समय का दर्शन-तीन

ज्ञान, ज्ञानार्जन की प्रक्रिया और चौथा आयाम

अक्सर कहा जाता है, ज्ञानी बनो. पुस्तकें ज्ञान का समंदर हैं. उन्हें पढ़ो. जितना संभव हो ज्ञान को समेट लो. समेटते जाओ. ज्ञार्नाजन को अपना लक्ष्य मानकर गुरु की शरण लो. उसकी कृपा से अपने अज्ञान के अंधेरे को दूर करो. लेकिन ज्ञान की ललक में दौड़ते, भागते. उसकी तलाश में भटकते, ठोकरें खाते कभी-कभी यह विचार भी मन में कौंध उठता है कि ज्ञान आखिर है क्या? हम कैसे जाने कि ज्ञान के लिए हमारी दौड़-भाग का जो परिणाम निकला, देर तक भटकने के बाद जिस लक्ष्य पर हम पहुंचे हैं—वह सचमुच ज्ञान है? ज्ञान और अज्ञान के बीच सीमारेखा कैसे खींची जाए? ज्ञान के कौन से लक्षण हैं जो उसको अज्ञान होने से बचाते हैं? साधारणजन के लिए यह उतनी बड़ी समस्या नहीं है. वह गुरुजनों पर विश्वास कर लेता है. धर्मग्रंथों में शताब्दियों पूर्व लिखी गई बातों से अपना काम चला लेता है. उसके लिए ज्ञान स्थायी, अपरिवर्तनशील, कभी न बदलने वाला, युगांतर सत्य है. तर्कबुद्धि को किनारे रखकर वह अपने आस्थावादी दिमाग से सोचता है. उसकी निगाह में गंगा शताब्दियों पहले जब प्रदूषण जैसी कोई समस्या नहीं थी जितनी पवित्र थी, आज भी उतनी ही पवित्र है. ऐसा व्यक्ति समाज की सामान्य समझ और रीति-रिवाजों से अनुशासित होता है. दूसरी ओर जिज्ञासु व्यक्ति मानता है कि ज्ञानार्जन की प्रक्रिया अंतहीन है. वह अपने संदेहों को सम्मान देता है. उसका विश्वास है कि ज्ञान सदैव अज्ञान की बांह पकड़कर चलता है. दोनों के बीच इतना बारीक अंतर है कि ज्ञान कब अज्ञान की सीमा तक पहुंच जाए, और अज्ञान यह कहकर कि वह कम से कम इतना तो जानता ही है कि उसको फलां का ज्ञान नहीं है—स्वयं को ज्ञानवान की परिधि में ले आता है. ऐसा व्यक्ति किसी बंधी-बंधाई लीक पर चलने के बजाय अपना लक्ष्य स्वयं तय करता है. उसका बोध निरंतर परिष्करण को उन्मुख रहता है. वह ज्ञान की चिरंतनता और सतत परिवर्तनशीलता पर अटूट विश्वास रखता है.

ऐसे जिज्ञासु के लिए ज्ञान का सामान्य-सा लक्ष्य है जानना, किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थान अथवा विचार को, जैसा वह है—जो वह दिखता है, और उस दृश्यमान के पीछे जो अनदिखा सत्य निहित है, उसका संपूर्ण बोध….वस्तु के रूप, रंग, गंध, गुण, दोष, आंतरिक-बाह्यः संचरना आदि का सर्वांग-परिचय. बेहतर ज्ञान अर्थात बेहतर जानकारी. एक वस्तु का दूसरी वस्तु से, एक विचार का दूसरे विचार से, साम्य-वैषम्य का निष्पक्ष-निरपेक्ष तत्वातत्व विवेचन. लेकिन यह कहना जितना आसान है, उतना है नहीं. किसी वस्तु को समग्रता के साथ जानना-समझना जितना कठिन है, उतना ही कठिन है ज्ञान को परिभाषित करना. किसी वस्तु, व्यक्ति का ज्ञान होना दर्शाता है कि हमें उसके व्यावहारिक एवं सैद्धांतिक पक्ष की संपूर्ण जानकारी है. हालांकि उस समय भी ज्ञान के कई ऐसे पक्ष हो सकते हैं, जो अभी मानवी मेधा के लिए समस्या बने हुए हों, अथवा जिनकी ओर उसका अभी ध्यान ही नहीं गया हो. उस अवस्था में वस्तु के बारे में उपलब्ध जानकारी को ही तत्संबंधी ज्ञान मानकर संतोष कर लिया जाता है. लेकिन ज्ञान का ज्ञान कैसे संभव हो? हम सामान्यतः ज्ञान की बाह्यः उपस्थिति से संतुष्ट हो जाते हैं. ज्ञान स्वयं क्या है? इस ओर हमारी दृष्टि कम ही जा पाती है. यह समस्या हम साधारण लोगों की नहीं है. बड़े-बड़े दार्शनिक और विचारकों के लिए भी ज्ञान को परिभाषित करना कठिन रहा है. किसी वस्तु, व्यक्ति आदि के बारे में सामान्य सूचना को ही उसके बारे में ज्ञान मानकर संतोष कर लिया जाता है. ऐसे में कई सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं. ज्ञान क्या वस्तु में अवस्थित होता है अथवा जिज्ञासु के मानस में? वह स्थायी है अथवा परिवर्तनशील? यदि वह परिवर्तनशील है तो किसी काल-विशेष में ज्ञान की प्रामाणिकता का आधार क्या हो? ऐसे कुछ प्रश्न ज्ञान और ज्ञानार्जन की प्रक्रिया से जुड़े हैं. किसी वस्तु के बारे में हमारे ज्ञान का स्तर इस बात पर निर्भर करता है, कि उसके बारे में हमें कितना बोध है? तथा उसको परखने में लगे हमारे उपकरण कितने निरपेक्ष, संवेदनशील, विश्वसनीय और सुग्राही हैं? इस तरह से देखा जाए तो ज्ञान एक पैमाना है, जिसके द्वारा हम किसी वस्तु, स्थान, व्यक्ति, विचार आदि के बारे में अपने अनुभवों को वैध तथा दूसरे के अनुभवों को परखने हेतु कसौटी तैयार करते हैं. जिससे स्वयं हमारे अपने विवेक की कसौटी तैयार होती है. ज्ञान स्वयं में भी ऐसी कसौटी है जिसपर खरा उतरने के बाद ही कोई तर्क कुतर्क कहलाने से बच पाता है.

ज्ञान की पूर्णता संदेहों को विराम देती, तर्कों को समापन की ओर ले जाती है. ज्ञान की संपूर्णता सदैव एक लक्ष्य होती है. जैसे ही किसी एक रहस्य से पर्दा हटता है, दूसरा आवरण चुनौती बनकर उपस्थित हो जाता है. यह सिलसिला निरंतर बना रहता है. व्यवहार में कहा जाता है कि जहां ज्ञान है, वहां शंकाओं के लिए कोई स्थान नहीं है. पर हकीकत है कि जहां शंकाएं हैं वहीं ज्ञान की खुली आमद है. भले किसी को यह विचित्र लगे, पर सच यही है कि हमारी शंकाएं हमारे ज्ञान के सफर को आगे बढ़ाती हैं. निरंतर बढ़ते रहने की प्रेरणा देती हैं. पीटर अबेलार्ड के मन में भी कुछ प्रेरणादायी शंकाएं रही होंगी, जब उसने ये शब्द कहे—‘संदेह हमें जांच-पड़ताल को प्रेरित करती है और जांच-पड़ताल हमें सत्य का रास्ता दिखा देती है.

ज्ञान इतना बहुआयामी होता है कि मनुष्य किसी वस्तु या विचार के एक समय में एक पक्ष को लेकर ही बात कर पाता है. किसी वस्तु या विचार को लेकर हमारी शंकाएं दर्शाती हैं कि हमारे भीतर उस वस्तु को जानने की अभिलाषा जन्म ले चुकी है. जब हम सवाल करते हैं कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा क्यों करती है? तो निश्चितरूप से हमें इसके पूर्व प्रश्न कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, का बोध होता है. पृथ्वी सूरज की परिक्रमा क्यों करती है? उसकी गति और कारण क्या है? उसके लिए ऊर्जा कहां से प्राप्त होती है? दूसरे ग्रहों, उपग्रहों की गति से उसका क्या संबंध है? ऐसे प्रश्नों की अंतहीन शृंखला किसी एक प्रश्न के साथ ही आरंभ हो जाती है. जरूरी नहीं कि सभी प्रश्न किसी एक व्यक्ति के दिमाग में एक ही बार में आ जाएं. परंतु आपसी चर्चा के दौरान, बहस के दौरान, चिंतन-मनन अथवा इतिहास के भिन्न-भिन्न दौर में, ये प्रश्न जन्मते ही रहते हैं. कह सकते हैं कि प्रश्न बीजमंत्र होते हैं. एक छिटका तो उसके बाद प्रश्नों की झड़ी लग जाती है. हमारे अबूझे प्रश्न हमें बताते हैं कि जानना सीमित एक पड़ाव-भर है. ज्ञानार्जन की कोशिश में लगे उपकरणों की भी सीमा है. इसके बावजूद ज्ञान के किसी एक चरण में ही हम उसके बारे में प्रश्नों की सुदीर्घ शृंखला से जुड़ जाते हैं. ज्ञानार्जन की अनवरत चलने वाली प्रक्रिया में कुछ के उत्तर हमें मिलते हैं, कुछ के नहीं भी मिलते. इसी प्रकार प्रथम और द्वितीयक चरणों में ज्ञान आगे बढ़ता है. यह परंपरा इतनी लंबी और सुदीर्घ होती है कि हमारे ज्ञान का स्तर हमेशा प्रथम पायदान पर होता है. जिज्ञासु के रूप में हम स्वयं को सदैव एक नए लक्ष्य के सामने पाते हैं, जो हमेशा लक्ष्य बना रहता है. रोजमर्रा के जीवन में शंका और संदेह को अच्छे मन से नहीं देखा जाता. शंका-युक्त ज्ञान को अज्ञान का दर्जा दे दिया जाता है. उसको अपूर्ण माना जाता है. लेकिन दर्शन ऐसा नहीं मानता. उसके लिए शंकाएं समाधान से कम महत्त्वपूर्ण नहीं होतीं. वे ज्ञान को उसकी पूर्णता की ओर ले जाने का एक अनिवार्य माध्यम हैं. इस तरह हमारा ज्ञान हमारी अंतर्बाह्यः दुनिया के बारे में सांगोपांग बोध है. जिसके माध्यम से हम दृश्य-अदृश्य वस्तुओं, ब्रह्मांड, आचार-विचार आदि के बारे में अपनी तथा दूसरों की विवेकशीलता के स्तर का अनुमान लगा पाते हैं.

ज्ञानार्जन की प्रक्रिया

स्मृति मनुष्य का वह गुण है जो उसको मनुष्येत्तर प्राणियों से अलग और विशिष्ट ठहराता है. यह ज्ञानार्जन की प्रक्रिया का प्रथम उपकरण है. मनुष्य को जो अनुभव होते हैं, हमारी स्मृति उन्हें मानसिक छवियों में संग्रहित करती रहती है. दार्शनिक शब्दावली में ये छवियां प्रत्यय कहलाती हैं. अनुभव के साथ हमारी मानस-छवियों में भी वृद्धि होती रहती है. उनमें से कुछ कम महत्त्वपूर्ण पद विस्मृति के रूप में लगातार ओझल होते रहते हैं. हालांकि मस्तिष्क उनके प्रभाव को हमेशा के लिए कभी विस्मृत नहीं होने देता. अनुकूल अवसर देख वह उन्हें विस्मृति के गर्भ से बाहर ले आता है. प्रत्यय निर्माण की सामग्री हमारे मनस् में प्रायः दो प्रकार से आती है. हमारे निजी अनुभव जो सीधे हमारी इंद्रियों के माध्यम से हमारे मस्तिष्क तक पहुंचते हैं. जैसे मेज को देखने के साथ ही एक छवि हमारे मस्तिष्क में पैठ जाती है. भविष्य में जैसे ही हमारे सामने मेज जैसी संरचना आती है अथवा कोई उसका जिक्र भी करता है तो हम जान जाते हैं कि वह मेज के बारे में है. सीधे अनुभव के अलावा दूसरों के अनुभव भी हमारे प्रत्यय-निर्माण में मददगार होते हैं. वे बातचीत, किस्से-कहानी, पुस्तक, लोकसंवाद या ऐसे ही किसी अन्य माध्यम से हमारे संज्ञान में आते हैं. उनके बारे में पढ़ते-सुनते-देखते समय ही हम उनकी छवियां अपने मनस् में पैठा लेते हैं. प्रत्ययों को सहेजते समय हमारा मस्तिष्क लगातार क्रियाशील रहता है. नवांतुक प्रत्ययों की पूर्वस्थापित प्रत्ययों से तुलना करते हुए वह उनके आधार पर नई मानस-छवियां गढ़ता रहता है. फलस्वरूप अगली बार जब भी कोई नया प्रत्यय बनता है, उससे तुलना करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक संख्या में प्रत्यय पहले से ही मनस् में मौजूद रहते हैं. उनके सहयोग-टकराव से कुछ नए प्रत्यय बनते रहते हैं, जो हमारी मेधा को समृद्धि प्रदान करते हैं. हमारे मस्तिष्क में प्रत्ययों की एक स्वतंत्र दुनिया बसी होती है. हमारा बोध, हमारा ज्ञान कहीं न कहीं उन्हीं से निर्धारित होता है.

प्रत्यय निर्माण में वस्तु-विशेष के अस्तित्व का योगदान होता है. दूसरे शब्दों में अस्तित्व किसी वस्तु का वह गुण अथवा गुणों की अन्योन्याश्रित शृंखला है, जिससे वह पहचानी जाती है. जिसके आधार पर वह दूसरों से भिन्न सिद्ध होती है. यह वैभिन्न्य मानव-मस्तिष्क की रचना है, जो उसने दृश्य वस्तुओं के भौतिक-भाविक रूप को देखते हुए उनकी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने के लिए उन्हें दी है. आवश्यक नहीं कि वे भी स्वयं उस पहचान से परिचित हों. घड़ा और ईंट दोनों ही मिट्टी से व्युत्पन्न हैं. अपने रूपाकार में दोनों स्वतंत्र. इतने कि उन्हें एक-दूसरे से अस्तित्व से, गुणों से कोई वास्ता नहीं. पर आदमी को उनसे वास्ता है. घड़ा र्या इंट भले न जानते हों कि वे क्या हैं? मनुष्य उन्हें अलग-अलग पहचान लेता है. इसलिए कि ये संज्ञाएं उसी के द्वारा दी गई हैं. बचपन से ही बालक को उसके आसपास मौजूद विभिन्न वस्तुओं तथा उनके रूपाकारों के बारे में बताया जाता है. ये रूपाकार अलग-अलग छवियों के रूप हमारे मस्तिष्क में मौजूद रहते हैं. ज्ञानार्जन की प्रक्रिया के दौरान व्यक्ति वस्तु अथवा विचार विशेष तथा मस्तिष्क में मौजूद प्रत्ययों की तुलना द्वारा जान लेता है कि प्रेक्षित वस्तु क्या है. आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति के मनस् में सभी प्रत्यय मौजूद हों. उस अवस्था में व्यक्ति दूसरे के अनुभवों और छवियों से काम चला लेता है. इस तरह ज्ञान सामूहिक प्रक्रिया भी है.

प्रश्न है कि क्या गुण वस्तुओं की निजी विशेषता होते हैं? यदि हां, तो क्या हम वस्तुओं को उसी रूप में जान पाते हैं, जैसी वे हैं. आम को ‘आम’ संज्ञा मनुष्य द्वारा दी गई है. निर्जीव वस्तुएं नहीं जानतीं कि वे स्वयं क्या हैं? आप आम को ‘आम’ कहें या ‘इमली’, इससे आम को कोई फर्क नहीं पड़ता. आम यह भी नहीं जानता कि वह खट्टा है या मीठा. यह तय करना उसका काम नहीं है. खट्टा-मीठा स्वाद या अनुभूतियां हैं, जिनका नामकरण प्रकृति साहचर्य से गुजरते हुए मनुष्य द्वारा किया गया है. पृथ्वी के अलग-अलग प्रांतों में भटकते हुए मनुष्य को भिन्न-भिन्न अनुभव हुए. उसके फलस्वरूप अलग-अलग भाषाएं बनीं. सभ्यताओं के संपर्क के आधार पर भाषायी परिवर्तन-संबर्धन के दौर भी चलते रहे. कह सकते हैं कि ज्ञान प्रकृति के साहचर्य द्वारा अर्जित बौद्धिक-आनुभविक संपदा है. लेकिन उसके प्रमाणीकरण का आधार क्या हो? कैसे कहें कि हमें वस्तु का यथातथ्य ज्ञान है? ज्ञान के प्रमाणीकरण की सबसे बड़ी समस्या है कि सृष्टि में मनुष्य अकेला विवेकवान प्राणी है. ज्ञान उसके लिए वरदान है तो अभिशाप भी है. वरदान इसलिए कि बाकी प्राणियों की ओर से मनुष्य के श्रेष्ठत्व को कोई बड़ी चुनौती कभी दी नहीं जा सकी. अपने ज्ञान के बल पर मनुष्य पशु-पक्षियों से अपने स्वार्थानुकूल काम लेता आया है. बल्कि उसने सृष्टि के विभिन्न तत्वों की व्याख्या ही अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर की है. अभिशाप इसलिए कि अपनी खूबियों, खामियों, स्वाध्याय, साधना, अध्ययन और चिंतन द्वारा मनुष्य ने भाषा की जो कसौटियां बनाईं, उन्हें यदि मनुष्येत्तर प्राणियों की ओर से भी चुनौती मिल पाती तो निश्चय ही विमर्श का दायरा और उसकी परिधि में विस्तार होता.

प्रकृति द्वारा केवल मनुष्य को स्मृति का वरदान प्राप्त है. इसके माध्यम से वह अपने अनुभवों, ज्ञान आदि को आने वाली पीढ़ियों को सौंपता आया है. आज के मनुष्य के प्रबोधीकरण में उसकी सैकड़ों पीढ़ियों का योगदान है. जिसे हम ज्ञान कहते हैं, उसकी कसौटियां मनुष्य ने ही तैयार की हैं. इन कसौटियों में समय-समय पर संशोधन भी होता रहा है. कई बार मनुष्य को अपना ज्ञान अपर्याप्त लगने लगता है. उदाहरण के लिए भाषा का मुद्दा. जैसे ‘खट्टी’ कही जाने वाली दो वस्तुओं में से एक वस्तु कम खट्टी है, दूसरी अधिक खट्टी. भाषा की सीमा है कि वह अधिक से अधिक खट्टेपन के स्तर को ‘कम’ या अधिक’ के रूप में अभिव्यक्त कर सकती है. संभव है कुछ लोकभाषाओं में अधिक खट्टेपन और कम खट्टेपन को अभिव्यक्त करने के लिए अलग शब्द हों. फिर भी अधिक और कम के बीच खट्टेपन के जो भिन्न स्तर हो सकते हैं, उनकी सटीक अभिव्यक्ति में हमारे भाषायी उपकरण काम नहीं आते. कोई वस्तु ठीक-ठीक कितनी खट्टी है, यह बताने में भाषा असमर्थ रहती है. रसायन विज्ञान पदार्थ में मौजूद अम्लीयता को मापकर पीएच मूल्य के आधार पर खट्टेपन को अंकों में अभिव्यक्त कर सकता है. लेकिन उसके द्वारा हमारे मस्तिष्क में दर्ज सूचना आंकिक होगी. खट्टेपन के बोध से सर्वथा परे. दूसरे शब्दों में विज्ञान खट्टेपन को लेकर उसके कारण अम्लीयता का सटीक पीएच स्तर तो बता सकता है. लेकिन स्वाद का अंकीकरण, पीएच मूल्य का ज्ञान हमारे मन में खट्टेपन का बोध जाग्रत नहीं कर पाते. यह जानकारी हमें अलग-अलग तरह से प्रभावित करती है. खट्टापन हमारी अनुभूति का विषय है. जबकि पीएच स्तर विशुद्ध बौद्धिक सूचना. इसे एक कथात्मक उदाहरण के माध्यम से भी समझा जा सकता है—

‘एक राजा था. प्रजा हित में उसे एक किसान के खेत की जरूरत पड़ी. खेत में था कटहल का पेड़. उसने मांग की कि उसको कटहल के पेड़ का भी मुआवजा दिया जाए. फरियाद लेकर वह राजा के दरबार में पहुंचा.
‘पेड़ का मुआवजा! ऐसा तो आज तक सुनने में नहीं आया….कितना मुआवजा चाहते हो?’
‘महाराज मेरा कटहल का पेड़ तीन हाथियों जितना ऊंचा है. हर साल वह इतने फल देता है कि तीन हाथियों का पेट भर सके. इसलिए मुझे उस पेड़ के बदले तीन हाथियों जितना मुआवजा दिया जाए?’
किसान ने अपनी बात कुछ इस तरह रखी कि जो दरबारी पेड़ के मुआवजे की बात सुनकर हंसे थे, उसके पक्ष में हो गए. कटहल के एक पेड़ के बदले तीन हाथियों जितना मुआवजा, राजा एकाएक निर्णय न ले सका. अगले दिन निर्णय सुनाने को कहकर उसने किसान को वापस कर दिया. संयोगवश राजा अगले दिन ही चल बसा. कुछ दिनों बाद किसान भी दुनिया से कूंच कर गया. उसके बाद तो वर्षों बीते. समय बदला. निजाम बदला. राजशाही की जगह लोकतंत्र ने ले ली. अनपढ़ किसान के बेटे पढ़-लिखकर नौकरी करने लगे. सरकार को फिर उस जमीन की जरूरत पड़ी. कटहल का पेड़ पहले की भांति अब भी हर साल फलता था. जेठ-बैशाख में उसकी डालियां फलों से लद जातीं. किसान के बेटों ने भी कटहल के पेड़ का मुआवजा मांगा. सरकारी कर्मचारियों ने टाल-मटोल की तो उन्हांेने मुकदमा दायर कर दिया.
‘कितना मुआवजा चाहते हो?’ अदालत में पूछा गया.
‘श्रीमान पेड़ बड़ा ही होनहार है. हमारे पिता के जमाने से ही फल देता आ रहा है. दस-पंद्रह वर्ष और फल देगा. ऐसा कमाऊ पेड़ हमसे ले लिया गया तो हमारा लाखों का नुकसान हो जाएगा.’
‘कितने वर्ष और फल देगा, दस या पंद्रह. ठीक-ठीक बताओ?’
‘जी पंद्रह वर्ष!’
‘एक साल की फसल और पेड़ की लकड़ी की कीमत बताओ?’ किसान के बेटों ने बता दिया.
अदालत ने लकड़ी की कीमत के साथ एक साल के कटहल के बाजार-मूल्य का पंद्रह गुना जितना मुआवजा तय कर दिया. किसान के बेटों ने इसे अपनी जीत माना.

किसान और उसके बेटों में एक समानता है. दोनों ही अपने अधिकार के बारे में जानते थे. दोनों को लगता था कि कटहल के पेड़ का मुआवजा मिलना चाहिए. न मिलने पर आगे फरियाद की जा सकती है, यह भी उन्हें मालूम था. लेकिन कटहल के मुआवजे में रूप में किसान ने तीन हाथी मांगे थे. जबकि उसके बेटे लकड़ी और पंद्रह वर्ष की फसल मुआवजा लेकर संतुष्ट हो गए. इसलिए कि किसान से उसके बेटों तक आते-आते समय वातावरण बदल चुका था. इस आधार पर कह सकते हैं कि मनुष्य का बोध अनुभव सिद्ध होता है. परिवेश बदलने के साथ ही उसके ज्ञान का स्वरूप भी बदलता रहता है. किसान का जैसा अनुभव था, उसने उसके अनुसार मुआवजे की मांग की थी. उसके बेटों के अपने अनुभव के अनुसार. इसलिए यह कहना कि गुण केवल मनोजगत की रचना है उचित नहीं है. दूसरी ओर यह कहना भी सही न होगा कि गुण वस्तु में अवस्थित होते हैं. गुण यदि केवल वस्तु में स्थित होते तो प्रत्येक प्रेक्षक को उन्हें समान रूप से प्रभावित करना चाहिए. जबकि ऐसा नहीं होता. चार चित्रकारों को यदि एक मूर्ति के चारों ओर बिठाकर चित्र बनाने को कहा जाए तो उनके बनाए चित्र अलग-अलग होंगे. लेकिन यदि मूर्ति न हो और उन्हें कल्पना के आधार पर उसका चित्र बनाने को कहा जाए तो उसकी प्रस्तुति में और भी बड़ा अंतर होगा. फिर भी अवलोकन न तो कोई यांत्रिक क्रिया है, न ही ज्ञान के हमारे सारे के सारे पैमाने जड़ हैं. हमारा बोध न केवल स्वतंत्र है, बल्कि उसमें संशोधन की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है. लेकिन गुण केवल मनोरचना नहीं हो सकते. उनका मूलाधार वस्तुएं होती हैं, एक प्रेक्षक के रूप में मनुष्य उनसे अपनी सीमाओं के अनुसार ग्रहण करता है. भाषा एवं अभिव्यक्ति के अन्य उपकरणों के विकास की दर, आनुभविक जगत की विकासदर से बहुत कम होती है. किसी भी लेखक-साहित्यकार का सामथ्र्य नहीं है कि वह अपनी अनुभूतियों को सटीक अभिव्यक्ति दे सके. उस समय उसको तुलना द्वारा काम चलाना पड़ता है. मसलन बहुत खट्टे आम को ‘तेजाब की तरह खट्टा’ कह देना. अभिप्राय है कि किसी वस्तु के गुण भले ही उसकी अपनी विशेषता हों, लेकिन उन्हें अपनी अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य पर निर्भर करना पड़ता है. यह अलग है कि अभिव्यक्ति के उसके उपकरण अधूरे और अक्षम हों. वस्तु के बारे में उसके जो गुण हमारे लिए उपयोगी नहीं होते उसके अवगुण कहलाते हैं. यह विशेषण हैं जो मनुष्य ने अपनी सुविधा और हित के अनुसार निर्धारित किए हैं. गुण और अवगुण का भेद भी व्यक्तिपरक और परिस्थतिकीय हो सकता है. किसी भूखे व्यक्ति को करेले का कड़वा रस भी आम के रस की भांति अमृत तुल्य लगेगा. जबकि भरे पेट वाला व्यक्ति आम के रस के स्वाद का भी आनंद नहीं उठा पाएगा.

वस्तुओं को टिककर देखने-परखने की सम्यक दृष्टि के अभाव में हम सामान्यीकरण करने लग जाते हैं. मसलन आम चीनी तरह मीठा है. ‘इमली’ तेजाब जितनी खट्टी है. ऐसे उदाहरण हमारे प्रबोधीकरण में सहायक होते हैं. परंतु इनसे सारा जोर वस्तु के किसी एक गुण पर ही अटक जाता है. वस्तु के बाकी गुणों की ओर हमारी निगाह ही जा पाती. हर भाषा की एक सीमा होती है. कभी-कभी शब्द चुकने लगते हैं. कभी-कभी हम कहना कुछ चाहते हैं, कह कुछ और जाते हैं. घर नदी पर है, उसमें कहने और समझने वाले दोनों का वही अर्थ नहीं होता जो शब्दों की निष्पत्ति है. उस अवस्था में शब्दार्थ के बजाय लक्षणार्थ को प्रधानता दी जाती है. लक्षण की अभिकल्पना भाषायी दुर्बलता को दूर करने की कोशिश का ही रूप है. इस भाषायी दुर्बलता का कारण भी है, क्योंकि उसकी रचना जिस मानवी मेधा द्वारा हुई है, वह सीमित होती है. लेकिन बोध की सीमाओं और भाषायी अक्षमताओं के चलते इस प्रकार के तुलनात्मक प्रयास अनिवार्य होते हैं. इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अज्ञान ज्ञान का विलोम न होकर उसके अभाव की अवस्था है. कोई बात जो झूठ नहीं है, आवश्यक नहीं कि वह सच भी हो. ऐसे ही काला और सफेद रंग दो विभिन्न स्थितियां हैं. नदी के दो पाटों के समान. एक इस तरफ दूसरी उस तरफ. एक के हाथ में हजार रुपये आए. उसने वे तत्काल दूसरे को सौंप दिए. दूसरे के पास भी इतने ही रुपये आए. उसने अपनी गांठ में बांध लिए. यह तो अपना-अपना व्यवहार है; या कि व्यापार करने का अपना अलग ढंग. वस्तुतः विलोम की संकल्पना प्रतिकूल परिस्थितियों की सही ढंग से व्याख्या न कर पाने के वाली हमारी वौद्धिक अक्षमता की उपज है. यह हमारी वुद्धि और अभिव्यक्ति की सीमा भी है.

ज्ञान का स्वरूप

ज्ञान अनंत है. उसे हम परमसत्ता का प्रतीक भी कह सकते हैं. लेकिन वह है इसी प्रकृति और ब्रह्मांड का रूप. उससे बाहर कुछ नहीं. कुछ हो भी नहीं सकता. दोनों एक ही रूप हैं. अलग-अलग मानेंगे तो व्यवस्था संबंधी अनेक समस्याएं पैदा हो जाएंगी. एक अनंत में दूसरी अनंत सत्ता कैसे समा सकती है. समाएगी तो फिर उनमें से किसी को भी अनंत भला कैसे कहा जा सकता है. परमसत्य के इन सभी रूपों को जानना समझना संभव नहीं है. वैसे ही परमसत्ता को उसकी समग्रता के साथ समझ पाना असंभव है. सीमित सामथ्र्य वाली मानवेंद्रियांे की क्षमता से यह बिलकुल बाहर है. उन आंखों का हम कैसे भरोसा करें जो तस्वीर के दूसरे पक्ष की ओर एक समय में एक साथ कभी जाती ही नहीं. जबकि परमसत्ता को समझने के लिए कम से कम पंचविमीय दृष्टि चाहिए, जो आइंस्टाइन के चतुर्विमीय संसार के अलावा उसके भीतर झांकने में भी सामथ्र्यवान हो. घ्राण, स्पर्श, और श्रवणेद्रियों के अनुभवों को भी अंतिम और प्रामाण्य नहीं माना जा सकता.

ज्ञान वस्तुनिष्ठ होने के साथ-साथ व्यक्तिनिष्ठ भी होता है. देशकाल के अनुसार किसी वस्तु के बारे में प्रेक्षकों की धारणाएं भिन्न-भिन्न हो सकती हैं. आम के वृक्ष को देखकर कृषि विज्ञानी, चिकित्सक, भौतिकविज्ञानी और साधारण आदमी सभी देखने का दावा कर सकते हैं. लेकिन उनके अनुभव और अभिव्यक्तियां परस्पर शायद ही मेल खाएंगी. कृषिविज्ञानी संभव है फसल का अनुमान लगाते हुए उससे होने वाली आय के बारे में बताना चाहे. उसका आम संबंधी ज्ञान वृक्ष की प्रजाति औसत पैदावार, पत्तियों और तने की आंतरिक संरचना जैसी जानकारी से भरपूर होगा. कृषि-विज्ञानी आम के औषधीय गुणों की चिकित्सक जैसी जानकारी रखता हो, यह आवश्यक नहीं है. चिकित्सक के उम्मीद की जा सकती है कि वह आम के साथ उसके तने, पत्तियों, और बौर के औषधीय गुणों का भी ज्ञान रखे. इसी प्रकार भौतिक-विज्ञानी आम के वृक्ष के रूपाकार के बारे में ही बेहतर टिप्पणी कर सकता है. साधारण आदमी आम के पत्तों, लकड़ी, फल और बौर आदि के सांस्कृतिक उपयोग, उसके फल और उससे तैयार होने वाले व्यंजनों आदि के बारे में व्यावहारिक जानकारी दे सकता है. इन सभी का ज्ञान प्रामाण्य है. एक मनुष्य भले ही वह कितनी ही विलक्षण प्रतिभा का स्वामी हो, ब्रह्मांड से अपने हिस्से का केवल उतना ज्ञान समेट पाता है, जितना अरबों-खरबों वर्ष पुरानी प्रकृति के आगे उसके अपने जीवन के चंद दिन.

दर्शनशास्त्रीय स्थापनाएं ठोस एवं तर्कशास्त्रीय आधार होने के बावजूद काफी लचीलापन लिए होती हैं. वह किसी भी विचार को अंतिम मानकर नहीं चलता. जबकि विज्ञान में नियम बनाने के साथ ही धारणा विशेष को सर्वस्वीकृति मिल जाती है. उसके बाद नियमों का उपयोग वैज्ञानिक गवेष्णाओं में आप्तवचन की भांति, बिना किसी विवाद एवं संदेह के चलता रहता है. जब तक कि कोई बड़ी और क्रांतिकारी खोज उसके नियमों में आमूल-चूल परिवर्तन न कर दे. जैसे कि न्यूटन के गति के नियम जो आश्चर्यजनक रूप से बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों तक सर्वमान्य बने रहे, लेकिन आइंस्टाइन ने अपने अध्ययन के दौरान माना कि गति के समीकरण केवल साधारण वेगों के लिए सही हैं. अति उच्च यथा प्रकाशकीय वेगों के लिए गति के समीकरण अनफिट हैं. जाहिर है कि आइंस्टाइन की इन घोषणाओं से न्यूटन के गति नियमों की शाश्वता पर प्रश्नचिह्न लग चुका है. लेकिन उसका उपयोग साधारण वेगों के लिए आज भी पूर्ववत जारी है. कुछ ऐसा ही आइंस्टाइन के सिद्धांत के साथ हुआ. करीब एक शताब्दी तक वह वैज्ञानिकों के मानक सिद्धांत का काम करता रहा. आज स्टीफन हाकिंग जैसे कई वैज्ञानिक सापेक्षता के सिद्धांत में खामी तलाश चुके हैं. क्वांटम थ्योरी ने भौतिकी के परंपरागत सिद्धांतों को उलट-पलट दिया है.

दर्शनशास्त्र का कोई भी विचार संदेह से परे नहीं होता. विज्ञान की तरह वह भी इस बात को महत्त्व देता है कि संदेह से जांच पड़ताल पर पहुंचते हैं और जांच पड़ताल हमें निष्कर्ष तक ले जाती है. विज्ञान और दर्शन में आगे चलकर एक मूलभूत अंतर यह बना कि विज्ञान जहां संदेहों के निवारण के लिए सार्वभौमिक नियमों की ओर अग्रसर रहता है, वहीं दर्शनशास्त्र संदेहों, विरोधी विचारधाराओं को भी सम्मानजनक स्थान देते हुए सत्य की खोज की ओर अग्रसर रहता है. इस प्रकार दर्शनशास्त्र में प्रतिविचार का महत्त्व विचार जैसा ही होता है. जबकि विज्ञान की कोशिश प्रति विचार के उन्मूलन के बाद एक सामान्य-सर्वस्वीकार्य नियम बनाने की होती है, जिसको प्रयोगों पर कसा जा सके. जो प्रत्येक तर्क और परीक्षण की कसौटी पर खरा उतर सके. दर्शनशास्त्रीय संकल्पनाओं का ध्येय मात्र इतना होता है कि वे परमसत्य अथवा उसके किसी अंश की पहचान करने वाले विविध मार्गों में से किसी एक की ओर संकेत भर करती हैं. चूंकि ब्रह्मांड की कारण सत्ता का स्वरूप इतना विराट और अकल्पनीय रहा है, कि कोई विचार-विशेष जो परमसत्ता के एकांश का भी प्रदर्शन करता है, वह भी काफी महत्त्वपूर्ण मान लिया जाता है. यहां उल्लेख करना आवश्यक है कि परमसत्ता का अभिप्राय किसी दैवीय या ईश्वरीय व्यवस्था से कदापि नहीं है, जैसी कि आस्था या अंधविश्वास के नाम पर अक्सर थोपी जाती रही है. परमसत्ता से हमारा आशय विराट प्रकृति से है जिसमें अखिल ब्रह्मांड और उसके आरपार भी यदि कुछ है तो वह सब समाया हुआ है. दर्शनशास्त्र विज्ञान न होकर भी आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की सभी धाराओं से समानरूप में प्रेरणा ग्रहण करता है. इसके साथ ही यह समानांतर रूप में उनके निष्कर्षों को प्रभावित भी करता है.

विज्ञान सामान्यतः प्रमेय और यथार्थ विषयों या ऐसे विषयों को जिनका प्रकारांतर में अन्वीक्षण-विश्लेषण संभव हो सके, अपने अध्ययन की विषय वस्तु बनाता है. यद्यपि यह आवश्यक नहीं है कि अध्ययन के प्रारंभ में भी वे विषय प्रमेय और यथार्थ माने जाते रहे हों. वैज्ञानिक जिज्ञासाएं अक्सर अज्ञेय समझे जाने वाले विषयों को चुनौती देती हैं, अंततः वैज्ञानिक को अपने श्रम और संकल्प के बूते सफलता भी मिलने लगती है. इस प्रकार दार्शनिक विवेचन का मुद्दा रहे विषय वैज्ञानिकों की मेधा के सहयोग द्वारा विशुद्ध वैज्ञानिक विषयों में ढलने लगते हैं. यहां स्पष्ट करना भी जरूरी है कि दर्शन और विज्ञान के बीच कोई स्पष्ट विभाजन रेखा खींच पाना असंभव है. महज अनुमान या कल्पना के आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि फलां विषय विशुद्ध वैज्ञानिक है और फलां केवल दार्शनिक विवेचन की अपेक्षा रखता है. जीनोम की खोज, मास्तिष्क की संरचना, क्वांटम भौतिकी, बह्मांड और समय के बारे में नवीनतम आविष्कार कई ऐसी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां हैं, मानवी मेधा की जिनके कारण हमें सृष्टि की व्युत्पत्ति संबंधी अपनी धारणाओं में संशोधन करना पड़ा. परिणामतः इन खोजों का प्रभाव दर्शन और ज्ञान-विज्ञान की दूसरी शाखाओं पर भी पड़ा है.

कुछ विद्वान समय को भी चैथे तत्व के रूप में जोड़ने का आग्रह करते हैं. इनमें आधुनिक भौतिकविदों की संख्या अधिक है. वस्तुतः प्रेक्षक और प्रेक्षित वस्तु के बीच प्रेक्षण की घटना को संपन्न करने के लिए दोनों के बीच अंतःसंबंधों का विकसित होना अनिवार्य है. यदि प्रेक्षक वस्तु के सापेक्ष प्रकाश आवर्तन की दिशा में प्रकाशीय वेग से जा रहा हो. वस्तु से परावर्तित प्रकाश किरणें प्रेक्षक तक कभी नहीं पहुंच पाएंगी. परिणामतः उपर्युक्त तीनों तत्वों के उपस्थित रहने के बावजूद देखने की क्रिया कभी संभव नहीं हो पाएगी. ऐसी स्थिति में वस्तु संबंधी हमारा ज्ञान शून्य होगा. सत्य एवं तार्किक होने के बावजूद यह नितांत काल्पनिक स्थिति है. विज्ञान की दृष्टि में संभावनाएं भी बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं. प्रत्येक नियम अपने पूरक नियम को साथ रखता है. इसलिए कि वह अपने आप में संपूर्ण नहीं है. सच तो यह है कि खरबों वर्ष पुराने इस ब्रह्मांड और सहस्रों प्रकाशवर्ष में विस्तृत सृष्टि को जानने समझने के लिए हमारे पास जो अनुभव और भाषा है, वह मात्र कुछ हजार वर्ष पुरानी है. स्वयं हमारा अस्तित्व भी कुछ लाख वर्ष पुराना है. इसलिए ‘सर्वखाल्विदं ब्रह्म’ कहकर ज्ञानार्जन की कोशिश से कुछ देर के लिए विराम ले लेता था. हम चाहें स्वयं को जितना बड़ा ज्ञानी माने, सृष्टि-रहस्य को जानने-समझने का जितना दावा करें, हमारा ज्ञान अभी शैशवास्था में है. सृष्टि को जानने का हमारा दावा उस बच्चे की भांति है, जो चांद को पानी से भरे कटोरे में देखकर रोटी समझ लेता है. हमारा यह अहं होगा यदि हम अपने कामचलाऊ ज्ञान को प्रकृति के रहस्यों के अनावरण की संज्ञा से विभूषित करें.

तक क्या मनुष्य को हार मान लेनी चाहिए? छोड़ दे कोशिश प्रकृति को जानने-समझने की. इसके अबूझ रहस्यों से पर्दा हटाने का संकल्प भुला दे. नहीं….इस विराट ब्रह्मांड और अपनी समस्त ऐंद्रियक सीमाओं, विशिष्टताओं, दुबर्लताओं और खूबियों के साथ मनुष्य अभी तक जितना समेट पाया है, वह भी कुछ कम संतोष की बात नहीं है. क्योंकि अपनी उस बीहड़ ज्ञान-यात्रा में मनुष्य को कदम-कदम पर भीतरी और बाहरी संकटों से जूझना पड़ा है. और यह भी कि असंख्य जीवों और उनकी असंख्य प्रजातियों में केवल मनुष्य ही है जो प्रकृति को चुनौती देने का साहस कर पाया है. जिसने अवसर मिलते ही समय धारा के विपरीत चलने का साहस जुटाया है. इस दुस्साहसी संकल्पयात्रा के लिए मानवी जिजीविषा को नमन करने का मन हो आता है. इसी जिजीविषा के दम पर मानवी मेधा ने चुनौतियों को स्वीकारा है. मानवी संकल्प की विराटता को दर्शाने के लिए यह कम नहीं है कि खरबों प्रकाश वर्ष में फैले ब्रह्मांड को जानने का जो दावा करता है, उसकी अपनी कद-काठी केवल पांच-छह फुट की है. उसका जीवन क्षणभंगुर है. मगर यह मानवी मेधा की अदम्य ज्ञान लालसा ही है कि सत्य शोधन के पथ पर वह स्वयं को खुशी-खुशी बलिदान कर देता है. चाहे वह जहर का प्याला पीने वाले सुकरात हों या हंसते हुए मौत को गले लगा लेने वाला का॓परनिक्स. हमारा ज्ञान हमारी उपलब्धियां उन सबकी कर्जमंद हैं.

क्रमश:….

© ओमप्रकाश कश्यप

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