बालक का मन

प्यार के नाम के बहाने

घरपरिवार के बीच बच्चों को हम अक्सर उनके असली नाम से नहीं पुकारते. अपने संबोधन को प्यार का विशेषण देते हैं. फिर टीलू, गीलू, मोनी, टोनी, अंजा, बंजा, बेली, जेली जो शब्द हमें पसंद हो, उसे बच्चों पर लाद देते हैं. असली नाम के लिए लोग पंडित के पास जाते हैं. परिजनों, मित्रों तथा रिश्तेदारों की सलाह लेते हैं. सुप्रसिद्ध हस्तियों के नाम जहन में लाते हैं. पुस्तकों, दूरदर्शन धारावाहिकों, फिल्मों के नायकनायिकाओं को याद करते हैं. अपने लाडले या लाडली के अदद नाम के लिए हम हरचंद कोशिश करते हैं. नाम ऐसा जो एकदम नया हो, अनूठा इतना कि किसी ने सुना तक न हो. जिसका अर्थ बूझने में भी मश्क्कत करनी पड़े. आजकल तो सजेसंवरे नामकोश भी आने लगे हैं, ऊपर से इंटरनेट है. बालक का असली नाम तय करने के लिए जितना परिश्रम और खोजबीन की जाती है, उसका शतांश भी घरेलू नाम के लिए नहीं किया जाता. रोजमर्रा के संबोधन के चयन हेतु हमारी नीतिरीति पूर्णतः भिन्न होती है. उस समय हम केवल अपने मुखसुख का ध्यान रखते हैं. ऐसा नाम जिसे बोलने में जराभी कष्ट न उठाना पड़े. परिजनों, रिश्तेदारों द्वारा रखे गए नामों की संख्या कभीकभी एकाधिक भी हो जाती है. उस अवस्था में बालक को न केवल सभी नामों को अपने अवचेतन में सुरक्षित रखना पड़ता है, बल्कि नाम विशेष द्वारा संबोधित करनेवाले व्यक्ति को भी स्मरण रखना पड़ता है.

मातापिता बच्चे का असली नाम ऐसा रखते हैं जो दूसरों से हटकर जान पड़े, अनूठा, अनसुना और विरल हो. जो उनके अलावा दूसरों को भी पसंद आए. सुनते समय बालक अच्छा और सम्मानित महसूस करे. मगर घरेलू नाम चुनते समय वे केवल और केवल सहजता पर जोर देते हैं. सहजता भी ऐसी जो केवल उन्हें सुख प्रदान करती हो. घरेलू नाम असली का लघु संस्करण भी हो सकता है. जीवन के आसान रास्तों की खोजने वाली मानववृत्ति की सहज, स्वाभाविक खोज. सामान्यतः यह मान लिया जाता है कि बालक को उसके पूरे नाम से हर समय पुकारा जाना न तो संभव है, न ही जरूरी. इसी सोच के साथ असली नाम को दबानिचोड़कर गुठलीसम कर दिया जाता है. इस कोशिश में आलोक ‘अलू’ बन सकता है, मानसी‘मुन्नु’. एक जमाना था जब लोग कसरत करते थे. बड़ीबड़ी मूंछें बढ़ाते थे. तब लोगों के व्यक्तित्व की भांति नाम भी भारीभरकम रखे जाते थे. दरयाब सिंह दलपत, सूबेदार सिंह सिंघानियां वगैरह….अब नई तकनीक का जमाना, नया चलन है. भारीभरकम पिक्चर ट्यूब वाले टेलीविजन और भाप के इंजन की तरह भारीभरकम नाम भी जिंदगी और बाजार दोनों से गायब हो चुके हैं. पढ़ेलिखे लोगों की जुबान पर लंबे नाम चढ़ ही नहीं पाते. मातापिता हल्काफुल्का, नाजुकसा नाम रखते हैं. पर जो रखते हैं, उसे भी पूरी तरह पुकारना उन्हें कठिन लगता है. प्यार का नाम कहकर बच्चे पर मनमाना संबोधन थोप देते हैं. ऐसे संबोधन को बालक कितने प्यार से लेता है? उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है? बालक के व्यक्तित्व पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है? ये बातें कभी उनके दिमाग में नहीं आतीं. न कभी हम यह सोचते हैं कि अगर वही संबोधन उनके मातापिता द्वारा उन्हें दिया गया होता तो कैसा लगता? या जो उपनाम उन्हें दिए गए थे, उन्हें सुनकर वे कैसा महसूस करते थे?

नाम का सरलीकरण अथवा संक्षिप्तीकरण केवल परिवार द्वारा नहीं होता. बड़े परिवार के रूप में समाज भी यही काम करता है. दोनों में अंतर है तो इतना कि मातापिता जहां मुखसुख के लिए अतिरिक्त नाम जोड़ देते हैं, वहीं समाज असली नाम को कसरगड़कर अनुकूलित कर लेता है. वहां व्यक्ति की आर्थिकसामाजिक हैसियत बहुत मायने रखती है. आदमी रसूखवाला हो तो नाम में कांटछांट करने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ती. उल्टे नाम को खींचखांचकर लंबा कर दिया जाता है. लोगों के दिलों में सम्मान भले हो या न हो, पर नाम के साथ मानसम्मान साफ नजर आना चाहिए, यह कोशिश निरंतर बनी रहती है. जनसाधारण के साथ ऐसा नहीं होता. समाज अक्सर उससे सौतेला व्यवहार करता है. लोगों की जुबान पर घिसकरघिसकर फतेहचंद ‘फत्तु’ रह जाता है, ‘किरोड़ीमल’ ‘कुर्री’. इस तरह उनके व्यक्तित्व का अवमूल्यन उसके नामोच्चारण के साथ ही होने लगता है. अभिजन वर्ग की इस चालाकी को सामान्यजन भलीभांति समझते हैं. मगर विभिन्न प्रकार के दबावों के बीच वे कुछ कर नहीं पाते. ये विशेषताएं किसी न किसी रूप में प्रत्येक समाज में पाई जाती हैं.

इसके पर्याप्त उदाहरण हैं कि मातापिता, संबंधियों द्वारा प्यार से दिया गया नाम बच्चे को उतना प्यारा नहीं होता, जितना उन्हें स्वयं को प्यारा होता है अथवा जैसा वे सोचते हैं. नाम के सरलीकरण को लेकर बालक अक्सर भावनात्मक दोहन का शिकार होता है. बल्कि कई बार तो खासा क्षुब्ध भी. घरेलू नाम चूंकि बड़ों के स्नेहप्रदर्शन का बहाना होता है, और ऐसा प्रायः सभी के साथ होता है, इसलिए व्यवहार में ऐसे सरलीकरण को स्वीकार करने के अतिरिक्त बालक के पास दूसरा कोई रास्ता नहीं होता. पर यह समझौता मन से किया गया समझौता नहीं होता. बेमन का समझौता कालांतर में आदत बन जाता है. आदत सहते जाने की, अप्रिय का प्रतिकार न करने और समझौतापरस्ती की. बचपन चूंकि अत्यधिक संवेदनशील अवस्था है, इसलिए नाम चुनने में हुई लापरवाही बालक को कुंठा, तनाव तथा आत्मविश्वास की कमी की ओर ले जाती है. साहित्य अकादमी में उपसंपादक देवेंद्र कुमार देवेश बताते हैं कि उनका पांच वर्षीय बेटा उस समय बुरी तरह नाराज हो जाता है जब पड़ोस की लड़की उसे उसके असली नाम से न बुलाकर ‘जॉज’ कहती है. उस लड़की को यह नाम भला लगता है. उस बच्चे को वह अतिशय प्यार करती है. बावजूद इसके बालक पर इस संबोधन का एकदम उल्टा असर होता है. वह स्वयं को अपमानित महसूस करता है. यह इकलौता उदाहरण नहीं है. खोजने पर हजारों मिल जाएंगे. एक आपबीता किस्सा भी है. चूंकि यह आलेख उसी घटना की परिणति है, इसलिए सनद के रूप में वह ज्यों की त्यों प्रस्तुत है.

ईशान हमारे परिवार में तीसरी पीढ़ी का सदस्य है. उसने इसी चार सितंबर को दो वर्ष तीन महीने पूरे किए हैं. यह घटना करीब दो महीने पहले की है. तब वह दो वर्ष एकसवा महीने का रहा होगा. शरारत में वह दूसरे बच्चों जैसा ही है. घर में हम उसको ईशू कहते हैं. खानेपीने का ज्यादा शौकीन उसे नहीं है. बस साथ खेलने वाला चाहिए. पेट खाली हो तो भी उसका खेल चलता रहता है. ईशू को उस समय बहुत सुख मिलता है जब हम किसी वस्तु से उसका नाम जोड़ देते है. जैसे घर ईशू का है, गाड़ी ईशू की है, मोटर साइकिल ईशू की है वगैरह. ऐसे क्षणों में उसके चेहरे की दीप्ति देखते ही बनती है. उसके अधिकारक्षेत्र में कोई नया नाम जुड़े तो उसकी हंसी दूरदराज की हवा को भी उमंगित कर जाती है.

उस दिन मजाक में ही ईशान को ‘छुटकू’ कहा तो उसकी आश्चर्यजनक प्रतिक्रिया थी

छुटकू नईं दादू….’ वह मचल उठा.

छुटकू तो बहुत अच्छा नाम है….तुम छोटे हो नाम भी छुटकू रख लेते हैं….?’ मैंने छेड़ा था.

नईं….दादू, छुटकू नईं….’ मुझे लगा कि शायद कुछ गलत समझ रहा है. भला दो वर्ष का बालक कैसे समझेगा कि उसका कौनसा नाम अच्छा है. कौनसा बुरा! इसलिए मैंने उसी से पूछा—

क्या तुम्हें ‘ईशू’ कहा जाए….?’ इस संबोधन को वह अच्छी तरह पहचानता है. पर उस दिन मानो उसका अस्मिताबोध प्रबल था, सो तुरंत नट गया—

नईं….ईशान!’

ईशू!’

ईशान…..!’ उसने जोर देकर कहा.

उसके कुछ देर बाद उसको ईशू कहकर संबोधित किया गया तो उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. शायद वह समझता था कि हमें यही पसंद है. यह सोचकर कि उस दिन जो हुआ कहीं महज संयोग ही न हो. बालक हमारे शब्दों का अर्थ ही नहीं समझ पाया हो, सो तीसरेचैथे दिन मैंने उसे फिर टोक दिया—

अरेरे! मेरा छूटकू….’ मैंने प्यार से आमंत्रित किया. वह खुशीखुशी आगे बढ़ा. लेकिन दिमागी सजगता पहले जैसी ही थी. जैसे हमारी एकएक चाल पर नजर हो—

छूटकू नईं, दादू.’ वह पास आतेआते मचला.

हमें तो यही अच्छा लगता है….’

नईं दादू!’

फिर क्या कहें?’

ईशान….’

यह आगे भी आजमाया गया. उसका हर बार एक ही उत्तर था—‘छुटकू नईं, दादू!’

इस घटना से पता चलता है कि बालक आत्मसम्मान का भूखा होता है. फ्रायड, जीन पिगेट, फिलिप ऐरिस, पीटर हंट आदि विद्वानों ने बालअस्मिता की विस्तार से चर्चा की है. बीसवीं शताब्दी के महान बालमनोवैज्ञानिक जीन पीगेट के अनुसार बालक का विकास अहंकारोन्मुखता(Egocentrism) से समाजोन्मुखता (Sociocentrism) की ओर बढ़ता जाता है. चूंकि बालक नैतिकता के पहले पायदान पर होता है, इसलिए उसके व्यवहार में कोई दुराव भी नहीं होता. बालक के जो मन में होता है, वही व्यवहार में. कारण साफ है कि अपने अस्तित्व के प्रति वह अतिरिक्तरूप से सजग होता है. इसको जानना है तो कुछ देर बालक की गतिविधियों का अवलोकन कीजिए. उसका अहंबोध स्पष्ट नजर आने लगेगा. जैसे—शिशु का पसंदीदा खिलौने के लिए आग्रह करना, न मिलने पर मचलना, जिद करना. छीनाझपटी करना. जो प्यारभरा व्यवहार करे उसे ज्यादा महत्त्व देना. डराए, धमकाए तो पास पहुंचने पर मुंह फेर लेना. इन गतिविधियों में बालक का अहंभाव साफ झलकता है. वह चाहता है कि बड़े केवल अपनी न चलाएं. उसकी भी सुनें. उसकी उपस्थिति को भी उतना ही महत्त्व दें. बालक को अपनी बात मनवानी हो, मातापिता पर दबाव बनाना हो तो वह रोने लगता है. रोना केवल कमजोरी या अभाव की स्थिति नहीं है. फिर क्या कारण है कि कोई व्यक्ति लोकभाषा के स्थान पर प्राकृतिक संकेतों का प्रयोग करता है. रोेने के बजाय सीधे वह नहीं कह देता जो उसका उद्दिष्ट है. इसका एकमात्र कारण लोकभाषा का अपर्याप्त ज्ञान नहीं है, क्योंकि बड़ा होने पर जब वह भाषायी उपकरणों को जानने लगता है, उस समय भी रोनारूठना जैसे मनोभाव दबाव के तौर पर प्रयुक्त किए जाते हैं. इसका प्रमुख कारण है, अभिव्यक्ति सामथ्र्य और आत्मविश्वास की कमी. बालक को लगातार दबाने, शब्दों का सही संस्कार न देने से वह भाषायी उपकरणों से अनभिज्ञ बना रहता है. परिणामस्वरूप उसका अभिव्यक्तिसामथ्र्य अविकसित रह जाता है और वह कुंठित रहने लगता है. तब अजनबियों को लेकर डर, संकोच और हीनताबोध जैसे नकारात्मक भाव उसके दिमाग में जगह बना लेते हैं. अगर बालक का विकास मुक्त परिवेश में हो, उसे अपना पक्ष विश्वास के साथ प्रस्तुत करने का प्रशिक्षण दिया जाए, तब वह अपने मनोभावों को बिना किसी झिझक के और स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करेगा. रोनेरूठनेजिद के नैसर्गिक भाषा संकेतों की जरूरत ही नहीं पड़ती.

जीन पिगेट का मानना था कि दुनिया के बारे में बालक के निष्कर्ष उसके अपने अवलोकन पर आधारित होते हैं. उसका सोच हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक वैज्ञानिक और तार्किक होता है. उसका अपना नैतिक संसार होता है, न्यायअन्याय, उचितअनुचित का निर्णय उसका अपना होता है. बालक का नैतिक संसार जरूरी नहीं वही हो जिसके बारे में उसके मातापिता या गुरुजनों ने बताया है. वह उससे एकदम अलग, यहां तक कि उल्टा भी हो सकता है. इसी कारण कभीकभी वह अपने तर्कों से आपको निरुत्तर भी कर सकता है. यही उसके अहंबोध का कारण है. इसलिए शरीर से भले ही दूसरों पर आश्रित नजर आए, दिमाग में बड़ीबड़ी बातें भी न आती हों, जुबान अक्सर तुतला जाती हो, लेकिन अपने विवेकबोध में वह पूरी तरह स्वतंत्र और अस्मिता की सुरक्षा के लिए सदैव सजग होता है. हालात से समझौता करना यदि मजबूरी न हो तो मानसम्मान के मामले में वह खुद को बड़ों से कम नहीं आंकता. जन्म के तुरंत बाद वह अपनी स्वतंत्रता की अनुभूति करने लगता है. इस बोध को न तो सामाजिक संस्कार पूरी तरह मिटा पाते हैं, न ही धार्मिकनैतिककानूनी मर्यादाएं. हालांकि शारीरिक अःशक्तता उसे दूसरों पर निर्भर बनाती तथा उनसे तालमेल बनाए रखने को विवश करती है. परिवार के बीच रहकर वह मान लेता है कि सामंजस्यीकरण समाजीकरण की अनिवार्य स्थिति है. इसलिए वह परिवार और शेष समाज दोनों से तालमेल बनाए रखने की कोशिश करता है. कालांतर में सामाजिक अनुकूलन की प्रक्रिया के बीच बालक जैसेजैसे समाज से सामंजस्य स्थापित करता है, उसका अस्मिताबोध नएनए जन्मे सामाजिकबोध के नीचे दबने लगता है.

स्वातंत्र्यबोध और अस्मिताबोध परस्पर पूरक हैं. स्वातंत्र्यबोध राष्ट्रसमाज में अधिकारों और अवसरों की समानता को दर्शाता है, जबकि अस्मिताबोध समाज में अपनी हैसियत के प्रति विनम्र विश्वास से है. अवसर मिलने पर पर स्वतंत्रताबोध ही अस्मिताबोध के रूप में विकसित होता है. इसी अस्मिताबोध के चलते बालक अपनी पसंदों पर जोर देता है और जो नापसंद हो उसका विरोध करता है. बशर्ते उसको इसका अवसर दिया जाए. उसका विकास खुले वातावरण में हो. लेकिन मातापिता को जल्दी होती है, बालक को अपने समाज के, परिवेश के रंगढंग में ढाल देने की. इसलिए बालक की मर्जी क्या है, किसी मुद्दे को लेकर वह स्वयं क्या सोचता है, यह जानने और इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का प्रयास नहीं किया जाता. इसलिए जब भी कोई प्रतिकूल अवसर होता है या उसको विषम परिस्थिति से गुजरना पड़ता है, तब स्वतंत्र निर्णय लेने का अभ्यस्त न होने के कारण वह प्रायः चुप्पी भी साध सकता है. यदि उसको अभिव्यक्ति का पूरा अवसर दिया जाए तो वह एक परिपक्व व्यक्ति की तरह व्यवहार करेगा. यदि कोई बात उसे नापसंद है तो एक स्वतंत्र और विवेकवान नागरिक की भांति उसका यथासंभव प्रतिवाद भी करेगा. डर, संकोच अथवा अभ्यास की कमी से यदि वह अपने मन की बात को साफसाफ नहीं कह पाता, सच कहने में किसी कारण चूक जाता है, और मातापिता उसके निर्णयसामथ्र्य को बढ़ावा देने पर यदि जोर नहीं देते हैं तो उसके मानसिक विकास के अवरुद्ध होने की पूरी संभावना होती है. तब यह मान लेना चाहिए कि बालक को उसके स्वतंत्र विकास के लिए जिन अवसरों की आवश्यकता थी, वे उसको नहीं मिल पाए हैं. उस अवस्था में बालक कुंठा का शिकार भी हो सकता है. इसलिए चाहे शिक्षक हो या बालसाहित्यकार, जो भी बालक के संपूर्ण चारित्रिक विकास की कल्पना करता है, उसके लिए आवश्यक है कि बालक के अस्मिताबोध को कमजोर न पड़ने दे. परंतु क्या ऐसा हो पाता है? असल में बालक के अस्मिताबोध को न समझ पाने के कारण बड़े साहित्यकार भी बालक को निरा बालक समझने की भूल करते रहे हैं. प्यार के नाम पर उपनामकरण और उसके लिए केवल अपनी पसंद को बालक पर थोप देना इसी का हिस्सा है.

बालसाहित्यकार भी इस प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हैं. यथार्थबोध के नाम पर वे भी रचना में उपनामों से काम चलाने की कोशिश करते हैं. वे पात्रों के नाम ही ऐसे रखते हैं जो उपनाम सरीखे हों. हिंदी के एक वरिष्ठ बालसाहित्यकार हैं. विदेशों में घूम आए हैं. उनकी कुछ बालकविताएं तो सचमुच गजब हैं. उनकी हाल की बालकहानियों में पात्र ‘लूलू’ से मिला जा सकता है. ‘लुलु’ अतिसामान्य लड़का होता है. कबाड़ी या ऐसा ही कुछ और. रेंगती हुई जिंदगी का प्रतिनिधि. गांव में ‘लुलु’ जमीन पर रेंगने वाले की ड़े को कहते हैं. कहानी में यह शब्द जुगुप्सा पैदा करता है. यह ठीक है कि बालपाठक कथानायक के नाम से उसकी हैसियत का अंदाज लगा लेता है. इससे उसके दिमाग में यह बात और गाढ़ी हो जाती है कि नाम और व्यक्तित्व का गहरा भेद होता है. इसलिए उपनाम के जरिये यदि कोई ऐसावैसा, निस्सार शब्द उसपर थोपा जाए तो वह उसपर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालता है. साहित्यिक रचना विशेषकर बालसाहित्य में कथापात्रों के नाम का अत्यधिक महत्त्व होता है. लेकिन बालक जो समाज की वर्ग संरचना से करीबकरीब अनजान होता है, उसे होना भी चाहिए, उसके लिए नामकरण ऐसा होना चाहिए जो सामाजिक स्तरीकरण से मुक्त नजर आए. कहा जा सकता है कि कहानी में कहानीपन और कहने का अंदाज देखना चाहिए. परंतु मेरा मानना है कि नामकरण की भी अपनी दृष्टि होती है. तभी तो मनुस्मृति में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के नामकरण का अलगअलग विधान दिया गया है. हम कभी नहीं सोचते कि हमारे द्वारा प्यार के नाम पर रखे गए ऊलजुलूल नाम सुनकर बालक पर क्या गुजरती होगी.

इसका यह अभिप्राय नहीं है कि मातापिता और अभिभावक गण बालक को पसंदीदा संबोधन देना ही छोड़ दें. जीवन केवल बुद्धि द्वारा ही नियंत्रित नहीं होता, उसे दिशा देने के लिए संवेदनतत्त्व भी अनिवार्य है. अतः ऐसा प्रत्येक कार्य या संबोधन तो मातापिता, परिजनों और बालक के संबंधों को आत्मीय और करीबी बनाए, वह जायज है. उसका सम्मान किया जाना चाहिए. लेकिन वह संबोधन ऐसा होना चाहिए जो घरपरिवार और समाज के बीच बालक के मानसम्मान की रक्षा करे, जिससे उसका व्यक्तित्व निखरकर सामने आए. गरिमाहीन, अर्थहीन और बालक के अहंबोध को चोट पहुंचाने वाले संबोधनों से जितना हो सके दूर ही रहना चाहिए. यह ध्यान रखना चाहिए कि आने वाला समय अधिक चुनौतीपूर्ण होने वाला है. उसका सामना विखंडित मानस द्वारा संभव नहीं है. अतएव मातापिता और समाज का कर्तव्य है कि वे बालक के व्यक्तित्व निर्माण और उसके बहुमुखी विकास के लिए यथासंभव प्रयास करें. मातापिता का काम बालक पर अपनी पसंदे और सपने सौंपना नहीं है. बल्कि उनका कर्तव्य बालक को भविष्य के नागरिक के रूप में तैयार करना है.

बड़ों द्वारा कथित प्यार के नाम दिया गया नाम बच्चे को कैसा लगता है, इस पर शोध होना चाहिए. एक शोध इस विषय पर भी होना चाहिए कि बचपन में जिन लोगों को उनके प्यार का नाम जराभी पसंद नहीं था, उनके व्यक्तित्व में संकोच, अविश्वास और हीनताबोध पैदा करने में इन कथित प्यार के नामों की भूमिका क्या और कितनी है? अपने बचपन के नाम को बेपर्दा करना मुझे आज भी अच्छा नहीं लगेगा. उस समय भी हिम्मत नहीं होती थी कि कह पाऊं कि श्रीमन् इस प्यार के नाम को आप अपने पास रखिए, मुझे मेरे असली नाम से पुकारिए. मेरे जैसे और भी दूसरे बालकबड़े होंगे जो अपनी पसंदनापसंद का इजहार करने में चूक जाते हैं. मुझे उस तथाकथित प्यार के नाम ने जो संकोच, अविश्वास और हीनताबोध बख्शा था, वह आज भी कम नहीं हुआ है. अंत में एक भरोसा, एक उम्मीद कि प्यार के नाम पर बालक के साथ मनमानी का खेल आगे और नहीं चलने वाला. नए सोच के चलते बचपन को समझने के लिए जिस तरह से जोर दिया जा रहा है, उससे उम्मीद है कि मातापिता इस हकीकत को समझेंगे और उपनामकरण के बहाने बालक पर कुछ भी ऊलजुलूल थोपने से बचेंगे. लेखकगण पात्रों के नामकरण के समय ध्यान देंगे. अपनी तीसरी पीढ़ी के युवतम सदस्य ईशान को देखकर मैं दावे के साथ यह भी कह सकता हूं. आने वाली पीढ़ी में इतना आत्मविश्वास है कि जो उसे नापसंद है उसका तत्काल विरोध कर सके.

© ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

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Filed under बचपन बहती गंगा, बालमनोविज्ञान, बालसाहित्य

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