धर्म और अभिजन संस्कृति—दो

अभिजन संस्कृति के विकास में धर्म का योगदान

 

आधुनिक समाज की दृष्टि से देखा जाए तो उसमें पुरोहित, नौकरशाह, व्यापारी, राजनेता, सैन्याधिकारी, उच्च पेशेवर जैसे अभिजन समाज के कई उपवर्ग मिलेंगे. किंतु प्राचीन समाजों में जब संस्थाओं का इतना विस्तार नहीं हुआ था और सामाजिकव्यापारिक संबंध अपेक्षाकृत सरल होते थे, इनकी संख्या धार्मिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अभिजन तक सीमित थी. इनमें से पहले किसका जन्म हुआ, यह सहीसही बता पाना संभव नहीं है. इतना तय है कि सामाजिक विकास के आरंभिक दौर में ये सब एक ही वर्ग से संबंधित थे. यह भी कह सकते हैं कि सरल समाजों में अकेला व्यक्ति धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल लेता था. चूंकि संस्कृति सामूहिकता के बीच जन्म लेती है, अतएव सरल समाजों में अभिजन संस्कृति के विकास की कल्पना नहीं की सकती. फिर भी कुछ ऐसे विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति अवश्य रहे होंगे, जिन्हें एकल सत्ताकेंद्र का आशीर्वाद प्राप्त हो या जो उसके सन्निकट रहकर सुविधालाभ पाते हों. कालांतर में, निरंतर जटिल होते समाजार्थिक संबंधों के बीच, अकेले व्यक्ति द्वारा विभिन्न प्रकार की जिम्मेदारियों को संभाल पाना कठिन हो चला था. शांतिव्यवस्था के लिए चुनौती पेश करने वाले संकट आंतरिक और बाह्यः सभी प्रकार के थे. बस्तियों में एक साथ रह रहे लोगों के बीच मनमुटाव और छोटेछोटे झगड़ों का होना सामान्य बात थी. अतः जनजीवन को सामान्य बनाने, शांतिव्यवस्था कायम करने, संकट के समय समूह की रक्षा करने तथा विभिन्न गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई के समय परस्पर विरोधी पक्षों के बीच तालमेल बनाए रखने हेतु ऐसे लोगों की आवश्यकता थी, जो नेतृत्वकुशल होने के साथसाथ दूरद्रष्टा, ईमानदार, कर्मठ, साहसी, व्यवहारकुशल तथा बुद्धिमान भी हों.

सर्वसम्मति से यह जिम्मेदारी ‘विश’ अथवा ग्रामणी को सौंपी जाने लगी. वह गांव का मुखिया होता था. आरंभ में उसका दायित्व अतिरिक्त अनाज का प्रबंधन करना तथा आवश्यकता के समय उसका समूह के सदस्यों में वितरण करना था. वह आवश्यकतानुसार बस्ती के छोटेमोटे झगड़ों को सुलझाकर विरोधी गुटों में संधिसुलह भी कराता था. उसके अलावा गांव में एक पद पुरोहित का था. उसका प्रमुख कार्य लोगों के धार्मिक मसलों में लोगों को नेतृत्व करना था. पदानुक्रम में उसे बाकी सभी पर वरिष्ठता प्राप्त थी. महत्त्वपूर्ण अवसरों पर उसका कथन निर्णायक माना जाता था. वहीं व्यवस्था का सर्वेसर्वा होता है. भारत की प्राचीनतम सभ्यता के अवशेष सिंधु घाटी से प्राप्त होते हैं. उनके विश्लेषण से पता चलता है कि उस समय तक नागर व्यवस्था पनप चुकी थी. कृषि के साथसाथ शिल्पकर्म का विकास हो चुका था. अंतर्महाद्वीपीय व्यापार में तेजी आई थी. सिंधु घाटी के उत्खनन से प्राप्त संकेतों में यद्यपि वहां की शासन व्यवस्था के बारे में सटीक अनुमान लगा पाना संभव नहीं है. लेकिन तत्कालीन मिस्र सहित पश्चिम के कई नगरराज्यों का प्रबंधन धार्मिक नेताओं तथा पुरोहितों के अधीन था. इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि उस समय धर्म प्रमुख ही नगरराज्य का वास्तविक कर्ताधर्ता होता था. उपजाऊ जमीन, समृद्ध वनसंपदा के कारण सिंधु सभ्यता के नगर अपने समकालीन नगरराज्यों की अपेक्षा अधिक सुरक्षित और शांत थे. लेकिन व्यवस्थित शासनप्रणाली का न उभर पाना उस सभ्यता की कमजोरी थी. संभवतः वही दुनिया की उस प्राचीनतम सभ्यताओं में एक के पतन का प्रमुख कारण बना था.

सिंधु घाटी के लोगों का आर्थिक जीवन मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर था. सिंधु सभ्यता के किसान गैहूं, जौ, राई, सरसों आदि की खेती करते थे. अन्नभंडारण के लिए बड़े गोदामों का उपयोग किया जाता था. यहां तक कि अनाज को पीसने के लिए भी सामूहिक प्रबंध थे. खेती के लिए औजारों का प्रचलन था. सिंधुवासियों ने सुदूर मिस्र, रोम, अरब तक व्यापार के अनुकूल जलमार्गों का अन्वेषण किया था. उनपर व्यापारिक दलों का आवागमन लगा ही रहता था. आरंभिक व्यापार असंगठित था. प्रारंभ में प्रायः कारीगर ही समूहबद्ध होकर व्यापार करते थे. उनके अलावा संभवतः एक श्रेष्ठि वर्ग भी पनप चुका था जो खुद तो निर्माण कार्य में दक्ष न था, परंतु उत्पाद को बेचने का हुनर उनके पास था. इस वर्ग ने कारीगरों से माल खरीदकर उसका दूरदराज के क्षेत्रों तक व्यापार करना आरंभ कर दिया. आर्थिक विकास की यह स्वाभाविक परिणति थी. असल में महीनों तक चलने वाली लंबी यात्राओं में व्यस्त रहने के कारण उत्पादक कर्म को स्वयं संभालना संभव भी नहीं था. इसलिए शिल्पकार वर्ग के लिए भी यही उपयुक्त था कि वह केवल उत्पादन पर ध्यान दे. दूरस्थ व्यापारकेंद्रों को बड़े व्यापारियों के लिए छोड़कर स्वयं केवल स्थानीय बाजारों में अपनी पैठ बनाए रखें. हालांकि कुछ ऐसे भी शिल्पकार संगठन अवश्य रहे होंगे जो उत्पादन और वितरण दोनों की जिम्मेदारी स्वयं संभालते थे.

इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता तक समाज में अभिजन मानसिकता जन्म ले चुकी थी. धर्म और अर्थ का नियंत्रण करने वाले शासक वर्ग का उदय हो चुका था. एक वर्ग था जो स्वयं को दूसरों से ऊपर मानता था. मोहनजोदड़ों और हड़प्पा के उत्खनन अवशेषों से सामान्य जन और अभिजन वर्ग के लिए बने अलगअलग आवासों का पता चलता है. सामान्य जनों के आवास जहां छोटे हैं, वहीं अभिजन वर्ग के आवास खासे बड़े हैं. छोटे घरों का आकार प्रायः 26 गुणा 30 फुट का है, वहीं विशिष्ट जनों के आवास उससे काफी बड़े, लगभग 242 फुट गुणा 112 फुट के थे. इसी प्रकार का भेद स्नानागार में मिला है. पुरोहित वर्ग के स्नानागार साधारण लोगों के स्नानागारों की अपेक्षा काफी बड़े हैं. इनसे जहां इन सभ्यताओं के वैभवशाली अतीत तथा सत्ता के आधार पर अभिजन और सामान्यजन में विभाजन का बोध होता है. एक निहितार्थ यह भी है कि सभ्यता और अभिजन वर्ग का उदय परस्पर, पूरक और अन्योन्याश्रित घटनाएं हैं. सांस्कृतिकसांस्कृतिक विकास की अनिवार्यता के रूप में दायित्वों के निर्वाह के लिए केंद्रीय सत्ताकेंद्रों की अभिकल्पना की गई. कालांतर में उन सत्ताकेंद्रों पर नियुक्त व्यक्तियों के भीतर विशिष्टताबोध पनपने लगा, जिसने अभिजन मानसिकता को जन्म दिया. आगे चलकर जब समाज का आर्थिक, सामाजिक विभाजन हुआ तो जनमानस ने भी उन सत्ताकेंद्रों को अपनी नियति की भांति स्वीकार कर लिया. इस बात की परिकल्पना की जा सकती है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता के विकास तक समाज में आर्थिक, राजनीतिक वर्ग की अलगअलग श्रेणियां बन चुकी थीं. उनमें पुरोहित शीर्षस्थ स्थान पर था.

 

ईसा से करीब 2000 वर्ष पहले सिंधु घाटी की सभ्यता का पतन हुआ. अगले एक हजार वर्षों के दौरान गंगायमुना के दोआब में जो नई सभ्यता विकसित हुई, वह अपेक्षाकृत सुस्थिर थी. उस समय तक बड़े राज्यों की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी थी. राज्यों के प्रबंधन के लिए स्वतंत्र राजनीतिक समूह जन्म ले चुका था. लोग यह भी मानने लगे थे कि राज्य की सुरक्षा का मसला धार्मिक आग्रहों से इतर है. इससे समाज को कुल मिलाकर लाभ ही हुआ था. हालांकि लोकजीवन अब भी धर्म के निर्णायक प्रभाव में था. इस कारण धार्मिक अभिजन का प्रतीक पुरोहितवर्ग समाज में अभी तक महत्त्वपूर्ण भूमिका मेें बना हुआ था. उसी के नेतृत्व में महत्त्वाकांक्षी सम्राट चक्रवर्तित्व का सपना पालने लगे थे. यह अवसर आर्थिक गतिविधियों के लिए भी अनुकूल सिद्ध हुआ. बड़े राज्यों के गठन से व्यापारिक गतिविधियों के विस्तार को अवसर मिला. यातायात के साधनों में वृद्धि ने अंतर्महाद्वीपीय व्यापार को नई ऊंचाइयां दीं. इससे कुछ ठिकाने, विशेषकर तटवर्ती स्थल महत्त्वपूर्ण व्यापारिककेंद्रों के रूप में पनपने लगे. जिसका सुखद परिणाम तत्कालीन राज्यों की तीव्र आर्थिक समृद्धि के रूप में सामने आया था. बड़े राज्य के प्रबंधन के लिए राजा को अनेक कर्मचारियों, मंत्रियों और अधिकारियों की आवश्यकता थी, जो न केवल अलगअलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ, बल्कि व्यवहारकुशल एवं भरोसेमंद भी हों. फलस्वरूप शिक्षा के नए क्षेत्रों का विकास हुआ, जिसने पुनः व्यापार के नवीनतम क्षेत्रों को जन्म दिया. उससे पहले दुर्गम रास्तों पर लुटेरों का भय बना ही रहता था. राज्यों की सीमा और चौकसी बढ़ने से वे अपेक्षाकृत अधिक दूर तक बिना कोई अतिरिक्त कर चुकाए व्यापार कर सकते थे. सुरक्षा और व्यापारिक कारणों से बड़े राज्यों में सत्ता के छोटेछोटे उपकेंद्र उभरने लगे. इससे व्यापारिक हित भी सधे और राजनीतिक अभिजन का दायरा भी विस्तृत होता गया.

व्यापारिक गतिविधियों के विस्तार से दो भिन्न संस्कृतियों को परस्पर करीब आने का अवसर मिला. अलगअलग समूहों के देवता, धर्म, रीतिरिवाज और परंपराएं भिन्न होती थीं. इसके बावजूद उनके आर्थिक, सामाजिक हित उन्हें परस्पर जोड़े रखते थे. उससे पहले केवल धर्म था, वही दो समूहों के बीच एैक्य अथवा प्राथक्य का भाव पैदा करता था. बदले हुए हालात में दो भिन्न समूहों में सहयोग या स्पर्धा दर्शाने के लिए व्यापार और राजनीति महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में उभरे थे. अनुत्पादक पुरोहित कर्म में कोई अंदरूनी स्पर्धा नहीं थी. इसलिए पुरोहित वर्ग के आगे आंतरिक एवं बाह्यः चुनौतियां न्यूनतम थीं. लेकिन व्यापारी और राजनीतिक अभिजन को न केवल बाहरी बल्कि आंतरिक चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता था. यूं तो भारत में राजनीतिक और आर्थिक कार्य भी विशिष्ट जातिवर्ग के लिए निर्धारित थे. परंतु स्पर्धा में बने रहने के लिए एक व्यापारी को अपने ही सदस्यों के साथ स्पर्धा करनी पड़ सकती थी. पेशागत चुनौतियों के कारण उसका जीवन अपेक्षाकृत उथलपुथल भरा था. इसका उसको लाभ भी मिलता था. अपनी कार्यकुशलता में सुधार के जरिये वह न केवल अपने, बल्कि दूसरे समूहों को भी प्रभावित करने में सफल होता था. चूंकि अलगअलग समूहों के भिन्न देवता और कर्मकांड रहे होंगे. अतः कर्मकांडों के अंतर एवं बहुदेववादी धारणाओं के चलते एक समूह का पुरोहित दूसरे समूह में न तो उतना सम्मानेय था, न ही जरूरी. इससे धार्मिक अभिजन की सीमाएं साफ नजर आने लगी थीं. पुरोहितवर्ग का प्रभाव केवल अपने समूह तक सिमटने लगा. किंतु समूह के भीतर बीच उसका प्रभाव स्थायी तथा इतना गहरा था कि उसकी अनुशंसा के बगैर दूसरे का वहां दखल दे पाना नामुमकिन जैसा था. विशेष लोगों की जीवनचर्या तथा अन्य सामाजिक मसलों को लेकर. पुरोहित को इससे भी संतुष्टि थी. धर्म को संगठित ताकत के रूप में बदलने के लिए ऐसी ही सघन प्रभावोत्पादकता जरूरी थी. यह तभी संभव तब जनसाधारण को कर्मकांडों में इतनी बुरी तरह से उलझा दिया जाए कि वह चाहकर भी उनकी किलेबंदी को तोड़ न सके. इसके लिए पापपुण्य, स्वर्गनर्क, पुनर्जन्म आदि का मायाजाल खड़ा किया गया. ऐसे शास्त्रों की रचना की गई जो व्यक्ति के मुक्त सोच को अवरुद्ध कर उसे अनुसरण का पाठ पढ़ाते हों. जैसेजैसे समाज का विकास हुआ, धर्म के नाम पर मानवीय विवेक की किलेबंदी बढ़ती ही गई. पंद्रहवी शताब्दी में पश्चिम में वैज्ञानिक प्रस्फुटन हुआ तो पुरोहित वर्ग को अपने अस्तित्व के ऊपर खतरा नजर आने लगा. तब बड़ी चतुराई से उसने धर्म को विज्ञानसम्मत बताने का प्रोपगेंडा आरंभ कर दिया. चूंकि विज्ञान के आगमन के साथ समाज में आर्थिक विभाजन भी बढ़ा था. जो मुख्यतः उत्पादक आर्थिक अभिजन द्वारा मुनाफे के बड़े हिस्से पर अधिकार कर लेने से बढ़ा था. जिसे राजनीतिक समर्थन प्राप्त था. उस समय उत्पादक वर्ग का समर्थन करते हुए पुरोहित वर्ग ने जनसाधारण को तरहतरह से फुसलाना आरंभ कर दिया. धार्मिकराजनीतिकआर्थिक अभिजन की शीर्ष तिकड़ी के आगे जनसाधारण ने अपनी दुरवस्था को अपनी नियति मानने लगा.

 

धर्म की उत्पत्ति मूलतः आध्यात्मिक जिज्ञासा से प्रेरित थी. वह मानवीय विवेक एवं चिंतन सामथ्र्य से अनुप्रेत होती थी. मनुष्य की विचारणा उसके अनुभव और विवेक के अनुसार नित नए रूप धरती थी. इसलिए धर्म का ताकत के स्रोत में उस समय तक बदलना संभव न था, जब तक उसकी धारणाओं में स्थायित्व न हो. समूह पर दीर्घगामी पकड़ के लिए आवश्यक था कि लोग पुरोहित पर आंख मूंद कर विश्वास करें. उसके कहे को आप्त वचन का सम्मान दें. यहां तक कि उनकी निर्णय क्षमता भी पुरोहित के दिए गए दिशानिर्देशों से अनुशासित हो. इसके लिए कर्मकांडों की अंतहीन और जीवन बहुव्यापी शृंखला बनाई गई. उनका संहिताकरण किया गया. फिर संहिताओं को दैवीय बताकर उनमें संकलित तथ्यों को तरहतरह से जनता पर थोपा जाने लगा. पुराणों, स्मृतियों और महाकाव्यों के जरिये अवतारवाद का गुणगान किया गया. मौलिक ज्ञान की जगह पाखंड को दे दी गई. इससे धर्म के आस्थाकरण को बल मिला. आस्था के दायरे में कैद जनशक्ति राजनेता के काम थी. वह उससे जो चाहे वह काम ले सकता था, अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के लिए किसी भी युद्ध में झोंक सकता था. वह आर्थिक अभिजन के भी काम की थी. अपने उत्पादों की बिक्री के लिए उसको भी बाजार की आवश्यकता थी. इस प्रकार धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक अभिजन का स्वार्थी गठबंधन दिनोंदिन मजबूत होता गया. धार्मिक अभिजन ने आध्यात्मिक जिज्ञासा को आस्था में ढालने की भरपूर कोशिश की थी तो राजनीतिक और आर्थिक शक्तियों ने आस्था को अंधआस्था तथा श्रद्धा को अंधश्रद्धा में ढालने के साजिशाना काम में अपना पूरापूरा सहयोग दिया.

धर्म की अवधारणा के पीछे आरंभिक सोच शायद इतनी बुरी न थी. अकेले मनुष्य और जानवर में कोई अंतर न था. समाज उसको संस्कारित करता, संरक्षण देता था. इस कारण समाज मनुष्य की जरूरत थी, तो समाज की जरूरत थी, सबकी शांति और खुशहाली. पर सभी लोगों को समूहबद्ध रखना, शांतिव्यवस्था और भाईचारा कायम रखना. सभी को एकसाथ आगे बढ़ते देखना, विकास की निरंतरता को बनाए रखना—आसान बात न थी. ऊपर से आदमी के अपने लोभ, लालच, झूठ और दुर्बलताओं पर काबू रखना, कुछ ऐसा करना जिससे व्यक्तिमात्र की अच्छाइयों का लाभ सबको मिले और बुराइयां उसके भीतर से कभी बाहर ही न आ सकें. बल्कि मनुष्य स्वयं ही उन बुराइयों से जूझता रहे. समाज में लोकोपकारी जीवनमूल्यों करुणा, त्याग, परोपकार, अपरिग्रह, अस्तेय, सत्य, सहयोग आदि का बोलबाला हो. लोगों में एकता और विश्वास की भावना हो. इसके लिए उस समय समाज का भला चाहने वाले मनीषियों को संभवतः एक ही रास्ता समझ में आया—मनुष्य की आदि जिज्ञासा और शाश्वत नैतिक मूल्यों को एकदूसरे से जोड़ देना. मनुष्य की आदि जिज्ञासा थी, अपने जीवनरहस्य को समझना. सूरज, चांद, सितारे, पृथ्वी, अन्यान्य ग्रहनक्षत्रों तथा जीवजगत के सर्जनकर्ता के बारे में जानना. और तब उन मनीषियों ने ईश्वर की परिकल्पना की और जो नैतिकमूल्य उन्हें समाजसृष्टि के कुशल संचालन के लिए जरूरी लगते थे, उन्हें ईश्वरीय विधान बनाकर जीवन की कड़ी मान लिया. आदमी उन्हें माने, उनपर विश्वास करे, उन्हें अपने आचरण में ढाल ले, इसके लिए उन्होंने उन्हें उन नैतिक मूल्यों को परमात्मा द्वारा सृजित बताया. चूंकि समाज को स्थायित्व देने योग्य नैतिक मूल्य पूरी दुनिया में एक जैसे थे तथा व्यक्ति के आध्यात्मिक विश्वास उसकी भौगोलिक, व्यावहारिक परिस्थितियों की देन. इसलिए दुनिया में जितने भी धर्मों की परिकल्पना हुई उनके नैतिक मूल्य हर जगह एक समान थे. अंतर केवल आध्यात्मिक अनुभवों और विश्वास का था. उन उदारचेता मनीषियों ने शायद ही सोचा होगा कि जिस धर्म को मनुष्य की आदि जिज्ञासा के समाधान के नाम पर समाज में उतार रहे हैं, वह एक दिन उसकी जिज्ञासा को ही ग्रहण लगा देगा. स्वार्थी पुरोहित निजी स्वार्थ के लिए कर्मकांडों का इतना बड़ा जखीरा खड़ा कर देंगे कि धर्म के प्राणतत्व नैतिक मूल्यों के लिए उसमें जगह ही नही बचेगी. जिस धर्म के बारे में सोचा गया था कि वह मनुष्यता को परिभाषित करने में सक्षम होगा, एक दिन वही उसके गले की हड्डी बन जाएगा! स्वार्थी, प्रपंची, लोभी, लालची, विलासिता को धर्म और शोषण को पुरुषार्थ मानने वाले लोग, गरीबी का महिमामंडन करेंगे और परलोकसुख का वास्ता देकर जनसाधारण से जीवन के मामूली सुखसुविधाएं भी छीन लेंगे!

आम आदमी के लिए धर्म का प्रलोभन बड़े काम का सिद्ध हुआ. इसलिए कि जीवन में चारों दिशाओं से समस्याओं से घिरे, जीवन की दौड़ में पिछड़ गए व्यक्ति के लिए वह एक अंतिम सहारा था. जो दौड़ में बने रहने की अनुभूति देता था. धर्म की संरचना ही इस प्रकार की गई थी कि जिसमें आदमी अपने हुनर अपनी बुद्धिमत्ता का कोई योग न था. बल्कि कुछ न होने और सबकुछ छोड़ देने की प्रवृत्ति को वह ‘मुक्ति’ का नाम देकर महिमामंडित करता था. प्रकट में वह गरीब आदमी द्वारा अमीरियत के सपने को धिक्कारता था. धनवान आदमी का स्वर्ग के दरवाजे को पार करना उतना ही असंभव है, जितना हाथी द्वारा सुई की नोंक से पारगमन—ईसामसीह के इस कथन का दूसरे धर्मावलंबियों के बीच भी तरहतरह से बखान किया गया. मृत्योपरांत आनंद की प्राप्ति के लिए इहलौकिक कष्टों को मूक सहना तथा दुर्दशा के लिए भी तथाकथित ईश्वर का आभार मानना, यह बात स्वार्थी धर्मावलिंबियों द्वारा जनसाधारण के दिल में बिठा दी गई थी. किन परिस्थितियों में कही गई थी, इस तथ्य को एकदम भुला दिया गया. धर्म के नाम पर होते आए षड्यंत्र को समझने के लिए इसकी तह तक जाना आवश्यक है. यूनान की घृणित दास प्रथा के विरोध में हथियार उठाने वाला रणबांकुरा योद्धा था, वीर स्पार्टकस. उसने दासों को एकजुट कर रोम की सत्ता के विरुद्ध युद्ध छेड़ा था. स्पार्टकस की वीरता और कुशल रणनीति के कारण रोम की करारी मात हुई थी. दासों को विश्वास हो गया कि आगे दासता का कलंक उन्हें और न ढोना पड़ेगा. उनकी जो संतान जन्म लेंगी वे आजाद होंगी. अपनी मर्जी की मालिक. इसके लिए वे स्पार्टकस के साथ थे. उसको अपना मसीहा मान रहे थे. लेकिन साम्राज्यवादी चुप कहां बैठने वाले थे. दासों के विरोध में यूनान के समस्त साम्राज्यवादी राज्य एकजुट होकर स्पार्टकस की सेना पर टूट पड़े. वह बड़ी वीरता से लड़ा और शहीद हुआ. साम्राज्यवादी शासकों ने पराजित दास सेना के छह हजार योद्धाओं को सामूहिक सूलियों पर चढ़ा दिया गया. दासों के लिए यह बहुत बड़ा आघात था. यदि स्पार्टकस जैसा महानतम योद्धा उनकी मुक्ति के रास्ते नहीं खोल सका तो आगे भी असंभव है. निराशा हताशा में ढल गई. स्पार्टकस की मृत्यु के करीब 70 वर्ष बाद जब ईसामसीह का जन्म हुआ, दास पूरी तरह से हताशा में डूबे हुए थे. स्पार्टकस के शहीद होने के बाद अपने उद्धार की उम्मीद बिलकुल छोड़ चुके थे. ऐसे में ईसामसीह से उन्हें मुक्ति का सपना अलग तरीके से परमात्मा के नाम पर दिखाया तो अंधेरे में डूबे उन दाससमाज ने उसपर आसानी से भरोसा कर लिया. वे ईसामसीह के आसपास एकजुट होने लगे. इस जन्म में मुक्ति संभव नहीं तो अगले जन्म में ही सही. ईसा मसीह का कथन उन्हें दौड़ में बने रहने की उम्मीद जगाता था. रोम का राज्य न सही, ईश्वर का राज्य उनके लिए सुरक्षित है. इस भरोसे वे वर्तमान की पीड़ाओं, अभावों और नाकामियों को भुलाकर जीने लगे. साम्राज्यवादियों को यह बड़ा अच्छा लगा. दासों को हमेशाहमेशा के लिए दास बनाए रखने के लिए एक नया हथियार उनके हाथ आ लगा था, वह हथियार था—धर्म का. उसके बाद यह हथियार पूरी दुनिया में आजमाया जाने लगा. आज तक उसका उपयोग जारी है.

 

धर्म अभिजन वर्ग की सत्ता, संसाधनों पर एकाधिकार को शास्त्रीय मान्यता प्रदान करता है. इस अनुचित अधिकारिता को वह जनसामान्य तक इतनी बार और इतनी तरह से ले जाता है कि जनसाधारण अपनी दुरवस्था को ही अपनी नियति मान लेता है. यह अनुकूलन इतना प्रभावी हो जाता है कि जिन स्थितियों में साधारणजन प्रतिदिन रहता है, उनमें किसी अभिजन को यदि एक दिन भी गुजरना भी पड़े तो उसको दारुण दुख होता है. रामायण में राम का वनगमन एक राजपरिवार के सत्ता के सघर्ष का मसला है. ऐसे संषर्घ उस समय राजपरिवारों में होते रहते थे. इसके लिए राजपरिवारों का उजड़ना और बसना सामान्य बात थी. लेकिन कैकयी जब दशरथ से वरदान मांगकर राम को वनगमन के लिए विवश कर देती है तो इस प्रसंग को नाटक अथवा रामलीला के जरिये देखना, सुनना, राम और सीता का वल्कल वेश में वनगमन करते हुए देखना जनता को उदास बना देता है. अभिजन वर्ग का सत्ता लोलुप स्वार्थपूर्ण चेहरा सामने न आए, उनके अंदरूनी झगड़े, बड़ों का तथाकथित बड़प्पन बना रहे, इसके लिए रामायणकार अपने ही वर्ग की स्त्री मंथरा को दोषी ठहराता है. यह जानते हुए भी कि चतुर दासियां वही कहा करती थीं, जो उनकी स्वामिनी या स्वामी सुनना चाहते थे. परोक्षरूप में वे अपने स्वामी अथवा स्वामिनी की इच्छा की अभिव्यक्ति ही करते थे. तभी वे अपने आश्रयदाता के परमप्रिय और विश्वसनीय होने का उपहार पाते थे. इसलिए मंथरा ने कैकयी से यदि कुछ कहा भी तो एक प्रकार से कैकयी की इच्छा की अभिव्यक्ति ही की थी. फिर भी कैकयी की करनी का दोष जनसामान्य के सहजबोध को कुंठित करने के लिए मंथरा को दिया जाता गया. युधिष्ठिर के जुआ खेलने को बड़े लोगों का स्वाभाविक खेल मानकर शास्त्रकार उसको कोई दोष नहीं देता, यहां तक कि अपनी पत्नी को दांव पर लगाकर हार आने से भी युधिष्ठिर के ‘धर्मराज’ होने पर कोई फर्क नहीं पड़ता. जबकि दुर्योधन द्वारा पांच गांव न देने की जिद उसको खलनायक बना देती है, जिसका समापन उसकी मृत्यु के बाद ही हो पाता है.

निहित स्वार्थ के लिए अभिजन समाज धर्म को पोसता है. धार्मिक मान्यताओं को लेकर उसकी अपनी निष्ठा कितनी प्रामाणिक है, इस अनुच्छेद में इसी को लेकर चर्चा करेंगे. हमारी कोशिश यह देखने की होगी कि अभिजन वर्ग व्यवहार में जिस तरह धर्म को बढ़ावा देता है, जनभावनाओं के नाम पर जिस प्रकार उसका महिमामंडन करता है, उसके प्रति वह स्वयं कितना गंभीर होता है. उदाहरण के लिए एक कारखानेदार विशाल फैक्ट्री का निर्माण करता है. अरबोंखरबों रुपये खर्च करके मशीनें लगाता है. उसके बाद उत्पादन शुरू करता है. धर्म के प्रति अपनी आस्था को दर्शाते, हुए वह फैक्ट्री के प्रांगण में ही एक मंदिर बनवा देता है. उसकी देखभाल के लिए पुजारी भी नियुक्त कर देता है. जिसको कारखाने की ओर से पगार मिलती है. समयसमय पर दक्षिणादि भी. मंदिर की दीवारों पर सांसारिक मोहमाया, लौकिक सुख की निस्सारता, जीवन की क्षणभंगुरता और संतोष की सार्थकता जताने वाली बातें सूक्तियां लिखी होती हैं. मंदिर की देखभाल, आयोजनों आदि पर कारखाने की मद से खर्च होता है. आप कहेंगे कि इसमें बुरा क्या है? आदमी की आस्था का मामला है. कारखानेदार यदि अपनी आस्था को जताना चाहता है, तो उसकी आलोचना क्यों? वैसे भी धर्मग्रंथों में लिखा है कि आदमी को अपनी आमदनी का दसवां या बारहवां हिस्सा धर्म की राह पर खर्च करना चाहिए. यही वह करता है. इस बहाने ईश्वर ने जो उसको सुखसमृद्धि प्रदान की है, उसका धन्यबाद ज्ञापन पर देता है. सवाल अन्यथा नहीं है. यह सुनने में भी न्यायसंगत लगता है. पर बात क्या बस इतनी ही है? कणकण में भगवान, आत्मा को परमात्मा का स्वरूप बताने वाले धर्म का कारखाने में ही मंदिर बनाकर प्रचार करने वाला मालिक जरूरत के समय मजदूर को सौपचास रुपये का एडवांस देने पर देने पर नाकमुंह सिकोड़ लेता है. श्रमकल्याण के नाम पर अपनी मुट्ठी बंद कर लेता है. बातबात पर मजदूर को धमकाता है और जरासे नुकसान पर आगबबूला हो उठता है. वही मालिक, मंदिर और चढ़ावे जैसे अनुत्पादक कार्यों पर अनापशनाप खर्च के लिए तैयार हो जाता है. धार्मिक कर्मकांडों में पानी की तरह पैसा बहाने वाला पूंजीपति स्कूल के लिए कुछ हजार रुपये का चंदा देते समय भी कंजूसी करता है. आखिर क्यों? इसलिए कि धर्म के नाम पर मामूली निवेश उसके मोटे लाभ के रास्ते खोल देता है. मान लीजिए एक कारखाने को सौ मजदूर मिलकर चलाते हैं. इसका सीधासा मतलब है कि उस कारखाने से होने वाला मुनाफा उन सौ मजदूरों के गाढ़े पसीने की कमाई है. नैतिकता की दृष्टि से उस मुनाफे में उन मजदूरों का बराबर का हिस्सा है. लेकिन बात जब मुनाफे के वितरण की आती है तो कारखानेदार अपने विशेषाधिकार के साथ सारी बागडोर अपने हाथों में ले लेता है. उसकी मनमानी के चलते श्रमिक के हाथ में बस इतना आ पाता है कि अगले दिन कारखाने में सही वक्त पर पहुंचकर उत्पादन को आगे बढ़ा सके. इस तरह श्रमिकसमाज कारखानेदार की समृद्धि के लिए दिनप्रतिदिन अपने जीवन को दांव पर लगाता है. धर्म और राजनीति इसमें उसके मददगार सिद्ध होते हैं.

धर्म के प्रति कारखाने मालिक की आस्था मापनी हो तो कुल फैक्ट्री और मंदिर के क्षेत्रफल के अनुपात को देख लीजिए. दसबीस हजार वर्ग मीटर की फैक्ट्री में मंदिर के नाम आठदस मीटर का कोना छिका होगा. वह भी वहां जहां गाड़ियां खड़ी की जाती हैं. मालिक विशिष्ट अवसर के सिवाय शायद ही कभी उस ओर झांकता है. उसकी अपनी आस्था घर पर बने मंदिर में पूजाअर्चन से संपन्न हो जाती है. फिर कारखाने में मंदिर किसके लिए हैं? मजदूरों और कामगारों के लिए? पर उनके लिए तो वे हर बस्ती, सड़क किनारे सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर खड़े कर दिए जाते हैं. फिर कारखाने में बनाए गए मंदिर की उपयोगिता? अब आप इसका अभिप्राय समझने लगे होंगे. धर्म और अभिजन वर्ग के स्वार्थ संबंधों को समझने के लिए एक और उदाहरण लेते हैं. आप की किसी गांव, कस्बे, शहर से गुजरिये, रास्ते के किनारे, चैराहों पर बड़ेबड़े होर्डिंग्स और बैनर दिखाई पड़ेंगे, कोई राजयोग लिखता मिलेगा, कोई हठयोग. कोई सहजयोगी होगा तो कोई निखालिस योगी. कोई रामामृत बांटता नजर आएगा तो कोई कृष्णामृत का पान कराता हुआ. देवियों और साध्वियों की संख्या भी कम नहीं है. जीवन में और कहीं हो न हो, मगर धर्म के नाम पर, स्वयं घोषित भगवानों के बीच किसी नई ‘देवी’ का उभर आना एकदम स्वाभाविक है. लैंगिक भेद के बावजूद उनकी दुकानदारी भी जमी रहती है. पिछले दशक में दो देवता नए चर्चित हुए हैं. शनि महाराज और साईंनाथ. खाली पड़ी जमीन पर इनके मंदिर रातोंरात खड़े कर दिए जाते हैं. अगले दिन से ही भक्तों का तांता भी बंध जाता है. इन मंदिरों का खर्च तो उनके कुछ भक्तों के चढ़ावे से सध जाता है. कि पुजारी के लखपति से करोड़पति होते देर नहीं लगती. चढ़ावे की रकम को बांटने के लिए झगड़े होते रहते हैं. साफ है कि धर्म के नाम पर होने वाला खर्च केवल उसकी आस्था से प्रभावित नहीं होता. बल्कि उसकी मंशा दूसरों को इस खेल में लगाए रखने की होती है. उत्पादन को प्रभावित किए बिना न्यूनतम खर्च में कारखाने को चालू रखने की यह भी एक युक्ति है. एक ऐसा गणित जिसमें पुरोहितवर्ग को दी गई मामूली दक्षिणा से न्यूनतम मजदूरी में भरपूर काम को तैयार मजदूरों की फौज तैयार होती है. एक ऐसा टूल जो मेहनतकश वर्ग के लिए सपने और अपने मालिक के लिए समृद्धि उगलता है. संक्षेप में धर्म ऐसा विधान है जो आदमी अगले जन्म के भरपेट भोजन की आस में व्यक्ति इस जन्म की भूखप्यास से समझौता किए रहता है.

क्रमश:….

© ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

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Filed under दर्शन, धर्म और अभिजन संस्कृति

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