प्लेटो का राजनीतिक दर्शन : परमशुभ की साधना

कहा जाता है कि आधुनिक समाज में दर्शन की जितनी भी चिंतनधाराएं हैं, सभी प्लेटो के विशद् लेखन की पादटिप्पणियां हैं. गुरु सुकरात ने प्लेटो के चिंतन को नूतन दिशा दी थी. उसी के विचारों का प्रभाव था कि अपनी सभी कविताओं, जिनमें वह पांडुलिपि भी थी, जो एक प्रतियोगिता के लिए तैयार की गई थी, को उसने सुकरात के मिलने के पश्चात आग के हवाले कर दिया था. सुकरात ने ही उसको समझाया था कि ‘शुभत्व’ दुनिया से, जीवन से बाहर की वस्तु नहीं है, प्रत्येक व्यक्ति जो उसकी कामना करता है, वह उसको प्राप्त कर सकता है. उसका यह भी मानना था कि शुभत्व व्यक्तिमात्र का, लक्षण है. हर कोई शुभ की कामना करता है. ज्ञान और सत्याचरण शुभत्व को प्राप्त करने के साधन हैं. सुकरात से पहले प्राणी और परमात्मा के बीच अलंघ्य दूरी थी. दर्शन वादविवाद में बदल चुका था. दूसरों को शास्त्रार्थ में परास्त कर देना ही बुद्धिमानी का पर्याय था. सोफिस्ट विचारक तो इसी को अपने जीवन का ध्येय मानते थे. इसी प्रकार की शिक्षा देने में उन्हें प्रवीणता प्राप्त थी. किंतु सुकरात ने यह कहकर कि हर कोई शुभत्व की कामना करता है, परोक्षरूप में यह भी स्वीकारा था कि आत्मोत्थान की चाहत व्यक्तिमात्र का लक्षण है. तदनुसार सभी एकदूसरे के बराबर हैं. अंतर केवल बाहरी है. मनुष्य और ईश्वर यानी आत्मा और परमात्मा के बीच भी अलंघ्य दूरी नहीं है. मनुष्य चाहे तो स्वयं को नैतिकरूप से इतना ऊंचा उठा सकता है कि परमात्मा से सीधा संवाद कर सके. कह सकते हैं कि सुकरात की विचारधारा ईश्वर और इंसान के अंतर को मेटती, उन्हें परस्पर करीब लाती थी. उससे पहले यह संभव न था. ऐसा भी नहीं है कि सुकरात ने जो कहा वह सर्वथा अनूठा था. भारत में औपनिषदिक मुनि प्रायः यही कहते आए थे. गौतम बुद्ध ने तो नैतिक प्रश्नों को इतना अहम् माना था कि उनसे बाहर सोचने, इतर अभिकल्पना करने को भी अनावश्यक माना था. यूनान और भारत के बीच प्रगाढ़ व्यापारिक संबंध भी थे. व्यापारिक काफिले भौतिक वस्तुओं के अलावा विचारों एवं सांस्कृतिक उपादानों का भी आदानप्रदान करते हो. इसलिए यह असंभव नहीं कि यूनान और भारतीय मनीषा आपस में एकदूसरे को आरंभ से ही प्रभावित करते रहे हों.

प्लेटो के सामने समस्या थी कि शुभत्व की यात्रा को आसान कैसे बनाया जाए. चूंकि परमात्मा परमशुभ है, अतः उसको पाने, उसके जैसा बनने के लिए व्यक्ति को भी अपने स्तर से ऊपर उठना होगा. इसके लिए उसका चारित्रिक विकास अत्यावश्यक है. अतएव जरूरी है कि हर व्यक्ति ‘शुभत्व’ के लक्षणों को पहचाने. उन्हें प्यार करे. उनकी राह का राही बने तथा इस पुनीत कर्तव्य में दूसरों की भी यथासंभव सहायता करे. उसने आचरण की पवित्रता पर जोर दिया है. वह जानता था कि व्यक्ति की शांति में ही समाज की शांति और प्रगति निहित है. इसलिए उसने एक आदर्श समाज का सपना देखा था. उसके कल्पनालोक की झलक हमें उसकी महत्त्वाकांक्षी संवादपुस्तक ‘रिपब्लिक’ में दिखाई पड़ती है. दस अध्यायों में बंटे इस विशद् ग्रंथ में प्लेटो शिक्षा, समाज, न्याय, नैतिकता सहित विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों यथा कुलीनतावाद, राजशाही, साम्राज्यवाद, गणतंत्र, तानाशाही आदि पर विस्तृत चर्चा करता है. बट्रेंड रसेल के अनुसार विषय की दृष्टि से यह पुस्तक मोटे तौर पर तीन हिस्सों में बंटी है. पहले खंड से लेकर चौथे खंड से समापन से कुछ पहले तक वह अपने आदर्श समाज की भूमिका बनाता है. किंतु न्याय की व्याख्या को वह इस हिस्से से अलग रखता है. स्पष्ट है कि रिपब्लिक’ के लेखन के दौरान ही प्लेटो के मन में न्याय को लेकर अलग से पुस्तक तैयार करने की भूमिका बन चुकी थी, जो आगे चलकर ‘ला॓ज’ में पूरी हुई. चैथे खंड के बाकी हिस्से से सातवें खंड तक वह ‘दार्शनिक’ सम्राट की अपनी परिकल्पना को विस्तार देता है, यह सिद्ध करने का प्रयत्न करता है कि केवल दार्शनिक ही आदर्श सम्राट हो सकते हैं. पुस्तक के आठवें से दसवें खंड इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं कि इनमें वह सभी प्रचलित शासन प्रणालियों यथा सामंतशाही, राजतंत्र, तानाशाही और गणतंत्र के गुणअवगुण पर विचार करता है. उस समय तक यूनान में आदर्श समाज की संकल्पना जन्म ले चुकी थी. ‘रिपब्लिक’ में यह कल्पनालोक अधिक व्यवस्थित रूप से मौजूद है. लेकिन यदि यहीं तक सीमित होता तो प्लेटो अन्य यूनानी विचारकों जितनी ख्याति से ही संतोष करना पड़ता. उसका योगदान इससे कहीं अधिक है. वह आदर्शवादी समाज की संकल्पना तथा उसको साकार बनाने के लिए व्यवस्थित चिंतन प्रस्तुत करता है. सुकरात और अपने समकालीन विचारकों के अध्ययन के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि सम्राट को दार्शनिक होना चाहिए, तभी वह समाज को निजी आकांक्षाओं एवं प्रलोभनों से परे रखकर विकासवादी दृष्टि से देख सकता है. व्यक्तिवादी दृष्टि राज्य को भी सीमाओं में कैद कर देती है. यदि व्यक्तिविशेष सोचे कि राज्य को कैसा होना चाहिए, तो राष्ट्र संबंधी उसकी अभिकल्पना भी पूर्णतः व्यक्तिवादी अभिकल्पना होगी. जबकि कल्याणकारी राज्य के लिए आवश्यक है कि वह अपने अधिक से अधिक नागरिकों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करे. प्लेटो ने इसके लिए राज्य के जिन सद्गुणों की बात कहता है, वे हैं—साहस, ज्ञान, सहिष्णुता तथा न्याय. न्याय की अधिकतम संभाव्यता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि राज्य में राजनीतिक दर्शन की प्रमुख शर्तों का पालन होता हो.

प्लेटो ने मानवसमाज के वर्गीकरण आधार उसकी नैसर्गिक प्रतिभा, शक्ति तथा साहस को माना है. जो विलक्षण प्रतिभाशाली नहीं हैं, न बहादुर हैं और न ही हृष्टपुष्ट हैं, वे प्रायः उत्पादक कार्यों, खेती, हाथ के दस्तकार के सर्वाधिक उपयुक्त माने जाते हैं. मगर जो सुंदरसजीले हैं, साथ में ताकतवर और साहसी भी हैं, उनको सुरक्षा और राजनीति के क्षेत्र में लिया जाना चाहिए. उनमें भी जो अतिरिक्तरूप से साहसी, विलक्षण प्रतिभाशाली और सद्गुण संपन्न हैं, वे राज्य को चलाने में स्वयं समर्थ होंगे. प्लेटो के आदर्श राज्य की परिकल्पना अभिजात वर्ग पर निर्भर है. यूनानी भाषा में जिसका अर्थ है, ‘सर्वोत्तम द्वारा सुशासन’. इस विश्लेषण से यह नहीं समझ लेना चाहिए कि प्लेटो की शासन व्यवस्था में कम प्रतिभाशली अथवा जनसाधारण के लिए कोई स्थान नहीं है. उसका मानना है कि समाज का बहुसंख्यक वर्ग, यानी जनसाधारण जो न सामान्य स्तर का प्रतिभाशाली है, शरीर सौष्ठव और युद्धकला में भी उतना प्रवीण नहीं है, को समाज के शेष कार्यों का दायित्व सौंपा जाना चाहिए. इस वर्ग को उसने ‘उत्पादक’ वर्ग की संज्ञा दी है. प्लेटो के समय में यही वर्ग लौहमति, काष्ठकारी, बुनकर, रंगाई, कृषिकर्म, व्यापार आदि में लिप्त था. आर्थिक दृष्टि से इस वर्ग की आय सीमित थी, मगर संख्या की दृष्टि से यह अन्य सभी वर्गों से बड़ा था. उन दिनों यूनान में युवाओं का सेना में भर्ती होना गर्व और प्रतिष्ठा का विषय था. पुलिस और सैन्यबलों को ‘सुरक्षा दस्ता’ कहा जाता था. समाज और राज्य दोनों की बागडोर सर्वाधिक प्रतिभाशाली, वीर, साहसी, अतीव धैर्यवान नागरिकों के समूह को को सौंपी जाती थी, जिन्हें ‘गार्जियन’ यानी अभिभावक कहा जाता था. प्लेटो के आदर्श राज्य में ‘साहस’ को सुरक्षाकर्मियों तथा ‘बुद्धिमानी’ को अभिभावकों का लक्षण बताया गया है. उसके अनुसार राज्य के स्थायित्व के लिए आवश्यक है कि ‘उत्पादक’ यानी कृषक और शिल्पकर्मी, सुरक्षाकर्मियों के अनुशासन में हों और सुरक्षाबल पूरी तरह से अभिभावकों के नियंत्रण में रहें. इनमें ये यदि एक भी समूह अपने कर्तव्यपालन में चूक करता है, अनुशासन को भंग करता है, तो उससे राज्य की शांति भंग हो सकती है. समाज और सरकार के इन विभिन्न अंगों में कर्तव्यपरायणता की भावना स्वयंस्फूर्त होनी चाहिए, न कि किसी बाह्यः दबाव से अनुप्रेत. यदि अनुशासन के प्रति अंतःपे्ररणा का अभाव है तो उसके लिए सरकार को अतिरिक्त संसाधन खर्च करने होंगे, जिससे विकास की गति में गिरावट आ सकती है. इसलिए प्लेटो ने आत्मानुशासन एवं दायित्वभावना पर जोर दिया है.

प्लेटो का आदर्शलोक

प्लेटो पहला दार्शनिक था, जिसने न्यायाधारित समाज का सपना देखा था. उसका मानना था कि शिक्षा केवल शीर्षस्थ वर्ग सीमित न रहे. जबकि जनसाधारण को भी अपने बौद्धिक विकास के अवसर प्राप्त हों. उसकी बहुचर्चित पुस्तक ‘रिपब्लिक’ का प्रथम उद्देश्य ही न्याय को परिभाषित करना है. यद्धपि न्याय की उसकी परिकल्पना कानून, न्यायालय, वकील आदि की प्रचलित अवधारणा से भिन्न है. न्याय से उसका अभिप्राय नैतिकता और आत्मानुशासन की भावना से है. चूंकि किसी भी पदार्थ की गुणवत्ता का आकलन करना बड़े परिवेश में अपेक्षाकृत आसान होता है, इसलिए वह न्याय को पूरे समाज के संदर्भ में देखता है, न कि व्यक्तिविशेष की वस्तु मानकर. यह मानते हुए कि न्याय किसी भी आदर्श राज्य की पहली जरूरत हो सकता है, अतएव वह न्याय को उसकी संपूर्णता में स्थापित करना चाहता है. प्लेटो का समाजदर्शन वास्तव में वह कल्याणकारी सपना है, जो उसकी आंखों में आदर्शसमाज की स्थापना को लेकर था. प्लेटो सबसे पहला विचारक था जिसने नागरिकों को तीन समूहों में वर्गीकृत किया था, वे हैं—जनसाधारण, सिपाही या रक्षक तथा अभिभावक. समस्त राजकीय शक्तियां अभिभावक के अधीन होती हैं, जिनकी संख्या बाकी दो वर्गों के सापेक्ष बहुत कम होती है. अभिभावक कौन बन सकता है? वही जो बुद्धिमानी में अद्वितीय हो. जो सर्वाधिक धैर्यवान और विवेकसंपन्न हो. जो इतना शक्तिशाली भी हो कि आवश्यकता पड़ने पर युद्ध के मैदान में सैनिकों का नेतृत्व कर सके. अभिभावक वर्ग के सदस्यों का चयन संवैधानिक नियमों के अनुसार किया जाता है. यूनान की तत्कालीन प्र्रथा के अनुसार अभिभावक वर्ग का चयन प्रायः वंशानुगत आधार पर किया जाता था. मगर कभीकभी किसी विलक्षण प्रतिभासंपन्न किशोर को भी भी वरिष्ठों की कतार में सम्मिलित कर लिया जाता था. अभिभावक नियुक्त किए जाने के बाद भी उसके कार्यों की समीक्षा की जाती थी. भ्रष्टाचार अथवा अकर्मण्यता के आरोपी को पदावनत कर वरिष्ठों की सभा से निष्कासित कर दिया जाता था. प्लेटो के सामने मुख्य समस्या थी वरिष्ठों को संविधान के प्रति जवाबदेह और समर्पित बनाए जाने की थी. चूंकि यह कार्य व्यक्तिगत नैतिकता, बुद्धिमानी और समर्पणभाव के साथ ही संभव है, अतएव अपने लक्ष्य को प्राप्त करने, समाज को मर्यादित बनाने के लिए वह आर्थिक, शैक्षिक, जैविक, धार्मिक, राजनीति आदि अनेक व्यवस्थाओं को अपनाने का सुझाव देता है. भारतीय वर्णव्यवस्था में ब्राह्मणों को मिले अतिरिक्त अधिकारों की भांति प्लेटो भी अभिभावक वर्ग के लिए अतिरिक्त अधिकारों की संस्तुति करता है, तथापि दोनों में अंतर है. भारतीय वाङमय में यह काम जहां धर्म आग्रह अथवा धर्म के निर्देशन में किया जाता है, प्लेटो पदाधिकारियों का चयन वस्तुनिष्ठ ढंग से, उनकी अपनी योग्यता और कार्यकुशलता के आधार पर करने का सुझाव देता है. उसकी सामाजिकराजनीतिक आचारसंहिता के कुछ प्रावधान केवल रक्षकों के लिए है. बावजूद इसके उसका विशेष आग्रह वरिष्ठों को जवाबदेह बनाने पर है, जो बिना शिक्षा के संभव नहीं.

प्लेटो जीवन में शिक्षा को कितना महत्त्व देता था, इसका परिचय उसके द्वारा स्थापित ‘अकादमी’ से भी मिलता है. वह शिक्षा को बहुआयामी बनाने का समर्थक था. अपने आदर्शलोक के लिए उसने शिक्षा को दो प्रमुख वर्गों में वर्गीकृत किया था, वे हैं—संगीत और शारीरिक व्यायाम. संगीत और व्यायाम दोनों को ही वह व्यापक संदर्भों में देखता था. उसके लिए संगीत का अभिप्राय था, हर वह चीज जो मानवसंतति के क्षेत्र में आती हो, जिससे मानवसमाज को उन्नत बनाया जा सके. इसमें राजनीति, कला, साहित्य, दर्शन, अर्थशास्त्र सभी में प्रवीणता ही व्यक्ति को जीवनक्षेत्र में सफल बना सकती है. इनमें से किसी एक विषय में भी अधूरे ज्ञान से जीवन की लय बिगड़ सकती है. इसी प्रकार व्यायाम का अभिप्राय था, हर वह वस्तु जो शारीरिक कसरत और प्रशिक्षण के क्षेत्र से संबद्ध हो, जिसके द्वारा शरीर के साथ मन को भी ऊर्जा मिले. इस तरह प्राचीन यूनानी शब्दावली में संगीत का अभिप्राय लगभग उतना ही व्यापक था, जितना आजकल संस्कृति का है. इसी प्रकार व्यायाम से अभिप्राय बौद्धिक और शारीरिक स्फूर्ति और ऊर्जा से था. प्लेटो का मानना था कि संस्कृति का काम व्यक्ति को स्वाभाविक रूप से विनम्र एवं उदार बनाना है. ‘रिपब्लिक’ में यूनानी अभिजात वर्ग का जिस तरह चित्रण किया गया है, उससे जाहिर होता है कि वह धनवैभव और प्रतिष्ठा का तो भोग करता था, किंतु राजनीतिक एकाधिकारवाद से मुक्त था. राजनीति का वह उतना ही प्रयोग करता था, जितना कि पदप्रतिष्ठा और सामाजिक गरिमा को बनाए रखने के लिए अनिवार्य था. अभिभावक वर्ग के लिए राजनीतिक दायित्वपालन का माध्यम थी. वस्तुतः ईसा पूर्व चैथी शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी पूर्व तक भारत और यूनान समेत प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताओं में बौद्धिक जागरण का वातावरण बना था. पुराने ज्ञान को लगातार चुनौती दी जा रही थी. समाज में नवबौद्धिक वर्ग की जो प्रतिष्ठा थी, उसके आगे राजनीतिक धनवैभव कोई मायने नहीं रखते थे. इसलिए उस समय के समाजों में हम देखते हैं कि राजा भी खुद को लेखक और दार्शनिक कहलवाने को उत्सुक दिखते हैं. महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध दोनों ने राजकुल में जन्मे थे, किंतु उन्होंने राजकीय प्रलोभनों को त्यागकर अपने लिए ज्ञानसाधना का मार्ग चुना था. जिन राजाओं में निजी प्रतिभा का अभाव होता वे अपने राज्य में दार्शनिकों, कवियों और वैज्ञानिकों को शरण देकर गौरव का अनुभव करते थे.

अभिजात वर्ग में शिक्षा पर पूरा जोर दिया जाता था. शिक्षा का उद्देश्य किसी खास विषय में बौद्धिक विशेषज्ञता प्राप्त कर लेने तक सीमित नहीं था, शिक्षण का वास्तविक ध्येय व्यक्तित्व निर्माण होता था. इसलिए धैर्य, सदाचरण, साहस, बुद्धिविवेक आदि कुछ ऐसे गुण थे, जिन्हें शिक्षा के माध्यम से उभारने पर जोर दिया था. स्पार्टा और एथेंस दोनों की राज्यों में जिस प्रकार लगातार युद्ध होते रहते थे, वहां सैन्य अभियानों के लिए मानवशक्ति की सदैव आवश्यकता पड़ती थी. युवाओं में आक्रामकता को पसंद किया जाता था. उसमें कोई कमी न आए, इसके लिए उन्हें रागात्मक गतिविधियों, विशेषकर प्रेम कविताओं से दूर रखा जाता था. स्मरणीय है कि प्लेटो ने अपने लेखन की शुरुआत एक कवि के रूप में की थी, किंतु बहुत जल्दी उसको सुकरात की गहन दार्शनिक विवेचनाओं के आगे कविताओं का क्षेत्र छोटा दिखने लगा. इसलिए लगभग बीस वर्ष की अवस्था में ही जब सबसे संवेदनशील और भावनाओं में बह जाने की उम्र होती है, उसने कविताओं से किनारा कर लिया था. माताओं और दाइयों से अपेक्षा की जाती थी कि वे अपने बच्चों को केवल तयशुदा कहानियां ही सुनाएं. ऐसी कहानियां जिनमें साहस, सदाचरण, सहनशीलता और मानवीय व्यवहार की गाथाएं हों. यहां तक कि होमर और हेसीयोद जैसे प्राचीन कवियों की रचनाएं भी बच्चों के लिए वर्जित मानी जाती थीं. यह माना जाता था कि ये चीजें बच्चों को मृत्यु का भय दिखाती हैं, जबकि यूनानियों के लिए शिक्षा का प्रथम उद्देश्य था, युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहना

हमारे बच्चों को सिखाया जाना चाहिए कि दासता मृत्यु से कहीं ज्यादा घृणित है. अतः इसके लिए उन्हें ऐसे किसी भले आदमी की कहानी नहीं सुनानी चाहिए जो, अपने घनिष्ट मित्रों की मृत्यु पर भी, रोता और विलाप करता हो.’

मानव व्यक्तित्व का एक गुण मर्यादा पूर्ण आचरण भी था, जिसके अनुसार सभा के बीच जोरजोर से हंसना असभ्य समझा जाता था. प्राचीन ग्रीक कविताएं जो व्रत, उपवास, ईश्वर के प्रति गहन निष्ठा दर्शातीं अथवा स्वर्ग का लालच देती थीं, उन्हें बच्चों के लिए वर्जित माना जाता था. प्लेटो के अनुसार श्रेष्ठ व्यक्ति वह है, जो बुरे व्यक्ति का अनुसरण नहीं करता. कलाओं में नाटकों को भी बहुत प्रशंसा की दृष्टि से नहीं देखा जाता था. चूंकि अधिकांश नाटकों में खलनायक की उपस्थिति सामान्य थी. अतः प्लेटो का विचार था कि खलनायक का अभिनय करने वाले पात्र दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, जिससे लोगों में, भले ही ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम हो, उसके प्रति सहानुभूति उत्पन्न होती है. यही क्यों स्त्रियों, दासों तथा समाज के अन्य कमजोर वर्ग के लोगों को भी नाटक के पात्र भिन्नभिन्न प्रकार से प्रभावित करते हैं; और उन्हें अपनी किसी न किसी रूप में यथास्थिति को बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं. उल्लेखनीय है कि प्राचीन यूनान में नाटकों में स्त्रियों का अभिनय पुरुष पात्रों द्वारा किया जाता था, वे प्रायः समाज के शीर्षस्थ वर्गों तथा दुष्ट प्रवृत्ति वाले लोगों का ही चित्रण करते थे. यथार्थवादी नाटकों का उदय उस समय तक नहीं हो पाया था. शायद यही कारण है कि अपने आदर्शलोक में प्लेटो ने नगर से सभी नाटक मंडलियों के निष्कासन का सुझाव दिया था. यही नहीं उसने दुख एवं शैथिल्य का भाव जगाने वाले संगीत का भी बहिष्कार करने का सुझाव दिया था, जबकि साहस और धैर्य जगाने वाले संगीत पर किसी प्रकार का नियंत्रण न था. इसी प्रकार गीत भी वही स्वीकार्य थे, जो साहस और सहिष्णुता के भावों को जगाते हों. सहिष्णुता का अर्थ युद्धस्थल में वीरतापूर्ण ढंग से जूझते हुए अधिक से अधिक घाव सहने तथा उनकी परवाह न करते हुए भी युद्ध में डटे रहने से था. प्रेम और भावानुराग भरे गीतों और कविताओं के लिए प्लेटो के आदर्शलोक में कोई स्थान न था. शरीर को चुस्त और फुर्तीला बनाए रखने के लिए शारीरिक प्रशिक्षण पर पूरा जोर दिया जाता था. नागरिकों को भोगविलास से दूर रखने के लिए प्लेटो ने उनके खानपान पर भी नियंत्रण का सुझाव दिया है. किसी को भी बगैर अनुमति भुना मांस, मछली खाने की छूट न थी. भोजन में सीमित व्यंजन रखने का सुझाव दिया गया था. चटनी और मिठाई परोसने से परहेज था. प्लेटो ने सादे और पौष्टिक भोजन की अनुशंसा की है, ताकि डा॓क्टरों को दूर रखा जा सके. रोजमर्रा की बातचीत में भी अनुशासन और मर्यादा का ध्यान रखने के निर्देश ‘रिपब्लिक’ में हैं. युवाओं को गालीगलौंच वाली भाषा का उपयोग करने, भद्दा मजाक करने की मनाही थी. यद्यपि कुछ विशेष अवसरों पर उन्हें चीखनेचिल्लाने और मौजमस्ती की अनुमति सायास दी जाती थी. दुश्मन को डराने, उसके दिल में दहशत पैदा करने के लिए इस तरह का अभ्यास जरूरी माना गया था. युद्धकाल में किशोरों को युद्ध देखने के लिए प्रेरित किया जाता था, ताकि वे स्वयं को एक अच्छे योद्धा के रूप में तैयार कर सकें. हालांकि किशोरों को बिना अनुमति के युद्ध में हिस्सा लेना वर्जित था.

अपने आदर्शलोक में अर्थव्यवस्था के नियमन के लिए प्लेटो ने कुछ सुझाव दिए हैं. और हम हैरान होते हैं कि करीब 2400 वर्ष अर्थात मार्क्स से भी 2200 वर्ष पहले प्लेटो ने आर्थिक समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था. विशेषकर अभिभावक वर्ग के लिए उसका सुझाव था कि उन्हें छोटे घरों में रहना चाहिए. साधारण भोजन करना चाहिए. उस वर्ग के लिए उसने सामूहिक आवास बनाए जाने का सुझाव था. उनका भोजन भी सामूहिक होता था. प्लेटो के आदर्शलोक में व्यवस्था थी कि अभिभावक वर्ग को निजी संपत्ति रखने का कोई अधिकार नहीं होगा. उनके लिए सोने और चांदी के गहनों का उपयोग वर्जित था. चूंकि संपत्ति की कोई स्पर्धा नहीं थी. पूरे समाज के लिए एक जैसे कानून थे, अतएव ऐसा कोई कारण नहीं था, जो उन्हें दुख पहुंचाता हो. अत्यधिक संपन्नता और विपन्नता दोनों ही हानिकारक हैं, इस कारण प्लेटो के आदर्शलोक में इन्हें निषिद्ध माना गया था. उसने व्यक्ति के बजाय समाज के सुख को महत्त्व दिया जाता था. प्लेटो के कुछ आधुनिक अनुयायी उसके सहजीवन के विचार का विस्तार करते हुए उसे परिवार की सामूहिकता तक ले जाते हैं. उनके अनुसार मित्रों के बीच कोई भेद नहीं होता, न किसी पर्दे की दरकार होती है. अतः समाज में स्त्रियों और बच्चों समेत सबकुछ साझा होना चाहिए. आदर्श राज्य की परिकल्पना करते हुए प्लेटो ने सुझाव दिया है कि बच्चों को उनके मातापिता से जन्म के कुछ समय बाद ही अलग कर, राज्य के नेतृत्व में ले लेना चाहिए. लड़कियों और लड़कों की शिक्षा में समानता होनी चाहिए. यहां तक कि संगीत, व्यायाम, कलासाहित्य में भी लड़कों और लड़कियों की शिक्षा में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए. स्त्री और पुरुष की मूल प्रवृत्तियां एकसमान होती हैं, इसलिए अच्छा अभिभावक बनने के लिए जो शिक्षा पुरुषों के लिए अनिवार्य है, वही लड़कियों के लिए भी जरूरी है. प्लेटो सेना और रक्षा सामग्री के खर्च को न्यूनतम करने के पक्ष में था. यूनानी समाज युद्ध प्रिय था. उनमें छोटेछोटे राज्य थे, जिनके बीच अकसर युद्ध होते रहते थे. इसके लिए राज्य को सेना और युद्ध साम्रगी पर अधिक खर्च करना पड़ता था. प्लेटो का मानना था कि युद्ध और सेना पर अत्यधिक खर्च करने से उचित है, जीत की सुनिश्चितता के लिए युद्धकाल में सहयोगियों को खरीद लेना. चूंकि उस समय राज्य छोटेछोटे भूक्षेत्रों तक सीमित थे, तथा वे परस्पर युद्धरत रहते थे, इसलिए सहयोगियों को खरीदना कठिन भी नहीं था. प्लेटो का यह विचार उसकी राजनीतिक कूटनीतिज्ञता का परिचायक है.

प्लेटो के आदर्शलोक में जिस बात पर पूरा जोर दिया गया था, वह थी—स्त्रीपुरुष की समानता. शिक्षा, समाज, राजनीति के स्तर पर स्त्रियों को पुरुष के समान अधिकार देना. वह कला, साहित्य, राजनीति के साथ युद्ध के बारे में भी लड़कियों को लड़कों जैसी शिक्षा दिलाने के पक्ष में था. उसका मानना था कि बच्चों के पालनपोषण से लेकर उनकी शिक्षादीक्षा तक का संपूर्ण दायित्व राज्य का होना चाहिए. बच्चे व्यक्तिविशेष की नहीं, समाज की जिम्मेदारी हैं. वे भावी नागरिक हैं, अतः उनके बीच स्पर्धा की भावना को समाप्त करने के लिए आवश्यक है कि उनका पालनपोषण इस प्रकार हो कि मातापिता अपनी संतान की पहचान भी न कर सकें. न ही किसी बच्चे को यह पहचान हो कि उसके जन्मदाता कौन हैं. इसके लिए उन्हें ऐसे रहस्यमय और एकांत स्थान पर रखा जाना चाहिए, जहां उनको रखा जा सकता है. बालक हृष्टपुष्ट, विवेकवान और होंइसके लिए आवश्यक है कि उनके मातापिता स्वस्थ एवं संतानोत्पत्ति में सक्षम हों. वे इतने वृद्ध भी न हों कि उनका स्वास्थ्य उनकी संतति को प्रभावित कर सके. प्लेटो के अनुसार बच्चे को जन्म देते समय मां की आयु बीस से चालीस वर्ष और पिता की अवस्था पचीस से पचपन के बीच होनी चाहिए. इससे ऊपर की अवस्था के स्त्रीपुरुष परस्पर संभोग तो कर सकते हैं, किंतु उनको संतानोत्पत्ति की अनुमति नहीं दी जा सकती. निर्धारित आयु सीमा के पश्चात स्त्रीपुरुष के संसर्ग से यदि गर्भ ठहरता है तो भ्रूणपात कराना अनिवार्य होगा.

प्लेटो के आदर्शलोक में समाज और राज्य को ऊंचे स्थान पर रखा गया था. राज्यहित सर्वोपरि था. प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य था कि वह राज्य के लिए स्वस्थ्य और बुद्धिमान नागरिक तैयार करे. भावी संतति स्वस्थ एवं विवेक संपन्न हो, इसके लिए राज्य नागरिकों के कामसंबंध नियंत्रित करने का अधिकार था. वैवाहिक संबंध तय करने में भी राज्य की भूमिका सर्वोपरि होती थी. राज्य द्वारा तय किए गए विवाहसंबंधों के विरुद्ध आवाज उठाने का अधिकार नागरिकों को भी नहीं था, उन्हें यह दायित्व राज्य के प्रति कर्तव्यपालन के निमित्त निभाना ही पड़ता था. वैवाहिक संबंधों को तय करने में प्यार और भावना कभी आड़े नहीं आते थे. चूंकि कोई बालक यह नहीं जान पाएगा कि उसका वास्तविक जन्मदाता कौन है, इसलिए व्यवस्था की गई थी कि पिता की वयस् के प्रत्येक व्यक्ति को वह ‘पिता’ से संबोधित करेगा. इसी तरह माता की वयस् की स्त्रियों को ‘माता’ और अपने समवयस्कों को भाई अथवा बहन कहकर पुकारेगा. ‘पिता’ और ‘पुत्री’ तथा ‘माता’ और ‘पुत्र’ के बीच वैवाहिक संबंधों का बहिष्कार किया जाता था, यद्यपि इसके लिए कोई ठोस नियम नहीं था. यहां प्लेटो के चिंतन की दुर्बलता साफ नजर आती है. तयशुदा व्यवस्था के अनुसार यदि कोई बालक या बालिका अपने वास्तविक जन्मदाताओं के नाम से पूर्णतः अनभिज्ञ रखा गया है, तो वह यह कैसे तय कर पाएगा कि उसका रक्तसंबंधी भाई अथवा बहन कौन है?

ऐसा लगता है कि प्लेटो ‘विवाह’ और ‘परिवार’ नामक संस्थाओं को लेकर अपने आप में स्पष्ट नहीं था. वह एक ओर तो बच्चों का पालनपोषण मातापिता से दूर राज्य के संरक्षण में इस तरह करने की सिफारिश करता है कि बच्चों को पता भी न चले कि उनके वास्तविक जन्मदाता कौन हैं, वह यह भी शर्त रखता है कि समवयस्क युवकयुवतियां परस्पर भाईबहन होंगे. दूसरे वह ‘भाई’ और ‘बहन’ के बीच विवाहसंबंधों को भी निषिद्ध ठहराता है. वह यह नहीं बताता कि मातापिता से दूर, एकांत में अपने हमउम्र बच्चों के बीच पले बच्चे कैसे अपने वास्तविक भाईबहन की पहचान कर सकेंगे. इससे इतना स्पष्ट है कि मातापिता, पुत्रपुत्री और भाईबहन को लेकर जिस तरह के भावनात्मक संबंध आज पाए जाते हैं, प्लेटो के दिमाग में भी उसी प्रकार के संबंधों की छवि मौजूद रही होगी. इस अवधारणा का आधार यह है कि प्लेटो के आदर्शलोक में कोई युवा अपने पिता की उम्र के व्यक्ति पर हाथ नहीं छोड़ सकता था. क्योंकि वह वृद्ध उसका जन्मदाता भी हो सकता है. कहा जा सकता है कि यत्किंचित राज्य की अधिनायकवादी सत्ता के समर्थक प्लेटो ने निजी अनुभूतियों, संवेदनाओं के सामान्यीकरण करने का प्रयास किया था. वृहद सामाजिक हितों के मद्देनजर उसको यह जरूरी जान पड़ा था. इससे समाज में न केवल निजी संपत्ति की अवधारणा को चुनौती दी जा सकती थी, बल्कि व्यक्ति के हितों के सापेक्ष सामाजिक हितों को वरीयता देना भी अपेक्षाकृत सरल था. मानवीय रिश्तों का यह सामान्यीकरण युद्धप्रिय समाज में सैन्यबल की अबाध आपूर्ति के लिए भी जरूरी था.

प्लेटो एक ओर तो सामाजिक हितों को व्यक्ति के हितों से ऊपर रखता है. ऐसी व्यवस्था करने का प्रयास करता है, जिससे सामाजिक संपत्ति का लाभ उसके सभी सदस्यों को एकसमान प्राप्त हो सके; तथा लोग समाज और राष्ट्र के प्रति इस प्रकार आस्थावान हों कि निजत्व की अवधारणा ही न रहे. दूसरी ओर उसके चिंतन के विरोधाभास भी सामने आते हैं. सामाजिक स्तरीकरण को लेकर प्लेटो ने आश्चर्यजनक तर्क दिया है, जिसके अनुसार ईश्वर ने तीन प्रकार के मनुष्यों को पैदा किया है. स्वर्णनिर्मित, जो सर्वश्रेष्ठ हैं. रजतनिर्मित, ये दूसरे स्तर पर आते थे. इनके अलावा बाकी जनसमूह को उसने कांस्य और लौहविनिर्मित श्रेणियों में रखा था, जिनका दायित्व समाज के परिश्रमसाध्य कार्यों को निपटाना था. प्लेटो के अनुसार एकमात्र स्वर्णविनिर्मित अर्थात सर्वोत्तम श्रेणी के पुरुष ही समाज का संरक्षक बनने की योग्यता रखते हैं. रजतविनिर्मित पुरुष समाज की रक्षा करने योग्य होते हैं, जबकि लौह और कांस्य निर्मित मनुष्य केवल शारीरिक श्रमकौशल द्वारा अपना भरणपोषण करने में सक्षम होते हैं. जहां तक बच्चों की बात है, उनका वर्ग मातापिता के वर्ग द्वारा निर्धारित होगा, हालांकि इसका कोई सार्वकालिक नियम नहीं था. बच्चों को उनके मानसिकशारीरिक स्तर के अनुसार ऊंचे अथवा नीचे वर्ग में विस्थापित किया जा सकता था. प्लेटो को एहसास था कि संभवतः आरंभिक पीढ़ी इस प्रकार के विभाजन को एकाएक स्वीकार न करे. इसलिए उसने लिखा है कि लोगों को इसके लिए उपयुक्त शिक्षा दी जानी चाहिए. प्लेटो का मानना था कि किसी मिथक में विश्वास पैदा करने, समाज में उसको स्थापित करने के लिए न्यूनतम दो पीढ़ियों की जरूरत पड़ती है. उसका आकलन गलत भी नहीं था. जापानियों को बचपन से ही यह सिखाया था जाता था कि सम्राट मिकाडो सूर्य देवता के वंशज, उसके उत्तराधिकारी हैं तथा जापान का निर्माण संसार में सबसे पहले हुआ था. धीरेधीरे यह मिथक जापानी लोगों के मानस स्थापित होता गया. आज स्थिति यह है कि यदि बड़े से बड़ा विद्वान भी इस मिथक के विरुद्ध कोई टिप्पणी करे तो वह बेअसर सिद्ध होती है, बल्कि उसको जापानी सभ्यता एवं संस्कृति के विरुद्ध मान लिया जाता है. प्लेटो ने इस वास्तविकता पर कोई ध्यान नहीं दिया था कि इस प्रकार के मिथकीय अंधविश्वास दार्शनिक अवधाराणाओं से सर्वथा असंगत होते हैं. वे न तो विवेकसम्मत होते हैं, न ही तर्कसिद्ध, वास्तव में वे कुछ चालाक और स्वार्थी बुद्धिजीवियों के बौद्धिक शगल का परिणाम होते हैं, जिन्हें वे समाज में यथास्थिति बनाए रखने के लिए तरहतरह से जीवित रखने का प्रयास करते हैं. चूंकि समाज के अधिकांश संसाधनों तथा उत्पादनतंत्र पर इसी वर्ग का अधिकार होता है, अतएव जनसाधारण की विवशता होती है कि वह इनकी सत्ता को स्वीकार कर उनके द्वारा स्थापित मान्यताओं के प्रति सहमति व्यक्त करता रहे. प्लेटो ने इस समस्या पर विचार अवश्य किया था, किंतु कहीं न कहीं वह भी यूनानी श्रेष्ठता के प्राचीन मिथक के प्रति अंधभक्त था. इसलिए एक ओर जहां वह सामान्य नागरिकों से राष्ट्रराज्य के प्रति सर्वस्व समर्पण की अपेक्षा रखता था, इसके लिए उसने अपनी संवादपुस्तक ‘रिपब्लिक’ में प्रावधान भी किया था, वहीं वह समाज के संरक्षक वर्ग को अतिरिक्त छूट दिए जाने के पक्ष में था. यह बहुत कुछ भारत के वर्णविभाजन से मिलताजुलता था, जिसमें ब्राह्मणों को अतिरिक्त अधिकार प्रदान किए गए थे, जिसके दुष्परिणामस्वरूप इस देश में धर्म और जाति के नाम पर अकर्मण्य और परजीवी समाज का जन्म हुआ, जो अंततः शताब्दियों लंबी दासता और देश के पिछड़ेपन का कारण बना. यूरोप इससे जल्दी उभर पाया तो इसलिए कि वहां सामाजिक विभाजन को धमसत्ता के हस्तक्षेप से मुक्त रखा गया था, जबकि भारतीय धर्मशास्त्रों में वर्णविभाजन बृह्मा की सर्जना है.

रिपब्लिक’ के चौथे खंड में ‘न्याय’ की अवधारणा पर विचार किया गया है. जिस गंभीरता के साथ प्लेटो इस विषय पर विचार करता है, उससे स्पष्ट होता है कि गणतंत्र अथवा राजनीति के बजाय ‘न्याय’ ही पुस्तक का प्रधान विषय है. न्याय की पर्तदरपर्त व्याख्या करता हुआ प्लेटो स्पष्ट करता है कि राज्य की सफलता तभी सुनिश्चित है, जब उसके नागरिक निर्दिष्ट कर्तव्यों का पूरी निष्ठा के साथ पालन करें. व्यापारी ईमानदारी से व्यापार करें, सेनाएं युद्ध में वीरता का प्रदर्शन कर राज्य की गरिमा को सुरक्षित रखें तथा संरक्षक वर्ग अपने दायित्व का निर्वाह करे. समाज के ये सभी वर्ग बिना दूसरे के काम में बाधा उत्पन्न किए अपने कर्तव्य का पालन करें, तभी राज्य की समृद्धि और सुरक्षा संभव है. यदि सभी नागरिक अपनेअपने कर्तव्यपालन के प्रति सचेत हों तो ‘कानून’ और ‘न्याय’ जैसे मुद्दों का कोई अर्थ ही न रहे. लेकिन व्यवहार में ऐसा हो नहीं पाता. मानवीय कमजोरियां उसके कर्तव्यपालन में विचलन का कारण बनती हैं. वही समाज में शांतिव्यवस्था बनाए रखने के लिए बाहरी शक्तियों की आवश्यकता को जन्म देती हैं. प्रसंगवश यह जान लेना उचित होगा कि यूनानी परंपरा में न्याय की अवधारणा उसकी आधुनिक अवधारणा से काफी भिन्न है. एनेक्जमेंडर के अनुसार न्याय को उस रूप में देखना चाहिए जिसके अनुसार वस्तुएं अपने स्वाभाविक रूप में आकार ग्रहण करती हैं तथा किसी समय विशेष में दूसरी वस्तुओं पर प्रभाव डालती हैं. आरंभिक यूनानी दर्शन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति तथा वस्तु का पूर्व निर्धारित स्थान और कर्तव्य होता है. इस संदर्भ में वह किसी भी पराभौतिक शक्ति के अनुशासन से मुक्त होती है. उसके अनुसार परसत्ता स्वयं भी अनुशासन से मुक्त नहीं है. वह उसी प्रकार अपने कर्तव्य से आबद्ध है, जैसे सृष्टि की बाकी वस्तुएं तथा प्राणी. इसलिए अपने दायित्व का निर्वहन करना समाज के प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद अथवा प्रतिष्ठा से जुड़ा क्यों न हो, की जिम्मेदारी है. पराभौतिक शक्तियों पर भी यह बात उतनी ही गंभीरता से लागू होती है. समस्या तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति शक्ति के उन्माद में अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने लगता है. दूसरों से श्रेष्ठता का दर्प उसको नियमों की अवहेलना के लिए उकसाता है. शक्ति के उन्माद और घमंड में डूबा हुआ व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख होने लगता है. परिणामस्वरूप समाज में अंतद्र्वंद्व पैदा होते हैं. इसलिए प्राचीन यूनानी विधिशास्त्र में दर्प को कुचल डालने की अनुशंसा की गई है. क्योंकि दूसरों से श्रेष्ठता का दर्प ही मनुष्य को कर्तव्य से विमुख होने तथा दूसरों के कार्य में बाधा खड़ी करने के लिए उकसाता है. प्लेटो की ‘न्याय’ की अवधारणा इसी यूनानी चेतना से बनी थी. उसके लिए ‘न्याय’ का मतलब था—‘कर्तव्यबोध तथा कर्तव्यपालन.

आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों में न्याय को अक्सर समानता के पर्याय के रूप में लिया जाता है. प्लेटो की अवधारणा इससे भिन्न थी. उसके अनुसार दूसरों के उधार को चुकाना भी मनुष्य का कर्तव्य है, अतएव वह भी न्याय का पर्याय है. ‘रिपब्लिक’ के आरंभ में ‘न्याय’ के बारे में कुछ ऐसी ही स्थापना है

न्याय आखिर क्या है? सदा सच बोलना और समय पर उधार लौटाना! इससे आगे क्या न्याय कुछ नहीं है? क्या यही मान लेने के अलावा हमारे सामने कोई अन्य विकल्प नहीं है?’

न्यायसंबंधी अपनी ही प्रारंभिक संकल्पना में प्लेटो एक के बाद एक सुधार करता जाता है. इसके लिए वह सुकरात को माध्यम बनाता है. प्लेटो की न्यायसंबंधी अवधारणा के कई बिंदू विचारणीय है, जिनसे उसकी कुंठा जाहिर होती है. ‘न्याय’ की बात करता हुआ वह ‘अन्याय’ का पक्ष लेता हुआ नजर आता है. दरअसल वह न्याय की परिभाषा को इतना व्यापक कर देता है कि अन्याय और न्याय के बीच भेद कर पाना असंभवसा हो जाता है. प्लेटो के समाज में ‘गार्जियन’ का कर्तव्य अपने बुद्धिविवेक से समाज को अनुशासित और कर्तव्योन्मुखी बनाए रखना है, इसके लिए उन्हें व्यापक अधिकार प्राप्त होते हैं. लेकिन यदि ऐसे वर्ग का कोई व्यक्ति जो ‘गार्जियन’ नहीं है, न ही उसकी योग्यता रखता है, बुद्धिविवेक में ‘गार्जियन’ से आगे निकल जाता है, तो उसका क्या किया जाए? कैसे उसकी योग्यता का समाज के हित में उपयोग किया जाए. न्याय तो इसी में है कि उस व्यक्ति को संरक्षक वर्ग में सम्मिलित कर उसकी बौद्धिक क्षमताओं का उपयोग समाजहित में किया जाए. दूसरी और संरक्षक वर्ग में सम्मिलित वे व्यक्ति जो बौद्धिक नेतृत्व करने में असमर्थ हैं, जो समाजहित के बजाय स्वार्थ को महत्ता देते हैं, जो नैतिक दृष्टि से भी पतनशील हैं—उचित होगा कि ऐसे दुराचारियों को पदावनत कर निचले वर्गों में ढकेल दिया जाए. प्लेटो बजाए इसके दासप्रथा का समर्थन करता है और उसको बनाए रखने के लिए तर्क देता है. यहीं उसकी न्याय की अवधारणा ‘अन्याय’ में बदलती नजर आती है.

प्लेटो द्वारा स्थापित इस व्यवस्था की तुलना अगर भारतीय वर्णव्यवस्था से की जाए तो दोनों में काफी समानता नजर आती है. प्राचीन यूनान की तरह भारत में भी समाज का विभाजन तीन प्रमुख वर्गांे, ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय के बीच था. जो मनुष्य इन तीन वर्गों से बाहर थे, उन्हें शूद्र कहा गया है, जिनका कार्य दूसरे वर्गों की सेवा करना है. आरंभ में भारतीय वर्णव्यवस्था में वर्गांतरण संभव था. व्यक्ति अपनी रुचि एवं योग्यता के अनुसार एक वर्ग से दूसरे वर्ग में आजा सकता था. कालांतर में यह विभाजन रूढ़ होता चला गया.वर्ण जातियों में ढल गए और जातियां उपजातियों में विस्तार पाती रहीं. भारत में जो स्थान शूद्रों के लिए तय था, यूनानी समाज में वही स्थिति ‘दास’ की थी. तय है कि सामाजिक न्याय के बारे हैं सिवाय इसके कि प्लेटो ने सामाजिकविभाजन की अपनी पद्धति में वर्गांतरण को सीमित मान्यता दी है, कोई नयापन नहीं है. उसने स्वीकार किया था कि जन्म एवं शिक्षा में दूसरों से बेहतर होने के कारण संरक्षकों के बेटेबेटियां समाज के शेष वर्गों की संतान की अपेक्षा लाभ की स्थिति में होंगे, जिससे समाज का शक्ति संतुलन एक वर्ग विशेष के पक्ष में खिसकता चला जाएगा. न्याय की व्याख्या के अगले चरण में प्लेटो ऐसे राज्य की परिकल्पना करता है जिसका संघटन पंरपरा अथवा किंचित आदर्शयुक्त पसंदों के आधार पर किया गया है. आदर्श राज्य के रूप में प्लेटो की परिकल्पना में ऐसा राज्य था, जहां ‘न्याय’ कि सर्वत्र व्याप्ति हो. जहां प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यपालन में तल्लीन रहता हो.

प्रश्न उठता है कि व्यक्ति के कर्तव्य को परिभाषित कैसे किया जाए. वह कौनसा कार्य हो सकता है, जिसको करके कोई नागरिक आदर्श राज्य के निर्माण में अपना योगदान दे सकता है? प्राचीन यूनान, आमेर आदि राज्यों में पुत्र को वही कार्य करना पड़ता था, जो उसके पिता के लिए निर्धारित था. पीढ़ीदरपीढ़ी यही चलता रहता था. इस प्रणाली पर कोई सवाल नहीं खड़ा होता था. मगर प्लेटो के राज्य में स्थिति दूसरी थी. उसने बच्चों का पालनपोषण मातापिता से दूर, इस प्रकार करने की अनुशंसा की है, जिसमें मातापिता अथवा उनकी संतान कभी एकदूसरे की पहचान न कर सकें. दूसरे शब्दों में उसके राज्य में व्यक्ति का कोई निजी अभिभावक नहीं था. वहां संबंधों के वर्ग थे, जिसके अनुसार पिता की उम्र के सभी व्यक्तियों को पिता का दर्जा प्राप्त था और पुत्र की उम्र के युवाओं को पुत्र का. यही स्थिति स्त्री के साथ थी. ऐसी अवस्था में कार्यांतरण की प्राचीन यूनानी पद्धति वहां कारगर ही न थी. इसलिए व्यक्ति के कार्य का निर्धारण या तो राज्य की मर्जी से हो सकता था अथवा उसकी अपनी रुचि के आधार पर. यदि सबकुछ व्यक्ति की इच्छा पर छोड़ दिया जाए तो जो कार्य बहुत श्रम की अपेक्षा रखते हैं, जो बेहद हानिकर हैं, या जिनमें अप्रीतिकर हालात का सामना करना पड़ता है, उनका क्या होगा? बिना किसी प्रलोभन अथवा दबाव के समाज के लिए अनिवार्य होने के बावजूद, ऐसे कार्यों को भला कौन करना चाहेगा! स्पष्ट है कि इसके लिए सरकार को अलग से व्यवस्था करनी होगी. आदर्श राष्ट्रराज्य में यह दायित्व सरकार को खुद संभालना चाहिए. दार्शनिक सम्राट की संकल्पना के पीछे एक कारण यह भी था. प्लेटो का मानना था कि एक दार्शनिक सम्राट ही ऐसा करने में सक्षम हो सकता है. मगर सिर्फ विचार से तो समाज को नहीं चलाया जा सकता. विकास की गति को बनाए रखने के लिए नए आविष्कारों की भी जरूरत पड़ती है. राज्य में उत्पादन वृद्धि और तकनीकी शोध के लिए दार्शनिक सम्राट का क्या योगदान होगा, प्लेटो इस बारे में कोई सुझाव नहीं देता. इसका कारण दास के रूप में उपलब्ध अतिरिक्त और सस्ता श्रम भी हो सकता है. यहां प्लेटो की कल्पनाशीलता कोई नया आयाम नहीं गढ़ती. दार्शनिक सम्राट की अवधारणा वास्तव में प्लेटो का पूर्वग्रह था, जिसमें वह इतना आगे बढ़ जाता है कि ‘रिपब्लिक’ का संदेश ही बिगड़ जाता है. तो फिर प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ की देन क्या है? आधुनिक समाज उससे क्या ग्रहण कर सकता है? इस बारे में एक आलोचक की टिप्पणी है—

उत्तर है—गतिहीनता, ठहराव, एकरसता! इससे केवल युद्धकाल में सफल हुआ जा सकता है, वह भी तब जब सामना करीबकरीब बराबरी का हो. यह केवल छोटे समूह की आजीविका को सुरक्षित रख सकता है. जड़ सोच और कठोर नियमों के कारण इस व्यवस्था में निश्चितरूप से न तो विज्ञान का भला होगा, न ही कलाओं का.’

स्पार्टा और वहां की राजनीति ने अपने समकालीन जिन विचारकों को प्रभावित किया था, प्लेटो भी उनमें से एक था. अपने जीवन में उसने कई उतारचढ़ाव देखे थे, जिनमें उसके देश एथेंस की शर्मनाक पराजय तथा अकाल आदि सम्मिलित थे. इन सभी घटनाओं ने उसके संवेदनशील मन को गहराई से प्रभावित किया था. इसका स्पष्ट प्रभाव उसके राजनीतिक सोच पर देखने को मिलता है. वह मानता था राजनीतिज्ञों में सुधार के साथ इन आपदाओं से मुक्ति संभव है. कविहृदय प्लेटो का मनुष्यता में अटूट विश्वास था. उसके लेखन से सर्वत्र इसकी पुष्टि भी होती है. हालांकि वह या तो समझ नहीं पाया था अथवा स्वयं को जानबूझकर भुलावे में रखे था कि आदर्श सदैव व्यक्तिसापेक्ष होता है. उसके बारे में चर्चा भी वही करते हैं, जो उसमें विश्वास रखते हैं. पर अधिकांश व्यक्ति निजी सुखों को ही अहमियत देते हैं. उन्हें अपने लिए बेहतर भोजन, अच्छा आवास तथा अन्य सुखसुविधाएं चाहिए. तब आदर्श और सामान्य पसंदों के बीच अंतर कैसे किया जाए? वह कौनसा गुण है जो व्यक्ति की सामान्य पसंदों को आदर्श पसंदों का रूप दे दे सकता है? प्लेटो के अनुसार व्यक्ति की इच्छाएं कहीं न कहीं उसके अहं से प्रेरितप्रभावित होती हैं. अहं व्यक्ति को आत्मकेंद्रित एवं स्वार्थी बनाता है. इसलिए ‘आदर्श पसंदें’ वे पसंदें कही जा सकती हैं, जिनमें व्यक्ति के अहं का न्यूनतम प्रभाव हो. जो समाज की सामान्य इच्छाएं हों तथा व्यक्ति के निजत्व को सामान्यबोध की पहचान देती हों, उन्हें प्राथमिकता दी जाए. जैसे किसी व्यक्ति की यह इच्छा कि प्रत्येक व्यक्ति के पास पर्याप्त भोजन हो अथवा यह सोच कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के पास उत्तम आवास, वस्त्र तथा भोजन आदि की सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में हों. इस प्रकार की इच्छा के साथ व्यक्ति का अहं तिरोहित हो जाता है. किंतु सभी मनुष्य तो एकसमान नहीं होते. उनकी रुचियों, स्वभाव और पसंदों में स्वाभाविक अंतर होता है. ऐसे में इच्छाओं का समाजीकरण कैसे हो? कैसे उनके आदर्श स्वरूप को कायम रखा जाए? ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो इसकी भी व्याख्या करता है. उसके अनुसार अहं के तिरोहण के पश्चात इच्छाओं का सहज समाजीकरण संभव है. उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की दर्शन में रुचि है तो वह इच्छा कर सकता है कि समाज के सभी व्यक्तियों को दर्शन का भरपूर ज्ञान हो. ऐसे ही विज्ञान में रुचि रखने वाला व्यक्ति विज्ञान और कलाओं में रुचि रखने वाला व्यक्ति कलाओं के बारे में इच्छा व्यक्त कर सकता है. इच्छाओं का समाजीकरण क्या मानवस्वभाव से निरपेक्ष होगा? उदारतापूर्ण इच्छाएं अपने समन्वयीकरण की प्रक्रिया में समाज में अपनी ही जैसी इच्छाओं को बढ़ावा देंगी. इससे व्यक्ति के निजी स्वार्थ में कमी आएगी. समाज में निजी संपत्ति की अवधारणा कमजोर पड़ेगी, फलस्वरूप आर्थिक समानता के स्तर को बनाए रखना आसान होगा.

इच्छाओं और पसंदों का सामान्यीकरण जितना आसान दिखता है, उतना होता नहीं. यदि व्यक्ति का पालनपोषण भिन्न परिस्थितियों में हुआ हो तो यह और भी कठिन हो जाता है. विकास की भिन्न स्थितियां तथा तज्जनित विषमताएं मतभेदों को जन्म देती हैं. मतभेद हों तो व्यक्तिगत इच्छाएं अहं से संचालित होने लगती हैं. जैसे राष्ट्रीय भावना से प्रेरित कोई व्यक्ति यह इच्छा रख सकता है कि सभी जर्मनवासी प्रसन्न हों. पर कोई दूसरा व्यक्ति इसपर आपत्ति कर सकता है कि सिर्फ जर्मनवासी क्यों, दुनिया में जितने भी लोग हैं, सभी प्रसन्न रहने चाहिए. यह समस्या प्लेटो के दिमाग में भी रही होगी. इसलिए वह समाधान भी देता है. समाधान उसके इस विश्वास से जन्म लेता है कि मनुष्य मूलतः अच्छा प्राणी होता है. प्लेटो के अनुसार व्यक्ति का सामान्य मनोविज्ञान यह है कि वह व्यक्तिविशेष अथवा कुछ व्यक्तियों के अप्रसन्न रहने की इच्छा तो कर सकता है, किंतु दुनिया के अधिकांश लोगों के अप्रसन्न होने की चाहत व्यक्ति के सामान्य मनोविज्ञान के विरुद्ध है. इसलिए ऊपर के उदाहरण में दूसरे व्यक्ति की इच्छा जो दुनियाभर के लोगों के प्रसन्न होने की कामना करता है, पहले व्यक्ति पर, जो केवल जर्मनवासियों के प्रसन्न होने की इच्छा रखता है, मनोवैज्ञानिक दबाव बना सकती है. इच्छाओं के सार्वजनिक प्रकटीकरण के अवसर पर वह अपने अहं को आहत महसूस कर सकता है. यह उसको अपनी राष्ट्रभावना के विरुद्ध भी लग सकता है. इसके बावजूद सार्वजनिक रूप में उसको दूसरे व्यक्ति की भावनाओं का सम्मान करना पड़ेगा. सच यह भी है कि व्यवहार में निरपेक्ष आदर्श जैसा कुछ हो ही नहीं सकता. व्यक्ति की अभिप्रेरणाएं उसकी रुचियों, स्वभाव, सोच और परिस्थितियों द्वारा संचालित होती हैं. नीत्शे के महामानव की संकल्पना ईसाई परंपरा में संत की अवधारणा से एकदम भिन्न है. लेकिन नीत्शे पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि उसकी महामानव की संकल्पना के पीछे उसका कोई स्वार्थ था. सच तो यह है कि समाज की बेहतरी के लिए ईसाई परंपरा में संत जो काम करते हैं, विचारक के नाते नीत्शे ने महामानव की संकल्पना भी समाज की बेहतरी को ध्यान में रखकर की थी. इसलिए नीत्शे के विचारों की आलोचना की जा सकती है, किंतु उसकी नीयत पर संदेह करना सर्वथा अनुचित होगा. अज्ञानता के कारण ही सही प्राचीन भारत और विश्व में पशुबलि को मानवकल्याण के लिए जरूरी माना जाता रहा है. भारत में जब बौद्ध धर्म का उदय हुआ तो महात्मा बुद्ध ने केवल पशुबलि का जोरदार विरोध किया था, बल्कि आत्मा और परमात्मा जैसे विषयों पर चर्चा को भी अनावश्यक माना, जिनपर उनसे पहले का लगभग पूरा का पूरा भारतीय दर्शन निर्भर था. चूंकि बौद्ध दर्शन वृहद जनसमाज के हितों का पक्ष लेता था तथा पशुबलि का निषेध लोगों के आर्थिकसामाजिक विकास से भी जुड़ा था, इसलिए ऐसे लोगों ने बौद्ध धर्म को हाथोंहाथ अपनाया जो पिछली व्यवस्था में अभाव और उत्पीड़न झेलते आए थे.

इच्छाओं का सर्वथा निरपेक्ष सामान्यीकरण असंभव है. दो इच्छाओं के बीच चयन उस समय तक असंभव है, जब तक व्यक्ति का किसी एक इच्छा की ओर अपना झुकाव न हो. यदि उनमें से एक भी इच्छा से उसकी सहमति नहीं है तो वह उनका विरोध करेगा. नैतिक असहमति के संभव नहीं है. जहां नैतिक सहमतिअसहमति आसान न हो, वहां बलप्रयोग भी संभावना भी बनी रहती है. संभवतः इसी भावना से प्रेरित होकर ‘रिपब्लिक’ का एक पात्र थरसाइमचस, जो प्लेटो ने वास्तविक जीवन से उठाया था, न्याय पर चर्चा करते हुए उग्र हो जाता है—

न्याय ताकतवर के हितलाभ के सिवाय कुछ नहीं है.’

हालांकि सुकरात ने इस तर्क का विरोध किया था, लेकिन वहां भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल पाता. सच तो यह है कि ‘न्याय’ की संकल्पना पर कभी गंभीरतापूर्ण विचार संभव ही नहीं हुआ. इसने न्यायविद्ों और राजनीति विज्ञानियों के लिए सदैव समस्याएं उत्पन्न की हैं. उनमें से एक बड़ी समस्या है कि ‘अच्छे’ और ‘बुरे’, ‘पाप’ और ‘पुण्य’ की तार्किक व्याख्या कैसे संभव हो? वे कौन से मानक हैं, जिनके आधार पर इनके बीच एक स्पष्ट विभाजनरेखा खींच पाना संभव है? यह समस्या प्लेटो के सामने भी थी. वह विविध स्थितियों की व्याख्या करता है, जिन्हें न्यायसंगत माना जा सकता है. लेकिन संवाद के दौरान कोई न कोई पक्ष सदैव असंतुष्ट बना रहता है. इसलिए उसने ‘आदर्श पसंदों’ का अपना विचार भी सामने रखा. ‘आदर्श पसंदों’ का अभिप्राय था, जिन्हें अधिकतम लोग पसंद करते हों या जिनसे अधिकांश की सहमति हो. लेकिन परोक्ष में तो यह बहुमत की दादागिरी ही हुई. प्लेटो यह समझता था, मगर उसके सामने अपने आदर्श नगरराज्य की समृद्धि और सुरक्षा का मसला बहुत बड़ा था. इसलिए न्याय पर चर्चा करते हुए उसकी अन्यान्य स्थितियों पर चर्चा करता है तथा निर्णय पाठक के विमर्श के लिए छोड़ देता है. उसके लिए यह समीचीन भी था.

धर्म भी न्याय को परिभाषित करने का प्रयास करता है, किंतु एक सपाटसी व्याख्या में वह कह देता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा—इसका निर्धारण ईश्वर करता है. अतः हर वह व्यक्ति जो ईश्वेच्छा को सहर्ष स्वीकार लेता है, उसको अपनी इच्छा मान लेता है—वही सत्पुरुष है. धर्माचार्य दावा करते हैं कि ईश्वर परमशुभ, शुभ की आश्रयस्थली है. उनके अनुसार ईश्वर चूंकि परमकल्याणकर्ता है, अतएव उसकी इच्छा और कर्तव्यों को शुभ का आधार माना जा सकता है. पर ईश्वर की इच्छा जाहिर कैसे हो? यह कैसे तय हो कि ईश्वर यही चाहता है? क्या ऐसा कोई रास्ता नहीं है, जिससे ईश्वरेच्छा का सटीक अनुमान लगाया जा सके? जिसको ईश्वरेच्छा बताकर आरोपित किया जाता है, उसके प्रमाणन का रास्ता क्या हो? चूंकि ऐसा कोई रास्ता व्यवहार में संभव नहीं है, अतएव उसके अनुयायी इसको आस्था का विषय बनाकर आरोपित करने का प्रयास करते हैं.

सच तो यह है कि जिसे ईश्वरेच्छा बताकर उसके अनुयायियों द्वारा आरोपित किया जाता है, वह वास्तव में उसके अनुयायियों की ही इच्छा होती है. धर्म और ईश्वरेच्छा के नाम पर ऐसे पाखंड पुरोहित वर्ग सहस्राब्दियों से रचता आ रहा है. दरअसल ‘शुभ’, ‘अशुभ’, ‘पाप’, ‘पुण्य’ आदि अवधारणाएं व्यक्तिसापेक्ष होती हैं. ‘वस्तुनिष्ठ सत्य’ जैसा कुछ नहीं है. हां, सीमित संदर्भों में व्यक्ति ‘सत्य’ अथवा ‘असत्य’ के बारे में अनुमान अवश्य लगा सकता है. ठीक ऐसे ही जैसे यह जान लेना कि ‘वर्फ’ सफेद है. यहां सफेद रंग वर्फ की मूल पहचान है, परंतु यह संज्ञा मनुष्य की ओर से ही एक रंग विशेष के नाम की गई है. उससे तुलना के आधार पर कोई व्यक्ति वर्फ के रंग का बयान कर सकता है. पर यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने सफेद वर्फ कभी देखी ही न हो, वह वर्फ के रंग के बारे में दावे के साथ कोई बात नहीं कह सकता. तो भी सामान्य जानकारी में यह कहना कि वर्फ सफेद होती है, कि महात्मा गांधी की हत्या हुई थी, कि जवाहर लाल नेहरू इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे, कि 1947 में भारत का विभाजन एक सच्ची ऐतिहासिक घटना है जैसी कुछ बातें हैं जो लोकसम्मति के आधार पर सच मान ली जाती हैं.

प्लेटो मानता था कि ‘शुभ’ की सत्ता है तथा उसको पहचाना जा सकता है. अपने आदर्शलोक में वह उन स्थितियों पर जोर डालता है, जिनके द्वारा मनुष्य के आचरण को नैतिक बनाए रखकर शुभ की संभावना को बढ़ाया जा सकता है. उसका मानना था कि आदर्श गणतंत्रात्मक राज्य भी अपने आप में ‘शुभ’ है. हालांकि गणतंत्र की कोई स्पष्ट परिभाषा वह नहीं देता. जिस आदर्शलोक की परिकल्पना वह ‘रिपब्लिक’ में करता है, उसमें जबरदस्त आर्थिकसामाजिक स्तरीकरण है. निकृष्ट दासप्रथा है, जिसके कारण लाखों लोगों को गुलाम के रूप में जिंदगी बसर करनी पड़ती है. प्लेटो उस प्रथा का समर्थन करता है. अतः ऐसे अनेक बुद्धिजीवी होंगे जिन्हें प्लेटो की यह स्थापना अस्वीकार्य होगी. स्वयं प्लेटो के समय में भी उसके कई आलोचक और विरोधी थे. उनका उत्तर प्लेटो के समकालीन और ‘रिपब्लिक’ के एक पात्र थरसाइमचस ने दिया था. उसका कहना था कि प्लेटो से सहमति अथवा असहमति का प्रश्न ही नहीं है. प्रश्न सिर्फ यह है कि आप प्लेटो के आदर्शलोक की स्थापना से कितने और कहां तक सहमत हैं. यदि आप उससे सहमत हैं तो यह आपके लिए शुभ है; और यदि आप उससे असहमत हैं तो निश्चय ही यह आपके लिए बुरा है. आशय है कि प्लेटो के दर्शन में ऐसा बहुत कुछ है, जो उससे असहमति से बावजूद बुद्धिजीवियों को प्रेरित और आकर्षित करता रहा है. उसके आदर्शलोक की विशेषता यह भी है कि वह केवल बौद्धिक विमर्श और कागजों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी स्थापना वास्तविक धरातल पर संभव हुई थी. उसके अनेक प्रावधान जिन्हें अव्यावहारिक माना जाता है, जैसे बच्चों को उनके मातापिता से दूर रखकर उनकी पहचान को छिपाकर पालनापोसना स्पार्टा से लिए गए थे. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग भी अनेक राज्यों में आजमाया जा चुका था. अनेक सम्राट ऐसे थे जो अपने राज्यों में दार्शनिकों को उच्च स्थान पर रखते थे, यद्यपि ऐसे राज्यों की सफलता के बारे में सटीक टिप्पणी कर पाना संभव नहीं है. सही मायने में प्लेटो सबसे पहला साम्यवादी था, जिसने एक ऐसे समाज का सपना देखा था, जहां संसाधनों का उपयोग संपूर्ण समाज के भले के लिए किया जाता हो. इसलिए उन सबके लिए वह आज भी सम्मानेय है, जो आमूल परिवर्तन का सपना अपनी आंखों में पाले हुए हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

2 टिप्पणियाँ

Filed under प्लेटो : स्वप्नदृष्टा दार्शनिक, प्लेटो का राजनीतिक दर्शन

2 responses to “प्लेटो का राजनीतिक दर्शन : परमशुभ की साधना

  1. दिनेशराय द्विवेदी

    इस चिट्ठे पर बहुत सी उपयोगी जानकारियाँ हैं। आभारी हूँ, चंदन कुमार मिश्र का जिसने मुझे यहाँ का पता दिया।

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