बचपन बहती गंगा

हर बालक अपने आप में एक्टीविस्ट होता है. पुराने को भंग कर नए की स्थापना को उत्सुक. आप उसे खिलौना दीजिए. कुछ देर खेलेगा, उसके बाहरभीतर झांकनेसमझने की कोशिश करेगा. तोड़ने का मन हुआ तो पल गंवाए बिना वैसा प्रयास भी करेगा. खिलौना महंगा है, पैसा खर्च करके लाया गया हैखूनपसीने की कमाई का है. ऐसा कोई मुहावरा वह नहीं समझता. मातापिता समझते हैं. वे बालक को बरजते हैं. रोकते हैं खिलौना तोड़ने से. बालक अक्सर मान भी जाता है. मान लेता है कि खिलौने के अंतनिर्हित सत्य को जानने के ज्यादा जरूरी है उसके साथ जीना.

जन्म के तुरंत बाद नवशिशु जब स्वयं को विराट प्रकृति के संपर्क में आता है तो अपने परिवेश को जानना चाहता है. शारीरिक रूप से वह भले माता पर निर्भर हो, लेकिन चाहता यही है कि दुनिया को अपनी तरह से जानेसमझे. हर छोटेबड़े कार्य में बड़ों की मदद लेना बालक की नैसर्गिक प्रवृत्ति नहीं. समाज की संरचना उसे विवश करती है. बालक चाहता है कि मातापिता उसकी जिज्ञासापूर्ति में सहायक बनें. अपनी ओर से कुछ थोपें नहीं. लेकिन मातापिता तथा अभिभावकगण जो बालक के आसपास का परिवेश रचते हैं, समाज से अनुकूलित कर चुके लोग होते हैं. उनकी जिज्ञासा की आंच ठंडी पड़ चुकी होती है. अनुभव तपे व्यक्ति के संपर्क में जब प्रखर जिज्ञासायुक्त बालक आता है तो ‘बड़े’ को अपना बड़प्पन खतरे में जान पड़ता है. उस समय जो विवेकवान और ज्ञानार्जन की ललक को बचाए हुए है, जान जाता है कि समाज से अनुकूलन की प्रक्रिया में वह कितना कुछ पीछे छोड़ आया है. इसलिए वह बालक के बहुमुखी विकास के लिए मुक्त परिवेश रचता है. सामान्यजन बालक की बौद्धिक प्रखरता और अतीव जिज्ञासा को समझ नहीं पाते. इसलिए वे बालक पर अपना निर्णय थोपने का प्रयास करते हैं. शारीरिक रूप से बड़ों पर निर्भरता बालक को उनकी बात मानने के लिए विवश करती है. प्रारंभ में उसके मन में विद्रोहभाव पनपता है. लेकिन जब वह देखता है कि उसके मातापिता समेत आसपास के सभी लोग परिस्थितियों के आगे नतमस्तक हैं, तब वह भी समर्पण की मुद्रा में आ जाता है.

कुछ लोग कहेंगे कि समाज में रहना है तो बालक को उसके तौरतरीके भी सिखाने होंगे. इसलिए मातापिता, सगेसंबंधी गलत नहीं करते. वे वही शिक्षा देते हैं जो उसको समाजोपयोगी बनाने में मदद करे. पर क्या वे सचमुच ऐसा कर पाते हैं? क्या वे ऐसी शिक्षा दे पाते हैं जो बालक की रचनात्मकता का सदुपयोग करती हो? जो उसके मस्तिष्क को सीमाबद्ध करने के बजाय मुक्त करे! दिमाग की खिड़कियों को खोलती चली जाए! कल्पना को पंख, सोच को नववितान दे! सवाल यह भी है कि क्या बालक को उसकी स्वतंत्रता के नाम पर मनमानी करने का अधिकार दिया जा सकता है? आखिर मातापिता जिस समाज से अनुकूलन करने की शिक्षा बालक को देते हैं, वह कोई एक दिन या एक व्यक्ति की रचना नहीं. मानवीय सभ्यता, संस्कृति तथा जीवनमूल्य की गरिमा प्राप्त कर चुकी सामाजिक आचारसंहिताएं—मानवीय मेधा एक उसकी जिजीविषा के शताब्दियों लंबे का परिणाम हैं. मनुष्य और पशु में अंतर भी यही है कि मनुष्य अपने ज्ञान को सहेजता हुआ, भावी संततियों को सौंपता चला जाता है. पशु अपने ज्ञान, अनुभवादि को सहेज नहीं पाते, इसलिए शताब्दियों से वे वहीं के वहीं टिके हुए हैं, जबकि मनुष्य ने प्रगति के एक के बाद एक सोपान पार किए हैं. अनुभव संपदा को बचाए रखने के लोभ में प्रत्येक समाज विगत की बांह में बांह डालकर चलता है. भविष्य की ओर एकाएक कुलांच नहीं मारता.

बालक की समझ में यह सत्य देर से आता है. धीरेधीरे वह परिवेश को आत्मसात करने लगता है. अनुकूलन की प्रवृत्ति बढ़ती ही जाती है. लेकिन इस कोशिश में बालक की मौलिकता, उसकी सृजनात्मकता और जिज्ञासावृत्ति निरंतर कमजोर पड़ती जाती हैं. बालक की मौलिकता बनी रहे, वह अपने सृजनसामथ्र्य का अधिकतम लोककल्याण में निवेश करे, लोकहित को पहचाने—इसके लिए उपयुक्त शिक्षा जरूरी है. वह मनुष्य को समाजोपयोगी बनने में मदद करती है. लेकिन हमारे शिक्षातंत्र का ढांचा ऐसा है कि बालक के मौलिक विकास के लिए उसमें बहुत कम ‘स्पेस’ बच पाता है. बालक अपने अनुभव से सीखना, अपने विवेकानुसार उसका संवर्धन करना चाहता है. अरस्तु की माने तो जन्म के समय बालक का मस्तिष्क पूरी तरह खाली होता है. शायद इसलिए उसमें उतावलापन होता है. अनुभवों के जरिये मस्तिष्क को बोध से भर लेने की जल्दी. अनुभव और शिक्षा इसमें मददगार सिद्ध होते हैं. इसलिए अरस्तु का सुझाव था कि बच्चों को अकादमिक और व्यावहारिक शिक्षा साथसाथ दी जानी चाहिए. उसके पूर्ववर्ती विद्वान सुकरात का कहना था कि—

ज्ञान का जन्म अज्ञान की कोख से होता है, सत्य की खोज निरंतर प्रश्नाकुलता द्वारा ही संभव है.’

इसके बावजूद हम हैं कि अपने अनुभव उसपर थोप देना चाहते हैं. ग्यारहवीं शताब्दी में अरबी विद्वान इब्न सीन अरस्तु का पक्ष दोहराते हुए कहा कि जन्म के समय मानवीय बोध खाली स्लेट जैसा होता है. शिक्षा उसको परिष्कृतपरिमार्जित करती है.’ विकासक्रम के बीच मानवीय प्रज्ञा वस्तुगत चेतना से ऊपर उठती हुई सक्रिय चेतना के स्तर को प्राप्त करती है और निरंतर विकासोन्मुखी रहने के बाद ही वह बोध के उच्चतम शिखर को छू पाती है.’ सीन के विचारों को इब्न तुफैल ने अपने दार्शनिक उपन्यास ‘हाये इब्न याक्जां’ में उपयोग किया. तुफैल ने बालक को ऐसे व्यक्ति की संज्ञा दी जिसका मस्तिष्क समाज के ‘लंदफंद’ से पूर्णतः मुक्त है. उपन्यास में दर्शाया गया था कि व्यक्ति केवल अनुभव से सीखता है. इब्न तुफैल के दार्शनिक उपन्यास का लातिनी अनुवाद ‘फिलोसोफस आॅटोडेक्टस’ शीर्षक से किया गया. उस उपन्यास को प्रकाशित किया था एडबर्ड पा॓कोक ने. इस उपन्यास से प्रेरणा लेकर सतरहवीं शताब्दी में जान ला॓क ने मानवीय विवेकीकरण की प्रक्रिया पर लंबा लेख लिखा, जिसमें उसने सिद्ध किया था कि मनुष्य के ज्ञान का मूल उद्गम उसका अनुभव है. इस लेख को भरपूर ख्याति मिली और जान ला॓क का नाम अपने समय के प्रमुख दर्शनशास्त्रियों में लिया जाने लगा. लेकिन ला॓क से लगभग एक शताब्दी पहले ही मस्तिष्क को कोरी स्लेट कहे जाने के विचार की समीक्षा करते हुए शताब्दी के महान चेक शिक्षाशास्त्री जा॓न अमोस काॅमिनियस(1592-1670) ने कहा था—

यह ठीक है कि बच्चे का मस्तिष्क कोरी सलेट होता है, जिसपर हम मनचाही इबारत लिख सकते हैं. लेकिन एक अर्थ में यह उससे भी बढ़कर है. सलेट की सीमा होती है. हम उसपर उसके आकार से अधिक कोई इबारत लिख ही नहीं सकते. जबकि मानवमस्तिष्क अनंत क्षमतावान होता है. उसपर जितना चाहे लिखा जा सकता है, क्योंकि वह निस्सीम है.’

काॅमिनयस का कहना था कि बच्चे स्वभावतः अच्छे होते हैं. इतने कि उन्हें सद्गुणों की खान कहा जा सकता है. तथापि उनके व्यक्तित्व को निखारने के लिए शिक्षा अनिवार्य है. का॓मिनियस ने ये विचार उस समय और समाज में व्यक्त किए थे, जहां एक सर्वमान्य मान्यता थी कि पाप मनुष्य के साथ उसके जन्म से जुड़ा है. पापपंक से उबारने के लिए शिक्षा (धार्मिक) अनिवार्य है. इस मान्यता के चलते तत्कालीन समाज में शिक्षा के नाम पर बलप्रयोग सामान्य बात थी. अपनी पुस्तक ‘डाइडेक्टिा मेग्ना’, जिसका अभिप्राय संपूर्ण शिक्षणकला से है, में का॓मिनियस ने शिक्षापद्धति को लेकर मौलिक विचार प्रस्तुत किए गए थे. उसका कहना था कि न केवल अमीर और ताकतवर वर्ग के बच्चों, बल्कि गांवों, कस्बों, शहरों में रहने वाले अभिजात और सामान्य, गरीब और अमीर, झोपड़ियों और अट्टालिकाओं के सभी लड़केलड़कियों को शिक्षा के लिए अनिवार्यतः स्कूल जाना चाहिए. ये विचार तत्कालीन यूरोपीय समाज में क्रांतिकारी थे. काॅमिनियस की पुस्तक वर्षों तक कई यूरोपीय भाषाओं में बेस्टसेलर बनी रही.

बीसवीं शताब्दी में बालकों के मन को समझा मारिया मानटेसरी ने. पेशे से डा॓क्टर मारिया को जिम्मेदारी सौंपी गई, मानसिक रूप से कमजोर बच्चों की देखभाल की. वह बच्चों के कुदरती हुनर को निखारकर उनकी प्रतिभा को तराशने में विश्वास रखती थी. वह अक्सर कहती—‘शिक्षा वह नहीं जो अध्यापकगण देते हैं; या जो तय पाठ्यक्रम द्वारा उपलब्ध कराई जाती है. शिक्षा तो व्यक्तिमात्र द्वारा किया जाने वाला नैसर्गिक उपक्रम है, जो कक्षा में पढ़ानेभर से पूरा नहीं हो जाता, बल्कि जीवनभर चलता रहता है. शिक्षाचक्र को पूरा करने के लिए परिवेश के संपूर्ण साक्षात्कार अनिवार्य है.’ मारिया का मानना था कि शिक्षण के पुनीत कर्तव्य को समर्पित शिक्षक को अपने विद्यार्थी की वैसे मदद करनी चाहिए, जैसे नौकर अपने स्वामी की करता है. लोग मारिया के प्रयोगों का मखौल उड़ाते. आरोप लगाते कि अर्धविक्षिप्त और मानसिक विकलांगता के शिकार बच्चों की शिक्षा पर वह अपना श्रम और सरकार का धन वृथा लुटा रही है. आलोचनाओं से निस्पृह, धुन की पक्की मारिया अपने प्रयासों में जुटी रही. उसको पहली सफलता उस समय मिली जब मानसिक रूप से विकलांग उसके कई विद्यार्थियों ने राज्य स्तरीय परीक्षा न केवल पास की, बल्कि औसत विद्यार्थियों से अधिक नंबर लाकर उस समय के शिक्षाविज्ञानियों को चकित कर दिया था. कुछ वर्ष पहले आई आमिर खान की चर्चित फिल्म ‘तारे जमीन पर’ के दर्शील सफारी का चरित्र का कांसेप्ट मारिया के छात्रों से लिया गया है.

मारिया ने जो काम इटली में किया भारत में उसको अंजाम देने वाले थे, गिजुभाई. उनके प्रशंसक उन्हें ‘मूंछों वाली मां’ कहते थे. गिजु भाई बापू के भक्त ठहरे. उनके साथ दक्षिण अफ्रीका में वकालत करते. उन्हीं की प्रेरणा से रचनात्मक कार्यों से नेह लगा. बापू भारत लौटने लगे तो जमीजमाई वकालत छोड़ गिजु भाई ने भी स्वदेश की राह ली. भारत आकर बापू तो राजनीति में लग गए. उनका काम बड़ा था. पर गिजुभाई क्या करें? उन्होंने बापू से बात की. बापू ने गिजु भाई को बच्चों को शिक्षित बनाने का काम दिया. एक न एक दिन अंग्रेजों को यह देश छोड़कर जाना ही होगा. उस समय राष्ट्र निर्माण की जरूरत होगी. नई पीढ़ी को नए सोच और चुनौतियों से निपटने योग्य बनाना है. बापू का निर्देश पाकर गिजु भाई अपने काम में जुट गए. बच्चों को पढ़ाना साधारणजन की निगाह में भले मामूली काम हो. लेकिन नई सृष्टि के जरूरी है नई दृष्टि की. सोच रचनात्मक सोच हो तो मामूली चीजों को भी विशिष्ट बनाया जा सकता है. फिर गांधी का कोई शिष्य अरचनात्मक हो ही नही सकता था. गिजुभाई भी परंपरा से होते आए को दोहराते तो भला कौन उनको याद रखता!

बापू की सलाह पर गिजु भाई ने टूटेफूटे सरकारी स्कूल को अपनी प्रयोगशाला बनाया. वे गाकर, नाचकर, झूमझूम कर, किस्साकहानी सुनाकर बच्चों को शिक्षा देने लगे. परिणाम उम्मीद से सवाया निकला. पहले बच्चे स्कूल के नाम से कन्नी काटते, सीखने से भागते थे. अब भागभागकर विद्यालय आने लगे. गिजु भाई ने अपने गीतों और किस्सोंकहानियों के माध्यम से बच्चों को एक साल में उतना सिखा दिया, जितना दूसरे अध्यापक पांचसात वर्षों भी नहीं सिखा पाते थे. उन दिनों मारिया मांटेसरी की यूरोप में धूम मची थी. गिजु भाई ने भारत का पहला बाल मन्दिर मांटेसरी पद्धति से दक्षिणामूर्ति भावनगर में खोला. कामयाबी मिलने लगी. गिजु भाई की उपलब्धियों से आह्लादित बापू ने एक बार कहा था—‘गिजु भाई का बच्चों के लिए काम मेरे काम से भी बड़ा है.’

गिजु भाई कहानियों को बालशिक्षण का महत्त्वपूर्ण औजार मानते थे. कहानी सुनाना आसान काम नहीं. यह भी एक कला है. आनंद बांटते हुए आनंदमग्न होने और आनंद लूटने की कला. गिजुभाई कहते थे कि कहानियों को असरदार बनाना उन्हें सुनाने वाले पर निर्भर करता है….कहानी को—‘आप रसीले ढंग से कहिए. कहानी सुनाने के लहजे से कहिए. कहानी भी ऐसी चुनें, जो बच्चे की उम्र से मेल खाती हो. कहानियां आप बच्चों को रटाना नहीं. बल्कि, पहले आप खुद अनुभव करें कि ये कहानियां जादू की छड़ीसी हैं….यदि आपको बच्चों के साथ प्यार का रिश्ता जोड़ना है तो उसकी नींव कहानी से डालें. यदि आपको बच्चों का प्यार पाना है तो कहानी भी एक जरिया है. लेकिन पंडित बनकर भी कहानी नहीं सुनाना. कील की तरह बोध ठोकने की कोशिश कभी न करना. कभी थोपना भी नहीं. यह तो बहती गंगा है. इसमें पहले आप डुबकी लगाएं, फिर बच्चों को भी नहलाएं.’

ज्ञान की मौलिकता को बचाने की. उसको संवर्धितसंरक्षित करने की कोशिश समयसमय पर अनेक विद्वानों ने की है. इसके बावजूद बच्चे पर अपना बोध थोपने की, उसके साथ मनमानी करने की कोशिश होती रही है. समाज में व्याप्त बौद्धिक जड़ता, हताशा, नाउम्मीदी और विवेकहीनता का एक कारण यह भी है कि हम नएपन से घबराते हैं. उसको मुश्किल मानकर लीक पर घिसटते जाते हैं. और बालक जो नए सपने, नई ऊर्जा, नया जोश और नए संकल्प लेकर इस दुनिया में आता है उसको भी उसी लीक पर ला पटकने की कोशिशों में लगे रहते हैं. जन्म के साथ ही स्थितियों से समझौते की, चुनौतियों से पलायन की आदत उसमें डाल देते हैं. हम स्वयं को आसानी से नहीं बदल सकते. बदलना चाहें तो एकाएक वह संभव भी नहीं है. लेकिन यदि हम समाज को बदलना चाहते हैं, यदि हम अपनी आंखों में कुछ बेहतरीन ख्बाव सजाना चाहते हैं तो हमें केवल इतना करना होगा कि बच्चों के बोध को मुक्त कर दें. उन्हें उनके सोच का विस्तृत वितान दें. इस समाज को बदलते तब देर नहीं लगेगी. समय हमारी मुट्ठी में भले न हो, लेकिन बालक समय को अपनी मुट्ठी में लेकर आता है. यह हम ही जो समय पर उसकी पकड़ को ढीला करने का अवरत प्रयास करते रहते हैं. इस बात से अनजान की हमारी यह आदत आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान की नई रोशनी से वंचित कर देती है.

ओमप्रकाश कश्यप

2 टिप्पणियाँ

Filed under इकीसवीं सदी के पहले दशक में हिंदी बालसाहित्य की स्थिति और चुनौतियां, बचपन बहती गंगा

2 responses to “बचपन बहती गंगा

  1. Divik Ramesh

    बहुत ही बेहतरीन, उपयोगी ऒर विचारोत्तेजक लेख हॆ । बच्चॊं के मनोविज्ञान ऒर बच्चे पर केन्द्रित ऎसे लेख आज के रचनाकारों के लिए भी प्रासंगिक हॆं ।बच्चे के हित में तो हॆं ही बधाई ।

  2. DR.CHANDRAKUMAR JAIN

    इस प्रस्तुति के लिए

    आपको साधुवाद,

    सिर्फ लेख नहीं, एक महत्वपूर्ण

    सामाजिक अवबोध का दस्तावेज़ जैसा कुछ है यह …

    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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