अराजकतावाद (अनार्किज्म)

अराजकतावाद यानी ‘anarchism’ ग्रीक मूल के शब्द ‘anarchos’ से जन्मा है, जिसके उपसर्ग ‘an-’ का अर्थ है ‘बिना’(without), जबकि ‘archê’ का अभिप्राय राज्यसत्ता, सरकार अथवा कानून से है. इस प्रकार ‘अनार्किज्म’ का अर्थ हुआ—‘बिना सरकार का राज’. ऐसा राज्य जो नागरिक-संचेतना द्वारा अनुशासित हो. कानून के बजाय जहां मनुष्यता का अनुशासन चलता हो. यह थोपे हुए शासन का विरोध करता है. ‘अनार्किज्म’ के पर्यायवाची के रूप में कुछ विद्वान ‘लिब्रटेरियनिज्म’ यानी ‘स्वाधीनतावाद’ शब्द का उपयोग करते हैं, इसका भी अभिप्राय मनुष्य की अबाध-गतिशील स्वाधीनता से है. यह माना गया है कि बाह्यः सत्ता द्वारा आरोपित कानून, पुलिस, न्यायिक संस्थाएं, सैन्य बल आदि मनुष्य की स्वतंत्रता को बाधित करते हैं. इससे सत्ता शक्तिकेंद्र के रूप में ढलती जाती है और प्रकारांतर में वह मनुष्य के नैतिक उत्थान में अवरोधक बनती है. अपनी अधिसत्ता की सुरक्षा के लिए शिखरस्थ शक्तियां समाजिक स्तरीकरण की पोषक संस्थाओं का सहारा लेते हैं. कुछ विद्वान ‘अराजकतावाद’ के स्थान पर ‘लिबर्टेरियन सोशियलिज्म’ ‘स्वाधीनतावादी समाजवाद’ शब्दयुग्म का उपयोग भी करते हैं. विश्व में अराजकतावाद समर्थक दार्शनिकों की खासी संख्या रही है. ईसापूर्व पांचवी-छठी शताब्दी में भारत, चीन और यूनान में अराजकतावाद के समर्थक दार्शनिक रहे हैं. चीन में ताओ के शिष्य लाओ जु, चुआंग-जु, बाओ जिंग्यान राज्यसत्ता के आलोचक थे. चुआंग जु(369—286) ने किसी भी प्रकार की अधिकारिता को मनुष्यता पर अंकुश माना था. राज्यसत्ता में पलने वाले अन्याय का उल्लेख करते हुए उसने लिखा था कि वह प्रायः अन्यायी का पक्ष लेती है. साधारण व्यक्ति के लिए कानून अनगिनत निषेधाज्ञाओं और प्रतिबंधों का जखीरा खड़ा कर देता है, जबकि शक्तिशाली को मनमानी करने के लिए खुला छोड़ देता है. कानून का लाभ उठाकर सत्ताशीर्ष पर विराजमान लोग जनसाधारण का शोषण और उत्पीड़न करते रहते हैं. राज्य का झुकाव समृद्धिशाली वर्ग की ओर होता है, वह पहले से ही सुविधासंपन्न वर्ग को और अधिक सुख-सुविधाएं बटोरने का अवसर प्रदान करता है, जबकि निर्धन उसकी दया पर जीने के लिए विवश होता है.

राज्य के असमानतापूर्ण आचरण के बारे में चुआंग जु ने लिखा था कि उसके बनाए कानून ने—‘मामूली चोर को जेल भेज दिया गया है, जबकि खूंखार डकैत राज्याधिपति बना हुआ है.’ जीवन में कृत्रिमता के विरुद्ध चुआंग-जु का मानना था कि प्रत्येक प्राणी अपने आप में पूर्ण है. प्राकृतिक रूप से समृद्ध. सामान्य जीवन जीने के लिए प्राणी को किसी बाह्यः साधन की आवश्यकता ही नहीं है. वह उदाहरण देता है—

घोड़ों के खुर होते हैं, जिनसे वे बर्फीली, फिसलनयुक्त सतह पर चल सकें. बाल होते हैं जो उनकी तेज हवा और ठंड से रक्षा कर सकें. वे प्रकृति में सहज उपलब्ध घास खाते, पानी पीते तथा अपनी मजबूत ऐड़ियों के बल पर लंबी दौड़ भी लगाते हैं. यह घोड़ों का कुदरती लक्षण है. राजसी जीन उनके लिए व्यर्थ है.’

चुआंगजु के विचार सुनकर एक दिन पो लो नामक व्यक्ति उसके सामने पहुंचा और कहने लगा—‘घोड़ों की देखभाल कैसे की जाए, यह मैं भलीभांति जानता हूं.’

उसने घोड़ों पर निशान लगाया, उन्हें बांधा, उनके खुरों को अच्छी तरह से साफ किया, वे भागें नहीं इसलिए पैरों में रस्सा भी डाल दिया. उसके बाद उसने उनपर लगाम कसकर अश्वशाला में बांध दिया. लेकिन इस कोशिश में कुछ दिनों बाद दस में से दोतीन घोड़े मर गए. प्रशिक्षण देने के लिए उसने घोड़ों को भूखा और प्यासा रखा, उन्हें सरपट और दुलकी चाल से दौड़ाया. उनके बालों को तराशा. लगाम कसी. फिर एक दिन ऐसा भी आया जब उनमें से आधों ने दम तोड़ दिया.’

चुआंग-जु का यह उदाहरण दर्शाता है कि कृत्रिमता जीवन को सुविधाजनक भले बनाए, किंतु वह अनेक व्यवधान भी खड़े करती है. मनुष्य को हालांकि सामाजिक प्राणी कहा जाता है, लेकिन सामाजिक होना केवल मनुष्य का लक्षण नहीं है. यह गुण अन्य जीवों में भी पाया जाता है. चींटियों, मधुमक्खियों तथा पक्षियों की सामाजिकता पर अनेक ग्रंथ रचे जा चुके हैं. मनुष्य ने लंबा जीवन प्रकृति के सान्न्ध्यि में बिताया है. अब भी प्रकृति पर उसकी निर्भरता कम नहीं हो पाई है. इसलिए उसकी सामाजिकता प्रकृति और नैसर्गिक नियमों से मुक्त नहीं हो सकती, जो जीवन में कृत्रिमता का निषेध करते हैं. जीवन की नैसर्गिकता को बचाए रखने की आवश्यकता के पक्ष में चुआंग-जु एक के बाद एक कई तर्क देता है. वह लिखता है कि कुम्हार यह दावा करता है कि वह मामूली मिट्टी को मनमानी आकृति में ढाल सकता है, चाहे गोल हो या चौकोर, आयताकार हो अथवा वृताकार—उसके लिए कुछ भी कठिन या असंभव नहीं है. काष्ठकार यह गुमान करता है कि वह लकड़ी को जैसी चाहे वैसी आकृति देने में कुशल है. चाहे गोलाकार हो या घुमावदार. सीधी हो अथवा आड़ी—सब उसके लिए बाएं हाथ का खेल है. ऐसा ही दावा दूसरे शिल्पकर्मी भी कर सकते हैं. चुआंग-जु के अनुसार उपर्युक्त उदाहरण में कुम्हार और काष्ठकार दोनों अपनी-अपनी कला का बखान करते हैं. मिट्टी और लकड़ी स्वयं क्या चाहती हैं, उनकी अपनी खुशी किसमें है, यह उनमें से कोई नहीं जानना चाहता. जैसे पो लो ने घोड़ों से साथ वह किया जो वह चाहता था; या जो उसको सिखाया गया था. घोड़े स्वयं क्या पसंद करते हैं. किस कार्य में उन्हें सर्वाधिक खुशी हासिल होती है, यह उसने कभी जानने का प्रयास ही नहीं किया था.

यही प्रवृत्ति शासक की होती है. हर शासक सत्ता पर सवार होते ही मनमानी पर उतर आता है. वह दावा करता है कि उसका शासन जनता के हक में, उसकी बेहतरी के लिए है. जनता स्वयं क्या चाहती है, यह जानने का वह कभी प्रयास तक नहीं करता. जनता के लिए ऐसा शासक अनपेक्षित और अनावश्यक है. राज्यसत्ता को अनावश्यक और अप्रासंगिक बताने वाला चुआंग-जु पहला विद्वान नहीं था. उससे लगभग दो शताब्दी पहले जन्मे लाओ-जु ने साफ लिखा था कि सर्वोत्तम तो यह है कि सरकार हो नहीं. यदि सरकार बनाना अनिवार्य है, तो बुद्धिमानी इसमें है कि उसका स्वरूप एकदम सादा और सरल हो. वह कोई काम न करे. बस शांत बनी रहे. व्यक्तिमात्र को बदलने के लिए, उसको नागरिक धर्म सिखाने के लिए वे अपनी ओर से कौन-सा कदम उठाना चाहेंगे, इस प्रश्न के उत्तर में लाओ-जु का कहना था—

मैं कोई कदम नहीं उठाऊंगा. लोग खुद अपने आप को बदलेंगे. मैं खामोशी का पक्ष लूंगा, लोग स्वयं अपनी मंजिल तय कर लेंगे. मैं कोई कार्रवाही नहीं करूंगा, अपने उत्थान के लिए लोग स्वयं आगे आएंगे….’

लाओ-जु का मानना था—

संसार में लोगों पर जितने अधिक प्रतिबंध और निषेध थोपे गए हैं, उतनी ही यहां दरिद्रता है….दुनिया में जितने अधिक नियम, कानूनादि होंगे, उतने ही अधिक चोरडकैतदुराचारी यहां होंगे.’

मानव-समूह की कुछ सामान्य विशेषताएं होती हैं. जैसे हर व्यक्ति अपना भोजन स्वयं कमाना-करना पसंद करता है. अपने कपड़े वह स्वयं पहनता है. अनौपचारिक वातावरण में ऐसे अनेक कार्य हो सकते हैं, जिन्हें मनुष्य को स्वयं करने से प्रसन्नता प्राप्त होती हो. कहा जा सकता है कि ये उसके जन्मजात लक्षण हैं. इन कार्यों के लिए किसी बाहरी उपकरण अथवा सहायता की आवश्यकता भी नहीं पड़ती. इस स्तर तक मनुष्य को शासन की भी आवश्यकता नहीं है. यह आदिम अवस्था है. परंतु जब कोई समाज विकास की ओर अग्रसर होता है, तो वह पाता है कि विकास के लिए आवश्यक मानी जाने वाली सभी वस्तुओं का उत्पादन प्रत्येक के लिए संभव नहीं है. अपनी रुचि, स्वभाव, सामथ्र्य के आधार पर व्यक्ति किसी कार्य-विशेष में ही निपुण हो सकता है. इन स्थितियों में कार्य-विभाजन समाज की आवश्यकता बन जाता है. पूंजीवादी व्यवस्था में कार्य-विभाजन का आधार लाभ की वांछा से किया जाता है. उससे समाज में स्पर्धा बढ़ती है, जो एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की दासता के लिए बाध्य करती है. इसलिए आवश्यक है कि कार्य-विभाजन लार्भाजन के बजाय सामूहिक कल्याण की भावना से प्रेरित हो, ताकि मनुष्य की स्वतंत्रता किसी भी प्रकार से बाधित न हो.

यूनानी विचारकों में अराजकतावाद का प्रमुख व्याख्याकार हम क्रीटवासी जीनो को पाते हैं. ईसा पूर्व 342 ईस्वी में जन्मा यह प्रतिभाशाली यूनानी दार्शनिक स्टोइक दर्शन का जन्मदाता था. प्लेटो के आदर्श राज्य की परिकल्पना का विरोध करते हुए उसने मुक्त समाज की स्थापना पर जोर दिया था. उसने राज्य की संप्रभुता, शक्ति संपन्नता, नागरिकों के जीवन में हस्तक्षेप करने के उसके अधिकार, ताकत बटोरने हेतु सेनाएं खड़ी करने की प्रवृत्ति तथा साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं का विरोध करते हुए व्यक्तिमात्र की नैतिकता तथा उसको संरक्षण प्रदान करने वाले नियमों का पक्ष लिया था. व्यक्ति की जटिल मनोरचना का विश्लेषण करते हुए जीनो ने लिखा था कि आत्मसंरक्षण और आत्मपरिर्वधन की प्रवृत्ति जहां मनुष्य को अहंवादी बनाती है, वहीं इसको संतुलित करने के लिए एक अन्य प्रवृत्ति भी मानव मन में सतत सक्रिय रहती है, वह है व्यक्तिमात्र में अंतनिर्हित उसका सामाजिकताबोध, जो विश्व-भर के जनसमूहों में दूसरे जनसमूहों यानी मानवमात्र के बीच एकता का भाव पैदा करता है. दूसरों से मिल-जुलकर रहने का स्वभाव मनुष्य को प्रकृति की ओर से प्राप्त है. मैत्री नैसर्गिक गुण है. इसलिए उसको न तो किसी कानून की आवश्यकता है, न पुलिस, न कोर्ट-कचहरी की. यहां तक कि उसे धर्म, धर्मालय, धन-संपदा, उपहार आदि की भी कोई आवश्यकता नहीं है. इसके लिए मनुष्य को चाहिए कि वह आवश्यकताओं को सीमित रखे, विलासिता के दुर्गुण को अपने मन में न पनपने दे. अपने अधिकार में ऐसी कोई वस्तु न रखे, जो समाज के दूसरे सदस्यों को सहज उपलब्ध न हो.

यह दुर्भाग्य ही है कि जीनो के अराजकतावादी विचारों को उन दिनों बहुत महत्त्व नहीं दिया जा सका. इसका कारण उसके समकालीन प्लेटो और अरस्तु की उच्चस्तरीय ख्याति थी, जिनके विचार सुकरात के दर्शन की छत्रछाया में विकसित हुए थे. उन दिनों राज्य छोटे थे और और वे आपस में युद्ध करते रहते थे. ऐसे में बिना राज्य के राज्य यानी ‘वैराज्य’ की परिकल्पना के लिए उन दिनों समाज में बहुत कम स्थान था. एक अन्य कारण जीनो की लिखी पुस्तकों का अनुपलब्ध होना है. उसके अराजकतावादी विचारों की झलक छिटपुट रूप से प्राप्त उसके वक्तव्यों में दर्ज है. भारत में बौद्ध धर्म का उदय राजसत्ता का प्रतीकात्मक विरोध था. ‘अप्प दीपोभव’ की चेतना के साथ गौतम बुद्ध ने मनुष्य से अपना मार्गदर्शक स्वयं बनने का आवाह्न किया. उन्होंने बाहरी अनुशासन के बजाय आंतरिक अनुशासन पर जोर दिया. बौद्ध विहारों की स्थापना की जहां जीवन सामूहिकता के नियम से अनुशासित होता था. महावीर स्वामी ने भी स्वयांनुशासित जीवन पर जोर दिया. उन्होंने अहिंसा को अपने दर्शन के केंद्र में रखा जो समाज और सहसंबंधों के स्थायित्व से लिए अपरिहार्य है.

मध्यकाल में अराजकतावादी दर्शन की झलक मार्को जिरोलमो वाइड के विचारों में देखने को मिलती है. अराजकतावाद और स्वाधीनतावाद के बारे में विस्तृत विमर्श हमें सोलहवीं शताब्दी के फ्रांस के दूरद्रष्टा कवि-दार्शनिक ला बूइटी(1530—1563) के साहित्य में भी प्राप्त होता है. उसने स्वाधीनतावाद के पक्ष में जोरदार तर्क दुनिया के सामने रखे. क्रीटवासी जीनो से प्रभावित बूइटी का विचार था कि तानाशाही चाहे वह बलपूर्वक स्थापित की गई हो, अथवा किसी अन्य माध्यम से, बड़े से बड़ा तानाशाह केवल उस समय तक सत्ता शिखर पर बना रह सकता है, जब तक कि जनता उसको वहां बनाए रखना चाहती है. ऐसे तानाशाह को बलपूर्वक खदेड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती. जनता यदि अपने दासताबोध से बाहर आ जाए तो तानाशाही स्वतः दम तोड़ लेती है. इसलिए आजादी की चाह रखने वाली जनता को सबसे पहले स्वयं दासता-चक्र से बाहर निकालना चाहिए. बूइटी को हम सत्याग्रह आंदोलन का आदि प्रवत्र्तक भी मान सकते हैं. यह बात चैंका सकती है कि 1575 में धार्मिक सुधारवादी नेता ह्युजनोट द्वारा प्रकाशित एक पंपलेट में बूइटी ने—

कस्बों और शहर में रहने वाले लोगों से सिविल नाफरमानी का सहारा लेते हुए राज्य को दिए जाने वाला किसी भी प्रकार का टैक्स न चुकाने की अपील की थी.’

बूइटी असल में मानवतावादी विचारक था. उस समय तक भी अराजकतावाद अथवा उसके किसी पर्यायवाची शब्द का चलन नहीं हो पाया था. अंग्रेजी शब्दावली में ‘अनार्किस्ट’ शब्द 1642 में इंग्लेंड के गृह-युद्ध के दौरान उपयोग किया गया. उन दिनों इस शब्द का आशय आज से एकदम भिन्न था. तब यह शब्द उपहास और हेयताबोध दर्शाने के लिए प्रयुक्त किया गया था. प्रयोग करने वाले अंग्रेजी राजशाही के समर्थक थे. उन्होंने इस शब्द का गालीनुमा प्रयोग राजशाही के स्थान पर संसदीय राज्यप्रणाली की मांग कर रहे परिवर्तनवादियों के लिए किया था. 1793 में फ्रांसिसी क्रांति के दौरान साम्राज्यवादी जेकोबिन के विरुद्ध परिवर्तनवादी आंदोलनकारियों द्वारा भी इस शब्द का उपयोग किया था. हालांकि उस समय भी अराजकतावादी होना, उपहास और हंसी का पात्र माना जाता था. आंदोलनकारी भीड़ को संबोधित करते हुए फ्रांसिसी क्रांति के सूत्रधार जेकुइस राॅक्स ने ‘आक्रोश का घोषणापत्र’ में समाज में व्याप्त असमानता पर प्रहार करते हुए कहा था कि ऐसे राज्य में जहां—

एक वर्ग शोषण द्वारा दूसरे वर्ग को भूखा मरने पर विवश कर दे, वहां आजादी सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है. जहां धनी अपने एकाधिकार और मनमानी द्वारा निर्धन व्यक्ति के जीवनमरण का फैसला करने लगे, वहां समानता सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है. जिस राज्य की तीनचैथाई जनता दिनोंदिन आसमान चढ़ती महंगाई से त्रस्त होकर रातदिन आंसू बहाती हो, वहां गणतंत्र सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है.’

अपने घोषणापत्र में रा॓क्स ने जनता से आततायी राजसत्ता को उखाड़ फेंकने का आवाह्न किया था. इस पर साम्राज्यवादियों द्वारा प्रतिक्रियावादी कहकर उसका मजाक उड़ाया गया था. अठारवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक व्यक्ति-स्वातंत्रय की मांग विस्तार ले चुकी थी. उन्हीं दिनों इमानुएल जोसेफ सीयेस(1748—1836) ने क्रांतिकारी काम किया, जिसने इतिहास की धारा ही बदल दी. कुलीन मध्यवर्गी परिवार में जन्मे सीयेस ने अपनी शिक्षा धार्मिक माहौल में पूरी की थी. समय आने पर उसको एक चर्च में पादरी की नौकरी मिल गई. लेकिन वह पादरी के परंपरागत कार्य में रमे रहने के बजाय सुधारवादी कार्यक्रमों में प्रवृत्त हुआ. अपने क्रांतिधर्मी विचारों को लेकर सीयेस ने कई छोटे-छोटे परिपत्र लिखे, जिन्होंने समाज में नई चेतना का प्रसार किया. उसके लिखे परिपत्रों में ‘तीसरी दुनिया क्या है?(व्हा॓ट इज थर्ड एस्टेट?)’ शीर्षक से लिखा गए परिपत्र में नए युग का संदेश निहित था. कालांतर में यही परिपत्र फ्रांसिसी क्रांति का प्रमुख उत्प्रेरक बना. राजशाही में जनता की हैसियत पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए सीयेस ने लिखा था—

तीसरी दुनिया क्या है?’

सबकुछ.’

अभी तक राजतंत्र में तीसरी दुनिया की हैसियत कैसी है?’

तुच्छ, कुछ भी नहीं.’

इसकी हसरत क्या है?’

थोड़ेसे मानसम्मान की.’

किसी राष्ट्र की जीवंतता और समृद्धि के लिए क्या अनिवार्य है?’

व्यक्तिगत प्रयास एवं सामूहिक कर्तव्यपरायणता.’

सीयेस ने अस्सी प्रतिशत नागरिकों को अधिकार वंचित करने वाली व्यवस्था को चुनौती दी थी. उसके परिपत्र ने जादू का असर किया, इसके बावजूद उनीसवीं शताब्दी के आरंभ तक ‘अनार्किज्म’ तथा उसके समर्थकों के प्रति लोगों का नकारात्मक रवैया बना रहा. अराजकतावाद को कोई भी गंभीरता से लेने को तैयार न था, किंतु उनीसवीं शताब्दी में यूरोपीय नवजागरण के दौर में, विशेषकर रूसो द्वारा व्यक्ति स्वातंत्रय के पक्ष में दिए गए जोरदार तर्कों के बाद अराजकतावाद के प्रति लोगों ने नए सिरे से सोचना आरंभ किया. उनीसवीं शताब्दी में पहली बार विलियम गुडविन(1756—1836) ने पहली बार अराजकतावाद का दर्शन सामने रखा, हालांकि अपने इस दर्शन को उसने कोई नया नाम नहीं दिया था. गुडविन के विचारों का प्रभाव एडमंड ब्रूक, बेंजामिन टुकर पर पड़ा. परंतु उसका श्रेय मिला अमेरिकी सुधारवादी विचारक जोसीह वारेन(1798—1874) को जिसने संभवतः पहली बार राज्य की उपयोगिता को नकारते हुए राज्यविहीन स्वावलंबी बस्तियों की स्थापना पर जोर दिया. राबर्ट ओवेन के सामूहिक आवास बस्तियों के विचार से प्रभावित वारेन के प्रस्तावित स्वावलंबी राज्य में सभी संपत्तियों तथा सेवाकार्यों को सामूहिक बस्तियों के अधिकार में रखा गया था. वारेन द्वारा स्थापित सामूहिक आवास बस्तियों में मानवजीवन पर बाहरी हस्तक्षेप कम से कम था. वे व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता का समर्थन करती थीं, लेकिन निवासियों में सामूहिक जीवन के प्रति निष्ठा का अभाव, अनुभव की कमी के कारण उनका वही अंत हुआ जो राबर्ट ओवेन द्वारा स्थापित ‘न्यू हार्मोनी’ का हुआ था. उन दिनों सहकारिता आंदोलन उठान पर था. वारेन के प्रयासों को भी सहकारिता के उपांग के रूप में देखा गया. असफलता का एक कारण यह भी था कि वारेन ने सहजीवन का पक्ष तो लिया, किंतु राजशाही और साम्राज्यवाद की उतनी तीखी आलोचना नहीं की, जैसी फ्रांसिसी क्रांति के सूत्रधार नेताओं ने की थी.

दर्शन के रूप में ‘अराजकतावाद’ भले ही ढाई हजार वर्ष अथवा उससे भी अधिक पुराना हो, परंतु एक परिपक्व राजनीतिक दर्शन के रूप में इस शब्द का सर्वप्रथम उपयोग 1890 में फ्रांस में पियरे जोसेफ प्रूधों द्वारा किया गया था. वह पहला विचारक था जिसने खुद को जोरदार शब्दों में अराजकतावादी कहते हुए व्यवस्था परिवर्तन की मांग की थी. निजी संपत्ति की अवधारणा को चुनौती देते हुए उसने लिखा था—‘निजी संपत्ति चोरी है तथा संपत्तिधारक व्यक्ति चोर है.’ प्रूधों सीयेस की तीसरे राज्य की अवधारणा से प्रभावित था, जिसने बाइबिल से संदर्भ लेकर राजशाही की तीखी आलोचना की थी. अपने समय में प्रूधों की ख्याति मार्क्स से कहीं बढ़कर थी. प्रूधों जब व्यक्तिगत संपत्ति को चोरी बता रहा था तो उसका आशय उसके कुछ हाथों तक सिमट जाने से था. राज्य चूंकि संपत्ति के केंद्रीयकरण को वैधता प्रदान करता है, इसलिए उसने राज्य की सत्ता को ही अवैध मानते हुए ऐसे राज्य की परिकल्पना की थी, जहां व्यक्ति कानून की अपेक्षा आत्मसंयम एवं आत्मानुशासन से बंधा हो.

अराजकतावाद की सैद्धांतिकी

अराजकतावाद ऐसा विचार अथवा सिद्धांत है जिसमें कोई समाज बिना सरकारी हस्तक्षेप अथवा मदद के आपसी भाईचारा, एकता और खुशहाली के लिए प्रयासरत रहता है. अराजकतावादी समाज में लोग स्वेच्छा और सहमति की भावना से एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हैं. वहां समर्पण की भावना किसी सत्ता के प्रति न होकर एक-दूसरे के प्रति होती है. उत्पादन का कार्य तकनीक विशेषज्ञों, पेशेवरों, कामगारों के समूह द्वारा किया जाता है, जो लाभ के बजाय सामूहिक हितों के लिए स्वेच्छापूर्वक संगठित होते हैं. एम्मा गोल्डमेन ने अराजकतावाद को परिभाषित करते हुए लिखा है—

अराजकतावाद—नव्य सामाजिक व्यवस्था का दर्शन है, जिसमें मानवीय स्वाधीनता को मनुष्यनिर्मित कानूनों द्वारा सुरक्षितसंरक्षित किया जाता है. इस दर्शन की मूल अवधारणा यह है कि सरकार के सभी रूप हिंसा पर टिके होते हैं, इसलिए वे अनुचित, अनावश्यक एवं हानिकारक हैं.’

अराजकतावाद मनुष्य की स्वाधीनता और समृद्धि दोनों की सुरक्षा चाहता है. वह दर्शाता है कि ‘समाजवाद के अभाव में स्वाधीनता कुछ लोगों का विशेषाधिकार और अनाचार है, जबकि स्वाधीनता के अभाव में समाजवाद दासता और क्रूरता का प्रतीक है. अराजकतावाद के आधार पर अनुशासित समाज में स्वयंसेवी संस्थाएं, समितियां उत्पादन, विपणन, अंतरण, शिक्षा, व्यापार, चिकित्सा, यातायात सहित सभी आवश्यक क्षेत्रों तक विस्तृत होती हैं. आवश्यकता पड़ने पर वे सरकार के श्रेष्ठतर विकल्प के रूप में राजनीतिक निर्णय भी लेती हैं. वे उत्पादन, वितरण, संचार, सफाई, शिक्षा, उपचार, सुरक्षा, प्रबंधन, अंतरण, आवागमन आदि समाजोपयोगी कार्यों के लिए विभिन्न आकार-प्रकार की स्थानीय, क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर की सभी संस्थाओं, संगठनों, संघीय स्वरूपों को परस्पर जोड़े रखती हैं. साहित्य, कला, संस्कृति आदि मानव-रुचि के विभिन्न क्षेत्रों में भी वे समाज के सक्रिय कार्यकत्र्ताओं, संगठनों, जनसमूहों के सहयोग द्वारा परस्पर संबंध बनाए रखती हैं. वे मनुष्य को यह संदेश देती हैं कि पारस्परिक सहयोग और सद्भाव मानवमात्र की आवश्यकता हैं तथा ऐसा कोई भी सुख और संतुष्टि नहीं है, जिसको इनके द्वारा प्राप्त कर पाना असंभव हो. और समाज के पास जो कुछ है, उसपर उसके प्रत्येक सदस्य का अधिकार है.

अराजकतावाद में चूंकि बाहरी सत्ता की पूरी तरह अनुपस्थिति होती है, इसलिए वहां सामाजिक अंर्तद्वंद्वों में खप रही ऊर्जा को अन्य उत्पादक कार्यों में लगा पाना संभव होता है, जिससे अपेक्षाकृत अधिक स्थायी सामाजिक संरचना जन्म लेती है तथा सामाजिक विकास को गति प्राप्त होती है. इस व्यवस्था में उत्पादन कार्य में लगे समूह, लोगों की रुचि एवं आवश्यकता को पहचानकर उत्पादन कर्म में हिस्सा लेते हैं, न कि लाभार्जन की वांछा से. उत्पादन प्रक्रिया में हिस्सा ले रहा व्यक्ति पूरे समाज के प्रति उत्तरदायी होता है, न कि किसी एक व्यक्ति के. एकाधिकारवाद और मनमानी के लिए अराजकतावादी समाज में कोई स्थान नहीं होता, इससे समाज पूंजीवादी समाज की बुराइयों से दूर बना रहता है. वहां उत्पादन के लाभ पर पूरे समूह का अधिकार होता है. चूंकि व्यक्तिमात्र स्वेच्छा और सहयोग भावना से उत्पादनकार्य में हिस्सा लेता है, इसलिए उसकी उत्पादकता अधिकतम होती है. उत्पादन समाज के निर्देशन और आवश्यकता के अनुरूप होने के कारण वहां स्पर्धा का लोप हो जाता है, इससे सामाजिक अंतद्र्वंद्वों में कमी आती है. व्यक्ति को कला, संस्कृति, नैतिकता, आदर्श आदि के मामले में विकास की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करने के अवसर प्राप्त होते हैं. प्रत्येक व्यक्ति चूंकि नैतिकता और आत्मानुशासन की भावना से शेष समाज के प्रति कर्तव्यरत होता है, इसलिए वहां कानून, अदालत, पुलिस जैसी पूंजीवादी समाजों में सभ्यता का प्रतीक मानी जाने वाली व्यवस्थाएं अपनी प्रासंगिकता खोने लगती हैं. उनमें खप रही समाज की ऊर्जा एवं संपदा का उपयोग अन्य रचनात्मक कार्यों के लिए किया जा सकता है. नागरिकों का आपसी विश्वास बढ़ने से तीव्र सामाजिक विकास संभव होता है.

अराजकतावाद समाजवाद की पूरक विचारधारा है. उसकी आर्थिक नीतियां समाजवाद की आर्थिकी से मेल खाती है. भू-संपदा, संसाधनों पर निजी अधिकारिता तथा पूंजीवादी उत्पादन पद्धतियां अपने एकाधिकारवादी सोच के कारण सामाजिक न्याय की भावना के प्रतिकूल कार्य करती हैं. इससे समाज में विशेषाधिकार संपन्न वर्ग पनपने लगता है. परिणामस्वरूप नवीनतम तकनीक, शिक्षा एवं वैज्ञानिक शोधों का लाभ समाज के सीमित वर्गों तक सिमटकर रह जाता है. इससे धन का ऊपरी वर्गों की ओर संचरण होने लगता है. खुली स्पर्धा के अंतर्गत वे लाभ को अपने पक्ष में मोड़े रखते हैं. परिणामस्वरूप समाज में आर्थिक-सामाजिक स्तरीकरण बढ़ता है. अराजकतावादी विचारक मानते हैं कि श्रम एवं मजदूरी की आधुनिक पद्धतियां तथा राज्य के संरक्षण में बने उत्पादन के पूंजीवादी तरीके, समाज के सर्वांगीण विकास में बाधक हैं. इसलिए शक्ति के दम पर टिकी राजसत्ता येन-केन-प्रकारेण शक्तिशाली का ही पक्ष लेती है. इससे समाज में अन्याय की मात्रा बढ़ती है. वे यह भी मानते हैं कि राज्य अपने आरंभ से, अब तक भूमि पर सीमित व्यक्तियों के अधिकार को समर्थन देता रहा है. राज्य की अनुमति पर पूंजीवादी शक्तियां लाभ के बड़े हिस्से को पूंजी में बदलकर उसका उपयोग अपने लाभानुपात को और तीव्रता से बढ़ाने के लिए करती हैं. इसलिए भूमि और उत्पादन पर सीमित लोगों के अधिकार को समर्थन देने वाली सामंतवादी-पूंजीवादी व्यवस्थाओं के साथ-साथ अराजकतावाद को राज्य से भी जूझना पड़ता है, जो सामाजिक असमानताओं को जन्म देने वाली व्यवस्थाओं का पोषण-संरक्षण करता है. अराजकतावाद के लिए इस बात से अधिक अंतर नहीं पड़ता कि सत्ता का स्वरूप कैसा है. तानाशाही अथवा गणतंत्र?

अराजकतावादी विचारक मानते हैं कि सत्ता-शिखर पर विद्यमान लोगों के चरित्र में बहुत अधिक अंतर नहीं होता. राज्य का झुकाव केंद्र की ओर होता है. इसी विशेषता के चलते सुविधाभोगी अल्पसंख्यक लोगों के हाथों में असीमित अधिकार एवं शक्तियां सौंप देता है, जिसका उपयोग वे अपनी सत्ता को अक्षुण्ण रखने के लिए बहुसंख्यक वर्गों के अधिकार हनन के रूप में करते हैं. सत्ता-शिखर पर विराजमान अल्पसंख्यक वर्ग कानून के समर्थन द्वारा उत्पादन, यातायात, खनन, भूमि, बीमा, विपणन, व्यापार समेत आय के समस्त स्रोतों पर अपना अधिकार जमा लेता है. राज्य के संरक्षण में पलने वाला पूंजीवाद नौकरशाही को बढ़ावा देता है, जिससे केंद्रीय सत्ता निरंतर ताकतवर होती जाती है. इससे मुक्ति का एक ही उपाय है, शक्ति और अधिकारों का विकेंद्रीकरण. अतः अराजकतावाद सत्ता, शक्ति एवं अधिकारों के संपूर्ण विकेंद्रीकरण का पक्ष लेता है, ताकि आमजन की शासन में सहभागिता सुनिश्चित की जा सके. यह कतिपय सर्वाधिक पुराना और अकेला राजनीतिक दर्शन है, जो मनुष्य को उसकी चेतना से जोड़ता है. उसके अनुसार ईश्वर, राज्य, समाज जैसे पारंपरिक विश्वास जो अभी तक सामाजिक चेतना को निर्धारित करने वाले प्रमुख कारक रहे हैं, असल में ये बाहर से थोपी गई यथास्थितिवाद की पोषक-समर्थक और अनावश्यक व्यवस्थाएं हैं. नई सामाजिक संरचना का जन्म मनुष्य के स्वेच्छिक और सहयोगात्मक संगठनों के द्वारा ही संभव है.

अराजकतावाद आज का दर्शन नहीं है. भले ही मानवेतिहास में लंबा दौर ऐसा रहा हो जब इसको हेय और निंदात्मक दृष्टि से देखने वालों की खासी संख्या रही हो. लेकिन लगभग प्रत्येक युग और कालखंड में राजसत्ता और धर्मसत्ता समेत किसी भी प्रकार की सत्ता पर प्रश्न उठाने वाले लोग समाज में हुए हैं. भारतीय धर्मग्रंथों में सतयुग भले ही मिथकीय कल्पना हो, लेकिन उसमें भी ‘राज्यविहीन समाज’ की परिकल्पना की गई है. ‘वैराज’ अर्थात ‘बिना राजा का राज्य’ यहां सम्मानित शास्त्रीय परिकल्पना का हिस्सा रहा है. ऋग्वेद में कहा गया था—‘मनुर्भव! ‘मनुष्य बनो!’ ‘रामराज्य’ की परिकल्पना में भले ही ब्राह्मणवादी दृष्टि रही हो, किंतु इसके मूल में समानताधारित समाज की स्थापना का सपना निहित है. महाभारत तक आते-आते साम्राज्यवाद राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा का रूप ले चुका था. लेकिन मनुष्य के प्रति आस्था उस समय में भी विद्यमान थी, तभी तो व्यास ने लिखा है—

इस सृष्टि में मनुष्य से श्रेष्ठतर कुछ भी नहीं है.’

अराजकतावाद यह शिक्षा देता है कि मनुष्य और समाज में इतना ही अंतर है जितना रक्त और धमनियों में. इमर्सन ने कहा था कि इस संसार में काम की एक ही चीज है. एक जीवंत आत्म, जो हर व्यक्ति में मौजूद होती है तथा हर वस्तु पर निगाह रखती है. आत्मरूप होने के कारण ही व्यक्तिमात्र महत्त्वपूर्ण है. अराजकतावाद संसार में एकता और अभिन्नता का संदेश देता है. चूंकि हर व्यक्ति आत्मरूप है, इसलिए सब एक हैं. सभी को समान अधिकार हैं. कोई छोटा है न बड़ा. इस कारण उनमें से किसी भी उपेक्षा संभव नहीं. अतएव आवश्यकता है कि प्रत्येक के कहे का सम्मान हो. प्रत्येक को अपने परिष्कार के बराबर अवसर प्राप्त हों. प्रत्येक के जीवन की महत्ता है. इसको तभी अक्षुण्ण रखा जा सकता है, जब कि उस पर समाज, राज्य, कानून आदि के न्यूनतम दबाव हों. रूसो ने कहा था—मनुष्य स्वतंत्र जन्मा है, पर हर जगह वह बेड़ियों में है. ये बेड़ियां मनुष्य ने कुछ अपने आप पैदा की हैं, कुछ उसी के स्वार्थी बंधु-बांधवों द्वारा पैदा की गई हैं. कुछ प्रसिद्ध बेड़ियों के नाम धर्म, राज्य, संपत्ति आदि हैं, जो मनुष्य की गुलामी के कारक हैं—

इनमें धर्म मानवमस्तिष्क का उपनिवेश है. संपत्ति मानवीय आवश्यकताओं की उपनिवेश है. इसी प्रकार सरकार मानवीय व्यवहार की उपनिवेश है—ये सब मिलकर मानवीय दासता और उसके लिए अन्यान्य डरों का कारण बनते हैं. यहां एक प्रश्न सहज ही उपस्थित हो जाता है कि धर्म! आखिर किस प्रकार यह मानवमस्तिष्क को नियंत्रित करता है? किस तरह से यह आत्मा के उत्पीड़न तथा उसकी अवमानना का कारण बनता है? धर्म कहता है—जो भी है, ईश्वर है, मनुष्य कुछ भी नहीं.’ जबकि इसी ‘नाकुछसे इंसान’ के बल पर ईश्वर ने इस अनाचारी, निरंकुश, कठोर, निर्दयी, आतंककारी, अनमेल सृष्टि की रचना की है. सच तो यह है कि उदासी, आंसू और रक्त मिलकर इस संसार को तब से अनुशासित करते आए हैं, जब से ईश्वर का जन्म हुआ है.’

संपत्ति जो मानवीय आवश्यकताओं का उपनिवेश है, वह मनुष्य के असंतोष को विस्तार देती है. वह कुछ मनुष्यों को यह हौसला भी देती है कि वे दूसरों के सुख की कीमत पर अपने असंतोष का दायरा बढ़ाते रहें. यह हमेशा नहीं था. प्रारंभ में जब सभ्यता का इतना विकास नहीं हुआ था, मानव जीवन पूरी तरह प्रकृति-आश्रित था, तब वह संपत्ति और संसाधनों का भोग करते समय यह ध्यान रखता था कि वे उसके अपने न होकर प्रकृति-प्रदत्त हैं. इसलिए वह प्रकृति के प्रति एक सम्मानभाव से भरा रहता था. अपने साथ वह दूसरों की आवश्यकताओं की चिंता भी करता था. उल्लेखनीय है कि मानवमात्र की कुछ न कुछ आध्यात्मिक जिज्ञासा होती है. धर्म इसी विश्वास को जमीन देता है. सभी व्यक्ति कैसे एक ही आध्यात्मिक विश्वास की ओर प्रेरित हों, कैसे उस जमीन पर संगठित होकर खड़े रहें. इसके लिए धर्म को नैतिकता से जोड़ा गया. चूंकि विराट वसुंधरा पर मनुष्य की चिंताएं एक समान हैं, उनका संघर्ष, सपने और समस्याएं एक हैं, इसलिए विभिन्न धर्मों के आध्यात्मिक विश्वास चाहे जो हों, उनकी नैतिक मान्यताएं आपस में इतनी मेल खाती हैं कि इस आधार पर उनकी पहचान कर पाना अंसभव-सा है. कालांतर में सत्ता और संसाधनों पर कब्जे की होड़ में मनुष्यों के अतिमहत्त्वाकांक्षी वर्ग ने प्रकृतिजन्य वस्तुओं पर भी अपना अधिकार जमाना आरंभ कर दिया. इससे अव्यवस्था फैली, जिसको नियंत्रित करने के लिए कानून, पुलिस, न्यायालय आदि बनाए गए. अराजकतावाद मनुष्य को वही नैसर्गिक परिवेश प्रदान करने के लिए संकल्पबद्ध है. यह मनुष्य की अपनी खोज है जो शताब्दियों लंबी सभ्यता की यात्रा में कहीं गुम हो चुकी है. यह मनुष्य द्वारा अपने व्यक्तित्व को संपूर्णता प्रदान करने का प्रयास है.

अराजकतावाद का पक्ष लेते हुए एम्मा गोल्डमेन ने लिखा है कि संपूर्ण मानवीय व्यक्ति उसी समाज और राज्य में संभव है जो उसको अपने कार्य का चयन, उसकी परिस्थितियों का निर्धारण करने की खुली छूट देता हो. तभी व्यक्ति अपने काम का आनंद ले सकेगा. तभी उसकी अधिकतम उत्पादकता संभव है. यह मुमकिन है उस समय उसकी आर्थिक उपलब्धियां कम रह जाएं. पर उसके माध्यम से जो सामाजिक लाभ होंगे, उनके आगे मौद्रिक लाभ गौण पड़ जाएंगे. इसलिए कि सरकार और शासन मनुष्य को बांधते हैं. वहां व्यक्ति की आवश्यकताओं और भावनाओं को एक ही तराजू पर तौला जाता है; तथा मौद्रिक आमदनी के आधार पर मनुष्य के सुख के स्तर की परिकल्पना कर ली जाती है. ऐसी सुविधाओं और स्पर्धाओं से घिरा मनुष्य कितना एकाकी, निरीह और बेबस होता है, इसका आकलन करने अथवा इसपर अंकुश लगाने के लिए कोई कानून दुनिया के किसी भी देश में आज तक नहीं बन पाया है. निरंकुश व्यवहार हर शीर्षस्थ शक्ति का लक्षण है, शायद इसलिए इमर्सन ने कहा था—

सरकार चाहे किसी भी प्रकार की हो, मूलतः तानाशाही का प्रतीक होती है. यह सवाल पूरी तरह अर्थहीन है कि वह सरकार दैवीय अधिकार द्वारा संचालित है अथवा बहुमत के आधार पर. प्रत्येक परिस्थिति में उसका एक ही उद्देश्य होता है, व्यक्तिमात्र को पूरी तरह अपने अधीन बना लेना.’

आधुनिक युग में भी अराजकतावादी विचारकों की लंबी शृंखला रही है. हेनरी डेविड रूसो, बट्रेंड रसेल, पीटर क्रोप्टोकिन, थोरो, महात्मा गांधी जैसे विचारक राज्य की मनमानी से आहत होकर स्वतंत्र, विवेकवान, स्वअनुशासित समाज की स्थापना पर जोर देते रहे हैं. थोरो ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा था कि प्राचीनकाल से आज तक सरकार सिर्फ अपनी समृद्धि, शक्तिसंपन्नता और सफलता पर जोर देती रही है. हर बार उसकी निष्ठा को संदेहजनक पाया गया है. नियम कभी भी मनुष्य को श्रेष्ठ नागरिक नहीं बनाता. कानून के प्रति सम्मान दर्शाता हुआ व्यक्ति अनायास ही अन्याय की ओर मुड़ जाता है. किसी विद्वान की उक्ति याद आती है. कानून की निस्सारता और उसकी असफलता के बारे में उसका कहना था—

दुनिया के सभी कानून व्यर्थ हैं. इसलिए कि बुरा आदमी उनसे सुधर नहीं पाता और भले को उसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती.’

यह मानते हुए कि सत्तामद में शीर्षस्थ शक्तियां सदैव अकसर अधिकारों का उल्लंघन करने लगती हैं, राज्य की आलोचना करने वाले विद्वानों की संख्या खासी रही है. लियो टॉल्सटाय जैसे महान लेखक, विचारक और महात्मा गांधी जैसे नेता अराजकतावाद के समर्थक रहे हैं. टॉल्सटाय द्वारा महात्मा गांधी को लिखित पत्र ‘लेटर टू ए हिंदू’, जिसने उन्हें सत्याग्रह के लिए प्रेरित किया, पर फ्रांसिसी कवि ला बूइटी का प्रभाव था. उनीसवीं शताब्दी का महान अमेरिकी विचारक-दार्शनिक हेनरी डेविड थोरो राज्यसत्ता के पर कतर देने के पक्ष में था. उसका मानना था—

सरकार वही सर्वोत्तम है जो बिलकुल भी शासन नहीं करती.

थोरो का ‘सिविल नाफरमानी’ का विचार ही आगे चलकर ‘सत्याग्रह’ के रूप में विकसित हुआ था. महात्मा गांधी की ग्राम-स्वराज्य की परिकल्पना भी राज्य की भूमिका को कमतर करने की कोशिश थी. हालांकि भारत में उसको अपेक्षित महत्त्व कभी मिल ही नहीं पाया.

कहा जा सकता है कि अराजकतावाद का लक्ष्य मस्तिष्क को धर्म की अधीनता से, शरीर को संपत्ति की गुलामी से तथा उसकी मानव-स्वातंत्रय को सरकार की हड़कड़ियों, बेड़ियों और अन्यान्य बंधनों से मुक्त कराना है. इस लक्ष्य को पाने के लिए वह नागरिक चेतना का पक्ष लेता है. यह मनुष्य के स्वेच्छिक समूहों के गठन के प्रति आग्रहशील होता है, जो समाजकल्याण की व्यापक लक्ष्य के लिए समूहबद्ध होते हैं. यह मानते हुए कि मनुष्य स्वतंत्र जन्मा है तथा उसको अपनी रुचि के अनुरूप सुखोभोग के सभी अधिकार प्राप्त हैं. इसलिए आवश्यक है कि उसपर न्यूनतम नियंत्रण हों. इसके लिए प्रूधों ने ‘सरकार रहित राज्य’ की अवधारणा प्रस्तुत की थी, जिसके लिए उसने ‘अ-राजकता’ शब्द का उपयोग किया. उसने साम्यवाद का यह कहकर विरोध किया था कि उसमें वैचारिक दुराग्रह के चलते पूरे समाज को मठों और छावनियों में बदल दिया जाता है. वह राज्याश्रित समाजवाद का भी विरोधी था, जिसका समर्थन उसके समकालीन लुइस ब्लेंक जैसे विचारक कर रहे थे. ‘संपत्ति चोरी है’ उक्ति से प्रूधों का आशय था कि संपत्ति अधिकारिता से जुड़े रोमन कानून संपत्ति पर अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकार को मान्यता देते आए हैं. यानी धर्म समाज में व्याप्त आर्थिक विभाजन को न केवल मान्यता देता है, बल्कि पाप-पुण्य, पुनर्जन्म की अपनी व्याख्याओं के आधार पर उसको तार्किक भी ठहराता है. लेकिन इससे मुक्ति कैसे संभव हो? कैसे धार्मिक पाखंड से समाज की रक्षा की जाए, अपने समकालीन विचारकों की भांति प्रूधों के समक्ष भी यह चुनौती थी. मार्क्स ने श्रमिक समूहों का आवाह्न किया कि वे संगठित विरोध द्वारा उत्पादन-तंत्र को अपने अधिकार में ले लें. प्रूधों नहीं चाहता था कि जमींदारों, खान मालिकों, कारखानेदारों आदि को बेदखल करने के लिए हिंसा का उपयोग किया जाए. हिंसा किसी भी मुक्त समाज के लिए वरेण्य नहीं है, इसलिए उसने उस राज्यसत्ता की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किए जो ऊंच-नीच और आर्थिक विषमता को अधिमान्य ठहराती है. उसने संपत्ति पर सामूहिक अधिकारिता के विचार का समर्थन किया जो उन दिनों समाजवादियों की प्रमुख मांग थी.

समाज के संसाधनों को सामूहिक अधिकारिता की परिधि में कैसे लाया जा सकता है? संपत्ति को लाभ की अवधारणा से मुक्त करके यह संभव है—प्रूधों का सुझाव था. बैंकों में जो धनराशि हो, वह पूरी तरह ब्याजमुक्त रहे. अपना प्रशासनिक खर्च निकालने के लिए बैंक अधिक से अधिक एक प्रतिशत वार्षिक ब्याज ले सकते हैं. इससे बैंकों से ऋण प्राप्त करना सुविधाजनक होगा. इसके लिए उसने बैंकों के राष्ट्रीयकरण का सुझाव देते हुए आपसी सहमति के सिद्धांत का पक्ष लिया था. यही व्यवस्था अन्य उद्योगों, काम-धंधों के लिए भी संभव है. लाभ की कामना से मुक्ति के लिए आवश्यक है कि उत्पादन में जुडे़ समूह अपने उत्पाद का विपणन न कर, आपसी समझौते के आधार पर आदान-प्रदान की नीति को अपनाएं. जिसके पास जो वस्तु अपनी आवश्यकता से अधिक है, वह अपनी जरूरत की अन्य वस्तुओं के आधार पर उनका दूसरे उत्पादक समूहों के साथ आदान-प्रदान करे. आदान-प्रदान का स्वरूप तय करने के लिए प्रत्येक वस्तु में लगे श्रम को कार्यघंटों में बांट दिया जाए. उन्हीं श्रमघंटों के आधार पर लोग अपनी आवश्यकता की वस्तुओं का लेन-देन करें. पारस्परिक सहमति की इस व्यवस्था में सभी सेवाओं को बराबर आंका जाएगा.

प्रूधों का विश्वास था कि समाज में धन को अत्यधिक महत्त्व मिलने से लोगों में उसको अतिरिक्तरूप से अर्जित करने की चाहत पैदा होती है. इससे समाज में स्पर्धा बढ़ती है तथा मुनाफाखोरी भी. धन को लाभ की वांछा से मुक्त कर दिए जाने से समाज में उसका महत्त्व घटेगा, जिससे आर्थिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त कर पाना आसान होगा. इस आधार पर गठित समाज में राज्य की भूमिका गौण होगी. संबंध पारस्परिक सहयोग और सद्भावना पर आधारित होंगे. क्या ऐसा समाज विवादों और आपसी अंतद्र्वंद्वों से सर्वथा मुक्त होगा? प्रूधों का मानना था कि मानवीय कमजोरियां वहां भी होंगी. इसके समाधान हेतु उसका सुझाव था कि अराजकतावाद पर आधारित समाज में विवादों का निपटान आपसी समझौते के आधार पर किया जाएगा. परस्पर समर्पित, स्पर्धाविहीन समाज में पुलिस, कानून, न्यायालय आदि की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. अराजकतावाद के प्रति पू्रधों की निष्ठा उसकी पुस्तक ‘व्हा॓ट इज प्रापर्टी’ के इस संवाद से समझी जा सकती है—

 

क्यों, आप यह सवाल कैसे कर सकते हैं? आप तो गणतंत्रसमर्थक हैं.’

गणतंत्र समर्थक, ठीक है, लेकिन इस शब्द से कुछ साफ नहीं होता. ‘रिपब्लिक’ यानी ‘रेस पब्लिका’ के मायने हैं, जनता से संबंधित मुद्दा. ऐसा कोई मसला जिसका लोकहित से सचमुच संबंध हो, वह न तो इस शब्द की सीमा में आता है, न उस सरकार के जो स्वयं के ‘रिपब्लिकन’ होने का दावा करती है. इस शब्दार्थ के अनुसार तो एक तानाशाह सम्राट भी स्वयं को गणतंत्रवादी कह सकता है.’

समझ गया, तुम प्रजातंत्र समर्थक हो?’

नहीं.’

क्या! क्या तुम्हारा विश्वास राजशाही में है?’

यह भी नहीं.’

संविधानवादी हो?’

भगवान माफ करे!’

अच्छा! तब तुम जरूर कुलीनतंत्र में विश्वास करते होगे?

कतई नहीं.’

क्या तुम चाहते हो कि मिलीजुली बने?

इससे भी कम.’

तुम आखिर चाहते क्या हो?’

मैं अराजकतावादी हूं.’

अराजकतावादी! तुम अवश्य ही परिहास रहे हो. वरना यह तो सरकार पर प्रहार करने जैसा है.’

कदापि नहीं! मैंने बस वही कहा है जो मैं एक मनुष्य के रूप में सोचता रहा हूं. मैं अनुशासन का कट्टर समर्थक हूं, लेकिन कुल मिलाकर हूं एक अराजकतावादी ही.’

प्रूधों के बाद अराजकतावाद की सैद्धांतिकी को आगे बढ़ाने वाले विद्वानों-आंदोलनकारियों में महत्त्वपूर्ण नाम है—मिखाइल बकुनिन(30 मई, 1814—1 जुलाई, 1876) का. मार्क्स के समकालीन बकुनिन की उससे कई मुद्दों में गहरी असहमति थी. हालांकि दोनों ही पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से मुक्ति चाहते थे. दोनों का ही रुझान समाजवाद की ओर था. दोनों ने ही फ्रांस की समाजवादी क्रांति में हिस्सा लिया था. प्रथम इंटरनेशनल की बैठक के दौरान उनके मतभेद खुलकर सामने आए थे, जो प्रकारांतर में उसकी असफलता का कारण भी बने. मार्क्स जहां श्रमिक वर्ग की अधिसत्ता में विश्वास रखता था, वहीं बकुनिन किसी भी प्रकार की सत्ता को मनुष्यता के लिए घातक मानता था, इसलिए उसने अराजकतावाद का समर्थन किया, किंतु मार्क्स की बौद्धिक प्रतिष्ठा के आगे बकुनिन के विचार अपना अपेक्षित प्रभाव न छोड़ सके. अपने अतिसक्रिय जीवन में उसने श्रमिकों और दासों की मुक्ति के लिए एक गोपनीय संगठन ‘इंटरनेशनल ब्रदरहुड’ का गठन किया था, जिसमें फ्रांस, इटली, स्केंडनेविया, स्वीडन, नार्वे, डेनमार्क, बेल्जियम, इंग्लेंड, स्पेन, पोलेंड, रूस आदि देशों के दास और श्रमिकसंगठन सम्मिलित थे. वह राजसत्ता की भांति धर्मसत्ता को भी मनुष्य की पराधीनता का कारण मानता था. अपने निबंध ‘केटकिज्म आफ ए रिवोल्युशनरी’ में उसने धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों का यह कहकर विरोध किया था कि—

किसी भी प्रकार की सत्ता के किसी भी रूप, जिसमें राज्य की सुविधा के नाम पर नागरिकों की स्वतंत्रता न्योछावर करा ली जाती है, का संपूर्ण निषेध.’

बकुनिन की आस्था समाजवाद में थी, किंतु समाजवाद की संरचना किसी गुलाम समाज में संभव नहीं, ऐसे समाज में भी वह असंभव है, जहां अभिव्यक्ति के अधिकार को बाधित किया जाता है. इसलिए बकुनिन स्वाधीनता के बगैर समाजवाद को दिवास्वप्न मानता था. उसका कहना था कि—

बगैर समाजवाद स्वाधीनता कुछ लोगों का विशेषाधिकार और अन्याय है, जबकि समाजवाद के बिना स्वाधीनता दासता और पाशविकता.’

मिखाइल बकुनिन ने श्रमिकों का आवाह्न किया था कि वे अपने उत्पादन संगठन बनाएं तथा उत्पादन कार्य को अपने हाथ में ले लें. उत्पादन, शिक्षा, अर्जन, भोजन, आवास आदि के साधन सामूहिक होने चाहिए. प्रत्येक बालक को चाहे वह लड़का हो अथवा लड़की, भोजन, वस्त्र, शिक्षा, आदि के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए. बड़ा होने पर उसको अपनी रुचि का व्यवसाय चुनने, सम्मानजनक ढंग से आजीविका कमाने का अवसर मिले, ताकि वह अपनी स्वाधीनता और श्रम का भरपूर आनंद ले सके. कुछ अराजकतावादी स्वाधीनता को समानता की अपेक्षा अधिक महत्त्व देते थे. यहां तक कि स्वाधीनता के पक्ष में वे समानता के लक्ष्य को टालने के भी समर्थक थे. बेंजामिन टुकर ने कहा था कि समानता हमें चाहिए—

यदि हम इसको प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन स्वाधीनता हमें किसी भी कीमत पर चाहिए.’

समानता सहकारिता का अभीष्ठ है. सहकारी समूह अपने सदस्यों के बीच हर तरह की समानता का पक्ष लेता है. स्वाधीनता के अभाव में स्वैच्छिक सहयोग असंभव है. इसलिए अजारकतावादी का सहकार एवं समाजवाद का समन्वित रूप था. मार्क्स के साम्यवाद से थोड़ा अलग. हालांकि दोनों का ही लक्ष्य राजनीति और अर्थव्यवस्था को समाजवादी भावना के अनुरूप ढालना था. उसके सिद्धांत को ‘सांगठनिक अराजकतावाद’ कहा जाता है.

अराजकतावाद के सिद्धांत के आधार पर किसी प्रथक राज्य का गठन तो नहीं हो सका, तो भी उनीसवीं शताब्दी के बाद से ही यह यह दर्शन परिवर्तनकामी विचारकों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों को आकर्षित करता रहा है. विलियम थांपसन, मिखाइल बकुनिन, लियो टाल्सटाय, जॉन ग्रे, जे. एफ. फ्रे. जोसीह वारेन, एडवर्ड कारपेंटर, फ्रैड्रिक नीत्शे, जॉन स्टुअर्ट मिल, लार्ड गैरीसन, हेनरी डेविड थोरो, एम्मा गोल्डमेन, स्पेंसर, पीटर क्रोप्टकिन, नोम चामस्की, महात्मा गांधी, भगत सिंह आदि उनीसवीं-बीसवीं शताब्दी के अनेक महत्त्वपूर्ण विचारक, नेता, साहित्यकार अराजकतावाद का समर्थन करते आए हैं. अराजकतावाद का पूरक सिद्धांत ‘स्वाधीनतावाद’ तो बीसवीं शताब्दी के प्रायः सभी महत्त्वपूर्ण लेखकों, साहित्यकारों का सर्वाधिक पसंदीदा विषय रहा है.

इकीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में अराजकतावाद ने अपने पंख फैलाए हैं. इन दिनों विश्व का सबसे बड़ा अराजकतावादी आंदोलन स्पेन में चल रहा है. वहां ‘नेशनल कन्फेडरेशन आ॓फ लेबर’(1910) तथा ‘जनरल कन्फेडरेशन आफ लेबर(1979) नामक अराजकतावाद समर्थकों के दो बड़े संगठन हैं. इनमें नेशनल कन्फेडरेशन आ॓फ लेबर के सदस्यों की संख्या लगभग 50000 है, जबकि दूसरे संगठन की सदस्य संख्या 2003 में 1 लाख से ऊपर थी. इसके अलावा अमेरिका, फ्रांस, इटली आदि देशों में भी अराजकतावाद के समर्थक विचारकों, लेखकों, संगठनों की अच्छी-खासी संख्या है. आदर्श के सर्वाधिक निकट होने के बावजूद अराजकतावाद विश्व-समाज में अपना सम्मानजनक स्थान बना पाने में असमर्थ रहा है. इसका कारण यह हो सकता है कि सहस्राब्दियों से राजशाही, सामंतवाद तथा अन्यान्य व्यवस्थाओं के अनुशासन में स्वयं को ढालने में अभ्यस्त हो चुका जनसमाज, बिना सत्ता के राज्य की कल्पना ही नहीं कर सकता. ऐसे लोगों के लिए अराजकता आज भी नकारात्मक स्थिति है. दूसरे धर्म के सामंती ढांचे में बंधे समाजों की मानसिकता समर्पण की होती है, जो आत्मचेतित समाज के राजदर्शन ‘अराजकतावाद’ के विरुद्ध जाती है. इसलिए अराजकतावाद को यदि जनमानस में अपनी व्यापक पैठ बनानी है तो उसको बड़े स्तर पर लोक-प्रबोधीकरण का आंदोलन खड़ा करना होगा, जो मनुष्य के उपभोक्ताकरण जिसमें पूंजीवाद के प्राण बसते हैं—के सर्वथा विरुद्ध है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1 टिप्पणी

Filed under समाजवाद के आधुनिक विकल्प

One response to “अराजकतावाद (अनार्किज्म)

  1. मैं आप से् संपर्क करना चाहता हूँ। – राजकिशोर, truthonly@gmail.com

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