अंध-आस्था का संस्थानीकरण

मैं हिंदू हूँ। यद्यपि मंदिर नहीं जाता। गीता, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत, दुर्गा सप्तशती जैसी अनेक पुस्तकें, बिना किसी आस्था, विश्वास के, सहज पाठकीय जिज्ञासा और चाव से पढ़ी हैं। बचपन में ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ करते समय लगता था कि संकट के समय बजरंगबली सहायक होंगे। उन दिनों गाँव के चारों ओर बाग थे, जहाँ आम के बुजुर्ग दरख्त जमीन से गलबहियाँ करते रहते। कुछ तो इतने पुराने कि शाखें खोखली पड़ चुकी थीं। हवा चलती तो तनों के चरमराने की आवाज सुनाई पड़ती। सूखे पत्ते झर-झर कर जमीन पर लोटने लगते। मानो जिस तने से वे अब तक लिपटते आए हों, स्नेह और समर्पण की पराकाष्ठा में उसके धराशायी होने से पहले खुद समाधिस्थ हो जाना चाहते हों। दिन में वे बाग अकसर सुनसान रहते। गुजरना पड़े तो धड़कनें अपने आप बढ़ जातीं। उस समय सिर्फ बजरंगबली का सहारा होता। लेकिन न तो कभी किसी प्रेत से मुलाकात हुई, न बजरंगबली ही मन का डर कम कर पाए। हाँ, ‘चालीसा’ इतना पढ़ा कि आज तक लगभग कंठस्थ है। धीरे-धीरे उसके प्रति आस्था भी खत्म होती गई। खोखली, अज्ञानजनित श्रद्धा और विश्वास का यह अकेला उदाहरण नहीं। हर साल गाँव में रामलीला मंडली आती। रात-रात भर जाग कर रामलीला देखी जाती। सिर्फ कथारस और मनोरंजन के लिए। राम दैव-पुरुष हैं, ऐसा भाव शायद ही कभी मन में उमड़ा हो। कभी नहीं लगा कि वे सामान्य सम्राट से बढ़ कर थे। हाँ, महाभारत पढ़ते-देखते कृष्ण-कथा की नाटकीयता से अवश्य अभिभूत हुआ हूँ। आज भी हो जाता हूँ। उनकी लौकिकता अद्भुत है। दैव-पुरुष कहलाकर भी वे आम जन के करीब हैं। उनके यहाँ परंपरा का दबाव नहीं है। बल्कि वे स्वयं परंपराओं को चुनौती देते हैं। इसके लिए वे देवराज इंद्र से भी पंगा ले सकते हैं। उनके साथ साख्य-भाव संभव है। यह लौकिकता उनसे कभी-कभी बड़े अनर्थ भी करवा लेती है। जैसे अपने पक्ष के पांडवों को जिताने के लिए धर्म के नाम पर छल (हालाँकि महाभारतकार ने उसे धर्मयुद्ध कहा है), एकलव्य की हत्या, युधिष्ठिर द्वारा अपनी ही पत्नी को जुए में दाँव लगाने के धत्कर्म को नजरंदाज कर उसको धर्मराज मानते रहना, गीता के बहाने वर्णाश्रम धर्म का पोषण आदि।

कृष्ण-कथा से इतर ‘सत्यनारायण कथा’ है, जिसमें ‘सत्यनारायण महाराज’ की कथा कभी नहीं आती। असल में तो वह डरी-सहमी, कुल-मर्यादा को समर्पित और पुरुष-सत्तात्मक परिवारों में अपनी अस्मिता गँवा चुकी ‘लीलावतियों’ के डर की कथा है, जो त्राण पाने के लिए दैवीय शक्ति की तलाश में रहती हैं। मेरे ही घर में आस्थावान पत्नी नियमपूर्वक इस कथा का आयोजन कराती हैं। उस समय पड़ोस की स्त्रियाँ भी जुट आती हैं। पुरोहित द्वारा हवन के दौरान देवताओं को बुलाना, कर्मकांड के बाद उन्हें वापस जाने को कहना। दिखावा इतना मानो ईश्वर, ईश्वर न हो कर उसके इशारे पर नाचनेवाला बंदर हो। एक ओर यजमान के लिए सुख-समृद्धि की कामना, दूसरी ओर गरीबी का यशस्वीकरण। दो-तीन घंटे के कर्मकांड का आखिरी पड़ाव, इहलौकिक-पारलौकिक सुख और समृद्धि की कामना….जितने समय तक पंडित घर में होता है, उतना समय छत पर अकेले बिताना मुझे भारी पड़ जाता है। सत्यनारायण की कथा बाँचनेवाले पंडित का भगवान मुझे उसी की तरह स्वार्थी एवं क्षुद्र-बुद्धि नजर आता है, जिसे अपना नाम लिवाने का शौक है। जो चाहता है कि पूरी दुनिया उसके रंग में रँग जाए। अगर कोई उसकी अवहेलना करे, उसके प्रसाद का अपमान करे, उसका नाम रटना भूल जाए, उसकी ओर से उदासीन हो जाए, तो वह कुटिल तानाशाह की भाँति अत्याचार पर उतर आता है। हर धार्मिक कथा की भाँति सत्यनारायण की कथा में भी चमत्कार होते हैं। वह प्रसन्न हो तो खोया पति, अर्जित धन-संपदा सहित, वापस लौट आता है। नाराज हो तो रास्ता भटक कर संकट में फँस जाता है। धन-संपदा नष्ट हो जाती है। मनुष्य की सारी की सारी कमजोरियाँ, धूर्तताएँ, छल-प्रपंच मुझे पुरोहित तथा उसके ‘सत्यनारायण’ में अंतर्निहित जान पड़ते हैं। ऐसे ‘सत्यनारायण’ की कथा में सत भला कहाँ से आए!

कह सकता हूं कि मेरा हिंदू होना ऐसी ही घटना है, जैसा मेरा जन्म। दोनों ही आकस्मिक हैं, मेरे नियंत्रण से बाहर। फिर भी जैसे मेरे होने का अधिकार सुरक्षित है, ऐसे ही मेरे हिंदू होने के अधिकार को भी कोई चुनौती नहीं दे सकता। सिवाय मेरे या जब तक मैं ऐसा न चाहूँ। यह अधिकार हिंदू धर्म ने ही मुझे दिया है, जहाँ किसी विशिष्ट देवता, पूजा-पद्धति, देवालय, धर्मग्रंथ, पंडा-पुजारी को माने बिना भी हिंदू रहा जा सकता है। हिंदुओं को छोड़ कर दुनिया के जितने भी बड़े धार्मिक समूह, संप्रदाय आदि हैं, प्रायः सभी का धर्मग्रंथ निर्धारित है। सिख होने के लिए ‘गुरुग्रंथ साहिब’ में आस्था और विश्वास जरूरी है। मुस्लिमों में तो कुरआन शरीफ न केवल व्यक्ति की धार्मिक आस्थाओं, बल्कि जीवनधारा को भी नियंत्रित करता है। पारसियों की आत्मा ‘जिंद अवेस्ता’ में त्राण पाती है। बाइबिल पर ईमान लाए बिना भी क्या ईसाई बना जा सकता है? मुझे लगता है शायद नहीं। ये धर्म ‘पुस्तकों से निकले हैं। इसलिए उनका पारायण करना ही धर्म मानते हैं। यह भी संभव है कि बदलाव की आशंका से डरे धर्माचार्यों ने ही इन्हें धर्मग्रंथों में कैद कर लिया हो। हिंदू होने के लिए ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है। यहाँ धर्म की व्याख्या समावेशी है। व्यक्ति बिना किसी धर्मग्रंथ पर ईमान लाए, बगैर मंदिर-देवालय जाए, बिना किसी कर्मकांड अथवा पूजा-पाठ में हिस्सेदारी के भी हिंदू रह सकता है। यह अनायास नहीं हुआ है। इसके पीछे जितनी हिंदू धर्म की उदारता है, संभवतः उतनी विवशता भी है। दरअसल, ढाई-तीन हजार वर्ष के अंतराल में वैदिक बहुदेववाद ने धर्म, दर्शन, वर्णाश्रम, जाति, कर्मकांड, क्षेत्रवाद आदि के नाम पर इतनी शाखाएँ-प्रशाखाएँ खड़ी कर दी हैं कि बाद के आचार्यों को अपने बौद्धिक श्रम का बड़ा हिस्सा उनके बीच समन्वय कायम करने में खर्च करना पड़ा। हालाँकि कुछ विद्वान इसे हिंदू धर्म की विशेषता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। हालांकि हिंदुओं के एक वर्ग की चाहत रही है कि दूसरे धर्मों की भांति उनका भी आधार धर्म-ग्रंथ हो। इसके लिए वे समय-समय पर प्रयास करते रहे हैं। किंतु जाति और संप्रदायों में बंटे हिंदू समाज में यह संभव नहीं हो पाया है।

वेद चूँकि प्राचीनतम ग्रंथ थे, इसलिए उन्हें भी हिंदुओं का आधार धर्मग्रंथ बनाने की चेष्टा की गई, लेकिन व्यावहारिक ज्ञान की कमी, दुरूह संस्कृत तथा तात्विक विषयवस्तु के कारण उनमें जनसाधारण को आकर्षित करने की क्षमता कम थी। दूसरे ऋग्वेद में कुछ ऐसे प्रसंग भी हैं, जिन्हें आज के युग में उचित नहीं समझा जा सकता। उदाहरण के लिए वैदिक देवता सोम का सेवन करते हैं। मांस खाते हैं। ऊपर से देवराज इंद्र का चारित्रिक विचलन, यम-यमी संवाद जैसे कई प्रसंग हैं, जिन्हें आज हमारी सामाजिक नैतिकता उचित नहीं मानती। संभवतः इस आधार पर होने वाली आलोचनाओं से बचने के लिए ही समाज के बहुसंख्यक वर्गों के लिए उनका पठन-पाठन निषिद्ध किया गया था। आलोचना दृष्टि के अभाव में वे प्रायः श्रद्धा की वस्तु बने रहे। यूँ भी जो ग्रंथ सर्वसाधारण के अध्ययन-मनन के लिए उपलब्ध न हो, वह आधार धर्म-ग्रंथ बन ही नहीं सकता था। वस्तुतः जिन दिनों वेदों का संकलन हुआ, धर्म स्वयं भी अविकसित अवस्था में था। वह निजी विश्वास से अधिक कुछ न था। लोग प्रकृति के सान्निध्य में रहने, उस पर विश्वास करनेवाले थे। जीवन में जो वस्तु उन्हें जरूरी लगती, उसके अधिष्ठाता के रूप में एक देवता की परिकल्पना कर ली जाती। एकेश्वरवादी धारा बहुत क्षीण, विकास की आरंभिक अवस्था में थी। यह बाद में समझा गया कि बिना व्यावहारिक हुए धर्म का संगठित सत्ता में बदलाव असंभव है। साथ में एक केंद्रीय शक्ति (चाहे वह बनावटी ही क्यों न हो) अथवा शक्तिबोध का होना भी जरूरी था। यह तब हो सका जब समाज में राजा नामक सत्ता का उदय हुआ और निर्णय के सारे अधिकार एक व्यक्ति के अधीन माने जाने लगे। धर्म का आधार सृष्टि-निर्माण और ध्वंस से उपजा सहजबोध था। राजा स्वयं जरा-मृत्यु के घेरे में था। उससे ऊपर भी कोई सर्वशक्तिमान सत्ता होनी चाहिए, इस सोच ने परम शक्तिषाली ईश्वर की संकल्पना को जन्म दिया। उसी का केंद्रीभूत रूप एकेश्वरवाद के रूप में सामने आया।

ऋग्वेद के रूप में मानवी मेधा की आरंभिक उड़ान ने स्वयं वैदिक आचार्यों को भी चमत्कृत कर दिया था। इसलिए उसको सँजो कर रखने के लिए तरह-तरह से प्रयास किए जाने लगे थे। चूँकि लेखनकला का आविष्कार नहीं हो पाया था, अतः उसके संरक्षण हेतु श्रुति का सहारा लिया गया। सामवेद की रचना वैदिक ऋचाओं के स्मरण तथा उनके शुद्ध गायन-उच्चारण की जरूरत को ध्यान में रख कर की गई। कालांतर में यज्ञ का प्रचलन बढ़ा तो याज्ञिक प्रविधियों को सहेजने तथा उन्हें अधिमान्य ठहराने के लिए नए ग्रंथों की आवश्यकता महसूस होने लगी। तब ऋक्, साम आदि से ऋचाएँ चुनकर बाकी दो वेद-संहिताओं की रचना संपन्न हुई। उस समय तक पुरोहित वर्ग काफी ताकतवर हो चुका था। यजुर्वेद एवं अथर्ववेद पर यह असर साफ दिखाई पड़ता है। उनमें यज्ञ की प्रविधियों तथा अन्य कर्मकांडों की प्रधानता है, जिनका विधान अभिजन वर्गों द्वारा अभिजन हितों के संरक्षण हेतु किया गया था। बहरहाल, दर्शन का आदिस्रोत होने के बावजूद वैदिक संहिताओं पर निरंतर बहसें होती रहती थीं। लोकायती और आजीवक विद्वान, वैदिक धर्म के नाम पर फल-फूल रहे कर्मकांड और टोटमवाद पर निरंतर प्रहार कर रहे थे। वैदिक धर्म का पोषक पुरोहित वर्ग, वेदों को अपौरुषेय बता कर उनके प्रति अपनी अंधश्रद्धा का प्रदर्शन करता, तो दूसरा वर्ग उनका मखौल उड़ाता था। परिणाम यह हुआ कि संपूर्ण दर्शन-परंपरा दो हिस्सों में बँट गई। वेदों पर विश्वास करनेवाले, उन्हें स्वतः प्रामाण्य एवं अपौरुषेय माननेवाले आस्तिक कहलाए, जब कि उन्हें मानवकृत और अप्रामाण्य माननेवाली धारा को नास्तिक और भौतिकवादी कहा गया। धीरे-धीरे नास्तिक विचारकों का चिंतन इतना प्रखर एवं और बहुव्यापी होता गया कि उसे न स्वीकारना ही आस्थावादियों के लिए चुनौती बन गया।

धर्म के अनुसार जीवन को मर्यादित करने की कोशिश स्मृतियों में दिखाई पड़ती है। उन्हें धर्म के संस्थानीकरण का पक्ष लेते, उसे वैध ठहरानेवाले आरंभिक ग्रंथ कहा जा सकता है। स्मृतियों तथा ब्राह्मण ग्रंथों के मुख्य रचयिता ब्राह्मण थे। इन ग्रंथों द्वारा शीर्षस्थ ब्राह्मण वर्ग ने अपने वर्गीय हितों को सुरक्षित करने की कोशिश की थी। उन दिनों भी समाज पर ब्राह्मणों, पुरोहितों का प्रभाव इतना गहरा था कि उसकी अवहेलना कर पाना राजाओं के लिए भी असंभव था। लेकिन धर्म को केंद्र बनाकर वर्णाश्रम व्यवस्था का जो ढाँचा खड़ा किया गया था, उसमें ऊपर के स्तर पर भी एका न था। यज्ञ एवं पुरोहिताई के अन्य कार्यों के आधार पर ब्राह्मणों की अलग-अलग उपजातियाँ बनी हुई थीं। क्षुद्र स्वार्थ के आधार पर वे बुरी तरह विभाजित थीं। पुरोहिताई में लगे ब्राह्मण प्रायः वे लोग थे, जो ज्ञान की मौलिक और अन्वेषणकारी परंपरा से कट चुके थे। उन्होंने समाज में परजीवी व्यवस्था को जन्म दिया था। ज्ञान की खोज को जीवन का मूल उद्देश्य माननेवाला वर्ग प्रायः अब भी यायावर जीवन जीता था। जहाँ पुरोहितकर्म पर ब्राह्मणवर्ग का अधिकार था, वहीं यायावर जिज्ञासुओं में सभी वर्गों के मनस्वी सम्मिलित थे। वे सत्ता प्रतिष्ठानों के प्रलोभन से परे, सीधे प्रकृति के सान्निध्य में चिंतन-मनन में लीन रहते थे। समाज में उनका मान-सम्मान था। उनके प्रभामंडल के आगे पुरोहित वर्ग भी श्रद्धानत रहता था। राजाओं की ओर से सुरक्षा के प्रबंध के साथ आश्रमों को जब-तब सुविधाएँ भी मुहैया कराई जाती थीं। तथापि समाज पर वास्तविक नियंत्रण उस पुरोहित वर्ग का ही था, जो प्रकट रूप में ज्ञान-परंपरा से कट चुका था तथा जैसे भी संभव हो, अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने में ही जीवन की सिद्धि मानता था। राष्ट्र की एकता अथवा बड़े राज्यों की स्थापना जैसा कोई सपना उसके आगे न था।

भारत में चाणक्य और पश्चिम में अरस्तू के आने तक प्रायः यही हालात बने रहे। राजनीतिशास्त्र के ये दोनों महापंडित दुनिया के अलग-अलग देशों में करीब एक ही कालखंड में जनमे। दोनों बड़े राज्यों के समर्थक थे। ध्येय की प्राप्ति के लिए अरस्तू ने सिंकदर को अपना सहायक बनाया और चाणक्य ने चंद्रगुप्त को। इनमें अरस्तू का साम्राज्यवादी अभियान किंचित पहले आरंभ हुआ था। चाणक्य और अरस्तू के सोच में जमीन-आसमान का अंतर था। सुकरात की ज्ञान-परंपरा से जुड़ा अरस्तू ‘शुभत्व’ की प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य मानता था। सत्ता का स्वरूप कैसा हो, इससे उसे कोई मतलब न था। उसकी निगाह में वही शासन प्रणाली श्रेयस्कर थी, जो जीवन में ‘शुभ’ की स्थापना करती हो। वह भले व्यक्ति और श्रेष्ठ नागरिक को परस्पर पर्याय मानता था—‘भले आदमी के सदगुण तथा श्रेष्ठ राष्ट्र के नागरिक के सदगुण से अवश्यमेव अभिन्न हैं….जिन उपायों और साधनों से मनुष्य नेक बन जाता है, उन्हीं उपायों एवं साधनों से वह श्रेष्ठ राष्ट्र की भी स्थापना करेगा। फिर चाहे उसका शासन श्रेष्ठ जनतंत्र पद्धतिवाला हो अथवा राजकीय पद्धतिवाला।’ हालाँकि इस सोच और सिकंदर की महत्त्वाकांक्षाओं को समर्थन दिए जाने में कोई साम्य न था। चाणक्य का विश्वास सुदृढ़ राजतंत्र की स्थापना में था। इस लक्ष्य को पाने के लिए साम-दाम-दंड भेद की किसी भी नीति को उसका समर्थन था। चंद्रगुप्त को भारत का एकक्षत्र सम्राट बनाने के लिए वह नंद के अमात्य राक्षस से भेंट में मिली विषकन्या को युद्ध में सहायक रहे सम्राट पर्वतक को भिजवा देता है, जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है। चंद्रगुप्त और सिकंदर में एक अंतर यह भी था कि सिकंदर मकदूनिया के सम्राट फिलिप की संतान था। राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएँ उसमें जन्मजात थीं, जबकि चंद्रगुप्त साधारण परिवार से आया था। बहरहाल, अरस्तू और चाणक्य दोनों को बड़े राज्यों की स्थापना में सफलता मिली। लेकिन बड़े राज्यों की स्थापना तथा उनके वैभव को बनाए रखना अलग-अलग बातें थीं। बड़े राज्यों में लोकहित के मुद्दों पर जनता के एकजुट हो जाने के भी खतरे थे। समाज में शांति-व्यवस्था एवं अनुशासन को बनाए रखने की चुनौती अलग से थी। इसके लिए जहाँ अरस्तू राजा से शुभत्व की स्थापना तथा कल्याण के न्याय-पूर्ण विभाजन को लक्ष्य मान कर काम करने की सलाह देता है. वहीं चाणक्य उत्तरदायी, नीति-कुशल और शक्तिशाली राजसत्ता के माध्यम से राज्य की एकता-अखंडता, शक्ति और समृद्धि को बनाए रखने का समर्थक था। दूसरे शब्दों में अरस्तू के लिए जनतंत्र कम से कम एक संभावना थी, जबकि चाणक्य के राजदर्शन में उसके लिए कोई स्थान न था।

‘शुभत्व’ की स्थापना जैसा नैतिक लक्ष्य व्यावहारिक दृष्टि में संभव न था। कोरी कूटनीति से सत्ता तो हथियाई जा सकती थी। इसके जरिए राजनीतिक दुश्मनों को ठिकाने भी लगाया जा सकता था, लेकिन महाशक्तिशाली सम्राट भी संगठित जनशक्ति से भय खाते थे. जानते थे कि संगठित जनाक्रोश से बचना कठिन और कभी-कभी तो असंभव हो जाता है। इस भय से मुक्ति में धर्म राजसत्ता का मददगार बना। वह इहलौकिक दुखों के सापेक्ष पारलौकिक सुखों को लाकर सामाजिक असंतोष कम करने तथा इसके माध्यम से जीवन में आभासी संतुलन बनाए रखने में सक्षम था। धर्म के इसी गुण के कारण धर्मसत्ता और राजसत्ता का गठजोड़ हुआ। स्वार्थी पुरोहित वर्ग द्वारा परंपरा और संस्कृति के नाम पर तरह-तरह के कर्मकांड व्यक्ति पर थोपे जाने लगे। स्वर्ग-नरक, पाप-पुण्य की कल्पनाएँ जीवनदर्शन की तरह पेश की जाने लगीं। परिणामस्वरूप आदमी का ध्यान इहलौकिक समस्याओं तथा उनके मूल कारणों से हटने लगा। ‘कोउ नृप होय हमें का हानी’ की भावना लोकचरित्र का हिस्सा बनती गई। समाज का बड़ा वर्ग राजनीति की ओर से विमुख हुआ तो वह अल्पसंख्यक अभिजन समूहों का कारोबार बनकर रह गई, जो अपने स्वार्थ के लिए बहुसंख्यक समूहों को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर स्वार्थ-सिद्धि करने में निपुण थे। वैदिक कर्मकांड और टोटमवाद की आलोचना करने वाले जैन और बौद्ध आचार्य भी धर्म और राजनीति के गठजोड़ के दुरुपयोग की कल्पना न कर सके। राजपरिवारों से आए महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध दोनों को अपने मत के प्रचार-प्रसार हेतु राजकुलों की षरण लेना सबसे आसान और प्रभावी तरीका जान पड़ा। गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी के रहते तो धर्म-दर्शन का दुरुपयोग संभव न था, लेकिन एक बार धर्म ने राजनीति को अपने लाभ का ‘औजार’ बनाने की कोशिश की तो बाद में राजनीति ने उसकी कीमत वसूलनी ही थी। धर्म और राजनीति के गठजोड़ ने स्थितियों की स्वार्थपूर्ण और मनमानी व्याख्या को जन्म दिया। देवासुर संग्राम की भांति महाभारत भी भाइयों के बीच राज्य के बंटवारे की लड़ाई थी। मगर दोनों संग्रामों की व्याख्या राजनीति की सामान्य घटना के बजाय धर्मयुद्ध के रूप में की गई। यह काम सिर्फ भारत नहीं, दुनिया के सभी देशों में हुआ।

बाइबिल, कुरआन, गुरुग्रंथ साहिब अथवा पारसियों के धर्मग्रंथ जिंद अवेस्ता की भाँति वेद ‘हिंदू धर्म’ का आधार-ग्रंथ रहे होते तो उससे हिंदू धर्म का उद्धार ही हुआ होता। क्योंकि वेदों में बहुरंगी संस्कृति से जनमा बहुदेववाद है। उनमें इतिहास तत्व भी है, जो तत्कालीन समाज को समझने में हमारी मदद कर सकता है। इस तरह दर्शन और जीवन-पद्धति के साथ इतिहास-दृष्टि भी बनी रहती। वह बिखरे समाज को एक सूत्र में बांधने और भावी पीढ़ियों को पे्ररणा देने के काम आती। जैसा यूनान में हुआ। होमर की ‘इलियड’ और ‘ओडिसी’ पुराकथाएं हैं, इसके बावजूद यूनानवासियों को भरोसा रहा है कि वे उनके जीवंत इतिहास का हिस्सा हैं। इसलिए सभ्यताओं के मिट जाने के बाद भी मध्यकाल में इटली जैसे देश अतीत की स्मृतियों की सहारे उठकर पुनः खड़े हो जाते हैं। कहने को तो भारत में भी पुराणकथाएं हैं। लेकिन उनकी रचना ऐसे की गई है कि वे मनुष्य से ज्यादा देवताओं का इतिहास लगती हैं। इतिहास का असली काम, प्रेरणा जगाने का काम-उनसे नहीं सधता। ऋग्वेद की आरंभिक ऋचाओं की भाषा लोकभाषा के करीब है। वह बाद में प्रक्षेपित ऋचाओं की भाषा अपेक्षाकृत परिष्कृत है। होना यह चाहिए था कि समय के साथ-साथ उनकी भाषा का सरलीकरण होता। वह लोक के कुछ और करीब आती। लेकिन बजाय उन्हें अर्थ-विस्तार देने के उनकी भाषा को और अधिक रूढ़ बनाने पर जोर दिया गया। यायावर वैदिक मुनियों की ज्ञान-चेतना कर्मकांडों में उलझने लगी। इस कारण वैदिक संहिताओं का विरोध स्वाभाविक था। श्रमण एवं आजीवक लोग यज्ञादि कर्मकांडों में दी जानेवाली बलि के लिए पुरोहित वर्ग की खूब खिल्ली उड़ाते। वैदिक कर्मकांडों के नाम पर बढ़ती हिंसा की प्रतिक्रियास्वरूप जैन और बौद्ध दर्शनों का विकास हुआ। न्याय, वैशेषिक और सांख्य जैसे तर्काधारित दर्शन अस्तित्व में आए। अपनी-अपनी तरह से ये सभी पुरोहितवादी प्रवृत्तियों तथा कर्मकांड चोट करते थे। दर्शन की ये वैकल्पिक धाराएँ इतनी विकसीं कि वैदिक धर्म को शताब्दियाँ नेपथ्य में गुजारनी पड़ीं। उसकी वापसी अंततः विरोध में जनमें जैन, बौद्ध, चार्वाक आदि धर्म-दर्शनों को भारत की दर्शन-परंपरा का अभिन्न हिस्सा मान लेने के बाद ही संभव हो सकी। मध्य काल तक हिंदू धर्म भी नाम प्रचलन में आ चुका था। लगभग उसी दौरान धर्म-दर्शन के क्षेत्र में सबसे सार्थक हस्तक्षेप शंकराचार्य की ओर से हुआ। उन्होंने अपना आचार्यत्व मीमांसक मंडन मिश्र को शास्त्रार्थ में पराजित करने के बाद स्थापित किया था। जैसे कोई विजेता हाथ आए प्रदेशों को छोड़ नहीं देता, उन्हें अपने अधीन कर, वहां उपनिवेश स्थापित कर लेता है, शंकराचार्य ने भी तर्क-वितर्क की प्राचीन दर्शन परंपरा को लौटाने के लिए ‘वेदांत’ जैसा नाम तो चुना, लेकिन उसकी जमीन मीमांसा की ही रही। इसलिए स्वयं यायावर रहते हुए भी उन्होंने मठों की स्थापना की। सृष्टि के आदि कारण के रूप में बृह्म की कल्पना की तो माया को भी बीच में ले आए। शंकर को अल्पायु मिली। उनके जाते ही ज्ञान और दर्शन के अन्वेषण के लिए स्थापित चातुर्मठ ‘मायावाद’ का शिकार होते गए।

कुछ लोगों ने गीता को हिंदू धर्म का आधार-ग्रंथ बनाने की कोशिशें कीं। थोड़ी सफलता भी मिली। पर एक तो गीता सर्वथा मौलिक ग्रंथ नहीं है। वह महाभारत का अध्याय-मात्र है। उसके अनेक मंत्र कठोपनिषद से आए हैं। दूसरे, सृष्टि के विकास को ले कर उसका दृष्टिकोण सांख्य दर्शन से प्रेरित है, जिसका द्वैतवादी रवैया बहुतों को नापसंद रहा है। दर्शन के रूप में सांख्य शंकराचार्य के आने के बाद अपनी आभा खो चुका था। तत्कालीन दर्शन-परंपरा में वेदांत को प्रमुख दर्शन का स्थान प्राप्त था। ब्रह्मसूत्र के अलावा श्वेताश्वर, ईश्वास्य आदि उपनिषदें वेदांत की ज्ञान-मार्गी धारा के समर्थन में थीं। फिर गीता को उपनिषदों से अधिक लोकप्रियता मिलने का कारण? दरअसल उत्तर मध्य काल में भक्ति आंदोलन में नया मोड़ आया था, जिससे निराकार भक्ति साकार की अभ्यर्थना में ढलने लगी थी। यह सर्वज्ञात तथ्य है कि निराकार भक्ति जाति-आधार पर बंटे समाज में उन लोगों की खोज थी, जिनके लिए वेद-पुराण निषिद्ध थे। मंदिर की सीढ़ियां जो चढ़ नहीं सकते थे। ऐसे लोगों में या तो शूद्र थे; अथवा उनसे भी नीचे के अंतज्य, जो शताब्दियों से जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे थे। निराकार भक्ति, कर्मकांड की जगह रूढ़ियां और ज्ञान की स्थान पर कोरा वितंडा रच रहे पुरोहित वर्ग के विरुद्ध ऐसे ही लोगों का पहला सशक्त सामाजिक-सांस्कृतिक विद्रोह था—‘रखे रहो तुम अपने मंदिर, वेद-पुरान। हमारा देवता, सच्चा देवता तो हमारे हृदय में है।’

यह अलख जगानेवाले संतकवि थे, जो समाज के निचले वर्गों से आए थे। शताब्दियों से असमानता और उत्पीड़न की पीड़ा को झेलते हुए। सूफी और वेदांत से प्रभावित इन संत कवियों ने निर्गुण आधार की परिकल्पना की; और एक निर्मल-निराकार-निर्विकल्प-अनादि और अनंत परमात्मा की भक्ति में खुद को तल्लीन कर दिया। उन्होंने न केवल धर्म के नाम पर थोपे जा रहे कर्मकांडों को चुनौती दी, बल्कि वर्गभेद की तीखी आलोचना करते हुए समरस समाज की स्थापना हेतु गीत भी रचे। एक चेतना थी, जो देखते ही देखते क्रांति-लहर में बदल गई। कभी-कभी निचले स्तर के लोग भी शिखरस्थ शक्तियों को राह दिखाने लगते हैं। भक्ति आंदोलन के दौरान भी यही हुआ था। उसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि ऊपरले क्रम की जातियां जो अपना त्राण मूर्ति-पूजा और कर्मकांड में खोजती थीं, वे भी भक्तिमार्ग की ओर आकर्षित होने लगीं। लेकिन शिखरस्थ जातियों के लोग अपने साथ अपने जातीय संस्कार भी लाए थे। उन्होंने धीरे-धीरे निराकार बृह्म का मूर्तिकरण करना आरंभ कर दिया। कबीर और रविदास जैसे संतकवियों की जगह तुलसी और सूर जैसे भक्त-कवियों ने ले ली। इस घटना ने भक्ति आंदोलन की रही-सही क्रांतिकारिता को भी बिखेरने का काम किया। भक्ति आंदोलन की लोकमानस में स्वीकार्यता देखते हुए उन्होंने अपने आराध्य का मूर्तिकरण करना आरंभ किया। भक्ति और समर्पण के नाम पर अपने आराध्य का नख-शिख गुणगान करते हुए उन्होंने अपनी सारी प्रतिभा उसके श्रंगारिक वर्णन को रसमय और विलासितापूर्ण बनाने पर लगा दी। तुलसी जैसे कवियों संतकवियों का दास्य-भाव धार्मिक पाखंडियों के लिए यथास्थिति बनाए रखने में सहायक सिद्ध हुआ। भक्ति आंदोलन के दौरान निरंतर आलोचनाओं के कारण अपनी आब खो चुके इंद्रादि वैदिक देवताओं के स्थान पर कृष्ण और राम को प्रमुख देवता का दर्जा मिला। गीता का नाम कृष्ण से जुड़ा था। इस कारण ग्रंथ के रूप में उसकी लोक-प्रतिष्ठा बढ़ने लगी। उल्लेखनीय है कि गीता के पास हिंदू दर्शन का आधारग्रंथ बनने का अवसर बौद्ध धर्म के पराभव के दिनों में भी आया था, मगर उस समय हिंदू धर्म खुद छोटे-छोटे संप्रदायों में बंटा हुआ था। उस समय भी यह ऐसा धर्म था, जिसकी विविध मान्यताएँ, अनेक पूजा-पद्धतियाँ तथा बहुसंख्यक देवता थे। यहाँ तक कि जनमानस को अपनी सुविधानुसार नए देवता गढ़ने, नई पूजा-पद्धति अपनाने की भी छूट थी। कालांतर में प्रेम, स्वास्थ्य, परीक्षा में उत्तीर्ण होना, संतान-सुख आदि के लिए भी कृपादाता देवताओं का गठन किया जाने लगा। लोकमानस द्वारा गढ़े गए ये देवता अपने भक्तों की आर्थिक हैसियत के अनुसार उनकी तरह खुले में रह सकते थे। घाम, वर्षा, शीत आदि सह सकते थे। पुरोहितों के लिए ये उनके जेबी देवताओं जैसे थे। अशिक्षित जनसमाज के बीच उनकी मनमानी व्याख्याएँ संभव थीं।

अद्वैतवाद से अवतारवाद की परिकल्पना को जन्म मिला था। उस समय हिंदू धर्म में उभर रही दो प्रमुख धाराओं में समन्वयीकरण की कोशिशों के बीच कृष्ण और राम दोनों को विष्णु का अवतार मान लिया गया। उस समय तक वर्णाश्रम व्यवस्था हिंदू धर्म पर छा चुकी थी। देश पर विदेशियों का अधिपत्य कायम था। असुरक्षाबोध से आहत पुरोहितवर्ग संकीर्ण मानसिकता को अपना रहा था, जो हिंदू धर्म की अपनी ही मान्यताओं के विपरीत थी। कृष्ण के साथ गीता का नाम जुड़ा था। इसलिए समाज पर उनका प्रभाव अधिक था। लेकिन कृष्ण द्वारा गोपियों के साथ रमण करना, परंपरारोधी होना। आवश्यकता पड़ने पर इंद्र को चुनौती देना तथा शास्त्रीय व्यवस्थाओं में ‘उपयोगिता के सिद्धांत’ के आधार पर छूट लेना, उस समय की स्थापित मान्यताओं को ललकारने जैसा था। वर्णाश्रम धर्म के प्रवक्ता पुरोहितों को यह स्वीकार न था। उसके आदर्श मर्यादाबद्ध राम थे, जो वशिष्ट और विश्वामित्र की गुरुता के आगे नत रहकर ब्राह्मणों के श्रेष्ठत्व को स्वीकारते हैं। उनके प्रभाव से रामकथा को प्रतिष्ठा मिलने लगी। फिर भी कृष्ण कथा की बहु-स्वीकार्यता बनी रही तो उसका कारण उनकी कथित लीलाओं में लोकलुभावन तत्व थे, उनमें रामकथा की अपेक्षा अधिक नाटकीयता थी। कृष्ण-कथा के लोकलुभावन तत्व कालांतर में साकार भक्ति आंदोलन की नींव बने। भक्ति के बहाने बहुसंख्यक वर्ग को सत्ता की स्पर्धा से परे रखा जाने लगा। वह धर्म का राजनीतिक उपयोग था, जो उनके कट्टरपंथी मंसूबों को साधने में सहायक था। इसके बावजूद ब्राह्मण वर्ग का आदर्श रामकथा ही रही, जिसमें वर्णाश्रम व्यवस्था को आदर्श के रूप में स्थापित करने की कोशिश की गई थी। तुलसी के राम इसलिए ‘पुरुषोत्तम’ हैं, क्योंकि वे वर्ण-व्यवस्था का पूरी निष्ठा से पालन करते हैं। आगे चलकर हालाँकि राम और कृष्ण को बराबर का दर्जा दिया गया, दोनों एक ही शक्ति विष्णु के अवतार भी कहलाए। लेकिन पहला अवतार बता कर राम को कृष्ण पर वरीयता दी गई। रामचरितमानस पाँचवा वेद कहलाने लगा तथा गीता की महत्ता अदालतों में उसके नाम की शपथ उठाने, लाल कपड़े में बाँध कर पूजा के आले में सजाने तक सीमित हो कर रह गई। हमारे कानूनविदों को यह समझ न आया कि अशिक्षित लोग जिनके लिए गीता को समझना तो दूर, सुनना तक नसीब न हो, उन्हें गीता की शपथ दिलाने का भला क्या औचित्य हो सकता है! यह अंध-आस्था का वैधानिकीकरण था। जनसाधारण गीता से अधिक गीता महात्म्य पढ़कर मन को तसल्ली देता रहा, जिसे चालबाज पंडितों ने अपनी ओर से जोड़ दिया था। उसके आधार पर एक ऐसा वर्ग भी पनपा जो गीता के पाठों को नियमित रटने, उसके आधार पर कर्मकांडों की स्वार्थानुकूल व्याख्या को ही बुद्धि-विवेक का पर्याय मानता था।

ज्ञातव्य है कि ऋग्वेद में कृष्ण को गौ-पालक यदुओं का नेता बताया गया है। इंद्र से परास्त होने के बाद वह कबीला जिस प्रकार उसका उल्लेख वेदों में हुआ है, उत्तर-पश्चिम भारत की ओर प्रस्थान कर गया था, जहां उसने गंगा-यमुना सभ्यता की नीव डाली। उससे लगता है कि वह आर्यों की विस्तारवादी नीति का विरोधी था। इंद्र से उसके संघर्ष का उल्लेख भी ऋग्वेद में है। भारत में आर्यों का आगमन चरणबद्ध घटना है। बाद में आए आर्यों को न केवल यहाँ के मूल निवासी द्रविड़ों से संघर्ष करना पड़ा था, अपितु उन आर्य-दलों से भी जूझना पड़ता था जो अपेक्षाकृत उनसे पहले पहुँचकर यहां की संस्कृति के रंग में रँग चुके थे। ऋग्वेद में राजा सुदास और दस राजाओं के संघर्ष का उल्लेख है। उस प्रागैतिहासिक युद्ध में कृष्ण के यदु नामक कबीले ने सुदास विरोधी सेनाओं का साथ दिया था। उसकी अवशेष स्मृति को सहेजने की कोशिश महाभारत के नींव-ग्रंथ ‘जय’ में दिखाई पड़ती है। आज महाभारत तथा भागवत आदि ग्रंथों में जो कृष्ण-कथा उपलब्ध है, वह वर्णाश्रम संस्कृति से समझौता कर चुके कृष्ण की कहानी है। साफ है कि समन्वय की प्रक्रिया के दौरान, दूसरे सांस्कृतिक तत्वों की भाँति कृष्ण को भी आर्य संस्कृति में शामिल कर लिया गया। अंधास्था को समाज में प्रचलित करने की चतुराई कृष्ण और राम के काल-निर्धारण में भी दिखाई पड़ती है। हिंदू परंपरा में राम को विष्णु का पहला तथा कृष्ण को बाद का अवतार माना गया है। उसके अनुसार राम त्रेता और कृष्ण द्वापर में जनमे। सवाल है कि कृष्ण का उल्लेख यदि ऋग्वेद (80/85/13-15) में है तो उनके पूर्वावतार राम का क्यों नहीं है? इस पर पर्दा डालने के लिए कुछ विद्वान उसको कृष्णासुर का नाम देते हैं। लेकिन यदुओं का नेता और गो-पालक होना, इंद्र से संघर्ष उन्हें महाभारत का नायक कृष्ण सिद्ध करता है। द्वापर (दूसरा) और त्रेता (तीसरा) की अर्थसंगति, महाभारत की रामायण से प्राचीनता कृष्ण को राम का पूर्ववर्ती सिद्ध करती हैं। कृष्ण-युगीन अर्थव्यवस्था में पशुओं का महत्त्व कृषि से अधिक है। इंद्र से उनका टकराव भी पशु-संपदा की सुरक्षा के लिए होता है। गोकुल की संस्कृति पर कबीलाई समूह की छाप है, जिसमें मुखिया समूह का कर्ताधर्ता होता है। वहाँ वर्ण-विभाजन उतना प्रबल नहीं है। ये सब कारण कृष्ण को राम से प्राचीन ठहराते हैं।

प्रश्न उठता है कि कृष्ण यदि राम से पहले जनमे तो उन्हें बाद का सिद्ध करने का क्या औचित्य हो सकता है? ऋग्वेद का कृष्ण गोपालकों का नेता है, जो संभवतः यहाँ के आदि निवासियों में से थे; अथवा उन आर्यों के वंशज थे, जिनका भारत आगमन राम से पहले प्रमाणित है, जो भारतीय उपमहाद्वीप में काफी पहले पहुँचकर यहाँ की संस्कृति में रम चुका था। बाद में आए आर्य कृषि कला में अपेक्षाकृत निपुण थे। कालांतर में सांस्कृतिक समन्वय की नीति में कृष्ण कथा को महाभारत में स्थान दिया गया तथा वर्णाश्रम व्यवस्था से उनकी सहमति दर्शाने के लिए गीता के रूप में प्रक्षिप्त अंश उसमें जोड़ा गया। कृष्ण की गोकुल से मथुरा की यात्रा असल में अलग-अलग युगों में दो भिन्न संस्कृतियों में समन्वय की संभावनाएँ तलाशती, उनके बीच की यात्रा है। आज का महाभारत जिस कालखंड की रचना है, उस समय तक वैदिक संस्कृति गंगा-यमुना के दोआब में एक परिपक्व संस्कृति के रूप में पनप चुकी थी, जब कि मूल ग्रंथ संभवतः राजा सुदास और दस राजाओं के संघर्ष की स्मृतियों को सहेजने की कोशिश में रचा गया था।

अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, हिंदुओं के आधारग्रंथ की मान्यता मिली ‘रामचरितमानस’ को। यह प्राचीन ग्रीक कथाओं से प्रभावित महाकाव्य ‘रामायण’ का वर्णवादी संस्करण था। रामचरितमानस के बाद ही राम को जनमानस में देवता की जगह मिलनी शुरू हुई। राम की ऐतिहासिकता को दर्शाने के लिए उन्हें विष्णु का अवतार बताया गया, जिन्हें वैदिक देवताओं की गिरती छवि के बाद पालनहारी देवता का स्थान मिला था। मनु के बाद वर्णाश्रम धर्म के प्रखरतम समर्थक तुलसी को महाकवि मान लिया गया। पत्नी द्वारा लांछित आत्महीनता के मारे तुलसी आस्था को मानवीय विवेक से उच्चतर स्थान देते हैं—‘कल्प-कल्प भरि एक-एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका।।’ —जो लोग वेदों की निंदा तर्क द्वारा करते हैं, वे एक-एक कल्प तक सभी नरकों में रहते हैं। यह तुलसी के सामंती संस्कार ही हैं जो वर्णव्यवस्था के अंध-समर्थक राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहलवा जाते हैं जब कि उस शब्दाडंबर के बाहर, सिवाय वर्ग-संस्कृति के समर्थन के वे कहीं मर्यादित नहीं हैं। वे बाली का वृक्ष की ओट लेकर वध करते हैं। निर्दोष गर्भवती सीता को लोकलाज के बहाने घर से निकाल देते हैं। वेदपाठी निर्दोष शूद्रक को मृत्युदंड देते हैं। ये बातें विचारशील हिंदुओं को परेशान करती थीं। इसका कारण हिंदू धर्म के अपने अंतर्विरोध भी थे। नई शिक्षा के आलोक में हिंदुओं का वह वर्ग जिसे वर्ण व्यवस्था में उत्पीड़ित होना पड़ा था, ऐसे किसी ग्रंथ को मान्यता देने को तैयार न था, जो उसके शोषण को शास्त्रीय वैधता प्रदान करता हो। इसलिए जैसे-जैसे हिंदू समाज में चेतना व्यापी, लोग उससे छिटकते चले गए। विशेष रूप से वह वर्ग जिसे वर्णाश्रम धर्म के कारण उपेक्षा और उत्पीड़न सहना पड़ा था, रामचरितमानस, मनुस्मृति जैसे ग्रंथों को संदेह की दृष्टि से देखता रहा। परिणाम यह हुआ कि पुरोहितों द्वारा रामचरितमानस को पाँचवा वेद घोषित करने के बावजूद उसे हिंदू धर्म के आधार ग्रंथ की मान्यता हासिल न हो सकी।

चलते-चलते एक और सवाल कि धर्म, जो व्यक्तिगत आस्था और विश्वास का विषय है, वह एकाएक ताकत या ताकतवर का संबल कैसे बन जाता है? इसको समझ पाना समाजविज्ञानियों के आगे बड़ी चुनौती रही है। उल्लेखनीय है कि धर्म का राजनीतिकरण और साम्राज्यवाद का उदय दोनों सहसंबद्ध घटनाएँ हैं। राजाओं के साम्राज्यवादी मंसूबे साधने में धर्म उनका कदम-कदम पर सहायक बना है। वह समाज के बहुसंख्यक वर्ग को शक्ति एवं संसाधनों से काट कर उन्हें परावलंबी बना देता था। चूँकि राज्य की अपनी व्यस्तताएँ थीं, इसलिए समाज में जुड़े मामलों की देखरेख की जिम्मेदारी पुरोहित वर्ग को सौंपी जाने लगी। इससे धर्म और राजनीति के संबंध की शुरुआत हुई। राजा धर्म की ताकत का इस्तेमाल करता था। राज्य का वह आरंभिक रूप था, जिसे धर्म के ठेकेदारों ने बड़ी चालाकी से कब्जाया हुआ था। उस समय चूँकि राजनीतिक विमर्श में गिने-चुने लोग सम्मिलित होते थे, जिन्हें धर्म के साथ-साथ अन्य मामलों की शिक्षा दी जाती थी, इसलिए धर्म उन दिनों अपेक्षाकृत कम प्रभावी था। धर्म की जिहादी ताकत का उपयोग सैनिकों को युद्धोन्मत्त बनाने के लिए तो हुआ, किंतु उसके आधार पर स्वतंत्र राज्य शायद ही कभी बन पाए। कारण साफ है। सत्तालोलुपों को केवल धर्म की संगठनकारी शक्ति से लगाव होता है, उन नैतिक प्रेरणाओं पर नहीं जिन्हें लोकमानस में अपनी पहचान बनाने के लिए धर्म अपने साथ जोड़ लेता है। साम्राज्यवाद के दौर में जितने भी राज्य बने, उनके पीछे राजाओं की निजी महत्त्वाकांक्षाएँ थीं। हालाँकि सत्ता प्राप्ति के बाद अपनी ताकत को मजबूत करने के लिए उन्होंने धर्म का भी सहारा लिया। इसके लिए धर्मांतरण को भी राजनीतिक हथियार की तरह प्रयोग किया गया। धर्मांतरित होकर आनेवाले दो प्रकार के लोग थे। एक वे जो जातीय उत्पीड़न से तंग आ कर अपने मान-सम्मान और अस्मिता की रक्षा के लिए नए धर्म की शरण में जाने को मजबूर हुए थे। दूसरे वे जो कतिपय सुविधाभोगी समाज से आए थे और अपने सामाजिक स्तर को बनाने, राज्य से निकटता का लाभ उठाने के लिए धर्मांतरित हो कर दूसरे धर्म में दाखिल हुए थे। इन सभी के विचार धर्म के विस्तार के लिए उपयोग किए गए। धर्म विशेष की सैद्धांतिकी से प्रभावित हो कर धर्मांतरण की घटनाएँ बहुत विरल होती हैं। जो लोग स्वार्थ के वशीभूत हो कर धर्मांतरण को अपनाते हैं, वे उसका उपयोग शिखर तक पहुँचानेवाली सीढ़ी के रूप में करते हैं। उनकी कोशिश धर्म को रूढ़ बना देने की होती है, ताकि उसके माध्यम से आमजन के विवेक को कुंठित कर, उसके व्यवहार को भीड़ की मानसिकता से जोड़ सकें।

इधर हिंदू धर्म को ‘जीवनपद्धति’ कहा जाने लगा है। ‘धर्म तो सनातन है, हमेशा से चला आ रहा है, उसका न आदि है न अंत।’—सनातन धर्म की व्याख्या कुछ इसी तरह की जाती है। प्रमाण के लिए वे वेदों और उपनिषदों का हवाला देने लगते हैं, जिन्हें उन्होंने शायद ही कभी पढ़ा हो। वे और साथ में दूसरे धर्मावलंबी भूल जाते हैं कि खरबों बर्ष पुराने ब्रह्मांड में धरती की उम्र कुछ अरब वर्ष है। जब कि इस धरती पर मनुष्य नामक प्राणी की उत्पत्ति मात्र 2,00,000 वर्ष पुरानी है। दूसरी ओर विश्व की प्राचीनतम सभ्यता मात्र 12,000 वर्ष पुरानी घटना है। अब मानव-पीढ़ी की औसत आयु यदि 25 वर्ष मान ली जाए तो मनुष्य के आदि पुरखे से आज तक लगभग 8000 पीढ़ियाँ गुजर चुकी हैं। जब कि मनुष्य की सभ्य पीढ़ी का आरंभिक सदस्य आज से 480वीं पुरानी पीढ़ी के रूप में जनमा होगा। इस आधार पर संगठित धर्म की शुरुआत; यानी वर्तमान देवताओं का सृजन आज से मात्र 80-90वीं पीढ़ी की मानसिक उड़ान थी। स्पष्ट है कि मनुष्य 8000 पीढ़ियों में से 7100 से अधिक पीढ़ियों ने, बहुत लंबा समय देवताओं की कृपा के बगैर, प्रकृति के साथ जूझते, संघर्ष करते तथा उसकी कृपाओं का आनंद लेते हुए बिताया है। सभ्यता के आरंभ के बाद से ही हर समूह-समाज ने अपने-अपने देवता गढ़े हैं, जो आम इन्सानों की भाँति मरते-खपते रहे हैं। भारतीय वाङ्मय में ऐसा बहुत कुछ है, जो यह बताता है कि वैदिक ऋषियों के देवता आसमान से नहीं, इसी जमीन से उपजे थे।

‘हिंदू धर्म वैज्ञानिक धर्म है’—यह निराधार तर्क नई पीढ़ी में धर्म की लोकप्रियता बनाए रखने के लिए दिया जाता है। मेरे विचार में धर्म की अवधारणा ही अवैज्ञानिक है। यह कैसी वैज्ञानिकता है जिसमें धार्मिक कर्मकांडों का निष्पादन किसी खास वर्ग, मुख्यतः ब्राह्मणों तक सीमित हो? दरअसल जो यह दावा करते हैं, वे धर्म और विज्ञान के अंतर को पहचानते ही नहीं हैं। विज्ञान वास्तव में चीजों को परखने की एक पद्धति है। उसका जन्म संदेह के साथ होता है और जब तक विश्वास करने योग्य पर्याप्त आधार नहीं मिल जाता, तब तक शंका बनी ही रहती है। ‘संदेह के द्वारा हम जाँच-पड़ताल तक पहुँचते हैं और जाँच-पड़ताल हमें सच तक ले जाती है।’—पीटर अबेलार्ड के ये शब्द विज्ञान को समझने में हमारे मददगार हो सकते हैं। इसके विपरीत धर्म आस्था और कदाचित अंधविश्वास के बल पर फूलता-फलता है। हर धर्म अपने अनुयायियों से अपेक्षा रखता है कि वे संदेह को त्याग कर पूरे आस्था-भाव से उसकी शरणागत हों। स्वार्थ-सिद्धि के लिए वह मानवीय विवेकशीलता को, जो मनुष्य होने का प्रमुख लक्षण है, किनारे कर देता है। किसी धार्मिक प्रवचन के दौरान उपस्थित भीड़ का आचरण बाड़े में कैद कर दी गई भेड़ों की तरह होता है, जो अपने ग्वाले द्वारा इधर से उधर हाँकी जाती हैं। जिन मनीषियों ने वैदिक ऋचाओं की रचना की थी, उन्होंने यह कभी नहीं सोचा था कि उनका उपयोग किसी धर्म या संपद्राय की गाड़ी चलाने के लिए किया जाएगा। अध्यात्म मनुष्य की बौद्धिक आकुलता की उपज था। उस जिज्ञासा की उपज था जो विराट, क्षण-क्षण परिवर्तनशील, विविध रूप-रंग-गुणवाली प्रकृति का सान्निध्य पा कर उसके मस्तिष्क में खलबली मचाने लगती थी। महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, डेमोक्रिटिस, सुकरात, कन्फ्युशियस, ताओ आदि जितने भी महान दार्शनिक हुए हैं, उनकी हरगिज यह मंशा नहीं थी कि अपने नाम से कोई नया धर्म या संप्रदाय स्थापित करें। गौतम बुद्ध ने तो अपनी मूर्तियाँ लगाने के लिए भी मना किया था। कन्फ्युशियस खुद को मामूली शिक्षक मानता था। सुकरात तो अपने अज्ञान का ज्ञान होने पर भी गर्व करता था। आजकल धर्म ‘न्यूनतम लागत और उच्चतम रिटर्न’ वाला सबसे भरोसेमंद कारोबार है, जिसमें घाटे की कोई संभावना नहीं। न उसका सेंसेक्स कभी नीचे आता है। आधुनिक बाबा माथे पर सोने का मुकुट लगा कर जनता के सामने आते हैं तथा उसकी भावनाओं का दोहन कर, धर्म का कारोबार चलाए रखते हैं। उन्हीं के बूते समाज में अंधास्था फलती-फूलती है और मानवीय विवेक का क्षरण होता है।

ओमप्रकाश कश्यप

4 टिप्पणियाँ

Filed under दर्शन, हिंदू धर्म: अंध-आस्था का सांस्थानीकरण

4 responses to “अंध-आस्था का संस्थानीकरण

  1. sudarshansingh

    sahaj tarkik aur vicharottejak lekh, bahut badhiya.

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