मार्क्स का दर्शन : भौतिकवाद की साम्यवादी अभिकल्पना

मार्क्स उन दार्शनिकों में से है जो अपने विचार और चेतना के माध्यम से अपने समय को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं तथा लाखोंकरोड़ों प्रशंसकों के दिल पर राज करते हुए अपने जीवनकाल में ही किंवदंति बन जाते हैं. स्वभाव से भावुक और बेहद पढ़ाकू किस्म का मार्क्स आजीवन विचारों की दुनिया में जीता रहा. उसने धर्म, दर्शन, इतिहास, राजनीति, विज्ञान, मानवव्यवहार आदि विषयों का गंभीर अध्ययन किया. उसपर हीगेल के अलावा प्लेटो, प्रूधों, ब्रूनो बायर, फायरबाख आदि अपने समकालीन और पूर्ववर्ती दार्शनिकों का गहरा प्रभाव पड़ा था. डार्विन का वह प्रशंसक था और उसके ऐतिहासिक भौतिकवाद की व्याख्या के बहुत से सूत्र डार्विन के विकासवाद से प्रेरित थे. अपने लंबे अध्ययन के उपरांत उसने राजनीति, दर्शन, अर्थशास्त्र आदि विभिन्न क्षेत्रों में कुछ मौलिक विवेचनाएं प्रस्तुत की हैं. जिनके कारण आधुनिक दर्शनशास्त्रियों में उसका स्थान अक्षुण्ण है. इन सभी में उसका झुकाव दमित और शोषित वर्ग के प्रति साफ झलकता है. इस कारण वह हमारे समय का सबसे आधुनिक और मानवीय विचारक नजर आता है. शायद यही कारण है कि मार्क्स के दर्शन के आधार पर विकसित राजनीति को आधुनिक समाजों में सर्वाधिक जगह मिली है. दुनिया के कई ऐसे देश हैं, जहां मार्क्सवाद वहां की राजनीति की मुख्य विचारधारा नहीं है. इसके बावजूद ऐसा शायद की कोई देश होगा, जहां मार्क्स के विचार राजनीति को प्रभावित न करते हों. हालांकि भारत और एशियाई देशों के परंपरागत समाजों में धर्म के प्रति आलोचनात्मक रवैये के कारण मार्क्स को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता. किंतु उन सभी देशों में शोषित और दमित वर्गों के बीच मार्क्सवाद आज भी अपना सम्मानित स्थान बनाए हुए है. यह सब इसलिए है कि मार्क्स बिना किसी लागलपेट के अपनी बात कहता है. मनुष्यता के पक्ष में उसकी निष्ठा साफ झलकती है.

आगे हम मार्क्स के दार्शनिक विचारों पर संक्षिप्त चर्चा करेंगे.

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद

मार्क्स का पूरा जीवन लेखन को समर्पित रहा. उसके इतिहास, दर्शन, राजनीति, अर्थनीति, व्यवहारशास्त्र आदि का विशद अध्ययन किया था. उसके विचारों पर फ्रैड्रिक हीगेल का सर्वाधिक प्रभाव था. हीगेल को दर्शन के क्षेत्रा में द्वंद्ववाद का जन्मदाता माना जाता है. उसको उनीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक प्रतिभाशाली दर्शनशास्त्री होने का गौरव प्राप्त है. यह भी कि जितना हीगेल ने अपने समय और बाद के दर्शनशास्त्रियों को प्रभावित किया, उतना शायद ही कोई दूसरा विद्वान कर सका. हीगेल के समय में ही उसके अनुयायी ‘वाम’ और ‘दक्षिण’ दो हिस्सों में बंट चुके थे. उस समय मार्क्स बर्लिन विश्वविद्यालय में अध्ययनरत था. हीगेल के ‘वामपंथी’ अनुयायियों में लुडबिग फायरबाख सबसे प्रखर प्रतिभाशाली था. फायरबाख ने हीगेल के आदर्शवादी द्वंद्ववाद की विवेचना विशुद्ध भौतिकवादी आधार पर की थी और इस नतीजे पर पहुंचा था कि दुनिया का इतिहास किसी आदर्शवाद या परमसत्ता की देन न होकर, भौतिकवाद से प्रेरित है. दृश्यमान जगत से परे किसी दिव्य सत्ता की खोज निरर्थक है. सत्य वही है, जो आंखों को दिखाई देता है और जिसे मानवेंद्रियां अनुभव कर सकती हैं. मार्क्स ने फायरबाख की विवेचना को ही सही माना. मगर उस समय तक वैज्ञानिक शोध कुछ और आगे बढ़ चुके थे. वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड और सृष्टि के रहस्यों को लेकर जो परिकल्पनाएं की थीं, वे प्रायोगिकरूप से सच सिद्ध हुई थीं. बल्कि कई ऐसी धारणाएं जो धर्म के नाम पर वर्षों से चली आ रही थीं, विज्ञान उनका तर्क के आधार पर समर्थन या विरोध करता था. विशेष बात यह थी कि उसके निष्कर्षों को प्रयोगशाला में जांचापरखा जा सकता था. उनपर बहस हो सकती थी. इससे भी बड़ी बात यह है कि विज्ञान का लक्ष्य मानवीय था. वह अपना प्रत्येक कृत्य बिना किसी वर्गीय पूर्वाग्रह के मानवमात्र के कल्याण की वांछा के साथ करता था, जबकि धर्म आदि के विश्लेषण और स्थापनाएं पूर्वाग्रहयुक्त और वर्गविशेष के लिए ही कल्याणकारी होती थीं. मार्क्स के हृदय में विज्ञान के प्रति गहरा सम्मोहन था, इसलिए वह फायरबाख से प्रेरित हुए बिना न रह सका. उस समय तक डार्विन का विकासवाद भी विद्वानों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ था. मार्क्स ने खुले मन से उसका समर्थन किया था.

हीगेल के द्वंद्वात्मक चिंतन, डार्विन के विकासवाद, विज्ञान के प्रति अपने सम्मोहन और समाज पर उत्तरोत्तर कसते जा रहे पूंजीवादी शिकंजे का मार्क्स पर समन्वित प्रभाव पड़ा. इन सबके सम्मिलन से उसने द्वंद्ववाद भौतिकवाद का विचार सामने रखा. वह मुख्यरूप में एक समाजविज्ञानी, दर्शनशात्री और राजनीतिक अर्थशाशास्त्री था. साथ ही वह एक भावुक कवि भी था, जो समाज के निचले वर्ग के जीवन में घटने वाली अप्रिय घटनाओं, विशेषकर उन घटनाओं के जो इस वर्ग के आर्थिकसामाजिकराजनीतिक शोषण का प्रतीक थीं, मानवीय संवेदना के साथ देखता था. शायद इसलिए पूंजीवादी समाज में श्रमिकों पर हो रहे उत्पीड़न को उसने गहराई से अनुभव किया था और वह यह मानने लगा था कि समाज का उत्पादक और अनुत्पादक वर्ग के बीच स्पष्ट विभाजन है. उत्पादक वर्ग अपने श्रमकौशल द्वारा पूरे समाज के लिए आवश्यक उत्पादन की जिम्मेदारी संभालता है, दूसरी ओर अनुत्पादक वर्ग पूंजी का स्वामी होने का दावा करते हुए, उत्पादनतंत्र पर कब्जा जमाए रखता है. अपनी पूंजी के दम पर वह समाज के वास्तविक उत्पादक वर्ग से न केवल उसका श्रेय छीन लेता है, बल्कि उसके द्वारा किए गए उत्पादन के आधार पर भारी मुनाफा भी कमाता है. यह लाभांश पूंजी में ढलकर अनुत्पादक वर्ग के लिए पुनः लाभार्जन का स्रोत बनता है. जैसेजैसे पूंजीवाद अपनी जड़ें फैलाता है, पूंजीपति के लिए अधिलाभ की स्थितियां बढ़ती ही जाती हैं, जो प्रकारांतर में श्रमिकशोषण को बढ़ावा देती हैं.

समस्त स्थितियों के विश्लेषण के उपरांत मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि स्वामी और श्रमिक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दो विपरीत ध्रुव, अलगअलग वर्ग हैं, जिनके बीच संघर्ष अनिवार्य है. मार्क्स का भौतिक द्वंद्ववाद हीगेल की दार्शनिक विचारधारा और उनीसवीं शताब्दी के भौतिकवाद के बीच की कड़ी था. कुछ विद्वानों का मानना है कि मार्क्स ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा का जनक था और द्वंद्वात्मक भौतिकवाद मूल रूप में मार्क्स के मित्र और सहयोगी ऐंगल्स के दिमाग की उपज था. यह सच हो सकता है. वस्तुतः मार्क्स और एंगल्स ने एकदूसरे के अभिन्न मित्रसहयोगी के रूप में तरह बहुत सारा कार्य किया है. दोनों के बीच बेहद अंतरंग संबंध थे. इसलिए उन दोनों के कार्य के बीच कोई स्पष्ट विभाजन रेखा खींच पाना असंभवसा है; और दोनों के मैत्रीधर्म का सम्मान करने के लिए शायद उसकी विशेष जरूरत भी नहीं है.

तत्वविज्ञान

भौतिकवादियों का मानना था कि आंख को जो दिखता है, इंद्रियों को जो जंचता, हाथ जिसे छूकर अनुभव कर सकते हैं, वही इस सृष्टि का एकमात्र सत्य है. जिसको देखनापरखनाछूनाअनुभव कर पाना असंभव हो, जिसका कोई भौतिक रूपरंगआकार आदि न हो, उसको सत्य की संज्ञा देना स्वयं को भ्रम में लिपटा लेने जैसा है. हमारे विचार, समस्त अनुभूतियां, मानसिक आड़ोलन, उद्वेग आदि सब भौतिकजगत देन हैं. ऐसा कोई सत्य नहीं, जो दृश्यमान जगत से बाहर अथवा उससे अलग हो. तत्ववादियों के लिए वस्तु और चेतना के बीच किसी प्रकार का व्यतिरेक नहीं है. व्यक्तिचेतना उनके लिए कुछ रासायनिक अभिक्रियाओं की परिणति है. दृश्यमान जगत में जो कुछ प्रकट, आंखों के सामने है, अथवा जिसको इंद्रियों के माध्यम से पकड़ा या अनुभव किया जा सकता है, सिर्फ वही अस्तित्ववान है. वही सृष्टि का मूल या उद्दिष्ट है. उससे परे सिवाय वौद्धिक विभ्रमों, छलावों और भटकावों के किसी प्रकार के सत्य की अपेक्षा संभव नहीं. भौतिकवादियों की यह परंपरा नई नहीं है. भारत में महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध के समकालीन अजित केशकंबली नाम के एक भौतिकवादी विद्वान हुए हैं, जिन्होंने दृश्यमान जगत को ही वास्तविक माना और इसके परे किसी भी सत्य की उपस्थिति को नकारा. भारतीय दर्शन में भौतिकवाद की परंपरा चार्वाक और लोकायत दर्शन के नाम से ख्यात है और षड्दशर्नों में सम्मानजनक स्थान रखती है. यूनानी दर्शन में यह परंपरा थेल्स आदि भौतिकवादी दार्शनिकों के विचारों में देखी जा सकती है.

सृष्टि दृष्टि की सीमा में है—भौतिकवादियों का मानना था. इसलिए उनका धर्म की उन अवधारणाओं से विरोध था, जो पारलौकिक विश्वासों पर टिकी हैं, मानती हैं कि मृत्युपार भी जीवन है. उनके अनुसार सृष्टि दृष्टि का विस्तारमात्रा है—जो यह नहीं मानते वे भटके हुए हैं. भौतिकवादियों ने ऐसे धर्म को मानवीय विकास में बाधक मानते हुए त्याज्य माना. मार्क्स ने तो धर्म को अफीम की संज्ञा देते हुए सर्वहारा वर्ग को उससे दूर रहने की सलाह ही दे डाली थी. उल्लेखनीय है कि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के समर्थक दार्शनिकों ने पुराने भौतिकवादी विचारकों की जमकर आलोचना की थी. लेकिन उनकी आलोचना भौतिकवाद का सीधा विरोध न होकर वास्तव में द्वंद्ववादी तत्वों तथा विकासवादी अवधारणा के अभाव के प्रति थी. वास्तव में मार्क्स और उसके समानधर्मा दार्शनिक भौतिकवाद को और अधिक तार्किक एवं परिपूर्ण बनाना चाहते थे, ताकि उसको किसी भी प्रकार के आडंबरवाद से परे रख जा सके.

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ का आगमन वास्तव में ‘द्रव्य शब्द की विवेचना पर टिका हुआ है. इस सामान्यसे शब्द के अनेक निहितार्थ है. व्लादिमिर लेनिन ने भी इस शब्द को परिभाषित करने का प्रयास किया था, हालांकि इस बारे में लेनिन की परिभाषा किंचित परेशानी खड़ी करने वाली है. उल्लेखनीय है कि व्लादिमिर लेनिन ही वह राजनेताविचारक था, जिसने मार्क्स और ऐंग्लस की विचारधारा को नए जोश के साथ, अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को केंद्र में रखकर प्रस्तुत किया था. मार्क्स का मानना था कि वर्गसंघर्ष की स्थितियां केवल औद्योगिक समाजों में ही संभव हैं. जबकि बीसवीं शताब्दी के आरंभ का रूस औद्योगिक दृष्टि से काफी पिछड़ा देश था. लेनिन और ट्राटस्की ने एक साथ मिलकर सर्वहारा किसानों को वर्गसंघर्ष के लिए प्रेरित किया और उनकी मदद से रूसी क्रांति की आधारशिला रखी. तय है कि लेनिन ने मार्क्स की विचारधारा का रूस की स्थितियों के अनुसार अनुकूलन किया. उसके बाद ही उसने उस विचारधारा को कम्युनिस्ट पार्टी के लिए स्वीकृत करने की सिफारिश की थी.

लेनिन के अनुसार द्रव्य अथवा पदार्थ वस्तुनिष्ट यथार्थ को सामने लाने वाली मात्रा दार्शनिक मनःस्थिति है. लेनिन के प्रकृतिशास्त्र में सत्य, पदार्थ तथा वस्तुनिष्ठ यथार्थ के संतुलन द्वारा संचेतना का अविरत विरोध करता रहता है. अनेक द्वंद्ववादी दर्शनशास्त्री यह साफ कर चुके हैं कि हम किसी पदार्थ को केवल अनुभूतियों के माध्यम से जान पाते हैं. उनके अनुसार हर पदार्थ की उत्पत्ति के पीछे सुनिश्चित कारण हैं. पदार्थ की विशेषता है कि वह मानवीय चेतना से स्वतंत्रा, मगर सृष्टि के निर्धारक नियमों से आबद्ध होता है. संक्षेप में कहा जा सकता है कि द्वंद्ववादी भौतिकशात्रियों द्वारा ‘द्रव्य’ अथवा पदार्थ शब्द का उपयोग उसकी प्रचलित अवधारणा से भिन्न स्तर पर किया गया है. द्वंद्वात्मक भौतिकवाद वस्तुतः एक मौलिक, शास्त्रीय एवं परवर्तनवादी विचारधारा है. उल्लेखनीय है कि भारतीय भौतिकवादी चार्वाकों ने सृष्टि की स्थापना के मूल में चार पदार्थों—पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु की उपस्थिति को मान्यता दी थी. आकाश चूंकि अवास्तविक और दृष्टिभ्रम है, इसलिए परंपरा से चले आ रहे पांचवे तत्व की मान्यता को वे अस्वीकार करते रहे. यूनानी भौतिकवादी दार्शनिक थेल्स जल को प्रमुख तत्व के रूप में स्वीकारता था. उसी से सृष्टि की उत्पत्ति मानता था. जबकि एपीक्यूरस ने अग्नि को सृष्टि का मूल स्रोत स्वीकार किया था. मगर ये दार्शनिक सृष्टि के विकास का कारण सुझाने में नाकाम रहे थे. शायद यह उनकी प्राथमिकता भी नहीं थी. मार्क्स ने इस व्याख्या को तार्किक रूप देते हुए परंपरागत भौतिकवादी विचारधारा से दूरी बनाए रखी. इसके विपरीत उसने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर जोर दिया.

स्पष्ट है कि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद विचारों की जड़ अथवा यांत्रिक व्यवस्था नहीं है. यह तर्क और नए शोधों, वैचारिक संघर्ष के आधार पर सतत परिवर्तनशील होता है. स्वीकृत विचारों के अनुसार अभी तक केवल जड़ वस्तुएं ही यांत्रिक नियमों से बंधी होती हैं, न कि जीवित प्राणी. किंतु वे सभी अनिवार्यरूप से कार्यकारण नियम का पालन करते हैं. इसका अभिप्राय यह है कि कार्यकारण के जो नियम जड़ पदार्थों एवं जानवरों आदि पर लागू किए जाते रहे हैं, मनुष्य भी उनसे परे नहीं है. द्वंद्ववाद मानवीय मेधा को गरिमामंडित देता है. इसलिए वहां तर्क को ऊंचा माना जाता है. द्वंद्ववाद के समर्थक भौतिक विज्ञानी बिना शर्त परमाणुवाद का समर्थन तक नहीं करते. बल्कि उससे पहले वे उसको अपने तर्क और परीक्षणों की कसौटी पर कसते हैं.

मार्क्स के अनुसार विकास एकल न होकर अनेक विकासोन्मुखी क्रियाओं का परिणाम है, जो एक के बाद एक आकार ग्रहण करते रहते हैं. विकास का यह चक्र सतत गतिमान रहता है, जैसे परमाणु का अणु में बदलना, उसके बाद क्रमशः जीवित कोशिकाओं, पेड़पौधोंलताओं, जीवित प्राणियों, मनुष्य, समाज आदि में ढलते जाना. मार्क्स के अनुसार विकास को आशावादी नजरिये से देखने की परंपरा समाज में रही है. मगर सबसे अंतिम सीमा सदैव सर्वाधिक जटिल होती है. प्रकारांतर में वह सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक शीलयुक्त भी होती है. स्मरणीय है कि द्वंद्ववाद के समर्थक अधिकांश भौतिकविज्ञानी डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत से प्रेरितप्रभावित थे. मार्क्स भी उससे अछूता नहीं था. इन विद्वानों का मानना था कि विकास का प्रत्येक चरण, उसके अनेक चरणों का समुच्चय होता है, वे सब साथसाथ गतिमान रहते हैं. उसके कहने का आशय था कि विकास एकल ज्यामितीय न होकर बहुतसे आकृतियों का समुच्चय है. सृष्टि की अविरत विकासधारा में किसी वस्तु में छोटेछोटे परिवर्तन बड़ा आकार ग्रहण करते जाते हैं, इससे तनावोंअंतःसंघर्षों की उत्पत्ति होती है, जो उस समय तक बढ़ते जाते हैं, जब तक कि नए तत्व पर्याप्त रूप में संतुलन का ध्वंस करने योग्य शक्तिशाली नहीं जाते, और वे उनके बीच सूत्रबद्धता के लिए जिम्मेदार कारकों, साम्यों को भंग नहीं कर देते. जब तक सुदीर्घ परिवर्तनशृंखला उनमें नए लक्षण पैदा करने में समर्थ नहीं हो जाती. इस सिद्धांत को ‘विचारप्रतिविचारसंविचार’ अथवा ‘सिद्धांतप्रतिसिद्धांतसमसिद्धांत’ का त्रिकोण कहा जाता है. तदनुसार विपरीत शक्तियों के बीच संघर्ष और उनसे नई शक्तियोंपरिणामों की उत्पत्ति ही इस सिद्धांत का आधार है.

मार्क्स के अनुसार विकास की संपूर्ण प्रक्रिया इसी त्रिकोण पर आधारित है. यही ‘द्वंद्वात्मक विकास’ का मूल आधार है. पूरी तरह आकस्मिक और अस्थिरआकस्मिक घटकों के आपसी अंतःसंघर्षोंटकराहटों के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाला, यह समूचा विकासचक्र सर्वथा अर्थहीन और अनुद्देश्यपूर्ण है. भौतिकवादियों के अनुसार इस सृष्टि की न तो विशिष्ट अर्थवत्ता है, न कोई विशेष लक्ष्य. किन्हीं चिरंतन, निर्धारणात्मक नियमों के अनुसार यह बस आगे बढ़ती जा रही है. यह गति अंतःस्फूर्त्त है. यानी इसके पीछे किन्हीं बाहरी कारणों की खोज करना वृथा है. द्वंद्वात्मक भौतिकवादियों के अनुसार यहां कुछ भी स्थिर नहीं है. संपूर्ण बृह्मांड, इसके सभी ग्रहनक्षत्र और नीहारिकाएं द्वंद्वात्मक विकासवाद के नियमों के अधीन अनंत शून्य में सिर्फ भागती जा रही हैं. हर क्षण, हर स्थान पर पुराना मर रहा है, नया जन्म ले रहा है. यहां न तो कुछ स्थायी है, न कोई अनंतिम और अतुलनीय सिद्धांत है. हर चीज परिवर्तन की कसौटी पर है. हर एक को एक न एक दिन समाप्त हो जाना है. उसकी जगह लेने के लिए नए पदार्थ, नए मूल्य सदैव जन्मते रहते हैं. पदार्थ और उसकी गतियों को अनुशासित करने वाले नियम बृह्मांडीय गति का कारण हैं.

भौतिकवादियों की एक मान्यता यह भी है कि विश्व को अपने आप में स्वतंत्रा और संगठित इकाई मानना चाहिए. तत्वविज्ञान के संदर्भ में मार्क्सवादियों का मानना है कि यह विश्व अनेक विशृंखलित शक्तियों का केंद्रबिंदू है, द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दुहरी मानसिकताओं के बीच एकत्ववाद के प्रतीक हैं. उनके लिए यह संसार अनुपम, अनूठा यथार्थ है, जिसके बाहर और जिससे अलग अथवा विशिष्ट कुछ भी नहीं है. न ही ईश्वर नाम की कोई सत्ता है. जो है, आंखों के समक्ष और स्पष्ट है. भौतिकवादियों की शाश्त्रीय मान्यता के अनुसार इस संसार को अनुशासित करने वाले नियम सुनिर्धारित हैं. यह सही है कि द्वंद्वात्मक भौतिकवादी अनेकानेक कारणों से स्वयं को निश्चयवादी कहलवाना पंसद नहीं करते. उनके विचार में एक पौधा बढ़ता है, मगर उसकी वृद्धि केवल पौधे के लिए सुनिश्चित नियमों पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि कुछ बाहरी कारण मसलन ओला वृष्टि, शीत, हवा, घाम आदि भी उसके विकास को प्रभावित करने का सामथ्र्य रखते हैं. वे उसकी वृद्धि को घटानेबढ़ाने में सक्षम होते हैं. इस धारणा से अनिश्चयात्मकता की झलक मिलती है. लेकिन तत्वों और उसकी विभिन्न अवस्थाओं, गतिविधियों पर के वैज्ञानिक अन्वीक्षण पर जोर देने वाला द्वंद्वात्मक नकारात्मक विचार नहीं है. उसमें पर्याप्त आशावाद है. नवीनता है और मनुष्यता के प्रति अनुराग भी है.

कुल मिलाकर द्वंद्वांत्मक भौतिकवादियों के लिए समस्त घटनाएं नियमों से बंधी हुई हैं. अपनी संपूर्णता में संसार के नियम, बगैर किसी चूक के बृह्मांडीय नियमों के शाश्वत अनुशासन का पालन करते हैं. इसी कारण उनके बीच एकात्मकता और और सातत्य बना रहता है. हमने देखा कि मार्क्स से पहले भी भौतिकवादी विचारधारा काफी समृद्ध थी. मगर उसमें व्यक्ति निरपेक्षता का भाव था. इसलिए उसका एक विचार से अधिक प्रयोग संभव न हो सका. मार्क्स ने भौतिकवाद को जड़ और चेतन तक विस्तृत कर, स्वाभाविक रूप से व्यक्ति सापेक्ष बना दिया था. इसके लिए उसने विज्ञानसम्मत तर्क गढ़े. जिसके फलस्वरूप आगे चलकर उसका राजनीतिक उपयोग संभव हो सका.

मनोविज्ञान

कार्ल मार्क्स घोषित रूप में मनोवैज्ञानिक नहीं था. लेकिन उसको मानवीय व्यवहार का गहरा बोध था. मनोविज्ञान संबंधी उसके विचारों पर हीगेल के दर्शन का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगत है. मार्क्स के अनुसार मानवमस्तिष्क अथवा उसकी चेतना सिवाय वस्तुगत दृष्टिबोध, एक अनुलिपि, एक प्रतिबिंब, अभिकल्पना अथवा छायाचित्रा के और कुछ भी नहीं है. जबकि संचेतना मस्तिष्क की उपज है. शरीर मस्तिष्क का आधार है, अतएव बिना मस्तिष्क के संचेतना की उपस्थिति संभव नहीं. दूसरी ओर पदार्थ इंद्रियों के बोध का विषय और प्राथमिक संदाय है. चेतना और उसकी संप्रेरणाएं उसके बाद जन्मती हैं. तदनुसार कहा जा सकता है कि संचेतना वस्तुसाधित नहीं है, बल्कि बात इसके ठीक उलट, पदार्थ संचेतना का आधार है.

भौतिकशास्त्रियों की इस मान्यता के अनुसार मनोविज्ञान ठोस, वस्तुगत और तत्संबंधी घटनाओं का विषय है. तथापि, भौतिकवादी दर्शन के प्रारंभिक रूपों की अपेक्षा नियतिवाद अधिक परिपक्व विचारधारा है. लेकिन एक चीज है जिसके लिए द्वंद्ववादी भौतिकशास्त्री पूरी तरह नियतिवादी नहीं होना चाहेगा—वह है स्वतंत्रता. यह स्वतंत्रता ही है जिसको नैसर्गिक नियमों में सन्निहित लाभों का पर्याय, उसका सुफल माना जा सकता है. यह मनुष्यता की प्रथम चाहत, उसका घनिष्ठ अनुराग है. मनुष्य के लिए, यद्यपि वह भी सामाजिक नियमों से आबद्ध होता है, तथापि उसकी स्वतंत्रता अपनी जरूरतों के बारे में सामान्य जागरूकता से प्रभावित होती है. यह चढ़त उसके आत्मबोध से जन्मती है. स्वयं को जानना, अनैतिक बंधनों का अवरोध भी है, जो मन में दासत्वबोध पैदा करते हैं. हीगेल का भी ऐसा ही मानना था. इसके अलावा द्वंद्ववादी भौतिकशास्त्रियों का विचार था कि पदार्थ सीधे चेतना का विनिर्धारण नहीं करता, बल्कि वह समाज के माध्यम से अपना काम करता है. दूसरे शब्दों में मनुष्य की चेतना उसके सामाजिक संस्कारों का निक्ष होती है. चूंकि दास का प्रायः कोई समाज नहीं होता. उसका सोच उसके मालिक तक सीमित होता है. इस कारण उसकी चेतना भी संकुचित होती है. यदि किसी बाहरी कारण से उसकी चेतना का प्रस्फुटन होने लगे तो वह दासभाव को नकारना आरंभ कर देता है. यही कारण है कि मनुष्य अनिवार्य रूप से एक सामाजिक प्राणी है. समाज के बिना वह जी ही नहीं सकता. समाज में रहकर ही वह अपनी जरूरतों और उनकी पूर्ति के लिए वस्तुओं का उत्पादन कर सकता है.

उत्पादनतंत्र एवं उत्पादन की प्रविधियां सर्वप्रथम मनुष्य के सामाजिक संबंधों को निर्धारित करती हैं. प्रकारांतर में उन्हीं के आधार पर मानवीय संचेतना का विकास और विनिर्धारण होता है. मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद का यही मुख्याधार और सार तत्व सर्वेसर्वा है. मनुष्य जो सोचता है, इच्छा करता अथवा जिसके वह पलछिन स्वप्न सजाता है, अंत में वही उसकी सामाजिक आवश्यकताओं और तत्संबंधी चेतना का निर्धारण करते हैं. उसकी इच्छाएं ही उसका बौद्धिक संसार को गढ़ती हैं. प्रकारांतर में ठीक इसी प्रकार वे उत्पादनप्रविधियों और उसके आधार पर विनिर्मित सामाजिक संबंधों की आधारशिला बनते हैं. ये प्रविधियां और संबंध निरंतर परिवर्तनशील होते हैं. उनके द्वारा ही समाज द्वंद्वात्मक विकास की आधारभूमि बनता है, जो कालांतर में वर्गसंघर्ष के रूप में सामने आता है. मार्क्स का मानना था कि मानवीय चेतना की कुल विषयवस्तु समाज और सामाजिक प्रगति के फलस्वरूप हुए बदलावों द्वारा निर्धारित होती है. उन्हीं के आधार पर मानवसमाज अपने भविष्य की यात्राएं तय करता है.

क्रमशः

ओमप्रकाश कश्यप

 

 

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