समिष्टवाद : सर्वकल्याण को समर्पित समाजवादी दर्शन

समष्टिवाद यानी ‘कलेक्टविज्म(Collectivism)का इतिहास पुराना है. लगभग सभ्यता के आरंभ जितना ही. उन दिनों मनुष्य कबीलों में रहता था, शिकार करके अपना पेट भरता था. आवश्यकताएं सीमित थीं. तब वह स्वयं को समूह की एक इकाई मानता और सबके कल्याण के लिए साथसाथ जीवनसंघर्ष में हिस्सा लेता था. जब भी अतिरिक्त मात्रा में भोजन जमा होता तो वह पूरे समूह की थाती माना जाता. समूह का मुखिया इस बात का ध्यान रखता कि भोजन सामग्री के वितरण में किंचित अन्याय न हो. प्रत्येक को उसकी आवश्यकतानुसार भोजन मिले. उसके वितरण में किसी प्रकार का पक्षपात न हो. कालांतर में मनुष्य कृषिकर्म में पारंगत हुआ तो उसके पास अतिरिक्त भोजन जमा होने लगा. एक जगह टिके रहने से जीवन में कतिपय स्थायित्व आया. किंतु सहअस्तित्व और सामूहिक कल्याण का बोध कमोवेश वैसा ही बना रहा. समूह अतिरिक्त रूप से अर्जित अनाज को अपने वरिष्ठ सदस्य के पास जमा रखता था. आवश्यकता पड़ने पर उससे जरूरतमंद परिवारों की मदद की जाती. जैसेजैसे संसाधन बढ़े, व्यक्ति की आय के स्रोत भी विस्तार लेते गए. इसी के साथ समाज पर व्यक्तिवाद हावी होने लगा. सर्वकल्याण का स्थान आत्मकल्याण लेने लगा. समष्टिवाद व्यक्तिवाद में समाता चला गया. आरंभ में अनाज के संचयन, वितरण का कार्य पूर्णतः सामूहिक कर्तव्यबोध के साथ किया जाता था. इस कार्य के लिए प्रायः वयोवृद्ध व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता था, जो अपने वार्धक्य के कारण किसी और कार्य में अपनी सक्रिय हिस्सेदारी निभा पाने में असमर्थ होते हों तथा जिनकी समूह में पर्याप्त लोकप्रियता भी हो. सामंतवादी युग में इस भावना को ठेस पहुंची. उस समय तक समाज के समस्त संसाधनों पर राजा के अधिकार को मान्यता मिल चुकी थी. अब यह राजा कि पर निर्भर था कि वह किसी व्यक्ति को कितना दे. बदले में कितना उससे काम ले. राजा प्रसन्न हो तो संपत्ति लुटा देता. वह नाराज हो तो उसके कोप के आगे जान के लाले पड़ जाते. इसने चापलूसी को बढ़ावा दिया, जिससे एक परजीवी जमात समाज में पैदा हुई. ब्राह्मणोंपुरोहितों की उस जमात ने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए समाज को जाति और धर्म के नाम पर बांटना आरंभ कर दिया. उस समय भी सत्ता से दूर एक वर्ग ऐसा था, जिसे राजा और उसके दरबारियों के छलछदम् से कोई कुछ लेनादेना न था. उसके मनस् में सामूहिक कल्याण की पुरातन स्मृतियां शेष थीं. ग्रामदेहात में रहने वाला यह वर्ग सर्वकल्याण और सामूहिकताबोध के साथ मिलकर काम करता था. इस वर्ग को सामंतवर्ग से लगातर उत्पीड़न तथा अन्य चुनौतियां मिलती रहती थीं. ऐसे में सहअस्तित्व की भावना ही थी, जो लोगों को एक साथ रहते हुए परिस्थितियों से संघर्ष की प्रेरणा देती थी. इसी वर्ग की सहगामी चेतना का सुफल था जिससे समाज के ऐक्यभाव को मशीनीकरण से पहले कोई बड़ी चुनौती नहीं मिली. सामूहिकताबोध और सर्वकल्याण की कामना ऋग्वेद की एक ऋचाओं में भी है. एक ऋचा में उद्गाता ऋषि प्रार्थना करता है कि

हम साथसाथ रहें, समवेत संभाषण करें, हम सबके मनस् एकसम, निकष् एक सम हों. सभी पितर, देवगण पधारें और अपना यथोचित हिस्सा ग्रहण कर लें.’

उपर्युक्त ऋचा में व्यक्तियों के साथसाथ देवताओं से भी सामूहिकता के अनुशासन में बंधने की कामना की गई है. यह सामूहिकताबोध, समष्टिकामना, मिलबांटकर खाने तथा साथसाथ रहने की भावना विश्व की प्रत्येक संस्कृति तथा सभ्यता में किसी न किसी रूप में उपस्थित रही है. हालांकि समयसमय पर मानवीय लालच तथा स्वार्थभावना ने इसमें विचलन भी पैदा किए हैं. स्वार्थप्रेरित कुछ व्यक्ति वृहद जनसमुदाय के कल्याण की उपेक्षा कर केवल अपने हितसाधन को ही पुरुषार्थ मानते रहे हैं, परंतु ऐसे अनैतिक विचार को समाज में की मुख्यधारा का सम्मान कभी प्राप्त नहीं हो सका. सामूहिकता का वह संकल्प, सर्वकल्याण की मानवतावादी कामना समाज की आचारसंहिता की उपज था, जो प्रकृति के मुक्त सान्न्ध्यि में साथसाथ रहते, संघर्ष करते हुए विकसित हुई थी. लेकिन राजनीति दर्शन के रूप में जिस समष्टिवाद पर यहां विचार किया जाना है, वह उनीसवीं शताब्दी की संकल्पना है. रूसो के लेखन में भी उसके बीजतत्व यत्रतत्र उपलब्ध हैं. अठारवीं शताब्दी के महान चिंतक रूसो ने अपनी प्रमुख कृति ‘सोशल कांट्रेक्ट’(1762) में शासक और शासित के बीच समन्वयात्मकता की आवश्यकता पर जोर दिया था. व्यक्तिस्वातंत्र्य के मुखर समर्थक रूसो का कहना था कि मनुष्य स्वतंत्र जन्मा है, लेकिन वह हर जगह बेड़ियों में है. ये बेड़ियां कहीं राज्य की ओर से पड़ती हैं, तो कभी धर्म अथवा समाज की ओर से. पुस्तक में उसने शासक और शासित दोनों के कर्तव्यों का विश्लेषण किया था. उससे अगली शताब्दी में जन्मे जर्मनी के महान दार्शनिक जार्ज विल्हेम फ्रैड्रिक हीगेल का मानना था कि राज्य किसी भी व्यक्ति से बढ़कर है. हीगेल की यह स्थापना अपने पूर्ववर्ती महान यूनानी दार्शनिकों सुकरात और प्लेटो की विचारधारा से प्रेरित थी. राज्य एवं व्यक्ति के कर्तव्यों की व्याख्या करते हुए हीगेल ने लिखा था—

राज्य को व्यक्ति की अपेक्षा उच्चतर अधिकार प्राप्त होते हैं. अतः व्यक्ति का सर्वप्रथम कर्तव्य है—स्वयं को राज्य का श्रेष्ठतर नागरिक सिद्ध करना.’

हीगेल व्यक्ति की राज्य के प्रति निष्ठा को सबसे बड़ी सामाजिक नैतिकता मानता था. उसकी द्वंद्ववादी विचारधारा से प्रभावित तथा उसका अपने राजनीतिक दर्शन में भौतिकवादी ढंग से उपयोग करने वाला कार्ल माक्र्स समाज के पुनर्गठन में सामूहिक प्रयासों का समर्थक था. बहरहाल जिस समष्ठिवाद का राजनीतिक दर्शन के रूप में विचार किया जाना है, वह समूह को व्यक्ति के बरक्स वरीयता देता है तथा व्यक्ति के हितों के सामान्यीकरण पर जोर देते हुए ऐसी विकास नीति बनाने का पक्ष लेता है, जिससे समाज के बहुसंख्यक वर्ग का कल्याण संभव हो. यह व्यक्तिवाद की निंदा करता है. मोयरा ग्रांट ने समष्ठिवाद को ऐसे राजनीतिक दर्शन अथवा के रूप में परिभाषित किया है जो किसी भी प्रकार के वर्ग यथा जाति, राष्ट्र, समाज, राज्य आदि, को व्यक्ति की अपेक्षा वरीयता देता है. यह ऐसा विचार अथवा व्यवहार है जिसमें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक मुद्दों पर विचार अथवा कार्रवाही करते हुए समाज के हितों को व्यक्ति के हितों से बढ़कर माना जाता है. समष्ठिवाद की एक सारगर्भित परिभाषा हमें बीसवीं शताब्दी की प्रसिद्ध उपन्यासकार अयन रेंड की ओर से प्राप्त होती है, हालांकि इस विचारधारा के प्रति अयन रेंड का नजरिया आलोचनात्मक रहा है—

समष्ठिवाद का अर्थ है—सामूहिक हितों के समक्ष व्यक्तिहितों का बलिदान, वह जाति, रंग, वर्ण, वर्ग अथवा राज्य चाहे जिस रूप में हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. समष्ठिवाद मानकर चलता है कि मनुष्य को सामूहिक गतिविधियों तथा विचारों के साथ ‘सामान्य शुभत्व’ की कामना के साथ सदैव आबद्ध रहना चाहिए.’

चूंकि समष्ठिवाद में सारी शक्तियां एवं अधिकार बहुसंख्यक के कल्याण को समर्पित सत्ता के अधीन रहते हैं, इसलिए वहां व्यक्तिमात्र से अपेक्षा की जाती है कि वह समूह के कल्याण के लिए निजी हितों का बलिदान करने को तत्पर रहे. यह व्यवस्था त्याग एवं समर्पण की कामना करती है. हीगेल तथा माक्र्स दोनों ही ने समष्ठिवाद को भौतिक, राजनीतिक अंतक्रियाओं तथा ऐतिहासिक परिवर्तनों की अनिवार्य परिणति स्वीकार किया था. समष्ठिवादियों की सैद्धांतिकी इस नैतिक विश्वास पर टिकी है कि मनुष्य अपना लक्ष्य स्वयं को नहीं बना सकता. उसका अपना लक्ष्य, व्यक्तिगत उपलब्धियां समाज से परे निरर्थक हैं. बल्कि वह दूसरों की सेवा करने का एक माध्यम मात्र है. मनुष्य की शारीरिक आवश्यकताएं मात्र भोजन एवं वस्त्र हैं. उनके लिए भी उसे समाज के अन्य व्यक्तियों, समूहों पर निर्भर होना पड़ता है. भोजन एवं वस्त्र के अलावा मनुष्य का सारा मानसिक कार्यकलाप समाज से उदभूत तथा उसी पर केंद्रित होता है. इसलिए नितांत व्यक्तिनिष्ठ और स्वार्थकेंद्रित हो जाना मनुष्य के स्वाभाविक चरित्र के विपरीत है. दूसरे शब्दों में समाज में रहने के लिए सहयोग का आदानप्रदान आवश्यक है. अतएव व्यक्ति को वही कार्य करना चाहिए जिसमें बहुसंख्यक का हित सन्निहित हो. व्यक्तिमात्र की नैतिकता को परखने का मापदंड भी यही है कि उसने दूसरों के कल्याण के लिए अपने हितों का कितना बलिदान दिया है! समष्ठिवादी समाज में उत्पादन, विपणन, अंतरण आदि व्यक्तिगत लाभ के लिए न होकर, संपूर्ण समाज के कल्याण की भावना के साथ किया जाता है. वहां व्यापार नहीं, नैतिकता सर्वोपरि होती है. समष्ठिवादी उत्पादन की आचार संहिता कहती है—

‘सर्वजन के लिए उत्पादन, न कि वर्गविशेष के लार्भाजन हेतु उत्पादन.’

समष्ठिवाद लोकतंत्र की आदर्शसंहिता भी यही है. बर्क रेंड ने इसी से मिलीजुली बात कही है. उसके अनुसार लोकतंत्र की आदर्श सहिंता ही समष्ठिवाद है, जो बहुसंख्यक के कल्याण के निमित्त अल्पसंख्यक के हितों का बलिदान का समर्थन करती है. समाज असल में नियमों की एक गतिशील व्यवस्था है, जिसको मानव समुदाय शांतिपूर्वक साथसाथ रहने की भावना के साथ गठित करता है. अतः समाज की आचारसंहिता का होना भी आवश्यक है. अयन रेंड एक प्रश्न उठाती हैं—‘समाज की शक्ति सीमित है अथवा असीमित?’ इसका वह व्यक्तिवादी और समष्ठिवादी नजरिये से उत्तर भी देती हैं. उपर्युक्त प्रश्न के सापेक्ष व्यक्तिवादी का उत्तर देगा—

‘‘समाज की शक्तियां सीमित हैं. इसलिए कि व्यक्ति के अपने भी कुछ अधिकार होते हैं, जिन्हें उससे अलग नहीं किया जा सकता. समाज को ऐसे नियम बनाने चाहिए जिनसे व्यक्ति के मूलभूत अधिकार बाधित न हों.’ इस उत्तर पर समष्ठिवादी की क्या प्रतिक्रिया होगी? रेंड इसका उल्लेख भी करती है—‘समाज की शक्तियां असीमित हैं. समाज को अधिकार है कि वृहद हितों के अनुसार नियम बनाए तथा किसी भी व्यक्ति को उनके अनुपालन के लिए बाध्य करे, जिस प्रकार वह कर सकता है.’’

अपनी तर्क के अनुरूप रेंड उदाहरण भी देती है, जिसमें वह समष्ठिवाद के दुर्बल पक्ष की ओर संकेत करती है, लेकिन समष्ठिवादियों के अनुसार वही उसकी विशेषता है. रेंड के अनुसार व्यक्तिवादी समाज में लाखों लोग भी मिलकर भी, अपने लाभ के लिए किसी एक व्यक्ति को मृत्युदंड की सजा नहीं दे सकते. यदि वे ऐसा करते हैं तो कानून की नजर में अपराधी माने जाएंगे तथा दंड के पात्र भी. जबकि समष्ठिवाद अथवा सामूहिकतावाद में इतने सारे लोग अथवा कोई एक भी, उन सबका प्रतिनिधि होने का दावा करते हुए, किसी एक व्यक्ति को आसानी से मृत्युदंड जैसी सजा दे सकता है. वहां किसी एक व्यक्ति के जीवन की कोई कीमत नहीं होती. यह तर्क निश्चय ही समष्ठिवाद के कमजोर पक्ष की ओर इशारा करता है. लेकिन यह बहुसंख्यक वर्ग के कल्याण को समर्पित किसी भी कल्याणकारी विचारधारा अथवा राजनीतिक दर्शन की विवशता भी हो सकती है, जिसके आधार पर वह व्यक्ति के आगे समूह को वरीयता देती है. लेकिन हमें मानना पड़ेगा कि सभ्यता के आरंभ से आज तक कोई भी राजनीतिक दर्शन सर्वथा दोषमुक्त नहीं रहा है. व्यक्तिहित और समाजहित में तालमेल बैठाए रखने की समस्या प्रत्येक दर्शन के समक्ष रही है. ऐसे में मनुष्य खराब तथा बहुत खराब व्यवस्थाओं के बीच से अपेक्षाकृत कम खराब व्यवस्था का चयन करता आया है. समष्ठिवाद की आलोचना के पीछे रेंड के कथन में सचाई हो सकती है, लेकिन मुटठीभर व्यक्तियों के स्वार्थ के लिए समाज के पूरे वर्ग का शोषण भी सभ्य समाज का प्रतीक नहीं हो सकता. यही कारण है कि अयन रंेड की आलोचना के बावजूद दुनिया में समष्ठिवाद के प्रशंसकों की भारी संख्या है. उसका स्वतंत्र राजनीतिक दर्शन है. उसके समर्थकों के अनुसार समष्ठिवाद साम्यवाद, समाजवाद आदि की तरह ही एक स्वतंत्र दर्शन है, जो समाज को पूंजीवाद के अभिशाप से मुक्त करने की वांछा रखता है. उन असमानताओं का समाधान करता है, जो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में स्पर्धा के कारण जन्म लेती हैं. कार्ल माक्र्स ने समष्ठिवाद का समर्थन किया था. माक्र्सवादी सिद्धांतकारों के अनुसार सामूहिक कल्याण को समर्पित यह विचारधारा नियोजित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देते हुए, निजी अधिकारिता पर अंकुश लगाकर अपने सुदूर लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत होती है. सबसे बड़ी बात यह है कि अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समष्ठिवाद सरकार अथवा तज्जनित संस्थाओं का सहारा नहीं लेता, बल्कि उनके समानांतर स्वयं को ऐसे स्वतंत्र, सशक्त विकल्प के रूप में स्थापित करने के लिए प्रयासरत रहता है कि राज्य और राज्याश्रित संस्थाओं की भूमिका गौण होकर रह जाए. इस प्रकार यह स्वयं को अराजकतावाद का समानधर्मा दर्शन सिद्ध करता है. वह साम्यवाद से इस मामले में एकमत है कि उत्पादकता के साधनों को निजी अधिकारिता के चंगुल से बाहर लाकर उन्हें ‘सामूहिक संपत्ति’ घोषित किया जाए. वह मानता है कि संपत्ति पर व्यक्ति के बजाय व्यक्तिसमूहों का अधिकार हो. जबकि साम्यवाद राज्य की अधिसत्ता का समर्थन करते हुए संसाधनों को उसकी अधिकारिता में रखना चाहता है. इस आधार पर समष्ठिवाद उससे भिन्न तथा अधिक जनोन्मुखी दर्शन है.

समष्ठिवाद का अर्थदर्शन

समष्ठिवाद की प्रमुख मान्यता यह है कि इसमें सदस्यगण सामूहिक कल्याण की भावना से स्वेच्छापूर्वक जुड़ते हैं. वे यह मान लेते हैं कि समूह के हित में ही उनका अपना हित शामिल है. इसलिए व्यक्तिवाद की प्रतीक सभी वस्तुएं, संसाधन, भूसंपदा आदि सामूहिक अधिकारक्षेत्र में चले आते हैं. समूह उनका उपयोग सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु, सर्वकल्याण की भावना के साथ करता है. एस. एच. स्क्वार्ज(1868—1936) के अनुसार सामूहिकतावादी समितियां व्यक्ति हित एवं निजी लालसाओं पर आधारित मांगों को न्यूनतम कर देती हैं. अतएव वे दूसरी समितियों की अपेक्षा अधिक सामंजस्यपूर्ण एवं स्थायी होती हैं. पूरे समूह का सामान्य वर्तमान और भविष्य होता है. समष्ठिवाद का मानना है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. समाज से परे उसका अस्तित्व संभव नहीं. जबकि समाज व्यक्ति विशेष के बिना भी बना रहता है. अतः वृहद सामाजिक हितों के समक्ष व्यक्तिहित को तिलांजलि दी जा सकती है. लेकिन समूह से जुड़ने तथा समष्ठिवादी बनने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य में पर्याप्त सामूहिकताबोध हो. साथ ही उसमें संसाधनों के साझा उपयोग का धैर्य और त्याग की भावना हो. पूंजीवादी उत्पादन लाभकेंद्रित होता है, इसलिए वह एकाधिकारवादी आचरण करता है. उसमें उत्पादक समकक्ष उत्पादों को बाजार से खदेड़ देना चाहता है. जबकि जमींदार की कोशिश होती है कि वह संपूर्ण कृषिभूमि पर अधिकार जमा ले. राज्य पेटेंट, का॓पीराइट, व्यापारिक गोपनीयता, बौद्धिक संपदा की सैद्धांतिकी के माध्यम से पूंजीवादी व्यवस्था को प्रश्रय देता है. इसके लिए वह पूंजीपति से अधिक कर वसूलता है. हालांकि कराधान की व्यवस्था का प्रथम उद्देश्य व्यापक जनकल्याण तथा लोगों को अनिवार्य सुखसुविधाएं प्रदान करना बताया जाता है. पर असल में उसका लक्ष्य केवल और केवल शिखरस्थ शासकों तथा नौकरशाही के लिए विलासिता के साधन जुटाना होता है, जो कालांतर में आर्थिक विषमता को आगे बढ़ाता है. इससे समाज के विपन्न और शक्तिहीन वर्ग के शोषण, उत्पीड़न में और भी वृद्धि होती जाती है.

समष्ठिवाद की आर्थिकी को लेकर दो भिन्न विचारधाराएं सामने आती हैं. पहली विचारधारा पूरे समाज को एक इकाई मानते हुए समस्त संसाधनों पर लोगों के सम्मिलित अधिकार को मान्यता देती है. तदनुसार कुल उत्पादक संपत्ति पर पूरे समाज के सभी सदस्यों का संयुक्ताधिकार होता है. दूसरी विचारधारा संसाधनों के कार्यक्षम उपयोग के लिए उन्हें सक्रिय, चेतनशील, सुसंगठित तथा स्वतंत्र समूहों के अधिकार में रखने का समर्थन करती है. उसमें कुल संपत्ति पर स्वतंत्र, स्वैच्छिक समूहों का अधिकार होता है. इनमें प्रथम की विशेषताएं समाजवाद और साम्यवाद से मेल खाती हैं, जबकि दूसरी व्यवस्था समष्ठिवाद को सहकार एवं ‘श्रमिकसंघवाद’ के निकट ले आती है, जिसका उल्लेख पीछे किया गया है. यूं तो पूंजीवाद में भी उद्योग स्वामियों की संख्या एकाधिक हो सकती है. पूंजीवादी उद्यम दो प्रकार के हो सकते हैं. पहले वे जो सार्वजनिक अधिकारिता में हों तथा जिनमें राष्ट्र की पूंजी लगी हो; और जो सरकार अथवा उसके द्वारा गठित किसी कानून अथवा संस्थान के अंतर्गत कार्यरत हों. दूसरा वर्ग निजी संस्थानों का हो सकता है, जिनमें पूंजीपतियों द्वारा जनता से पूंजी आमंत्रित की गई हो. दोनों ही प्रकार के संस्थानों में स्वामियों की संख्या एकाधिक संभव है. इसके बावजूद उन्हें समष्ठिवादी नहीं कहा जा सकता, इसलिए कि ऐसे संस्थानों में उत्पादन का ध्येय विशुद्ध लाभार्जन होता है. खुद को बाजार में टिकाए रखने के लिए वे पूंजीवाद के प्रिय विचार ‘स्पर्धा’ का सहारा लेते हैं तथा प्रकारांतर में मनुष्य के साथ निर्जीव उपभोक्ता वस्तु की भांति आचरण करने लगते हैं.

समष्ठिवाद की आर्थिकी के अनुसार लोकोपयोगी वस्तुओं पर एकमात्र लोक का अधिकार होना चाहिए. उनका उपयोग भी जनकल्याण की पवित्र भावना के साथ किया जाना चाहिए. उत्पादन जब मुनाफे के बजाय लोगों की आवश्यकता के अनुसार किया जाएगा तथा प्रत्येक को लगेगा कि उत्पादन उसके अपने हित के लिए तो उससे निरर्थक मारामारी पर अंकुश लगेगा. स्पर्धा की समाप्ति होगी. चूंकि उत्पादन के पीछे लोकहित की भावना होगी, इसलिए कोई भी उत्पादक बाजार पर छाने का प्रयास नहीं करेगा. इससे एकाधिकार पर अंकुश लगेगा. यह असंभव भी नहीं है. अतीत में इस प्रकार का उत्पादन संभव होता आया है. यदि हम प्राचीन अर्थव्यवस्थाओं पर विचार करें तो दुनिया के अनेक देशों में छोटे उद्यमियों और व्यापारियों के अपने संगठन होते थे, जो सामूहिक कल्याण की भावना के साथ काम करते थे. उन्हें हम समष्ठिवाद का प्रारंभिक संस्करण मान सकते हैं. इसलिए कि समूह के बाहर के लोगों के साथ वे मंजे हुए व्यापारियों की भांति पेश आते थे. उनकी एक कमजोरी यह भी थी कि वे तत्कालीन एकाधिकारवादी राज्यप्रणालियों यथा राजशाही, कुलीनतंत्र और सामंतशाही का न केवल समर्थन करते थे, बल्कि राज्याश्रय पाने के लिए आकुल भी रहते थे. इस प्रकार वे राज्य और उसके एकाधिकार के समर्थक थे. प्राचीन राजशाही में सभी निधियां राजा की मानी जाती थीं. जनता के बीच उनका वितरण राजा की मर्जी के अनुसार किया जाता था. जबकि अराजकतावाद और श्रमिकसंघवाद की भांति समष्ठिवाद भी राज्य की उपस्थिति को समाज के व्यापक हितों के विरुद्ध मानता है. वह समस्त लोकोपयोगी निधियों को समाज के सामान्य अधिकार के दायरे में लाना चाहता है, ताकि सभी संसाधनों का लाभ सभी को प्राप्त हो सके. बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में यूरोप के देशों में जनसाधारण को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए श्रम संगठनों तथा पेशेवरों ने मिलकर ‘सामूहिक उपचार निधि’ की स्थापना की थी. इसके बाद उन्होंने डाॅक्टरों तथा अस्पतालों से संपर्क कर, श्रमिकों को स्वास्थ्य सेवा तथा चिकित्सा भत्ता देने का प्रावधान किया था. योजना के संचालन हेतु धनराशि श्रमिकों तथा अन्य पेशेवरों से चंदे के रूप में जमा की जाती थी. इस योजना को आरंभिक सफलता प्राप्त हुई थी. समष्ठिवाद में संपत्ति के प्रबंधन को लेकर भी भिन्न प्रकार के विचार मिलते हैं. कुछ लोग इसके लिए राज्य को संपत्ति के प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंप सकते हैं. हालांकि इसका दूसरा रूप भी संभव है. जैसे निगमों की संपत्ति का प्रबंधन, बजाय उसके हिस्सेदारों के, प्रशिक्षित प्रबंधकों को सौंपा जा सकता है. यह अराजकतावाद और साम्यवाद की मूल स्थापनाओं के विपरीत है, जो राज्य का तत्काल विखंडन चाहते हैं. उनके अनुसार श्रम का सटीक मूल्यांकन असंभव है. इसलिए आवश्यक है कि श्रम का मूल्यांकन वस्तुनिष्ठ आधार पर न करके संवेदना के धरातल पर किया जाए, और श्रमिकों के श्रम के बीच अधिक अंतर न रखा जाए. इस विचारधारा के अनुसार व्यक्तिमात्र को अपनी आवश्यकता के अनुसार उपभोग की स्वतंत्रता होनी चाहिए.

विद्वानों ने समष्ठिवाद को दो वर्गों में बांटा है:

1. क्षैतिज समष्ठिवाद

2. उर्ध्व समष्ठिवाद

आगे हम इनपर विस्तार सहित चर्चा करेंगे—

1. क्षैतिज समष्ठिवाद

इसमें सदस्यों की आर्थिकसामाजिक समानता तथा संसाधनों के समन्वित उपयोग पर जोर दिया जाता है. क्षैतिज समष्ठिवाद उन स्थानों पर खूब फलताफूलता है जहां लोग परस्पर मिलजुलकर सहयोगात्मक तरीके से रहते हों. उनकी सामाजिक हैसियत में बहुत अधिक अंतर न हो. अक्सर गांवों, छोटे कस्बों में क्षैतिज समष्ठिवाद आसानी से पनप सकता है, इसलिए कि वहां आर्थिक विषमता अपेक्षाकृत कम होती है. लोगों की आर्थिक हैसियत में बहुत अधिक अंतर नहीं होता. इसको सामूहिक साझेदारी भी कहा जाता है. छोटे गांवों, कबीलाई अथवा विशिष्ट पहचान से जुड़े समाजों में क्षैतिज समष्ठिवाद के अनेकानेक उदाहरण आरंभ से ही मिलते रहे हैं. यह आपसी विश्वास तथा सहयोग पर जोर देता है. चूंकि लोग आपस में जुड़े होते हैं, इसलिए इससे चोरी और अन्य नुकसान की संभावना बहुत घट जाती है. समूह भावना से जुड़े लोगों के बीच बराबरी एवं समानता का वातावरण बना रहता है. समूह के बाहर के लोगों के साथ बाहरी नागरिक जैसा ही व्यवहार किया जाता है. इससे समष्ठिवादी आंदोलन के विभिन्न उपकेंद्रों में बंट जाने का खतरा होता है. व्यक्ति के बजाय व्यक्ति समूह अहमियत पाने लगते हैं. इसलिए क्षैतिज समष्ठिवाद को क्षेत्रीय समष्ठिवाद भी कहा जा सकता है.

2. उर्ध्व समष्ठिवाद

उर्ध्व समष्ठिवाद में लोग अपने कर्तव्य एवं दायित्व के आधार पर अलगअलग समूह में बंटे होते हैं. आधिकारिक स्तरीकरण की भावना उन्हें छोटे तथा बड़े में बांटती है. दूसरे शब्दों में असमानताओं को नैसर्गिक लक्षण मानते हुए उर्ध्व समष्ठिवाद उन्हें बनाए रखने के प्रति सहमत होता है. क्षैतिज समष्ठिवाद आंशिकरूप से मनुष्य के स्वार्थभाव को वाजिब ठहराता है. तथा समाज में स्तरीकरण को मान्यता प्रदान करता है. क्षैतिज समष्ठिवाद सामान्यतः यह मान लेता है कि सभी व्यक्ति कमोबेश बराबर हैं. जबकि उर्ध्व समष्ठिवाद मानता है कि मनुष्य प्रकृतिक रूप से एकदूसरे से भिन्न होते हैं, इसलिए वह एक वर्ग पर दूसरे वर्ग के अनुशासन को मान्यता प्रदान करता है. क्षैतिज समष्ठिवाद की मान्यता होती है कि सभी व्यक्ति सामान्यरूप से एकसमान होते हैं. जबकि उर्ध्व समष्ठिवाद के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की स्वभावगत भिन्नताएं होती हैं. सामान्यबोध के कारण क्षैतिज समष्ठिवाद में व्यक्ति दूसरों के साथ बराबरी का व्यवहार करना चाहता है, और वह वांछा रखता है कि बाकी लोग भी उसे उसी दृष्टि से देखें, यथा एक व्यक्ति—एक वोट. वह दूसरों के आगे समर्पण को आसानी से तैयार नहीं होता. जबकि उर्ध्व समष्ठिवाद में व्यक्ति अपने सामान्य हितों के लिए समूह से आबद्ध होता है, और वह उनके लिए समर्पण हेतु भी तत्पर होता है. यदि उसको लगे कि समूह द्वारा उठाया गया कोई कदम उसके व्यक्तिगत हितों के सर्वथा विपरीत है तो वह उसका विरोध भी करता है. मनोवैज्ञानिक ए. पी. फिस्के ने क्षैतिज समष्ठिवाद को ‘सामूहिक साझेदारी’ तथा उर्ध्व समष्ठिवाद को ‘आधिकारिक पदानुक्रम’ के रूप में वर्गीकृत किया है. एम. रोकीश ने राजनीतिक प्रणालियों के अध्ययन के लिए भी इसी मान्यता का समर्थन किया है—

वह राजनीतिक प्रणाली, जो व्यक्तिगत स्वाधीनता के बजाय समानता को महत्त्व देती है, क्षैतिज समष्ठिवाद के निकट है—यथा इजरायली किबुत्ज. दूसरी ओर ऐसी प्रणालियां जो समानता के बजाय स्वाधीनता पर जोर देती हैं, वे उर्ध्व व्यक्तिवाद की समानधर्मा हैं—जैसे स्पर्धात्मक पूंजीवाद, अमेरिका की बाजार आधारित अर्थव्यवस्था. उर्ध्व समष्ठिवादी समाजों की तुलना में जो समाज न तो समानता को महत्त्व देते हैं, न ही स्वतंत्रता को, उनमें फासीवादी तथा वे पारंपरिक समाज आते हैं जो अपने प्रभावशाली नेताओं के संरक्षण में सांप्रदायिकता को प्रश्रय देते हैं.’

क्षैतिज समष्ठिवाद के समर्थक अराजकतावादी समाजविज्ञानी अलेक्जेंडर बर्कमेन का मानना था कि समानता के लिए भी समूह के बीच सामान्य व्यक्तिबोध होना अनिवार्य है. समानता, बिना आत्मबोध के संभव ही नहीं है. अपने आप को समझकर ही व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों को भलीभांति समझ सकता है. इसलिए समूह की संपूर्ण एकता के लिए व्यक्तिबोध की उपस्थिति अपरिहार्य है. सभी नागरिकों को समान सुविधाएं तथा आगे बढ़ने के एक जैसे अवसर नागरिकों को अपनी कार्यक्षमता में बढ़ोत्तरी करने के अवसर भी दे सकते हैं. उसका मानना था कि समानता केवल आर्थिक समानता तक सीमित नहीं है. यह एक व्यापक पद है, जिसका आशय सामाजिक विषमता एवं उत्पीड़न की समस्त संभावनाओं को मेट देने से है. इसलिए व्यक्ति को स्वाधीन समाज में समानता और किसी कारागार में आरोपित समानता के बीच स्पष्ट अंतर करके देखना चाहिए. समानता का अभिप्राय यह हरगिज नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति एक जैसा भोजन करे, एक ही काम करे, एक जैसे वस्त्र धारण करे अथवा एक ही ढर्रे का जीवन जिए. सच्ची अराजकतावादी समानता स्वाधीनता में प्रश्रय लेती है. मनुष्य की स्वभावगत भिन्नताओं को एकसूत्र में पिरोकर समाज और व्यक्ति दोनों के हितों में समन्वयात्मकता एवं स्वाधीनता ही मानव समाज का अभीष्ठ हैं. विशिष्ट बनने, दूसरों से अधिक सुखसुविधाएं बटोरने की ललक प्रथम द्रष्टया असमानता की प्रतीक हैं, किंतु इनकी अंतिम परिणति एक वर्ग के अधीन दूसरे वर्ग की गुलामी से होती है.

क्षैतिज समष्ठिवादी तर्क देता है कि सामूहिक कल्याण अथवा ‘शुभत्व’ की खातिर व्यक्तिहितों के बलिदान की अवधारणा ही कठोरता की प्रतीक है. उसके अनुसार समूह कोई निर्जीव वस्तुओं का ढेर नहीं है. बल्कि उसके पीछे एकाधिक व्यक्ति होते हैं. इसलिए ‘व्यक्ति’ की उपेक्षा समूह के लक्ष्य को वायवी बना सकती है. समूह का कोई भी सदस्य स्वयं को उपेक्षित न समझे, इसके लिए क्षैतिज समष्ठिवादी निर्णय प्रक्रिया को अधिकतम लोकतांत्रिक बनाने पर जोर देता है. जबकि उर्ध्व समष्ठिवादी समूह की घनिष्ठता और एकता के प्रति आग्रहशील होता है. उसके अनुसार अधिक लोगों के कल्याण के लिए व्यक्ति विशेष के हितों की बलि दी जा सकती है. विकास की निरंतरता को बनाए रखने के लिए उर्ध्व समष्ठिवादी विभिन्न समूहों के बीच स्पर्धा को महत्त्व देता है. वहां व्यक्ति विशेष की अपेक्षा समूह अधिक महत्त्वपूर्ण होता है. समष्ठिवादी एक सीमा तक अराजकतावादियों से प्रभावित थे. पू्रधों तथा उसके अनुयायियों की भांति समिष्ठवादियों को भी लगता था कि पूंजीवाद का मुकाबला श्रम सहकारिताओं तथा सामूहिक बचत योजनाओं द्वारा किया जा सकता है. किंतु व्यवहार में बहुत जल्दी यह सिद्ध हो गया था कि सहकारी आंदोलन और कुछ नहीं, बल्कि बुर्जुआ वर्ग के नए संगठन खड़े करना है. यह भी देखा गया कि छोटी पूंजी तथा साधारण तकनीक से संपन्न सहकारिताएं, बड़ी पूंजीप्रधान और दक्ष प्रबंधन युक्त कंपनियों के समक्ष टिके रह पाना असंभव होगा. समष्ठिवाद के सुझाव सहकारिता के विकल्प के तौर पर उभरा था. यह माना गया था आर्थिक असमानता और पूंजीवादी शोषण से उबरने के लिए श्रमिक संगठनों के हाथों में उद्योगों की कमान सौंप दी जाए और श्रमिकसंघ उनका संचालन सार्वजनिक कल्याण को ध्यान में रखते हुए करें. यह एक प्रकार से उद्योग सहकारिताओं को सुदृढ़ करने का जैसा ही काम था. लेकिन उनसे श्रमाधिकारों के प्रति अपने संघर्ष को दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ाने की मांग की गई थी. 22 जून से 12 जुलाई, 1921 के बीच चलने वाली तीसरे इंटरनेशनल की बैठक में एक प्रस्ताव को स्वीकृति दी गई थी जिनमें श्रमसहकारिताओं से अपेक्षा की गई थी कि वे संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए—

उत्पादन के सभी साधनों को पूंजीपतियों के हाथ से झटकते हुए उन्हें श्रमिकों के अपने हाथों में सौंप दें, जो उनके वास्तविक स्वामी हैं.’

इंटरनेशनल की बैठक के तुरंत बाद प्रूधों तथा उसके सहयोगियों ने आर्थिक संघों की रूपरेखा बनानी आरंभ कर दी थी. यह मानते हुए कि प्रत्येक व्यक्ति समाज पर निर्भर और एक तरह से उसका उत्पाद है, इसलिए उत्पादनकर्म किसी भी अन्य श्रम से महत्त्वपूर्ण है. इसलिए बजाय इसके कि राज्य अथवा बाजार उत्पादन की दिशा और उनके वितरण की शर्तों को तय करे, श्रमिकसंघों को आपसी तालमेल के द्वारा यह निर्णय स्वयं अपने हाथ में ले लेना चाहिए. इस समझौते पर सामूहिक बस्तियों द्वारा नजर रखी जानी चाहिए. उद्योग संघ इस बात का ध्यान रखें की श्रमिकों का शोषण न हो. बकुनाइन को डर था कि वस्तुओं का मूल्यरहित आदानप्रदान भी समाज में एकाधिकारवाद को बढ़ावा देगा. उसको डर था कि किसान और शिल्पकार जो अपने विशिष्ट श्रम से जीविका चलाते हैं, वे अवसर मिलते ही मनमानी करने लगेंगे. इसलिए उसने उत्तराधिकार कानून को भी समाप्त कर देने की मांग की थी. इसके बावजूद उसने उत्पादन संघों को पर्याप्त अधिकार देने की व्यवस्था की है. समष्ठिवादी विचारकों के अनुसार श्रमिक संघों का आंतरिक संचालन, काम की शर्तें, कार्यघंटे, दायित्वों का विभाजन, आयवितरण जैसे कार्य उनके सदस्यों को सौंप देने चाहिए. ये संगठन अपने कार्य के मामले में पूरी तरह स्वायत्त होगे. साम डोल्गा॓फ लिखते हैं—

प्रत्येक कार्यशाला, हर एक फैक्ट्री, अपने श्रमिकों के संघ के अधीन होगी, जो अपने कार्यनियोजन तथा कारखाने के उत्पादन की दिशा निर्धारित करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र होंगे और वे अपने कर्तव्य का इस प्रकार निर्वहन करेंगे, जो उन्हें सर्वश्रेष्ठ लगे. लेकिन यह सर्वथा आवश्यक है कि प्रत्येक श्रमिक के अधिकारों की रक्षा हो तथा समानता और न्याय के सिद्धांतों का परिपालन.’

समष्ठिवाद का अर्थदर्शन व्यवस्थित नहीं है. वह श्रमिकों की स्वायत्तता पर जोर देता है. इसकी विशेषता है कि यह उत्पाद के मूल्यनिर्धारण का काम बाजार अथवा उपभोक्ता पर छोड़ देने के बजाय उसमें लगे श्रमघंटों के आधार पर तय करने का सुझाव देता है. इसके लिए वह ‘बैंक आ॓फ एक्सचेंज’ की स्थापना करने पर जोर देता है. ‘बैंक आ॓फ एक्सचेंज’ विनिमय के वे ठिकाने हैं जो किसी वस्तु विशेष में लगे श्रम के आधार वस्तुओं का श्रममूल्य निर्धारित करते हैं. इस कार्य के लिए श्रम सहकारिताओं से सहयोग की अपेक्षा की जाती है, जो वस्तु का श्रममूल्य तय करने के लिए वास्तविक आंकड़े उपलब्ध कराती हैं. ‘बैंक आ॓फ एक्सचेंज’ उत्पाद के निर्माण में लगे कार्यघंटों के आधार पर उसके श्रममूल्य का आकलन कर उत्पादक को एक बाउचर प्रदान करता है. बाउचर में उत्पाद में लगे श्रममूल्य का उल्लेख होता है. उत्पादक उन श्रमबाउचर के आधार पर दूसरी वस्तुओं का आदानप्रदान कर सकता है. ‘एक श्रमिक का जैसा काम, वैसा उसको दीजे दाम.’ इस सूत्रवाक्य द्वारा समष्ठिवाद की सैद्धांतिकी को समझा सकता है. उत्पाद के मूल्य निर्धारण से लेकर विपणन तक श्रम संगठनों की मदद ली जाती है. इसके लिए सरकार की उपस्थिति को अनपेक्षित माना जाता है. इस आधार पर समष्ठिवाद अराजकतावाद के करीब है. अराजकतावादी अर्थदर्शन को समष्ठिवाद का योगदान यह है उन समस्याओं के उन्मूलन के लिए प्रयत्नरत रहता है जो किसी अराजक समाज के राज्यविहीन माहौल में, खासकर उन दिनों जब कोई परंपरागत समाज एकाधिकारवादी समाजों में बदलता रहता है, जन्म लेती हैं. यही कारण है कि स्पेन की क्रांति के दौरान समष्ठिवाद खूब फलाफूला. आज भी कई ऐसे समाज हैं, जिन्हें समष्ठिवाद से प्रेरित माना जा सकता है. हालांकि यह एक विषय माना जाए कि समष्ठिवाद के दायरे में किसे माना जाए और किसे नहीं. समाजवाद की भांति समष्ठिवाद की परिभाषा का दायरा बहुत बड़ा है. उसके एक ओर साम्यवाद के आधार पर गठित राज्य हैं, जहां पर पर सामूहिक कल्याण की सैद्धांतिकी के आधार पर उत्पादन गतिविधियां नियंत्रित की जाती हैं. इजरायल के किबुत्ज, डेनमार्क की ‘फ्रीटाउन क्रिश्चनिया’ जैसी सामूहिक बस्तियां समष्ठिवादी परिकल्पना के काफी निकट हैं. इजरायल के किबुत्ज उर्ध्व समष्ठिवाद का उदाहरण हैं. जबकि क्षैतिज समष्ठिवाद का प्रतीक ‘फ्रीटाउन क्रिश्चनिया’, 85 एकड़ में बसी 850 नागरिकों की सामूहिक बस्ती है, जहां निजी संपत्ति के विरोध में कानूनी प्रावधान बनाए गए हैं. ऊपर जिन समष्ठिवादी बस्तियों का उल्लेख किया गया है, वे सभी समाजवादी अवधारणा के निकट हैं. इनसे अलग फासिस्ट, स्टालिनवादी, नाजी भी स्वयं को सर्वकल्याणवादी घोषित करते रहे हैं. चूंकि इन व्यवस्थाओं में व्यक्ति की इच्छा का कोई महत्त्व नहीं होता, बल्कि उनकी नींव ही मानवाधिकारों के दमन पर रखी जाती है, इसलिए फासिस्टवादी, नाजी विचारधारा के आधार पर गठित समूहों, राज्यों को समष्ठिवादी नहीं माना जा सकता. समष्ठिवाद सर्वकल्याण का दर्शन है, जो समाज की सुखसमृद्धि तथा मानवीय चेतना के संरक्षणपोषण के बाद ही संभव है.

© ओमप्रकाश कश्यप

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