दो आसमानों के बीच: समापन किश्त

यात्रा संस्मरण

चार किलोमीटर की चढ़ाई के लिए गाड़ी पर पंद्रह मिनट का समय लगा. पहाड़ की चोटी पर मानो पूरा नगर बसा हुआ था. वहीं बीच चौक में ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी. चौक से मात्र पचास कदम दूर था नीलाचल पहाड़ी के शीर्ष पर ऊर्ध्वाधर खड़ा कामाख्या मंदिर. मुक्त आकाश से बतियाता हुआ. मंदिर के उत्तुंग शिखर को देखकर लगता था मानो उसके गर्भ में नीचे, मंदिर के प्रांगण में धर्म और आस्था के नाम पर जो कारोबार चलता है, उस ओर वह शायद ही देखता हो. शिखर की निगाह या तो दूर आसमान में तैरते बादलों पर जाती होगी, यदि कभी झुकें तो सीधे ब्रह्मपुत्र की विशाल जलराशि पर. आखिर पानी तो जड़जंगम को भी चाहिए ही.

मेजबान और सहयात्री आस्था में डूबे हुए, आगे बढ़ रहे थे. मैं पीछे था. आगे की अपनी भूमिका के बारे में अनुमान लगाता, अपने विश्वास को तौलता हुआ. मैं मन ही मन उन उन कारीगरों का चित्र अपने मनस् में बनाने की कोशिश कर रहा था, जिन्होंने रातदिन एक कर इस मंदिर का निर्माण किया था. बारीक नक्काशी का हुनर हासिल करने के लिए पहले वर्षों तक खुद को तराशा था, और बाकी की जिंदगी इस मंदिर को तराशने में खपा दी. क्या राजा सही मायने में उनके कला का मूल्यांकन कर पाया होगा! सुना है ऐसी विलक्षणभव्य इमारतों का निर्माण करने के बाद कारीगरों के हाथ काट दिए जाते थे. ताकि वे वैसी दूसरी कोई इमारत खड़ी न कर सकें. खुद को बाकी राजाओं से अलग दिखने के लिए सनकी सम्राट ऐसे कुकर्म करते ही रहे हैं. हम तो गाड़ी पर सवार होकर मजे से शीर्ष तक चले आए. जिस राजा ने इसका निर्माण करवाया वह भी पालकियों पर सवार होकर इसी तरह ऊपर चढ़ आया होगा. अपनी रानियों, मंत्रियों, संतरियों और कारिंदों के साथ. न उसको पसीना बहाना पड़ा न हमें. पर जिन्होंने पहाड़ी को काटकर यह रास्ता बनाया. मंदिर बनाने के लिए पत्थरों को तराशा, निर्माण सामग्री को दूर मैंदानों से लाकर यहां चोटी पर पहुंचाया. वे कितने पानीदार, जीवट वाले और उत्साही लोग रहे होंगे. या यह सब उन्होंने विवश होकर किया होगा?

पचास रुपये बतौर रिश्वत चढ़ावे में देकर सहयात्री और मेजबान मंदिर का गर्भद्वार खुलवाने में सफल हो चुके थे. भीतर अंधेरा था. कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था. सहयात्री और मेजबान मेरे आगे थे. मुझे नहीं लगता कि उन्होंने भी कुछ देखा हो. पर सहयात्री और मेजबान दोनों की आंखें श्रद्धावनत थीं. मेरा व्यवहार मेजबान को कुछ अजूबा लगा हो. निस्पंद खड़ा देख उन्होंने मुझसे भी देवी की अभ्यर्थना करने को कहा था. मैं मौन रहा. प्रतिवाद का मतलब था उनकी आस्था को ठेस पहुंचाना. उस सुंदर आतिथ्य का अपमान जो अभी तक हमारे लिए करते आ रहे थे. उस क्षण मैं सोच रहा था कि जिस देवी को हम इस अनंत सृष्टि की पालक, संहारकर्ता, निर्मात्री, सब मानते हैं, जिसमें समाये अनेकानेक ब्रह्मांडों के आगे इंसान तो क्या, स्वयं पृथ्वी का अस्तित्व नदी किनारे पड़े रेत कण जितना हो, उसके आगे धरती के एक क्षुद्र इंसान की गर्दन दो इंच उठाने या झुकान से क्या अंतर पड़नेवाला है! अंतर पड़ता भी हो उन पंडेपुजारियों के लिए जिनका कारोबार धर्म को कर्मकांड बनाए रखने पर निर्भर है, जो मनुष्य के विवेकीकरण से घबराते हैं तथा जैसे भी हो यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं.

देवी अभ्यर्थना के बाद लौटने की बारी थी. ड्राइवर हमें और ऊपर की ओर ले गया. वहां एक दर्शनस्पॉट था. उस स्थान से खड़ा होकर देखने पर गुवाहाटी शहर बिजली के बल्वों से झिलमिलाते टापू जैसा लग रहा था. ब्रह्मपुत्र की अथाह जलराशि का आकलन रात में संभव न था. परंतु पानी में झिलमिलाती तरहतरह की रोशनियां अलग ही नजारा पेश कर रही थीं. ऊपर से गहनजलराशि को छूकर आती ठंडी हवा. मन को भीतर तक शीतलता से भर जाती थी. हमें बताया गया था कि कुछ दिन बाद अंबुमासी मेला लगने वाला है. रास्ते के किनारे गाढ़े गए बांस बता रहे थे कि तैयारियां जोरों पर हैं. कुछ ही दिनों बाद यहां श्रद्धालुओं का हुजुम जुड़ने वाला है.

अंबुमासी का मतलब तो बाद में पता चला. असमवासी वर्ष में एक बार अंबुमासी के रूप में देवी के मासिकधर्म को पर्व की तरह मनाते हैं. हिंदुस्तान के बहुत से समाजों में मातृशक्ति की पूजा आज भी प्रचलित है. सभ्यता के आदिकाल से यह प्रथा चली आ रही है. खासकर जनजातियों में जहां प्रकृति के अपार वैभव के बीच जीवन बहुत विरल था. वहां जीवनचक्र को बनाए रखने के प्रयास भी स्तुत्य माने जाते थे. वही शिवलिंग की पूजा का आधार बने. वही मातृ शक्ति की अराधना का. हिंदुस्तान में जहांजहां देवी के मंदिर हैं, उनकी महिमा बनाए रखने के लिए उनमें से प्रत्येक को देवी के किसी न किसी अंग के गिरने से जोड़ा गया है. जहां कामाख्या का मंदिर है, वहां देवी का योनि भाग गिरा था. यह तांत्रिकों का प्रसिद्ध पीठ है. आमतौर पर कहा जाता है कि गौतम बुद्ध ने बौद्धधर्म के प्रचारप्रसार के लिए जो बौद्ध विहार बनवाए थे, वहीं कालांतर में मठ में रहने वालों के भोगविलास का कारण बन गए. उनमें मुक्त काम पनपने लगा, वही अंततः उनके पतन का कारण भी बना. भारतीय संस्कृति में योनि पूजा नई बात नहीं, बल्कि शताब्दियों से चली आ रही परंपरा है. अपनी यौनलिप्सा को संतुष्ट करने के लिए वैदिक पुजारियों ने यज्ञादि कर्मकांड को भी माध्यम बनायात्र. वौद्धधर्म के पराभव के दौर में वे रीतियां अपने रहस्यमयी आवरण के साथ तांत्रिक क्रियाकलापों में ढल गईं. परिणामस्वरूप बौद्ध मठों में मुक्त काम को जगह मिलने लगी. इससे तंत्र मार्ग का जन्म हुआ. देवीअराधना के नाम पर योनि पूजा और मुक्त कामाचार केवल बौद्धविहारों तक सीमित नहीं था. उसकी नींव महाकाव्य काल तक आतेआते चढ़ चुकी थी. मनुस्मृति के बाद ब्राह्मणवर्ग लोगों को यह समझाने में सफल हो चुका था कि संपूर्ण सृष्टि उसकी है. यहां तक कि स्त्रियां भी. इसलिए स्त्रियों में मुक्त भोग का खेल वैदिक काल में ही खेला जाने लगा था. उसी ने नियोगप्रथा को जन्म दिया. नियोग के लिए ब्राह्मण सर्वाधिक उपयुक्त पात्र है. यह भी शास्त्रसिद्ध बताया गया. रामायण के राम तथा उनके बंधु तथा महाभारत के पांच पांडवों को वीरता में अद्वितीय माना गया है. हमारा इरादा अर्जुन के समक्ष एकलव्य को खड़ा करके द्रोणाचार्य के छल को सामने लाना नहीं है. इतिहास उनके पाखंड को स्वयं तारतार कर चुका है. हम तो बस इतना याद दिलाना चाहते हैं कि रामायण और महाभारत दोनों के महानायक, महाकाव्यों के अद्वितीय वीर यानी चारों दशरथ पुत्र तथा पांचों पांडव नियोगसंतान हैं. क्या यह अन्यथा है? इस बात पर विमर्श अपेक्षित है कि कहीं यह नियोग को बढ़ावा देने का छल तो नहीं? यह कि ब्राह्मण की औरस संतान ही अद्वितीय वीर हो सकती है?

नीलाचल पर्वतमाला से ब्रह्मपुत्र तथा गुवाहाटी का विहंगावलोकन करने के बाद हम होटल वापस पहुंचे तो दस बज चुके थे. शरीर में थकान, आंखों में नीद दस्तक देने लगी थी. देह पर थकान ने कब्जा किया तो उसकी सहोदरा नींद भी आंखों के रास्ते उतरने लगी. दिल्ली की कूलर या एयरकंडीश्नर की बनावटी ठंडक से कुदरती शीलतता में अलग आनंद था. इसलिए भोजन के बाद नींद आई तो सुबह होने पर ही आंखें खुलीं. अगला दिन, अगली यात्रा. यह निर्णय लेने के बाद ही हमने एकदूसरे को शुभरात्रि कहा था.

सुबह का नाश्ता, आराम से केंटीन में किया. टेलीविजन, देखते हुए. दिल्ली में कांग्रेस प्रणव दा को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित कर चुकी थी. उनको समर्थनविरोध पर विभिन्न दलों की राजनीति जारी थी. व्यावसायिक चैनलों की खूबी देखिए कि उन्होंने खबरों को भी मनोरंजन का माध्यम बना दिया है. उसके चलते राजनीतिक समाचार भी अच्छेखासे प्रहसन लगने लगे हैं. उस समय भी टेलीविजन पर ऐसा ही प्रहसन जारी था. राष्ट्रपति गरिमामय पद है, उनका चुनाव भी गरिमापूर्ण होना चाहिए. परंतु यह प्रत्येक बात में मुनाफा और धंधागिरी करने वाले नेताओं की समझ आए तब न! भारतीय राजनीतिक दल जिस प्रकार स्वार्थी आचरण करते हैं, उससे तो देश का लोकतंत्र ही खतरे में नजर आने लगा है.

ठीक दस बजे होटल छोड़ा तो मन काफी शांत था. किसी भी नए शहर की सड़कों को सुबह की ताजगी में देखना यादों को गाढ़ा कर लेने जैसा जरूरी उपक्रम है. सहयात्री बहुत ही संवेदनशील हैं. उनका एक ही शौक, हर खास दृश्य, को अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लेना. कहीं सीधे फोटो, तो कभी वीडियोग्राफी के माध्यम से. उनका फोन हाथ से छूटता नहीं था. राजनीति में फुर्सत के क्षण बहुत कम आते हैं. उन व्यस्ततम क्षणों में एक पल को इन चित्रों को देखकर कुछ क्षणों के लिए तनाव से मुक्ति पाने का यह उनका अपना रास्ता है. चलने से पहले ही उन्होंने ड्राइवर से कह दिया था कि गाड़ी ब्रह्मपुत्र के घाट पर खड़ी करना. ताकि दिन के उजाले में ब्रह्मपुत्र के वैभव को जीभर निहार सकें. ड्राइवर ने मन की बात पकड़ ली. उसने गाड़ी को वहीं खड़ा किया जहां से ब्रह्मपुत्र साफ नजर आती थी. किनारे पर मजदूर बांसों की धुलाई कर रहे थे. उसी ने बताया कि ऊपर बांसों की खेती होती है. वहीं से वे यहां तक बहा कर लाए गए हैं. बहकर आए बांसों का किनारे जमघट लगा था. मानों दर्जनों नावों ने एकसाथ किनारे आकर लंगर डाल लिया हो. उस ओर गांव था, ड्राइवर हमें बता रहा था कि गुवाहाटी के लिए दूध की आपूर्ति उसी दिशा से होती है.

बांसों के ऊपर चढ़कर देखने से ब्रह्मपुत्र के बहाव को सीधे अनुभव किया जा सकता था. नीचे नदी की वेगवती धारा. मैं नदी के वैभव में डूबा हुआ था. जबकि सहयात्री को वहां के चित्र लेने की धुन सवार थी. जब से आए हैं उनका मोबाइल कैमरा लगातार चल रहा था. नदी किनारे झौपड़ियां पड़ी थीं. खाली. उनमें मजदूर परिवार आकर बसर करते होंगे. कड़ी मेहनत के बाद थकन मिटाने के लिए भी ये झोपड़ियां सिर पर छाया देने का काम करती होंगी. ब्रह्मपुत्र का विराट वैभव देखकर गंगा का चौड़ा पाट नजर आने लगा. बचपन में कई बार उसको देखा था. गढ़मुक्तेश्वर पर गंगा इसी तरह विराटरूप लेकर बहा करती थी. अब वह सिकुड़ने लगी है. फिर भी दिल्ली की यमुना से लाख दर्जे बेहतर. यमुना तो गंदानाला बनकर रह गई है. अपनी आर्थिक प्रगति पर इतराने वाली दिल्ली प्राकृतिक संसाधनों के मामले में कितनी कंगाल है, यह साफ नजर आ रहा था. संभव है अपनी आर्थिक ताकत के बल पर वह कुछ दशक और अपनी कंगाली को छिपा सके. लेकिन एक न एक दिन तो असलियत सामने आएगी ही.

विमान ने गुवाहाटी की उड़ान भरी तो मन वहां की यादों से भराभरा था. मेजबान का आत्मीय व्यवहार. निश्छल, प्यारे, सरलमना लोग. राजधानी होने के बावजूद गुवाहाटी अपने कस्बाई चरित्र को नहीं भुला पाया है. यह इस बात का प्रतीक है कि वहां की मिट्टी अपने लोगों को इतनी जल्दी नहीं भुलाती. लौटते हुए रहरह कर याद आ रहा था, राज्यपाल का वह गमन. जिसमें उनके आगेपीछे पचीसतीस कारों का कारवां था. सारा ट्रैफिक रोक दिया गया था. बीस मिनट से अधिक हमें चौराहे पर ही बिताने पड़े थे. इस देश में लोकतंत्र को आए 65 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन लोकतंत्र के झंडे तले सत्ता पर विराजमान होने वाले यहां के हुक्मरान, आज भी अपने चरित्र को लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं ढाल पाए हैं. संविधान उनके लिए महज औपचारिक व्यवस्था है. एक ढाल जिसके पीछे वे अपने सामंती चरित्र को छिपाये रहते हैं.

विमान एक बार फिर दो आसमानों के बीच उड़ रहा था. ऊपरनीचे बादल ही बादल. नीम बेहोशी में डूबे. हौलेहौले चहलकदमी करते, आसमान में कुलांचे भरते, नन्हे मृगछौने से बादल. आसमान में व्यावहारिक दिशाबोध काम नहीं करता. जैसे बादल इस ओर हैं, ठीक वैसे ही बादल, ठीक ऐसा ही आसमान, ठीक ऐसे ही नीलाचल पर तैरतीं, श्वेत कपासी चट्टानें. हिमालय के उस पार चीन में भी होंगी. ऐसे ही बादल भूटान, नेपाल, तिब्बत, बर्मा आदि उस पार के देशों में भी होंगे. आदमी की हवस का सिक्का सिर्फ धरती पर चलता है. अच्छा ही है, जो आसमान को वह बांट नहीं पाया है. कुछ औपचारिक विभाजन आसमान का भले ही हुआ हो. हमारी धरती से ऊपर, फलां ऊंचाई तक का आसमान हमारा है. पर यह आसमान धरती की कक्षा के साथ ही अपनी जगह बदलता रहता है. आदमी की हवस का सिक्का आसमान पर चल ही नहीं सकता.

गुवाहाटी से डिब्रूगढ़….केवल पचपन मिनट का सफर. चालक दल विमान के उतरने की घोषणा कर कर रहा था‘अब से थोड़ी ही देर बाद हम डिब्रूगढ़ में होंगे. यात्री कृपया अपनी सीटबैल्ट बांध लें. खूबसूरत शहर डिब्रूगढ़ में आपका स्वागत है.’

डिब्रूगढ़! पहाड़ की गोद में बसा छोटासा शहर. डिबू्रगढ़ नाम बना है ‘डिब्रामुख’ से. यहां कभी अहोम राजाओं की छावनी हुआ करती थी. कुछ लोग मानते हैं कि ‘डिब्रू’ शब्द ‘डिबारू’ या ‘दिमसा’ नदी से निकला है. एक परंपरा के अनुसार ‘दिमसा’ का अर्थ ‘विशाल नदी का शहर’ भी है. ब्रिटिश इस शहर में 1826 में कदम रख चुके थे. अंग्रेजों को डिब्रूगढ़ की भौगोलिक स्थिति इतनी पसंद आई थी कि यहां फौरन अपना व्यापारिक और प्रशासनिक कार्यालय बना लिया. 1840 में इसे लखीमपुर जिले का मुख्यालय बनाया गया. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यह शहर ब्रिटिश सेना का मुख्यालय बना. युद्ध के दौरान बर्मा से विस्थापित शरणार्थियों के लिए यह शरणस्थली बना. जनसंख्या के हिसाब से देखें तो डिब्रूगढ़ गुवाहाटी और जोरहट के बाद असम का तीसरा सबसे बड़ा शहर है. फिर भी कुल जनसंख्या मात्र तीन लाख. उत्तर भारत किसी छोटे शहर जितनी.

एयरपोर्ट से बहार निकले तो अगवानी के लिए यहां भी लोग तैयार थे. वही आत्मीय व्यवहार. वैसा ही दिल को छू लेने वाला संबोधन. सड़क संकरी थी. पर आसपास प्रकृति का वैभव मानो बिखरा पड़ा था. अतुलनीय सौंदर्य. ऐसा कि निगाह टिकी की टिकी रह जाए. सड़क के दोनों और चाय के बागान. दूर जहां तक नजर जाए, हरियाली ही हरियाली. लोग इसे ‘भारत का चाय का शहर’ कहते हैं तो वे गलत नहीं हैं. डिब्रूगढ़ को भारत के तीन प्रमुख चाय उत्पादक जिलों, तिनसुकिया, सिवसागर और स्वयं डिब्रूगढ़ का प्रवेश द्वार माना जाता है. देश के कुल चाय उत्पादन का आधा हिस्सा इन्हीं तीन जिलों से आता है. यहां गुवाहाटी जैसी भीड़भाड़ नहीं. न ही सड़कों पर अवैध कब्जादारी. प्राकृतिक वैभव ने यहां के निवासियों को संतोषी बना दिया है.

गाड़ी जहां रुकी वह डिब्रूगढ़ का पॉश इलाका था. होटल भी वहां के अच्छे होटलों में गिना जाता होगा. हालांकि दिल्ली के हिसाब से वह रेलवे स्टेशन के आसपास बने सस्ते विश्रामग्रह जैसा ही था. अधिक ठहरने का समय न था. डिबू्रगढ़ शहर और वहां के पठारों, नदियों का अवलोकन करना था. उसी शाम डिब्रूगढ़ की दलित बस्तियों में घूमने का अवसर मिला. पूरे नगर की साजसफाई की जिम्मेदारी संभालने वालों की हालत दिल्ली की किसी मलिन बस्ती से भी हजार गुना खस्ता थी. टीन के आठ बाई बारह के खोलीनुमा घर. सीलन और बदबू से बेहाल. छत पर प्लास्टिक, पोलीथीन, बांस की टाटियों सं बनी झोपड़ियां. सड़क से नीची. इतनी की गली का पानी सीधे झोपड़ी में जाकर रुके. कुम्हलाया बचपन. यूं तो दिल्ली में भी कई भारत बसते हैं. पर यह तस्वीर उस भारत की थी, जिसके अभी तक दर्शन नहीं हो पाए थे. लोकतंत्र का उत्सव तो यहां भी मनाया जाता होगा. हर पांच वर्ष में उम्मीद की गठरियां खोली जाती होंगी. पर पांच वर्ष ऐसे ही बीत जाते हैं, उन गठरियों की सौगात इन तक पहुंच ही नहीं पाती. छह फुट लंबा, चार फुट चौड़ा और लगभग डेढ़ फुट गहरा हथठेला. जिसे वे लोग शहर का कूड़ा यहां से वहां पहुंचाने के लिए काम में लाते हैं. कालोनी के सिरे पर ही एक अपेक्षाकृत पक्का कमरा था. सामने आंबेडकर जी की तस्वीर. अपनी कालोनी की तरह की खस्ताहाल. उसके आगे विद्यालय लिखा था. पर क्या वह सचमुच विद्यालय ही था! यहां बढ़कर जो विद्यार्थी बाहर निकलते होंगे, वे कितना आगे तक जाते होंगे. उनके सपने यहीं कीचड़ में दम तोड़ लेते हैं. ऐसे स्कूलों को उन लोगों को अवश्य दिखाया जाना चाहिए जो आरक्षण का विरोध करते हैं. जिन बच्चों को समय पर खाना, पेटभर भोजन, पहनने को कपड़े, पढ़ने को किताबें, सिर पर छत तक उपलब्ध नहीं, वे स्पर्धा के मामले में कितना टिक सकते हैं. उन लोगों के आगे तो सुविधासंपन्न एयरकंडीशनड विद्यालयों में पढ़े हैं. मेरे सहयात्री उनके लिए एक उम्मीद थे. बस्ती का युवक बता रहा था कि उसके दादेपरदादे असम के शासकों के बुलावे पर वहां पहुंचे थे. तीनचार पीढ़ियां वहीं गुजर चुकी हैं. इसके बावजूद उन्हें वहां का स्थायी निवासी नहीं माना जाता.

डिब्रूगढ़ के प्राकृतिक वैभव ने मन लुभाया था. पर उस बस्ती से गुजरने के बाद यात्रा का आनंद हवा हो चला था. अब वापस लौटना था. उस रात ढंग से सो भी न पाया. अगले दिन चाय बागान देखने का अवसर मिला. ब्रह्मपुत्र के दर्शन भी किए. पाट तक गए. असम की बोडो समस्या के बारे में भी पता चला. लेकिन बीते दिन की यादों ने पीछा नहीं छोड़ा. वे मुझे मनुष्यता के नाम पर गाली लगती रहीं. जहां एक ओर मीलों तक फैले चायबागान हों, धरती के वैभव का प्रदर्शन करती नदियां, ऊंचे पहाड़ और बेशुमार हरियाली हो. वहीं दूसरी ओर कीचड़सनी, भूख, बेकारी, गरीबी और गिजालतभरी जिंदगी हो, वहां ऐसे विद्रोही स्वरों का उभरना असामान्य नहीं. रूसो ने कहा था कि आदमी आजाद जन्मता है. लेकिन वह हर कहीं कैद में है. किसी और ने नहीं उसको इंसान ने उसके लिए बेड़ियां इंसान ने ही तैयार की हैं. इसलिए उत्पीड़ितों के न्याय के लिए विरोध के स्वर उभरना अवश्यंभावी है. भरपूर प्राकृतिक संपदा के बीच अमानवीय जिंदगी ये दस्तावेज इन संभावनाओं को और बढ़ा देते हैं.

वापसी में उड़ान चालीस मिनट के लिए कोलकाता में ठिठकी थी. कोलकाता भारतीय चेतना का शहर. महर्षि अरविंद, सुभाषचंद बोष और ऐसे ही न जाने कितने बंगवीरों, विद्वानों और महात्माओं की धरती. ममता दीदी का राज्य….उनकी राजनीति के बारे में तो नहीं मालूम, प्रथम दृष्टया वे मुझे ‘राजनीति की हरावल लेडी’ जान पड़ती हैं. कोलकाता से उड़ान भरी तो तेज हवाएं चल रही थीं. बादल कुछ और बोझिल हो चले थे. द्रवभार से झुकेझुके नजर आ रहे थे. बीच रास्ते दो बार चालक दल को सीटबेल्ट बांध लेने के निर्देश देने पड़े. थोड़ी घबराहट हुई. परंतु हवा के झोंके की तरह वह वक्त भी गुजर गया. अब दिल्ली करीब थी. अपनी उमस, प्रदूषण, भीड़भाड़, ट्रेफिक जाम, नाजनखरे, वैभव और अपनी समस्त राजनीतिक चालकुचाल के साथ.

© ओमप्रकाश कश्यप

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