धर्म और अभिजन संस्कृति

अकेले व्यक्ति के हाथ में असीमित सत्ता होना सबसे बड़ी बुराई है. हममें से कोई भी इतना सक्षम नहीं है जो असीमित ताकत को संभाल सके.फ्रैड्रिक आगस्ट वान हयेक.

धर्म के बारे में तो सभी जानते हैं. इसलिए शुरुआत अभिजन संस्कृति से की जाए. अभिजन संख्या में अल्पसंख्यक मगर आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक अथवा धार्मिक क्षेत्र के अतिप्रभुत्वशाली लोग होते हैं. अपने विचार और कर्म से वे पूरे समाज को तरहतरह से प्रभावित करते हैं. अभिजन के अंग्रेजी पर्याय ‘एलीट’ को परिभाषित करते हुए इटली के विचारक विल्फ्रेड परेतो(18481923) ने लिखा है कि ‘एलीट’ वे लोग हैं जो किसी भी क्षेत्र में उच्चतर सफलता प्राप्त कर शिखर पर आसीन हैं. इनमें उच्चासीन नौकरशाह, व्यापारी, राजनेता, पेशेवर, बुद्धिजीवी, कलाकार आदि सम्मिलित हो सकते हैं. परेतो के अनुसार अभिजन संख्या में अल्पसंख्यक होकर भी अधिकार और सत्ता के मामले में शेष समाज से बहुत आगे होते हैं. अपने पद और अधिकार का उपयोग करते हुए वे चतुराईपूर्वक, संसाधनों के बड़े हिस्से पर अपना अधिकार जमा लेते हैं. इटली के समाज के बारे में अपने विशद् अध्ययन के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि वहां के कुल 80 प्रतिशत संसाधन मात्र 20 प्रतिशत लोगों के स्वामित्व में हैं. शेष 80 प्रतिशत को अपने जीवन में मात्र 20 प्रतिशत से गुजारा करना पड़ता है. अपने निष्कर्ष को पहेलीनुमा अंदाज में पेश करते हुए उसने कहा थाᅳ‘मान लीजिए दोनों में प्रतियोगिता होती है. तब 20 प्रतिशत अभिजन आबादी को शिखर पर पहुंचने, उपलब्धियों के शतप्रतिशत स्तर को प्राप्त करने के लिए मात्र 20 प्रतिशत की जरूरत पड़ेगी. जबकि शेष 80 प्रतिशत सामान्यजन को उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए न केवल चार गुना ज्यादा चुनौतियों से जूझना पड़ेगा, बल्कि उस 20 प्रतिशत अभिजन से भी टकराना पड़ेगा, जो शीर्ष पर पहले से विराजमान होकर, शक्ति एवं संसाधनों पर अधिकार जमाए हुए है.’ यह न केवल कठिन बल्कि असंभवसा कार्य है. इसलिए कि राष्ट्र के कुल संसाधनों के अस्सी प्रतिशत पर अधिकारिता एवं सत्ताकेंद्रों से निकटता के बल पर अभिजन समाज अपनी ताकत और हैसियत को निरंतर ऊपर उठाता रहता है. अपने सीमित संसाधनों से सामान्य यदि आगे जाने की कोशिश करता है तो उतनी अवधि में उससे कई गुना रफ्तार से तरक्की करता हुआ अभिजन, और भी आगे निकल चुका होता है. परिणामस्वरूप जन और अभिजन के बीच की दूरी निरंतर बढ़ती जाती है. सामान्य जन के लिए अभिजन की स्थिति तक पहुंचना न केवल अतिकठिन, बल्कि असंभवसा कार्य होता है. इसलिए कि अपने कई गुना संसाधनों तथा हैसियत के बल पर अभिजन समाज अपनी ताकत को निरंतर बढ़ाता रहता है.

अभिजन और सर्वजन के बीच संसाधनों के वितरण में 80 : 20 का अनुपात आज भले अजूबा न लगे, मगर 1906 में जब परेतो ने यह निष्कर्ष दुनिया को सुनाया तो सब चौंके थे. खुद परेतो को भी कहां विश्वास था! इस सिद्धांत की जांच करने के लिए उसने इटली के बाहर के समाजों का अध्ययन तत्काल शुरू कर दिया था. उसके साथ दूसरे विद्वान भी इस जांच में आ जुटे थे. आगे आने वाले निष्कर्ष चौंकाने वाले थे. अध्ययन के बाद पाया गया कि खुद को विकसित मानने वाले सभी देश इस समस्या से ग्रस्त हैं. कई समाजों का असमानता अनुपात तो 80 : 20 से भी अधिक पाया गया. नतीजों से हैरान रोमानियाई प्रबंधन गुरु डा॓. जोसेफ जुरान(19042008) के मुंह से निकला थाᅳ‘तंदरुस्त मुट्ठीभर, दुबले हजार’.1 पेशे से क्वालिटी प्रबंधक जुरान ने सिद्ध किया था कि ‘बीस प्रतिशत कारण अस्सी प्रतिशत समस्याओं के जनक हैं.’ व्यवहार में हम देखते हैं कि एक रोग अनेक समस्याएं लेकर आता है. विभिन्न प्रकार के परीक्षणों के उपरांत जुरान ने पाया कि हमारी रोजमर्रा की अनेकानेक समस्याओं के मूल में भी कुछ गिनेचुने कारण होते हैं. इस निष्कर्ष को समाज पर लागू करते हुए उसने कहा कि बीस प्रतिशत अभिजन समाज में अलगअलग क्षेत्रों पर छाए, बेहद ताकतवर और गरिमामय लोग होते हैं. अपने स्वार्थ के लिए वे शेष अस्सी प्रतिशत के जीवन से मनमाना खिलवाड़ करते हैं. परेतो ने कहा था कि अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग अतिसंगठित समुदाय होता है. निहित स्वार्थ उसको एकदूसरे से जोड़े रखते हैं. यदि अस्तित्व पर आन पड़े तो उनकी एकता अभूतपूर्व होती है. उनका एकमात्र काम होता है, किसी भी तरह से अपने वर्चस्व को कायम रखना. ‘मैं वह हूं जो दूसरे लोग नहीं हैं.’यह एहसास अभिजन संस्कृति के विशिष्टताबोध का परिचायक और मूल मंत्र है. शीर्ष पर बने रहने के लिए यह वर्ग सामदामदंडभेद की नीति अपनाता है. संगठित अल्पसंख्यक की शासकीय मनोवृत्ति के आगे बहुसंख्यक वर्ग के अकेले व्यक्ति(सदस्य) की शक्ति नगण्य होती है. इससे अल्पसंख्यक अभिजन समुदाय लगभग अपराजेय बना रहता है. तदनुसार असंगठित, आर्थिक रूप से परावलंबी बहुसंख्यक समाज पर उसका अधिपत्य अपरिहार्य हो जाता है.

अब बात अभिजन संस्कृति की, जिसे ‘अभिजात’ अथवा ‘उच्च’ संस्कृति भी कहा जा सकता है, यह समाज के सफलतम व्यक्तियों, संस्थाओं तथा शीर्षस्थ वर्ग की जीवनशैलियों का वह समुच्चय है, जिसे अत्याधुनिक सामाजिक जीवन का पर्याय और कारण माना जा सकता है. यह मुख्यतः अभिजात्य वर्ग के सदस्यों यथा सफलतम उद्यमियों, व्यापरियों, उच्च पेशेवरों, उच्चपदासीन नौकरशाहों के वर्चस्ववादी सोच, व्यवहार, कला संस्कारों तथा विशिष्ट रुचियों के रूप में सामने आती है. समाज के शीर्षस्थ लोगों की महत्त्वाकांक्षाओं से भरपूर अभिजन संस्कृति सदैव आधुनिकता का पर्याय बनी रहती है. इसके सदस्य बड़प्पन और विशिष्टताबोध से भरे होते हैं. ‘हम जहां है वहां अन्य कोई नहीं है और यह हमारा अधिकार है.’की भावना के साथ वे स्वयं को जनसाधारण से ऊपर मानते हैं. वे प्रायः साधारण जन से अधिक प्रतिभाशाली, मुखर, प्रदर्शनप्रिय और सुविधाभोगी होते हैं. इस कारण अभिजन संस्कृति हर युग में समाज के बहुसंख्यक वर्ग के लिए अनुकरणीय तथा उसकी लालसाओं का केंद्र बनी रहती है. सामाजिक, आर्थिक सीमाओं से पूरी तरह आबद्ध सामान्यजन का जीवनसंघर्ष उसकी रोजमर्रा की जरूरतों से बाहर नहीं निकल पाता. पूंजीवादी व्यवस्था में उसे अपने लिए उन संसाधनों और प्राप्तियों से संतोष करना पड़ता है, जो ‘रिसाव के सिद्धांत’(ट्रिकल डाउन थ्योरी) के अनुसार कई स्तरों से गुजरने और कटौतियों के बाद उस तक पहुंचती हैं और जब तक पहुंचती हैं, तब तक अभिजन वर्ग किसी न किसी बहाने उन्हें पुनः हड़पने का इंतजाम कर चुका होता है. इसलिए अभिजन समाज में पूंजी का नीचे से ऊपर की ओर सतत पलायन होता रहता है. यह भी कह सकते हैं कि अपने विकास, यहां तक कि सामान्य जरूरतों के लिए भी जनसामान्य को अभिजन वर्ग की अनुकंपा पर निर्भर रहना पड़ता है. कहने की आवश्यकता नहीं कि अभिजन आम आदमी की इस विवशता का जमकर दोहन करता है. इस तरह एक आदमी की दैनिक आवश्यकताएं दूसरे के लिए मुनाफादेय व्यवसाय को आगे बढ़ाती हैं.

अभिजन संस्कृति का इतिहास मानव सभ्यता जितना ही पुराना है. पिछले जमाने में पुरोहितवर्ग, गणप्रमुख, सम्राट, जमींदार, नबाव, राजा, सामंत आदि अभिजन संस्कृति के वाहक थे. अभिजन संस्कृति के समानांतर संस्कृति को लोकसंस्कृति अथवा जनसंस्कृति कहा जा सकता है. वह समाज के बहुसंख्यक वर्ग के सोच तथा उसकी जीवनचर्या को तय करती है. अभिजन संस्कृति चूंकि परोक्ष में शासक संस्कृति होती है. अतः इसमें धर्म, राजनीति, अर्थव्यवस्था, कला, लोकसंस्कार, व्यापार, शासनप्रशासन आदि क्षेत्रों में निर्णायक पदों पर मौजूद व्यक्तियों को रखा जा सकता है. इसलिए इसे विशेषज्ञ संस्कृति भी कहा जा सकता है. इसके सदस्य अधिकारभावना से लैस होते हैं. दूसरी ओर लोकसंस्कृति प्रायः धर्म, परंपरा, सामाजिक रीतिरिवाज, लोकसाहित्य, पारंपरिक उत्पादन पद्धतियों से प्रभावित रहती है. चूंकि इनकी परिवर्तनदर ज्ञानविज्ञान तथा प्रौद्योगिकी की अधुनातन धाराओं की अपेक्षा कम होती है, इसलिए लोकसंस्कृति की गतिशीलता यानी परिवर्तन की दर अपेक्षाकृत मद्धिम होती है. इस कारण अभिजन और जनसंस्कृतियों का फासला निरंतर बढ़ता जाता है. उसी अनुपात में समाज में जन और अभिजन के बीच स्तरीकरण बढ़ता है. परिणामस्वरूप जनसाधारण में अभिजन संस्कृति के प्रति ललक भी लगातार बढ़ती जाती है. इसका लाभ अभिजन संस्कृति के वाहक घटकों यथा राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक अभिजनों को मिलता है. राजनीतिक अभिजन दोनों के बीच की दूरी को पाटने के बहाने चतुराईपूर्वक अपनी लोकप्रिय राजनीति को चमकाते हैं. जबकि धार्मिक अभिजन यानी पुरोहित वर्ग इस दूरी के लिए भाग्य और पूर्वजन्म के कर्मों को जिम्मेदार ठहराता है. उनके निदान के नाम पर वह तरहतरह के कर्मकांडों को बीच में ले आता है. जिससे उसकी दुकानदारी चमकती रहती है. आध्यात्मिक जिज्ञासा जो धार्मिक विश्वासों का मूल है, इस क्रम में निरंतर पीछे खिसकती जाती है. आर्थिक अभिजन उस अंतराल को पाटने के लिए सस्ते और नकली उत्पादों की खेप बाजार में उतारकर आभासी पटाव का भ्रम पैदा करता है; और इसके सहारे मुनाफा बटोरता है. इस आभासी पटाव की हकीकत को जन और अभिजन दोनों ही समझते हैं. इसलिए हकीकत का बोध जन के भीतर अविश्वास, सामाजिक नियमों, विधान के प्रति अनास्था पैदा करता है. तो अभिजन अपनी सफलता के दम पर मनमानी करने पर उतारू हो जाता है. यह द्वंद्व सामाजिक अशांति के रूप में सामने आता है.

सामाजिक दुरवस्था के वास्तविक कारणों का बोध जनसाधारण को ज्यादा उद्धिग्न न करे, उसका आक्रोश तय सीमा में बना रहे, इसके लिए प्रशासनिक अभिजन और उसके कृपापात्र बुद्धिजीवी जनसाधारण के बीच बढ़ती हताशा, नैराश्य, गरीबी, दुर्दशा, दैन्यादि के लिए उसके विभिन्न घटकों को दोषी ठहराते हैं. बढ़ती जनसंख्या, प्रवासी समस्या, खास जातीय घटकों का मनमाना आचरण, अशिक्षा, कुरीतियां, भ्रष्टाचार, गरीबी आदि को उनकी दुर्दशा का कारण बताकर अभिजन संस्कृति के पुरोधा जनसाधारण के बीच अनेक दरारें पैदा कर देता है. हालांकि इसके मूल में अभिजन वर्ग का वर्चस्वकारी आचरण होता है, जिससे वह संसाधनों के अधिकांश हिस्से पर कब्जा कर, बाकी लोगों की दुर्दशा का कारण बनता है. इसके बावजूद उसके विरोध की स्थिति नहीं बन पाती तो इसलिए कि उसी के समान वर्गीय शोषण से गुजर रहे उसके साथी, स्वार्थवश छोटेछोटे हिस्सों में बंटे होते हैं. अपनी सामान्य जरूरतों की पूर्ति के लिए उन्हें अपने ही जैसे लोगों के साथ स्पर्धा करनी पड़ती है. जिसका नुकसान पूरे वर्ग को उठाना पड़ता है. छोटेछोटे अनुत्पादक मुद्दों को लेकर जनसमाज के बीच अनेक टापू बन जाते हैं, जो उन्हें कभी निर्णायक भूमिका में नहीं आने देते. जनसाधारण की इसी कमजोरी और मतवैभिन्न्य का लाभ उठाकर वह संपत्ति पर अपने कब्जे को कानूनी रूप देने में सफल हो जाता है. उसपर कोई जोर न चलता देख साधारण जन अपने ही साथियों को दोष देने लगता है. इससे जनाक्रोश की धारा आत्मघाती रूप ले लेती है. अवसर देख अभिजन वर्ग पुनः सक्रिय होता है तथा समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए नई संस्थाओं का गठन कर, वहां अपने समर्थक साथियों को तैनात कर देता है. इससे अभिजन वर्ग की संख्या में यकिंचित वृद्धि होती है, किंतु उसकी सत्ता अधिक सुरक्षित और मान्य हो जाती है. इस स्थिति का लाभ उठाकर अभिजन वर्ग अपनी ताकत और समृद्धि को लगातार बढ़ाता रहता है.

अभिजन संस्कृति के सदस्य सामान्यतः शासकीय मनोवृत्ति का व्यवहार करते हैं. चूंकि जनसंस्कृति का वाहक जनसमाज धर्म, परंपरा, लोकसंस्कृति, पारंपरिक उत्पादन पद्धति आदि में निपुणता को ही अपनी मनोरथ सिद्धि माने रहता है, इसलिए वह ज्ञानविज्ञान और प्रौद्योगिकी के बूते सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहे अभिजन समाज का कभी मुकाबला नहीं कर पाता. उल्टे अभिजन समाज जनसमाज के हिस्से के संसाधनों का उपयोग भी निहित स्वार्थ के लिए करने लगता है. साधारण जन समाज, संस्कृति, निर्धनता, परंपरा और धार्मिक आग्रहों के जाल में इतना फंसा होता है कि इस तरह की स्पर्धा का विचार तक उसके दिमाग में नहीं आता. इसका एक कारण उसके व्यक्तित्व में शासकीय अभिलक्षणों का अभाव है, जिसका लाभ अभिजन वर्ग के असंतुष्ट घटक उठाते रहते हैं. उनके उकसावे में या अपनी ही आंतरिक उथलपुथल से यदि जनसमुदाय में विद्रोह की लहरें उठें भी तो वह आमूल परिवर्तनकारी होने में अक्षम सिद्ध होती हैं. वह प्रायः नहीं समझ पाता कि सत्ता का कौनसा रूप उसके लिए सर्वाधिक कल्याणकारी है. इसलिए निर्णायक अवसरों पर भी वह दूसरों पर निर्भर होने की अपनी मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाता. प्रशासकीय अनुभव के अभाव एवं आत्मविश्वास की कमी के कारण सत्ताकेंद्रों के सफल परिचालन के लिए जनसमाज को स्वार्थी अभिजन वर्ग का सहारा लेना ही पड़ता है. इससे उसकी प्रवृत्ति आगे भी पिछलग्गू समाज की बनी रहती है. उल्लेखनीय है कि जिन संस्थाओं को सभ्यता, सहूलियत और प्रशासनिक नियंत्रण के नाम पर जनसमाज पर आरोपित किया जाता है, उनमें से अधिकांश अभिजनवर्ग द्वारा, उसी के स्वार्थ के लिए गठित की होती हैं. वे प्रायः खर्चीली तथा जनसाधारण की दृष्टि से बेहद जटिल होती हैं और उनमें से अनेक ऐसी होती हैं जिनके बगैर भी काम चल सकता है अथवा उनके सस्ते और सरल विकल्प समाज में पहले से ही मौजूद होते हैं. लेकिन प्रशासनिक कौशल का अभाव जनसमाज को आमूल परिवर्तनकारी कदम उठाने से रोकता रहता है. प्रकारांतर में अभिजन वर्ग के अंदरूनी तनाव, उसकी क्षणिक द्वंद्वात्मकता तथा अंतःसंघर्ष भी अंततः उसी के लिए हितकारी सिद्ध होते हैं.

क्या यह विकल्पहीन है? शायद नहीं! न ही यह ऐसी समस्या है, जिससे हमारा समाज अज्ञात रहा हो. पिछले दोढाई सौ वर्षों से तो इसपर निरंतर विचार होता रहा है. गौतम बुद्ध, प्लेटो, वोलनी, वाल्तेयर, रूसो, पीयरे जोसेफ प्रूधों, पीटर क्रोप्टकिन, थाॅमस पेन, मिल आदि दुनिया के महानतम दार्शनिकों का चिंतन हमारे सामने है. माक्र्स और दूसरे बुद्धिजीवी इसके लिए वर्गहीन समाज की स्थापना का सुझाव देते रहे हैं. साम्यवाद की तो पूरी संकल्पना ही वर्गहीन समाज की स्थापना पर टिकी है. इसकी पूरक विचारधाराओं के रूप में हम ‘समष्ठिवाद’, ‘अराजकतावाद’, ‘श्रमिकसंघवाद’, सहजीवितावाद को ले सकते हैं. ये सभी राजनीतिकआर्थिकसामाजिक सहभागिता एवं सहजीवन के विचार पर आधारित दर्शन हैं. ये सामान्य रूप से ऐसे जीवनदर्शन का समर्थन करते हैं जिसमें व्यक्तिगत गुणों, योग्यताओं को तो महत्ता दी जाती है, इस अपेक्षा के साथ कि व्यक्ति उनका प्रयोग इस प्रकार करेगा कि उसके अपने और समाज के व्यापक हितों की पूर्ति संभव हो. इसमें आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक अथवा किसी भी अन्य प्रकार के विशिष्टताबोध को उपेक्षित कर दिया जाता है. अराजकतावाद इनमें सबसे अहं सैद्धांतिकी है, जो व्यक्तिगत संपत्ति के निषेध और राज्य को बेदखल कर उन शक्तियों को निष्प्रभ करने की व्यवस्था करती है, जो सामाजिक स्तरीकरण के लिए जिम्मेदार हैं अथवा उसको बढ़ावा देने का काम करती हैं. इसका आधार यूनानी दार्शनिक की वह उक्ति है जिसमें उसने कहा हैᅳ‘हम न तो शासित होना चाहते हैं, न ही शासक बनने की हमारी इच्छा है.’2 शताब्दियों के बीच अराजकतावाद को लेकर बहुत कार्य हुआ है. माक्र्स की वर्गहीन समाज की संकल्पना भी शासक और शासक के स्तरीकरण को समाप्त करती है. अंतोनियो ग्राम्शी का तो पूरा दर्शन ही सामाजिक, सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को लेकर बुना गया है. ग्राम्शी के अनुसार वर्गीय शोषण की जड़ें संस्कृति में निहित होती हैं. इसमें कोई मतभेद नहीं है कि अभिजनवर्ग एक बेहतर, सुविकसित और वर्चस्ववादी संस्कृति का अनुगामी होता है. उस संस्कृति के जो एक आदमी द्वारा दूसरे पर शासन करने को श्रेष्ठता का पर्याय मानती है. वही उनमें दूसरों पर अधिपत्य बनाए रखने की योग्यता विकसित करती है. उसी के आधार पर वे साधारण जन को अपने अधीन बनाए रखते हैं. सांस्कृतिक अधिपत्य से उबारने के लिए ग्राम्शी ने सर्वहारावर्ग को अपनी समानांतर संस्कृति विकसित करने की सलाह दी थी. जिसके अपने जीवनमूल्य, अपना बुद्धिजीवी वर्ग और विकास के स्वतंत्र मापदंड हों. जो समानता और सरलता के सिद्धांत के आधार पर विकसित हो. इसे भलीभांति समझने के लिए अभिजन संस्कृति के विभिन्न घटकों तथा उनकी ऐतिहासिकी को जानना जरूरी है.

धर्म : अभिजन संस्कृति का आदिउत्प्रेरक

सामाजिक स्तरीकरण को मान्य ठहराने में धर्म का योगदान सर्वाधिक है. अतः धर्म को अभिजन संस्कृति का आदिउत्प्रेरक कहा जाए तो भी यह अनुचित न होगा. बताया जाता है कि इसकी उत्पत्ति मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं की पूर्ति के रूप में हुई. यह अधूरा सच है. जिज्ञासा तत्व किसी भी वस्तु, विचार या अवधारणा पर संदेह तथा उसके मूलभूत कारण को जानने की इच्छा से जुड़ा है. जबकि धर्म की नींव आस्था और विश्वास पर टिकी होती है. संदेह करना, शंकालु होना तथा अंतनिर्हित सत्य को जानने के लिए स्थापित मान्यताओं पर सवाल खड़े करना, धर्म की मूल प्रवृत्ति से ही गायब है. उसकी उत्पत्ति किसी एक धारणा पर स्थिर होकर प्रश्नाकुलता से बच निकलने वाली प्रवृत्ति का परिणाम थी. आरंभिक समाजों में जब कानून तथा राजनीतिक संस्थाओं का विकास नहीं हुआ था, उन दिनों यह सोचकर कि ईश्वर का नाम बीच में आने से मनुष्य उनका पालन निष्ठापूर्वक करेगा, मनुष्य के सामाजिक, नैतिक कर्तव्यों को धर्म से जोड़कर समाज के विभिन्न घटकों के बीच तालमेल बनाने की कोशिश की जाती थी. चूंकि सारे धार्मिक प्रतीक, सांस्कृतिक प्रतिमान और उनकी प्रणालियां प्रकृति के सन्निकट तथा उसी से उद्भूत थीं, इसलिए प्रकृति के संरक्षक के रूप में प्रकल्पित ईश्वर को बीच में लाने का कारण कदाचित जीवन में प्राकृतिक शक्तियों की पैठ और उनकी शक्तियों का वास्ता देना भी था, ताकि खुद को उनके प्रति उत्तरदायी मानता हुआ मनुष्य इनके तथा अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति पूरी तरह श्रद्धावनत एवं निष्ठावान बना रहे. यह अन्यथा भी नहीं था. हालांकि समय के साथसाथ यह सिद्ध होता गया कि प्रकृति को समझने के लिए काल्पनिक शक्ति यानी ईश्वर का सहारा लेना बहुत बड़ी भूल थी. इसने मानव मन में अवांछित भय और काल्पनिक प्रलोभनों को जन्म दिया. इससे संसार और सांसारिक चुनौतियों के प्र्रति उपेक्षाभाव मानवमन में जन्मा. जो लोग इस सपने की हकीकत को समझते थे, वे जनसाधारण के धर्म के प्रति आग्रहअनुराग का उपयोग लोक और उसकी समस्याओं के मूल कारण की ओर से उनका ध्यान हटाने के लिए करते रहे. और जो नादान थे, वे इसके आधार पर निर्मित संस्कृति का शिकार होते रहे.

जीवन की निदेशक सत्ता के रूप में समाज में धर्म को जगह मिलने के कुछ व्यावसायिक कारण भी थे. वस्तुतः कृषि के विकास के साथ मनुष्य ने यायावरी छोड़ जब एक ही स्थान पर टिककर रहना आरंभ किया तो विकास में तेजी आई. जीवन अपेक्षाकृत सुख के साथ कटने लगा. नया जीवन यद्यपि सुविधाजनक था. उसमें पहले जैसी भागमभाग नहीं थी, तथापि प्रकृति की परिवर्तनशीलता बारबार उसे उसके पुराने यायावरी जीवन की याद दिलाती थी. वह चाहता था कि उसे जीवनजगत के रहस्य के बारे में जानकारी हो. कहींकहीं यह रंज भी जरूर रहा होगा कि एक जगह टिककर रहने, घरगृहस्थी में डूब जाने से वह वास्तविक ज्ञान के अवसरों से वंचित हो चुका है. जीवन की भंगुरता एवं प्रकृति के सापेक्ष अत्यल्प जीवन का एहसास भी उसको पलायनवादी बनाता था. इस मानसिकता के निर्माण में पुरोहितों तथा उन लोगों का कम योगदान न था जो धर्म और/या समाज के प्रबंधन से किसी भी प्रकार जुड़े थे तथा उसके साधारणपन का उसे लगातार बोध कराते रहते थे. पुजारी कहता, ‘तुम गृहस्थी के जंजाल में घिरकर बहुत कुछ गंवा चुके हो. तुम्हारा परलोक न बिगड़े इसलिए आज से तुम्हारे कल्याण की चिंता मैं करूंगा.’ गृहस्थ उसकी बातों में फंसा और नियमित दक्षिणा देने का वचन देकर उसने पुजारी को अपने और ईश्वर के बीच बिचैलिया स्वीकार कर लिया. अगली बार राज सत्ता की लालसा रखने वाले ने उससे संपर्क किया, बोलाᅳ‘आज से तुम्हारी सुरक्षा मेरा कर्तव्य. बदले में कुछ कराधान देना होगा’. शांतिपूर्ण जीवन की चाहत में साधारणजन ने यह भी मान लिया. तदनंतर व्यापारी ने दस्तक दी. आम आदमियों संबोधित कर उसने कहा

तुम्हें तुम्हारे सुख, सुविधा के लिए जिनजिन वस्तुओं की आवश्यकता है, मुझे बताओ. उन्हें मैं लाकर दूंगा. तुम्हें वस्तु के वास्तविक मूल्य से बस कुछ अधिक का भुगतान करना होगा, फिर उसके लिए धक्के खाने की जरूरत न रहेगी.’ कारीगरों से कहा, ‘तुम केवल उत्पादन पर ध्यान दो. बिक्री की जिम्मेदारी मेरी.’

बदले में उसने दोनों पक्षों से अपना मुनाफा तय कर लिया. पहले उत्पादक और उपभोक्ता दोनों एकदूसरे को जानते थे. उत्पादक उपभोक्ता की जरूरतों को समझता था तो उपभोक्ता को भी उत्पादक की समस्याओं का बोध था. इसलिए वस्तुओं का मूल्यनिर्धारण श्रम और पारस्परिक जरूरतों से तय होता था. तीसरे वर्ग का बीच में आना वास्तविक उत्पादक से उसका पद; तथा उपभोक्ता से उसकी पसंद छिनने की शुरुआत थी. आगे वही हुआ. उससे पहले तक वस्तुओं के दाम कारीगर तय करता था. वह खुद भी आम आदमी की भांति, उन्हीं के समाज का हिस्सा होता था. व्यापारिक अभिजन ने कारीगर से वस्तुओं के मूल्य तय करने का अधिकार छीन लिया. यही नहीं लाभकामना के ध्येय से वह उपभोक्ता की पसंदों को भी नियंत्रित करने लगा. इस तरह राजा, व्यापारी और पुरोहित तीनों वास्तविक उत्पादक वर्ग यानी शिल्पकर्मी और किसान की सहायता का संकल्प लेकर आए थे. यह भी कह सकते हैं कि समाज के बहुसंख्यक वर्ग की सेवा के प्रति उनकी वचनबद्धता के आधार पर ही उनके उद्यम को स्वीकार्य माना गया था. उस समय शायद ही कोई जानता था कि जो वर्ग वास्तविक उत्पादक की सहायता और सेवा का संकल्प लेकर आया है, यानी जिस पुजारी ने मामूली दक्षिणा के लिए पुरोहितकर्म को अपनाया है, जो राजा कराधान के बदले राज्य की सुरक्षा का वचन दे चुका है और जिस व्यापारी ने मामूली मुनाफे की ऐवज में उपभोक्ता और उत्पादक के बीच पुल बनने की जिम्मेदारी स्वीकार की थीवे एकाएक अपनी भूमिका बदलकर ‘स्वामी मानसिकता’ को अपना लेंगे? यह कार्य धर्म के भरोसे शुरू हुआ, या यूं कहें कि धर्म के सहारे यह परवान चढ़ा. फिर तो पूरे गाजेबाजे के साथ शताब्दियों तक गूंज उठाता रहा.

जीवन में धर्म को अपरिहार्य बनाने वाले कुछ कारण आर्थिक भी थे. कृषि उत्पादन पूरी तरह प्रकृतिअनुकंपा पर टिका था. उसमें उत्पादन की अफरात थी तो प्राकृतिक आपदा द्वारा अकस्मात होने वाला नुकसान भी कम न होता था. कुदरत मेहरबान हो तो घर, भंडार आसानी से भर देती. अपनी और दूसरों की जरूरत के लिए पर्याप्त अन्नसामग्री आसानी से जुट जाती. लेकिन आपदा आ घटे तो नुकसान भी उसी अनुपात में होता था. प्रकृतिकोप यानी अतिवृष्टि, अनावृष्टि, कुहरे, पाले की मार से भरीपूरी खेती तबाह हो जाती. पूरे वर्ष अन्नाभाव से जूझना पड़ता. इसी अनिश्चितता से कृषिकर्म में सहायक देवताओं इंद्र, वरुण, मित्र, मरुत आदि का महत्त्व बढ़ा. ये देवता जीवनसंघर्ष के बीच झूलते मनुष्य को मानसिक संबल प्रदान करते थे. प्रकृति आधारित जीवन के छूट जाने, ज्ञानानुभव के अवसर घट जाने का क्षोभ, एक नास्टेल्जिया, अतीत मोह अथवा व्यामोह की भांति उस समय भी मानवमन में कहीं न कहीं था. इसी कारण जनसाधारण के मन में उन लोगों के प्रति विशिष्ट सम्मानभाव था जो उस समय तक प्रकृति आधारित जीवनशैली अपनाए हुए तथा लोकमान्यता के अनुसार सांसारिक झंझटों से परे थे. ऐसे लोगों से वह संपर्क बनाकर रखता था. समयसमय पर उन्हें अपने घर बुलाकर उनके अनुभवचिंतन द्वारा पीछे छूट गए जीवन के अभाव को पूरा करने का प्रयास करता रहता था.

धीरेधीरे वे लोग जिनका मन प्रकृति आधारित जीवन और सामाजिक जीवन के बीच कहीं फंसा था, वे रहरह कर समाज की ओर लौटने लगे. सामाजिक जीवन की गर्माहट, जीवन में स्थायित्व की चाहत, लोगों की ओर से मिलने वाला मानसम्मान उन्हें आकर्षित करने लगा. चूंकि समाज के बाहर के वनचारी जीवनशैली को अपनाए लोग, आम गृहस्थ को हर समय, उसकी सुविधा और पहुंच के अनुसार मिलने असंभव थे, इस अभाव की पूर्ति हेतु समाज के बीच से ही एक पुरोहित वर्ग पनपने लगा. इस वर्ग का शारीरिक श्रम से कोई वास्ता न था. वे दूसरों के श्रम के आधार पर जीवन जीने वाले परजीवी किस्म के लोग थे, जो अपने इहलोक की सिद्धि के लिए दूसरों का परलोक सुधारने का दावा करते थे. स्वर्ग उनका सबसे लुभावना प्रलोभन था, जिसके माध्यम से व्यक्ति को बगैर किसी परिश्रम के सभी प्रकार के सुखामोद का सपना दिखाया जाता था. स्वयं को ईश्वर का भक्त, उसकी अपने ऊपर अनुकंपा का दावा करने वाले पुरोहित का जीवन अपेक्षाकृत सुखमय बीतता था. वह ऐसे ही, बल्कि उससे कहीं अधिक सुखसमृद्धिमय जीवन का सपना लोगों की आंखों में रोपता था. इस कारण समाज में उसको अतिरिक्त मानसम्मान भी प्राप्त था. परिणामस्वरूप मेहनतकश वर्ग में अपने जीवन के प्रति अविश्वास बढ़ा और संघर्ष से पलायन की प्रवृत्ति भी. प्रकारांतर में यही सब रूढ़ियों और कर्मकांडों के प्रति जनसाधारण की बढ़ती रुचि का वाहक बना.

परलोकसिद्धि की लालसा असल में एक ऐसा मकड़जाल था कि आदमी उससे उबरने की जितनी कोशिश करता, उतना ही उसमें उलझता जाता था. इसके बावजूद उसका आकर्षण ऐसा कि स्वर्ग का कल्पनासुख लेने के लिए भी व्यक्ति पूरा का पूरा जीवन मानवकृत स्थितियों के नर्ककुंड में गुजार देता था. ऊपर से धर्म का आतंक इतना कि उसके विरुद्ध कुछ भी कहा जाए, वह बेअसर सिद्ध होता था. आस्था और विश्वास के आगे बुद्धिविवेक का कोई मोल न था. सच तो यह है कि अपने स्वार्थसिद्धि में लिप्त पुरोहित वर्ग ने ज्ञान की परिभाषा ही बदल दी थी. उसे लिए सच्चा ज्ञान वह था जो लोगों के पूजापाठ, तोतारटंत और कर्मकांडों की सीख देता था. भक्ति को सर्वोपरि बताता था. एक ही नाम को लगातार रटते रहना, पत्थरों के आगे माथा रगड़ना और जीवन की चुनौतियों से मुंह मोड़ लेना उसकी नजरों में साधना थी. चूंकि आम आदमी का जीवन बेहद कष्टमय था, प्राकृतिक आपदाओं और सांसारिक उलझनों से घिरा हुआ, इसलिए ऐसी पलायनवादी सलाह लोगों को खूब पसंद आती थी; या यूं कहें कि इसपर विश्वास करने के अलावा उसके पास कोई और रास्ता ही न था. विज्ञान उस समय तक अविकसित अवस्था में था. नास्तिक लोग उस समय भी थे. आस्तिकों के साथ उनकी बहसें होती रहती थीं. जनसाधारण पर उनका प्रभाव भी था. तथापि सत्ता एवं संसाधनों पर अपनी पकड़ के अभाव में वे समाज को अपने सोच के अनुसार दिशा देने में असमर्थ थे. उधर सत्ता एवं संसाधनों के शिखर पर बैठे लोग थे कि अपनी स्थिति को अक्षुण्ण रखने के लिए वे जनसाधारण का ध्यान उससे दूर जाने ही नहीं देते थे. आम आदमी के लिए रोटी का संघर्ष ही इतना बड़ा था कि उससे इतर सोचने का उसके पास समय ही नहीं था.

सामाजिक स्तरीकरण के प्रतीक बन चुके धर्म के समर्थकों का एक तर्क यह भी था कि सभी मनुष्य समान मेधावी नहीं हो सकते. उनमें कुछ साधारण मेधा संपन्न होंगे तो कुछ विशिष्ट मेधावी. तो जो साधारण मेधावी हैं, उन्हें चाहिए कि वे उन नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करें जिन्हें समाज ने अपने हित के लिए जरूरी माना है. व्यक्ति की बौद्धिक क्षमताओं का आकलन केवल उसके जन्म और वर्ण के आधार पर किया जाता था. यह सरासर अमनोवैज्ञानिक तथ्य था, लेकिन पुरोहितवर्ग अपनी हठ के आगे किसी की सुनने को तैयार न था. इस तरह धर्म, दर्शन के ठहराव तथा उसके मूत्र्तिकरण के माध्यम से मनुष्यों को जन और अभिजन में बांटने वाला प्रमुख कारक बना. दर्शन यानी विचार से कटे जनसमूहों को कर्मकांडों और टोटमबाजी में उलझा देना बहुत आसान था. जातीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए आगे यह किया भी गया. ज्ञान के आस्थाकरण ने न केवल उत्पीड़न को बढ़ावा देने वाली स्थितियों को बढ़ावा दिया, बल्कि उत्पीड़ित को उत्पीड़न सहते रहने के लिए तैयार किया. परिणामस्वरूप वह उत्पीड़न के वास्तविक कारणों की ओर से निरंतर उदासीन होता गया. इससे शीर्षस्थ अभिजन समाज को दूसरे वर्ग के श्रमसंसाधनों के आधार पर फलनेफूलने का अवसर मिला. साथ में धार्मिक अभिजन की अधिसत्ता और उसके विशेषाधिकारों को मान्यता भी, जो कालांतर में लगातार मजबूत होती गई. उल्लेखनीय है कि आरंभ में जब श्रम के आधार पर ऊंचनीच की भावना नहीं थी, कबीले का मुखिया ही प्रमुख अनुष्ठानों के समय उसका काम निपटाता था. बस्ती के दूसरों लोगों की तरह वह खेतीकिसानी भी सबके साथ मिलकर करता था. अल्पविकसित समाजों को नियंत्रित करने के लिए वह आवश्यक भी था. क्योंकि आवश्यकता पड़ने पर मुखिया स्वयं आगे बढ़कर समाज की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी लेता था. समय के साथसाथ आस्था धर्म कहलाने लगी और धर्म संगठन का रूप लेता गया. समाज में पुरोहित का महत्त्व बढ़ा तो उसके प्रभाव में बौद्धिक श्रम को शारीरिक श्रम से बड़ा समझा जाने लगा. इससे भी अभिजन मानसिकता को स्थायित्व मिला.

धर्म का उद्भव मनुष्य की अध्यात्मजिज्ञासा के समाधान से जुड़ा है. बल्कि यह कहना ठीक होगा कि धर्म जिस रूप में आज है, पहले उस रूप में था ही नहीं. आरंभिक जीवन में मनुष्य जब सीधे प्रकृति के सान्निघ्य में रहता था. उस समय जीवन को लेकर वह जो कल्पना करता था, वह उसकी अपनी होती थीं. उनके बारे में समूह के भीतर चर्चा भी करता होगा. उस समय भी मौलिक व्याख्या के लिए व्यक्ति को समूह के भीतर अतिरिक्त सम्मान मिलता होगा. धीरेधीरे उसकी बातों पर जब समूह के भीतर और बाहर, बहुत से लोग विश्वास करने लगे. फिर कुछ ऐसे लोग भी पनपे जो केवल दूसरों के आध्यात्मिक अनुभवों, जिज्ञासाओं को रोचक भाषा में प्रस्तुत कर देते थे. उस समय तक सभ्यता आगे बढ़ चुकी थी. मनुष्य का अधिकांश समय रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं को जुटाने में खप जाता था. उसके लिए दूसरों के आध्यात्मिक अनुभवों पर विश्वास करने के अलावा दूसरा कोई रास्ता ही नहीं था. यहीं से धर्म के सांस्थानिकीकरण की नींव पड़ी. कालांतर में प्रकृति साहचर्य में तत्वदर्शन की खोज करने वाले ज्ञानसाधक मुनि अथवा तत्वदर्शक तथा समाज में साधारण गृहस्थ की तरह रहकर पुरोहिताई करनेवाले लोग ऋषि के रूप में पहचाने गए. अपनी सामाजिक हैसियत को बनाए रखने के लिए पुरोहित वर्ग ने कर्मकांड गढ़े. शास्त्रों की स्वार्थानुकूल टीकाएं कीं और सत्तावर्ग के हर अच्छेबुरे काम का समर्थन कर उससे नजदीकी बनाए रखी. इससे समाज पर उसका प्रभाव बढ़ता गया. इसके बावजूद वनचारी जीवन जीनेवाले निरासक्त मुनियों के प्रति लोगों के मन में अतिरिक्त सम्मान था. शायद इसके पीछे कर्मकांडों की निस्सारता का बोध रहा हो. कहीं न कहीं यह धारणा भी बनी थी कि कर्मकांडों में मदद करने वाला पुरोहित, देवता और यजमान के बीच महज एक बिचैलिया है या शायद वह भी नहीं, क्योंकि जिस ईश्वर की दुहाई देकर वह सारे प्रपंच रचता है, उसका अस्तित्व उसी की कल्पना से उद्भूत और वहीं तक सीमित है. दानदक्षिणा के रूप से कमज्यादा प्रसन्न होने वाला पुजारी का देवता उसी की भांति लालची है. खुद को दुनियादारी से दूर रखकर तपसाधना करनेवाले मुनि उससे बड़े हैं. ऋषिवर्ग पर मुनिवर्ग की श्रेष्ठता रामायण और महाभारत काल तक बनी रही. इस युग में दुर्वासा, कपिल, कणाद, विश्वामित्र, गौतम, याज्ञवल्क्य आदि मुनिगणों का प्रभाव देखा जा सकता है. दशरथ के दरबार में पहुंचकर विश्वामित्र जब राम और लक्ष्मण को अपने साथ वन ले जाने को कहते हैं, तब वशिष्ट चाहकर भी उनका विरोध नहीं कर पाते. समाज के सीधे सान्निध्य में पनप चुके ऋषियों, पुरोहितों आदि को आरंभिक धार्मिक अभिजन कहा जा सकता है. मुनिगण चूंकि समाज से कटे हुए वनचारी लोग थे. इसलिए बावजूद इसके कि उनमें से अनेक के अपने परिवार और आश्रम आदि थे, वे संगठित समाज से दूर रहना ही श्रेयस्कर समझते थे. इस आधार पर उन्हें जन और अभिजन की परिभाषा से अलग रखना उचित होगा. हालांकि कहा यह भी जा सकता है कि स्वयं को तत्वदर्शक मानने वाले मुनिगण अपनी पहुंच और विवेक का उपयोग धर्म के सांस्थानिकीकरण के विरोध के लिए करते तो वह शायद ही इतना रूढ़ और शक्तिशाली हो पाता.

क्रमशः…..

© ओमप्रकाश कश्यप

1.  vital few and trivial many

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