जीवन का मूल है’….‘संसार माया है’. इस विश्वास के चलते सदाग्रही व्यक्ति जो भी कर्म करता है, वह उसका सत्कर्म कहलाता है, जिसमें लाभ की कामना, सुख की वांछा को अगले जन्म तक स्थगित कर दिया जाता है. ‘सत्’ अथवा ‘सत्य’ का आशय बहुत सीमित अर्थों में लिया जाता है. उसका व्यक्ति अथवा समाज के विकास से कोई संबंध नहीं होता. न ही उसका अभिप्राय ज्ञानविज्ञान की ज्ञात प्रणालियों की मदद से समाज और प्रकृति के बारे में बोध अर्जित करना है. धार्मिक व्यक्ति की नजर में ‘सत्’ का अभिप्राय धर्म गुरु के पलायनवादी विचारों में श्रद्धा रखना, पुरोहित के कर्मकांड को अपनाए रखना तथा उनके प्रभाव में रहते हुए तर्क और ज्ञान की प्रणालियों से कट जाना होता है. इससे व्यक्ति की निर्णय क्षमता का हृास होता है. आत्मविश्वास कमजोर पड़ता है और वह भेड़चाल को ही अपने जीवन की उपलब्धि मानने लगता है. जीवन की विकट परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने में नाकाम व्यक्ति हताशा और नाउम्मीदी से भर जाते हैं. ‘संसार दुखमय है’….‘दुख कालातीत है’….‘संसार मायाजाल है’….‘रिश्तेनाते सब दिखावा हैं….पिता, पुत्र, पत्नी, भाईबहन सब स्वार्थमय रिश्ते हैं, कोई किसी का नहीं हैं.’ जैसी अवधारणाओं के माध्यम से दुख एवं अविश्वास की प्रतीति को तरहतरह से लोकमानस में बिठाया गया. सुख और उसके संसाधनों के प्रति कुंठा उमगाई गई. इससे जीवन का उत्साह मरने लगता है. हतोत्साह होने से कार्यक्षमता घटती है, संसार के प्रति पलायनवादी द्रष्टिकोण पैदा होता है. बात केवल आज की नहीं, न केवल छोटेबड़े की है. बड़ेबड़े दर्शन भी संसार के प्रति नकारात्मक बोध को बनाने में पीछे नहीं रहे. वेदांतियों ने दृश्य जगत को ही मिथ्या माना है. ‘ब्रह्म सत्यं जगन्नमिथ्यां’. जीवन को लेकर व्यावहारिक द्रष्टिकोण रखने वाले बौद्ध दर्शन ने भी दुख की कारक सत्ता पर विश्वास बनाए रखा. हांलांकि इस बारे में उसका नजरिया भी पलायनवादी था. परंतु बुद्ध ने यह कहकर कि दुख का निवारण संभव है, जीवन के प्रति संभावनाओं को बचाए रखा. बौद्ध दर्शन से मिलाजुला रवैया जैन मतावलंबियों का था. ‘कैवल्य’ की आस में वे भी संसार को लेकर नकारात्मक बोध पैदा करते रहे.

धर्म की लोकप्रियता का तीसरा बड़ा कारण इसका सुलभ और सरल होना है. धर्म को आस्था से जोड़ा गया. धार्मिक बने रहने के लिए किसी स्पर्धा या परीक्षा की आवश्यकता नहीं होती. यह मान लिया जाता है कि ईश्वर बदलाव के विरुद्ध है. एकरसता उसको भाती है. एक ही आरती को बारबार लाखोंकरोड़ों के मुंह से बारबार सुनकर बोर नहीं होता. रोज एक लोटा पानी उसकी प्यास बुझाने और नहलाने के लिए पर्याप्त है. वह निरंकुश है, जो चाहता है कि पूरी दुनिया उसका नाम रटती रहे. केवल उसके बारे में सोचे. केवल उसकी होके रहे. वही देखेसुने जो वह दिखानासुनाना चाहता है. उसके हर निर्णय को सिर झुकाकर माने, जैसे किसी सामंत के आदेश को माना जाता है. दुनिया को मायाजाल माने, संबंधों को भ्रांति. एक ही आरती को रोज गाकर, सुबहसुबह एक लोटा पानी चढ़ाकर ‘भक्त’ मान लेता है कि इससे ईश्वर प्रसन्न होगा. आदमी की जिंदगी गुजर जाती है, परंतु आरती वही रहती है. भक्त मानता है कि चापलूसीभरी स्तुतियां ईश्वर को प्रसन्न्न करेंगी, इसलिए वह तरहतरह का पाठ करता है. ऐसी आरती या पाठ जिसका जरूरी नहीं कि उसको भावार्थ भी आता हो. धर्म व्यक्तित्व परिष्कार पर जोर नहीं देता. न उसके लिए न्यूनतम शिक्षा अथवा मानसिक स्तर जरूरी है. इसलिए जो कुछ नहीं बन पाता, वह धार्मिक आसानी ने बन जाता. जैन और बौद्ध दर्शन निरर्थक कर्मकांड और मिथ्या आडंबरों का विरोध करते हैं. फिर भी मनुष्यता के लिए कुछ चामत्कारिक नहीं कर पाते. इसलिए कि मसीहावाद उनपर भी हावी रहता है. उसी के समर्थन पर वर्चस्वकारी शक्तियां समाज के संसाधनों पर कब्जा कर जनसमाज को उत्पीड़ित करती रहती हैं. इससे आमजन के मन में अपनी स्थिति के प्रति क्षोभ पैदा हो जाता है. इससे उबरने के लिए मसीहावाद के समर्थक, संचालक लोग अतींद्रिय सपनों की नई खेप बाजार में झांेक देते हैं, जो लोगों को भीड़ में बदलने का प्रयत्न करते हैं.

आम आदमी के लिए धर्म का प्रलोभन बड़े काम का था. इसलिए कि जीवन में चारों दिशाओं से समस्याओं से घिरे जीवन की दौड़ में पिछड़ गए व्यक्ति के लिए वह एक अंतिम सहारा था. जो दौड़ में बने रहने की अनुभूति देता था. धर्म की संरचना ही इस प्रकार की गई थी. उसमें आदमी अपने हुनर अपनी बुद्धिमत्ता का कोई योग न था. बल्कि कुछ न होने और सबकुछ छोड़ देने की प्रवृत्ति को वह ‘मुक्ति’ का नाम देकर महिमामंडित करता था. प्रकट में वह गरीब आदमी द्वारा अमीरियत के सपने को धिक्कारता था. धनवान आदमी का स्वर्ग के दरवाजे को पार करना उतना ही असंभव है, जितना हाथी द्वारा सुई की नोंक से पारगमन. यह ईसा मसीह द्वारा कहलवाया गया. मेरा विचार में ईसामसीह ने जो कहा वह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना यह जानना कि यह उन्होंने कितनी विषम परिस्थितियों के बीच कहा था. ईसा से करीब 70 वर्ष पहले रोम में दास योद्धाओं की ओर से जबरदस्त विद्रोह हुआ था. जिसने रोम की साम्राज्यवादी सेना को पीछे हटने को विवश कर दिया था. बाद में रोम और यूनान के अन्य नगरराज्यों की समन्वित सेनाओं के आगे स्पार्टकस के योद्धाओं को हार मिली. स्पार्टकस समेत उसके छह हजार योद्धाओं को सामूहिक सूली पर चढ़ा दिया गया. इससे दासों के दिल में यह बात घर कर गई थी कि यदि स्पार्टकस जैसा महान योद्धा उनकी मुक्ति के रास्ते नहीं खोल सका तो आगे भी असंभव है. ईसा मसीह का उपर्युक्त कथन उन्हें दौड़ में बने रहने की उम्मीद जगाता था. रोम का राज्य न सही, ईश्वर का राज्य उनके लिए सुरक्षित है, वर्तमान की पीड़ाओं, अभावों और नाकामियों को भुलाकर वे सुखमय जीवन जी सकते हैं. खासकर जब उनके सामने अमीरियत का रौब तथा गरीबी के लिए ढेर सारे तर्क सुख मौजूद हों.

धर्म को लोकप्रिय बनाने वाला अगला सबसे महत्त्वपूर्ण माध्यम समानता का सिद्धांत है. धर्म समाज में व्याप्त ऊंचनीच का समर्थन करता है. स्तरीकरण को बनाए रखने के लिए जाति और वर्ण जैसी व्यवस्थाओं का विन्यास करता है. उन्हें समर्थन देकर ताकतवर बनाता है. दूसरी ओर वह बराबर यह दोहराता है कि ‘ईश्वर के दरबार में सब बराबर हैं.’….‘वही सच्चा न्यायकर्ता है’….‘उसके यहां देर है, अंधेर नहीं’ आदिआदि. इस तरह वह एक ओर तो शोषणकारी व्यवस्था का समर्थन करता है, दूसरी ओर शोषित को यह विश्वास भी दिलाता है कि उसके साथ इस दुनिया में जो अन्याय हो रहा है, एक न एक दिन उसका न्याय होना है. वह माने रहता है कि ईश्वर के यहां देर भले हो, अंधेर नहीं है. इस तरह वह एक प्रलोभन की भांति, मरीचिका की भांति व्यक्ति को ललचाता है. उसको अन्याय और उत्पीड़नकारी व्यवस्था से समझौता करना सिखाता है. वह तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था को अपने हितों के लिए प्रभावित करता है तो उससे प्रभावित भी होता है. सामंतवादी दौर में मंदिरप्रवेश, गंगास्थान जैसे धार्मिक कार्यकलापों में सामाजिक वरीष्ठताक्रम के अनुसार भागीदारी का अवसर मिलता था. मंदिर में जब तक गांव का मुखिया पूजा न कर ले, तब तक आमजन को प्रवेश का अधिकार ही नहीं था. अनेक जातियों को मंदिर प्रवेश की अनुमति ही नहीं थी. गंगा स्नान पर मेलों में भी सामाजिक अनुक्रम का ध्यान रखा जाता था. लोकतंत्र में वे परंरपराएं दम तोड़ चुकी हैं.

धर्म का लचीलापन भी उसकी दीर्घायु के लिए जिम्मेदार है. वह हर नए वैज्ञानिक आविष्कार पर नजर रखता है. अपनी आधुनिकता दर्शाने, नवागत पीढ़ी पर प्रभाव जमाने तथा अपने स्थायित्व के लिए तत्काल उसका उपयोग करने, उसका अपने हितों के साथ अनुकूलन करने का प्रयास भी करता है. नवीनतम वैज्ञानिक आविष्कारों को आत्मसात करने की प्रक्रिया धर्म में लगातार चलती रहती है. लेखनकला का विकास हुआ तो मानव जीवन की समस्याओं के बारे में लिखने, चुनौतियों पर तर्क सम्मत ढंग से विचार करने, विकास और जीवन के विभिन्न पक्षों पर उपलब्ध ज्ञान के संग्रहण के बजाय सबसे पहले धर्मग्रंथों के संकलन पर जोर दिया गया. उस समय तक के उपलब्ध ज्ञान को धर्मग्रंथों में जगह भी मिली तो ईश्वर नाम का मुलम्मा चढ़ाकर. कंप्यूटर आया तो उसका उपयोग भविष्य बांचने, कुंडली बनाने में किया जाने लगा. विज्ञान ने मनुष्य को लुभाना शुरू किया तो धार्मिक परंपराओं को ही वैज्ञानिक ठहराने की मानो होड़ सी मच गई. पर्यावरण के प्रति चिंता बढ़ी तो पूजापाठ को पर्यावरण संरक्षण के उपकरण के रूप में उल्लिखित किया जाने लगा. यानी व्यक्ति की चाहे जो विचारधारा हो, या विचारधारा न भी हो तो भी, धर्म के पास उसे लुभाने, उसको अपने पाले में बनाए रखने का भरपूर तामझाम होता है.

इतिहास को अपने हितों के मोड़ने का खेल भी धर्म के नाम पर बाखूबी होता आया है. इस खेल में वह ऐतिहासिक चरित्रों का स्वार्थानुकूल उपयोग करता है. इसका एक उदाहरण भारतीय देवता गणेश हैं. देवताओं के राजा इंद्र हैं. वे वैदिक देवता भी हैं. परंपरा के अनुसार उन्हीं को प्रथम पूज्य होना चाहिए. फिर नवागत देवता गणेश को प्रथम स्थान देना, उन्हें प्रथम पूज्य दिखाना! गणेश वेदोत्तर काल के देवता हैं. पौराणिक युग की अभिकल्पना. गौतम बुद्ध के समय देश में कई स्वतंत्र गणराज्य थे. आकार में छोटे होने के बावजूद अपनी समृद्धि और वैभव में बेमिसाल वे राज्य मगध जैसे बड़े साम्राज्यों के लिए ईष्र्या का विषय बने हुए थे. ईसापूर्व तीनचार सौ वर्ष पहले जब दुनियाभर में आरंभिक गणतांत्रिक राज्य कमजोर पड़ने लगे तो गणतंत्र समर्थकों का मजाक उड़ाने का खासा बहाना उसके साम्राज्यवादी आलोचकों को मिल गया. गणसभा के बीच कार्रवाही का लोकतांत्रिक ढंग से संचालित करते गणप्रमुख या सभापति की झुकी गर्दन को सूंड का रूप दे देना, लगातार बैठे रहने से फूली तोंद बना देना गणप्रमुख की सत्ता पर तीखा कटाक्ष था. जिसका ध्येय था गणप्रमुख और उसके माध्यम से गणतांत्रिक व्यवस्था का उपहास करना. चूंकि सत्ताओं का पतन विचार का पतन नहीं होता. इसलिए केवल छवि विकृत कर देने, उसका मखौल उड़ाने से भी काम नहीं चलने वाला था. अतएव गणतंत्र और साम्राज्यवाद के बीच समन्वयकारी नीति अपनाने की कोशिश भी की गई. और तब गणेश(गणवेश) को केंद्रीय सत्ता का समर्थक घोषित करने के लिए एक रूपक रचा गया. एक कहानी….प्रथम पूज्य होने का सम्मान पाने के लिए देवताओं को प्रतियोगिता में उतारा गया, उस समय गणेश तीनों देवताओं(कहींकहीं अपने मातापिता) की परिक्रमा कर खड़े हो जाते हैं. एक तरह से यह कर्म के आगे व्यक्ति पूजा का उदाहरण भी हो सकता है. जो सिद्ध करता था कि सत्ता की वैधानिकता के लिए जनसमर्थन अथवा जनसहयोग की जरूरत नहीं है. केवल केंद्रीय व्यक्तियों को प्रसन्न करके, उनका आशीर्वाद प्राप्त करके भी शीर्ष पर बना रहा जा सकता है. इसी आधार पर गणप्रमुख की छवि को विकृत कर गणेश के रूप में लाया गया. यह ठीक ऐसा ही आयोजन था, जैसे गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करना. असल में यह शक्ति के विकेंद्रीकरण के प्रतीक गणपति को केंद्रीय सत्ता के समर्थन में लाने की कोशिश का नतीजा था. वैसे भी देवेश तो इंद्र हैं, गणेश को तो गणों(नागरिकों) का स्वामी होना चाहिए. पुरा आख्यानों में शिव गणेश को महादेव का पुत्र बताया गया है. यदि हड़प्पाकालीन सभ्यता से प्राप्त अवशेषों पर चर्चा की जाए जाए तो वहां एकमात्र देवता पाशुपत का उल्लेख मिलता है. यदि इसको धार्मिकता से न जोड़ा जाए तो एक प्रतीक के भी कई अर्थ निकलते हैं. जिनमें शिव पहले जननेता या लोकस्वीकृत महामानव दिखाई पड़ते हैं. वे एक ओर तो नीलकंठ हैं, अपनी जनता के कल्याण के लिए कष्टों को पचा जाने वाले, दूसरी ओर उन्हें विनाश का देवता भी कहा गया है. यानी जनता यदि क्रुद्ध हो तो वह पूरे संसार में तांडव मचा सकती है. ये प्रतीक देश के आदि जनतंत्र के अवशेष भी हो सकते हैं. जननेता को देवता का रूप देकर उसकी क्रांतिकारिता पर पानी फेर देना धूत्र्त, प्रवंचक पुरोहितों की केवल चाल नहीं. विवशता भी थी. जो समन्वयकारी परिस्थितियों में आवश्यक था.

धर्म, राजनीति और पूंजी का यही गठजोड़ आज तक चला आ रहा है. पूंजीवाद के कंधों पर सवार आधुनिक अभिजन चाहता है कि लोग बेहतर उपभोक्ता सिद्ध हों. इसके लिए वह धर्म और संस्कृति का सहारा लेता, समाजेतिहासिक तथ्यों को तोड़तामरोड़ता है. पुरोहित, धर्मोेपदेशक, प्रचारक आदि धार्मिक विशेषाधिकार प्राप्त लोग अभिजन संस्कृति को मजबूत करने के लिए पक्षपातपूर्ण ढंग से काम करते हैं. व्यवहार में वे धनसंपदा और भौतिक निधियों की उपेक्षा करते तथा इन्हें धर्म की राह में बाधक बताते हैं. धनवान व्यक्ति के स्वर्ग प्रवेश के बजाय ऊंट का सुई की नोक ने पार निकलना आसान है, ऐसी बातें गरीबी के महिमामंडन में सुनीसुनाई जाती हैं. संस्कृत की में कहा गया है—

तुष्ठो हि राजा यदि सेवकेभ्यो भाग्यात् परं नैव ददाति किचिंत

अहर्निशं वर्षति वारिवाहः तथापि पत्रत्रियः पलाशः.’

अर्थात राजा यदि सेवकों पर खुश हो फिर भी उनके भाग्य से अधिक वह उन्हें कुछ नहीं दे सकता. बादल रातदिन बरसें तो भी पलाश को तो केवल तीन ही पत्ते आते हैं.’ जैसी बातें जन को अपने हालात से संतोष करने, उन्हें भाग्यवादी बनाए रखने के लिए अक्सर कहीसुनी जाती हैं. अप्रकट रूप से वे समाज की कुल धनसंपदा पर कुंडली मारे बैठे मुट्ठीभर अभिजन समाज की अधिकारिता को वैध ठहराने में सहायक बनते हैं. ईश्वर को बीच में लाकर वे वृहद जनसमाज को समझाते हैं कि शीर्षस्थ वर्ग को जो विशेषाधिकार, सुविधाएं, मानसम्मान, धनवैभव आदि प्राप्त हैं, उनके पीछे विशेष ईश्वरीय कृपा है. प्रकारांतर में वे असमानता के प्रमुख कारणों से लोगों का ध्यान हटाए रखते हैं. धार्मिक अभिजन उत्पादकता की दृष्टि से परजीवी समाज होता है. वह स्वयं किसी उत्पादन प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेता. लेकिन पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में वह स्वामीवर्ग का पक्ष लेकर उसके शोषण को शास्त्रीय आधार पर मान्य ठहराता है. अपनी उच्च हैसियत को बचाए रखने के लिए वह राजनीतिक अभिजन का भी साथ देता है और उसकी मनमानियों को धर्मसंगत ठहराकर जनाक्रोश की धारा को मोड़ने में सहायक बनता है. इस प्रकार शीर्ष स्तर पर धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक अभिजन की तिकड़ी एकदूसरे को सहयोग देती, परस्पर मनमानियों का समर्थन करते हुई सत्ता में बनी रहती है. यदि कभी परिवर्तन की लहर उठती भी है तो अनुभव और आत्मविश्वास की कमी के कारण जनसाधारण में से बदलाव के लिए लोग आगे नहीं आ पाते और सत्ता अभिजन समाज के ही किसी सदस्य के हाथों में खिसक जाती है. इससे व्यवस्था में वास्तविक परिवर्तन नहीं हो पाता.

क्रमशः….

© ओमप्रकाश कश्यप

अनुक्रमणिका :

1. “Religion is excellent stuff for keeping common people quiet. Religion is what keeps the poor from murdering the rich.” ―Napoleon Bonaparte

2. belief is the death of intelligence….when dogma enters the brain, all intellectual activity ceases.- Robert Anton Wilson, Cosmic Trigger.

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