समय का दर्शन-दो

कालसैद्धांतिकी

समय को लेकर उपर्युक्त दोनों मान्यताएं प्रेक्षक के सोच और उसकी मनोरचना पर निर्भर हैं. हमारी दृष्टि प्रायः अपने परिवेश की सामान्य गतिविधियों तक सीमित रहती है. समाज, संस्कृति अथवा रोजमर्रा के कार्यकलापों पर चर्चा के दौरान समय के प्रत्यय का जिक्र घटनाचक्र को सहेजने वाले उपकरण के रूप में किया जाता है. उस समय मान लिया जाता है कि रेलगाड़ी के डिब्बों की भांति वह भी प्रखंडों में प्रवाहमान है. सामान्य शब्दावलि इन प्रखंडों को भूत, वर्तमान और भविष्य के रूप में बांचती है, जबकि दर्शन इसे समय की कालसैद्धांतिकी(Tense Theory) कहता आया है. कालसैद्धांतिकी की संकल्पना मनुष्य की व्यावहारिक जरूरत है. यह प्रेक्षकसापेक्ष होती है. जैसे इतिहास के सामान्य अध्ययन के आधार पर हम कह सकते हैं कि 1857 का स्वाधीनता संग्राम तात्या टोपे के लिए उसका ‘वर्तमान’ था. हमारे लिए वह अतीत यानी ‘भूतकाल’ का हिस्सा है. जनसाधारण का समयबोध इसी आधार पर विकसित होता है. अधिकांश बुद्धिजीवी भी यही मानते हैं. लेकिन व्यवहार से परे कालसैद्धांतिकी की क्या प्रामाणिकता है? क्या भूत, वर्तमान और भविष्य की सत्ता वास्तविक है, यह असली प्रश्न है. दूसरे शब्दों में जिसे हम ‘वर्तमान’ कहकर संबोधित करते हैं, क्या वह सचमुच वर्तमान होता है? क्या हम घटनाओं को ठीक उसी क्षण ग्रहण कर पाते हैं, जब वे घटित होती हैं? प्रयोगों की बात करें तो ऐसा संभव नहीं है. घटनाओं के जन्म तथा उनके बोध में प्रयोगसिद्ध अंतर होता है. घटनाओं के प्रेक्षण की हमारी योग्यता ध्वनि, प्रकाश, स्पर्श आदि किसी न किसी माध्यम पर निर्भर होती है. किसी घटना का आकलन दो स्वतंत्र प्रेक्षकों में से एक यदि ध्वनि को आधार मानकर करे, दूसरा प्रकाश कोतो उन दोनों के निष्कर्षों में परस्पर इतना अंतर होगा कि उनपर विश्वास करना कठिन हो जाएगा. हालांकि अपनेअपने निष्कर्ष में दोनों ही सही होंगे. हम कह सकते हैं कि ध्वनि और समय के वेग के तुलनात्मक अध्ययन और गणना के समायोजन से घटना का वास्तविक कालबिंदू तय किया जा सकता है. परंतु क्या इतने भर से काम चल जाएगा? और उसके बाद जो निष्कर्ष प्राप्त होगा, क्या वह पूरी तरह सही होगा? शायद नहीं! इसलिए कि घटनाओं के सामान्य प्रेक्षण के दौरान तीसरे आयाम को प्रायः पूरी तरह भुला दिया जाता है. वह तीसरा आयाम प्रेक्षक का है. जो घटना को देखकर, छूकर अथवा सुनकर उसका अनुभव करता और तदनुसार निर्णय लेता है.

       जिसको हम वर्तमान कहते हैं, समय को लेकर क्या वह ठीक वैसा ही साक्ष्य है जैसा हमें प्रतीत होता है. जिसे हम साधारणतः मान भी लेते हैं? वर्तमान हमारी हालिया अनुभूति से गुजर रही घटनाएं हैं. वे प्रत्यक्ष भी हो सकती हैं और परोक्ष भी. का॓फी हाउस में चाय का आनंद ले रहे व्यक्ति के लिए वहां की अंदरूनी हलचलों के अलावा, वहां लगे टेलीविजन सेट पर राष्ट्रपति के अभिभाषण का सजीव प्रसारण वर्तमान है. मैं इस लेख को कंप्यूटर पर टाइप कर रहा हूं, यह मेरा वर्तमान है, और इसको लेकर संदेह की गुंजाइश नहीं है. समस्या वर्तमान के सटीक आकलन को लेकर है, जो वर्तमान के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर देती है. कदाचित आश्चर्यजनक मगर विज्ञानसम्मत तथ्य है कि वर्तमान जैसी कोई चीज नहीं होती. हम सदैव भूतकाल में वास करते हैं. मान लीजिए कि कोई व्यक्ति एक साथ अपने दाएं हाथ से अपनी कान एवं बाएं हाथ द्वारा पैर के अंगूठे का स्पर्श करता है. वह सामान्यतः यही दावा करेगा कि उसने दोनों कार्य एक साथ, एक ही क्षण में किए हैं. कान और पैर के अंगूठे दोनों को एक साथ छुआ है. उसकी गतिविधि पर नजर रख रहा पर्यवेक्षक इसकी पुष्टि आसानी से कर सकता है. संभव है उस व्यक्ति ने कान और पैर दोनों को सचमुच एक ही कालबिंदू पर छुआ हो. लेकिन छूने का बोध हमारे वास्तविक संवेदनतंत्र यानी मस्तिष्क की निर्णय प्रक्रिया पर निर्भर करता है. दोनों घटनाएं भले ही किसी एक क्षण में घटी होंलेकिन हमारा मस्तिष्क, यदि वह सूक्ष्मतम अंतराल को पकड़ लेने में सक्षम हो तो, उन्हें अलगअलग क्षणों में घटी घटना बताएगा. आखिर क्यों? इसलिए कि स्पर्श और उसकी अनुभूति दोनों भिन्न घटनाएं हैं. स्पर्श का संबंध हमारे हाथ अथवा शरीर के उस हिस्से से है, जो किसी वस्तु के संपर्क में आता है. जबकि अनुभूति उस स्पर्श की तरंगों के मस्तिष्क तक पहुंचने के बाद वहां हुई हलचल है. अतः उपर्युक्त घटना में प्रेक्षक को भले ही लगे कि दोनों हाथों द्वारा किया गया स्पर्श किसी क्षणविशेष में घटी घटनाएं हैं. इसके बावजूद मस्तिष्क जो निर्णय देगा वह वास्तविकता से परे होगा. इस कारण कि कान मस्तिष्क के निकट है. अतः उसके स्पर्श से बने संकेत को मस्तिष्क तक पहुंचने में पैर के स्पर्श से बने संकेत की अपेक्षा कम समय लगता है. इसलिए मस्तिष्क कान के स्पर्श को प्रारंभ में घटी घटना बताएगा. दोनों के बीच लगभग 80 मिली सैकिंड का अंतराल होगा. यह अंतराल प्रयोगों द्वारा प्रमाणित है. स्वतंत्र पर्यवेक्षक इन घटनाओं का अवलोकन प्रकाश के माध्यम से करेगा. उसकी अनुभूति घटनास्थल से उसकी भौतिक दूरी पर भी निर्भर करेगी.

       चूंकि प्रकाश एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में समय लेता है, इसलिए जिस समय घटना का संदेश प्रकाश के जरिये पर्यवेक्षक तक पहुंचेगा, घटना उससे कुछ क्षण पहले ही संपन्न हो चुकी होगी. घटनास्थल से अलगअलग दूरी पर खड़े दो पर्यवेक्षक यदि उसका अवलोकन करें तो दोनों द्वारा अभिव्यक्त घटना का ‘वर्तमान’ अलगअलग होगा. वह घटना के वास्तविक समय से पूरी तरह भिन्न होगा. चूंकि हम बहुत छोटे कालखंडों का हिसाबकिताब रखने में प्रवीण नहीं हैं, इसलिए प्रायः ऐसे अंतराल हमारे मस्तिष्क की पकड़ में नहीं आते. खासकर प्रकाश वेग जैसे उच्चतम वेग. परिणामस्वरूप हम उनकी अनजाने ही उपेक्षा करते जाते हैं. आम जीवन में इससे कुछ बिगड़ता भी नहीं है. पर यदि घटनास्थल और प्रेक्षक के बीच की बहुत लंबी दूरी हो, अरबोंखरबांे किलोमीटर का अंतराल हो तो वर्तमान की संद्धिग्धता एकदम साफ नजर आने लगती है. खगोल वैज्ञानिक बताते हैं जिन तारों को देखकर हम उनके अस्तित्व का आकलन करते हैं, संभव है वे आज जीवित ही न हों. सैकड़ोंहजारों वर्ष पहले ही नष्ट हो चुके हों. उस समय उनसे निकला प्रकाश हम तक पहुंचने में सैकड़ोंहजारों वर्ष बाद पहुंचा हो. इसलिए घटना के प्रेक्षण के लिए आइंस्टाइन ने समय को चौथे आयाम के रूप में स्वीकार किया है, जिसके अनुसार वह घटनाओं के आकलन के लिए समय को ध्यान में रखने का सुझाव देता है. वही आइंस्टाइन मानते हैं कि वर्तमान जैसी कोई चीज नहीं होती. हम भूतकाल में जीते हैं. इसे यों भी कह सकते हैं कि जब तक वर्तमान का अनुभव करते हैं, वह भूतकाल में ढल चुका होता है. प्रेक्षण को अभिव्यक्ति की अवस्था तक आतेआते हमारे मस्तिष्क और उसकी निर्णय प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. उस अवस्था में जिसे हम वर्तमान मानते हैं, वह भूत में बदल जाता है. जीवन और प्रकृति को लेकर यह अनिश्चितावादी द्रष्टिकोण ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी के दार्शनिक हेराक्लाइट्स के विचारों से मिलताजुलता है. वह पानी को परमतत्व मानता था. नदी के प्रवाह को देखकर जो अनुभूति उसके मनस में कौंधी, उसने माना कि संसार सबकुछ परिवर्तनशील है. कुछ भी निश्चित नहीं है. जल की भांति प्रवाहमान है. हम एक ही नदी में दूसरी वार पांव नहीं रख सकते. हेराक्लाटस तत्ववादी विचारक था, जिसने सृष्टि की विराटता से प्रभावित हुए बिना उसके सूक्ष्म रूप की चंचलता को पहचाना तथा उसके भीतर मौजूद अस्थिरता पर कटाक्ष किया था. आधुनिक विज्ञान की क्वांटम थ्योरी पदार्थ के इस अस्थिरतावादी गुण पर वैज्ञानिकता की मुहर लगाती है. उसके अनुसार परमाणु की कक्षा में दौड़ रहे इलेक्ट्रान का किसी एक क्षण में उसके सुनिश्चित ठिकाने का पता लगाना असंभव है, केवल उसके संभावित क्षेत्र का आकलन किया जा सकता है. यह संदेह समय के मापन से लेकर उसके अस्तित्व तक बना रहता है.

        प्रश्न उठता है कि जब वर्तमान की सत्ता नहीं है तो भविष्य और भूतकाल की सत्ता कैसे संभव है? उपर्युक्त विश्लेषण से एक सामान्य निष्कर्ष यह निकलता है कि हमारा समयबोध घटनाओं के प्रेक्षण से बनता है. जिन घटनाओं का अनुभव हम स्वयं नहीं कर पाते, उनके लिए दूसरों के अनुभव अथवा बोध का लाभ उठाते हैं. इतिहास जिसे हम विगत का दस्तावेज कहते हैं, वह दूसरों के समयबोध का संकलनमात्र है. पुस्तकें दूसरों के समयबोध से परचाने का बेहतरीन माध्यम हैं. अपने अनुभवअन्वीक्षण की सीमाओं के चलते हम किन्हीं घटनाओं के अंतराल को ही पकड़ पाते हैं. दो घटनाओं के बीच के अंतराल के मापन की प्रत्येक समाज की अपनी प्रविधियां और पैमाने होते हैं. घटनाओं की आवृति तथा उनके क्रम के निर्धारण हेतु अंतराल की परख अनिवार्य होती है. इस अंतराल का अंकन स्मृति एवं संदर्भों द्वारा घटनाओं को उनके सही क्रम में सहेजने के लिए किया जाता है. यह वस्तुतः दो स्वतंत्र घटनाओं के बीच की अवधि है. अपने चारों ओर घट रही दृश्यअदृश्य सहस्रों किस्म की घटनाओं के क्रम को पहचानने एवं उनके आकलन के लिए हम इसे भाषासंकेत भी कह सकते हैं. संक्षेप में दो घटनाओं के बीच का अंतराल ठीक ऐसी ही आभासी रचना है जैसे बाग में खड़े दो वृक्षों के बीच आकाश. जिसका महत्त्व केवल घटनाओं की स्वतंत्र पहचान तक सीमित है.

       अगर समय की सत्ता ही संद्धिग्ध है तो समयबोध क्या है? यह बोध जन्म कैसे लेता है? इसको समझने के लिए आप घटनाओं की शृंखला की कल्पना कीजिए. उनमें कुछ घटनाएं भूतकाल की होंगी, बहुत पीछे गुजर चुकी घटनाएं. कुछ हाल के भूतकाल की होंगी, जो अभीअभी गुजरी हैं. कुछ घटनाएं ऐसी होंगी जो वर्तमान में भी जारी हैं. परंतु उनका एक हिस्सा भूतकाल में प्रवेश कर चुका है. और दूसरा हिस्सा अभी भविष्य का गिरफ्त में है. ये सब घटनाएं हमारे ही अंतरिक्ष में घट रही हैं. उसी अंतरिक्ष में मौजूद हम उनके दृष्टा या भोक्ता हैं. जो घटना सुदूर अतीत में बीत चुकी है, वह हमारे मनस् पर सूचना अथवा स्मृतिप्रभाव के रूप में विद्यमान है. वे हमारे किसी पूर्वज अथवा पूर्वज के पूर्वजों के अनुभव का हिस्सा भी हो सकती है, जो संचरण के किसी मान्य तरीके से हम तक पहुंची हो. हमारा मस्तिष्क किसी भी प्रसंग, घटना, वस्तु या विचार के संपर्क में आने के साथ ही सक्रिय हो उठता है. स्वाभाविक रूप से वह उन्हें दूसरी घटनाओं, प्रसंगों आदि के साथ संयोजित करता है तथा उनके बीच संबंध सेतु बनाने की कोशिश करता है. आवश्यकता पड़ने पर वह उन्हें सुदूर अतीत, कुछ देर पहले अतीत और हाल के अतीत की घटनाओं के क्रम में लौटाता है. उससे हम जान जाते हैं कि कोई घटना किसी अन्य घटना से कितनी आगे अथवा पीछे घटी थी. यह बोध मन में समय नाम के काल्पनिक आकाश का निर्माण करता है, जिसमें विभिन्न घटनाएं विशिष्ट अनुक्रम से बंधी होती है. इस अनुक्रम को हम समयांतराल से बांटते हैं, वह विभिन्न घटनाओं, प्रसंगों के बीच वह रिक्त अंतराल है, जिसे मस्तिष्क उन घटनाओं, प्रसंगों को एक दूसरे से अलग, विशिष्ट और उनका क्रमानुक्रम दर्शाने के लिए बनाता है. भूतकाल के बारे में हम वहीं तक कल्पना कर पाते हैं, जहां तक हमारी स्मृति में घटनाओं का सिलसिला जाता है. दूसरे शब्दों में घटनाओं के अनुक्रम अथवा उनकी ऐतिहासिकता से परे हमारे लिए समय का कोई बोध नहीं होता. उदाहरण के लिए अंतरिक्ष विस्फोट, सृष्टि का विकास, मानव सभ्यता का जन्म आदि हमारे लिए केवल सूचनाओं का संकलन है. चूंकि हमारा मस्तिष्क उन घटनाओं से अब तक की अरबोंखरबों घटनाओं को याद रखने, उनकी विशेषताओं को सहेजने तथा उनके बीच तारतम्यता बनाने में अक्षम है, इसलिए इतनी बहुत लंबी अवधियों को लेकर हमारा समय(अथवा अंतराल)बोध शून्य होता है. इसके बरक्स किसी वस्तु या व्यक्ति का घंटे भर का अंतराल हमें भारी पड़ने लगता है. इसलिए कि प्रतीक्षा के दौरान हमारा मस्तिष्क आसपास के परिवेश एवं घटनाओं के प्रति तुलनात्मक रूप में अधिक सक्रिय होता है. इसलिए उसको लेकर हमारा समयबोध भी सघन होता है. इस तरह जिसको हम अतीत अथवा भूतकाल कहते हैं, वह हमारी स्मृति की व्यापकता और उसकी सीमाओं को दर्शाता है. तदनुसार समय स्वतंत्र सत्ता न होकर केवल हमारी मनोरचना है.

       समयबोध को समझने के लिए एक और उदाहरण देखते हैं. मान लीजिए एक व्यक्ति को नीचे तहखाने में एकसमान परिस्थितियों के बीच रखा गया है. बाहरी संसार से उसका संपर्क कटा हुआ है. कमरे में सदैव एक जैसी तीव्रता का प्रकाश बना रहता है. व्यक्ति की अपनी गतिविधियां भी शून्य हैं. आसपास का परिवेश भी आदर्श की अवस्था तक स्थिर है. इससे उसकी शारीरिक मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर जो नकारात्मक असर पड़ेगा, उसे हम भुलाए देते हैं. लेकिन एक जैसी परिस्थिति में रहने के बावजूद व्यक्ति का समयबोध सुरक्षित रहेगा. भले ही वह दिनरात का अनुमान लगा पाने में अक्षम हो. उस अवस्था में उसका समयबोध उसकी धड़कनों तथा उन शारीरिक क्रियाओं से निर्मित होगा, जिनसे उसका जीवन आबद्ध है. इस बारे में कम से एक बात तो विश्वास के साथ कही जा सकती है कि घटनाएं समय की प्रतीति का माध्यम हैं. उनके बिना समय की अनुभूति असंभव है. वैज्ञानिक समय को मापने के लिए घटनाओं के वेग को आधार बनाते हैं. अब जैसे गति के नियम को देखिए. उसके अनुसार किसी कालखंड विशेष में किसी वस्तु ने जो दूरी तय उसको उसके वेग से भाग कर दिया जाए तो समय आ जाता है. यह तो हुई वेगवान वस्तु के समय के आकलन के बारे में. परंतु यदि कोई वस्तु स्थिर है तो समय का आकलन उसके आसपास घट रही घटनाओं के वेग से निर्धारित होता है.

      हमने देखा कि सटीक वर्तमान एक संद्धिग्ध अवधारणा है, हम केवल भूतकाल में जीते हैं और भूतकाल वह प्रभाव है जिसे मानवस्मृति विभिन्न घटनाओं की प्रवृत्ति, आवृति तथा उनके अन्यान्य लक्षणों के आधार पर उन्हें मस्तिष्क में सहेजकर रखती है, ताकि उसमें दर्ज घटनाओं का क्रम और उनका अंतराल जाना जा सके. बीतने के बाद घटना स्मृति का हिस्सा बन जाती है. मगर जो घटना अभी तक घटी ही नहीं है, जो अभी अवतरित होनी है, यानी भविष्य उसके बारे केवल कल्पना ही की जा सकती है. सृष्टि में घटनाएं सामान्यतः चक्रीय क्रम में घटती हैं. जैसे सूरज का उदयअस्त होना, बीज का वृक्ष बनना और पुनः बीज बन जाना. ग्रहनक्षत्रों की यात्रावलियां. प्रत्येक घटना अपने आप को दोहराती है. पुनरावृत्ति के इस सिद्धांत की सहायता से हम भविष्य की घटनाओं का कल्पना सकते हैं, अनुभव के आधार पर उनके सच होने का दावा भी कर सकते हैं, लेकिन कोई घटना हमेशा पूर्वनिर्धारित क्रम में ही होगी, ऐसा दावा करना किसी भी घटना, किसी भी व्यक्ति के लिए असंभव होगा. किसी घटना के सच होने की संभावना पर्याप्त हो सकती है. इसके बावजूद दावे के साथ यह कोई नहीं कह सकता कि भविष्य की घटना का वही रूप होगा, जैसा वह अब तक देखने में आया है. इस तरह भविष्य केवल हमारी कल्पना की चीज बनकर रह जाता है. हम भविष्य की कल्पना घटनाओं से सिलसिले से बाहर नहीं कर पाते. इसके प्रतिवाद में यह कहा जा सकता है कि सूर्य प्रतिदिन निकलता है, करोड़ों वर्ष से यही होता आ रहा है. इसलिए यह संभावना व्यक्त की जा सकती है कि निकट भविष्य में कुछ बदलने वाला नहीं है. कोई भी यह दावा कर सकता है कि सूरज अगले दिन भी पूर्व दिशा से ही निकलेगा. ठीक है यह दावा कुछ क्षण के लिए स्वीकारा जा सकता है, मगर ऐसा हमेशा, युगयुगांतर तक होता रहेगा, यह कहना मूर्खता ही होगी. किसान धान की लहलहाती हुई फसल को देखकर अनुमान लगाता है कि इतने महीने या दिन के बाद फसल पककर उसके खलिहान में होगी. उसका यह बोध उसके अनुभव के आधार पर बनता है. इसलिए भूतकाल यदि मस्तिष्क का अतीत में स्मृति वितान है तो भविष्य की परिकल्पना मनुष्य की कल्पनावीथि है. जिसके पीछे मनुष्य के अनुभवों का योगदान होता है.

       यदि समय का अस्तित्व ही संद्धिग्ध है तो समयबोध की अनुभूति का कारण? व्यवहार में हम देखते हैं कि रोज सूरज प्रातः एक ही क्रम में उपस्थित होकर दस्तक देता है. फूल एक अवधि के बाद खिल जाते हैं. रात होते ही तारे झिलमिलाने लगते हैं. यानी हम हम पल यह एहसास बना रहता है कि कुछ बीत रहा है. इस अनुभूति से हम कभी मुक्त नहीं हो पाते. यदि यह मान लंे कि कुछ है जो बीत रहा तो वह बीतने वाली चीज यदि समय नहीं तो क्या है? क्या वह महज हमारी मानस रचना है? यह एक जटिल सवाल है? यह प्रश्न तब जन्म लेता है जब हम स्वयं को प्रकृति से अलग मानकर स्वतंत्र प्रेक्षक की भांति उनका अवलोकन करते हैं. घटनाओं की शृंखला हमारी स्मृति पर जो अनुक्रम अंकित करती है, उसको हमारी बुद्धि अपने विवेक से अलगअलग संयोजित रखती है. अरस्तु का मानना था कि मनुष्य अपने परिवेश से निर्मित है. मनुष्य अपने वातावरण से जो सीखता है. जो वह देखताभोगता है वह स्मृति के माध्यम से उसके मस्तिष्क में सुरक्षित हो जाता है. मस्तिष्क इसी अनुभव सामग्री का संश्लेषण विश्लेषण कर मस्तिष्क निर्णय लेता है. कभीकभी कल्पनाएं भी अपना खेल खेलती हैं. तब मनुष्य अपने मस्तिष्क द्वारा घटनाओं की शृंखला अभिकल्पित करता है. घटनाओं का वेग, उनकी तारतम्यता, घटने के सिलसिले का अनुभव करते हुए हम जिस प्रभाव से गुजरते हैं, वह समय कहलाता है, जो पूरी तरह घटनाओं की स्मृति, उनके प्रभाव पर निर्भर करता है. यदि यह स्मृति न हो तो समयबोध बनने का आधार ही न रहे. लंबा जीवन जी चुके व्यक्ति को अपना बचपन कल की बात लगने लगती है, इसलिए कि जीवन के प्रवाह में वह उन अनेक घटनाओं को विस्मृत कर चुका होता है, जो उसके समयबोध का कारण थीं. अंतरिक्ष विस्फोट, पृथ्वी का जन्म, पुरापाषाण काल, प्रस्तर युग हमारे लिए केवल सूचनाएं हैं. इसलिए कि हमारी स्मृति इन घटनाओं के प्रभाव से अछूती है. सुप्तावस्था में हम समयबोध की जन्मदाता घटनाओं से कट जाते हैं. इसलिए शरद ऋतु की सुदीर्घ रात्रियां एक झटके में बीत जाने की अनुभूति देती हैं. लेकिन यदि हम किसी की व्यग्र प्रतीक्षा में तो समय का हर पल हमें छूकर जाता है. पलपल की घटनाओं पर हमारी नजर होती है. तब समय की अनुभूति हमारे लिए लंबी हो जाती है. यदि समय हमारी अनुभूति से बाहर की चीज है, यदि वह निरपेक्ष सत्ता है तो उसकी अनुभूति हमारे परिवेश से एकदम स्वतंत्र होनी चाहिए. घटनाओं को उनके स्वतंत्ररूप में पहचानने का सामथ्र्य पशुओं में भी होता है. परंतु उनकी स्मृति उतनी जोरदार नहीं होती कि वह घटनाओं को उनकी संपूर्ण विविधताओं के साथ अलगअलग, लंबे समय तक सहेजकर रख सके. इसलिए उनका समयबोध उनकी रोजमर्रा की चेतना से अधिक नहीं होता. टोगार्ट के अनुसार समय के स्वतंत्र अस्तित्व के लिए घटनाओं से समय की प्रतीति होने के बजाय समय से घटनाओं की प्रतीति होना आवश्यक है. लेकिन समय से घटनाओं की प्रतीति का कोई प्रमाण हमारे पास नहीं है. यदि हम यह माने कि घटनाएं समय की अनंतता में घटित होती हैं, तो हमें ब्रह्मांड के भीतर एक और ब्रह्मांड की असंभवसी परिकल्पना करनी होगी. समय और ब्रह्मांड दोनों के अस्तित्व को समान महत्त्व दिए जाने से कई बारे हमारे निष्कर्ष गड्डमड्ड हो जाते हैं. उस अवस्था में हमें एक अनंत के बीच दूसरे अनंत की कल्पना करती पड़ती है. लेकिन किस ‘अनंत’ में कौनसा ‘अनंत’ समाया हुआ है, कौन आगे है कौन पीछे, यह निर्णय हम कभी नहीं कर पाते. संक्षेप में समय की परिकल्पना उसकी प्रतीति की मूलाधार घटनाओं की परिकल्पना के बगैर असंभव है. इसलिए स्टीफन हाकिंग जैसे वैज्ञानिक समय का इतिहास लिखते समय दरअसल ब्रह्मांड का इतिहास ही बता रहे होते हैं.

क्रमश…..

© ओमप्रकाश कश्यप

1 टिप्पणी

Filed under समय का दर्शन, समय का दर्शन-काल-सैद्धांतिकी

One response to “समय का दर्शन-दो

  1. पढ़कर आनंद आ गया। समय की तीनों अवस्थाओं (वर्तमान, भूतकाल और भविष्य काल) में आपने जो भेद किया है। तारीफे काबिल है।

    इस चित्र को देखिये। आशा है आपको भी आनंद आएगा। इनमे से केवल एक चित्रण ही सही है और दूसरा चित्रण गलत है। इनमे से समय का एक चित्रण भ्रम पैदा करता है। और दूसरा चित्रण समय की वास्तविकता बतलाता है।

    https://scontent.xx.fbcdn.net/hphotos-xpt1/v/t1.0-9/s720x720/11145171_898357856873241_2462299653669197597_n.jpg?oh=132eaea9a601800b9a6117e1091676a9&oe=55F94711

    इसके अलावा लेख की अंतिम पंक्ति ने लेख की सार्थकता सिद्ध कर दी है। समय को समझने के बाबजूद समय की माया में फसना स्वभाविक है।

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