प्लेटो : स्वप्नदृष्टा दार्शनिक-दो

शिक्षा

बचपन से ही प्लेटो ने दिखा दिया था कि वह अतुलनीय मेधावी और असामान्य तीक्ष्ण बुद्धि से संपन्न है. बचपन में ही उसने प्राचीन यूनानी कवियों होमर, हेसोद आदि की रचनाओं का अध्ययन किया था. अनेक रचनाएं तो उसको पूरी तरह कंठस्थ हो चुकी थीं, जो युवावस्था में उसके काव्यानुराग की प्रेरणा बनीं. हालांकि सुकरात से मुलाकात के बाद उसने न केवल कविताओं से अपना पीछा छुड़ा लिया, बल्कि अपनी उस समय तक की रचनाओं को भी आग के हवाले कर दिया. उन दिनों एथेंस में सार्वजनिक विद्यालय नहीं थे. अध्यापन का कार्य सोफिस्टों के जिम्मे था, वे निजी विद्यालयों में गणित, दर्शन, व्याख्यान विद्या और व्यावहारिक विज्ञान की शिक्षा देते थे. उन विद्यालयों में केवल अभिजात्य वर्ग के विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर पाते थे. प्लेटो ने ऐसे ही एक विद्यालय में प्रवेश लिया था. उसको पाठशाला तक लाने-ले जाने के लिए एक दास नियुक्त था, जिसको ‘ट्यूटर’ कहा जाता था. उस समय यूनान में स्त्रियों की शिक्षा के प्रति जागरूकता का अभाव था. प्लेटो को जहां निजी विद्यालय में अध्ययन के लिए भेजा गया था, वहीं उसकी बहन को घर पर रहकर शिक्षा दिलाने का प्रबंध किया गया था. शिक्षा के मामले में स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव को प्लेटो ने गहराई से अनुभव किया था. इसलिए अपने आदर्श राज्य की संकल्पना में उसने दोनों के लिए एकसमान शिक्षा पर जोर दिया है. अस्तु, उस विद्यालय में प्लेटो ने अंकगणित की शिक्षा प्राप्त की. उन दिनों प्राचीन यूनानी काव्य में पारंगत होना विशेष योग्यता मानी जाती थी. अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का परिचय देते हुए प्लेटो ने उपलब्ध यूनानी काव्य का गहरा अध्ययन किया. होमर के साहित्य को पूरा कंठस्थ कर उसने अपने गुरुजनों को हैरत में डाल दिया था. प्लेटो के जीवनीकार डायोजिनिस ने उसको मेहनती और पढ़ने-लिखने में मन लगाने वाला विद्यार्थी कहा है. उसके अनुसार प्लेटो अद्भुत प्रतिभाशाली था. उसको ईश्वरीय वरदान प्राप्त था, उसी के फलस्वरूप उसकी मेधा विलक्षण थी. वह पाठ को बहुत जल्दी याद कर लेता था. उसका गला भी सुंदर था. प्राचीन कवियों की रचनाओं को सस्वर गाकर वह सबको हैरत में डाल देता था. प्लेटो की कविता और गायन कला पर पकड़ उसकी संवाद-पुस्तक ‘प्रोटेगोरस’ में दिखाई पड़ती है. उसकी यह मान्यता थी कि बच्चों के मस्तिष्क को छोटी और सुरीली कविताओं से समृद्ध किया जाना चाहिए. ताकि वे संवेदनशील बनें और समाज में रहकर बाकी लोगों से अच्छा तालमेल बना सकें. राजपरिवार से संबंध होने के कारण शारीरिक सौष्ठव और व्यायाम का प्रशिक्षण भी अनिवार्य था. इसके लिए वह नियमित रूप से व्यायामशाला जाता था. नियमित व्यायाम को उसने शिक्षा के अनिवार्य हिस्से के रूप में उल्लिखित किया है. अपनी पुस्तक ‘लाज’ में उसने लिखा है कि किशोरावस्था में कदम रखने के साथ ही बालक को एक कुशल स्वास्थ्य प्रशीक्षक के सुपुर्द कर देना चाहिए.

प्लेटो का विश्वास था कि केवल दार्शनिक ही अच्छे शासक हो सकते हैं. मगर उनके लिए भी शिक्षा अनिवार्य है. किसी भी अन्य बालक की भांति किशोर दार्शनिक को भी मानसिक और शारीरिक रूप से परिपुष्ट होना चाहिए. इसके लिए उसको योग्य अध्यापकों के निर्देशन में व्याकरण जिसमें लिखना और पढ़ना सम्मिलित है, चित्रकला तथा शारीरिक व्यायाम के बारे में बताया जाना चाहिए. स्वयं प्लेटो नियमित रूप से जमकर व्यायाम करता था. वह कई खेलों में पारंगत था और अपने समकालीन युवाओं को छका देता था. सुकरात से मिलने से पहले प्लेटो दर्शनशास्त्र की नियमित कक्षाओं में हिस्सा ले सकता था. सबसे पहले वह उस समय के महान दर्शनशास्त्री क्रेटीलस के संपर्क में आया, जो हेराक्लाटस का शिष्य था. हेराक्लाइटस की गिनती सुकरात से पहले के महान यूनानी दार्शनिकों में होती है. क्रेटीलस ने उसको उस समय तक प्रचलित दार्शनिक विचारधाराओं का बोध कराया, जिसमें प्लेटो ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए अल्प समय में ही विशेषज्ञता प्राप्त कर ली. प्लेटो की रचनात्मक प्रतिभा के दर्शन उसकी किशोरावस्था से ही होने लगे थे. यूनान के प्रतिभाशाली व्यक्तियों की तरह उसने अध्ययन के दौरान ही कविताएं लिखना आरंभ कर दिया था. युवावस्था के दिनों में उसने कविताएं, गीत, धार्मिक कविताएं आदि खूब रचीं. एक नाटक पुस्तक की रचना भी की. मगर सुकरात से भेंट के बाद उसके परंपरागत लेखन पर विराम लग गया. सुकरात से उसकी मुलाकात मानो उसके कायाकल्प की घटना थी, जिसने दुनिया को एक अप्रतिम आदर्शवादी विचारक, दर्शनशास्त्री प्लेटो को जन्म दिया. सुकरात के विचारों से प्रभावित होकर उसने अपनी सारी कविताएं, नाटक आदि आग के हवाले कर दिए तथा स्वयं को दर्शनशास्त्र के अध्ययन-लेखन तक सीमित कर दिया. प्रसंगवश बता दें कि उन दिनों दर्शनशास्त्र का विषयक्षेत्र बहुत व्यापक था. राजनीति, विज्ञान, अर्थशास्त्र, कानून, समाज, तत्वविज्ञान, अध्यात्म आदि उसी का हिस्सा माने जाते थे. सुकरात और प्लेटो की पहली मुलाकात को लेकर एक दंतकथा यह भी है कि सुकरात ने प्लेटो से मिलते ही कहा था कि एक हंस उसकी शरण में आया है. कुछ अनाम कवियों ने उस अवसर को महिमामंडित करते हुए कविताएं भी लिखी हैं. किंतु उनकी ऐतिहासिकता को लेकर सटीक टिप्पणी संभव नहीं है. आधुनिक विद्वानों का मानना है कि जिन दिनों प्लेटो की सुकरात से पहली भेंट हुई, वह युवा था. उस समय तक सुकरात सोफिस्टों की व्यंग्यात्मक आलोचना के कारण काफी ख्याति बटोर चुका था. उसकी वक्रोक्तियां लोगों की जुबान पर चढ़ी थीं. प्लेटो का एक चाचा चारमिंडस तथा उसका एक और संबंधी क्राइटिइस सुकरात के निकट मित्रों में थे. इस तथ्य की ऐतिहासिकता पर सटीक टिप्पणी करना इसलिए कठिन है, क्योंकि सुकरात ने स्वयं कुछ नहीं लिखा. उसके बारे में जो भी लिखित सामग्री है, वह प्लेटो तथा उसके अन्य शिष्यों द्वारा लिखी गई है. सुकरात से भेंट के पश्चात प्लेटो ने स्वयं को अध्ययन और लेखन तक सीमित कर दिया. यद्यपि उसके परिवार की आर्थिक-राजनीतिक हैसियत को देखते हुए उसके पास एथेंस की राजनीति में जगह बनाने के भरपूर अवसर थे. यदि ऐसा हो जाता तो महान दार्शनिक सुकरात का वह मेधावी शिष्य अधिक से अधिक रोम के विलासी सम्राटों-शासकों में अपना नाम लिखवाने में कामयाब हो जाता, किंतु उसने तो अपने लिए स्वतंत्र मार्ग चुना था. निश्चित रूप से इस चयन के पीछे प्रेरणा सुकरात की ही थी.

सिसली की यात्रा
सुकरात को दंडित किए जाने की घटना ने प्लेटो को आहत कर दिया था. उसे राजनीति से ऊब होने लगी थी. एथेंस की हवा में उसका दम घुटने लगा था. इसलिए कुछ समय के लिए उसने बाहर जाने का निर्णय किया और एक लंबी यात्रा पर प्रस्थान कर गया. यात्रा के लिए कोई पूर्वनिर्धारित गंतव्य नहीं था. केवल मन में एथेंस के राजनीतिक परिदृश्य से जन्मी आकुलता थी, वही उसे एथेंस के जड़-परिवेश से दूर निकलने के लिए उकसा रही थी. कालांतर में वही वैकल्पिक राजनीतिक दर्शन की खोज की प्रेरणा बनने वाली थी. उस यात्रा से, संभवतः वह अपने मन के उस खालीपन को भी भरना चाहता था, जो गुरु सुकरात को अचानक मृत्युदंड दिए जाने से उत्पन्न हुआ था. यात्रा के पहले पड़ाव के रूप में उसने मेगरा को चुना. वहां उन दिनों यूक्लिड की धूम मची थी. गणित प्लेटो की रुचि का विषय था. मेगरा में रहते हुए उसने यूक्लिडीय ज्यामिति का गहरा अध्ययन किया. पर उसका अशांत मन वहां बहुत दिनों तक विश्राम न पा सका. कुछ दिन वहां प्रवास करने के उपरांत वह दक्षिणी इटली की ओर प्रस्थान कर गया. मेग्ना ग्रेशिया उन दिनों यूनान के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में ख्यात था. असल में वह दक्षिणी इटली के समुद्र तटीय इलाके में बसा छोटे-छोटे नगरों का समुच्चय था, जिसको व्यापारिक गतिविधियों ने जोड़ा हुआ था. व्यापारिक केंद्र होने के साथ वह गणितज्ञों और वैज्ञानिकों का ठिकाना भी था. मेग्ना ग्रेशिया प्रवास के दौरान प्लेटो पाइथागोरेस के अनुयायियों से मिला, जिनका उसपर गहरा असर पड़ा. इसी से उसके मन में अंकगणित के प्रति अनुराग का जन्म हुआ जो जीवनपर्यंत बना रहा. वह टेरेंटम में रह रहे, उस समय के प्रख्यात वैज्ञानिक आक्रिटस के संपर्क में भी आया. मेग्ना ग्रेशिया व्यापारिक केंद्र के रूप में विख्याता महानगर था, वहां की आबोहवा भी दिलकश थी. लेकिन वह भी प्लेटो के अशांत मन को लंबे समय तक बांधने में असमर्थ रही. उसका अगला पड़ाव सिसली था. उन दिनों सिसली पर डायोनिसियस प्रथम का अधिकार था. वह निरंकुश सम्राट था. उसका खास शौक था, प्रतिभाशाली लोगों को अपने दरबार में रखना. इसलिए नहीं कि उनके ज्ञान और अनुभव का लाभ उठाया जा सके, बल्कि इसलिए कि उसके माध्यम से अन्य राजाओं पर अपनी बुद्धिमत्ता की धाक जमाई जा सके. उसके दरबार में अनेक वैज्ञानिक, दर्शनशास्त्री, कवि, साहित्यकार, संगीतज्ञ आदि नियुक्त थे. सिसली प्रवास के दौरान प्लेटो की धारणा बनी कि शासन का दायित्व दर्शनशात्री को सौंपा जाना चाहिए. उसका विश्वास था कि दार्शनिक अधिक धैर्यवान, करुणाशील एवं शांतिप्रिय होते हैं. इसलिए उनसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर प्रजा-कल्याण के लिए अधिक कारगर नीतियांे पर काम करेंगे. उसका मानना था कि राजा को निजी महत्त्वाकांक्षाओं, भोगविलासों, बहादुरी के दंभ-भरे कारनामों का बखान करने के बजाय स्वयं को नैतिक मूल्यों के विकास के प्रति समर्पित कर देना चाहिए. प्लेटो की उस सलाह पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.

प्लेटो की रचनाओं में मिस्र के प्राचीन नगरों का भी उल्लेख हुआ है. इसलिए यह संभावना भी व्यक्त की जाती है कि उस यात्रा के दौरान उसने मिस्र के प्रख्यात नगर हेलियोपोलिस का भी भ्रमण किया था. प्लेटो ने लिए वह यात्रा नए अनुभव बटोरने की थी. उस समय वह अपनी वयस् के चालीसवें वर्ष से गुजर रहा था. यात्रा के दौरान उसकी लेखनी अनवरत-अविराम चल रही थी. लोग भी उसको पहचानने लगे थे. अंततः बारह वर्ष तक विभिन्न देशों की अनवरत यात्रा के बाद वह एथेंस वापस लौट आया.

सायराकस प्रवास के दौरान वह डायोन के संपर्क में आया था, जो वहां के निरंकुश सम्राट डायोनिसियस प्रथम का निकट का रिश्तेदार था. अपुष्ट òोतों के अनुसार उसने डाओन को शिक्षा भी दी. प्लेटो के एथेंस वापस लौटने के कुछ ही वर्षों पश्चात डायोनिसियस प्रथम की मृत्यु हो गई. प्लेटो को डीओन की ओर डायोनिसियस द्वितीय की शिक्षा के लिए निमंत्रण प्राप्त हुआ. उस समय तक वह सुकरात की छाया से बाहर आ चुका था. हालांकि अपने गुरु के प्रति उसके सम्मान में किंचित कमी नहीं आई थी. अब उसको लगने लगा था कि राजनीति, दर्शन, कानून आदि को लेकर उसके जो विचार हैं, उन्हें स्वतंत्र रूप में भी प्रकट किया जा सकता है. डीओन के आमंत्रण को स्वीकार कर वह साइराकस के लिए रवाना हो गया. वहां पहुंचने पर उसका जोरदार स्वागत किया गया. गणित प्लेटो का प्रिय विषय था. उसको वह कुशल दर्शनशास्त्री बनने की पहली सीढ़ी मानता था. डीओन स्वयं भी गणित और दर्शनशास्त्र में रुचि रखता था. उसने सम्राट के दुर्ग को ज्यामितीय रचनाओं के अनुसार तैयार करवाया था, जो अपने समय का अनोखी और विशिष्ट वास्तुरचना थी. डीओन के जीवनीकार प्लूटार्क ने उस दुर्ग का वर्णन किया है. उसने लिखा है कि दुर्ग में बुरादे का चबूतरे बनवाकर उनके ऊपर त्रिभुज, वृत आदि विभिन्न ज्यामितीय रचनाओं को दर्शाया गया था. पाइथागोरेस की प्रमेय का चित्रण भी एक स्थान पर था. उस समय जब अधिकांश सम्राट शिकार करने, अपने महलों में सुंदर स्त्रियों की भरमार करने के लिए राज्य का अधिकांश श्रमबल और ताकत झोंक देते थे, डीओन की कल्पना पर निर्मित वह दुर्ग गणितीय आकृतियों पर आधारित विशिष्ट रचना थी. प्लेटो कुशल अध्यापक था, किंतु उसका युवा शिष्य डायोनिसियस द्वितीय उतना प्रतिभाशाली न था. वह पढ़ते हुए बहुत जल्दी थक जाता था. उसका मन शिकार खेलने जैसे विलासितापूर्ण कार्यों में अधिक लगता था. डीओन से उसको ईष्र्या थी, इसलिए वह उसको पहले ही निष्कासित कर चुका था. अपने श्रम का कोई लाभ न देख प्लूटो वहां से ऊब गया और एथेंस वापस लौट आया. वापस लौटकर उसने शिक्षा केंद्र के रूप में अपनी महत्त्वाकांक्षी परियोजना के अंतर्गत ‘अकादमी’ की स्थापना की और खुद को अकादमी की सफलता के प्रति समर्पित कर दिया.

प्लेटो के प्रयासों से अकादमी की प्रतिष्ठा दिनोंदिन बढ़ रही थी. तभी उसको सायराकस से तीसरा निमंत्रण प्राप्त हुआ. उस समय वह वृद्धावस्था की ओर बढ़ चला था. एक सफल लेखक, विचारक और दार्शनिक के रूप में भी उसकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ती ही जा रही थी. हालांकि सायराकस के तीसरे दौरे के लिए प्लूटो पहले ही अपनी सहमति दे चुका था. मगर वह यात्रा उसके लिए विशेष कष्टकारी सिद्ध हुई. उसके पहुंचने के एक महीने के अंदर ही डायोनिसियस द्वितीय ने प्लूटो के मित्र और शुभचिंतक डीओन को देश-निकाले की सजा सुना दी. यही नहीं प्लूटो को डीओन का मित्र और समर्थक मानते हुए तानाशाह सम्राट ने नजरबंद बना लिया गया. आखिर बुलावे पर सायराकस लौट आने का वचन देने पर सम्राट ने उसको मुक्त किया. इस घटना का उल्लेख प्लूटो ने अपनी 7’वीं पत्र-रचना में किया है. अपुष्ट स्रोत यह भी बताते हैं कि डायोनिसियस द्वितीय प्लेटो से नाराज हो गया था तथा उसने प्लेटो को दास के रूप में बेचने का पूरा इंतजाम भी कर दिया था. उस समय आक्रिटस ने उसकी मदद की, जिसके फलस्वरूप वह एथेंस वापस लौटने में सफल हो सका. कुछ दिन पश्चात निर्वासन की सजा काट रहा डीओन भी एथेंस पहुंच गया. दोनों की मुलाकात अकादमी परिसर में हुई. डीओन प्लेटो की अकादमी को देखकर बहुत प्रसन्न था. उसके बाद वह चार वर्षों(465—361 ईसा पूर्व) तक एथेंस में ही रहा. इस बीच उसको तानाशाह डायोनिसियस की ओर से एक और निमंत्रण मिला. इस बार प्लेटो ने उस निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया. इस घटना को एक वर्ष नहीं बीता था कि प्लेटो को डायोनिसियस की ओर से एक और बुलावा आया. इस बार उसने प्लेटो के मित्र एक्रेडेमस को जहाज पर प्लेटो को लिवाने के लिए भेजा था. डायोनिसियस द्वितीय की धूर्तता को समझते हुए प्लेटो चैथी बार सायराकस जाने के लिए कतई तैयार न था, किंतु उसके मित्र डीओन ने एक योजना के तहत उसको आमंत्रण स्वीकार कर लेने की सलाह दी. डीओन के आग्रह पर प्लेटो सायराकस की चैथी यात्रा को तैयार हो गया. मगर स्थितियां फिर उसके प्रतिकूल थीं. डायोनिसियस ने विश्वासघात करते हुए उसको एक बार फिर कारावास में डाल दिया. इस बार प्लेटो के कुछ मित्रों ने उसकी मदद की, तभी वह कारागार से मुक्त हो सका.

इस बीच डीओन ने भाड़े के सैनिकों को जुटाकर एक सेना तैयार की और अपनी मातृभूमि पर धावा बोल दिया. युद्ध में उसको सफलता मिली और सिसली उसके कब्जे में आ गई. किंतु उसको मिली सफलता अल्पकालिक सिद्ध हुई. वह कुछ ही दिन राज कर पाया था कि एक विश्वासघाती ने उसकी हत्या कर दी. सिसली में एक बार फिर अराजकता का छा गई. इस घटना ने प्लेटो को बुरी तरह आहत कर दिया. वह निराशा से भर उठा. उसकी हताशा और अवसाद का एक कारण यह भी था कि डीओन की हत्या कर, राजसत्ता पर कब्जा कर लेने वाला विश्वासघाती उसका अपना ही शिष्य केलीप्पस था. इस घटना से प्लेटो का राजनीति से ही विश्वास हट गया था. इसलिए सायराकस को अलविदा कहकर वह वापस अपनी अकादमी में लौट आया. उस समय वह बूढ़ा हो चला था. अपने जीवन के शेष तेरह वर्ष उसने अकादमी में रहकर बिताए. 347(कुछ विद्वानों के अनुसार 348) ईसा पूर्व जब उसकी मृत्यु हुई, उस समय उसकी उम्र लगभग 80 वर्ष थी. इतिहासविद् डायोजिनिस के अनुसार उसको अकादमी के परिसर में ही दफनाया गया था, यद्यपि उसके मकबरे की खोज अभी तक नहीं की जा सकी है.

प्लेटो पर अपने समकालीन जिन लेखकों का प्रभाव पड़ा था, उनमें हेराक्लिीटस, पेरामेंडिस, जीनो तथा सुकरात प्रमुख हैं. इनके अलावा वह, स्पार्टा के राजनीतिक परिवेश, वहां की नीतियों तथा पाइथागोरेस के अनुयायियों से भी प्रभावित-प्रेरित था. प्लेटो के तत्वदर्शन पर पेरामेंडिस का प्रभाव है. जबकि जीनों से वह इतना प्रभावित था कि उसको अपनी एक संवादिका में स्थान दिया है. सुकरात तो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में प्लेटो का नायक है ही. उसका लेखनकाल पचास वर्ष से अधिक विस्तृत है. इस अवधि में कभी ऐसा नहीं हुआ कि उसने सुकरात को विस्मृत किया हो, या उसकी उपेक्षा की हो. केवल एक पुस्तक को छोड़कर सुकरात उसकी सभी पुस्तकों में महत्त्वपूर्ण पात्र के रूप में उपस्थित है, जो उसकी अपने गुरु के प्रति निष्ठा को दर्शाता है. उसके राजनीतिक विचारों पर हेराक्लाइटस सहित पाइथागोरेस के अन्य अनुयायियों का प्रभाव है. उन्हीं को पढ़ते हुए प्लेटो के मन में गणित के प्रति विशेषानुराग पैदा हुआ था. हालांकि गुरु सुकरात की भांति प्लेटो भी कविता और कवियों को नापसंद करता था. उसके अनुसार कवि बात को आलंकारिक भाषा में बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं. उनका जोर सत्य को यथातथ्य प्रस्तुत करने के बजाय उसको चामत्कारिक बनाने पर होता है. इस कारण कविता अपना असर खो देती है. इसके बावजूद परोक्षरूप में ही सही उसके लेखन पर प्राचीन यूनानी कवियों होमर और हेसोद का भी प्रभाव भी है. प्लेटो के लेखन में जो अद्भुत तरलता एवं लालित्य है, वह बिना संवेदनशील मनस् के संभव ही नहीं है.

प्लेटो का योगदान

प्लेटो के दर्शन को यदि किसी एक शब्द में अभिव्यक्त करने को कहा जाए तो उसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त शब्द होगा—आदर्श. दूसरा एक शब्द जो इसके विकल्प के रूप में संभव है, वह है—नैतिकता. वस्तुतः प्लेटो ने जिस आदर्श समाज का सपना देखा था, वह तभी संभव है, जब उसके शासकगण अपने आचरण को नैतिकता की कसौटी पर कसते रहें. उनमें आत्मावलोकन का गुण हो. वे पर्याप्त संवेदनशील तथा अपने कर्तव्य को समझने वाले हों. जो विलासिता से दूर सादगीपूर्ण जीवन पसंद करते हों. उनमें अपना पक्ष प्रस्तुत करने का सलीका हो तथा विरोधी की बात सुनने का धैर्य. प्लेटो स्वयं एक भावुक एवं संवेदनशील इंसान था. मन का सच्चा और खरा. गुरु सुकरात का मानना था कि सृष्टि में कोई ऐसा प्राणी नहीं जो बुराई की कामना करता हो. मूलतः सभी शुभत्व के समर्थक हैं. शुभत्व केवल सद्गुण द्वारा संभव है, जो वास्तविक ज्ञान से जन्म लेता है. गुरु सुकरात की भांति प्लेटो ने भी आदर्श समाज का सपना देखा था. जहां कानून का राज हो. मगर कानून का कर्तव्य अपने नागरिकों को अनुशासन में बांधने तक सीमित नहीं है. बलप्रयोग से जेलखाना तो चलाया जा सकता है, समाज नहीं. समाज को चलाने के लिए नैतिक बल की जरूरत पड़ती है. उसके लिए कोरी ताकत किसी काम की नहीं होती. यह तभी संभव है, जब कर्तव्य और अनुशासन की भावना नागरिकों के अंतर्मन से उमड़े. उनका अपने शासकों पर पूरा-पूरा विश्वास हो. इसकी संभावना तभी है जब शासकगण अपने कर्तव्यों को समझकर उनका पालन करने के लिए प्रतिबद्ध हों…उनका अपना जीवन किसी भी प्रकार की विलासिता अथवा वैभव प्रदर्शन से मुक्त हो. जब राज्य की संपत्ति का विभाजन इस प्रकार हो कि उसका लाभ वहां के प्रत्येक नागरिक को मिल सके. प्लेटो ने दास प्रथा का समर्थन किया था. स्मरण रहे कि यह उस समय की घटना है, जब रोम की लगभग आधी आबादी दासों से मिलकर बनी थी. कुछ हालांकि ऐसे भी दास थे, जो स्वयं को स्वतंत्र करा चुके थे, किंतु उन्हें भी नागरिकों जितने अधिकार न थे. स्वतंत्र हो जाने के बावजूद समाज में उनकी हालत दूसरे दर्जे के नागरिक जैसी थी. जो दास थे, वे पशु की तरह व्यवहृत होते, खरीदे-बेचे जाते थे. समाज के संसाधनों पर अभिजात्य वर्ग का अधिकार था. दास भी संसाधनों का अनिवार्य हिस्सा थे. उनका कर्तव्य था अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना. प्लेटो के माता-पिता की आर्थिक स्थिति भले ही दूसरे अभिजात्य परिवारों, राजकुल के सदस्यों जितनी सुदृढ़ भले न थी, किंतु उसके परिवार का पूरा का पूरा परिवेश अभिजात्य परिवारों जैसा था. गुरु सुकरात भी दासप्रथा को जरूरी मानते थे. प्लेटो ने भी इस कुप्रथा का उत्पादन के स्तर को बनाए रखने के लिए समर्थन किया. अपने लेखन विशेषकर अपनी महान कृति ‘रिपब्लिक’ में उसने जिस आदर्श समाज का सपना देखा था, उसमें समानता और बंधुत्व की जो कल्पना की गई थी, वह केवल समतामूलक समाज में ही संभव है. अगले चरण में अरस्तु ने भी विकासदर के स्थायित्व एवं गतिशीलता के लिए दास प्रथा का समर्थन किया था.

प्लेटो ने अपना लेखन कवि के रूप में आरंभ किया था. प्राचीन ग्रीक साहित्य से प्रभावित होकर प्रारंभ में उसने दुखांत रचनाएं लिखीं. मगर जिस दार्शनिक प्लेटो को दुनिया जानती है, उसका वास्तविक जन्म प्लेटो और सुकरात की भेंट के पश्चात ही संभव हो सका था. प्लेटो उस समय बीस वर्ष का स्वप्नदृष्टा युवा था, उसकी आंखों में रूमानी सपने थे. गंभीर और अंतर्मुखी वह बचपन से ही था. इसलिए बचपन से युवावस्था तक आते-आते वह प्राचीन यूनानी साहित्य का अध्ययन कर चुका था. सुकरात उस समय वयस् के साठवें वर्ष में प्रवेश कर चुका था, मगर उसकी ख्याति पूरे एथेंस में फैली हुई थी. खासकर नवयुवकों पर उसका जादुई प्रभाव था. सुकरात के संपर्क में आने के पश्चात प्लेटो को अपना उस समय तक रचा सब व्यर्थ लगने लगा. उसको कविता से अरुचि हो गई. एक दिन उद्धिग्न होकर उसने अपनी समस्त काव्य रचनाएं आग के हवाले कर दीं. उनमें वह नाटक भी था, जिसको उसने एक प्रतियोगिता के लिए विशेषरूप से रचा था. तदोपरांत उसने स्वयं को दर्शन, राजनीति, गणित, विज्ञान और खगोलविज्ञान के अध्ययन तक सीमित कर दिया. उल्लेखनीय है कि राजपरिवार से संबद्ध होने के कारण प्लेटो के पास एथेंस की राजनीति में स्थान बनाने के भरपूर अवसर थे. यदि वह सुकरात से न मिला होता तो अवश्य की उसकी गिनती एथेंस के महत्त्वपूर्ण राजनयिकों में होती. किंतु सुकरात की प्रेरणा पर उसने परंपरागत राजनीति को आगे बढ़ाने की अपेक्षा नए समाज का सपना देखा, नई राजनीतिक प्रणालियों की खोज के काम को वरीयता दी, जिसके लिए गहन साधना और त्याग की आवश्यकता थी.

सुकरात से प्रभावित प्लेटो ने अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए विपुल वाङ्मय की रचना की. हालांकि उसके द्वारा लिखे गए ग्रंथों की कुल संख्या को लेकर विद्वानों के बीच मतभेद है. संवाद-शैली पर आधारित होने के कारण प्लेटो द्वारा रचित पुस्तकें ‘डायलाग्स’ कही जाती हैं. इन पुस्तकों में उसने सुकरात की संवाद-शैली का प्रयोग किया था, जिसे ‘सुकरातीय शैली’ के नाम से भी जाना जाता है. उसने कुल मिलाकर 46 संवादों(डायलाग्स) की रचना की. इनमें शिक्षा, राजनीति, कानून, दर्शन, नैतिकता, तत्वज्ञान आदि पर विस्तृत विचार-विमर्श प्रस्तुत किया गया है. अधिकांश विद्वानों का मानना है कि प्लूटो द्वारा रचे गए संवादों की संख्या मात्र 24 है. कुछ विद्वान इस संख्या को 28 तक ले जाते हैं. बाकी रचनाएं बाद में उसके नाम से जोड़ दी गई हैं. प्लेटो द्वारा रचित प्रमुख ‘संवादों’ में ‘रिपब्लिक’, ‘दि अपोला॓जी’, ‘फीडो’, ‘प्रोटागोरेस’, ‘चारमेंडिस’, ला॓ज आदि प्रमुख हैं. इनमें कर्तव्य, साहस, सद्गुण, न्याय, प्रेम, सौंदर्य, विज्ञान, प्रकृति, कानून, रीति-रिवाज, नैतिकता, शुभता, परंपरा, उत्तराधिकार, मेल-मिलाप, ज्ञान आदि विभिन्न विषयों को बड़े विद्वतापूर्ण ढंग से समेटा गया है, जिसके कारण ये पुस्तकें गत 2400 वर्षों से विद्वानों और शोधकर्ताओं को प्रभावित करती आ रही हैं. प्लेटो की रचनाओं में अब भी वे तत्व मौजूद हैं, जिनके आधार पर काम करते हुए उन अनेक समस्याओं का हल खोजा जा सकता है, जो पूंजीवाद अथवा सांस्कृतिक अपसंस्करण की देन हैं.

संवादों के अतिरिक्त उसने 13 पुस्तकें(लेटरर्स) पत्र-शैली में रची हैं. इनमें यूनान के तत्कालीन इतिहास और प्लेटो के जीवन की झलक देखी जा सकती है. प्लेटो के जीवनी-लेखकों के लिए तो उसकी पत्र-शैली की रचनाएं प्रामाणिक òोत हैं हीं. ‘संवादों’ की भांति पत्र-शैली में रची गई पुस्तकों की प्रामाणिकता पर भी कुछ विद्वान आपत्ति करते हैं. अधिकांश का मानना है कि प्लेटो के नाम से उपलब्ध पत्र-शैली की 13 पुस्तकों में से मात्र छठी, सातवीं और आठवीं रचनाओं को ही उसकी वास्तविक कृति माना जा सकता है. शेष रचनाएं परिवर्ती लेखकों द्वारा प्लेटो के नाम पर थोप दी हैं. पहले अकसर ऐसा होता था. जब किसी विचारक का नाम अथवा पुस्तक अधिक प्रचलित हो जाती तो उनके समर्थक-अनुयायी उसमें अपनी ओर से भी विस्तार करते जाते थे. कभी यह काम उस ग्रंथ के प्रति समर्पण भाव दर्शाते हुए भावातिरेक में कर दिया जाता था तो कभी-कभी, आत्मविश्वास की कमी के कारण, अपने विचारों को भी ग्रंथ-विशेष में यह सोचकर समाहित कर लिया जाता था, इससे वे अधिक मान्य होकर जनता में प्रचलित हो सकें. उदाहरणार्थ भारत में भी वेदों, महाकाव्यों, स्मृतियों, पुराणों में ऐसे प्रक्षेपण लगातार होते रहे हैं. प्लेटो द्वारा रचित सभी संवादों में मनुष्यता की चिंताएं तथा उसकी स्थापना के प्रति तीव्र आग्रहशीलता है. ‘ला॓ज’ उसका अंतिम संवाद है, जिसमें वह शिक्षा की अनिवार्यता तथा उसकी सर्वोपलब्धता पर जोर देता है. स्मरणीय है कि प्लेटो पहला विचारक था जिसने आदर्श समाज की स्थापना के लिए बच्चों की वैज्ञानिक तरीके से शिक्षा को जरूरी माना था. उससे पहले शिक्षा का मुख्य उद्देश्य धार्मिक प्रतीकों, आस्थाकेंद्रों के बारे में बताना और अध्यात्म-जिज्ञासा को बनाए रखना होता था. उनसे अलग हो चुके सोफिस्ट विचारक भी थे, जो केवल अभिजात्य वर्ग अध्यापन करते थे. उनकी दृष्टि में शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य व्यावहारिक निपुणता प्राप्त करना था. बदले में वे मोटी शुल्क वसूलते थे. उन दिनों एथेंस का कानून ही ऐसा था कि तीस वर्ष से अधिक वयस् का कोई भी नागरिक राजनीति में हिस्सा ले सकता था. राजनीतिक गतिविधियां प्रायः खुले में संपन्न होती थीं. वहां अनुकूल निर्णय के लिए दूसरे सदस्यों को प्रभावित करना अत्यावश्यक था. इसलिए वाक्-निपुण होना अतिरिक्त योग्यता मानी जाती थी. असल में वह गणतंत्र के नाम पर भीड़तंत्र था. जिसमें वाक्निपुण व्यक्ति के विकास के अतिरिक्त अवसर थे.

पश्चिमी जगत में सुकरात को बौद्धिक संत की गरिमा प्राप्त है. वही सुकरात प्लेटो के संवादों में प्रत्यक्ष अथवा परोक्षरूप में नायक के रूप में उपस्थित है, जबकि स्वयं प्लेटो सिवाय ‘अपोला॓जी’ के किसी भी संवादिका में उपस्थित नहीं है. इस संवाद में सुकरात के अंतिम दिनों का वर्णन है. यहां उल्लेख करना प्रासंगिक हो सकता है कि सुकरात ने स्वयं कुछ नहीं लिखा था, सिवाय कुछ धार्मिक गीतों के अनुवाद के, जो उसने अपनी मृत्यु से पहले, कारागार में अपने अंतिम दिन बिताते हुए लिखे थे. उनके अलावा वह सिर्फ संवाद में हिस्सा लेता रहा. वहां भी उसकी उपस्थिति एक प्रश्नवाचक जिज्ञासु की होती थी. ‘मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि मैं कुछ नहीं जानता….मुझे अपने अज्ञान का ज्ञान है.’—यह उसकी प्रसिद्ध उक्ति थी. इसके विपरीत सोफिस्ट विचारक थे, जो अपने ज्ञान के अहंकार से तने-तने रहते थे. जिनका ज्ञान केवल समाज के उच्च वर्ग के काम की चीज था. दूसरी ओर सुकरात के शिष्यों में अधिकांश नवयुवक थे, जिनके मन में कहीं न कहीं एथेंस की राजनीतिक के प्रति असंतोष था. सुकरात द्वारा लिखी गई किसी पुस्तक का उल्लेख नहीं मिलता. जिस सुकरात को दुनिया जानती और सम्मान करती है, उसके बारे में अधिकांश विवरण प्लेटो तथा जेनोफीन की रचनाओं से ही प्राप्त होता है. इसलिए यह कहना बहुत कठिन है कि प्लेटो के विचारों में कितना मौलिक और कितना गुरु सुकरात से आयातित है. लेकिन यह सप्रमाण कहा जा सकता है कि गुरु-शिष्य के विचारों में काफी समानता थी, प्लेटो ने अपनी रचनाओं में जहां भी उसे अवसर मिला, मौलिक दृष्टि के साथ गुरु के विचारों को ही विस्तार दिया है. अतएव प्लेटो के संवादों के भाषाशास्त्रीय वर्गीकरण-विश्लेषण तथा जेनोफीन, प्रोटेगोरेस आदि की समकालीन लेखकों की कृतियों के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा सुकरात के विचारों को जानने की कोशिश की जाती रही है. इनमें जेनोफीन और प्रोटेगोरस प्लेटो के समकालीन थे.

सुकरात और प्लेटो दोनों ही परंपरा के नाम पर रूढ़ियों को थोपे जाने के विरुद्ध थे. दोनों ही सोफिस्टों के तर्कों, मिथ्या व्याख्यानों को व्यर्थ का वितंडा मानते थे. दोनों ही का मानना था कि ज्ञार्नाजन ही मनुष्य का पहला लक्ष्य है. वही शुभत्व की प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है. अतएव ‘न तो कोई इच्छा पाप है, न इच्छा करना कोई अपराध है. सभी सदगुण ज्ञान का प्रतीक हैं’—सुकरात का मानना था. केवल सद्गुण द्वारा ही परमशुभ को जाना जा सकता है और सद्गुण की पहचान के लिए ज्ञान परमावश्यक है. इसलिए प्लेटो ने अपनी संवादों में शिक्षा पर पूरा जोर दिया था. समाज के रूप में उसने ऐसी व्यवस्था की संकल्पना की थी, जिसके द्वारा सभी को ज्ञानार्जन का पर्याप्त अवसर मिल सके. वह सुकरात के आदर्शों को अपने चिंतन में न केवल महत्त्वपूर्ण स्थान देता है, बल्कि ऐसी व्यवस्थाओं की परिकल्पना भी करता है, जिनसे इस लक्ष्य को सुगम बनाया जा सके. जो मानवोत्कर्ष के सपने को सच करने में सहायक हों. देखा जाए तो प्लेटो का पूरा लेखन मनुष्य के बहुआयामी उत्थान को समर्पित है. उसकी संवादिकाओं में सुकरात की उपस्थिति एक प्रखर-बुद्धि, निस्पृह, आदर्शवादी विचारक, मौलिक चिंतक और भौतिक प्रलोभनों से मुक्त मानवतावादी शिक्षक की है. जिसके संपूर्ण चेष्ठाएं मनुष्यता की स्थापना को समर्पित हैं, और जिसके पास मनुष्यता की सर्वश्रेष्ठता को स्थापित करने वाले असंख्य तर्क हैं. जिसकी ज्ञान प्राप्ति की ललक वरेण्य है. जो हर पल कुछ सीखने को छटपटाता रहता है तथा किसी भी प्रकार के भौतिक प्रलोभनों और लालसाओं से परे है. जो तर्क के माध्यम से अपनी बात मनवाना चाहता है. लेकिन तर्क उसके लिए दूसरों को बौद्धिक रूप से परास्त करने, उनपर अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता सिद्ध करने अथवा विमर्श के नाम पर फिजूल का वाग्जाल खड़ा करने का माध्यम नहीं है. सुकरात के लिए तर्क सत्य की खोज का माध्यम है, जिसके द्वारा सद्गुणों की स्थापना संभव है. उसके पास मनुष्यता की हर समस्या का समाधान, उससे उबरने की युक्ति है, वह ज्ञानार्जन को अपने जीवन का लक्ष्य मानता है, और बौद्धिक जड़ता को मनुष्यता के लिए अभिशाप.

प्लेटो के लेखन-चिंतन का दायरा व्यापक था. पत्र-शैली में रचित उसकी पुस्तकों द्वारा उसके अपने जीवन तथा तत्कालीन इतिहास के बारे में प्रामाणिक जानकारी मिलती है. चूंकि सुकरात इन सभी में किसी न किसी रूप में मौजूद है इसलिए कुछ विद्वान उन्हें ‘सुकरातीय संवाद’ भी कहते हैं. प्लेटो ने सुदीर्घ जीवन जिया और भरपूर लेखन किया था. उसके विपुल वाङमय में हर सोच-समझ के व्यक्ति को सीखने, पे्ररणा लेने के लिए कुछ न कुछ मिल जाता है. यह आधार पर यह दावा भी किया जाता है कि पश्चिम का कोई दर्शन ऐसा नहीं है, जिसके बीजतत्व प्लेटो के लेखन में उपलब्ध न हों. गत 2400 वर्ष के कालखंड में अनेक विचारकों ने अपने सोच और विचारधारा के अनुरूप उसके लेखन को वर्गीकृत-विश्लेषित करने का प्रयास किया है. सबसे पहले लुइस केंपबेल ने, उनीसवीं शताब्दी में शैली-वैज्ञानिक अध्ययन द्वारा प्लेटो की संवादों को भिन्न-भिन्न वर्गों में बांटने का काम किया था. अपने अध्ययन के उपरांत केंपबेल इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि क्रिटिअस, टाइमियस, लाॅज, फिलेबस तथा स्टेटसमेन प्लेटो की अपेक्षाकृत परिवर्ती रचनाएं हैं. बावजूद इसके प्लेटो विभिन्न पुस्तकों के रचनाकाल को लेकर विवाद अकसर उठते ही रहते हैं. तो भी मोटे तौर पर उसकी पुस्तकों के रचनाकाल को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है. आरंभिक संवाद-पुस्तकों का लेखनकाल 400 ईस्वी पूर्व से 387 ईस्वी पूर्व है. इस वर्ग के संवादों में सुकरात की शत-प्रतिशत उपस्थिति है. यह सुकरात के जीवन और दर्शन के बारे में सवार्धिक प्रामाणिक स्रोत हैं. विश्व-समाज में व्यक्ति और विचारक के रूप में सुकरात की जो छवि है, उसका आधार यही पुस्तकें हैं. इनमें एक ओर जहां प्राचीन यूनान के सामाजिक-राजनीतिक परिवेश की झलक मिलती है, वहीं प्लेटो और सुकरात की अंतरंगता का भी बोध होता है. इनपर प्लेटो की युवावस्था के अनुभव और चिंतन की छाप है. सुकरात की इनमें मौजूदगी इस सीमा तक है कि इस कारण कुछ विद्वान इन्हें ‘सुकरातीय संवाद’ भी कहते हैं. इनमें मनुष्यता और प्रेम का दर्शन है. अपोलाॅजी, चारमिंडिस, क्रीटो, यूथाइफ्रो, आयोन, लेसर हिप्पीयास, मेनेक्जीनियस, लाइसस, प्रोटेगोरस, लेस आदि इसी वर्ग में आती हैं. इनके अतिरिक्त यूथाइडेमस, मेनो तथा जोर्जिया को भी प्लेटो के प्रारंभिक संवादों में गिना जाता है. इन पुस्तकों के माध्यम से हमें सुकरात की वक्तृत्वकला का साक्षात होता है तथा उसका मानवताप्रेमी, निर्भीक, स्पष्टवक्ता का रूप सामने आता है. इन सभी संवादिकाओं में एक और विशेषता है कि इनमें सुकरात विनम्रतापूर्वक प्रश्न उठाता है. उसके उत्तर की अपेक्षा वह प्रतिपक्षी से रखता है. वार्तालाप के बीच वह गजब का धैर्य दिखलाता है. यदि सामनेवाला नाराज हो तो भी वह उद्धिग्न नहीं होता. बल्कि शांतिपूर्वक संवाद की निरंतरता को बनाए रखता है. वह साभिमान इस बात को कहता है कि उसको अपने अज्ञान का ज्ञान है. उसकी यह विनम्रता ही उसको उच्चकोटि का जिज्ञासु और विचारक सिद्ध करती है.

दूसरी श्रेणी में प्लेटो के उन संवादों को रखा जाता है, जो उसने सुकरात की मृत्यु के बाद, 386 ईसा पूर्व से लेकर 367 ईसा पूर्व के बीच लिखे थे. उल्लेखनीय है कि सुकरात की मृत्यु से खिन्न प्लेटो एथेंस को छोड़कर सिसली की सुदीर्घ यात्रा पर निकल चुका था. दस वर्ष लंबी उस यात्रा में उसने सिसली के अलावा अनेक निकटवर्ती राज्यों का भ्रमण दिया. सायराकस के निरंकुश सम्राट डायोनिसियस के उत्थान और पतन का साक्षी बना. कहा जा सकता है कि जीवन में व्यावहारिक अनुभव बटोरते हुए प्लेटो ने इन संवादों की रचना की थी, जिनकी छाप इन पर है. सुकरात की मौजूदगी इनमें भी है, किंतु उसके स्वभाव में किंचित अंतर आ चुका है. अब वह सिर्फ जिज्ञासा ही प्रकट नहीं करता, साथ-साथ समस्या का समाधान भी देता है. उसके समाधान उसके मानवतावादी दृष्टिकोण के ही अनुरूप हैं. इन रचनाओं में हमारा साक्षात प्लेटो की बौद्धिक परिपक्वता से भी होने लगता है. हालांकि यह अंतर कर पाना बड़ा कठिन है कि इन संवाद-पुस्तकों में उल्लिखित विचारों में कितने प्लेटो के हैं और कितने गुरु सुकरात से आयातित. ‘केवल शुभत्व का बोध ही ज्ञान है, प्राणीमात्र शुभ की कामना करता है. जानबूझकर कोई भी पाप का भागी नहीं बनना चाहता.’—यही सुकरात के दर्शन का मूल तत्व है, जो प्लेटो के मध्यकालीन संवादों में निखरकर आता है. ‘पदार्थ के शुद्ध-सात्विक स्वरूप को पहचान लेना, उसको उसकी पवित्रता के साथ अनुभव करना ज्ञान का प्रमुख मार्ग है. मानवजीवन का लक्ष्य ऐसी ही अनुभूतियों की खोज है, जिससे वह सृष्टि के रहस्यों की सही-सही व्याख्या कर सके.’ ये विचार प्लेटो के थे, जो उसकी रचनाओं में अलग-अलग तर्कों के साथ अभिव्यक्त होते हैं. ‘सिंपोजियम’ और ‘रिपब्लिक’ इस दौर में लिखी गई प्रमुख संवाद-पुस्तकें हैं. जिनमें वह आत्मा की अमरता के साथ न्याय, सत्य, सौंदर्य, शुभत्व, ज्ञान आदि को लेकर अपना विशिष्ट चिंतन प्रस्तुत करता है. ‘पेरामेंडिस’ तथा ‘थिटेट्स’ इस काल के अंतिम दौर में रची गई पुस्तकें हैं. इस दौर के संवादों में क्रिटेलस, पेरामेंडिस, फीडिया, फीडरस, रिपब्लिक, सिंपोजियम, थीटेट्स आदि आती हैं. इन रचनाओं से प्लेटो का राजनीति और धर्म के प्रति रुझान भी प्रकट होता है.

परिवर्ती जीवनकाल की संवाद-पुस्तकों का लेखनकाल 366 ईसा पूर्व से 348 ईसा पूर्व तक है. उस समय तक प्लेटो राजनीति से उकता चुका था. एथेंस वापस लौटकर उसने खुद को अध्ययन-अध्यापन को समर्पित कर दिया था. ‘अकादमी’ में रहते हुए उसने विपुल साहित्य की रचना की थी. प्लेटो के अधिकांश महत्त्वपूर्ण संवाद इसी दौर में रचे गए. ‘ला॓ज’, ‘सोफिस्ट’, ‘फिलेबस’, ‘स्टे्टसमेन’ तथा ‘टाइमियस’ इस कालखंड की अतिमहत्त्वपूर्ण संवादिकाएं हैं. इनमें प्लेटो लगभग अपने गुरु की गहन छाया से उबर चुका था, इसलिए इन संवादों में वह या तो नदारद है, अथवा न्यून भूमिका लिए हुए है. इनमें हम प्लेटो को मौलिक दार्शनिक और चिंतक के रूप में पाते हैं. ‘टाइमियस’ में वह वस्तुओं के वर्गीकरण पर चर्चा करता है. इस समय तक प्लेटो की संवादशैली भी काफी निखर चुकी थी. वह नए तर्कों के साथ बात को आगे बढ़ाता है. वार्तालाप में भाग ले रहा प्रतिपक्षी किसी वस्तु अथवा विचार के वर्णन के लिए अन्य वस्तुओं से उसकी समानता और असमानताओं का विश्लेषण करता है, ताकि उनको उनके यथार्थरूप में जाना जा सके. ‘सोफिस्ट’ में प्लेटो इस अवधारणा के साथ प्रस्तुत होता है कि दर्शन का मूल स्वरूप, जानने की शाश्वत प्रक्रिया में निहित है. यानी मनुष्य की जिज्ञासा है, तो दर्शन है. किसी वस्तु को जान लेने के बाद भी उसके बारे में बहुत कुछ जानना शेष रह जाता है. इसलिए दर्शन की भूमिका कभी समाप्त नहीं होती. इन संवादों में प्लेटो बहुत-से नए मुद्दे भी उठाता है. मगर कई बार वह उन बिंदुओं को भी पुनःविमर्श के केंद्र में लाता है, जिनपर वह अपने पूर्ववर्ती संवादों में विचार कर चुका था. नए निष्कर्ष उसके पिछले चिंतन को आगे बढ़ाने का काम करते हैं. परिपक्व और सधे हुए चिंतन के कारण ये संवाद प्लेटो की पिछली संवाद-पुस्तकों की अपेक्षा अधिक गंभीर और विषय-केंद्रित बन पड़े हैं.

जैसा कि पहले भी कहा गया है कि इन संवादों में प्लेटो स्वयं अनुपस्थित है. सिवाय ‘अपोला॓जी’ के वह किसी भी संवाद में नजर नहीं आता. उद्घोषक की उपस्थिति भी चर्चा को मूल विषय तक लाने तक सीमित है. हालांकि अनेक ऐसे संवाद जैसे मेनो, जोर्जियास, फीड्रस, क्रीटो, यूथाइफ्रो हैं जो सीधे वार्तालाप से आरंभ हैं. कुछ संवादों में उद्घोषक की भूमिका स्वयं सुकरात ने निभाई है, जिनमें वह प्रथम पुरुष में सीधे संवाद करता है. ऐसी रचनाओं में लाइसिस, चार्मिंडिस, रिपब्लिक आदि हैं. संवाद-पुस्तक ‘प्रोटेगोरस’ का आरंभ सीधे वार्तालाप से होता है, मगर कुछ देर बाद ही सुकरात उसमें उद्घोषक की भूमिका में उपस्थित हो जाता है. इसी प्रकार फीडो और सिंपोजियम की शुरुआत संवादों के माध्यम से होती है, मगर इनमें थोड़ी देर बाद सुकरात के शिष्य उपस्थित होकर उसको नया मोड़ दे देते हैं. आशय यह है कि प्लेटो ने अपनी संवादिकाओं में विषय प्रस्तुतीकरण के लिए विभिन्न पात्रों, स्थितियों और शैलियों का सहारा लिया है, हालांकि उसका ध्येय नाटकीयता प्रस्तुत करना हरगिज नहीं था. न ही वह अपनी रचनात्मक क्षमता द्वारा विद्वानों को प्रभावित करना चाहता था. न ही उसका लक्ष्य प्राचीन और समकालीन यूनानी साहित्यकारों की भांति प्रसिद्ध यूनानी चरित्रों का महिमामंडन करना था. ये संवाद मूलतः दार्शनिक चर्चा हैं, इसलिए इनमें वार्तालाप में हिस्सा ले रहे व्यक्तियों की संख्या बहुत कम है. उनमें से कुछ ऐतिहासिक चरित्र भी हैं. चर्चा को अवरोध से बचाए रखने के लिए प्लेटो उनमें नए-नए पात्रों को लाता है. वे पात्र साधारण व्यक्ति भी हो सकते हैं. जैसे ‘सोफिस्ट’ और ‘स्टेटसमेन’ नामक संवादों में दक्षिणी इटली से आया एक अजनबी यात्री चर्चा को आगे बढ़ाता है. इसी प्रकार ‘लाॅज’ में एथेंस के दो नागरिक स्पार्टा तथा क्रीट से आए सैलानियों से चर्चा करते हैं. लिखते समय प्लेटो न केवल अपने पाठकों से संवाद में सहभागिता की अपेक्षा रखता है, बल्कि वह वार्तालापियों के व्यवहार, चरित्र, वातावरण आदि पर भी अपनी आलोचनात्मक दृष्टि बनाए रखता है. रूढ़ चरित्रों पर सूक्ष्म कटाक्ष के माध्यम से वह उनकी अस्वाभाविकता को निशाने पर लाता है. प्रोटागोरस, जोर्जियास, यूथाडेमस आदि संवादों में यह शैली खुलकर सामने आई है. इसका सुखद परिणाम यह रहा है कि वह गूढ़-गंभीर विषय को भी सहज-संप्रेषणीय रूप में व्यक्त करने में सफल रहा है, जो विषय को रोचक एवं ग्राह्यः बनाए रखने के लिए अत्यावश्यक था.

प्लेटो आदर्शवादी विचारक तथा दक्ष लेखक था. वह विचारों के आधार पर आदर्शवादी था, जिसकी निगाह में समाज का स्तर व्यक्ति से ऊपर है. बाद की संवाद-पुस्तकों में ‘रिपब्लिक’ सर्वाधिक लोकप्रिय है. आजकल ‘रिपब्लिक’ शब्द को गणतंत्र के पर्याय के रूप में लिया जाता है. मगर गणतंत्र की आधुनिक अवधारणा से यह पुस्तक कोसों दूर है. इसको राजनीति से अधिक नीतिशास्त्र की पुस्तक मानना उपयुक्त होगा, जिसमें वह राज्य एवं उसके नागरिक के कर्तव्यों का निष्पादन करता है तथा अपेक्षा करता है कि प्रत्येक नागरिक स्वयं-स्फूर्त भाव से उनका पालन करे. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो के आदर्श समाज की संकल्पना की झलक देखी जा सकती है. इस पुस्तक में यह विचार भी सामने आया है कि राज्य की बागडोर एक दार्शनिक को सौंपी जानी चाहिए. प्लेटो का मानना था कि दार्शनिक स्वाभाविक रूप से विवेकवान, दूरदृष्टा, ईमानदार, संवेदनशील, उदार तथा धैर्यवान होते हैं. वे भौतिक प्रलोभनों से दूर होते हैं. उनके नेतृत्व में समाज का बहुआयामी और समरस विकास संभव है. प्लेटो की इस अवधारणा के पीछे कुछ विद्वान उसकी कुंठा की झलक भी पाते हैं. उसका संबंध एथेंस के राजवंश से था. मगर वह कभी एथेंस की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा सका. दार्शनिक और प्रखर बुद्धिमान होने के बावजूद उसे सुकरात के मुकदमे में मतदान से मात्र इसलिए वंचित रखा गया था कि उसकी वय मतदान के लिए निर्धारित न्यूनतम वय से मात्र दो वर्ष कम थी. एक संभावना यह भी हो सकती है कि 401 ईस्वी तक इतिहास प्रसिद्ध पेलोपोनिशयन युद्ध में स्पार्टा के हाथों करारी मात के बाद एथेंस का शासन अभिजात्य वर्ग के हाथों में आ चुका था. महान सोलोन और वीर पेरिक्लीस के एथेंस पर उन लोगों का शासन था जो अदूरदर्शी, निकम्मे और विलासी थे. मात्र आठ महीने में उस समूह का आचरण तानाशाहीपूर्ण हो चला था. एथेंस जो कभी समृद्धि के शिखर पर था, वह लगातार चलने वाले युद्धों, अभिजात्य वर्ग की मनमानी तथा उनकी विलासितापूर्ण हरकतों के कारण पतन के कगार तक पहुंच चुका था. प्लेटो ने अपनी आंखों के सामने राजसत्ता को उखड़ते और क्रमशः एक तानाशाही व्यवस्था में ढलते हुए देखा था. अभिजात्यों की तानाशाही ने ही सुकरात को मृत्युदंड दिया था. इस कारण प्लेटो का उस व्यवस्था से स्वप्नभंग होना स्वाभाविक था. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने अपने सपनों के राज्य की परिकल्पना की थी, यद्यपि वह इतनी अव्यावहारिक थी कि उसके शिष्य अरस्तु ने ही इसे स्वीकारने से इंकार कर दिया था. तथापि उसकी महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता. क्योंकि शताब्दियों से प्लेटो के लेखन को आधार मानकर ही वैकल्पिक दर्शन की खोज की जाती रही है. अठारहवीं शताब्दी तथा उसके बाद के प्रमुख दार्शनिकों हीगेल, नीत्शे, कार्ल मार्क्स, ऐंगल्स आदि पर प्लेटो का प्रभाव था.

‘रिपब्लिक’ में वह अपनी कल्पना के अनुरूप आदर्श समाज का सपना देखता है. उसके सपने की विशेषता है कि उसको किसी भी आदर्शवादी शासन-व्यवस्था के माध्यम से संभव किया जा सकता है. उसके दूसरे संवाद ‘लाॅज’ के बारे में भी सच है. यह संवाद भी कानून के प्रबंधन अथवा कानून के आधार पर प्रबंधन के बारे बहुत चर्चा नहीं करता. अपराधियों की नाक में नकेल डालने की व्यवस्था करना भी ‘ला॓ज’ का उद्देश्य नहीं है. इसका मूल विषय है मानव समाज की समुन्नत व्यवस्था और विवेकीकरण की प्रक्रिया को ऊर्जस्वित करना, ताकि लोगों में कर्तव्यबोध जाग्रत हो. अपना मंतव्य स्पष्ट करने के लिए प्लेटो एक सूत्र का सहारा लेता है. उसकी स्थापना उस समाज को चौंका सकती है जो स्वयं कानूनी आधार पर व्यवस्थित होने का दावा करता है. उल्लेखनीय है कि वह कानून के नाम पर किसी बाहरी शक्ति को थोपने पर उतना जोर नहीं देता, जितना कि वह व्यक्ति को नैतिक और सामाजिक रूप से मर्यादित देखना चाहता है. कानून उसके लिए न्याय की स्थापना का माध्यम नहीं है, बल्कि मानवीय बोध और आत्मानुशासन की उच्चतम अवस्था का प्रतीक है. यहां हम प्लेटो और सुकरात के विचारों के साम्य को परख सकते हैं. सुकरात ज्ञान को सत्य और सत्य को परमशुभ की संज्ञा देता था. उसके अनुसार व्यक्ति का कर्तव्य है, शुभत्व की प्राप्ति के लिए अविरत प्रयास करना और दूसरों को अपने इस लक्ष्य में सहयोग करना. संवाद-पुस्तक ‘ला॓ज’ में प्लेटो भी यही कामना करता है. किंतु इसके लिए वह किसी बाह्यः शक्ति के बजाय व्यक्ति के नैतिक उत्थान और आत्मानुशासन को अनिवार्य मानता है. तो प्लेटो का समीकरण है कि किसी राज्य में न्याय की मौजूदगी, वहां के नागरिकों के आचरण में मौजूद न्याय की भावना से आंकी जा सकती है. उसका मानना था कि जनसाधारण के व्यवहार में न्याय की भावना जाग्रत करने के लिए हमें समाज को इस प्रकार व्यवस्थित करना चाहिए, जिस प्रकार हम खुद को रखना चाहते हैं. प्लेटो व्यक्ति को अपूर्ण इकाई मानता था. इसके बावजूद उसको विश्वास था कि आदर्श समाज की स्थापना का लक्ष्य व्यक्तिमात्र के सहयोग और समर्पण के बगैर संभव नहीं है. नैतिकता की इस उच्चतम स्थिति का विस्तार आगे चलकर कांट के दर्शन में देखने को मिलता है—

‘हमें न्याय के रूप में ऐसे सदगुण की कल्पना करनी चाहिए जो पूरे समाज में उसी प्रकार मौजूद है, जैसे कि उसकी इकाई-विशेष में, और समाज सदैव दो से अधिक से मिलकर बनता है. इससे इस बात की संभावना बढ़ेगी कि हम न्याय को अधिक मात्रा में प्राप्त कर सकते हैं, उसकी स्थापना कर सकते हैं…’

प्लेटो अपने विचारों के मामले में जड़ अथवा एकीभूत नहीं था, बल्कि उसकी मान्यताओं में समय के साथ परिवर्तन भी देखने को मिलते हैं. उसके लेखन की एक अन्य विशेषता थी कि वह कृति के प्रकाशित होने के बाद भी उसमें निरंतर सुधार करता रहता था. ‘रिपब्लिक’ जैसी महान कृति में भी उसने एकाधिक बार संशोधन किया था. विद्वानों के अनुसार यह ग्रंथ चार या पांच बार लिखा गया. वर्षों तक यह ‘प्रोटो रिपब्लिक’ के शीर्षक के अंतर्गत पढ़ाया जाता रहा. इस बात के भी प्रमाण हैं कि प्लेटो द्वारा स्थापित ‘अकादमी’ के सदस्य भी उसकी कृतियों की लोकप्रियता को बनाए रखने के लिए उनमें समयानुसार संशोधन-परिवर्धन करते रहते थे. यह दावा भी किया जाता है प्लेटो की कुछ संवाद-पुस्तकें ‘अकादमी’ के सदस्यों के सहयोग से रची गई थीं. विशेषतः ‘ला॓ज’ शीर्षक से रचा गया संवाद, जो उसकी अंतिम पुस्तकों में से एक है, के बारे में संभावना व्यक्त की जाती है कि यह प्लेटो के शिष्यों ने, उसके द्वारा दी गई रूपरेखा के आधार पर रचा था. तथापि इस बात से प्लेटो की प्रतिभा पर संदेह करना सर्वथा अनुपयुक्त होगा. इसलिए कि ‘डायलाग्स’ अथवा संवाद-पुस्तकों के अतिरिक्त भी विविध विधाओं में लिखित विपुल सामग्री हमें प्लेटो के नाम से प्राप्त होती है. उसके अध्ययन-मनन का क्षेत्र अत्यंत व्यापक था. अपनी सुदीर्घ आयु का अधिकांश हिस्सा उसने अपने अध्ययन-मनन को समर्पित किया था, जिसमें उसने राजनीति, नीतिशास्त्र, दर्शन, कानून, शिक्षा के मानवीयकरण के लिए लगातार लेखन किया. यही कारण है कि लगभग 2400 वर्षों से वह दुनिया-भर के विचारकों को अलग-अलग तरह से प्रभावित करता रहा है. उसी के दम पर प्लेटो के प्रशंसक यह दावा भी करते हैं—
‘पश्चिम के जितने भी दर्शन हैं, वे वस्तुतः प्लेटो के दर्शन पर की गई पाद-टिप्पणियां हैं.’

किसी भी विचारक के लिए इससे बड़ी बात भला और क्या हो सकती है.

अकादमी की स्थापना

सायराकस में डायोनिसियस द्वितीय के अध्यापन के समय प्लेटो को लगने लगा था कि उसके पास शिक्षा, दर्शनशास्त्र, विज्ञान, राजनीति, कानून आदि को लेकर कुछ नए विचार हैं. उनके माध्यम से शिक्षा और शिक्षा पद्धति में बदलाव संभव है. जैसा कि पहले भी कहा गया है, उस समय शिक्षा समाज के अभिजात्य वर्ग तक सीमित थी. शिक्षण का प्रमुख लक्ष्य विद्यार्थी को व्यवहार-कुशल, व्याख्यान कला में पारंगत तथा तर्क-वितर्क में निपुण बनाना था. उन्हें वे अभिजात्यीय संस्कार देना था, जिनपर एथेंस का तत्कालीन अभिजात्य-वर्ग गर्व करता था. उस समय तक शासन के स्तर पर शिक्षण की कोई व्यवस्था न थी. अधिकांश विद्यालय निजी थे, जिनका संचालन सोफिस्टों के अधीन था, जो केवल समाज के प्रभावशाली वर्ग को शिक्षा देते और बदले में मोटी शुल्क वसूलते थे. तत्कालीन कानून और व्यवस्था के अंतर्गत दासों का कर्तव्य केवल अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना था, अतएव उनके शिक्षण का कोई प्रावधान न था. अभिजात्य वर्ग और दासों के अलावा तीसरा वर्ग ‘मेटिक्स’ का था, जिनकी हैसियत मुक्त दास जैसी थी. मेटिक्स कृषि, उत्पादन और व्यापार को संभालते थे. दासों की भांति मेटिक्स को भी नागरिकता के अधिकार से वंचित रखा गया था. न वे एथेंस की राजनीति में सक्रिय भाग ले सकते थे, किंतु उन्हें व्यापार एवं उत्पादन-कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी. इसलिए एथेंस के समाज में अल्पसंख्यक होने के बावजूद उनकी हैसियत ऊंची थी. प्लेटो का समाज को लेकर एक सपना था. वह चाहता था कि व्यक्ति का नैतिक स्तर इतना ऊंचा हो कि समाज में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून की आवश्यकता ही नहीं पड़े. चरित्र-निर्माण में शिक्षा की महत्ता को समझते हुए वह बच्चों को बहुआयामी शिक्षा दिए जाने के पक्ष में था, ताकि उनका बहुमुखी विकास हो सके. वह चाहता था कि बच्चों को गीत-संगीत की शिक्षा मिले, ताकि उनमें थोड़ी संवेदनशीलता हो और वे सुहृदय नागरिक की भांति व्यवहार कर सकें. शरीर को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए उनको व्यायाम की भी शिक्षा दी जाए. इसके साथ-साथ गणित और विज्ञान की शिक्षा भी अनिवार्यतः दी जानी चाहिए, ताकि वे प्रकृति में होने वाले बदलावों को भली-भांति समझ सकें.

प्लेटो की अत्यंत महत्त्वाकांक्षी परियोजना ‘अकादमी’ की स्थापना का विचार सायराकस दूसरी यात्रा के दौरान जन्मा था. उन दिनों वह डायोनिसियस द्वितीय के शिक्षण में रत था, जिसके लिए पढ़ाई-लिखाई का कोई महत्त्व न था. वह हमेशा स्वयं को सायराकस के भावी सम्राट के रूप में सोचता था कि वह आने वाले दिनों का सम्राट है. अपने उस विद्यार्थी को पढ़ाने में प्लेटो को विशेष परिश्रम करना पड़ता था, फिर भी परिणाम लगभग शून्य था. वह समझ रहा था कि राजनीति के जिन आदर्शों की वह कल्पना करता है, उनमें से एक भी डायोनिसियस प्रथम और द्वितीय में नहीं है. तभी सायराकस की राजनीति करवट लेने लगी. तानाशाह सम्राट को मृत्यु ने आ दबोचा. पिता की मृत्यु के बाद शासन की जिम्मेदारी डायोनिसियस द्वितीय के कंधों पर आ गई. अपने पिता की भांति वह भी निरंकुश सम्राट सिद्ध हुआ. बदलते घटनाक्रम के बीच डायोनिसियस द्वितीय अचानक डिओन से नाराज हो गया. चूंकि प्लेटो डीओन का मित्र था. उसी के निमंत्रण पर सायराकस पहुंचा था. इसलिए डायोनिसियस प्लेटो का भी दुश्मन बन गया. प्लेटो बड़ी मुश्किल से खुद को बचाते हुए एथेंस लौटने में कामयाब हो पाया. उस समय उसका मन खिन्न था. राजनीति से उसका मन उचाट हो चुका था. वह कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे मन को तसल्ली मिले. वह ईसा से लगभग 385(अथवा 387) ईस्वी पूर्व का समय था. प्लेटो अपनी वयस् के चालीसवें वर्ष से गुजर रहा था. उसके मन में नया करने का संकल्प था. आंखों में कुछ अलग गढ़ने की बेचैनी. उसको इसका अवसर भी शीघ्र मिल गया.

एथेंस से लगभग एक किलोमीटर दूर उत्तर में एक पवित्र स्थान था. ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी में उस स्थान को यूनानी महायोद्धा ‘अकादमस’ के नाम पर ‘अकादमिया’ कहा जाता था. प्राचीन यूनानी ग्रंथों में ‘अकादमस’ को ‘हेकादमस’ भी कहा गया है. वह अत्यंत प्राचीन स्थल था, जो यूनान की ज्ञान की देवी एथेना के वास-स्थल के नाम से प्रसिद्ध था. वहां लौंग के महमहाते वृक्ष थे. चारों और हरियाली. एथेंसवासियों के लिए वह स्थल बहुत ही खास था. ईसापूर्व पांचवी शताब्दी में एथेंस के साम्राज्य के स्थापकों में से एक सीमोन ने उस स्थान पर एक अहाता बनवा दिया था. समय के अंतराल में वह स्थल हालांकि खंडहर में ढल चुका था. तो भी स्थल की ऐतिहासिकता को दर्शाने वाले कई मूर्तिशिल्प, धर्म-स्थल वहां थे. उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण थी, एथेंसवासियों की ज्ञान की देवी ‘एथेना’ के पवित्रस्थल के रूप में, उस स्थान के प्रति गहन ऋद्धा, जिसके चलते वे एथेंस का अजेय नगर-राज्य मानते थे. हरे-भरे वृक्षों से घिरे उस स्थान का उपयोग नगर के युवजन खेलकूद और व्यायाम के लिए करते थे. उस स्थान का एक हिस्सा प्लेटो को पैत्रिक संपत्ति के रूप में मिला था. वहां छोटा-सा बाग था. उसी पवित्र और ऐतिहासिक स्थल पर ‘अकादमी’ की स्थापना की गई थी. एक प्रकार का खुला विश्वविद्यालय, जिसकी तुलना हम भारतीय उपनिषदों में व्यक्त आश्रमों से कर सकते हैं. कुछ विद्वान प्लेटो द्वारा स्थापित उस विश्वविद्यालय को दुनिया का पहला विश्वविद्यालय मानते हैं. मेग्ना ग्रेशिया की यात्रा के दौरान प्लेटो पाइथागोरस के अनुयायियों के संपर्क में आया था, जो गणित एवं विज्ञान के क्षेत्र में शोधरत रहते थे. उस विश्वविद्यालय का ढांचा उन्हीं की प्रेरणा से तैयार किया गया था. पाठ्यक्रम में गणित, धर्म, दर्शन, विज्ञान, राजनीति, ज्योतिष, कानून आदि को सम्मिलित किया गया था. इनके अलावा बच्चों को शारीरिक व्यायाम की शिक्षा भी नियमित रूप से दी जाती थी. प्लेटो ने अपनी ‘अकादमी’ यूनानी देवता मूस को समर्पित की थी. ज्ञानार्जन के लिए वहां आपसी तर्क-वितर्क और संवाद-पद्धति को अपनाया जाता था, जो सुकरात की सर्वप्रिय शैली थी. ‘अकादमी’ का परिसर घने, छायादार वृक्षों से घिरा था, जो लौंग की गंध से महमहाता रहता था. पूरा वातावरण शांत और सौहार्दपूर्ण था. कुछ ही अवधि में अकादमी ने स्वयं को एथेंस के प्रमुख शिक्षा-केंद्र के रूप में स्थापित कर लिया. आसपास के नगर-राज्यों के विद्यार्थी और जिज्ञासु वहां आने लगे.

ऐसे अभिलेख भी मिले हैं, जिनके अनुसार विश्वविद्यालय के मुख्यद्वार पर एक प्रस्तर आलेख खुदा था, जिसके अनुसार विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए ज्यामिती का ज्ञान अनिवार्य था. कुछ विद्वानों का मत है कि प्लेटो की गणित के बारे में रुचि पाइथागोरस के समर्थकों के संपर्क में आने के बाद पैदा हुई थी. वह स्वयं गणित में प्रवीण था. ‘अकादमी’ में पढ़ाए जाने विषयों के स्पष्ट पाठ्यक्रम का अभाव था, किंतु वरिष्ठताक्रम का पूरा ध्यान रखा जाता था. अध्यापन के लिए उस समय के प्रसिद्ध आचार्यों को नियुक्त किया गया था. आवश्यकता पड़ने पर वह बाहर से भी जाने-माने अध्यापकों और विद्वानों को आमंत्रित करता रहता था. वहां पढ़ाने वालों में गणितज्ञ, ज्योतिष-विज्ञानी, भूवेत्ता, चिकित्सक, वैज्ञानिक यूडोक्सस भी था. प्लेटो स्वयं दर्शन, तत्वविज्ञान, नीतिशास्त्र आदि विषय पढ़ाता था. वह विद्यार्थियों और विद्वानों को नए-नए विषयों पर विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित करता था. अकादमी में वैज्ञानिक शोध की भी व्यवस्था थी. प्लेटो के ‘टाइमियस’ जो प्रकृति-विज्ञान के अध्ययन और तत्संबंधी प्रयोगों को लेकर प्रमुख ग्रंथ है, अकादमी में हुए शोध का ही निक्ष है. वहां की अध्यापन की शैली विचित्र थी. प्रतिदिन कक्षा आरंभ होने से पहले विद्यार्थियों को एक विषय दे दिया जाता था, जिसपर सब खुले मन से चर्चा करते थे. उस विमर्श से निकलने वाला निष्कर्ष भी अंतिम नहीं था. शंका होने पर कोई भी उसपर अगले दिन नए सिरे से चर्चा की शुरुआत कर सकता था. वहां पढ़ाए जाने वाले विषयों में ‘राजनीति’ प्रधान विषय था, जिसका नियमित अध्यापन होता था. ‘अकादमी’ का पुस्तकालय बेहद समृद्ध था. उसमें विभिन्न देशों के लिखित संविधान की प्रतिलिपियां, विद्वानों, राजनेताओं के ग्रंथ, पांडुलिपियां, आलेख, लिखित भाषण आदि भारी संख्या में उपलब्ध थे. उन्हें जुटाने के लिए प्लेटो को अथक प्रयास करना पड़ा था, जिसमें उसके अर्जित धन का बड़ा हिस्सा भी खर्च हुआ था. अकादमी में संविधान और कानून की पढ़ाई मुख्यरूप से होती थी. कुछ ही समय में अकादमी की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी थी. अकादमी में अध्ययन करने वाले प्रतिष्ठित लोगों की लंबी सूची है.

जीवन में नैतिकता एवं उच्चादर्शों को सर्वाधिक महत्त्व देने वाला प्लेटो दासप्र्रथा का समर्थक था. वह इस तथ्य से भी प्रमाणित होता है कि अकादमी में जनसाधारण के लिए शिक्षा की अनुमति न थी. वहां केवल अभिजातवर्ग के सदस्य शिक्षा ग्रहण कर सकते थे. प्लेटो ने हालांकि सोफिस्टों की आलोचना की है. किंतु उसने अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित प्लेटो का लक्ष्य था कि अकादमी के द्वारा भावी राजनीतिज्ञों को दर्शन, विज्ञान, राजनीति, कानून आदि की शिक्षा दी जाए. ‘रिपब्लिक’ तथा ‘स्टेटसमेन’ में वह पहले ही लिख चुका था कि केवल दार्शनिक ही श्रेष्ठतर सम्राट सिद्ध हो सकते हैं. शायद इसीलिए अकादमी में दर्शन को प्रमुख विषय के रूप में पढ़ाया जाता था. प्लेटो और उसके साथियों को इसपर गर्व भी था. सुकरात का असर वहां पढ़ाए जाने वाले दर्शनशास्त्र के पाठ्यक्रम पर स्पष्ट था. उसके अलावा जिस दार्शनिक का अकादमी के पाठ्यक्रम पर गहरा प्रभाव पड़ा, वह था पाइथागोरस. प्लेटो स्वयं दर्शनशास्त्र का अध्यापन करता था. कुछ विद्वानों के अनुसार प्लेटो ‘अकादमी’ के माध्यम से अपनी उन मान्यताओं को साकार करना चाहता था, जो उसने ‘रिपब्लिक’ में व्यक्त की थीं. जबकि अन्य का विचार है कि प्लेटो अपने आदर्श समाज के सपने को आगे बढ़ाना चाहता था, जिसमें नागरिक स्वयं प्रबुद्ध एवं अनुशासित हों, इसलिए वहां औपचारिक पाठ्यक्रम के बजाय अध्यापन के लिए संवाद-शैली का प्रयोग किया जाता था. विद्यार्थी अपनी समस्या समूह के बीच रखते. तदनंतर सभी उसपर मुक्त चर्चा में हिस्सा लेते थे. प्लेटो हालांकि पांचवी शताब्दी के यूनानी दार्शनिक डेमोक्रिटिस की स्थापनाओं से असहमत था, जिसे परमाणुवाद का जनक माना जाता है, लेकिन वैज्ञानिक शोध में उसको पूरा विश्वास था. इसलिए अकादमी परिसर में वैज्ञानिक शोध पर भी नियमित काम चलता था. भावी राजनीतिज्ञों के लिए तो वह मानो तीर्थस्थली थी.

प्लेटो की मृत्यु के उपरांत अकादमी का दायित्व क्रमशः स्पीसिप्पस(347—314 ईस्वी पूर्व), जेनोक्रेट्स (339—314 ईस्वी पूर्व), पोलेमा(314—269 ईस्वी पूर्व) से होता हेगेसीनस (160 ईस्वी पूर्व) तक जाता है. उसके सम्मानित सदस्यों में अरस्तु, हेराक्लाडस, यूडोसस, फिलीप्पस, क्रेंटर जैसे महान दार्शनिक रहे हैं. लगभग तीन सौ वर्ष तक अपने उत्थान-पतन के अनेक दौर देखने के बावजूद ‘अकादमी’ अपना काम करती रही. उसके पतन का दौर 88 ईस्वी पूर्व शुरू हुआ, जब रोमन कमांडर लुइस कोरनिलयस सूला ने भारी दलबल के साथ एथेंस पर हमला कर उसको युद्ध में पराजित किया. सूला तानाशाह प्रवृत्ति का था. उसका लक्ष्य पारेअस पर कब्जा जमाना था, जो एथेंस विजय के बिना संभव न था. इसलिए भारी-भरकम सेनाओं के दम पर उसने पूरे एथेंस की नाकेबंदी कर दी. सूला को युद्धक हथियारों के लिए भारी मात्रा में लकड़ी की जरूरत थी. उसके आदेश पर अकादमी परिसर, जो एथेंस का सर्वाधिक हरा-भरा क्षेत्र था, के सभी वृक्ष काट डाले गए. कुछ ही घंटों में पूरी अकादमी उजाड़ दी गई. अकादमी के तत्कालीन प्रधान आचार्य फिलो आ॓फ लेरिसा को परिसर छोड़ना पड़ा. सुकरात की वार्तालाप शैली को समर्पित प्लेटो, हेराक्लाइट्स, यूडोसस, फिलीप्पस, केंटर जैसे महान दार्शनिकों की अध्यापन-स्थली एक सनकी तानाशाह की महत्त्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़कर वीराने में बदल गई. उसके करीब दस वर्ष बाद सिसरो ने अकादमी स्थल का भ्रमण किया तो वहां सिवाय उजाड़ मैदान के कुछ नहीं था. एक तानाशाह शासक ने महान प्लेटो के सपने को मिट्टी में मिला दिया. पर सच में जो मिटा वह प्लेटो की स्मृति का भौतिक अवशेष था. क्योंकि प्लेटो तो अपने वृहत लेखन और अपने उन समर्थकों में जीवित था, जो ज्ञान के आगे किसी भी अन्य प्रलोभन के आगे झुकने को तैयार न थे.
क्रमशः….

ओमप्रकाश कश्यप
opkaashyap@gmail.com

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Filed under प्लेटो : स्वप्नदृष्टा दार्शनिक

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