विचारहीन क्रांति का दिशाहीन अंत

अन्ना हजारे तथा उनके साथियों से उम्मीद पहले भी कम थी. आस थी तो बस इतनी कि अपने आंदोलन के माध्यम से वे इस देश के आमजन को लोकतंत्र की ताकत याद दिलाने तथा उसकी सैद्धांतिकी से रूरू करने का काम करेंगे. इसलिए कि स्वाधीन भारत में आमजन के लोकतांत्रिक प्रशिक्षण के प्रयास बहुत कम, लगभग ‘न’ के बराबर हुए हैं. इस बीच आमजन ने अपने मताधिकार के आधार पर कुछ प्रबुद्ध निर्णय लिए तो उसका प्रमुख कारण उसके मानस में स्वाधीनता आंदोलन की अवशेष स्मृतियां थीं. इस देश को स्वाधीनता प्राप्ति के लिए बहुत लंबा, अनथक संघर्ष करना पड़ा था. वास्तविक सफलता गांधीजी के आजादी की लड़ाई में उतरने के बाद तब संभव हो पाई, जब उन्होंने आमजन को आंदोलन से जोड़ा. भारतीय स्वाधीनता संग्राम में गांधी और आंबेडकर के नेतृत्व वाले बाद के तीस वर्ष बहुत महत्त्व रखते हैं. यही वह कालखंड हैं जिसमें इस देश के आमजन यानी किसान, मजदूर, दस्तकार तथा शोषितउत्पीड़ित जन ने स्वतंत्रता, समानता और सम्मान की लड़ाई में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था. उसका अहिंसक जनसंघर्ष विश्वइतिहास में अनूठा था. उससे जनसाधारण को पहली बार अपनी ताकत और पहुंच का एहसास हुआ था. पहली बार उसको लगा था कि स्वार्थी सत्तासीन वर्गों पर भरोसा न करते हुए, अपनी मुक्ति का बीड़ा उसे स्वयं उठाना चाहिए. यही उसने किया भी, जिसका सुफल आजादी और लोकतंत्र के रूप में सामने आया.

 स्वाधीनता पूर्व की यह लोकचेतना आजाद भारत में राष्ट्रीय चेतना का रूप ले सके, इसके लिए सरकारी तथा गैरसरकारी स्तर पर बड़े कार्यक्रमों की आवश्यकता थी. आजादी के बाद ऐसी ईमानदार कोशिशें, बहुत कम, लगभग ’न’ के बराबर हुई हैं. इसके प्रमुख कारणों में पहला तो यह कि देश की आजादी अपने साथ विभाजन की त्रासदी को लेकर आई थी. इस कारण स्वाधीनता आंदोलन जिसने एकराष्ट्र के सिद्धांत के आधार पर जन्म लिया था, बहुत आसानी से और जल्दी ही द्विराष्ट्र के औचित्यअनौचित्य संबंधी बहसों में उलझ गया. इससे समाज में सांप्रदायिक विद्वेष पनपा, जिसका फायदा उन अलगाववादी सांप्रदायिक ताकतों ने उठाया, जिन्हें लोकतंत्र में कोई विश्वास न था. जो धार्मिकसांस्कृतिक पुनरुत्थान के नाम पर पुरातनपंथी सामंती संस्थाओं को वापस लाना चाहती थीं. हैरानी की बात तो यह है कि आमजन के कंधों पर सवार होकर सफलता की ओर सतत अग्रसर कांग्रेस के बड़े नेताओं में भी लोकतांत्रिक चेतना का अभाव था. स्वयं गांधी जी ’रामराज्य’ के बहाने पुरानी ग्रामीण शासन प्रणाली को चुस्त करना चाहते थे, जो लोकतंत्र की आधुनिक सैद्धांतिकी से कोसों दूर थी. उनके अनन्य शिष्य कहे जाने वाले विनोबा, जिनके बारे में माना जाता है कि ‘गांधीवाद’ के प्रति उनकी निष्ठा गांधीजी से भी ज्यादा दृढ़ थी, तो लोकतंत्र के कटु आलोचकों में थे. पुरी सर्वोदयसम्मेलन में वे इसका जमकर मखौल उड़ाते हैं

 ‘हम सुझाते यह हैं कि हमारे जो भाई भिन्नभिन्न संस्थाओं में हैं, वे यह कोशिश करें कि जिसको वे अहिंसात्मक, रचनात्मक कार्य समझते हैं, वे उन संस्थाओं के प्रधान हो जाएं और बाकी बातें गौण हो जाएं. चुनाव को कितना भी महत्त्व क्यों न दिया जाए, आखिर वह ऐसी चीज नहीं है कि उससे समाज के उत्थान में हम कुछ मदद पहुंचा सकें. वह ‘डेमोक्रेसी’ में खड़ा किया हुआ एक यंत्र है, एक फारमल डेमोक्रेसी, एक औपचारिक लोकसत्ता आई है. वह मांग करती है कि राजकार्य में हर मनुष्य का हिस्सा होना चाहिए. इस वास्ते हर एक की राय पूछनी चाहिए और मतों की गिनती करनी चाहिए. यह तो हर कोई जानता है कि ऐसी कोई समानता परमेश्वर ने पैदा नहीं की है कि जिसके आधार पर एक मनुष्य के लिए जितना एक वोट है, उतना ही दूसरे मनुष्य के लिए भी हो, इस बात का हम समर्थन कर सकें. ऐसी कोई योजना ईश्वर ने भी नहीं की. लेकिन यह स्पष्ट है कि पंडित नेहरू को एक वोट है, तो उनके चपरासी को भी एक ही वोट है, इसमें क्या अक्ल है, हम नहीं जानते.’ (शक्ति सत्ता में नहीं, लोकसेवा मेविनोबा, 25 मार्च 1655 को दिया गया भाषण, राजनीति से लोकनीति की ओर, पृष्ठ 20)

 ऊपर विनोबा सर्वोदयी कार्यकर्ताओं को विभिन्न संस्थाओं के शीर्षपद पर कब्जा कर लेने का आवाह्न करते हैं. बिना किसी चुनाव या नैतिकता के. विनोबा के अलावा उनके सहयोगियों में दादा धर्माधिकारी, धीरेंद्र मजूमदार, शंकरराव देव जैसे तत्कालीन कांग्रेसी, जिन्हें कांग्रेस में विचारवान नेता होने का गौरव प्राप्त था, भी संसदीय लोकतंत्र के आलोचकों में थे. स्वयं गांधीजी की वर्णाश्रम धर्म में आस्था उन्हें पूर्ण लोकतांत्रिक होने से रोकती थी. इसके बावजूद यदि देश में लोकतंत्र को जगह मिली तो इसलिए कि वह समय पूरी दुनिया में बदलाव का था. साम्राज्यवादी लालसा के रूप में दुनिया दो विश्वयुद्ध झेल चुकी थी, जिसकी परिणति हिरोशिमा और नागाशाकी की तबाही के रूप में सामने आई थी. इससे भी ज्यादा अहम् था, डा॓. आंबेडकर के नेतृत्व में दलित चेतना का उभार. नई शिक्षा के आलोक में सहस्राब्दियों से शोषितउत्पीड़ित पिछड़े जन अपने विकास तथा आत्मसम्मान हेतु सत्ता में भागीदारी चाहते थे. उनकी भावनाओं को नकारने का मतलब था, देश के बड़े वर्ग के भविष्य को फिर सामंती ताकतों के हवाले कर देना. प्रकारांतर में एक और विभाजन. कहने का आशय है कि आजाद भारत के लिए लोकतंत्र कांग्रेस या गांधी की देन न होकर परिस्थितियों के अनुसार अपरिहार्य हो चुका था. किसी भी नेता के लिए उसकी उपेक्षा कर पाना संभव नहीं रह गया था.

 लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक था कि आजादी पूर्व की लोकचेतना राष्ट्रीय चेतना का रूप ले सके, ताकि इस इस देश में मतदाताओं को जाति, धर्म, सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयता जैसे अलगावकारी मुद्दों के आधार पर बांटा न जा सके. आजादी के बाद ऐसी ईमानदार कोशिशें ‘न’ के बराबर हुई थीं. परिणामस्वरूप भारतीय लोकतंत्र पूंजी, जातीयता, क्षेत्रीयता, दलगत स्वार्थपरता और सांप्रदायिकता का शिकार होकर अपने लक्ष्य से भटकता गया. अन्ना हजारे के आंदोलन से मामूली उम्मीद थी तो बस इतनी कि शायद यह आंदोलन, गांधीवाद की पुरानी सीमाओं का उत्क्रमण करते हुए वह लोकतांत्रिक चेतना के विस्तार के लिए सचमुच कार्य करेगा. आखिर देश में संसदीय लोकतंत्र अपने साठवें वर्ष में था. इस अवधि में उसने कई सफलताएं अर्जित की थीं. उम्मीद थी कि अन्ना हजारे के विचारों से प्रेरित होकर चुनावों में एक भीड़ की तरह व्यवहार करने वाली जनता, भविष्य में प्रबुद्ध संगठित निर्णायक लोकशक्ति होने के आत्मविश्वास से लैस होकर व्यवहार करेगी. राजनीति में कुलीनतावाद का जो नया दौर पनपा है, उसपर लगाम लगेगी. आंदोलन की शतप्रतिशत सफलता का विश्वास तो कभी था ही नहीं.

 इस अविश्वास के पीछे टीम अन्ना का दुराग्रही रवैया था. पिछला अगस्त आंदोलन टीम अन्ना ने केवल जनलोकपाल के मुद्दे पर चलाया था. उसको आंदोलन को युवाओं का भरपूर समर्थन प्राप्त हुआ था. परंतु इसलिए नहीं कि वे भ्रष्टाचार से सचमुच आजिज आ चुके थे और अवसर मिलते ही उसकी बांह मरोड़ने को कृतसंकल्प थे. भ्रष्टाचार और जातिप्रथा इस देश की ऐसी दो कुरीतियां हैं जिससे इस देश की जनता पूरी तरह अनुकूलन कर चुकी है. बल्कि देखा जाए तो जातिप्रथा स्वयं एक बड़ा सामाजिकसांस्कृतिक भ्रष्टाचार है जो किसी व्यक्ति की योग्यता को जांचेपरखे बिना, केवल जन्म के आधार पर उसे विशिष्ट सुविधाओं का अधिकारी बना देता है. भ्रष्टाचरण की सुविधाजनक परिभाषा गढ़ते हुए उसको केवल आर्थिक स्वार्थपरता तक सीमित कर दिया गया, जिसपर रोकथाम के लिए वर्तमान कानूनों में ही पर्याप्त प्रावधान है. उसमें कामयाबी नहीं मिल पाती तो इसलिए कि अधिकांश लोग भ्रष्टाचार को लेकर दोहरे मापदंड के शिकार हैं. ज्यादातर को भ्रष्टाचार से शिकायत सिर्फ इसलिए है कि वे उसके अवसरों से वंचित हैं. ऊंचे पदों पर विराजमान शक्तियों में अपनेअपने स्वार्थ को लेकर समझौता है. वे एकदूसरे के भ्रष्टाचार पर पर्दा डाले रखती हैं.

 उचित होता कि टीम अन्ना भ्रष्टाचार तथा दूसरे मुद्दों की उपयोगिता पर व्यापक बहस चलाती. इसके बावजूद अगस्त आंदोलन केवल ‘जनलोकपाल’ लाने की जिद तक सिमटा रहा. हाल का आंदोलन भी तथाकथित भ्रष्ट मंत्रियों को सजा दिलवाने के लिए विशेष जांच दल गठित करने की मांग से आगे नहीं बढ़ पाया. इससे जाहिर होता है कि स्वयं अन्ना हजारे और उनके साथियों का मौजूदा लोकतांत्रिक संस्थाओं पर संदेह है. उल्लेखनीय है कि टीम अन्ना को अगर इन मंत्रियों के भ्रष्टाचार से सचमुच अत्यधिक पीड़ा है तो वह इनके विरुद्ध न्यायालय में जा सकती थी. उसके सदस्यों में दो इस देश के वरिष्ठ और जानेमाने वकील हैं, जो सरकार को वैधानिक तरीके से चुनौती पेश कर सकते थे. अगस्त आंदोलन की सफलता को दोहराने के मोह में उन्होंने आंदोलन का रास्ता चुना, जो सरकार की हठधर्मी के कारण विफल सिद्ध हुआ.

टीम अन्ना के अनुसार वह लोकशक्ति को जागरूक करना चाहती है. लेकिन उसकी सीमा है कि वह समाज के सभी वर्गों विश्वास जीतने में असफल रही है. अगस्त आंदोलन की कामयाबी के पीछे एक सच यह भी था कि उसके साथ आरक्षण व्यवस्था से स्वयं को घाटे में समझने वाला युवावर्ग उत्साहपूर्वक जुड़ा था. जनांदोलन के नाम पर दबाव की राजनीति उसके लिए लिटमस टेस्ट की तरह थी. यदि उस आंदोलन में अन्ना पूरी तरह कामयाब हो पाते तो निश्चय ही वह वर्ग ऐसे किसी आंदोलन का प्रयोग दबाव की राजनीति के रूप में आगे भी करता. इस मुद्दे को लेकर टीम अन्ना का सोच क्या है यह तो वही जाने, लेकिन वह अपने समर्थन में उतरे उन युवकों के मन को समझ रही थी, इसलिए जनलोकपाल आंदोलन से देश के सभी वर्गों को जोड़ने की अपील अगस्त आंदोलन के सबसे अंतिम दिन, बहुत ही दबे मन से की गई थी. तब तक दलित वर्ग रामलीला मैदान में उमड़ी युवाओं की भीड़ के मन को समझ चुका था. मन में शंका लिए वह निरंतर अन्ना के आंदोलन से कटता चला गया.

 टीम अन्ना को चाहिए था कि वह उस अविश्वास को दूर करने का प्रयास करती. लेकिन विचारहीनता के संकट और दूरदृष्टि की कमी में उलझी टीम अन्ना अपनी नीति स्पष्ट न कर सकी. रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के समर्थन में उमड़ी भीड़ को देख सरकार आंदोलन के दबाव में जरूर नजर आई थी, लेकिन बाद में कूटनीतिक तरीके से उसने जनलोकपाल को ठंडे बस्ते में डाल दिया. साथ ही फेसबुक पर होने वाली अनर्गल, भड़ासनुमा टिप्पणियों की रोकथाम के लिए उसने कानून का सहारा लिया. फलस्वरूप छद्म पहचान के जरिए अनर्गल टिप्पणियां करने वाला समूह, जो अगस्त आंदोलन में सक्रिय था, फेसबुक से नदारद होने लगा.

अब जब टीम अन्ना सक्रिय राजनीति में जाने की घोषणा कर चुकी है तो एक बार फिर उसकी निष्ठा और वैचारिक प्रतिबद्धता को लेकर सवाल उठाए जाएंगे. इसलिए कि देश में नेताओं की कमी नहीं है. टीम अन्ना को अपने आंदोलन के लिए कार्यकर्ता मिलें न मिलें, चुनावों में मतदाताओं के लिए उसको भले ही तरसना पड़े, लेकिन नेताओं की उसके पास कमी नहीं होगी. एक बार आवाह्न करने की देर है, हजारों लोग उसके बैनर के नीचे चुनाव लड़ने को खड़े होंगे. अपनीअपनी ईमानदारी की तख्ती उठाए, आत्ममुग्ध और बड़ेबड़े प्रशस्तिपत्र हाथ में लिए. उस समय टीम अन्ना किस आधार पर निर्णय लेगी! कैसे उनमें से सत्यनिष्ठ और प्रतिबद्ध नेताओं को खोज निकालेगी, यही उसकी सफलता की कसौटी होगी. आज विधायकी का चुनाव लड़ने के लिए भी कम से कम तीसचालीस लाख की जरूरत पड़ती है. उनके लिए धन कहां से लाएगी. अभी तक जो कारपोरेट घराने उसकी आर्थिक मदद करते आए हैं, राजनीति में आमनेसामने होने पर वे कितने सहायक होंगे, यह आने वाला समय ही बताएगा.

 ऐसा नहीं है कि अच्छे लोग चुनाव मैदान में आते ही नहीं हैं. किशन पटनायक, प्रकाश झा जैसे प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता चुनावों में उतरते ही रहे हैं. लेकिन लोकप्रिय राजनीति पर पकड़ न होने के कारण उनकी उपस्थिति केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाती है. इसके लिए टीम अन्ना कौनसे हथकंडे अपनाएगी, यह तो वही जाने, फिलहाल उसके सामने अपने उद्देश्य की प्रामाणिकता और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता को दर्शाने की बड़ी चुनौती होगी. इससे भी बड़ी चुनौती होगी, स्पष्ट विचारधारा, ठोस एजेंडे और सार्थक विकल्प के साथ जनता के सामने उपस्थित होने की, जिससे वह अभी तक बचती रही है. फिलहाल तो टीम अन्ना का आंदोलन दिशाहीन हो, बिखर गया लगता है.

 © ओमप्रकाश कश्यप

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