टीम अन्ना के नाम खुली चिट्ठी

प्रिय अन्ना जी,

आपसे मैंने चौबीस वसंत कम देखे हैं. फिर भी यदि मैंने आपको प्रिय संबोधन किया है, तो इसलिए कि आप मेरे उन अति प्रिय नायकों में से हैं, जिन्होंने इस छलप्रपंच से भरी दुनिया में भी इंसानियत और नैतिकता को बचाए रखा है. आपके द्वारा रालेगणसिद्धि में किए गए कार्यों की भनक मेरे कानों तक डेढ़ दशक पहले ही पहुंच चुकी थी. उन दिनों मैं सहकारिता की वैचारिकी को समझने के प्रयत्न में था. सरकार मीडिया और पूंजीपतियों के साथ मिलकर नवउदारवाद के गीत गा रही थी. पूंजीवाद का सांड भारत की धरती पर छोटेछोटे उद्यमियों, व्यापारियों, शिल्पकर्मियों को कुचलता हुआ आगे बढ़ रहा था. छोटेछोटे धंधे तबाह हो रहे थे. मेहनतमशक्कत द्वारा रोजीरोटी कमाने वाले कामगारों का बुरा हाल था. टेलीविजन और समाचारपत्रों पर नवउदारवाद का रंग चढ़ा हुआ था. दोनों एक स्वर में स्पर्धा का गुणगान कर रहे थे. सहस्राब्दियों से सहयोग, सहअस्तित्व और सद्भाव में जीते आए भारतीयों को समझाया जा रहा था कि स्पर्धा से चीजें सस्ती होंगी, तरक्की के नए रास्ते खुलेंगे और जानलेवा महंगाई से मुक्ति मिलेगी. सोवियत संघ के पतन के पीछे वहां के नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षाएं, अदूरदर्शिता, लालच और अन्यान्य कमजोरियां थीं. लेकिन उसके पतन से लोगों ने समाजवाद को समयबाह्यः विचारधारा मान लिया. अमेरिका को विकल्पहीन मान भारत जैसे देश उसकी आरती उतारने लगे थे. बिका हुआ मीडिया स्पर्धा के गुणगान में जुटा था. महानगरों की चमकदमक से परे जो चंद अच्छे सहयोगाधारित प्रयास किए जा रहे थे, उन्हें जाननेसमझने के लिए उसके पास न तो समय था न समझ. उस दौर में पांडुरंग आठवले, राजस्थान की ‘कुल्हड़ी’ संस्था की कर्मठ और दूरद्रष्टा महिलाओं तथा रालेगण सिद्धि में आपके सहयोगाधारित प्रयोगों के प्रति श्रद्धा मन में जगी, जो वर्षों तक बनी रही. इसलिए जब जनलोकपाल आंदोलन की हवा चली तो अंधेरे में लौ की किरण की तरह मैंने उस आंदोलन का मन ही मन स्वागत किया था. जब आपने ‘जनता सर्वोपरि’ कहा तो दिनकर की आपातकाल के दौरान लिखी वे पंक्तियां सहसा याद आने लगीं, जिनमें उन्होंने कहा था‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है.’ लेकिन बहुत जल्दी लगने लगा कि जिन लोगों के कंधों का सहारा लेकर आप उम्र के आठवें दशक में आंदोलन को बढ़ाना चाहते हैं, वे प्रदर्शन प्रिय, नामलिप्सा के मारे हुए लोग हैं. कैमरे और माइक की भूख उनमें आपसे कहीं अधिक है. ऐसे लोग तमाशा तो खड़ा कर सकते हैं, एक परिवर्तनकामी आंदोलन में रचनात्मक सहभागिता उनसे संभव नहीं है.

गांधी जी के बारे में आप मुझसे कहीं अधिक जानते हैं. उनका काम पहले दिखता था. वही जनता को अपनी ओर खींचता था. लेकिन आपकी टीम के सदस्य सबकुछ पलटने पर उतारू हैं. वे माइक पर अपना चेहरा दिखाने के लिए मचलते रहते हैं. भारतीय जनता इतनी समझदार तो है कि वह समझ ले कि माइक और कैमरों की ओर ललचाई दृष्टि से देखने वाले चेहरों में राजनीति की कितनी भूख है. राजनीतिक क्षेत्रों में पैठ बनाने का आपके सहयोगियों का उतावलनापन हरियाणा के चुनावों में कांग्रेस विरोध के माध्यम से नंगे सच की तरह सामने आया था. आप अच्छी तरह जानते हैं कि जनलोकपाल के समर्थन में घरों से निकले लोगों के मन में भ्रष्टाचार को लेकर आक्रोश था, जिससे कोई भी राजनीतिक दल बचा नहीं है. नेताओं के लिए राजनीति एक व्यापार है. सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के बीच वंशवाद को मौन सहमति मिल चुकी है. ऐसे में कोई नहीं कह सकता था कि केवल कांग्रेसी भ्रष्ट हैं और भाजपा, प्रकारांतर में आप जिसका समर्थन कर रहे थे, वह दूध के धुले नेताओं की पार्टी है. यह बात तो आपकी टीम के सदस्य भी नहीं मानते थे. इसलिए वे ‘किंतुपरंतु’ का सहारा लेते हैं. ‘देश में कांग्रेस पार्टी की सरकार है, इसलिए कांग्रेस को हराना है’—अरविंद केजरीवाल का यह तर्क बेतुका और तथ्यों से परे था. क्या वे नहीं जानते कि देश में कांग्रेस की न होकर ‘संयुक्त जनतांत्रिक मोर्चा’ की सरकार है. कांग्रेस के बहुमत के बावजूद यह संभव नहीं कि जब तक संजमो के बाकी दल न चाहें, अकेली सोनिया या कांग्रेस कोई बिल पास करा ही नहीं सकती. दूसरे लोकसभा में बिल पास होने से ही वह कानून नहीं बन जाएगा. इसके लिए उसको राज्यसभा से भी पास कराना जरूरी है. जहां कांग्रेस पार्टी अल्पमत में है. आपके चुनावी तीर का सामना कांग्रेस और संजमो के सहयोगी दलों ने चुनावी रणनीति से ही किया. उन्होंने लोकसभा में बिल पास करवा दिया. लेकिन राज्यसभा में, जहां भाजपा और उसके सहयोगी दलों का बहुमत है, उसके बड़े नेता मौन साधे रहे. वहां जिस तरह बहस चली, जनता समझ गई कि राजनीतिक दलों में से कोई भी लोकपाल अथवा जनलोकपाल जैसा बिल पास कराना नहीं चाहता. परिस्थितियों में आमूल परिवर्तन की जरूरत है, यह आप और आपके सहयोगी भी मानते हैं. इसके बावजूद उनके भाषण तथा रामलीला मैदान में किरन बेदी की नौटंकी से संदेश गया कि आप केवल कांग्रेस को हराने की राजनीति कर रहे हैं. यह भी कारगर होता यदि विपक्ष की जनता के बीच कुछ साख होती. संसद में विपक्ष की मान्यता प्राप्त भाजपा जनता के बीच पहले ही साख गंवा चुकी है, ऐसे में लोग आपके समर्थन में बारबार घर से क्यों निकलते? खासकर उस मुंबई में जहां शिवसेना का प्रभाव हो और उसके नेता बाल ठाकरे खुलकर आपका विरोध करते आ रहे हों.

अन्ना जी, एक गांव का सुधार करने और देश को सुधारने में बड़ा अंतर होता है. भारत के गांवों का चेहरामोहरा आज भी सामंतवादी है. धर्म से साथ स्वार्थपूर्ण गठजोड़ कर वह समाज के बड़े वर्ग को सत्ता और संसाधनों से बेदखल कर देता है. शिखर पर गिनेचुने लोग बचे रह जाते हैं. जिन्हें उनके आपसी हित एकदूसरे से जोड़े रखते हैं. वस्तुस्थिति से अनजान लोग इसी को विकास मान लेते हैं. देश में न केवल बहुरंगी सांस्कृतिक छटा है, बल्कि विभिन्न राजनीतिक दांवपेच, मान्यताएं और अनेक धार्मिक प्रपंच हैं. उनसे एक झटके में पार पाना संभव नहीं है. विशेषकर उस आंदोलन के जरिये जिसका स्वरूप ही प्रतिक्रियात्मक हो. जो दावा अराजनैतिक होने का करता हो, लेकिन आंदोलन का स्वरूप, भाषणबाजी, जनता को चेहरा दिखाने की ललक, आरोपप्रत्यारोप ठीक वैसे ही हों, जैसे दूसरी राजनीतिक पार्टियों के हैं. जिसका कोई रचनात्मक कार्यक्रम न हो. ऐसी उखाड़पछाड़ से कुछ दिनों के लिए गहमागहमी का माहौल जरूर बनाया जा सकता है, वास्तविक परिवर्तन जिसके लिए लंबे संघर्ष की आवश्यकता पड़ती है, इसके द्वारा सर्वथा असंभव है.

आमूल परिवर्तन के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता अनिवार्य है. साथ ही जरूरी है नेता और जनता के बीच प्रामाणिक संवादसेतु. निरंतर जनसंवाद द्वारा ही समर्पित और सत्यनिष्ठ कार्यकर्ताओं का समूह बनाया जा सकता है. यदि विचारधारा ठोस, आचरण निष्प्रह और नेतृत्व ईमानदार हो तो आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए अधिक व्यक्तियों की आवश्यकता नहीं पड़ती. कस्तूरी गंध की भांति उसका संदेश दूर तक जाता है और लोग उससे स्वतः जुड़ने लगते हैं. भीड़ को बहलाफुसलाकर चुनावों में ठप्पा तो लगवाया जा सकता है. मतदाता के पास बेहतर विकल्प न होने से यह काम आसान भी है. वास्तविक परिवर्तन के लिए लंबे समय और संयम की दरकार होती है. वहां केवल शिखर नेतृत्व के आचरण की पवित्रता, नैतिकता और दूरंदेशी ही लोगों को बांधे रख सकती है. नमक सत्याग्रह के लिए गांधीजी ने केवल 78 कार्यकर्ताओं को चुना था. यह उनका नैतिक आभामंडल था जो बिना किसी फेसबुकिया अभियान के डांडी यात्रा को देशभर में व्यापक जनसमर्थन मिला था. 24 दिनों की 390 किलोमीटर की यात्रा पूरी करने के बाद वह यात्रा जब डांडी पर पहुंची तो वहां एक लाख से अधिक लोग जमा थे. साबरमती तट के अलावा भी देश में जगहजगह नमक बनाया जा रहा था. लाखों सत्याग्रही आंदोलन के घरों से निकले हुए थे. औपनिवेशिक सरकार के दमन का विरोध करते हुए 80,000 से अधिक सत्याग्रही जेल जा चुके थे. वह आंदोलन नैतिकता के कंधों पर सवार होकर परवान चढ़ा था. कोई प्रतिक्रियात्मक सोच उसके पीछे नहीं था. देश को नमक सत्याग्रह के तुरंत बाद आजादी नहीं मिली थी. पूरे 17 वर्ष लगे थे. लेकिन उस आंदोलन ने इस देश के आम आदमी के भीतर राजनीति का एक जज्बा पैदा किया था. यह विश्वास उसके दिल में पैदा किया था कि लोग निडर हों तो दुनिया की बड़ी से बड़ी हुकूमत उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती. यह अवसर आपको भी मिला था, लेकिन आपके सहयोगियों की निजी महत्त्वाकांक्षा और उनपर लग रहे एक के बाद एक आरोपों से जनता का विश्वास इस आंदोलन से डिगा है. लोगों को यह आंदोलन एकसूत्री और सियासी चाल लगने लगा है. आप कह सकते हैं सरकार टीम अन्ना को बदनाम कर रही है. संभव है यह सच हो. लेकिन सत्ता चाहे देशी हो या विदेशी, उसका चरित्र अमूमन एक जैसा होता है. केवल चैतन्य जनसमाज द्वारा उसे नियंत्रित किया जा सकता है. जनता को जगाने, उसका विश्वास जीतने के लिए नेता को पहले उसके करीब आना पड़ता है. इसीलिए दूरदृष्टा गांधी सार्वजनिक जीवन में आने से पहले एक लंगोटी, घड़ी, लाठी और टोपी जैसे कुछ साधारण वस्तुओं को छोड़कर बाकी सब से नाता तोड़ चुके थे.

आप कहेंगे कि बारबार गांधी को याद करना जरूरी क्यों? वह इसलिए कि आप अपने आंदोलन में गांधीजी के ‘औजार’ सत्याग्रह का इस्तेमाल कर रहे हैं. आप यह भी भलीभांति जानते हैं कि गांधी के रास्ते पर चलना साध्य और साधन की समानता के बगैर संभव ही नहीं हैं. वे जब तक दक्षिण अफ्रीका में रहे, तभी तक बेरिस्टर रहे. भारत आने के साथ ही उनका कायाकल्प हो चुका था. बेरिस्टर गांधी लंगोटीछाप बन चुका था. उन्हें मालूम था कि लोगों का विश्वास जीतने के लिए पारदर्शिता आवश्यक है. ईमानदार होना नहीं, दिखना भी चाहिए. न केवल नेता को, बल्कि उसके आसपास जुटे कार्यकर्ताओं को भी. उनके नैतिक आभामंडल ने विनोबा जैसे अनुयायी पैदा किए थे, जिनमें गांधीवाद गांधीजी के अपने आचारव्यवहार से भी ज्यादा दमदार था. गांधीजी का आंदोलन ऐसे ही समर्पित कार्यकर्ताओं के कंधों पर टिका था. गांधीजी स्वयं खास अवसर पर ही नेतृत्व की जिम्मेदारी ओटते थे. आपकी टीम में कोई ऐसा नहीं है, जिसके कंधों पर किसी आंदोलन की जिम्मेदारी डाली जा सके. न किसी में इतना आत्मविश्वास है कि आपके प्रतिनिधि के रूप में स्वतंत्र आंदोलन की बागडोर संभाल सके. इसलिए वे हर जगह, हर बार आपको अनशन और आंदोलन के बहाने आगे ले आते हैं. एक मुखैटे की भांति वे आपका इस्तेमाल कर रहे हैं. आप सत्तर पार कर चुके हैं. शतायु हों यह कामना भी है. लेकिन आमूल बदलाव के लिए लंबे आंदोलन की दरकार होती है. आपकी उम्र और सेहत को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि आप लंबे समय तक किसी रचनात्मक आंदोलन में सक्रिय भागीदारी कर सकते हैं. कहीं ऐसा न हो आपके बाद टीम अन्ना की हालत भी बिना सोनिया की कांग्रेस या बिना अटलविहारी वाजपेयी के भाजपा जैसी बनकर रह जाए.

आप जो आंदोलन लेकर चले हैं उसकी सफलता के लिए ठोस वैकल्पिक विचारधारा का होना जरूरी है. यह काम गांधी के रास्ते चलकर भी हो सकता है. बशर्ते उसमें ‘टीम अन्ना’ के सभी सदस्यों की संपूर्ण आस्था हो. साथ में अपने बूते आंदोलन को आगे बढ़ाने का जज्बा. यदि अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, किरन बेदी में ‘गांधीवाद’ के प्रति सच्ची आस्था का अभाव है? यदि उनमें अपेक्षित आत्मविश्वास गायब है? यदि वे मंच पर अपरिग्रही और निष्प्रह दिखना चाहें और पीछे अपनेअपने संगठन के जरिये करोड़ों का अनुदान पचाएं, तो वे आपके सच्चे साथी हो ही नहीं सकते. जनता नारों की हकीकत को जानती है. वह समझती है कि ‘अन्ना’ के नाम का जयकारा लगाने वालों के दिल में नाम और नामे दोनों की भूख है. इसलिए वे बारीबारी से माइक झटककर मंच पर आते हैं. हर कोई हाथ लहरालहराकर जनता को अपना चेहरा दिखाना चाहता है. फिर बिना किसी ठोस रणनीति, वैकल्पिक राजनीतिक दर्शन या वर्तमान संसदीय लोकतंत्र में सुधार हेतु ठोस सुझावों के, सिर्फ एक जिद के लिए साल में तीनतीन अनशन! हमारे घरों में औरतें साल में साठसत्तर व्रत रख लेती हैं. वे अच्छा करती हैं या बुरा, उसपर विचार करना इस लेख का विषय नहीं है. लेकिन रोजरोज उपवास करने पर वे घर के सदस्यों तक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित नहीं करा पातीं.

आप गांधीजी के अनुयायी हैं. आपको उनके बारे में बताने की जरूरत नहीं. गांधीजी कभी इकहरे आंदोलन पर विश्वास नहीं करते थे. उनकी अहिंसक लड़ाई एक से अधिक मोर्चों पर लगातार जारी रहती थी. उनके पास समर्पित कार्यकर्ताओं और नेताओं की पूरी टीम थी. प्रत्येक आंदोलन उनके द्वारा नामित सत्याग्रही हिस्सा लेते थे. विनोबा भावे, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल, आचार्य कृपलानी, कस्तूरबा गांधी, सरोजिनी नायडू, अबुल कलाम आजाद, हरिलाल गांधी जैसे अनेक नेता गांधीजी के साथ थे. सभी का स्वतंत्र व्यक्तित्व और नैतिक आभामंडल था. दुर्भाग्य की बात है कि आपकी टीम में जितने भी सदस्य हैं, एक आपको छोड़कर किसी की जनता के बीच नैतिक छवि नहीं है. सबके दामन पर दाग लगे हैं. आंदोलन से बाहर वे सभी जुगाडू़ किस्म के लोग हैं. ऐसे में जनता उनपर विश्वास करे भी तो कैसे? ‘मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना’ का नारा लगाने हर कोई अन्ना नहीं बन जाता. न मंच की पृष्ठभूमि पर महात्मा गांधी की तस्वीर लगा देने से किसी में गांधीजी की आत्मा उतर आती है. दुनिया में ‘गांधी’ एक विचारधारा एक आंदोलन पद्धति का पर्याय बन चुका है. उनके रास्ते पर चलना बिना उनके जैसा बने संभव नहीं है.

भारतीय लोकतंत्र की आज जो अवस्था है वह अनायास नहीं है. न ऐसा है जिसके बारे में कभी सोचा न गया हो. भारत में लोकतंत्र के नाम पर बनी विभिन्न संस्थाओं की आज जो दुर्दशा है वह अकल्पित भी नहीं है. लोकतंत्र की विसंगतियों के बारे में प्लेटो ने खुलकर लिखा है. 2400 वर्ष पहले लिखे गए उसके ग्रंथ ‘रिपब्लिक’ में लोकतंत्र की विस्तृत समीक्षा को देखा जा सकता है. यह आपको तय करना है कि जो परिवर्तन आप चाहते हैं, क्या वे संसदीय लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था में संभव हैं? यदि ‘हां’ तो उसके लिए कौनसे कार्यक्रम जरूरी हैं और कैसे उन कार्यक्रमों पर चरणबद्ध तरीके से अमल किया जाए? यदि वांछित परिवर्तन संसदीय लोकतंत्र द्वारा संभव नहीं है तो भावी लोकतंत्र अथवा नए राजनीतिक दर्शन का स्वरूप क्या हो? उल्लेखनीय है कि लोकतंत्र उन्हीं देशों में बचा हुआ है जो किसी न किसी प्रकार पूंजीवाद को समर्पित हैं. इसलिए पूंजीवाद का विरोध कर रहे देश लोकतंत्र के वैसे समर्थक भी नहीं है. समस्या यह भी है कि पूंजीवाद का विकल्प कही जाने वाली समाजवाद और साम्यवाद जैसी विचारधाराओं का वैश्विक प्रभाव सिकुड़ रहा है. बीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद के विकल्प के रूप में श्रमिक संघवाद, अराजकतावाद, समष्ठिवाद और सहजीवितावाद जैसे नए राजनीतिक दर्शन आए हैं, लेकिन उनको आजमाया जाना बाकी है. मार्क्सवाद से प्रेरितप्रभावित हैं ये सभी विचारधाराएं उसकी अपनीअपनी तरह से अधुनातन व्याख्या करती है. जहां तक भारत की बात है, धर्म, जाति, सांप्रदायिकता के आधार पर बुरी तरह विभाजित समाज में इन विचारधाराओं के आधार पर परिवर्तन असंभव है. फिलहाल जो सबसे जरूरी है वह है आम जनता को लोकतंत्र और उसके विकल्पों से परचाना. उसको परिवर्तन के लिए मानसिकशारीरिक रूप से तैयार करना, जो केवल नैतिक धरातल पर खड़े नायक द्वारा संभव हो सकता है. ऐसा नायक जो निजी नैतिकता के सम्मोहन से आगे बढ़ते हुए पूरे समाज में उसकी स्थापना करना चाहता हो. यह एक लंबा काम है, पर आमूल परिवर्तन के लिए विकल्पहीन भी है.

आधुनिक राजनीतिक दर्शन की सबसे बड़ी समस्या व्यक्तिहित तथा समाजहित में तालमेल बनाने की है. बदले हुए समय में व्यक्ति की राय और उसकी आकांक्षाओं की अवहेलना कर पाना संभव नहीं रह गया है. न ही शासक दल के लिए यह संभव है कि जनमत की उपेक्षा करते हुए वह मनमाना आचरण करे. इसलिए बदलाव अपरिहार्य हैं. लोगों के दिलों में यह विश्वास पैदा कराना जरूरी है कि यह कोरी राजनीति नहीं, वास्तविक परिवर्तन की लड़ाई है. महोदय, मुंबई में अपेक्षाकृत कम जनसमर्थन मिलने पर निराश होने की आवश्यकता नहीं है. हर आंदोलन की राह में ऐसे दौर आते हैं. परिवर्तन की लड़ाई किसी एक दिन में नहीं जीती जा सकती. सुनिश्चित जीत के लिए बारबार चाल अदलबदल कर प्रयास करने पड़ते हैं. इसलिए जरूरी है कि परिवर्तन का पहले खाका बनाया जाए. फिर ऐसे लोगों को आंदोलन से जोड़ा जाए जिनका कोई नैतिक आभामंडल हो. इसके अभाव में लोगों की भीड़ तो जुटाई जा सकती है, समर्पित और प्रतिबद्ध कार्यकर्ता पैदा नहीं होते. लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए एक मुखपत्र भी जरूरी है. फेसबुक आदि को त्वरित संदेश का माध्यम बनाया जा सकता है, सामान्य स्थिति में उनके माध्यम से सरकार पर दबाव भी बनाया जा सकता है. वैकल्पिक समाज की संरचना के लिए ठोस कार्यनीति और राजनीतिक दर्शन की पीठिका तैयार कर पाना उनसे सर्वथा असंभव है. यह अच्छा है कि आपने असफलता के कारणों की पड़ताल शुरू कर दी है. ‘टीम अन्ना’ को चूक का एहसास होना परिवर्तनकामियों को संतोष प्रदान कर सकता है. भविष्य के कार्यक्रम ऐसे हों जो जनता को उसकी उसकी ताकत और अधिकारों से परचाने के साथसाथ लोगों को संकल्पनिष्ठ एवं कर्तव्यनिष्ठ बनने की प्रेरणा भी देते हों.

©ओमप्रकाश कश्यप

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