पूंजी दि (कैपीटल) : संक्षिप्त विमर्श : अंतिम

28. उपनिवेशीकरण का आधुनिक सिद्धांत

पूंजी’ की रचना के समय पूंजीवादी शोषण की स्पष्ट छवि थी. उत्पादन व्यवसाय में और व्यवसाय शोषण में ढल चुका था. उत्पादन व्यवस्था पर पर पूंजीवादी एकाधिकार की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही थी. पूंजीपतियों की आपसी स्पर्धा के कारण श्रमिक शोषण के नएनए अध्याय खुल रहे थे. समाज में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई निरंतर गहराती जा रही थी. मशीनों के आगमन के समय उनसे जो उम्मीदें बांधी गई थीं, वे टूटने लगी थीं. यद्यपि राजनीतिक वर्चस्व और साम्राज्यवादी विस्तार के लिए होने वाले युद्धों में कमी आई थी. मगर साम्राज्यवाद के नए प्रतीक के रूप में बड़ीबड़ी व्यावसायिक कंपनियां उभरती जा रही थीं. उनका एकमात्र कार्य आर्थिक रूप से पिछड़े देशों की परिस्थितियों का लाभ उठाकर, वहां के श्रमिकों एवं संसाधनों का दोहन कर अपने लिए भारी मुनाफा बटोरना था. कानून उसके समर्थन में था. वह इतना ताकतवर और पहुंचवाला था कि कानून को मनचाहा मोड़ दे सकता था. अपनी पूंजी के दम वह अपने स्वार्थानुकूल संवैधानिक व्यवस्थाएं भी करा सकता था. वह लोकतंत्र का नारा देकर व्यक्तिवाद को उकसाता था. मानवाधिकारों पर जोर देने का उसका उद्देश्य मात्र इतना था कि समाज में अमर्यादित और अविवेकी उपभोक्तावर्ग जन्म ले. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि एक नए प्रकार का उपनिवेशवाद हवा में था.

पुस्तक के तेतीसवें अध्याय में मार्क्स नव्यउपनिवेशवाद की विशद् व्याख्या करता है. अध्याय का आरंभ वह निजी संपत्ति के दो भिन्न, किंतु परस्पर विरोधी स्वरूपों की चर्चा के साथ करता है. ये दोनों रूप में हैं

. उत्पादक के अपने श्रमकौशल द्वारा अर्जित.

. दूसरों के श्रम के शोषण के आधार पर अर्जित.

मार्क्स के अनुसार दूसरी स्थिति पहली का परिणाम है. संपत्ति की उपस्थिति व्यक्ति को और भी महत्त्वाकांक्षी बनाती है. उसके मन में दूसरों से आगे निकलने की होड़ पैदा करती है. हर पूंजीपति कम समय में अधिक से अधिक संपत्ति अर्जित कर लेना चाहता है. इसके लिए वह श्रमलागत को न्यूनतम कर, लाभानुपात को बढ़ाने का प्रयास करता है. श्रमशोषण के नए तरीकों और बाजारों की खोज करता है. स्थानीय संसाधनों का असीमित दोहन कर प्रकृति और पर्यावरण के लिए विकट समस्याएं खड़ी करता है. उन वस्तुओं के उत्पादन पर जोर देता है, जिनका वास्तविक जरूरतों से कोई संबंध न हो, फिर भी व्यक्ति को उनके अभाव की सतत अनुभूति होती रहे.

मार्क्स के अनुसार उपनिवेशों की स्थापना के बाद पूंजीपति का चरित्र उससे एकदम अलग रूप ले चुका था, जैसा कि वह घरेलू पूंजीवाद, जिसको वह ‘होमलेंड कैपीटलिज्म’ का नाम देता है, के समय था. इस बारे में एडवर्ड गिबन वेकफील्ड लिखता है

औपनिवेशिक पूंजी का अभिप्राय किसी वस्तु/उत्पाद से नहीं है, बल्कि व्यक्तियों के बीच वे सामाजिक संबंध है, जो वस्तुओं के माध्यम से आकार लेते हैं.’

आगे चलकर वह भूमि एवं मजदूरों संबंधों की विवेचना करता है. मार्क्स के अनुसार कोई भी समाज पूंजीवादी संबंधों को अनायास स्वीकार नहीं कर लेता. बल्कि अपनी परंपरा और परिस्थितियों के आधार पर, प्रारंभ में वह उनका जमकर विरोध करता है. किंतु एक नियति के रूप में पराजय ही उसके हाथ लगती है. इस तरह उसे अपने संसाधन पूंजीपतियों को सौंपने ही पड़ते हैं. औपनिवेशिक देशों में भूमि सामान्यतः सस्ती और फैली हुई होती है. इसलिए पूंजीपति वहां अपने लिए बेहतर अवसर देखते हैं. संसाधनों की विपुलता और सस्ता श्रम उन्हें वहां अपने उद्योग लगाने के लिए प्रेरित करता है, तो भी वहां के मजदूर अपने श्रम को बेचने के लिए उस तरह उत्साहित नहीं होते, जैसे कि वे उससे पहले तक करते आए थे. पूंजीवाद की यह विशेषता है कि वह उत्पादनव्यवस्था का सांस्थानिकीकरण करता है. श्रमिकों और शिल्पकारों द्वारा संचालित उत्पादन को कारखानों तक लाकर वह उनका पूंजीकरण कर देता है. इससे पहले से ही उत्पादन में लगे श्रमिक और कामगार बेदखल होते जाते हैं. उनमें से कुछ रोजगार के लिए कारखानों की शरण लेते हैं, तो बाकी बेरोजगार होकर जीविका के लिए अन्य क्षेत्रों में पलायन कर जाते हैं.

आगे मार्क्स एक स्वाभाविकसा प्रश्न उठाता हैµपूंजी और सर्वहारा का उद्गम कैसे हुआ. मार्क्स यहां, पूंजीवाद के उद्गम स्रोत को जानना चाहता है. प्रश्न के बाद वह स्वयं उसकी विवेचना भी करता जाता है. उसके अनुसार उत्पादन की प्राचीन सामाजिक व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति अपने श्रम के आधार पर वस्तुओं का अर्जन करता था. कालांतर में सामंतवाद ने दस्तक दी और दूसरे के श्रम पर आधारित जिंदगी जीने वाला एक परजीवी वर्ग समाज में पनपने लगा. इस वर्ग के पास मजदूरों के कठिन परिश्रम से कमाई कई बेशुमार धनसंपदा थी, लेकिन वह उसको उत्पादन में बदलने की कला से अनभिज्ञ था. शायद इसलिए वह विलासितामय रूप को, धनसंपदा के सर्वोत्तम प्रयोग और अपने वैभव प्रदर्शन के रूप में देखता था. धर्म, जाति, क्षेत्रीयता जैसे अनुत्पादक तत्व उसके सुरक्षा कवच होते थे. प्रौद्योगिकी के विकास के साथ सामंतों का एक वर्ग पूंजीपति के रूप में आकार लेता गया. तो मार्क्स के अनुसार इनकी(पूंजी और मजदूर) उत्पत्ति श्रमिकों के बंटवारे की उस घटना के साथ हुई जब उनका एक वर्ग पूंजी का मालिक बना और दूसरा वर्ग मात्र अपने श्रम का स्वामी बना रहा

यह श्रमिकों के पूंजी के स्वामी और श्रम के स्वामी में विभाजन की घटना से जुड़ा है, जिसके अंतर्गत श्रमिकों ने पूंजी के संचयन के प्रति निष्ठा दर्शाते हुए खुद को श्रम से अनिवार्यरूप से बेदखल कर दिया था.’

मार्क्स के अनुसार उपनिवेशों में भूमि के लिए होने वाला संघर्ष केवल पूंजीवाद की स्थापना तक सीमित नहीं रह जाता. उसकी शुरुआत छोटे किसानों और उद्यमों की बेदखली के साथ होती है. भूनिर्वासन की यह प्रक्रिया क्रमिक और क्षेत्रवार होती है. जहां यह प्रक्रिया अधूरी हो, वहां छोटे किसानों और कृषिव्यवसाय से जुड़े पूंजीपतियों के बीच संघर्ष चलता रहता है. देर तक चलने वाले इस संघर्ष में जीत अंततः पूंजीपतियों की ही होती है, लेकिन उन्हें शतप्रतिशत सफलता कभी नहीं मिल पाती. संघर्ष के विभिन्न चरणों में भूमि छोटे किसानों से हाथों से खिसककर धीरेधीरे पूंजीपतियों के हाथों में जाती ही रहती है. अपवादस्वरूप कई बार किसानमजदूरों का एक वर्ग, पूंजीवादी प्रलोभनों का शिकार होकर, पूंजीकरण की प्रक्रिया को आत्मसात कर लेता है, इससे उसका रवैया पूंजीवाद के प्रति सहयोगात्मक हो जाता है. लेकिन ऐसा हर जगह और हर समाज में संभव नहीं होता. उस अवस्था में पूंजीवादी वर्चस्व के विरुद्ध अपनी परंपरागत उत्पादन प्रविधियों को बचाए रखने का संघर्ष सतत चलता ही रहता है.

मार्क्स के अनुसार श्रम से स्वतःनिर्वासन की यह क्रिया पारंपरिक नियमों के अनुसार संपत्ति संचय की प्राचीन कामना के रूप में व्यक्त हुई थी. यही कारण है कि इसने उपनिवेशों में पूंजीवाद के विस्तार के लिए उत्प्रेरक का काम किया. श्रमिक आत्मनिर्वासन की भावना के साथ, कतिपय कृत्रिम उपायों से मुद्रा (मजदूरी अर्जन हेतु आर्थिकसामाजिक रूप से पूंजीपतियों पर निर्भर होते चले गए. श्रम को बेचने की उनकी आतुरता पूंजीवाद के लिए मददगार बनी. उनकी निर्भरता को स्थायी रूप देने के लिए पूंजीपतियों द्वारा जनसुविधाओं का व्यावसायिकीकरण किया गया. विकास और आधुनिक समाज के प्रतीक के रूप में ऐसी संस्थाओं का गठन किया जाने लगा जो परिवार के गठन की अनिवार्यता पर प्रहार करती थीं. समाज में पहले एकल और छोटे परिवारों के गठन पर बल दिया गया.नतीजा यह हुआ कि पूंजीपतियों को सस्ता श्रम उपलब्ध होने लगा, जो उनके लाभानुपात में भारी वृद्धि का कारण बना. फिर जैसेजैसे उत्पादन पूंजीवादी व्यवस्था के अधीन होता गया, समाज में श्रमिकों की संख्या भी बढ़ती गई. रातदिन चलती फैक्ट्रियां उनके लिए मुनाफा उगलती गईं. पूंजीवाद के विस्तार के साथ ऐसे आर्थिक उपनिवेशों की संख्या में भी विस्तार होता गया.

क्या कोई श्रमिक जितना अपनी मात्रभूमि के प्रति समर्पित है, उतना ही किसी उपनिवेश के प्रति भी हो सकता है. पूंजीवाद के औपनिवेशिक विस्तार की सरणियों को समझने के लिए इस अंतर को समझना बेहद जरूरी है. पिछले विश्लेषण से हमने जाना कि औपनिवेशिक विस्तार के लिए पूंजीपति संपदासंचयन की प्राचीन पद्धतियोंस्वभावों से लाभ उठाते आए हैं, हालांकि आगे चलकर इसी के आधार पर श्रमिकों को अविरत निर्वासन भी सहना पड़ा है. ये स्थितियां पूंजीवादी समाज की अनिवार्य परिणति हैं. अंत में वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि पूंजीपति की निजी समृद्धि व्यक्तिगत संपत्ति के हड़पने, पचा लेने के बाद ही संभव है.

पूंजी’ के पहले खंड में मार्क्स आरंभ से अंत तक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में श्रमशोषण की अनिवार्य स्थितियों का विश्लेषण करता है. तो भी यह नकारात्मक आख्यान नहीं है. पुस्तक में मार्क्स जहां शोषण की अनिवार्यता और पूंजीवादी दमनचक्र की सर्वव्यापकता का विवरण प्रस्तुत करता है, वहीं वह हमें इस बात का भी भरोसा दिलाता है कि पूंजीवादी उत्पीड़न से मुक्ति संभव है. श्रममुक्ति का गुलाब पूंजीवाद की राख से खिलेगा, ‘पूंजी’ का यह संदेश उसको आधुनिक समय का अर्थशास्त्रीय महाकाव्य सिद्ध करने को पर्याप्त है.

 

दि कैपीटल : खंड दो एवं तीन

उनीसवीं शताब्दी के छठे दशक में लंदन में मात्र तीन कमरों के छोटेसे मकान में अपने बड़े परिवार के साथ रहते हुए मार्क्स अपनी आजीविका के लिए ‘न्यू यार्क डेली ट्रिब्यून’ जैसे समाचारपत्रों के लिए लिखे गए साप्ताहिक लेखों से मिले पारिश्रमिक पर निर्भर था. कुछ आमदनी पुस्तकों की बिक्री तथा स्थानीय समाचारपत्रों द्वारा बड़े परिवार का बोझ उठाने और अपनी लगभग स्थायी बीमारी का इलाज कराने के लिए उतनी आमदनी पर्याप्त न थी. आड़े वक्त में मित्र ऐंगल्स ही काम आता था. विषम परिस्थितियों में भी वह राजनीतिक अर्थशास्त्र पर, धीरेधीरे मगर निरंतर काम करता आ रहा था. 1857 में उसने एक बड़ी पांडुलिपि तैयार की, जिसमें पूंजी, संपत्ति, श्रम, मजदूरी, राज्य, विदेश व्यापार तथा विश्वबाजार जैसी विषयों पर गंभीर काम किया गया था. 1860 में आखिर मार्क्स ने उस पुस्तक को प्रकाशन को भेजने से पहले दुबारा जांचापरखा. पुस्तक प्रकाशित होकर बाजार तक पहुंचने में सात वर्ष का लंबा समय और लगा. 1867 में ‘पूंजी’ का पहला खंड बाजार में आया. इस खंड में उसने श्रमसिद्धांत, अधिलाभ, मजदूरी, श्रमशोषण आदि अनेक विषयों पर अपने विचारों को प्रस्तुत किया था. पुस्तक का दूसरा और तीसरा खंड भी 1860 में ही तैयार हो चुका था. लेकिन उन्हें अंतिम रूप देने के लिए मार्क्स उन खंडों पर लगातार काम करता रहा. इस तरह दूसरे और तीसरे खंड का प्रकाशन क्रमशः 1885 और 1894 में संभव हो सका. उस समय तक कार्ल मार्क्स की मृत्यु हो चुकी थी. दोनों खंडों का संपादन उसके अभिन्न मित्र और सहयोगी फ्रैड्रिक ऐंगल्स ने किया था.

पूंजी’ का दूसरा खंड भी पहले खंड की तरह श्रममूल्य और पूंजीवादी शोषण की व्याख्या पर टिका है और एक तरह से पहले खंड का पूरक है. तीसरे खंड में मार्क्स ने पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था की प्रवृत्तियों को दर्शाया है. यह सात हिस्सों में बंटा है

1. अधिलाभ का लाभ में तथा अधिलाभ की दर का लाभ की दर में रूपांतरण.

2. लाभ का औसत लाभ में रूपांतरण.

3. लाभदर में गिरावट की प्रवृत्ति का नियम.

4. उपभोक्ता पूंजी तथा पूंजीधनराशि का वाणिज्यिक पूंजी एवं मुद्राव्यवहार पूंजी(सौदागर की पूंजी) में रूपांतरण.

5. लाभ का ब्याज एवं उद्यमलाभ तथा ब्याजयुक्त पूंजी में विभाजन.

6. अधिलाभ का भूमिकर में परिवर्तन.

7. राजस्व एवं उसके स्रोत.

तीसरे खंड में पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था के गहन अध्ययन के उपरांत मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि उत्पादनवृद्धि के दौर में जैसेजैसे मानवीय श्रम की आवश्यकता बढ़ती जाती है, वैसेवैसे लाभ की दर में गिरावट आने लगती है. प्रथम द्रष्टया यह तर्क मार्क्स के अन्य स्थापनाओं का विरोधी जान पड़ता है, जिसके आधार पर वह मशीनीकरण की आलोचना करता है. मगर यह तथ्य मशीनीकरण और बढ़ती स्पर्धा के दौर में यह तथ्य अनिवार्य परिणति के रूप में सामने आता है. मशीनीकरण के युग में मानवीय श्रम की अनिवार्यता का औचित्य क्या है? वे कौनसी स्थितियां हैं जहां प्रौद्योगिकीय उन्नति साथ नहीं दे पाती?

वस्तुतः मशीनों की अभिकल्पना इस उद्देश्य के निमित्त की जाती है कि वे उत्पादन में कमी लाएं. इससे उत्पादन में तेजी आती है. अतिरिक्त उत्पादन को खपाने के लिए पूंजीपति को नए बाजारों की जरूरत पड़ती है. संचार माध्यमों और प्रचार कीे नवीनतम तकनीक के माध्यम से कोई पूंजीपति अपने उत्पाद के पक्ष में माहौल बना सकता है. मगर कठिन स्पर्धा के दौर में इतनेभर से काम नहीं चलता. उत्पादक को अपने उत्पाद की विशेषताओं के साथ उपभोक्ता के करीब जाना पड़ता है. इस कार्य में मशीनों की भूमिका मात्र सहायक तक सिमट जाती है. इसलिए कि उपभोक्ता से अंतरंग संबंध बनाने, उसको अपने उत्पाद से जोड़े रखने के लिए विशेषरूप से प्रशिक्षित मानवीय श्रम की आवश्यकता पड़ती है. स्पर्धा के चलते उत्पादक का इस मद में खर्च लगातार बढ़ता ही जाता है. इस निष्कर्ष से मार्क्स और उसके अनुयायी मानते आए हैं कि पूंजीवाद एक दिन अपने ही बोझ से दबकर समाप्त हो जाएगा. हालांकि उसकी यह भविष्यवाणी अभी तक सच सिद्ध नहीं हुई है, लेकिन मार्क्स के समानताधारित समाज के सपने की स्थापना का औचित्य कम नहीं हो जाता.

 

ओमप्रकाश कश्यप

 

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