विनोबा भावे: प्रथम सत्याग्रही—एक

चरख भिख्खवे चारिकम्: बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय गौतम बुद्ध

 

यूं तो समूची भारत वसुंधरा ही चिंतन और कर्म की जन्मभूमि रही है. लेकिन महाराष्ट्र की धरा को एक साथ कई परिवर्तनकामी आंदोलनों की पुण्यधरा का गौरव विशेषरूप से प्राप्त है. ऊंच-नीच और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध समानतावादी आंदोलनों के जन्मदाता महापुरुष जितने महाराष्ट्र में जन्म, उतने देश के किसी और हिस्से में शायद ही जन्मे हों. उन्हीं के सद्कर्मों से परिवर्तनकामी आंदोलनों की लहर वहां उठी, जिसने पूरे देश में बदलाव को हवा दी. यहीं पर बारहवीं शताब्दी में निर्गुण भक्ति परंपरा के उन्नायक संत ज्ञानेश्वर का जन्म हुआ, जिन्होंने कर्मकांड, धार्मिक जड़ता, बौद्धिक वितंडा एवं वर्गीय उत्पीड़न का विरोध करते हुए निर्गुण भक्ति पर जोर दिया. धार्मिक कट्टरपंथियों तथा पाखंडप्रेमियों के अत्याचार-अनाचार के कारण ज्ञानेश्वर और उनके परिवार का जीवन अत्यंत कष्ट और दुःख में बीता. उनके महान ग्रंथ ज्ञानेश्वरी की उपेक्षा की गई. मगर रचना के तीन सौ वर्ष उपरांत जब वह अप्रतिम ग्रंथ दुनिया के सामने आया तो लोग उसकी सरलता और चिंतन की गहराई से अचंभित रह गए. संत ज्ञानेश्वर की प्रतिभा और ज्ञान-सिद्धि ने लोगों की आंखों को चैंधिया दिया. उनका संदेश महाराष्ट्र के घर-घर में गूंजने लगा. संत की गरिमा प्रदान की गई. इनके अतिरिक्त संत नामदेव, तुकाराम, एकनाथ आदि ने भी महराष्ट्र की संत परंपरा को समृद्ध करने का काम किया. आजकल राजनीति से प्रेरित लोग महाराष्ट्र को वीर शिवाजी की धरती कहते हैं. उन्हें मराठी अस्मिता का प्रतीक-पुरुष बताते हैं. लेकिन जिन्हें इतिहास की थोड़ी भी समझ है वे जानते हैं कि वीर शिवाजी को छत्रपति शिवाजी बनाने, उनका सुसंस्कार करने में शिवाजी की मां जीजाबाई का जितना योगदान था, लगभग उतना ही योगदान था समर्थ गुरु रामदास का भी था.

      उनीसवीं शताब्दी के स्त्री एवं समाज सुधार आंदोलनों के अगुआ, विचारक ज्योतिबा फुले का जन्म भी पुण्यभूमि महाराष्ट्र में ही हुआ. उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री बाई फुले के साथ सामाजिक समानता के लिए लंबा संघर्ष किया. स्त्रियों को घर की चारदीवारी से निकाल कर उनके लिए स्वतंत्र शिक्षा की राह प्रशस्त की. स्त्री-शिक्षा की राह को आसान बनाने के लिए उन्होंने उनके लिए स्वतंत्र पाठशालाएं खोलीं. इसके लिए रूढ़िवादी, धर्म-प्रवंचकों और जाति का पाखंड रचने वाले लोगों ने उनका विरोध भी किया. जानलेवा हमले किए उनपर. लेकिन वे अड़े रहे. अड़े ही रहे. फुले के संघर्ष को आगे बढ़ाने वालों में डॉ. भीमराव आंबेडकर प्रमुख थे. जिन्होंने बीसवीं शताब्दी को दलित अस्मिता के उन्नयन का पर्याय बना दिया. अपनी सूझबूझ और अप्रतिम विद्वता के आधार पर दलित अधिकारों के लिए निरंतर अनथक संघर्ष करते हुए उन्होंने उसमें अपेक्षित कामयाबी प्राप्त की. डॉ. आंबेडकर के आंदोलन का ही प्रभाव था कि महात्मा गांधी को अपने अछूतोद्धार जैसे कार्यक्रम प्रमुखता से आरंभ करने पड़े. डॉ. आंबेडकर के जन्म के चार वर्ष पश्चात ही इस पुण्य धरा पर एक और महापुरुष का जन्म हुआ, जिसने गांधी जी के विचारों को उनसे भी ज्यादा ईमानदारी और निष्ठा के साथ जिया. लोग उन्हें गांधीजी का शिष्य मानते हैं. स्वयं वे भी यही मानते थे. मगर वे केवल परंपरा का अनुसरण करने वाले वाले शिष्य नहीं थे. बल्कि वे गुरु की विरासत का विस्तार करने वाले, उसको नई ऊचाइयों तक ले जाने वाले इंसान थे.

     गांधी और विनोबा की गुरु-शिष्य परंपरा की तुलना अगर किसी से करनी ही हो तो वह सुकरात और प्लेटो अथवा प्लेटो और अरस्तु के साथ की जा सकती है, जहां शिष्यत्व गुरु की चेतना का संवाहक और उन्नायक है. सर्वोदय गांधीवादी विचारधारा से आगे का चिंतन है. विनोबा की भूदान और ग्रामदान जैसी अभिकल्पनाएं गांधी जी के ग्राम स्वराज्य के सपने का ही विस्तार थीं. बावजूद इसके यह विनोबा की उदारता ही थी कि वे आजीवन स्वयं को गांधी जी का विनम्र अनुयायी ही मानते रहे.

     महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में एक गांव है, गागोदा. वहां एक साधारण गृहस्थ निवास करते थे, नरहरि भावे. गणित के प्रेमी और वैज्ञानिक सूझबूझ वाले. रसायन विज्ञान में उनकी गहन रुचि थी. उन दिनों रंगों को बाहर से आयात करना पड़ता था. नरहरि भावे रात-दिन रंगों की खोज में लगे रहते. बस एक धुन थी उनकी कि भारत को इस मामले में आत्मनिर्भर बनाया जा सके. उनकी पत्नी रुक्मिणी बाई ममतामयी, विदुषी महिला थीं. उदार-चित्त, आठों याम लोककल्याण भाव में डूबी रहतीं. इसका असर उनके दैनिक कार्य पर भी पड़ता था. मन कहीं और रमा होता तो कभी सब्जी में नमक कम पड़ जाता, कभी ज्यादा. कभी दाल के बघार में हींग डालना भूल जातीं तो कभी बघार दिए बिना ही दाल परोस दी जाती. पूरा परिवार उनके स्नेह-सूत्र में बंधा था. इसलिए इन छोटी-मोटी बातों की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता था. उसी सात्विक वातावरण में 11 सितंबर, 1895 को विनोबा का जन्म हुआ. उनका बचपन का नाम था विनायक. मां उन्हें प्यार से विन्या कहकर बुलातीं. विनोबा के अलावा रुक्मिणी बाई के दो और बेटे थे—वाल्कोबा और शिवाजी. विनायक से छोटे वाल्कोबा. शिवाजी सबसे छोटे. विनोबा नाम गांधी जी ने दिया था. महाराष्ट्र में नाम के पीछे ‘बा’ लगाने का जो चलन है, उसके अनुसार. तुकोबा, विठोबा और विनोबा.

     मां का स्वभाव विनायक ने भी पाया था. उनका मन भी हमेशा अध्यात्म चिंतन में लीन रहता. न उन्हें खाने-पीने की सुध रहती थी. न स्वाद की खास पहचान थीं. मां जैसा, जो भी परोस देतीं, चुपचाप खा लेते. रुक्मिणी बाई का गला बड़ा ही मधुर था. भजन सुनते हुए वे उसमें डूब जातीं. गातीं तो भाव-विभोर होकर, पूरे वातावरण में भक्ति-सलिला प्रवाहित होने लगती. रामायण की सैकड़ों चैपाइयां उन्हें कंठस्थ थीं. उन्हें वे मधुर भाव से गातीं. ऐसा लगता जैसे मां शारदा गुनगुना रही हो. विनोबा को अध्यात्म के संस्कार देने, उनके मन में भक्ति के प्रति अनुराग जगाने, बचपन में ही उनके मन में संन्यास और वैराग्य की प्रेरणा जगाने में उनकी मां रुक्मिणी बाई का बड़ा योगदान था. बालक विनायक को माता-पिता दोनों के संस्कार मिले. गणित की सूझ-बूझ और तर्क-सामर्थ्य, विज्ञान के प्रति गहन अनुराग, परंपरा के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तमाम तरह के पूर्वाग्रहों से अलग हटकर सोचने की कला उन्हें पिता की ओर से प्राप्त हुई. जबकि मां की ओर से मिले धर्म और संस्कृति के प्रति गहन अनुराग, प्राणीमात्र के कल्याण की भावना. जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण, सर्वधर्म समभाव, सहअस्तित्व और ससम्मान की कला. आगे चलकर विनोबा को गांधी जी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माना गया. आज भी कुछ लोग यही कहते हैं. मगर यह विनोबा के चरित्र का एकांगी और एकतरफा विश्लेषण है. वे गांधी जी के ‘आध्यात्मिक उत्तराधिकारी’ से बहुत आगे, स्वतंत्र सोच के स्वामी थे. मुख्य बात यह है कि गांधी जी के प्रखर प्रभामंडल के आगे उनके व्यक्तित्व का स्वतंत्र मूल्यांकन हो ही नहीं पाया.

      महात्मा गांधी राजनीतिक जीव थे. आम हिंदुस्तानी की भांति उनकी आध्यात्मिक चेतना सुबह-शाम की आरती और पूजा-पाठ तक सीमित थी. जबकि उनकी धार्मिक-चेतना उनके राजनीतिक कार्यक्रमों के अनुकूल और समन्वयात्मक थी. उसमें आलोचना-समीक्षा भाव के लिए कोई स्थान नहीं था. धर्म-दर्शन के मामले में यूं तो विनोबा भी समर्पण और स्वीकार्य-भाव रखते थे. मगर उन्हें जब भी अवसर मिला धर्म-ग्रंथों की व्याख्या उन्होंने लीक से हटकर की. चाहे वह ‘गीता प्रवचन’ हों या संत तुकाराम के अभंगों पर लिखी गई पुस्तक ‘संतप्रसाद’. इससे उसमें पर्याप्त मौलिकता और सहजता है. यह कार्य वही कर सकता था जो किसी के भी बौद्धिक प्रभामंडल से मुक्त हो. एक बात यह भी महात्मा गांधी के सान्न्ध्यि में आने से पहले ही विनोबा आध्यात्मिक ऊंचाई प्राप्त कर चुके थे. आश्रम में आनने के बाद भी वे अध्ययन-चिंतन के लिए नियमित समय निकालते थे. विनोबा से पहली ही मुलाकात में प्रभावित होने पर गांधी जी ने सहज-मन से कहा था—

      ‘बाकी लोग तो इस आश्रम से कुछ लेने के लिए आते हैं, एक यही है जो हमें कुछ देने के लिए आया है.’

     विनोबा भावे की अध्यात्म-चेतना असाधारण थी. दर्शनशास्त्र उनका प्रिय विषय था. आश्रम में दाखिल होने के कुछ महीने के भीतर ही दर्शनशास्त्र की आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने एक वर्ष का अध्ययन अवकाश लिया था. अगर वे दर्शन के क्षेत्र में जाते तो भक्ति वेदांत की हृदयग्राही व्याख्याओं के लिए जाने जाते. इसलिए विनोबा को गांधी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी मानना जहां गांधी जी क्षमताओं का गलत आकलन करना है, वहीं विनोबा भावे की प्रतिभा/पहुंच को कमतर आंकना है. असल में गांधीजी के प्रभामंडल में विनोबा के चरित्र की व्याख्या कभी हो ही नहीं पाई.

     विनोबा के यूं तो दो छोटे भाई और भी थे, मगर मां का सर्वाधिक वात्सल्य विनायक को ही मिला. भावनात्मक स्तर पर विनोबा भी खुद को अपने पिता की अपेक्षा मां के अधिक करीब पाते थे. यही हाल रुक्मिणी बाई का था, तीनों बेटों में ‘विन्या’ उनके दिल के सर्वाधिक करीब था. वे भजन-पूजन को समर्पित रहतीं. मां के संस्कारों का प्रभाव. भौतिक सुख-सुविधाओं के प्रति उदासीनता और त्याग की भावना किशोरावस्था में ही विनोबा के चरित्र का हिस्सा बन चुकी थी. घर का निर्जन कोना उन्हें ज्यादा सुकून देता. मौन उनके अंतर्मन को मुखर बना देता. वे घर में रहते, परिवार में सबके बीच, मगर ऐसे कि सबके साथ रहते हुए भी जैसे उनसे अलग, निस्पृह और निरपेक्ष हों. एकांत से बाहर आते तो मां के सान्निध्य में शरण पाते. ‘विन्या’ रुक्मिणी देवी के दिल, उनकी आध्यात्मिक मन-रचना के अधिक करीब था. मन को कोई उलझन हो तो वही सुलझाने में मदद करता. कोई आध्यात्मिक समस्या हो तो भी विन्या ही काम आता. यहां तक कि यदि पति नरहरि भावे भी कुछ कहें तो उसमें विन्या का निर्णय ही महत्त्वपूर्ण होता था.

     ऐसा नहीं है कि विन्या एकदम मुक्त या नियंत्रण से परे था. परिवार की आचार संहिता विनोबा पर भी पूरी तरह लागू होती थी. ठीक उसी प्रकार जैसे बाकी सदस्यों पर. विनोबा के बचपन की एक घटना है. रुक्मिणी बाई ने बच्चों के लिए एक नियम बनाया हुआ था कि भोजन तुलसी के पौघे को पानी देने के बाद ही मिलेगा. विन्या बाहर से खेलकर घर पहुंचते, भूख से आकुल-व्याकुल. मां के पास पहुंचते ही कहते—

     ‘मां, भूख लगी है, रोटी दो.’

      ‘रोटी तैयार है, लेकिन मिलेगी तब पहले तुलसी को पानी पिलाओ.’ मां आदेश देती.

      ‘नहीं मां, बहुत जोर की भूख लगी है.’ अनुनय करते हुए बेटा मां की गोद में समा जाता. मां को उसपर प्यार हो आता. परंतु नियम-अनुशासन अटल—

      ‘तो पहले तुलसी के पौधे की प्यास बुझा.’ बालक विन्या तुलसी के पौधे को पानी पिलाता, फिर भोजन पाता.

      रुक्मिणी सोने से पहले समर्थ गुरु रामदास की पुस्तक ‘दास बोध’ का प्रतिदिन अध्ययन करतीं. उसके बाद ही वे चारपाई पर जातीं. बालक विन्या पर इस असर पड़ना स्वाभाविक ही था. वे उसे संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम, नामदेव और शंकराचार्य की कथाएं सुनातीं. रामायण, महाभारत की कहानियां, उपनिषदों के तत्व ज्ञान के बारे में समझातीं. वही बातें जिन्हें वे दूसरों से सुनती आई थीं. संन्यास उनकी भावनाओं पर सवार रहता. लेकिन वे दुनिया से भागने के बजाय लोगों से जुड़ने पर अधिक जोर देतीं. संसार से भागना तो जीवन से पलायन है. बुराइयों के लिए दुनिया की कोसने के बजाय वे उसे बदलने का आग्रह करतीं. अक्सर कहतीं—‘विन्या, गृहस्थाश्रम का भली-भांति पालन करने से पितरों को मुक्ति मिलती है.’ लेकिन विन्या पर तो गुरु रामदास, संत ज्ञानेश्वर और शंकराचार्य का भूत सवार रहता. इन सभी महात्माओं ने अपनी आध्यात्मिक तृप्ति के लिए बहुत कम आयु में अपने माता-पिता और घर-परिवार का बहिष्कार किया था. वे कहते—

      ‘मां जिस तरह समर्थ गुरु रामदास घर छोड़कर चले गए थे, एक दिन मुझे भी उसी तरह प्रस्थान कर देना है.’

      ऐसे में कोई और मां होती तो हिल जाती. विचारमात्र से रो-रोकर आसमान सिर पर उठा लेती. क्योंकि लोगों की सामान्य-सी प्रवृत्ति बन चुकी है कि त्यागी, वैरागी होना अच्छी बात, महानता की बात, मगर तभी तक जब त्यागी और वैरागी दूसरे के घर में हों. अपने घर में वे हों जो साधारण आदमी की तरह गृहस्थी बसाएं, सुख-समृद्धि बटोरें, यश कमाएं. पर रुक्मिणी बाई तो जैसे किसी और ही मिट्टी की बनी थीं. वे बड़े प्यार से बेटे को समझातीं—

      ‘विन्या, गृहस्थाश्रम का विधिवत पालन करने से माता-पिता तर जाते हैं. मगर बृह्मचर्य का पालन करने से तो 41 पीढ़ियों का उद्धार होता है.’

      बेटा मां के कहे को आत्मसात करने का प्रयास कर ही रहा होता कि वे आगे जोड़ देतीं—

      ‘विन्या, अगर मैं पुरुष होती तो सिखाती कि वैराग्य क्या होता है.’

      बचपन में बहुत कुशाग्र बुद्धि थे विनोबा. दर्शन में खास रुचि थी. गणित उनका प्रिय विषय था. कविता और अध्यात्म चेतना के संस्कार मां से मिले. उन्हीं से जड़ और चेतन दोनों को समान दृष्टि से देखने का बोध जागा. मां बहुत कम पढ़ी-लिखी थीं. पर उन्होने की विन्या को अपरिग्रह, अस्तेय के बारे में अपने आचरण से बताया. व्यवहार से समझाया कि दूसरों को सुख पाकर आनंद प्राप्त करना एक कला है. उसी में गृहस्थी की सफलता का राज छिपा है. मां ने ही उन्हें संसार में रहकर उससे निस्पृह-निर्लिप्त रहना सिखाया. यह जीते जी कैवल्य प्राप्त करने की अवस्था थी. मां का ही असर था कि विन्या कविता रचते और और उन्हें आग के हवाले कर देते. दुनिया में जब सब कुछ अस्थाई और क्षणभंगुर है, कुछ भी साथ नहीं जाना तो अपनी रचना से ही मोह क्यों पाला जाए! उस समय यही भाव उनके साथ रहता. अतिशय भावुक वे आरंभ से ही थे. इसलिए जो भी करते उसको सच्चे मन और दिल की गहराइयों से करते. मां यह सब देखतीं, सोचतीं, मगर कुछ न कहतीं. मानो दिमाग में कोई बड़ी योजना हो. विन्या को बड़े से बड़े त्याग करने के लिए तैयार कर रही हों. विनोबा की अध्यात्म चेतना मां की देन थी. गणित की प्रवीणता और उसके तर्क उनके आध्यात्मिक विश्वास के आड़े नहीं आते थे. यदि कभी दोनों के बीच स्पर्धा होती भी तो जीत आध्यात्मिक विश्वास की ही होती. जैसे माता-पिता दोनों से गहनानुराग होने के बावजूद वे अकेले में स्वयं को मां के अधिक निकट पाते थे. आज वे घटनाएं मां-बेटे के आपसी स्नेह-अनुराग और विश्वास का ऐतिहासिक दस्तावेज हैं—

      रुक्मिणी बाई हर महीने चावल के एक लाख दाने दान करती थीं. एक लाख की गिनती करना भी आसान न था, सो वे पूरे महीने एक-एक चावल गिनती रहतीं. नरहरि भावे पत्नी को चावल गिनते में श्रम करते देख मुस्कराते. कम उम्र में ही आंख कमजोर पड़ जाने से डर सताने लगता. उनकी गणित बुद्धि कुछ और ही कहती. सो एक दिन उन्होंने रुक्मिणी बाई  को टोक ही दिया—

      ‘इस तरह एक-एक चावल गिनने में समय जाया करने की जरूरत ही क्या है. एक पाव चावल लो. उनकी गिनती कर लो. फिर उसी से एक लाख चावलों का वजन निकालकर तौल लो. कमी न रहे, इसलिए एकाध मुट्ठी ऊपर से डाल लो.’

      बात तर्क की थी. लौकिक समझदारी भी इसी में थी कि जब भी संभव हो, दूसरे जरूरी कार्यों के लिए समय की बचत की जाए. रुक्मिणी बाई को पति का तर्क समझ तो आता. पर मन न मानता. एक दिन उन्होंने अपनी दुविधा विन्या के सामने प्रकट करने के बाद पूछा—‘इस बारे में तेरा क्या कहना है, विन्या?’

      बेटे ने सबकुछ सुना, सोचा. बोला, ‘मां, पिता जी के तर्क में दम है. गणित यही कहता है. किंतु दान के लिए चावल गिनना सिर्फ गिनती करना नहीं है. गिनती करते समय हर चावल के साथ हम न केवल ईश्वर का नाम लेते जाते हैं, बल्कि हमारा मन भी उसी से जुड़ा रहता है.’ ईश्वर के नाम पर दान के लिए चावल गिनना भी एक साधना है, जिसमें मन हर घड़ी अपने आराध्य के निकट अनुभव करता है. सुनकर रुक्मिणी बाई हैरान. चावलों के गिनने की ऐसी व्याख्या….ऐसा पहले कहां सोचा था! अध्यात्मरस में पूरी तरह डूबी रहने वाली रुक्मिणी बाई को ‘विन्या’ की बातें खूब भातीं. बेटे पर गर्व हो आता था उन्हें. उन्होंने आगे भी चावलों की गिनती करना न छोड़ा. न ही इस काम से उनके मन कभी निरर्थकता बोध जागा. एक साधना मानकर उसे और भी मनोयोग से करने लगीं.

      ऐसी ही एक और घटना है. जो दर्शाती है कि विनोबा कोरी गणितीय गणनाओं में आध्यात्मिक तत्व कैसे खोज लेते थे. घटना उस समय की है जब वे गांधी जी के आश्रम में प्रवेश कर चुके थे तथा उनके रचनात्मक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे. आश्रम में सुबह-शाम प्रार्थना सभाएं होतीं. उनमें उपस्थित होने वाले आश्रमवासियों की नियमित गिनती की जाती. यह जिम्मेदारी एक कार्यकर्ता थी. प्रसंग यह है कि एक दिन प्रार्थना सभा के बाद जब उस कार्यकर्ता ने प्रार्थना में उपस्थित हुए आगंतुकों की संख्या बताई तो विनोबा झट से प्रतिवाद करते हुए बोले—

      ‘नहीं इससे एक कम थी.’

      कार्यकर्ता को अपनी गिनती पर विश्वास था, इसलिए वह भी अपनी बात पर अड़ गया. कर्म में विश्वास रखने वाले विनोबा आमतौर पर बहस में पड़ने से बचते थे. मगर उस दिन वे भी अपनी बात पर अड़ गए. आश्रम में विवादों का निपटान बापू की अदालत में होता था. गांधी जी को अपने कार्यकर्ता पर विश्वास था. मगर जानते थे कि विनोबा यूं ही बहस में नहीं पड़ने वाले. वास्तविकता जानने के लिए उन्होंने विनोबा की ओर देखा. तब विनोबा ने कहा—

      ‘प्रार्थना में सम्मिलित श्रद्धालुओं की संख्या जितनी इन्होंने बताई उससे एक कम ही थी.’

      ‘वह कैसे?’

      ‘इसलिए कि एक आदमी का तो पूरा ध्यान वहां उपस्थित सज्जनों की गिनती करने में लगा था.’

      गांधीजी विनोबा का तर्क समझ गए. प्रार्थना के काम में हिसाब-किताब और दिखावे की जरूरत ही क्या. आगे से प्रार्थना सभा में आए लोगों की गिनती का काम रोक दिया गया.

      युवावस्था के प्रारंभिक दौर में ही विनोबा आजन्म ब्रह्मचारी रहने की ठान चुके थे. वही महापुरुष उनके आदर्श थे जिन्होंने सत्य की खोज के लिए बचपन में ही वैराग्य ओढ़ लिया था. जब संन्यास धारण कर ब्रह्मचारी बनना है, गृहस्थ जीवन से नाता ही तोड़ना है तो क्यों न मन को उसी के अनुरूप तैयार किया जाए. क्यों उलझा जाए संबंधों की मीठी डोर, सांसारिक प्रलोभनों में. ब्रह्मचर्य की तो पहली शर्त यही है कि मन को भटकने से रोका जाए. वासनाओं पर नियंत्रण रहे. इसके लिए वह हर संभव प्रयत्न करने लगे.

      किशोर विनायक से किसी ने कह दिया था कि ब्रह्मचारी को किसी विवाह के भोज में सम्मिलित नहीं होना चाहिए. वे ऐसे कार्यक्रमों में जाने से अक्सर बचते भी थे. पिता नरहरि भावे तो थे ही, यदि किसी और को ही जाना हुआ तो छोटे भाई चले जाते. विनोबा का तन दुर्बल था. बचपन से ही कोई न कोई व्याधि लगी रहती. आंत्र रोग तो मानो चिपका हुआ था. लेकिन मन-मस्तिष्क पूरी तरह चैतन्य, सजग और विचारवान. मानो शरीर की सारी शक्तियां सिमटकर दिमाग में समा गई हों. स्मृति विलक्षण थी. किशोर विनायक ने वेद, उपनिषद के साथ-साथ संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम, नामदेव के सैकड़ों पद अच्छी तरह याद कर लिए थे. गीता उन्हें बचपन से ही कंठस्थ थी. संस्कृत, मराठी, हिंदी, उर्दू में वे धाराप्रवाह बोल सकते थे. आगे चलकर चालीस हजार श्लोक भी उनके मानस में अच्छी तरह रम गए.

      वैराग्य की अपनी धुन में भोज से दूर रहने का संकल्प वे ले चुके थे. कि अचानक परीक्षा की घड़ी करीब आ गई. बड़ी बहन का विवाह तय हुआ. व्रत के पक्के विनोबा ने तय कर लिया कि विवाह के अवसर पर भोज से दूर रहेंगे. कोई टोका-टाकी न करे, इसलिए उन्होंने उस दिन उपवास रखने की घोषणा कर दी. बहन के विवाह में भाई उपवास रखे, यह भी उचित न था. पिता तो सुनते ही नाराज हो गए. मगर मां ने बात संभाल ली. उन्होंने बेटे के मन को समझा. उसके संकल्प का सम्मान करते हुए उन्होंने साधारण ‘दाल-भात’ खाने के लिए राजी कर लिया. यही नहीं अपने हाथों से अलग पकाकर भी दिया. धूम-धाम से विवाह हुआ. विनायक ने खुशी-खुशी उसमें हिस्सा लिया. लेकिन अपने लिए मां द्वारा खास तौर पर बनाए दाल-भात से ही गुजारा किया. मां-बेटे का यह प्रेम आगे भी बना रहा. आगे चलकर जब संन्यास के लिए घर छोड़ा तो मां की एक लाल किनारी वाली धोती तथा उनके पूजाघर से एक मूति साथ ले गए. मूर्ति तो उन्होंने दूसरे को भेंट कर दी थी. मगर मां की धोती जहां भी वे जाते, अपने साथ रखते. सोते तो सिरहाने रखकर. जैसे मां का आशीर्वाद साथ लिए फिरते हों. संन्यासी मन भी मां की स्मृतियों से पीछा नहीं छुटा पाया था. मां के संस्कार ही विनोबा की आध्यात्मिक चेतना की नींव बने. उन्हीं पर उनका जीवनदर्शन विकसित हुआ. आगे चलकर उन्होंने रचनात्मकता और अध्यात्म के क्षेत्र में जो ख्याति अर्जित की उसके मूल में भी मां की ही प्रेरणाएं थीं.

      रुक्मिणी बाई  कम पढ़ी-लिखीं थीं. संस्कृत समझ नहीं आती थीं. लेकिन मन था कि गीता-ज्ञान के लिए तरसता रहता. एक दिन मां ने अपनी कठिनाई पुत्र के समक्ष रख ही दी—

      ‘विन्या, गीता पढ़ना चाहती हूं, पर संस्कृत गीता समझ में नहीं आती.’ विनोबा जब अगली बार बाजार गए, गीता के तीन-चार मराठी अनुवाद खरीद लाए. लेकिन उनमें भी अनुवादक ने अपना पांडित्य प्रदर्शन किया था.

      ‘मां बाजार में यही अनुवाद मिले.’ विन्या ने समस्या बताई. ऐसे बोझिल और उबाऊ अनुवाद अपनी अल्पशिक्षित मां के हाथ में थमाते हुए वे स्वयं दुःखी थे. पर मां तो मानो भविष्य देख रही थीं.

     ‘तो तू नहीं क्यों नहीं करता नया अनुवाद.’ मां ने जैसे चुनौती पेश की. विनोबा उसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे.

      ‘मैं, क्या मैं कर सकूंगा?’ विनोबा ने हैरानी जताई. उस समय उनकी अवस्था मात्र 21 वर्ष थी. पर मां को बेटे की क्षमता पर पूरा विश्वास था.

      ‘तू करेगा…तू कर सकेगा विन्या!’ मां के मुंह से बरबस निकल पड़ा.

 मानो आशीर्वाद दे रही हो. कह रही हों कि यह कार्य बस तू ही कर सकता है. गीता के प्रति विनोबा का गहन अनुराग पहले भी था. परंतु उसका वे भाष्य लिखेंगे, और वह भी मराठी में—यह उन्होंने कभी सोचा तक न था. लेकिन मां की इच्छा भी उनके लिए सर्वोपरि थी. धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया. गीता पहले भी उन्हें भाती थी. अब तो जैसे हर आती-जाती सांस गीता का पाठ करने लगी. रोम-रोम मानो गीता हो गया. यह सोचकर कि मां मे निमित्त काम करना है. दायित्वभार साधना है. विनोबा का मन गीता में रमण करने लगा. और फिर स्वप्न के संकल्प में बदलते देर न लगी. उसी साल 7 अक्टूबर को उन्होंने अनुवादकर्म के निमित्त कलम उठाई. उसके बाद तो प्रातःकाल स्नानादि के बाद रोज अनुवाद करना, उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया. यह काम 1931 तक निरंतर चला. परंतु जिस मां के लिए सारा संकल्प साधा था, वह उस उपलब्धि को देख न सकीं. रुक्मिणी बाई का निधन 24 अक्टूबर 1918 को हुआ. उस समय तक अनुवादकर्म अधूरा था. मां का जाना विनोबा के लिए बड़ा आघात था. परंतु तब तक मन में वैराग्य भाव समा चुका था. मां गीता के अनुवाद का दायित्वभार सौंप कर गई हैं, विनोबा मनोयोग से उस काम में लगे रहे.

      धार्मिक संस्कारों में पाखंड उन्हें स्वीकार न था. मां के निधन के समय भी विनोबा का अपने पिता और भाइयों से मतभेद हुआ. विनोबा ब्राह्मणों के हाथ से परंपरागत तरीके से दाह-संस्कार का विरोध कर रहे थे. लेकिन परिवार वालों की जिद के आगे उनकी एक न चली. विनोबा भी अपने सिद्धांतों पर अडिग थे. नतीजा यह कि जिस मां को वे सबसे अधिक चाहते थे, जो उनकी आध्यात्मिक गुरु थीं, जिनसे उन्हें भावना का वरदान मिला था, उनके अंतिम संस्कार से वे दूर ही रहे. मां को उन्होंने भीगी आंखों से मौन विदाई दी. आगे चलकर 29 अक्टूबर 1947 को विनोबा के पिता का निधन हुआ तो उन्होंने वेदों के निर्देश कि ‘मिट्टी पर मिट्टी का ही अधिकार है’ का पालन करते हुए उनकी देह को अग्नि-समर्पित करने के बजाय, मिट्टी में दबाने जोर दिया. तब तक हालात बदल चुके थे. गांधीजी के करीबी विनोबा अब ‘संत विनोबा’ थे. बापू का उन्हें आशीर्वाद था. इसलिए इस बार उन्हीं की चली.

      मां की गीता में आस्था थी. रुक्मिणी बाई विनोबा को गीता का मराठी में अनुवाद करने का दायित्व सौंपकर गई थीं. विनोबा उस कार्य में पूरी तल्लीनता से लगे थे. आखिर अनुवाद कर्म पूरा हुआ. पुस्तक का नाम रखा गया—गीताई. ‘गीता़+आई = गीताई. महाराष्ट्र में ‘आई’ का अभिप्राय ‘मां के प्रति’ से है. ‘गीताई’ का अर्थ हुआ—‘मां की स्मृति’…..उसके नेह से जुड़ी-रची गीता. मां तो पुत्र की कृति को देखने से पहले ही चल बसीं थीं. विनोबा ने मां की स्मृति और उनकी प्रेरणाओं को साथ लेकर काम पूरा किया था. ‘गीताई’ रुक्मिणी बाई की याद और अभिलाषा से जुड़ी थी. ज्ञान और प्रेमरस का अनूठा सामंजस्य. छपने के साथ की पुस्तक की पूरे महाराष्ट्र में धूम मच गई. वह घर-घर में माताओं, बहनों के कंठ-स्वर में ढलने लगी. उनकी अध्यात्म चेतना का आभूषण बन गई. गांधी जी ने सुना तो अनुवाद कर्म की भूरि-भूरि प्रशंसा की. जो महिलाएं संस्कृत नहीं जानती थीं, जिन्हें अपनी भाषा का भी आधा-अधूरा ज्ञान था, उनके लिए सहज-सरल भाषा में रची गई थी —‘गीताई’. साधारण गृहस्थ स्त्रियों के लिए वह मानो ज्ञान और अध्यात्म का सम्मिलित वरदान लेकर आई थी.

संन्यास की साध

विनोबा को बचपन में मां से मिले संस्कार युवावस्था में और भी गाढ़े होते चले गए. युवावस्था की ओर बढ़ते हुए विनोबा न तो संत ज्ञानेश्वर को भुला पाए थे, न तुकाराम को. वही उनके आदर्श थे. संत तुकाराम के अभंग तो वे बड़े ही मनोयोग से गाते. उनका अपने आराध्य से लड़ना-झगड़ना, नाराज होकर गाली देना, रूठना-मनाना उन्हें बहुत अच्छा लगता. आराध्य के साथ उनका बराबरी का, सखा-भाव का संदेश था. संत रामदास का जीवन भी उन्हें प्रेरणा देता. वे न शंकराचार्य को विस्मृत कर पाए थे, न उनके संन्यास को. दर्शन उनका प्रिय विषय था. हिमालय जब से होश संभाला था, तभी से उनके सपनों में आता था. तब वे कल्पना में स्वयं को सत्य की खोज में गहन कंदराओं में तप-साधना करते हुए पाते. वहां की निर्जन, वर्फ से ढकी दीर्घ-गहन कंदराओं में उन्हें परमसत्य की खोज में लीन हो जाने के लिए उकसातीं.

      1915 में उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास की. अब आगे क्या पढ़ा जाए. वैज्ञानिक प्रवृत्ति के पिता और अध्यात्म में डूबी रहने वाली मां का वैचारिक द्वंद्व वहां भी अलग-अलग धाराओं में प्रकट हुआ. पिता ने कहा—‘फ्रेंच पढ़ो.’ परंपरा और संस्कार से बंधी मां बोलीं—‘ब्राह्मण का बेटा संस्कृत न पढ़े, यह कैसे संभव है!’ विनोबा ने उन दोनों का मन रखा. इंटर में फ्रेंच को चुना. संस्कृत का अध्ययन उन्होंने निजी स्तर पर जारी रखा. उन दिनों फ्रेंच ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हो रही क्रांति की भाषा थी. सारा परिवर्तनकामी साहित्य उसमें रचा जा रहा था. दूसरी ओर बड़ौदा का पुस्तकालय दुर्लभ पुस्तकों, पांडुलिपियों के खजाने के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध था. विनोबा ने उस पुस्तकालय को अपना दूसरा ठिकाना बना दिया. विद्यालय से जैसे ही छुट्टी मिलती, वे पुस्तकालय में जाकर अध्ययन में डूब जाते. फ्रांसिसी साहित्य ने विनोबा का परिचय पश्चिमी देशों में हो रही वैचारिक क्रांति से कराया. संस्कृत के ज्ञान ने उन्हें वेदों और उपनिषदों में गहराई से पैठने की योग्यता दी. ज्ञान का स्तर बढ़ा, तो उसकी ललक भी बढ़ी. मगर मन से हिमालय का आकर्षण, संन्यास की साध, वैराग्यबोध न हटा.

     उन दिनों इंटर की परीक्षा के लिए मुंबई जाना पड़ता था. विनोबा भी तय कार्यक्रम के अनुसार 25 मार्च 1916 को मुंबई जाने वाली रेलगाड़ी में सवार हुए. उस समय उनका मन डावांडोल था. पूरा विश्वास था कि हाईस्कूल की तरह इंटर की परीक्षा भी पास कर ही लेंगे. मगर उसके बाद क्या? क्या यही उनके जीवन का लक्ष्य है? विनोबा को लग रहा था कि अपने जीवन में वे जो चाहते हैं, वह औपचारिक अध्ययन द्वारा संभव नहीं. विद्यालय के प्रमाणपत्र और काॅलिज की डिग्रियां उनका अभीष्ठ नहीं हैं. वे कुछ पाने-करने के लिए इस दुनिया में आए हैं. रेलगाड़ी अपनी गति से भाग रही थी. उससे सहस्रगुना तेज भाग रहा था विनोबा का मन. ऊहापोह में डूबा रहा मन-मस्तिष्क. आखिर जीत मन की हुई.

      जैसे ही गाड़ी सूरत पहुंची, विनोबा उससे नीचे उतर आए. गाड़ी आगे बढ़ी पर विनोबा का मन दूसरी ओर खिंचता चला गया. दूसरे प्लेटफार्म पर पूर्व की ओर जाने वाली रेलगाड़ी मौजूद थी. विनोबा को लगा कि हिमालय एक बार फिर उन्हें आमंत्रित कर रहा है. गृहस्थ जीवन या संन्यास. मन में कुछ देर तक संघर्ष चला. ऊहापोह से गुजरते हुए उन्होंने उन्होंने निर्णय लिया और उसी गाड़ी में सवार हो गए. संन्यासी अपनी पसंदीदा यात्रा पर निकल पड़ा. इस हकीकत से अनजान कि इस बार भी जिस यात्रा के लिए वे ठान कर निकले हैं, वह उनकी असली यात्रा नहीं, सिर्फ एक पड़ाव है. जीवन से पलायन उनकी नियति नहीं. उन्हें तो लाखों-करोड़ों भारतीयों के जीवन की साध, उनके लिए एक उम्मीद बनकर उभरना है.

      ब्रह्म की खोज, सत्य की खोज, संन्यास लेने की साध में विनोबा भटक रहे थे. उसी लक्ष्य के साथ उन्होंने घर छोड़ा था. हिमालय की ओर यात्रा जारी थी. बीच में काशी का पड़ाव आया. मिथकों के अनुसार भगवान शंकर की नगरी. हजारों वर्षों तक धर्म-दर्शन का केंद्र रही काशी. साधु-संतों और विचारकों का कुंभ. जिज्ञासुओं और ज्ञान-पिपासुओं को अपनी ओर आकर्षित करने वाली पवित्र धर्मस्थली. न जाने कितने ज्ञान-पिपासु इस नगरी में उम्मीद लेकर पहुंचे. काशी के गंगा घाट पर जहां नए विचार पनपे तो वितंडा भी अनगिनत रचे जाते रहे. उसी गंगा तट पर विनोबा भटक रहे थे. अपने लिए मंजिल की तलाश में. गुरु की तलाश में जो उन्हें आगे का रास्ता दिखा सके. जिस लक्ष्य के लिए उन्होंने घर छोड़ा था, उस लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग बता सके.

      भटकते हुए वे एक स्थान पर पहुंचे जहां कुछ सत्य-साधक शास्त्रार्थ कर रहे थे. विषय था अद्वैत और द्वैत में कौन सही? प्रश्न काफी पुराना था. लगभग बारह सौ वर्ष पहले भी इस पर निर्णायक बहस हो चुकी थी. शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच. उस ऐतिहासिक बहस में द्वैतवादी मंडन मिश्र और उनकी पत्नी को शंकराचार्य ने पराजित किया था. वही विषय फिर उन सत्य-साधकों के बीच आ फंसा था. या कहो कि वक्त काटने के लिए दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ वितंडा रच रहे थे. और फिर बहस को समापन की ओर ले जाते हुए अचानक घोषणा कर दी गई कि अद्वैतवादी की जीत हुई है. विनोबा चौंके. उनकी हंसी छूट गई—

      ‘नहीं, अद्वैतवादी ही हारा है.’ विनोबा के मुंह से बेसाख्ता निकल पड़ा. सब उनकी ओर देखने लगे. एक युवा, जिसकी उम्र बीस-इकीस वर्ष की रही होगी, दिग्गज विद्वानों के निर्णय को चुनौती दे रहा था. उस समय यदि महान अद्वैतवादी शंकराचार्य का स्मरण न रहा होता तो वे लोग जरूर नाराज हो जाते. उन्हें याद आया, जिस समय शंकराचार्य ने मंडन मिश्र को पराजित किया था, उस समय उनकी उम्र भी लगभग वही थी, जो उस समय विनोबा की थी.

      ‘यह तुम कैसे कह सकते हो, जबकि द्वैतवादी सबके सामने अपनी पराजय स्वीकार कर चुका है.’

      ‘नहीं यह अद्वैतवादी की ही पराजय है.’ विनोबा अपने निर्णय पर दृढ़ थे.

      ‘कैसे?’

      ‘जब कोई अद्वैतवादी द्वैतवादी से शास्त्रार्थ करना स्वीकार कर ले, तो समझो कि उसने पहले ही हार मान ली है.’

      उस समय विनोबा के मन में अवश्य ही शंकराचार्य की छवि रही होगी. उनकी बात भी ठीक थी. जिस अद्वैतमत का प्रतिपादन बारह सौ वर्ष पहले शंकराचार्य मंडन मिश्र को पराजित करके कर चुके थे, उसकी प्रामाणिकता पर पुनः शास्त्रार्थ, और वह भी बिना किसी ठोस आधार के. सिर्फ वितंडा के यह और क्या हो सकता है! वहां उपस्थित विद्वानों को विनोबा की बात सही लगी. कुछ साधु विनायक को अपने संघ में शामिल करने को तैयार हो गए. कुछ तो उन्हें अपना गुरु बनाने तक को तैयार थे. पर जो स्वयं भटक रहा हो, जो खुद गुरु की खोज में, नीड़ की तलाश में निकला हो, वह दूसरे को छाया क्या देगा! अपनी जिज्ञासा और असंतोष को लिए विनोबा वहां से आगे बढ़ गए. इस बात से अनजान कि काशी ही उन्हें आगे का रास्ता दिखाएगी, और उन्हें उस रास्ते पर ले जाएगी, जिधर जाने के बारे उन्होंने अभी तक सोचा भी नहीं है. मगर जो उनकी वास्तविक मंजिल है.

गांधी से मुलाकात

एक ओर विनोबा संन्यास की साध में, सत्यान्वेषण की ललक लिए काशी की गलियों में, घाटों पर भटक रहे थे. वहीं दूसरी ओर एक और जिज्ञासु भारत को जानने, उसके हृदय-प्रदेश की धड़कनों को पहचानने, भारतीय जनता से रू-ब-रू होने तथा उससे आत्मीयता-भरा रिश्ता कायम करने के लिए भारत-भ्रमण पर निकला हुआ हुआ था. कुछ ही महीने पहले वह दक्षिण अफ्रीका से बेशुमार ख्याति बटोरकर लौटा था. वहां उन्होंने उन अंग्रेजों को उन्हीं के हथियारों से मात दी थी जो स्वयं को दुनिया की सबसे सभ्य, विकसित एवं न्यायप्रिय कौम मानते थे. उसने वहां उन्हें चिराग तले की अंधेरी स्थितियों से परिचय कराया था. जब आईना दिखाने पर भी दागों की जानबूझकर अनदेखी की गई जो उनके विरुद्ध अहिंसक संघर्ष छेड़ने में भी उसने विलंब नहीं किया. वहां उसने न केवल भारतीय और दक्षिणी अफ्रीका के नागरिकों की अस्मिता के लिए, बल्कि मानवीय गरिमा की सुरक्षा के लिए आंदोलन खड़ा किया था, जिसकी दुनिया-भर में प्रशंसा हुई थी.

      वह एक दुबला-पतला इंसान था, मगर उसकी खूबी थी कि वह अपनी कमजोरियों को ही ताकत में तब्दील कर चुका था. मानवेतिहास में ईसा मसीह को छोड़कर शायद ही किसी ने अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बनाया हो. उसका रास्ता अनोखा था. अब से पहले के नेतागण और वुद्धिजीवी विरोध की राजनीति की करते आए थे. वह विरोध के बजाय असहमति की राजनीति कर रहा था. वह भी अहिंसा के साथ. कहावत थी कि सेनाएं इतिहास बदल देती हैं. सेना उसके पास भी थी. लेकिन निहत्थी. उसी निहत्थी सेना के भरोसे उसकी भावी योजना भारतीय राजनीति में दखल देने की थी. उस साधक का नाम था—मोहनदास करमचंद गांधी. अपने राजनीतिक गुरु गोविंद बल्लभ पंत के कहने पर वह भारत की आत्मा को जानने के उद्देश्य से एक वर्ष के भारत-भ्रमण पर निकला हुआ था. आगे चलकर भारतीय राजनीति पर छा जाने, करोड़ों भारतीयों के दिल की धड़कन, भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का प्रमुख सूत्रधार, अहिंसक सेनानी बन जाने वाले गांधी उन दिनों अप्रसिद्ध ही थे. ‘महात्मा’ की उपाधि भी उनसे दूर थी. उनकी पूंजी दक्षिण अफ्रीका में छेडे़ गए आंदोलन तक सीमित थी. यह लड़ाई उन्होंने उस ब्रिटिश साम्राज्य का विरोध करते हुए जीती थी, जो उस समय तक अजेय माना जाता था. उसी के कारण वे पूरे भारत में जाने जाते थे. उन दिनों उनका पड़ाव भी काशी था. मानो दो महान आत्माओं को मिलवाने के लिए समय कोई जादुई करतब दिखा रहा था.

      काशी में महामना मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित हिंदू विश्वविद्यालय में एक बड़ा जलसा हो रहा था. दिन था—4 फरवरी, 1916. जलसे में राजे-महाराजे, नबाव, सामंत सब अपनी पूरी धज, शानो-शौकत के साथ उपस्थित थे. उसकी छटा देखते ही बनती थी. लोग गांधी जी को देखना-सुनना चाहते थे. सम्मेलन में गांधी जी ने ऐतिहासिक भाषण दिया. वह कहा जिसकी उस समय कोई उम्मीद तक नहीं कर सकता था. वक्त पड़ने पर जिन राजा-सामंतों की खुशामद स्वयं अंग्रेज भी करने लगते थे, जिनके दान पर काशी विश्वविद्यालय और दूसरी अन्य संस्थाएं चला करती थीं, उन राजा-सामंतों की खुली आलोचना करते हुए गांधी जी ने कहा था कि वे अपनी फिजूलखर्ची से बाज आएं. ऐशो-आराम और विलासिता की वस्तुओं पर धन का दुरुपयोग करने के बजाय उसका राष्ट्रनिर्माण के लिए सदुपयोग करें. उसको गरीबों के कल्याण में लगाएं. उन्होंने आह्वान किया कि वे व्यापक लोकहित में अपने सारे आभूषण दान कर दें. वह एक क्रांतिकारी अपील थी. उन सामंतों-राजाओं और नबावों के बीच जिनमें से अधिकांश अपने सुख-सुविधाओं, विलासिता और वैभव प्रदर्शन के स्तर को बनाए रखने के लिए दूसरों के शरीर से आभूषण खींचते आए थे. जिनका दबदबा दूर ब्रिटिश राजदरबार में भी दिखाई पड़ता था. सभा में खलबली मच गई. पर गांधी की मुस्कान उसी तरह बनी रही. अगले दिन उनके भाषण से अखबार रंगे पड़े थे.

      उस भाषण ने बहुतों की मानसिकता को बदला. विनोबा ने समाचारपत्र के माध्यम से ही गांधी जी के बारे में जाना. मन जैसे उमड़ने-सा लगा. उन्हें लगा कि जिस लक्ष्य की खोज में वे घर से निकले हैं, वह पूरी हुई. विनोबा कोरी शांति की तलाश में ही घर से नहीं निकले थे. न वे देश के हालात और अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे अमानवीय अत्याचारों से अपरिचित थे. मगर कोई राह मिल ही नहीं रही थी. भाषण पढ़कर उन्हें लगा कि इस व्यक्ति के पास शांति भी है और क्रांति भी. उन्होंने तुरंत गांधी जी के नाम पत्र लिखा. पत्र में कुछ सवाल थे, स्वाभाविक जिज्ञासाएं थीं. समय पर जवाब आया. गांधी जी ने उन्हें आश्रम आकर मिलने के लिए आमंत्रित किया था. विनोबा तो उसकी प्रतीक्षा कर ही रहे थे. वे तुरंत अहमदाबाद स्थित कोचर्ब आश्रम की ओर प्रस्थान कर गए, जहां उन दिनों गांधी जी का आश्रम था.

      7 जून, 1916 को विनोबा की गांधी से पहली भेंट हुई. विद्वान लोग इसको गुरु-शिष्य की भेंट का नाम दे सकते हैं. मगर मेरी निगाह में वह उन दो महान आत्माओं की भेंट थीं, जिनकी भविष्य-यात्रा दो महान परिवर्तनकारी आंदोलनों को जन्म देने वाली थी. पहली मुलाकात के बाद से ही विनोबा गांधी जी के ही होकर रह गए. गांधी जी ने भी विनोबा की प्रतिभा को पहचान लिया था. इसलिए पहली मुलाकात के बाद ही उनकी टिप्पणी थी कि, ‘अधिकांश लोग यहां से कुछ लेने के लिए आते हैं, यह पहला व्यक्ति है, जो कुछ देने के लिए आया है.’ काफी दिन बाद अपनी पहली भेंट को याद करते हुए विनोबा ने कहा था कि—

      ‘जिन दिनों मैं काशी में भटक रहा था, मेरी पहली अभिलाषा हिमालय की कंदराओं में जाकर घोर तप-साधना करने की थी. एक और अभिलाषा थी, बंगाल के क्रांतिकारियों से भेंट करने की. लेकिन इनमें से एक भी अभिलाषा पूरी न हो सकी. समय खुद मेरा हाथ थामकर मुझे गांधी जी तक ले गया. वहां जाकर मैंने पाया कि उनके व्यक्तित्व में हिमालय जैसी शांति है, तो बंगाल की क्रांति की धधक भी. मैंने छूटते ही स्वयं से कहा था, अहो! मेरी दोनों अभिलाषाएं एक साथ पूरी हुईं.’

      गांधी और विनोबा की वह मुलाकात क्रांतिकारी थी. क्योंकि उसके बाद गांधी जी को भारतीय स्वाधीनता के समर में उतरना था, जिसमें विनोबा के लिए भी बड़ी भूमिकाएं तय थीं. गांधी जी को जैसे ही पता चला कि विनोबा अपने माता-पिता को बिना बताए घर से चले आए हैं, और उनके परिजन उनके लिए चिंतित हो सकते हैं, उन्होंने तुरंत विनोबा के पिता के नाम एक पत्र लिखा. पत्र में विनोबा के आश्रम में सुरक्षित होने की सूचना भेजी गई थी. स्वातंत्रय समर में पूरा समर्पण तभी संभव है, जब परिजन भी साथ दें. बना परिवार की सम्मिति के उसके किसी सदस्य को आंदोलन से जोड़ना पाप है. उसके बाद उनके संबंध लगातार प्रगाढ़ होते चले गए.

      विनोबा ने खुद को गांधी जी के आश्रम के लिए समर्पित कर दिया. अध्ययन, अध्यापन, कताई, खेती के काम से लेकर सामुदायिक जीवन तक आश्रम की हर गतिविधि में वे हमेशा आगे रहते. गांधी जी का यह कहना कि यह युवक आश्रमवासियों से कुछ लेने नहीं बल्कि देने आया है, सत्य होता जा रहा था. उम्र से एकदम युवा विनोबा, अपने आचरण से बाकी आश्रमवासियों को अनुशासन और कर्तव्यपरायणता का पाठ पढ़ा ही रहे थे. गांधी जी का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था. उतनी ही तेजी से बढ़ रही थी आश्रम में आने वाले कार्यकर्ताओं की संख्या. कुछ ही महीनों के बाद कोचरब आश्रम छोटा पड़ने लगा. राजनीतिक गतिविधियों के संचालन के लिए गांधी जी को अब बड़े ठिकाने की आवश्यकता थी, जहां रहकर वे अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से पूरे देश से संपर्क साध सकें.

      अहमदाबाद में साबरमती का किनारा उपयुक्त पाया गया. वहां नए आश्रम के निर्माण का काम तेजी से होने लगा. लेकिन आजादी के अहिंसक सैनिक तैयार करने का कार्य अकेले साबरमती आश्रम से भी संभव भी न था. कुछ ही दिनों बाद देशव्यापी गतिविधियों के संचालन हेतु नए आश्रम की जरूरत महसूस की जाने लगी. गांधी साबरमती जैसा आश्रम वर्धा में भी चाहते थे. वहां पर ऐसे अनुशासित कार्यकर्ता की आवश्यकता थी, जो आश्रम को गांधी जी के आदर्शों के अनुरूप चला सके. इसके लिए विनोबा सर्वथा अनुकूल पात्र थे और गांधी जी के विश्वसनीय भी. 8 अप्रैल 1923 को गांधी जी के आदेश पर विनोबा वर्धा के लिए प्रस्थान कर गए. वहां उन्होंने ‘महाराष्ट्र धर्म’ मासिक का संपादन शुरू किया.

      मराठी में प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका में विनोबा ने नियमित रूप से उपनिषदों और महाराष्ट्र के संतों पर लिखना आरंभ कर दिया, जिनके कारण देश में भक्ति आंदोलन की शुरुआत हुई थी. पत्रिका को अप्रत्याशित लोकप्रियता प्राप्त हुई, कुछ ही समय पश्चात उसको साप्ताहिक कर देना पड़ा. विनोबा अभी तक गांधी जी के शिष्य और सत्याग्रही के रूप में जाने जाते थे. पत्रिका के माध्यम से जनता उनकी आध्यात्मिक पैठ और कलम के सामथ्र्य को जानने लगी थी.

      गीता और अध्यात्म पर विनोबा की पैठ का अगला उदाहरण ‘गीता प्रवचन’ के रूप में सामने आया. इस पुस्तक में विनोबा ने गीता के कर्मयोग की अनूठी व्याख्या की है. उल्लेखनीय है कि गीता का एक अनुवाद ‘गीता रहस्य’ तिलक द्वारा भी किया गया, जिसमें उन्होंने गीता के कर्मयोग की ओजस्वी व्याख्या की है. विनोबा की व्याख्या में मानो ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग तीनों का समन्वित रूप है. स्मरणीय है कि स्वाधीनता संग्राम के दौरान महापुरुषों की जेलयात्रा कोरी सजा नहीं होती थी. जेल में मिले अवसर का उपयोग वे सब अपने चरित्र निर्माण हेतु, देश-दुनिया के बारे में अधिक से अधिक जानने के लिए अध्ययन को आगे बढ़ाने के लिए करते. अंग्रेज सरकार से लगभग रोजमर्रा का टकराव था. जिससे जेल जाने की संभावना भी लगातार बनी रहती थी. अतएव सजा से घबराए बिना नेतागण प्रायः इस प्रयास में रहते थे कि आने वाली जेल यात्रा का अधिक से अधिक रचनात्मक उपयोग कैसे किया जाए! कैसे उसका अधिक से अधिक राजनीतिक लाभ हो. ‘गीता रहस्य’ मांडले जेल में रचा गया था. उसमें उन्होंने कृष्ण के जीवन-दर्शन को कर्मयोग के माध्यम से अभिव्यक्त करने की कोशिश की है. गीता के कर्मयोग की इससे बेहतर और ओजमयी व्याख्या दूसरी नहीं है.

      विनोबा भी जेलयात्रा से पहले ही अपने अध्ययन-लेखन का कार्यक्रम विधिवत बना लेते थे. वे जेल के अनुशासित कैदी होते थे. इसलिए जबतक वे जेल में रहते, जेलर कारागार की आंतरिक व्यवस्था की जिम्मेदारी उनपर डालकर लगभग निश्चिंत हो जाता था. उन दिनों विनोबा धुले जेल में थे. विनोबा के साथ धुले जेल में बहुत से मजदूर कैदी भी थे. सभी विनोबा की आध्यात्मिक पैठ और गीता पर उनकी पकड़ के बारे में जानते थे. विनोबा वहां एक सत्याग्रही होने की सजा काट रहे थे. उनके साथ साने गुरुजी भी थे. उनकी लिखाई इतनी सुंदर थी, मानो मोती टांक रहे हों.

      ‘गीता प्रवचन’ का जन्म धुले जेल में हुआ. गीता पर विनोबा की पकड़ को देखते हुए मजदूरों ने उनसे गीता पर प्रवचन देने को कहा. विनोबा ने स्वीकार कर लिया. उसके बाद तो प्रत्येक रविवार को प्रातःकाल वे गीता पर बोलते. उस समय जेल का वातावरण मानो पवित्र हो जाता. उसके प्रांगण भक्ति-वेदांत की धारा बहने लगते. विनोबा जो बोलते साने गुरुजी उन्हें अपने मोतियों जैसे अक्षरों में लिखते जाते. तिलक ने अपने ‘गीता रहस्य’ में गीता के कर्मयोग पर जोर दिया है. विनोबा के गीता प्रवचनों में भक्ति की सहजता थी. वे ज्ञान, कर्म और योग की तिकड़ी के बीच सामन्जस्य बिठा रहे थे. वह भी मूल गीता की आत्मा को ठेस पहुंचाए बिना. अपनी पूरी सहजता और विनम्रता के साथ. बचपन में मां रुक्मिणी देवी ने गीता की दुरुह व्याख्याओं को समझने में असमर्थता व्यक्त की थी. धुले जेल में विनोबा के सामने मजदूर और कैदी थे. अधिकांश अशिक्षित या अल्पशिक्षित. ऐसे जिज्ञासुओं के समक्ष वे गीता को गूढ़ रूप में प्रस्तुत कर ही नहीं सकते थे. गीता-प्रवचन के चैदहवें अध्याय का एक अंश देखिए और सोचिए क्या गीता के गूढ़ ज्ञान की इससे ज्यादा सरल-सहज और प्रवाहमयी व्याख्या दूसरी कोई हो सकती है, शायद नहीं…

      ‘यह स्वधर्म कैसे सुनिश्चित किया जाए?’ ऐसा कोई प्रश्न करे तो उसका उत्तर है’ ‘वह स्वाभाविक होता है’. स्वधर्म सहज होता है. उसे खोजने की कल्पना ही विचित्र मालूम होती है. मनुष्य के जन्म के साथ ही उसका स्वधर्म जन्मा है. बच्चे के लिये जैसे उसकी माँ नहीं खोजनी पड़ती, वैसे ही स्वधर्म भी किसी को खोजना नहीं पड़ता. वह तो पहले से ही प्राप्त है. हमारे जन्म के पहले भी दुनिया थी; और हमारे बाद भी वह रहेगी. हमारे पीछे भी एक बड़ा प्रवाह था और आगे भी वह है ही दृ ऐसे प्रवाह में हमारा जन्म हुआ है. जिन माँ-बाप के यहां मैंने जन्म लिया है, उनकी सेवा….जिन पास-पड़ोसियों के बीच मैं जन्मा हूँ, उनकी सेवादृ ये कर्म मुझे निसर्गतः ही मिले हैं. फिर मेरी वृत्तियां तो मेरे नित्य अनुभव की ही हैं न? मुझे भूख लगती है, प्यास लगती है; अतः भूखे को भोजन देना, प्यासे को पानी पिलाना, यह धर्म मुझे स्वतः ही प्राप्त हो गया. इस प्रकार यह सेवा रूप, भूत दयारूप स्वधर्म हमें खोजना नहीं पड़ता. जहां कहीं स्वधर्म की खोज हो रही है, वहां निश्चित समझ लेना चाहिये कि कुछ न कुछ अधर्म हो रहा है.’

      गीता पर इतना प्रभावोत्पादक सहज भाष्य दूसरा नहीं है. स्वयं विनोबा कहा करते थे—

     ‘नाम और रूप तो जाने वाला है, मेरे बाद क्या रह जाएगा. गीता प्रवचन और गीताई.’

विनोबा के जीवन में गीता का जो महत्त्व था, वह उनके इस कथन से स्पष्ट हो जाता है. उन्होंने अपना जीवन उसी आस्था और विश्वास के साथ जिया. पूरा जीवन वे तपस्वी, साधक कर्मयोगी और तत्वज्ञानी के रूप में जीते रहे. आजादी के दौरान अछूतोद्धार का कार्यक्रम भी गांधी जी और कांगे्रस के रचनात्मक कार्यक्रमों में सम्मिलित था. हालांकि वह गांधी जी द्वारा मजबूरी में लिया शामिल किया गया था. यहां अन्यथा न होगा यदि उसकी पृष्ठभूमि पर संक्षिप्त विचार कर लिया जाए.

      वस्तुतः गांधी जी से बहुत पहले ज्योतिबा फुले महाराष्ट्र में दलितों और पिछड़ों के बीच शिक्षा और समानता की अलख जगा चुके थे. यह संयोग ही है कि 1891 के जिस साल डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म हुआ था, उसी वर्ष ज्योतिबा फुले दिवंगत हुए थे. नियति मानो समानतावादी आंदोलन के एक पुरोधा को उत्पीड़ितों के हाथों से छीन रही थी, तो उन्हें दूसरे पुरोधा के हाथों में सौंपकर मानो उऋण भी हो जाना चाहती थी. गांधी जी के समय दलित आंदोलन का नेतृत्व डॉ. आंबेडकर के हाथों में था, जिनका दलितों के बीच लगभग उतना ही प्रभाव था, जितना भारतीय जनमानस पर गांधी जी का. डॉ. आंबेडकर ने महात्मा फुले के आंदोलन को न केवल गति प्रदान की थी, बल्कि दलितों और पिछड़ों को संगठित और अपनी अस्मिता के प्रति जागरूक करने में भी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त कर ली थी. जाति और उसके आधार पर उत्पीड़न के विरोध में लोग घरों से निकलने लगे थे. महाड़ सत्याग्रह ने शताब्दियों से चली आ रही अश्पृश्यता के ताबूत में कील ठोकने का काम किया था. दलित तेजी से एकजुट हो रहे थे. कांगे्रस समेत सभी दलों को यह लगने लगा था कि दलितों की मांगों को स्वीकार किए बिना आजादी की संगठित लड़ाई लड़ पाना असंभव है.

      ऐसा नहीं है कि डॉ. आंबेडकर भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में न थे. मगर दलितों का मान-सम्मान, उनकी अस्मिता की लड़ाई उनकी निगाह में अधिक महत्त्वपूर्ण थी. राजनीतिक आजादी से अधिक महत्ता वे सामाजिक आजादी को दे रहे थे. दूसरी ओर गांधी समेत कांग्रेसी नेता किसी भी तरह और जल्दी से जल्दी देश की राजनीतिक आजादी चाहते थे. इनमें गांधी जी का व्यवहार भले ही निस्पृह रहा हो, मगर अधिकांश कांग्रेसी नेताओं के मन में राजनीतिक आकांक्षाएं जन्म लेने लगी थीं और उसके लिए वे जल्दी से जल्दी आजादी चाहते थे. यह तभी संभव था, जब दलितों की सहानुभूति जीतकर उन्हें अपनी ओर मिला लिया जाए, जो बड़ी तेजी से डॉ. आंबेडकर के पीछे एकजुट हो रहे थे.

      दलितों की एकजुटता और उनके बीच डॉ. आंबेडकर के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर गांधी जी का हरिजन प्रेम जोर पकड़ने लगा था. भारतीय समाज को आजादी की लड़ाई में एकजुट अंततः उन्हें कहना ही पड़ा कि ‘अश्पृश्यता हिंदू समाज पर कलंक है.’ वर्णव्यवस्था के प्रति पूर्ण आस्थावान गांधी के इस कथन में भले ही उनकी राजनीतिक चतुराई और तात्कालिक राजनीति पर छाए रहने की अभिलाषा छिपी हो, मगर अपने प्रत्येक कार्य को ईमानदारी और संकल्प-भावना से लेने वाले विनोबा ने इसे भी पूरी ईमानदारी के साथ अपने विचार एवं आचरण का हिस्सा बनाया. हालांकि विभेदकारी वर्ण-व्यवस्था में उनकी आस्था भी गांधी जैसी ही थी. साबरमती आश्रम में सभी को संडास की सफाई करनी पड़ती थी. विनोबा भी यह कार्य पूरे मनोयोग पूर्ण ढंग से करने लगे. एक ब्राह्मण होकर विनोबा का संडास की सफाई करना कस्तूरबा को बुरा लगता था. उन्होंने विनोबा को वहां से हटाकर दूसरा काम करने की सलाह दी. पर विनोबा नहीं माने. बल्कि उन्होंने आश्रम से बाहर दलित बस्तियों में भी संडास सफाई करना उन्होंने अपने रचनात्मक कार्यक्रम का हिस्सा बना लिया.

      एक घटना है. गांधी जी के अछूतोद्धार कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए विनोबा ने सुरंगांव नामक एक गांव को चुना था. यह उनके पवनार आश्रम के निकट पड़ता था. बीच में बहती थी एक नदी. विनोबा को नदी पैदल पार करके सुरंगांव तक जाना पड़ता था. पूरे तीन साल तक वे गांव की गलियों को बुहारते रहे. लोगों का पाखाना साफ करते रहे. एक बार बरसात का मौसम था. विनोबा पवनार से सुरंगांव के लिए निकले तो नदी में बाढ़ आई हुई थी. वे किनारे रुककर पार जाने का उपाय सोचते रहे. लेकिन नदी उफान पर थी. विनोबा को नियम टूटने का क्षोभ था. लेकिन बिना किसी साधन के नदी पार कर पाना भी असंभव था. आखिर प्राकृतिक कोप के आगे स्वयं को नतमस्तक करते हुए उन्होंने वापस लौटने का निर्णय ले लिया. गांव वाले कहीं यह न मान लें कि वे जानबूझकर नहीं आए, उन्होंने एक उपाय किया. नदी के दूसरे सिरे पर कुछ बच्चे बाढ़ का पानी देखने आए हुए थे. विनोबा ने उन्हीं को संबोधित कर जोर से कहा—

      ‘बच्चो, गांव के मंदिर जाकर भगवान को संदेश दो कि गांव का सफाईकर्मी आया हुआ है. परंतु नदी ने उसकी राह रोक ली थी, इसलिए उसको वापस लौटना पड़ा है.’ बच्चे जाने को मुड़े तो विनोबा ने पूछा—

      ‘अच्छा बोलो, भगवान से क्या कहोगे बच्चो?’

     ‘कहेंगे कि विनोबा जी आए थे, बाढ़ ने उनकी राह रोक ली.’ बच्चों में से एक ने बताया. मगर विनोबा को यह कहां मंजूर. इससे उनका उद्देश्य कहां पूरा होता था. वे और तेज आवाज में चीखकर बोले—

      ‘नहीं बच्चो, कहना कि गांव का सफाईकर्मी आया था. बाढ़ ने उनकी राह रोक ली.’

      यह एक घटना है जिससे स्पष्ट होता है कि विनोबा अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित और उसमें डूब जानेवाले इंसान थे.

 क्रमशः

© ओमप्रकाश कश्यप

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