अंतोनियो ग्राम्शी और उसका सांस्कृतिक अधिपत्यवाद

यह एक विचित्र संयोग है कि यूरोप के बौद्धिक जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले इटली के अधिकांश विद्वानों ने अपने जीवन का लंबा और महत्त्वपूर्ण हिस्सा कारावास में बिताया तथा वहीं रहते हुए उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ लेखन भी किया. उनके लेखन और विचार-क्षेत्र में भी गजब की समानता थी. उनके चिंतन का प्रमुख उद्देश्य उत्पीड़ित जनता के सामंतवादी-पूंजीवादी शोषण से मुक्ति की राह खोजना था. इसके लिए वे शैक्षिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन के समर्थक थे. प्लेटो से प्रभावित तोमासो कंपानेला(1568—1638) जीवन में शिक्षा को अत्यधिक महत्त्व देता था. उसका मानना था कि नगर-राज्य के शासकों का चयन धन अथवा जन्म के आधार पर न होकर, उनकी शिक्षा के आधार पर किया जाना चाहिए. केवल शिक्षा व्यक्ति की योग्यता का मापदंड हो सकती है. इटालियन भाषा में लिखी गई उसकी पुस्तक ‘सिटी आ॓फ दि सन’ असल में एक आदर्शलोक का बयान करती है, जिसमें उसने संपत्ति पर निजी अधिकारिता के आगे प्रश्नचिह्न लगाते हुए लिखा था कि—‘सामाजिक शांति और सद्भाव का स्थायित्व तथा व्यक्तिमात्र की खुशी निजी संपत्ति के उन्मूलन पर निर्भर करती है.’ उसके अनुसार—‘निजी संपत्ति सामाजिक सुरक्षा और शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा है. यह सामाजिक एकता को स्थायी रूप से क्षति पहुंचाती है.’ इसलिए अपने ‘यूटोपिया’ में उसने सभी वस्तुओं को सामूहिक आधिकारिता में सम्मिलित किया है. प्लेटो से प्रेरणा लेते हुए ‘सिटी आ॓फ सन’ में उसने ऐसे आदर्श नगर-राज्य की परिकल्पना की है, जिसमें सभी साथ-साथ रहते हैं. एक रसोई का बना भोजन करते हैं. उनमें आपसी विश्वास और सहिष्णुता की भावना हैं. उनके संयुक्त आवासकक्षों, शयनकक्षों में इतनी नीरवता व्याप्त रहती है, जैसी गिरजाघर के प्रांगण में. यहां कंपानेला को याद करने का उद्देश्य मात्र यह बताना है कि महान दार्शनिक फ्रांसिस बेकन के समकालीन कंपानेला ने अपनी उपर्युक्त पुस्तक की रचना सताइस वर्ष के कारावास की दीर्घावधि सजा भोगते हुए की थी.

कंपानेला की भांति अंतोनियो ग्राम्शी ने भी अपना महत्त्वपूर्ण कार्य कारावास में ही पूरा किया था. जेल में रहते हुए उसने 2848 पृष्ठों की विशद् पांडुलिपि तैयार की, जो ‘कैदी की डायरी’(दि प्रिजन नोटबुक) के नाम से चर्चित है. समय-समय पर लिखी गई वे डायरीनुमा टिप्पणियां मार्क्सवाद पर सर्वथा नए ढंग से विमर्श करती हैं. पूंजीवाद के प्रसार-प्रचार के लिए उसने ‘सांस्कृतिक अधिनायकवाद’ को दोषी माना है. उसके अनुसार पूंजी का समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ओर अंतरण सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों की देन होता है. इसलिए समानांतर संस्कृति के विकास से ही आर्थिक-सामाजिक विषमता की खाई को पाटा जा सकता है. अंतोनियो ग्राम्शी का जन्म 22 जनवरी 1891 को सरदीनिया द्वीप के केगलियरी प्रांत में हुआ था. यह क्षेत्र इटली के सर्वाधिक निर्धनता-ग्रस्त क्षेत्रों में गिना जाता है. कुल सात भाई-बहनों में चैथी संतान ग्राम्शी के पिता का नाम फ्रांस्सिको ग्राम्शी तथा मां का नाम जियुसिपिना मार्सियस था. अल्बीनिया मूल के ग्राम्शी की अपने पिता से कम ही बनती थी, किंतु वह अपनी मां के बेहद करीब था. जियुसिपिना अच्छी किस्सागो थी. यथार्थ को छूती उसकी कहानियों में तीखा व्यंग्य छिपा होता था. बचपन में मां के मुंह से सुनी गई कहानियों का ग्राम्शी पर गहरा प्रभाव पड़ा. मां के मुंह से लोक-कहानियों के प्रति जन्मा अनुराग ही प्रकारांतर में युवा अंतोनियो के अंतर्मन में साहित्य-प्रेम के रूप में विकसित हुआ.

फ्रांस्सिको ग्राम्शी एक सरकारी कार्यालय में छोटे पद पर काम करते थे. परिवार बड़ा था. इस कारण समस्याएं भी थीं. मगर जियुसिपिना की कुशलता से परिवार की गाड़ी जैसे-तैसे खिंच रही थी. अंतोनियो के जीवन में बड़ा मोड़ उस समय आया जब मामूली अपराध के लिए उसके पिता को नौकरी से बेदखल कर उन्हें पांच वर्ष की कैद की सजा सुनाई गई. पिता फ्रांस्सिको परिवार की अर्थव्यवस्था का एकमात्र संबल थे. उनके कारावास में जाते ही परिवार पूर्णतः निराश्रित हो गया. रोजगार की तलाश में मां जियुसिपिना अपने बच्चों के साथ गिलर्जा के लिए प्रस्थान कर गईं, जहां अंतोनियो को पाठशाला में प्रवेश दिला दिया गया. उसके परिवार के लिए वे दिन भीषण अभावों और गरीबी से भरे दिन थे. लेकिन दुखों का अंत यहीं सीमित नहीं था. अंतोनियो के जीवन की एक और दुर्घटना उसका पीछा कर रही थी. उन्हीं दिनों की बात है. एक दिन अंतोनियों का नौकर उसको गोद में लेकर घुमाने निकला हुआ था. अचानक वह नौकर की गोद से फिसल गया. गिरने पर अंतोनियो की रीढ़ की हड्डी में चोट आई, जिससे उसका शारीरिक विकास अवरुद्ध हो गया. बड़े होने पर उसका कद पांच फुट से भी दो इंच कम था, जो सामान्य से बहुत कम था. इस असमान्यता ने ग्राम्शी को अंतर्मुखी बनाया. वह अपनी कल्पना की दुनिया पुस्तकों में सजाने लगा. ग्यारह वर्ष का होते-होते अंतोनियो को लगने लगा था कि परिवार के आर्थिक संकट के चलते आगे पढ़ना संभव न होगा. इसलिए पाठशाला की पढ़ाई पूरी करते ही उसको नौकरी करनी पड़ी. अगले दो वर्ष उसने एक कराधान कार्यालय में मामूली नौकरी करते हुए बिताए. ग्राम्शी के लिए जीवन के वे दिन बेहद अभावग्रस्त और चुनौती-भरे थे.

जीवनसंघर्ष ने ग्राम्शी को जुझारू बनाया. अभाव-भरे दिनों में भी उसका अध्ययन चल रहा था. कालांतर में उसको विद्यालय जाने का अवसर मिला, जहां उसने स्वयं को विलक्षण प्रतिभावान विद्यार्थी सिद्ध किया. उसने सभी विषयों में उच्च अंक प्राप्त किए थे. प्राथमिक अध्ययन के बाद उसने संत लसर्जियु के विद्यालय में प्रवेश ले लिया. यह स्थान गिलर्जा से लगभग 16 किलोमीटर दूर था. लसर्जियु में पढ़ाई पूरी करने के उपरांत उसने केगलियरी के डेटरी लाइसियम में प्रवेश ले लिया. उसका भाई जिनेरो भी वहीं अध्ययन करता था. केगलियरी के आसपास औद्योगिक श्रमिकों की सघन बस्तियां थीं. उस समय तक इटली में पूंजीवाद अपना शिकंजा कसने लगा था. वहां की तानाशाह सरकार के साथ मिलकर वह श्रम-शोषण के नए-नए तरीके ईजाद कर रहा था. उससे मुक्ति की वांछा के साथ श्रमिक आंदोलन होते ही रहते थे. वहां रहते हुए ग्राम्शी को श्रमिकों की समस्याओं को जानने का अवसर मिला. वह समाजवादी विचारकों, श्रमिक नेताओं और सुधारवादियों के संपर्क में भी आया. अंतोनियों नौकरी और पढ़ाई साथ-साथ कर रहा था. इसके बावजूद उसके जीवन के अभाव और पिता पर निर्भरता कम नहीं हुई थी. पिता की ओर से समय पर आर्थिक मदद न मिलने पर भी वह परेशान रहता था. अपने पत्रों में अंतोनियो ने अपने पिता पर आर्थिक मदद करने में जानबूझकर विलंब करने तथा उपेक्षा बरतने का आरोप लगाया है. लगातार काम और पढ़ाई के बीच उसका स्वास्थ्य निरंतर बिगड़ता जा रहा था. उसके स्नायुतंत्र में भी कमजोरी आने लगी थी, जो आगे चलकर उसके लिए भारी कष्ट का कारण बनी हुई थी. यह ग्राम्शी की जिजीविषा ही थी, जो उसको संघर्ष के लिए निरंतर पे्ररित करती आ रही थी. 1911 में ग्राम्शी ने स्नातक परीक्षा पास की. वह अपने अध्ययन को आगे बढ़ाना चाहता था, किंतु परिवार की आर्थिक स्थिति सर्वथा प्रतिकूल थी. मगर जहां संकल्प वहां विकल्प. युवा अंतोनियो ने एक परीक्षा में हिस्सा लिया और उच्च अंक प्राप्त करने के कारण उसको सदर्निया के सम्राट की ओर से छात्रवृत्ति का पात्र मान लिया गया. अंतोनियो के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी, जिसने उसके उच्च अध्ययन के लिए रास्ता खोल दिया.

अंतोनियो के साथ छात्रवृत्ति प्राप्त करने वालों में पालमिरो तोगलियत्ती भी था, जिससे उसकी दोस्ती बन गई. तोगलियत्ती आगे चलकर इटली की कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव बना और उसने स्वयं को एक दमदार नेता सिद्ध किया. अपने अध्ययन को आगे बढ़ाने के लिए ग्राम्शी ने उच्च अध्ययन के लिए तूरिन विश्वविद्यालय में प्रवेश ले लिया. तूरिन उन दिनों औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहा था. उसके आसपास के क्षेत्रों में गरीब श्रमिकों की संख्या बहुतायत थी. इसलिए वहां श्रम-शक्ति इटली के बाकी हिस्सों से सस्ती थी. वहां रहते हुए वह समाजवादी नेताओं के संपर्क में आया. इनमें से एक का नाम एंजलो तास्का का था. तास्का कालांतर में ‘इटालियन समाजवादी पार्टी’ का सदस्य बना और ग्राम्शी के साथ अनेक संघर्षपूर्ण अभियानों में हिस्सा लिया. एक ओर जीवन के अभाव, परिवार की ओर मिल रही उपेक्षा तथा बीमारी, इन सभी ने अंतोनियो के लिए विकट परेशानियां खड़ी की हुई थीं. उसकी शारीरिक विकलांगता बढ़ती जा रही थी, विशेषकर स्नायुतंत्र की समस्या, जिससे मुक्ति का कोई उपाय उसको नजर नहीं आ रहा था. चुनौतियों से कदम-कदम पर जूझते, भूख, गरीबी, अभाव और संघर्षों से गुजरते हुए अंतोनियो ने न केवल अपनी पढ़ाई की निरंतरता को बनाए रखा, बल्कि मानविकी, समाजविज्ञान, भाषाशास्त्र, राजनीति, दर्शनशास्त्र आदि क्षेत्रों में अनेक उपाधियां प्राप्त कर लीं. अंतोनियो के अध्यापक उसकी प्रतिभा से चमत्कृत थे. विशेषकर समाजविज्ञान और भाषाविज्ञान में तो उसका ज्ञान अप्रतिम था. अध्ययन के दौरान वह तत्कालीन बुद्धिजीवियों के संपर्क में आया, जिनमें बेनडिट्टो क्रूस जैसे प्रखर मार्क्सवादी विद्वान के अलावा रोन्डोल्फो मानडोल्फो, जियोवनी जेंटिल, अंतोनियो लाब्रओला आदि प्रमुख थे. उन्हीं के बीच रहते हुए ग्राम्शी ने हीगेल के द्वंद्ववाद, फायरबाख की धर्म-संबंधी अवधारणा तथा मार्क्स के वैज्ञानिक भौतिकवाद का गहरा अध्ययन किया. मार्क्स ने ग्राम्शी को प्रभावित तो किया परंतु उसके दर्शन की असंगतियां भी उससे छिप न सकीं.

पढ़ाई पूरी करने के पश्चात अंतोनियो जैसे प्रतिभाशाली छात्र के लिए अवसरों की कमी न थी. अध्यापन का क्षेत्र तो उसके स्वागत के लिए पूरी तरह तैयार था. किंतु एक ही ढर्रे से बंधा जीवन उसको स्वीकार न था. खूब सोच-विचार के बाद उसने पत्रकारिता को कैरियर के रूप में प्रधानता दी. 1914 से ही उसके लेख समाजवादी पत्रों में छपने लगे थे, जिन्हें व्यापक प्रसिद्धि मिली थी. फलस्वरूप एक लेखक-पत्रकार के रूप में ग्राम्शी की प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ रही थी. तूरिन के राजनीतिक, आर्थिक परिदृश्य को लेकर लिखे गए उसके लेख आंखें खोल देने वाले होते थे. 1916 में उसको तूरिन से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित समाचारपत्र ‘अवांति’ में सहसंपादक चुन लिया गया. इससे जीवन में कुछ आर्थिक स्थायित्व आया. पत्रकारिता के साथ-साथ ग्राम्शी ने खाली समय में श्रमिकों को पढ़ाने की जिम्मेदारी भी ओट रखी थी. एक कुशल वक्ता और नेतृत्वकर्ता के रूप में भी उसका नाम लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ था. श्रमिक संगठनों के बीच दिए गए उसके भाषण सदैव चर्चा का विषय बनते थे. वह रोमिन रोलेंड के प्रगतिवादी उपन्यासों, पेरिस कम्यून, फ्रांस तथा इटली की क्रांति, स्त्री-मुक्ति के प्रश्नों और मार्क्सवादी साहित्य पर अक्सर श्रमिकों के बीच विमर्श करता रहता था. इटली, विशेषकर उसके तूरिन प्रांत में समाजवादी विचारधारा का असर बढ़ता ही जा रहा था. लोग पूंजीवादी शोषण के विरुद्ध संगठित हो रहे थे. सरकार ने समाजवाद के उफान को थामने के लिए ताकत का इस्तेमाल किया. परिणाम यह हुआ कि 1916 में एक-एक कर इटली के अधिकांश समाजवादी नेता गिरफ्तार कर लिए गए. सरकार की दमनकारी नीति के विरोध में 1917 में श्रमिक आक्रोश भड़क उठा. ग्राम्शी की श्रमिक संगठनों के बीच विश्वसनीयता थी. श्रमिकगण उसके एक आवाह्न पर संगठित हो जाते थे. उसकी ख्याति एक समाजवादी विचारक एवं नेता की थी. 1919 में ग्राम्शी ने एंजलो तास्का,

उम्ब्रेटो तारसिनी तथा तोगलियाती के साथ मिलकर समाजवादी विचारधारा के समाचारपत्र ‘दि न्यू आर्डर: एक वीकली रिव्यू आॅफ सोशिलिस्ट कल्चर’ की शुरुआत की. कालांतर में वह बहुत प्रभावशाली समाचारपत्र सिद्ध हुआ. प्रारंभ में उसका प्रकाशन साप्ताहिक आधार पर किया जाता था, बाद में उसको द्वैमासिक कर दिया गया. उस पत्र ने श्रमिकों के बीच वर्गचेतना जाग्रत करने का काम किया. प्रगतिशील साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग पहले से ही श्रमिकों के समर्थन में था. ग्राम्शी और उसके सहयोगियों पर श्रमिकों के नेतृत्व का दायित्व था.

1917 की सोवियत क्रांति ने विश्व-भर के श्रमिक संगठनों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था. लेनिन से प्रभावित ग्राम्शी श्रमिक आंदोलनों की सफलता के लिए रात-दिन काम कर रहा था, किंतु श्रमिक नेताओं के आपसी मनमुटाव के कारण सरकार उनके आंदोलन को कुचलने में कामयाब हो गई. ग्राम्शी अकेला पड़ गया. आंदोलन की असफलता ने ग्राम्शी को रूस की भांति इटली में भी साम्यवादी दल के गठन के बारे में सोचने को विवश कर दिया. अपने सोच को कार्यान्वित करते हुए उसने 21 जनवरी 1921 को ‘कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इटली’ का गठन किया. ग्राम्शी को उसकी केंद्रीय समिति में स्थान मिला. बावजूद इसके वह पार्टी के कार्यक्रमों को लेकर कोई अग्रणी भूमिका निभाने में नाकाम रहा. तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी के नेतृत्व में इटली की फासिस्ट सरकार मनमानी पर उतारू थी. देश में उत्तरोत्तर गंभीर होती जा रही सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समस्याओं के निदान का कोई भी गणतांत्रिक हल उसको स्वीकार्य न था. नवंबर 1926 में तानाशाह सम्राट ने एक विशेष प्रस्ताव के जरिये इटली की संसद के साथ सभी विपक्षी संगठनों को भंग कर, उनके प्रकाशनों पर रोक लगा दी. विरोधी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. इटली में समाजवाद का पथ सहसा अवरुद्ध हो गया. 1922 में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य के रूप में वह रूस की यात्रा पर निकला, वहां उसका संपर्क जूलिया सुचेत नामक वायलिन वादक से हुआ. शीघ्र ही दोनों दांपत्य-बंधन में बंध गए. जूलिया स्वयं रूस की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य थी. उसने ग्राम्शी के दो बेटों डेलिनो और गुलियानो को जन्म दिया. जिन दिनों वह रूसी प्रवास पर था, इटली में तानाशाह मुसोलिनी समाजवादी नेताओं पर कहर बरपा रहा था. अधिकांश विरोधी कैद कर लिए गए थे. देश से बाहर रहकर भी ग्राम्शी पार्टी को बचाए रखने का भरसक प्रयत्न करता रहा. 1924 में उसको इटली की कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव चुन लिया गया. इससे पार्टी-नेतृत्व की समस्त जिम्मेदारी उसके ऊपर आ गई. पार्टी संगठन के लिए काम करते हुए उसने उसके मुखपत्र ‘यूनिटी’ का प्रकाशन आरंभ किया. इस दौरान वह स्वयं रोम के प्रवास पर था, जबकि उसका परिवार मास्को में रह रहा था.

1921 से 1926 के वर्ष ग्राम्शी के जीवन के सर्वाधिक कठिन दिन थे. उसने स्वयं उस अवधि को ‘संघर्ष और चुनौती’ से भरे वर्ष माना है. इटली में तानाशाह मुसोलिनी तथा विरोधी आमने-सामने थे. पूरे देश में तनाव व्याप्त था. 31 अक्टूबर, 1926 को मुसोलिनी पर विरोधियों द्वारा जानलेवा हमला किया गया. गुस्साए तानाशाह ने आपातस्थिति की घोषणा कर दी. साम्यवादी पार्टी के सभी बड़े नेता एक झटके में गिरफ्तार कर लिए गए. ग्राम्शी को इस षड्यंत्र की कोई जानकारी न थी. तानाशाह सरकार भी यह जानती थी. तो भी 8 नवंबर, 1226 की शाम पुलिस ने ग्राम्शी को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया. यह गिरफ्तारी ग्राम्शी को ‘कम्युनिस्ट पार्टी आ॓फ इटली’ की बैठक में सम्मिलित होने से रोकने के लिए की गई थी. फासीवादी सरकार किसी भी तरह समाजवादी आंदोलन को कुचल देना चाहती थी. गिरफ्तार ग्राम्शी को ‘रेजिन कोइली’ नामक जेल में ले जाया गया. रोम स्थित इस जेल में खतरनाक और कुख्यात अपराधियों को कैद करके रखा जाता था. उस समय ग्राम्शी की वयस् मात्र 35 वर्ष थी और शरीर अनेक व्याधियों से ग्रस्त. लेकिन सरकार तो उसके विचारों से आतंकित थी. ग्राम्शी की गिरफ्तारी पर मुसोलिनी की प्रतिक्रिया थी—‘हमें इसके दिमाग के सोचने पर लगाम लगा देनी चाहिए.’ अपने तानाशाह सम्राट की इच्छा को दोहराते हुए मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष के वकील ने कहा था—

‘हमें इसके दिमाग के सोचने पर अगले बीस वर्षों तक अंकुश लगा देना चाहिए.’

तानाशाह की अदालत ने वही फैसला दिया जो तानाशाह चाहता था. ग्राम्शी पर राष्ट्रदोह का आरोप लगाकर पांच वर्ष की सजा सुनाई गई. उसको उसटिका के सुदूर टापू पर कैद कर दिया गया. ग्राम्शी को खतरनाक जेल में कैद कर देने से ही सरकार को संतोष न हुआ. अगले ही वर्ष उसकी सजा बढ़ाकर बीस वर्ष कर दी गई. ग्राम्शी पहले से ही शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त था. जेल के वातावरण का सबसे बुरा असर उसके स्वास्थ्य पर पड़ा. जेल प्रशासन ने ग्राम्शी पर बाहर से आए लोगों से मिलने-जुलने पर प्रतिबंध लगाया हुआ था. केवल उसका भाई उससे संपर्क कर सकता था. जेल के प्रतिकूल वातावरण में ग्राम्शी का स्वावस्थ्य निरंतर गिरता जा रहा था. ग्राम्शी को दी गई सजा की प्रतिक्रिया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई थी. कई देशों ने उसको दी गई सजा की आलोचना की थी. 1932 में रूस ने इटली सरकार के समक्ष राजनीतिक बंदियों के आदान-प्रदान का प्रस्ताव रखा, किंतु इतालवी सरकार ने उसको अस्वीकार कर दिया. 1934 में ग्राम्शी की तबियत अचानक गंभीर हो जाने से सरकार के सामने समस्या खड़ी हो गई. अंततः तानाशाह सरकार ग्राम्शी को कड़ी शर्तों के आधार पर आजाद करने को तैयार हो गई. ग्राम्शी को उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया, किंतु उस समय तक काफी देर हो चुकी थी. डाक्टरी उपचार उसके स्वास्थ्य को स्थायी लाभ पहुंचाने में असमर्थ रहे. अंततः 27 अप्रैल, 1937 को उसने रोम स्थित कोसिसना नामक अस्पताल में अंतिम सांस ली. इस तरह बीसवीं शताब्दी का सर्वाधिक मौलिक विचारक, मनुष्यता के लिए सतत जूझता हुआ इस दुनिया से सदा के लिए कूंच कर गया.

ग्राम्शी के विरोधी उसके विचारों से भय खाते थे. उनकी कामना थी कि वह अपने दिमाग से काम न ले. किसी तरह सोचना बंद कर दे. इसके लिए उन्होंने उसको गहन कारावास में बंद भी किया था. ऐसे कारावास में जहां खूंखार कैदियों को बंद रखा जाता था. यह सोचकर कि जेल की अंधेरी, सीलनभरी कोठियों में उसका दिमाग अपने आप जकड़ जाएगा. लेकिन उनके ये मनसूबे कामयाब न हो सके. जेल में भी ग्राम्शी का मस्तिष्क सतत सक्रिया बना रहा. बल्कि कालकोठरी के एकांत और उसकी गहन नीरवता ने उसको और भी सक्रिय कर दिया था. तानाशाह के मनसूबों पर पानी फेरते हुए ग्राम्शी ने गिरफ्तार होने के तुरंत बाद अपनी वैचारिक परिकल्पनाओं को लेकर नए सिरे से अध्ययन करना प्रारंभ कर दिया था. वह सांस्कृतिक अधिपत्यवाद को पूंजीवाद के विकास में सहायक मानता था. जेल में रहते हुए लेखन-संबंधी भावी योजनाओं का उल्लेख उसने अपनी साली ततियाना को 9 मार्च 1927 को लिखे गए एक पत्र में किया था. पत्र में उसने कुछ ऐसा लिखने का उल्लेख किया था, जिसमें उसके निजी जीवन के साथ इटली के प्रख्यात बुद्धिजीवियों तथा उनके विचारों को लेकर व्यापक विमर्श हो. जिसमें भाषा-विमर्श के साथ इटली के समाज और राजनीति पर भी विशद् चर्चा हो. साथ ही उसके अपने समाज की चिंताएं तथा लोगों का दुख-दर्द भी हो.

एक अन्य पत्र में ग्राम्शी ने दावा किया था—‘मैं अंधेरे में पत्थर उछालने का कोई इरादा नहीं रखता. मेरे पास कहने के लिए कुछ खास बातें हैं.’ पत्र लिखते समय ग्राम्शी के दिमाग में क्या था, वह पूरी तरह तो सामने नहीं आ सका. नियति ने उसे इतना अवसर ही नहीं दिया कि वह अपने मस्तिष्क में समाए विचारों को पूरी तरह कागज पर उतार सके. तो भी जेल प्रवास के दौरान वह अपनी वैचारिक चेतना को शब्दों के माध्यम से कागज पर उतारता रहा. उसकी मृत्यु के समय जेल में लिखी गई उसकी तैतीस डायरियां बरामद हुई थीं. ततियाना उन्हें बचाकर इटली से बाहर ले जाने में सफल हो गई. यूं तो ग्राम्शी ने कारावास से बाहर रहकर भी सारगर्भित लेखन किया था, लेकिन उसकी ख्याति तैंतीस डायरियों तथा उन पत्रों के कारण हैं जो जेल में लिखे गए थे. उसकी मृत्यु पर टिप्पणी करते हुए पादरी ने हालांकि कहा था कि मरणासन्न अवस्था में ग्राम्शी को पुनर्जन्म पर विश्वास हो चला था. उसने अपने पापों के लिए पादरी के समक्ष ईश्वर से क्षमा मांगते हुए प्राण त्यागे थे. लेकिन जेल के दस्तावेज दर्शाते हैं कि मृत्यु के समय उसके पास कोई भी पादरी नहीं था. न ही उसने उस अवसर पर किसी से धार्मिक विश्वास का जिक्र ही किया था. रही पापों की बात, ग्राम्शी जैसा विचारक जिसने अपना पूरा जीवन विपन्नों-शोषितों के कल्याण की चिंता में बिताया था, वह कभी पाप का भागी हो ही सकता. उसके संघर्ष को पापकर्म बताने वाली धर्मसत्ता तानाशाह सरकार को झेलने तथा उसको समर्थन देते रहने के लिए स्वयं पाप की भागी थी.

सांस्कृतिक अधिपत्यवाद

बीसवीं शताब्दी के महानतम चिंतकों में अंतोनियो ग्राम्शी का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है. उसने मार्क्स के विचारों को अपनाया. किंतु बंधे-बंधाए ढर्रे पर चलने, उसकी रूढ़िग्रस्त परिभाषाओं को अपनाने के बजाय उसने मार्क्स द्वारा प्रणीत वैज्ञानिक समाजवाद की अपने ढंग से व्याख्या की. वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत की व्याख्या के लिए उसने संस्कृति को आधार बनाया और सांस्कृतिक अधिपत्य को शोषण के प्रमुख कारणों में गिना. अपने दस वर्ष से लंबे कारावास के दौरान उसने 30 से अधिक डायरियां तथा लगभग 500 पत्र लिखे थे. इनके अतिरिक्त लगभग 3000 पृष्ठों की साम्रगी इतिहास और सामाजिक विश्लेषण को लेकर प्राप्त हुई है. उसके लेखन को ‘कैदी की डायरियां’ शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित किया गया है. ग्राम्शी ने ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ को पूंजीवाद के सुरक्षाकवच की संज्ञा दी है. उसके अनुसार शोषण से मुक्ति का एक ही रास्ता है, सांस्कृतिक विषमता की गहरी खाई को पाटना. सांस्कृतिक-जातीय कुंठा के दायरों से बाहर निकलकर समानतावादी सोच को अपनाना. उसने श्रमिकों को प्रोत्साहित किया था कि वे शिक्षा पर जोर दें तथा अपने भीतर से समर्पित बुद्धिजीवी पैदा करें. प्रसंगवश उल्लेख किया जा सकता है कि ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ ग्राम्शी की मौलिक स्थापना नहीं थी. इस अवधारणा का सर्वप्रथम उल्लेख व्लादिमिर लेनिन द्वारा किया गया था. ‘सांस्कृतिक अधिपत्य’ से लेनिन का आशय श्रमिक वर्ग के संगठित राजनीतिक शक्ति को लोकतांत्रिक क्रांति के निमित्त तत्पर करने से था. ग्राम्शी ने इस अवधारणा का विस्तार करते हुए उन कारणों की व्यापक समीक्षा की थी, जो उसको मार्क्सवाद के प्रचार के अवरोधक जान पड़ते थे. जो समाज में पूंजीवाद को संरक्षण प्रदान करते हैं. जिनके कारण समाजवाद की स्थापना का सपना जिसे मार्क्सवाद अपने आरंभ से ही देखता आ रहा था—बीसवीं शताब्दी में पूरा न हो सका था. इसी के कारण पूंजीवाद आज पहले से कहीं अधिक मजबूत एवं सुरक्षित है. ग्राम्शी इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए पूंजीवाद न केवल हिंसा और राजनीतिक-आर्थिक मनमानी का सहारा लेता है, बल्कि वह सामाजिक आदर्शो एवं सांस्कृतिक प्रतीकों को भी अपने विमर्श में मनमाना रूप दे देता है. परिणामस्वरूप नौकरशाही और बुर्जुआवाद जनसाधारण की सामान्य तर्कबुद्धि में गहरे पैठ जाते हैं. इससे समाज, विशेषकर श्रमिक वर्ग के बीच यह रजामंदी बनने लगती है कि कामगार वर्ग तथा बुर्जुआवर्ग के हित परस्पर स्वतंत्र एवं एक-दूसरे से भिन्न हैं. यह प्रवृत्ति उन्हें परिस्थिति से अनुकूलन की ओर ले जाती है. इससे दोनों के बीच व्याप्त कृत्रिम स्तरीकरण नैसर्गिक व्यवस्था का रूप लेने लगता है, जो अंततः श्रमिक आक्रोश और उसके संघर्ष को कमजोर करता है. अपनी दुरवस्था को श्रमिक अपनी नियति मानने लगता है और उसके निदान के लिए पराभौतिक शक्तियों की शरण में चला जाता है. इससे न केवल उसका संघर्ष कमजोर पड़ता है, बल्कि दुरवस्था के लिए जिम्मेदार कारकों से मुक्ति की उसकी छटपटाहट भी कमजोर पड़ने लगती है. उसकी यह प्रवृत्ति धर्मसत्ता को समाज में अपरिहार्य एवं शक्तिसंपन्न बनाती है, जो सर्वहारा के मुक्ति-संघर्ष को कमजोर करने का काम करता है.

ग्राम्शी के चिंतन का मुख्य बिंदू भी यही है. उसके अनुसार सांस्कृतिक संरक्षणवाद सामाजिक शक्ति-केंद्रों पर राज करता है. मनुष्य केवल विवेक से ‘सांस्कृतिक अधिपत्य’ की जकड़न से बाहर आ सकता है. शिक्षा जिसका प्रमुख लक्ष्य मनुष्यमात्र को अज्ञान के अंधेरे से बाहर निकालना है, इस लक्ष्य की प्राप्ति में मनुष्य का मार्गदर्शन कर सकती है. इसलिए श्रमिकों को चाहिए कि वे शिक्षा को महत्त्व देते हुए अपने बीच से प्रतिबद्ध और संकल्पवान बुद्धिजीवी पैदा करें. किंतु बुद्धिजीवियों की विश्वसनीयता का पैमाना क्या हो? ‘सांस्कृतिक अधिपत्य’ का सामना करने के लिए वैकल्पिक सांस्कृतिक मूल्यों, प्रतीकों का गठन भी तो बुद्धिजीवियों के सहयोग और समर्थन के बगैर संभव नहीं है. जेल की कालकोठरी में जीवन जीते हुए ग्राम्शी ने इस अवस्था पर भी गंभीर विचार किया था. उसके अनुसार बुद्धिजीवियों की पहचान सामाजिक परिवर्तन के निमित्त उनकी भूमिका से आंकी जानी चाहिए. न कि सिर्फ उनके लेखन और वक्तव्यों के आधार पर. यानी परिवर्तन के इच्छुक बुद्धिजीवी का सामाजिकरूप से सक्रिय होना आवश्यक है. ऐसे बुद्धिजीवी जो अपने समूह की चिंताओं, समस्याओं से परिचित हों; तथा उनके निदान के लिए निरंतर आंदोलनरत रहने का साहस भी रखते हों, उन्हें वरीयता दी जानी चाहिए. ग्राम्शी के अनुसार सामाजिक निष्क्रियता के दौर में तकनीकी तथा राजनीतिक नेतृत्व धीरे-धीरे अपनी पकड़ बनाने लगते हैं और कालांतर में दूसरों को छोड़कर इतना आगे निकल जाते हैं कि उन के वर्चस्व से मुक्ति जनसाधारण के लिए असंभव-सी हो जाती है. उन्हें नियंत्रण में रखने के लिए आवश्यक है कि श्रमिक वर्ग अपने बुद्धिजीवियों की मदद से समानांतर राजनीतिक-सांस्कृतिक संस्थाओं का विकास करे.

ग्राम्शी की ‘बुद्धिजीवी’ की परिभाषा व्यापक है. उसके अनुसार हर वह व्यक्ति बुद्धिजीवी है जो धनार्जन के लिए सीधे श्रम के बजाय बुद्धिबल से काम लेता है, तथा श्रम की अपनी आवश्यकता बाजार से पूरी करता है. तदनुसार उसने ‘पूंजीवादी उद्योगपति’ को प्रथम ‘बुद्धिजीवी स्वीकार किया है. जो अपने साथ तकनीक विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, संस्कृतिकर्मी, विधिवेत्ताओं का समुच्चय बनाता है तथा उनको अपने हितों के अनुरूप उपयोग में लाता है. वह स्वयं इस संगठन के शीर्ष पर विराजमान रहता है तथा अपने समूह के सदस्यों के स्तर-निर्धारण के लिए एकमात्र निर्णायक शक्ति होता है. सहायक बुद्धिजीवियों की मदद से वह श्रमिकों के दिलों में यह बात भली-भांति बिठा देता है कि उनकी दुर्दशा के कारण कहीं और विद्यमान हैं और वह उनका सर्वप्रथम शुभचिंतक है. ग्राम्शी के अनुसार हमें मालूम होना चाहिए कि बहुत-से बुद्धिजीवी अपने समूह के भीतर स्वयं को स्वतंत्र और सर्वेसर्वा घोषित कर शीर्षस्थ स्थान कब्जाए रखते हैं. वे स्वयं और अपने समूह को दूसरों से अलग तथा विशिष्ट माने रहते हैं. यह विशिष्टताबोध उन्हें आय का बड़ा हिस्सा अपने पास रखने, अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए दूसरों पर शासन करने को प्रेरित करता है. ऐसा कोई भी सामाजिक समूह जो पूर्ववर्ती आर्थिक संरचना का निषेध कर इतिहास में दस्तक देना चाहता है, उसको समकालीन बुद्धिजीवियों से बौद्धिक स्तर पर भी जूझना पड़ता है. उससे उम्मीद की जाती है कि वह परिवर्तनों को चाहे वे कितने ही प्रगतिगामी क्यों न हों, इतिहासक्रम को बगैर झुठलाए तथा प्रचलित व्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचाए बिना पूरा करे. ऐसे बुद्धिजीवियों को ग्राम्शी ने ‘परंपरा-पोषक बुद्धिजीवी’ के विशेषण से नवाजा है. ऐसे बुद्धिजीवियों में प्रशासक, रूढ़िवादी दार्शनिक, सिद्धांतकार, विधिवेत्ता, शिक्षक, प्रोफेसर, वैज्ञानिक आदि होते हैं. ऐसे कथित बुद्धिजीवियों को यदा-कदा ‘क्लर्क’ से भी संबोधित किया जाता है, जो इन छद्म विद्वानों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त संबोधन है. यदि हम छद्म बुद्धिजीवियों की पहचान के लिए कोई सार्वत्रिक कसौटी बनाने की कोशिश करें या उनके विचारों के सहारे गतिशील सामाजिक समूहों का अध्ययन करने का प्रयास करें तो यह असंभव है. इसलिए कि अपनी प्रगतिशीलता का मुखौटा लगाए ये छद्म बुद्धिजीवी सच को आसानी से बाहर नहीं आने देते. इस प्रकार के बुद्धिजीवियों की बौद्धिक गतिविधियों की व्याख्या करना, बजाय इसके कि जिस समाज में ये बुद्धिजीवी रहते हैं, उनका अध्ययन किया जाएµसैद्धांतिक रूप से अनुचित होगा. छद्म बुद्धिजीवियों का एक लक्षण यह भी है कि वे बौद्धिक श्रम को शारीरिक श्रम पर वरीयता देते हैं, तथा समाज में वर्गभेद का समर्थन करते हैं. इससे वास्तविक उत्पादक को, जो अपने श्रम-कौशल से उत्पादन को संभव बनाता है, उत्पादन का पूरा लाभ नहीं मिल पाता. इससे शोषण को बढ़ावा मिलता है. अपने प्रतिक्रियावादी चिंतन द्वारा ये बुद्धिजीवी समाज में यथास्थिति बनाए रखने में सहयोग करते हैं. परिणामस्वरूप सामाजिक विकास अवरुद्ध हो जाता है.

ग्राम्शी ने वर्गभेद की समस्या के निदान के लिए शिक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया है. उसके अनुसार केवल शिक्षा ही ऐसा उपक्रम है, जिससे इन छद्म बुद्धिजीवियों के प्रलोभन में आने से बचा जा सकता है. इसलिए श्रमिक वर्ग को चाहिए कि वह अपने भीतर से समर्थक बुद्धिजीवी पैदा करे. ऐसे बुद्धिजीवी जो समानांतर संस्कृति को जन्म देने में सक्षम हों. कालांतर में ये बुद्धिजीवी इस अवधारणा को कि मध्यवर्गी जीवनमूल्य समाज ही वास्तविक मूल्यों का पर्याय हैं, उखाड़ फेंकने में सक्षम होंगे. इनके प्रभाव से बुद्धिजीवी वर्ग का ध्यान शोषित वर्गों की ओर आकर्षित होगा, जो कालांतर में आमूल परिवर्तनों को जन्म देगा. ग्राम्शी का यह सिद्धांत ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ कहलाता है, जिसमें विकसित संस्कृति अपने भीतर के अल्पविकसित सांस्कृतिक समूहों को भ्रमित किए रहती है. वह उन्हें अपनी दुरवस्था के कारणों की तह में जाने से रोकती है. लेनिन का विचार था कि संस्कृति राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक है. दूसरी ओर ग्राम्शी का मानना था कि वर्तमान परिदृश्य में सत्ता प्राप्ति के लिए सांस्कृतिक अधिपत्य के बिना संभव नहीं, इसलिए समानांतर संस्कृति के विकास द्वारा पहले सांस्कृतिक वर्चस्व प्राप्त करना चाहिए. ग्राम्शी का विश्वास था कि कोई भी समूह जो आधुनिक परिदृश्य में समाज के नेतृत्व की जिम्मेदारी उठाना चाहता है, उसको अपने क्षुद्र आर्थिक स्वार्थों से ऊपर उठकर बौद्धिक एवं नैतिक नेतृत्वकारी योग्यता अपने भीतर पैदा करनी होगी. साथ ही उसको विभिन्न प्रकार के संगठनों और सहयोगियों के साथ तालमेल बनाना चाहिए, तभी वह चारों और से उमड़कर आने वाली चुनौतियों का सामना कर सकता है. ग्राम्शी ने सामाजिक बलों के संगठन को ‘ऐतिहासिक गुट’ की संज्ञा दी थी. यह पद उसने उनीसवीं शताब्दी के फ्रांसिसी वामपंथी विचारक जार्ज सोरेल से उधार लिया था. उसने उम्मीद जाहिर की थी कि ऐतिहासिक गुटों का गठन पूर्व निर्धारित सामाजिक व्यवस्थाओं के अनुसार किया जाएगा, जो विभिन्न संस्थाओं के साथ गठजोड़ कर सामाजिक संबंधों और धारणाओं का विकास करेंगे.

ग्राम्शी का मानना था कि पश्चिम में बुर्जुआ संस्कृति के मूल्य धर्म से आबद्ध थे. इसलिए वर्चस्ववादी संस्कृति की अधिकांश व्याख्याएं धार्मिक रीति-रिवाजों और मूल्यों को समर्पित रही हैं. कहीं न कहीं वह रोमन कैथोलिज्म से प्रेरित और प्रभावित था और मानता था कि चर्च ने उच्च शिक्षित और अल्प शिक्षित नागरिकों के धर्म के बीच खाई को बढ़ने से रोका है. समाज में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक विभाजन चाहे जितना बड़ा हो, किंतु धार्मिक आधार पर उनके बीच बहुत कम अंतर देखने को मिलता है. लेकिन धार्मिक कर्मकांडों में समानता व्यक्ति को उसकी आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता से विमुख किए रखती है, जिससे वह अपने शोषण के लिए अपनी नियति को दोषी मानने लगता है. उसका मानना था कि केवल मार्क्सवाद ने ही धर्म की विशुद्ध वैज्ञानिक आधार पर आलोचना है. और उसको उदार मानवतावाद के रूप में पहचान दिलाने के लिए संघर्षरत रहा है. उसकी यह भी मान्यता थी कि मार्क्सवाद धर्म को केवल उस अवस्था में चुनौती दे सकता है, जब वह जनसाधारण की पराभौतिक जिज्ञासाओं का समाधान करने में सफल हो तथा आम जनता उसको अपने अनुभव के माध्यम से अभिव्यक्त कर सके. धर्म वस्तुतः एक जटिल अवधारणा है. मनुष्य की पारलौकिक जिज्ञासाओं के शमन का दायित्व दर्शन और अध्यात्म का है. धर्म में सामाजिक आचार-विचार और अध्यात्म घुल-मिल जाते हैं. मार्क्सवाद स्वयं एक दर्शन है, किंतु मार्क्स तथा उसके अनुयायियों द्वारा मार्क्सवाद का प्रचार-प्रसार के लिए वही रास्ते अपनाए गए, जो उस समय तक धर्म के लिए लगभग आरक्षित थे. मार्क्स को उसके समर्थकों द्वारा भगवान मान लिया गया. मार्क्सवाद को लेकर कुछ ऐसी ही स्थिति आज भी है. ग्राम्शी इस अतिशय समर्पण के खतरों को पहचानता था. वह शिक्षा को परिवर्तनकारी शक्ति मानता था. उसका मनुष्यमात्र में गहरा विश्वास था. उसका मानना था कि—

‘सभी मनुष्य प्रतिभासंपन्न होते हैं….वे तर्कसम्मत और प्रतिभाशाली लोगों से युक्त संगठनों का संचालन भी करते हैं…लेकिन वे सभी प्रतिभासंपन्न लोग, बुद्धिमानों जैसे सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह नहीं करते.’

बुद्धिजीवियों की चारित्रिक विशेषता की ओर संकेत करते हुए उसने लिखा था कि वे प्राचीन दार्शनिकों की भांति महज चिंतक और वक्ता नहीं हैं, जो समाज को अपने ज्ञान से समृद्ध कर निर्लिप्तता ओढ लेते हों. अपने समाज का प्रबोधीकरण, व्यक्तिमात्र का चारित्रिक उत्थान उनके आचरण का सहज-स्वाभाविक हिस्सा था, न कि व्यवसाय. इसके वह निजी सुख की परवाह किए बिना कर्तव्य मानकर करते थे. दूसरी ओर आधुनिक बुद्धिजीवी पूर्णतः व्यावहारिक तथा जोड़-घटाव करने वाले नौकरशाहों जैसे हैं. वे शिक्षा, संचार आदि समाजोपयोगी माध्यमों का उपयोग समाज में वर्गभेद पैदा करने तथा सामाजिक स्तरीकरण को बढ़ावा देने के लिए करते हैं. इस तरह वे समाज में पूंजीवाद को मजबूत करने में सहायक की भूमिका निभाते हैं. इन स्थितियों पर नियंत्रण कैसे किया जाए? कैसे उन छद्म बुद्धिजीवियों से जनसामान्य को मुक्ति दिलाई जाए—ग्राम्शी ने इसपर विस्तार से लिखा है. उसका मानना था कि प्रायोगिक शिक्षा समाज में श्रम-संस्कृति के विकास में सहायक हो सकती है. अतएव उसने ऐसी शिक्षा के विकास पर जोर दिया था, जो न केवल श्रमिकों को आत्मनिर्भर बनाए बल्कि उनके बीच से संकल्पवान बुद्धिजीवी पैदा कर सके. ग्राम्शी के अनुसार ऐसे बुद्धिजीवी न केवल सर्वहारावर्ग की मदद के बगैर समाजवादी विचारधारा को स्थापित करने के लिए तत्पर होंगे, साथ ही अभिजात संस्कृति को जनसंस्कृति में बदलने के लिए भी प्रयासरत होंगे. ग्राम्शी के शिक्षा-संबंधी विचारों का प्रायोगिक विस्तार आगे चलकर ब्राजील के दार्शनिक पाब्लो फ्रेरा के चिंतन-कर्म में देखने को मिलता है.

ग्राम्शी की ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ पूंजीवादी राज्य की विशेषताओं की ओर संकेत करता है. जिसका आशय है बल और सहमति द्वारा राज करना. पूंजीवादी शक्तियों के समर्थन पर टिका राज्य अपनी नीतियों एवं कर्तव्यों द्वारा श्रमविरोधी आचरण अपनाता है. वहां आमजन की उपयोगिता एक उपभोक्ता वस्तु जितनी ही होती है. सरकार की समस्त नीतियां और अन्यान्य व्यवस्थाएं इसी को बनाए रखने को प्रयासरत होती हैं. लेकिन पूंजीवाद की अच्छी सेहत के लिए सस्ता श्रम चाहिए और भरपूर उपभोक्ता भी. इसलिए इसलिए पूंजीवादी सरकार अपने समस्त आयोजन आमसहमति के नाम पर करती है. कह सकते हैं कि पूंजीवादी राज्य लोकतंत्र को अपने सुरक्षाकवच की भांति अपनाए रहते हैं. इससे जनसहमति के नाम बना पूरा का पूरा तंत्र पूंजीवादी मंसूबों को साधने वाली मशीन बन जाता है. यहां ‘राज्य’ का आशय केवल सरकार तक सीमित नहीं है. बल्कि वह व्यापक अर्थ लिए हुए है. ‘राज्य’ पद से ग्राम्शी का आशय ‘राजनीतिक समुदाय’ तथा ‘जनसमुदाय’ के समुच्चय से है. पुनः राजनीतिक समुदाय से उसका अभिप्राय समस्त राजनीतिक संस्थानों एवं संवैधानिक उपक्रमों से है, जो आधुनिक समाज को व्यवस्थित बनाए रखने के लिए अनिवार्य माने गए हैं. इसी प्रकार जनसमुदाय से ग्राम्शी का आशय निजी और राज्येत्तर संस्थाओं से है, जिन्हें कोई जीवंत समाज स्वेच्छा और स्वतःअनुशासन की भावना से गठित करता है. इनमें ‘राजनीतिक समुदाय’ बल का प्रतीक है, जबकि ‘जनसमुदाय’ स्वानुशासन की उदात्त भावना का. ग्राम्शी ने आग्रहपूर्वक कहा था कि उपर्युक्त वर्गीकरण विशुद्ध वैचारिक है. वास्तव में ये दोनों परस्पर इतने घुले-मिले हैं कि इनके बीच स्पष्ट विभाजन-रेखा खींच पाना असंभव-सा है.

ग्राम्शी का मानना था कि आधुनिक पूंजीवाद पहले की अपेक्षा कहीं अधिक चतुर और स्वार्थी है. इसमें बुर्जुआ वर्ग समाज पर अपना आर्थिक नियंत्रण बनाए हुए है. यदा-कदा श्रमिकों को भुलावे मंे रखने के लिए वह उनके संगठनों की कुछ शर्तें भले ही स्वीकार कर ले, किंतु उसके समस्त प्रयत्न स्वार्थ-केंद्रित तथा समाजवाद की पवित्र भावना के प्रतिकूल होते हैं. वह पूंजीवाद को समाजवाद के विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर, उसके विरुद्ध संघर्ष की दिशा बदलने का प्रयास करता है. ग्राम्शी ने बुर्जुआ वर्ग के आचरण को ‘निष्क्रिय क्रांति’ की संज्ञा दी है, जो अपने आर्थिक-राजनीतिक स्वार्थ से परे कुछ सोच ही नहीं पाता. इस प्रकार वह समाज में स्तरीकरण को बढ़ावा देने का कारण बनता है. मैकियावेली से प्रेरणा लेते हुए उसने क्रांतिकारी संगठनों को ‘आधुनिक युवराज’ की उपमा देते हुए परिकल्पना की थी कि ये ‘आधुनिक युवराज’ श्रमिकवर्ग को अपने भीतर वास्तविक बुद्धिजीवी पैदा करने के लिए प्रेरित करेंगे, जिससे जनसमाज में एक वैकल्पिक नेतृत्व शक्ति का जन्म होगा. उसका विश्वास था कि सर्वहारा समाज का ऐतिहासिक लक्ष्य स्वतः अनुशासित समाज की स्थापना करना है. इसके लिए उसने राज्य को महिमा मंडित करने के बजाय, उसको लोकानुशासन में ढालने की कामना की है.

मार्क्सवाद की आलोचना

ग्राम्शी ने मार्क्स के विचारों की उनकी अतिशय अर्थकेंद्रिक प्रवृत्ति के कारण आलोचना की है. 1917 में अपने एक लेख, ‘‘दास कैपीटल’ के विरुद्ध क्रांति’’ में उसने मार्क्स पर आरोप लगाया था कि उसका चिंतन पूंजी के इर्द-गिर्द घूमता है. मानवजीवन को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दे उसके यहां लगभग उपेक्षित हैं. पूंजी के प्रति अतीव केंद्रता अंततः पूंजीवाद को ही संबल, संरक्षण प्रदान करती है. इस कारण वह सर्वहारावर्ग से अधिक पूंजीपतियों का हित-साधन करता है. मार्क्स की इस विचारधारा कि पूंजीवाद का अत्यधिक विस्तार ही एक दिन उसके पतन का कारण बनेगा, के बारे में ग्राम्शी का कहना था कि अगर ऐसा हो तो समाजवादी क्रांति की सफलता के लिए पूंजीवाद के चरमोत्कर्ष तक प्रतीक्षा करनी होगी यानी उतने समय तक ही पूंजीवाद को मनमानी करने का अवसर देना होगा, ताकि क्रांति के अनुकूल वातावरण बन सके. यह तो उपचार से पहले रोग को फलने-फूलने की छूट देने जैसा घातककर्म हुआ. इसी लेख में ग्राम्शी ने उदाहरण देकर बताया था कि मार्क्स की इस अवधारणा को इतिहास ने झुठला दिया है. उसने दावा किया था कि रूस में अक्टूबर क्रांति की घटना ने मार्क्स की इस स्थापना को अमान्य कर दिया है कि समाजवादी क्रांति के लिए पूंजीवादी उत्पादनतंत्र के चरम उभार तक प्रतीक्षा करनी होगी. रूस की बोल्शेविक क्रांति का विश्लेषण करते हुए उसके तत्काल बाद ग्राम्शी ने लिखा था कि—

‘यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि बोल्शेविक क्रांति रूसी जनता के संघर्ष का सुफल है. दो माह पहले तक अतिवादी इस प्रयास में थे कि सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहे. उसकी भविष्योन्मुखी यात्रा में कहीं अवरोध पैदा न हो. इसके लिए वे सर्वमान्य समझौते के प्रति भी सहमति व्यक्त कर चुके थे, जो वास्तव में पूंजीवाद की हदों के बीच हुआ ‘बुर्जुआ समझौता’ था. अब यही अतिवादी तत्व शक्तिकेंद्रों तथा उत्पादन-òोतांे को अपने अधिकार में ले, उनपर अपना अधिपत्य जमा लेने के पश्चात सत्ता के समाजवादी ढांचे को मूत्र्तरूप देने का प्रयास कर रहे हैं. यदि वे आगे भी बिना किसी वाद-विवाद के, अपनी अब तक की अपरिमित उपलब्धियों के साथ जिन्हें वे सायास प्राप्त कर चुके हैं, परस्पर एकता एवं सामंजस्य बनाए रखने में सफल होते हैं, तभी यह जनक्रांति अपने पवित्र लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगी.’

बोल्शेविक क्रांति के परिणामों के आधार पर मार्क्सवाद की आलोचना करते हुए ग्राम्शी ने इसी लेख में आगे लिखा था—
‘बोल्शेविक क्रांति, घटनाओं से कहीं अधिक अपने भीतर आदर्शों को समाहित किए हुए है. वस्तुतः यह कार्ल मार्क्स की ‘पूंजी’ के विरुद्ध जनक्रांति है. रूस में मार्क्स की ‘पूंजी’ सर्वहारा वर्ग से अधिक पूंजीपतियों का महाग्रंथ है. यह इस तथ्य की सविस्तार व्याख्या करता है कि घटनाएं किस प्रकार पूर्व-निर्धारित चक्र से गुजरती हैं. यह दर्शाता है कि रूस में किस प्रकार पूंजीपति वर्ग विकसित हुआ था. वहां सर्वहारावर्ग द्वारा विद्रोह की बात भी दिमाग में लाने, क्रांति के बारे में सोचने अथवा अपनी वर्गीय मांगों को सामने रखने पर विचार करने से भी बहुत पहले ही, पश्चिमी सभ्यता से प्रेरणा लेकर पूंजीवादी युग की नींव रखी जा चुकी थी. इसके बावजूद क्रांति ने अंततः कागजी आदर्शों पर विजय पा ही ली….बोल्शेविकों ने कार्ल मार्क्स को किनारे कर दिया है, तथा उनकी सुस्पष्ट गतिविधियों तथा सफलताओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि ऐतिहासिक भौतिकवाद की तोपें इतनी मारक नहीं जितना इनके बारे में सोचा-समझा गया था….मार्क्स की कल्पना वहीं तक थी, जहां तक वह परिकल्पना कर सकता था. वह यूरोप के युद्ध की विभीषिका की परिकल्पना नहीं कर पाया था. यहां तक कि युद्ध इतना लंबा खिंचेगा, उसके ऐसे दुष्परिणाम होंगे जो इन दिनों सामने आ रहे हैं, का आकलन करने में भी वह नाकाम रहा था.’

लेख में मार्क्सवाद की असफलता के कारणों के मूल में जाते हुए ग्राम्शी ने लिखा था कि, ‘इस प्रकार की सामूहिक इच्छा का निर्माण सामान्यतः एक दीर्घकालिक और क्रमिक विकास का सुफल होता है. इसके लिए कार्यकारी समूहों के गहनतर अनुभव की दरकार होती है. जबकि सुस्ती, आलस्य, स्वार्थपरता, चपलता आदि मानवमात्र की सामान्य दुर्बलताएं हैं. इस कारण समय-समय पर उसका जागरण-प्रबोधीकरण करते रहने की आवश्यकता पड़ती है. ग्राम्शी के अनुसार प्रबोधीकरण का कार्य सर्वप्रथम संगठनों और संघों के रूप में किया जाता है. तदनंतर एक अनवरत-समर्पित प्रयास द्वारा उनके विचारों, इच्छाओं, महत्त्वाकांक्षाओं आदि में परिवर्तन लाने की कोशिश की जाती है. उनके बहुआयामी और दीर्घसंचित आक्रोश को निरंतर भड़काया जाता है.’ लेख के माध्यम से ग्राम्शी इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि मार्क्सवाद कोई सुस्थापित दर्शन नहीं है. मार्क्स की अतिशय भावुकता उसे जगह-जगह अतिगामी बनाती है. इससे वह तथ्यों की बहुआयामी समीक्षा-व्याख्या करने में असफल रहता है. तो भी ग्राम्शी ने स्वीकार किया है कि मार्क्सवाद उनीसवीं शताब्दी का सर्वाधित चर्चित एवं प्रभावशाली दर्शन है. आवश्यकता पड़ने पर उसने मार्क्सवाद के आलोचकों की भी खिंचाई की है. उसके अनुसार उत्पादक शक्तियों की वरीयता का सिद्धांत असल में मार्क्सवाद की अधूरी समझ का नतीजा है. आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन दोनों ही ‘मूल ऐतिहासिक प्रक्रिया’ हैं. इनमें से किसी एक को दूसरे से श्रेष्ठ अथवा प्रभावशाली ठहराना अनुचित होगा. मार्क्सवाद के आरंभिक दिनों में श्रमिक आंदोलनों में यह भ्रांति बहुत गहरे तक पैठी हुई थी कि ‘ऐतिहासिक नियम’, जिसमें पूंजीवाद के स्वतः पराभव की कल्पना की गई है, के फलस्वरूप उनकी विजय अवश्यंभावी है. इस विचार को मिली व्यापक जनस्वीकृति के पीछे कारणों की खोज के लिए ग्राम्शी संस्कृति की तह में जाता है. उसके अनुसार श्रमिक अर्से तक इस भ्रांति से इसलिए सहजतापूर्वक चिपके रहे, क्योंकि वे मूलतः सुरक्षात्मक प्रयासों के समर्थक होते हैं. हिंसक क्रांति उनके मूल स्वभाव का हिस्सा नहीं है. इसलिए ऐसी भारी-भरकम भाग्यपरक सैद्धांतिकी से श्रमिकों को उस समय तक दूर रखा जाना चाहिए था, जब तक वे स्वयं पहल करने के लिए तैयार नहीं हो जाते. मार्क्सवाद कोरा सिद्धांत न होकर असल में ‘क्रियात्मक दर्शन’ है. इस कारण वह सामाजिक परिवर्तन के लिए किन्हीं अनदेखे, अयाचित और अमूत्र्त ‘ऐतिहासिक नियमों’ पर भरोसा नहीं कर सकता. इतिहास स्वयं मानव-समाज के आपसी संबंधों, क्रियाओं एवं अंतद्र्वंद्वों की अनुकृति होता है. उसको मानवेच्छा से निरपेक्ष नहीं माना जा सकता. अतएव प्रत्येक परिस्थिति में केवल श्रमिकों की इच्छाशक्ति से सफलता की आस लगाए रहना अनुचित है. यदि किसी परिवर्तनकामी लक्ष्य के लिए श्रमिक संगठित प्रयास करते हैं तो उन्हें स्वाभाविक रूप अपने प्रतिद्विंद्वियों के अलावा उन सांस्कृतिक-सामाजिक अवरोधों से भी संघर्ष करना पड़ता है, जो समाजीकरण की सुदीर्घ परंपरा में जन्मे हैं, जिन्हें एकाएक बदल पाना संभव ही नहीं होता. विकास की राह में आगे बढ़ने के लिए मनुष्य को इन अवरोधों से गुजरना ही पड़ता है. वैसे भी विकास सीधी-सादी प्रक्रिया न होकर अनेकानेक जटिल प्रक्रियाओं की देन होता है. इसलिए विकास की ओर बढ़ता समाज भविष्य में कब, कौन-सा रूप धारण कर लेगा, इसके बारे में सटीक परिकल्पना कर पाना असंभव होता है. खासकर तब जब पूंजीवाद नए पैंतरों के साथ कदम-कदम पर चुनौती बनकर खड़ा हो. ऐसे पूंजीवाद का सामना करने के लिए वर्गसंघर्ष की साम्यवादी चेतना को भी नए हथियारों से लैस होना पड़ेगा. आंदोलन के नए क्षेत्रों की पड़ताल करनी होगी—

‘ग्राम्शी के अनुसार सुनियोजित पूंजीवाद ने(श्रम-आंदोलनों के लिए) न केवल ठोस रियायतें दी हैं, बल्कि एक विस्तृत जनसमाज की सरंचना में भी उसकी भूमिका रही है, जिसमें श्रम-संगठनों का सघन जाल, राजनीतिक दल, सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली, लोकप्रिय समाचारपत्र तथा अनेकानेक स्वयंसेवी संस्थाएं भी सम्मिलित हैं, जिनके प्रति श्रमिक वर्ग की भी सहमति रही है. आने वाले समय में वर्ग-संघर्ष केवल राज्य की सत्ता हथिया लेने तक सीमित नहीं रहेगा. उसको मात देने के लिए ‘सीधी लड़ाई’ से काम नहीं चलने वाला. बल्कि उसकी जगह लेने के लिए लंबी और सोची-समझी लड़ाई लड़नी पड़ेगी. जिसमें वर्तमान सामाजिक-आर्थिक संस्थाओं में आमूल परिवर्तन तथा उनका नए सिरे से संगठन अनिवार्य होगा जो पूरी तरह से समाजवादी आदर्श के प्रति समर्पित हो.’

ग्राम्शी ने मार्क्सवाद की अतिशय अर्थकेंद्रिक प्रवृत्ति को इटली के श्रमिक-संघों की आलोचना का आधार भी बनाया है. अपने विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए उसने लिखा था कि इटली के अधिकांश श्रमिक नेता स्वयं को गर्व के साथ सुधारवादी कहते थे. यह देखा जाए तो बुरा भी नहीं है. लेकिन वे बिसार देते हैं कि श्रम-सुधार के वृहद लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक, अर्थात तीन मोर्चों पर अनवरत संघर्ष अपरिहार्य है. जबकि इटली के श्रम-संगठन केवल आर्थिक असमानता की खाई को पाटने का लक्ष्य-संधन करते रहे. राजनीति और सामाजिक समानता के लक्ष्य को उन्होंने अपने संघर्ष-क्षेत्र में सम्मिलित ही नहीं किया. यही कारण है कि वे वास्तविक सफलता से अभी तक वंचित हैं. ग्राम्शी को श्रम-संगठनों की उपयोगिता एवं क्षमताओं पर पूर्ण विश्वास था. वह उन्हें पूंजीवादी अधिपत्य से जूझने के लिए निर्णयकारी शक्ति मानता था. उसको इस बात का क्षोभ था कि श्रमिक नेता व्यवस्था में आमूल परिवर्तन की अपेक्षा उसके भीतर महज कुछ सुधारों की मांग कर रहे हैं. यह अनपेक्षित और सर्वहारा विरोधी कृत्य है. इस तरह वे पूंजीवाद से मुक्ति पाने के बजाय उसे बचाए रखने का माध्यम बने हुए हैं. ऐसे श्रम संगठनों को उसने ‘अशिष्ट अर्थसत्तावादी’ कहा है. उसके अनुसार श्रम संगठनों को ‘श्रम-सुधार’ की अपेक्षा ‘श्रम-मुक्ति’ की मांग पर जोर देना चाहिए और अपनी शक्ति एवं ऊर्जा का उपयोग श्रम-मुक्ति के निमित्त किया जाना चाहिए. उल्लेखनीय है कि श्रम-मुक्ति का सपना मार्क्स भी देखता है. ‘पूंजी’ के प्रथम खंड में उसने इसपर विस्तार से चर्चा की है. लेकिन मार्क्स की श्रम-मुक्ति की अवधारणा श्रमिक पूंजीवाद के चंगुल से बाहर आ जाने तक सीमित है. जबकि ग्राम्शी के लिए श्रम-मुक्ति का विचार केवल आर्थिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था. उसके लिए श्रम-मुक्ति का आशय आर्थिक मुक्ति के साथ-साथ राजनीतिक और सामाजिक स्वाधीनता से भी जुड़ा था. इसको उसने सांस्कृतिक अधिपत्य से मुक्ति की अवस्था कहा है.

ऐतिहासिक भौतिकवाद की आलोचना

बीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद जैसे-जैसे संसार में फैला, हर जगह वह अपने अनुयायी बनाता चला गया. उसका बौद्धिक प्रभामंडल इतना चकाचैंध-युक्त था कि जो भी उसके विचारों के संपर्क में आया, वह या तो अनुयायी बना अथवा तीव्र आलोचक. मार्क्स के समर्थकों में ऐसे अनेक लोग हुए जिनके लिए उसका लिखा एक-एक शब्द आप्तवचन था. उसमें जरा-भी संशोधन, तनिक-सा व्यतिरेक उन्हें स्वीकार नहीं है. दूसरी ओर ऐसे विद्वान बिरले ही हुए हैं जिन्होंने मार्क्स की अद्वितीय प्रतिभा का लोहा तो माना, उसके विचारों से सहमति भी रही, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के बृहद लक्ष्य के लिए उन्होंने मार्क्स के विचारों, बिना उसके बौद्धिक प्रभामंडल की चकाचैंध से प्रभावित हुए, उसका समर्थन-अनुसरण भी किया—बावजूद इसके जिन बिंदुओं पर उनकी मार्क्स से असहमति रही, उनपर खुलकर विमर्श भी किया. बिना यह सोचे कि आलोचना उनके अपने ही संगठन को नुकसान पहुंचा सकती है. मार्क्सवाद के विरोधियों को आलोचना के नए तर्क दे सकती है; या संगठन में ही उनके अपने विरोधी खड़े कर सकती है. ग्राम्शी को ऐसे ही मार्क्सवादियों में गिना जा सकता है, जिसने मार्क्स के विचारों से वहीं तक सहमति व्यक्त की, जहां तक वे उसको सही जान पड़े. असहमति के बिंदुओं पर उसने मार्क्स की खुलकर आलोचना भी की है. ग्राम्शी को मार्क्स के विचार जहां अतिशय अर्थकेंद्रित लगते हैं, वहीं वह उसकी ऐतिहासिक भौतिकवाद की व्याख्या से भी असंतुष्ट था. इसलिए उसने मार्क्स के भौतिकवाद की भी आलोचना की है. मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद दरअसल इतिहास की आर्थिक दृष्टिकोण से पड़ताल थी. उसके अनुसार सामाजिक परिवर्तन उत्पादन-प्रविधियों से प्रेरित-प्रभावित होते हैं. अपने प्रारंभ से ही ऐतिहासिक भौतिकवाद बुद्धिजीवियों की आलोचनाओं-प्रत्यालोचनाओं का शिकार रहा है. यह प्रश्न अकसर उठाया जाता है कि क्या जटिल ऐतिहासिक परिवर्तन की व्याख्या मात्र आर्थिक गतिविधियों के एकरैखिक आधार पर की जा सकती है? जिसके अनुसार सामाजिक परिवर्तनचक्र अपनी स्वाभाविक गति से चलता हुआ, जैसा कि मार्क्स ने ऐतिहासिक भौतिकवाद की व्याख्या के दौरान दर्शाया है—उत्पादन के प्राचीन तौर तरीकों से सामंतवाद, सामंतवाद से पूंजीवाद और फिर पूंजीवाद से साम्यवाद के क्रम में अपनी यात्रा पूरी करता है. यदि यही सच है तो क्या इतिहास-चक्र को उल्टे क्रम में घुमा पाना संभव है? इस तरह क्या साम्यवाद से पूंजीवाद, उसके बाद सामंतवाद और तत्पश्चात उत्पादन की प्राचीनतम पद्धतियों के दौर में समाज की वापसी संभव है? आइंस्टाइन ने सापेक्षिकता के सिद्धांत की व्याख्या करते समय ऐसी संभावना जाहिर अवश्य की थी. लेकिन यह प्रयोगरूप से संभव नहीं हो पाया है. हो पाएगा यह भी संभव नहीं दिखता. क्योंकि समय एकांगी परिघटना नहीं है. वह अनेकानेक घटनाओं का जटिल समुच्चय है. यदि समय वापस लौटने भी लगे या लौट भी रहा हो उसकी पहचान कर पाना असंभव होगा. क्योंकि उस समय उसमें हो रही घटनाएं वह नहीं होंगी, जो पिछली बार थीं. यदि वह ऊर्जा है, तो भी उसको अपने प्रदर्शन हेतु कोई न कोई आधार चाहिए. इस कारण व्यावहारिक रूप से समय को वापस लौटा पाना असंभव है. मानवेतिहास में ऐसा कोई उदाहरण भी नहीं है. ऐसे में यह कैसे माना जा सकता है कि उत्पादन के उपर्युक्त चरण ही अंतिम हैं, तथा उनको प्रभावित करने वाले अन्य कोई कारण नहीं हैं. आखिर क्या कारण है कि संस्कृति जैसी नितांत काल्पनिक अवधारणा, अपने भीतर अनेकानेक रूढ़ियां छिपाए होने के बावजूद लोगों का दिल जीत लेती है. करोड़ों लोग उससे नेह लगाए रहते हैं. सामाजिक परिवर्तन के इस द्वैध पर ग्राम्शी गंभीरतापूर्वक विचार करता है तथा असहमति के बिंदुओं के आगे प्रश्नचिह्न भी लगाता है.

ऐतिहासिक भौतिकवाद की कमजोरियों को पकड़ते हुए ग्राम्शी लिखता है कि मार्क्स उन स्थितियों पर कोई ध्यान नहीं देता जो मानव-नियंत्रण से बाहर हैं, जिनका मनुष्य से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है. भौतिक संसार से बाहर यदि वह किसी अन्य सत्ता का नाम लेता है तो वह है—जनसाधारण का ईश्वर पर विश्वास, जिसके भौतिकरूप में होने की कोई संभावना नहीं है. यदि ईश्वरीय सत्ता का भौतिक साक्ष्य होता तो मार्क्स के लिए धर्म की आलोचना कर पाना संभव ही नहीं होता. ग्राम्शी के अनुसार धर्म की आलोचना करते समय मार्क्स फायरबाख को दोहराता है. उसका अपना कोई ठोस विचार नहीं है. इसलिए उसके द्वारा की गई धर्म की आलोचना के आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता कि वह ईश्वर का विरोधी था. ग्राम्शी धर्म के बजाय संस्कृति पर विचार करने पर जोर देता है. उसके अनुसार संस्कृति एक जटिल प्रत्यय है. इसमें व्यक्ति के देनंदिन व्यवहार के अलावा अध्यात्म, रीति-रिवाज, उत्पादन-प्रविधियां तथा वे सभी संस्कार सम्मिलित हैं, जिन्हें व्यक्ति पिछली पीढ़ी से प्राप्त करता है तथा उतने ही स्नेह-निष्ठा से आगामी पीढ़ी को सौंपने का प्रयत्न करता है. अपने प्रभाव को अक्षुण्ण बनाए रखने, उसको निरंतर प्रभावशाली बनाने पूंजीवाद संस्कृति का ही सहारा लेता है. सांस्कृतिक अधिपत्य के ही प्रभावस्वरूप एक वर्ग यह मान लेता है कि उसका प्रमुख कर्तव्य दूसरे वर्ग के निर्देशन में काम करना है. अतः बिना किसी विरोध के वह दूसरे वर्ग, जो कतिपय विकसित संस्कृति में जीता है, के निर्देशों का पालन करता जाता है. यह गुलामी से स्वैच्छिक समझौता है, जिसे मनुष्य स्थितियों से अनुकूल की अवस्था में बिना किसी प्रतिवाद के निभाए जाता है. शोषणकारी व्यवस्था से समझौतावादी रवैया क्रांति की संभावना को क्षीण करता है. अपने स्थायित्व के लिए बुर्जुआ संस्कृति साहित्य तथा कलाओं को भी अपने नियंत्रण में रखती है. परिणामस्वरूप समाज में छद्म नायक रातों-रात खड़े कर दिए जाते हैं, जो विभेदकारी नीतियों के समर्थक हों. संस्कृति-कर्मी एवं बुद्धिजीवियों का एक वर्ग इन नायकों के महिमामंडन में लगा रहता है. वह उनका बढ़-चढ़कर बखान करता है. वैकल्पिक संस्कृति के अभाव में लोकमानस विभ्रम का शिकार होकर धीरे-धीरे यथास्थितिवाद का समर्थन करने लगता है. इससे विकास के वास्तविक लक्ष्य काफी पीछे छूट जाते हैं और विमर्श के दायरे में ऐसी चीजें आ जाती हैं, जिनका मनुष्य के विकास से कोई संबंध नहीं होता.
ग्राम्शी के अनुसार सांस्कृतिक हीनताबोध एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की दासता के लिए विवश करता है. अतएव पूंजीवाद से मुक्ति के निमित्त संस्कृति अधिपत्य से मुक्ति अपरिहार्य है. उसके अनुसार यद्यपि यह आवश्यक नहीं है कि सांस्कृतिक प्रतीकों में पूंजीपतिवर्ग की अपनी भी कोई आस्था हो. तथापि वह सदैव इस प्रयास में रहता है कि सांस्कृतिक प्रतीकों, प्रत्ययों तथा उनकी शैलीगत विशेषताओं को विमर्श के दायरे में बनाए रखा जाए. इसलिए वह उन्हें चर्चा में बनाए रखने का कोई न कोई निरंतर आयोजन रचता रहता है. भाड़े के बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी उसके सहायक बनते हैं. आवश्यकता पड़ने पर वह सांस्कृतिक प्रतीकों का व्यावसायिक लाभ उठाने का भरपूर प्रयास करता है. संस्कृति के मानक चूंकि बहुतायत की जीवनशैली को नियंत्रित करते हैं, इसलिए वह उनके प्रति अपनी निष्ठा जताने, उनका सम्मान तथा प्रचार-प्रसार को अपनी वाणिज्य-नीति का हिस्सा बना लेता है. परिणाम यह होता है कि जनसमाज अपने विकास के वास्तविक लक्ष्य से भटक जाता है. सामाजिक बहस के केंद्र में ऐसे मुद्दे सायास पैदा कर दिए जाते हैं, जिनका विकास से दूर तक कोई नाता नहीं होता. किसी कारणवश यदि सांस्कृतिक विक्षोभ की स्थिति उत्पन्न होती है, व्यक्ति उन आरोपित प्रतीकों को ही वास्तविक मानकर उनके माध्यम से विकास की ओर उन्मुख होने का प्रयास करता है तो वह तत्काल उसके समर्थन में खड़ा हो जाता है. इस बार वह संस्कृति संरक्षण को अपने विणज का हिस्सा बनाता है; तथा जनसमाज का नए सिरे से दोहन करने लगता है.

अंत में एक स्वाभाविक-सा प्रश्न उठता है कि मार्क्सवाद से तीखे मतांतरों के बावजूद क्या ग्राम्शी को समाजवादी माना जा सकता है. इसका उत्तर तो निस्संदेह ‘हां’ में ही होगा, हालांकि समाजवादी विचारक के रूप में ग्राम्शी के योगदान को अभी पूरी तरह से रेखांकित किया जाना बाकी है. दूसरे विश्वयुद्ध के उपरांत ‘इटली कम्युनिस्ट पार्टी’ की बागडोर संभालने वाले, ‘यूरो कम्युनिजिस्म’ के समर्थक तोगलियाती के अनुसार उन दिनों इटली की कम्युनिस्ट पार्टी की अधिकांश गतिविधियां ग्राम्शी के विचारों के अनुकूल थीं. बल्कि कहा जा सकता है कि इटली का साम्यवादी आंदोलन की ग्राम्शी के चिंतन पर टिका था. इस कारण उसको निःशंक समाजवादी माना जा सकता है. कुछ विद्वानों के अनुसार ग्राम्शी वस्तुतः उग्र वामपंथी था. उन विद्वानों के अनुसार यदि उसको जेल में न भेजा गया होता तो मार्क्सवाद की तीखी आलोचना, अपने मौलिक एवं प्रखर समाजवादी चिंतन लिए भी उसका गिरफ्तार कर लिया जाना अवश्यंभावी था. आखिर हुआ भी ऐसा ही था. मार्क्सवादी संगठनों में ग्राम्शी के विचारों पहले ही उपेक्षित थे, विशेषकर उन विद्वानों के बीच जो मार्क्सवाद की परंपरागत परिभाषा से परे कुछ सोचना ही नहीं चाहते थे. बावजूद इसके ग्राम्शी के बौद्धिक प्रभामंडल की उपेक्षा कर पाना उसके कट्टर विरोधियों के लिए भी संभव नहीं है. उसके योगदान का आकलन मार्क्सवाद के अधूरेपन को भरने, उसको अकादमिक गांभीर्य प्रदान करने के लिए भी किया जाना चाहिए; और इसलिए भी कि उसने पूंजीवाद की आलोचना के नए और मौलिक औजार बुद्धिजीवियों को दिए. ग्राम्शी पर मार्क्सवाद के क्रियात्मक चरित्र को अधिक जटिल बनाने का आरोप भी लगाया जा सकता है, जिससे मार्क्स का दर्शन जो शोषणकारी व्यवस्था से मुक्ति हेतु सीधी कार्रवाही पर जोर देता था, वह अधिक शालीन और बौद्धिक बना. मैकियावैली, हैनरी वर्गंसा, जार्ज सोरेल, विल्फ्रेड पारटो से प्रभावित ग्राम्शी ने बीसवीं शताब्दी के असंख्य बुद्धिजीवियों को प्रभावित किया है. मौलिक सोच और निर्भीक अभिव्यक्ति के कारण ही उसको गत शताब्दी के कतिपय सर्वाधिक मौलिक, प्रतिभावान मार्क्सवादी चिंतक का सम्मान दिया जाता है. उसका कहना था कि—‘आधुनिकता की सबसे बड़ी चुनौती है कि हम न तो स्वयं भ्रमित हों, न दूसरों को भ्रम में डालने का काम करें.’ थाॅमस बेट ने ग्राम्शी के विपुल लेखन का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि ग्राम्शी का लेखन—

‘एक सामाजिक व्यवस्था है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कितना विस्फोटक है. उसको समझ पाना कठिन है, ठीक ऐसे ही जैसे किसी कपटी और दुष्कर्मी शासक की छलनीति को समझना आसान नहीं होता. वह हमें सिखाता है कि शासक वही सक्षम है जो बिना किसी बाहरी दबाव के समाज को कर्मोन्मुखी बनाए, लोगों को कर्तव्यपथ पर चलना सिखाए.’

अपने इसी चिंतनशील लेखन के लिए ग्राम्शी इकीसवीं शताब्दी के समाजवादी, मानवतावादी विचारकों में शीर्ष स्थान रखता है. इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि मार्क्सवाद के कट्टर समर्थक उसको समाजवादी मानते हैं अथवा नहीं. परंतु आधुनिक समाज की विसंगतियों, असमानता आदि को समझने के लिए उसका ‘सांस्कृतिक अधिपत्य’ का सिद्धांत, मार्क्सवादी दर्शन की उन खाइयों को पाटने की बेहतरीन कोशिश है, जो मार्क्स के अतिशय पूंजीकेंद्रित चिंतन द्वारा जन्मी थीं. यूरोप के अलावा विश्व के अन्य भागों में मशीनीकरण उतना उग्र रूप नहीं धारण कर पाया था. वहां आर्थिक असमानता होने के बावजूद स्थितियां भिन्न थीं. इससे वहां के नेताओं और विचारकों ने मार्क्सवाद को अपनी-अपनी स्थितियों के अनुसार संशोधित कर काम चलाया. ग्राम्शी इन स्थितियों पर व्यापक संदर्भ में चर्चा करता है. हालांकि परिस्थितियोंवश अपने विचारों को वैकल्पिक दर्शन का रूप देने में नाकाम भी रहता है. मगर इससे उसकी प्रतिभा और जनकल्याण के प्रति समर्पण की भावना को हल्का करके नहीं आंका जा सकता. इतिहास का काम स्मृतियों को सहेजना है. इसलिए वह ग्राम्शी के साथ-साथ तानाशाह मुसोलिनी की यादों को सहेजने का भी समान उपक्रम करेगा. उसको करना भी चाहिए. लेकिन तानाशाह की कटु-स्मृतियों में जहां मनुष्यता की आह सुनाई देगी, वहीं लेखक-विचारक ग्राम्शी को पढ़ते हुए पाठक की आंखों में एक खूबसूरत सपना अंगड़ाई लेने लगेगा. उसका संदेश भी रुपहला होगा, ठीक ऐसे जैसे पौ फटने से पहले आसमान का नजारा होता है.
ओमप्रकाश कश्यप

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