पूंजी (दि कैपीटल): संक्षिप्त विमर्श—तीन

15. समयाधारित वृत्तिका

इस अध्याय में मार्क्स ने मजदूरी के विभिन्न रूपों का विश्लेषण किया है. पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूरी का भुगतान प्रायः दो तरीके से किया जाता है. पहला कार्यघंटे के आधार पर. तथा दूसरा किए गए कार्य के आधार पर. कार्यघंटे के आधार पर दी जाने वाली मजदूरी की एक मौलिक विशेषता है कि वह समयसापेक्ष होती है. प्रत्येक श्रमिक अपने श्रम का स्वामीपूंजीपति की इच्छानुसार कुछ सुनिश्चित कालावधि के लिए निवेश करता है. यह अवधि घंटे, दिन, सप्ताह, महीना आदि कुछ भी हो सकती है. अवधि के पूरा होने पर जो धनराशि श्रमिक को उसके श्रममूल्य के रूप में प्राप्त होती है, वह उसकी वृत्तिका अथवा मजदूरी कहलाती है. हालांकि पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूरी की मात्रा श्रमिक की श्रमलागत का कुछ ही हिस्सा होती है. अधिकांश तो पूंजीपतिस्वामी द्वारा लाभांश के रूप में हड़प ली जाती है. कार्यदिवस की लंबाई के अनुसार, उसकी दैनिक अथवा साप्ताहिक मजदूरी में खतरनाक रूप से बड़े अंतर दिखाई पड़ सकते हैं. ऐसे में यदि किसी श्रमिक के औसत श्रममूल्य की गणना करनी हो तो वह उसकी दैनिक माध्यवृत्तिका अथवा औसत मजदूरी को कुल कार्यघंटों द्वारा विभाजित करने पर प्राप्त की जा सकती है. स्पष्ट है कि जैसेजैसे औसत कार्यघंटों की संख्या बढ़ती है, श्रमिक की औसत मजदूरी में भी गिरावट आने लगती है. इसके आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि किसी भी श्रमिक का औसत श्रममूल्य उसके दैनिक कार्यघंटों की संख्या के व्युत्क्रमानुपाती होता है. औसत श्रममूल्य की गिरावट श्रमिक की साप्ताहिक या मासिक मजदूरी से स्वतंत्रा होती है, यानी दैनिक या साप्ताहिक मजदूरी समान रहने पर भी उसके औसत श्रममूल्य में पतन संभव है. यहां तक कि कार्यघंटों की बढ़ती दर के आधार पर, श्रमिक की मजदूरी बढ़ने पर भी उसके औसत श्रममूल्य में स्थिरता अथवा गिरावट के लक्षण बने रह सकते हैं. यही स्थिति उनके शोषण के स्तर को दर्शाती है. मार्क्स ने स्पष्ट किया था कि मजदूरी का बढ़ना और औसत श्रममूल्य का बढ़ना दोनों एकदूसरे से भिन्न स्थितियां हैं.


मार्क्स ने लिखा है कि श्रमशक्ति के मूल्य एवं उसके श्रममूल्य की अंतर्संबद्धता को छिपाने के लिए पूंजीपति हालांकि प्रतिघंटा के आधार पर मजदूरी के भुगतान के नियम को अपना सकता है. मगर यह उसी अवस्था में लागू किया जाता है जहां कार्यदिवस के घंटों को निर्धारित करना संभव हो. पूंजीपति श्रमिक को एक कार्यदिवस के लिए नियुक्त कर सकता है. लेकिन यह तभी संभव है कि जब कार्यदिवस दिवस के दौरान किए कार्य का कुल मूल्य श्रमिक की दैनिक मजदूरी से अधिक हो और मालिक के लिए अधिलाभ की सुनिश्चितता हो. ऐसी अवस्था में पूंजीपति के लिए श्रमिक को लंबे समय के लिए नियुक्त करने के बजाय अल्पावधि के लिए काम पर रखना लाभप्रद होता है. अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए श्रमिक उस अल्पावधि में भी अधिकतम कार्य कर मालिक को संतुष्ट करना चाहता है, ताकि उसको आगे भी काम की उम्मीद बनी रहे. कम वृत्तिका लेकर भी स्वयं को स्पर्धा में बनाए रखने की श्रमिक की व्यवस्था ही पूंजीवाद को ताकतवर बनाने का काम करती है. अक्सर आठ घंटे अथवा एक औसत कार्यदिवस के दौरान मजदूरी की दर इतनी कम रखी जाती है कि श्रमिक को अपनी जरूरतों की भरपाई के लिए अतिरिक्त समय तक कार्य करना पड़ता है. यह स्थिति स्वामीपूंजीपति के लिए और भी लाभकारी होती है. इससे उसको दुहरा लाभ होता है. मार्क्स इसकी व्याख्या कुछ इन शब्दों में करता है—

जब कोई अकेला कामगार डेढ़ अथवा दो कामगारों जितना कार्य निपटाता है, तब श्रम की उपलब्धता बढ़ती है, यद्यपि इससे बाजार में श्रमशक्ति की आपूर्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. वह स्थिर बनी रहती है. इससे श्रमिकों में स्पर्धा का माहौल बनता है. यह स्थिति पूंजीपति को बलपूर्वक श्रममूल्य घटाने का अवसर प्रदान करती है. इस तरह जब श्रममूल्य में गिरावट को अघोषित अनुमति मिल जाती है, तब पूंजीपतिस्वामी श्रमिकों पर और भी अधिक समय तक काम करने के लिए दबाव डालने की स्थिति में होता है.

समय के आधार पर मजदूरी का भुगतान पूंजीपति और श्रमिक दोनों के बीच यह विश्वास पैदा करता है कि श्रम को सीधेसीधे खरीदा जा रहा है. मजदूर यह मानकर संतुष्ट हो जाता है कि जिस अवधि के लिए उसने श्रम का निवेश पूंजीपति के लिए किया, उस अवधि का श्रममूल्य वह प्राप्त कर चुका है. दूसरी ओर पूंजीपति भी कार्यघंटों के हिसाब में मजदूरी का भुगतान कर निश्चिंत हो जाता है. मगर इस व्यवस्था में मजदूर को एक जीवित इकाई के बजाय मात्रा एक मशीन अथवा अपना श्रमकौशल बेचने वाली निर्जीव इकाई मान लिया जाता है. जबकि यथार्थ में ऐसा हरगिज नहीं होता. यह स्थिति श्रम के लिए शोषणकारी सिद्ध होती है. बाजार में श्रम की स्पर्धा श्रममूल्य में निरंतर गिरावट की स्थितियां पैदा करती है. जबकि पूंजीपतिस्वामी खुद को निर्दोष मानकर न केवल निस्पृह बना रहता है, बल्कि कानूनी जटिलताओं का लाभ उठाते हुए स्थितियों को निरंतर अपने पक्ष में बनाए रखता है.

16. उत्पादनआधारित वृत्तिका

कामगार को काम के बदले मजदूरी दिए जाने की दूसरी प्रणाली में श्रमिक को उसके द्वारा उत्पादित माल के प्रति नग के अनुसार, पूर्वनिर्धारित दर पर, मजदूरी प्रदान की जाती है. पूंजीवादी व्यवस्था में यह प्रणाली भी शोषण का आधार बनती है. इस प्रणाली में श्रमिक द्वारा बनाए गए माल के प्रति नग के अनुसार तय धनराशि का भुगतान किया जाता है. इसे वृत्तिकाभुगतान की परिष्कृत प्रणाली माना जाता है. इस प्रणाली में पूंजीपतिस्वामी को उत्पाद की एक इकाई के निर्माण में लगने वाले समय की जानकारी होती है. इसलिए वह उन्हीं कामगारों को नियुक्त करता है, जो उस समयमानक पर खरे उतरते हों. इस प्रणाली में उत्पादनचक्र को विभिन्न इकाइयों में बांट दिया जाता है, ताकि उनमें लगे श्रममूल्य की गणना की जा सके. यह व्यवस्था दलालों को बढ़ावा देने में सहायक सिद्ध होती है. ये दलाल पूंजीपति स्वामी से जो निश्चित राशि लेते हैं, उसका एक आकर्षक हिस्सा अपने लिए बचाकर बाकी का भुगतान श्रमिक को करते हैं. इससे श्रमिक को उसका पूरा श्रममूल्य नहीं मिल पाता. ये स्थितियां मजदूर के शोषण को बढ़ावा देती हैं.

निहित स्वार्थ के लिए पूंजीपति की ओर से श्रमिक को बराबर यह समझाया जाता है कि उसके अतिरिक्त श्रम का लाभ उसको सीधे मिल रहा है. यदि वह अधिक काम करेगा, तो उसका पूरा लाभ उसी को प्राप्त होगा. अतएव अपने आर्थिक हित को देखते हुए उसको अधिक से अधिक कार्य करना चाहिए. श्रमिक जो अक्सर इस पद्धति की बारीकियों से अनजान होता है, लालच में आकर प्रति समयइकाई में अधिक से अधिक नगों का उत्पादन करने की कोशिश करता है, जिसके लिए उसको निर्धारित कार्यघंटों से भी अधिक देर तक काम करना पड़ सकता है. लेकिन जैसेजैसे उसके प्रतिदिवस कार्यघंटों की बढ़ोत्तरी होती है, उसके श्रममूल्य में उतनी ही गिरावट आने लगती है. दूसरी ओर पूंजीपति स्वामी को उत्पाद की प्रति नग के अनुसार होने वाला लाभ बढ़ता चला जाता है. यह स्थिति भी श्रम को स्पर्धात्मक बनाती है. मार्क्स के अनुसार—

प्रति नग मजदूरी की एक खास प्रवृत्ति होती है. यह कि जब किसी श्रमिक की मजदूरी औसत से बढ़ने लगती है, तो उसका माध्यमान अपने आप नीचे गिर जाता है. स्पष्ट है कि प्रतिनग मजदूरी भुगतान की प्रणाली पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था के बेहद अनुकूल है.’

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए मार्क्स ने फ्रांस के कपड़ा उद्योग का उदाहरण दिया है. वह लिखता है कि युद्धक स्थितियों के दौरान फ्रांस में कई घंटे लंबे कार्यदिवस के बावजूद प्रतिउत्पाद मजदूरी की दर में भारी गिरावट दर्ज की गई थी. मजदूर प्रतिदिन बीस घंटे काम करके भी अपनी जरूरत की चीजें नहीं जुटा पाते थे. दैनिक मजदूरी की दर अपने न्यूनतम स्तर तक गिर चुकी थी. दूसरी ओर श्रमिकों ने इस स्थिति का खूब लाभ उठाया था. चूंकि युद्ध के कारण उद्योगधंधों में मंदी का आलम था, और बेरोजगारी अत्यंत बढ़ चुकी थी, इसलिए श्रमिकों के लिए बाहर रोजगार के अवसर काफी घट चुके थे. ऊपर से रोजमर्रा की वस्तुएं अत्यधिक महंगी हो जाने के कारण उन्हें जुटाने के लिए श्रमिक को अतिरिक्त श्रम करना ही पड़ता था. इसलिए पूंजीपति की शर्तों पर, अपेक्षाकृत कम वृत्तिका पर भी काम करने को विवश थे.

गहन अध्ययन के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि प्रतिउत्पाद मजदूरी के भुगतान की व्यवस्था सिवाय श्रमिकों के शोषण के और कुछ नहीं है. प्रति नग उत्पादन प्रणाली पूंजीपतिस्वामी के लिए विशेष हितकारी होती है. वह उसकी दर अपनी शर्तों पर तय करता है, जो सामान्यतः इतनी कम होती है कि अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय तक काम करना हर श्रमिक की विवशता बन जाता है. परिणाम यह होता है कि पूंजीपतिस्वामी को उतने ही संसाधनों से अतिरिक्त उत्पादन प्राप्त हो जाता है, जो उसके अधिलाभ को बढ़ाने में सहायक होता है. युद्ध जैसी आपात्कालिक स्थितियां जहां जनसाधारण के लिए जानलेवा संकट बन जाती हैं, वहीं पूंजीपति के लिए वे विशेष लाभदायक सिद्ध होती हैं. समाज अथवा सरकार की ओर से कोई कानूनीनैतिक बंधन न होने के कारण वे पूरी तरह स्वार्थी और निष्ठुर बन जाती हैं.

17. पूंजी-संचयन की प्रक्रिया

उन्नत प्रौद्योगिकी पर आधारित उत्पादन व्यवस्था पूंजीपति के लिए विशेषरूप से लाभकारी सिद्ध होती है. अपनी पूंजी के दम पर वह आधुनिकतम प्रौद्योगिकी में निवेश करता है, जिनके आगे श्रमिक की हैसियत मशीनसहायक जितनी होती है. इसका लाभ उठाते हुए पूंजीपति श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी देता है. अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए श्रमिक को अधिक देर तक काम करना पड़ता है. यह स्थिति भी पूंजीपतिस्वामी के हित में होती है. वह न्यूनतम मजदूरी देकर अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने की स्थिति में रहता है. परिणामस्वरूप उसका अधिलाभ निरंतर बढ़ता ही जाता है. उत्पादन व्यवस्था में अधिलाभ की लगातार बढ़ती दर के कारण अतिरिक्त पूंजी, कारखाना मालिक के खजाने में जमा होती जाती है. जो उसको और अधिक ताकतवर, महत्त्वाकांक्षी, साधनसंपन्न, लालची और उत्पीड़क बनाती है.

पुस्तक के अगले अध्यायों में मार्क्स ने अधिलाभ के पूंजी में ढलने और उसके वर्गीय चरित्र को पुनः उभारने वाली प्रवृत्तियों का विवेचन किया है, जो श्रमिकों के शोषण को बढ़ावा देती हैं. अधिलाभ की बढ़ती मात्रा पूंजीपति की एकाधिकार की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है. अपनी संचित पूंजी के दम पर वह और महंगी, मजदूरविरोधी तकनीक खरीदता है. नई तकनीक उसके पूंजीलाभ और भी वृद्धि करती है, जिससे उसका लाभानुपात निरंतर बढ़ता जाता है. उच्च तकनीक के आगमन के पश्चात श्रमिकों को उनकी वृत्तिका के रूप में दी जाने वाली चल पूंजी, मशीनादि के रूप में अचल पूंजी का रूप धारण कर लेती है. पूंजीपतिस्वामी उसका लाभ उठाता है. वह अधिलाभ का बड़ा हिस्सा मशीनों के संरक्षण, रखरखाव, क्षरण, संचालनशुल्क आदि पहले ही अपने पास रख लेता है. नई मशीनों के आगमन के परिणामस्वरूप कुछ श्रमिक बेरोजगार हो जाते हैं. हालांकि उन्हें यह अवसर प्राप्त होता है कि नई तकनीक से सामन्जस्य बनाए रखने के लिए स्वयं को प्रशीक्षित करें, लेकिन उससे पहले तक पूंजीपतिस्वामी की ओर से मिल रही धनराशि इतनी कम होती है कि वह प्रशिक्षण का व्यय उठाने में अक्सर असमर्थ होता है. वह पूंजीपति से अपेक्षा करता है कि प्रशिक्षण का खर्च स्वयं उठाकर उसके साथ सहयोग करे. उस समय पूंजीपति चुनिंदा कर्मचारियों को, जितनी नई प्रौद्योगिकी युक्त मशीनों के संचालन के लिए उसे आवश्यकता है, प्रशिक्षण देकर बाकी को अपनी मनमानी शर्तों पर काम करने के लिए बाध्य कर देता है. पूंजीपति स्वामी प्रशिक्षण का स्वयं खर्च उठाने के बजाय बाहर से प्रशिक्षित कर्मचारियों को काम पर लेने को प्राथमिकता देते हैं. नए कर्मचारी अनुभवी कर्मचारियों की अपेक्षा कम वृत्तिका पर ही काम करने को तैयार हो जाते हैं. उनके ऊपर अपनी शर्तें थोपना भी आसान होता है. इसका दुष्परिणाम यह होता है कि अनुभवी कर्मचारियों के सिर पर छंटनी की तलवार लटक जाती है. अंततः उन्हें भी पूंजीपति स्वामी की शर्तों के अधीन काम करने को सहमत हो जाते हैं.

पूंजीवाद का बढ़ता वर्चस्व समयसमय पर अनेक वित्तीय संकटों का कारण बनता है. पूंजीपतियों के बीच बढ़ती स्पर्धा एक और जहां श्रमिकों के शोषण को बढ़ावा देती है, वहीं यह पूंजीपतियों के बीच भी एक निर्लज्ज होड़ पैदा करने लगती है. मार्क्स के अनुसार पूंजी के संचयन की प्रवृत्ति अर्थव्यवस्था में स्थायित्व के लिए चुनौतीपूर्ण होती है. बाजार पर एकाधिकार प्राप्त करने की प्रवृत्ति उत्पादनव्यवस्था में निरंतर क्रांतिकारी परिवर्तनों को बढ़ावा देती है. श्रमिक जब तक एक तकनीक का अभ्यस्त होने का प्रयास करता है, उससे पहले ही बाजार में नई तकनीक दस्तक देने लगती है. स्वाभाविक रूप से नई तकनीक पहले से कहीं अधिक उत्पादनक्षम किंतु श्रमविरोधी होती है. बावजूद इसके बाजार पर एकाधिकार कायम रखने के लिए पूंजीपति उस तकनीक को अपना भी लेता है. नई तकनीक के प्रति अकुशल श्रमिक एक बार पुनः पूंजीपति की मनमानी के आगे झुकने को विवश हो जाता है.

18. पुनरुत्पादनमात्र

मार्क्स के लेखन की विशेषता यह है कि पूंजीवाद के चरित्र का कोई भी पहलू, कोई भी कोना उसके चिंतन से बच नहीं सका है. पूंजी की तानाशाही से जुड़े प्रत्येक मुद्दे पर वह अपने मौलिक विचार प्रस्तुत करता है. पूंजीवादी व्यवस्था के लगभग हर निहितार्थ की विवेचना करता हुआ वह बारबार उसकी शोषणकारी प्रवृत्तियों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कराता है, और हर बार वह पूंजीवाद की वैकल्पिक प्रविधियों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है. पुस्तक के तेइसवें अध्याय में वह पुनरुत्पादन पर चर्चा करता है और उत्पादन को उससे जोड़ देता है. पुनरुत्पादनमात्र का अभिप्राय पूंजीपतिस्वामी की उस प्रवृत्ति से है जो समस्त अर्जित अधिलाभ को पचाकर, दूसरे शब्दों में श्रमिकों के हिस्से के अधिलाभ को हड़पकर, हर बार उतनी ही पूंजी का निवेश उत्पादन में जोड़ देता है. इसके परिणामस्वरूप उत्पादनस्तर में स्थायित्व आता है. मार्क्स के अनुसार उपभोग समाज की जरूरत है, और संभवतः उसका चरित्र भी. समाज के लिए उपभोग को रोक पाना असंभव है. न ही उसके लिए उत्पादन पर अंकुश लगाया जा सकता है. उपभोग उत्पादन की प्रेरणा बनता है. मगर उत्पादन मात्रा से पूंजीपति की महत्त्वाकांक्षाओं की तृप्ति नहीं हो पाती. लाभवृद्धि की कामना से वह अधिक उत्पादन करना चाहता है. इसके लिए वह अर्जित लाभ को निवेश का हिस्सा बना लेता है. बढ़ी हुई पूंजी को सक्रिय बनाए रखने के लिए नए क्षेत्रों में उत्पादन की जरूरत पड़ती है, पुनरुत्पादन की मांग बढ़ने लगती है. लाभ के निवेश और मशीनीकरण के चलते एक दिन पुनरुत्पादन व्यवस्था की अनिवार्यता बन जाता है—

समाज की उत्पादन की प्रत्येक प्रक्रिया, उसी क्षण पुनरुत्पादन की प्रक्रिया भी है.’

मार्क्स का यह निर्णय बहुत ही महत्त्वपूर्ण तथा उसकी सुतीक्ष्ण विश्लेषणात्मक वुद्धि का आविष्कार था. मार्क्स के अनुसार पूंजी का वर्गीय चरित्र ही ऐसा है कि वह सदैव विकासमान अवस्था में रहे. उत्पादन की अवस्था में चूंकि श्रमशक्ति और उत्पादन के अन्य संसाधनों की लगातार खपत हो रही होती है, अतएव उत्पादन की निरंतरता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि श्रम और संसाधनों का समानुपातिक पुनरुत्पादन भी होता रहे. ऐसा न होने पर उत्पादन शृंखला बाधित हो जाएगी. पुनरुत्पादन की बढ़ती मांग श्रमशोषण के नए आयाम विकसित करती है. मार्क्स यहां दो बिंदुओं का विशेष उल्लेख करता है. वह लिखता है कि—

‘सामान्यतः यही लगता है कि पूंजीपति अपने श्रमिक को काम के बदले मुद्रा के रूप में भुगतान करता है, जबकि हकीकत यह है कि मजदूर को मात्रा उतनी मजदूरी ही प्राप्त हो सकती है, जिससे वह किसी भी प्रकार अपना एक दिन बिता सके. अपनी सामान्य जरूरतों को पूरा करने के लिए श्रमिक को सारे दिन काम करना पड़ता है. उसके बदले पूंजीपति उसको मजदूरी के रूप में कुछ धन का भुगतान करता है. किंतु अपने श्रम के माध्यम से श्रमिक पूंजीपति द्वारा दी गई मजदूरी से कहीं अधिक उसे कार्य के रूप में लौटा भी चुका होता है. वह पूंजी पूंजीपति का अधिकार मानी जाती है और दिनप्रतिदिन बढ़ते हुए भारी धनराशि का रूप ले लेती है. यह पूंजी प्रकारांतर में पूंजीपति को और अधिक समृद्ध करने के काम आती है. चूंकि कामगार की जरूरत की अधिकांश वस्तुएं, जीवनोपयोगी दैनिक सामग्री भी पूंजीपति के कारखानों में बनती है, जिन्हें वह भारी लाभानुपात के साथ बेचता है. बिना यह सोचेविचारे कि उनके उत्पादन में श्रमिक वर्ग ने अपना पसीना बहाया है, और इस नाते उसका भी उतना ही अधिकार है, जितना कारखानेदार का. उन्हें अर्जित करने के लिए श्रमिक अपनी मजदूरी को दुबारा पूंजीपति को लौटा देता है. मजदूर और मालिक के बीच इस अदलाबदली द्वारा मालिक को पुनः निवेश योग्य धन एवं श्रमिक को उपभोक्ता सामग्री की प्राप्ति होती है. परिणाम यह होता है कि श्रमिक जहां जीनेभर का सामान जुटा पाता है, वहीं पूंजीपति के पास मुनाफे के रूप में पूंजी की लगातार आमद रहती है, जो उसको और अधिक समृद्ध करने का काम करती है.’

मार्क्स आगे लिखता है कि उत्पादनप्रणाली को गतिमान बनाए रखने हेतु उससे लाभ का सृजन अनिवार्य है. यदि लाभ के बिना भी पूंजीपति उद्योग को चलाए रहता है, उसके लिए वह अपनी जेब से लगातार पूंजी लगाता है, तो एक दिन निश्चय ही ऐसा आएगा, जब वह टूट चुका होगा. अतएव पुनरुत्पादनमात्रा का आशय है, समस्त पूंजी को इस तरह उद्यम का हिस्सा बना देना कि उससे सतत लाभार्जन होता रहे और अर्जित लाभ के एक हिस्से का उद्यम में निवेश कर, उसको आगे बढ़ाते रहने की संभावना भी निरंतर बनी रहे. पुनरुत्पादन अथवा उत्पादन की चक्रीय व्यवस्था दरअसल समाज के वर्गचरित्रों की अनुकृति है. पूंजीवादी अवस्था में श्रमिक को सिर्फ इतना ही मिल पाता है जिससे वह अपनी सामान्य जरूरत के लिए आवश्यक वस्तुएं जुटा सके. कई बार तो वह इतना कम होता है कि श्रमिक को अपनी न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है और अपनी कुछ अपेक्षा कम जरूरी वस्तुओं के साथ कतरब्योंत करनी पड़ती है. श्रमिक जिन उद्यमों में अपने श्रम का निवेश करता है, वे पूंजीपति की संपत्ति होते हैं. अपने श्रमकौशल के माध्यम से श्रमिक वहां पूंजीपतिस्वामी के लिए लाभ का सृजन करता है. काम पूरा होने के साथ ही वह कारखाने को ज्यों का त्यों छोड़कर चला जाता है. इस बीच वह सिर्फ उतना जुटा पाता है, जो उस अवधि में काम करने के लिए अनिवार्य था. पूंजीपति की भांति वह धन को कभी अपने जीवन की वास्तविकता में नहीं बदल पाता. इससे पूंजीपति पर उसकी आश्रितता सदैव बनी रहती है. यह व्यवस्था समाज के बहुसंख्यक श्रमजीवी वर्ग को पूंजीपतियों का आश्रित बना देती है, जिससे शोषण और अनाचार को बढ़ावा मिलता है. मार्क्स के शब्दों में—

श्रमिक उत्पादनप्रक्रम को सदैव उस अवस्था में छोड़ता है, जैसा वह उसके आगमन के समय था—धन का वैयक्तिक स्रोत, वह उसे अपने लिए धनार्जन का नियमित स्रोत बनाने से वंचित रह जाता है.’

श्रमिक को मजदूरी के रूप में उतनी ही धनराशि मिलती है, जिससे वह अपने जीवनयापन के लिए केवल अनिवार्य वस्तुओं की खरीद कर सके. उसके बाद उसके पास कुछ शेष नहीं बचता. इसलिए उसको श्रम के लिए दुबारा समर्पित होना पड़ता है. मार्क्स यहां गहराई में जाकर अन्वीक्षा करता है. वह लिखता है कि मजदूर को प्राप्त मजदूरी उस अवधि के लिए होती है, जिसको वह पूरा कर चुका होता है. इसका आशय है कि श्रमिक अग्रिम श्रमनिवेश करता है. मजदूरी उसको बाद में प्राप्त होती है. इस अवधि का पूंजीपति की ओर से उसको कोई ब्याज भी नहीं मिलता. उल्टे पूंजीपति के अधिकारभाव के आगे उसको सदैव झुकना पड़ता है. यही कारण है कि इस व्यवस्था में श्रमिक निरंतर पिसता जाता है, जबकि पूंजीपति सदैव लाभ की स्थिति में रहता है. वह पूंजी का निवेश करता है, लाभ कमाता है, दुबारा उसका निवेश करता है. वह श्रमिक को कम मजदूरी देता है. जितना देता है, उसका एक हिस्सा उसे उपभोक्ता वस्तुएं बेचकर अधिलाभ के रूप में पुनः वापस ले लेता है. अतएव मजदूर के पास सिवाय उसके एक दिन के, जिसे वह कारखाने में श्रम करते हुए बिताता है, और कुछ नहीं बच पाता. इस प्रकार उसका लाभ और उत्पादनव्यवस्था पर वर्चस्व बढ़ता ही जाता है.

उल्लेखनीय है कि पूंजीपति समस्त लाभ का एक साथ निवेश नहीं करता. न ही उसको वह अपने पास बचाकर रखता है. बल्कि लाभार्जन के रूप में संचित पूंजी का निवेश वह उत्पादन के नए क्षेत्रों में करता है, जो उसके साथसाथ दूसरे पूंजीपतियों को भी लाभ पहुंचाने का काम करते हैं. परिणाम यह होता है कि पूंजीपति की आरंभिक पूंजी चक्रीय पूंजी का रूप ले लेती है, जो पूंजीपति के लिए मजदूरों के श्रम को अधिलाभ में बदलने का काम करती है. इस व्यवस्था में श्रमिक को यह लगता है कि वह पूंजीपति से अपनी मजदूरी के रूप में कुछ अर्जित कर रहा है, जबकि अर्जित की गई मुद्राएं जीवन के लिए जरूरी वस्तुओं की खरीद में खप जाती हैं. अगले दिन से श्रमिक को पुनः संघर्ष में जुटना पड़ता है. कामगार जीवित रहने की कोशिश में अपने श्रम को बेचता है, और इस दौरान वह पूंजीपतिस्वामी के लिए अधिलाभ का लगातार सृजन करता है, जिसका एक हिस्सा पुनः निवेश होकर पूंजीपति के अधिलाभ में वृद्धि करने और अपने लिए वर्गीय शोषण की स्थितियां पैदा करने का काम करता है. श्रम और संसाधन की खरीदफरोख्त के इस क्रम में श्रमिक अपने श्रम से पूंजीपति को बढ़ावा देता है, जबकि पूंजीपति अपनी पूंजी के दम पर श्रमिकों की कतार पर कतार पैदा करता चला जाता है. मार्क्स के अनुसार यह स्थिति आगे चलकर वर्गसंघर्ष को प्रासंगिक और अनिवार्य बनाने का काम करती है.

19. अधिलाभ का पूंजी में अंतरण

मार्क्स के अनुसार हर धन पूंजी नहीं है. न ही हर वस्तु उपभोक्ता सामग्री कही जा सकती है. पूंजी का आशय उस संपदा से है जो उत्पादनप्रक्रिया में प्रवृत्त होकर पूंजीपति के निमित्त अधिलाभ का सृजन करती है. इसी प्रकार उपभोक्ता वस्तु का आशय उस वस्तु से है, जिसका निर्माण दूसरों के उपयोग हेतु, आर्थिक लाभ कमाने की वांछा के साथ किया जाता है. ‘पूंजी’ के चैबीसवें अध्याय में मार्क्स उन स्थितियों की विस्तृत विवेचना करता है जिनके माध्यम से कोई पूंजीपति अपने लाभ का उपयोग पूंजीविस्तार के लिए करता है. पिछले अध्यायों में किए गए विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए वह एक बार फिर पूंजी के संचयन, उसके पुनः निवेशन और लाभ में बदलने की प्रक्रिया को अपने विश्लेषण से जोड़ता है. मार्क्स के शब्दों में अधिलाभ के संचयन का अभिप्राय—

अधिलाभमूल्य का पूंजी के रूप में निवेश करना; अथवा उसका पूंजी के रूप में पुनः रूपांतर है.’

अपने मंतव्य को स्पष्ट करने के लिए वह सूती धागा बनाने वाले एक मजदूर का चित्र खींचता है. शब्दचित्र के माध्यम से वह दर्शाता है कि एक पूंजीपति किस प्रकार अपनी पूंजी का उपयोग अपने उत्पादन को बढ़ाने और श्रमशक्ति जुटाने के लिए करता है. वह बारबार एक ही बात पर लौटकर आता है कि किस प्रकार अधिलाभ को पूंजी का रूप देने के लिए पूंजी का संचयन और उसका पुनः निवेशन अनिवार्य है. आखिर वे कौन से कारण हैं, जिनके कारण कोई पूंजीपति अपने लाभ का निवेश करने को तैयार होता है? वे कौनसी लालसाएं हैं जो पूंजीपति को श्रमिकों के शोषण के लिए उकसाती हैं और उसको उस व्यवस्था का खलनायक बनने के लिए बाध्य करती हैं?

मार्क्स के अनुसार लाभ की मात्रा जैसेजैसे बढ़ती है, पूंजीपति के मन में बाजार पर एकाधिकार कायम करने की इच्छा बलवती होती जाती है. आर्थिक साम्राज्य का मुखिया बनने की साध उसे उत्पादनवृद्धि और नई उपभोक्ता वस्तुओं के विकास के साथ नए बाजारों की खोज के लिए भी प्रेरित करती है. स्मरणीय है साधारण अवस्था में उत्पादनवृद्धि का सपना देखना और उसके लिए नई प्रौद्योगिकी का उपयोग करना अपने आप में बुरा नहीं है, बशर्ते इसके साथ सामाजिक हितों का भी पूरापूरा ध्यान रखा जाए. उन श्रमिकों, कारीगरों को भी लाभ का समुचित हिस्सा प्रदान किया जाए, जो उन वस्तुओं के उत्पादन के लिए अपना पसीना बहाते हैं. लेकिन पूंजीपति यह कार्य विशुद्ध लाभ कामना के साथ, केवल निहित स्वार्थों के लिए करता है. इस कारण उसकी अपने साथी पूंजीपतियों के साथ एक स्पर्धा कायम हो जाती है, जो उसकी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं का निकष होती है. इसके लिए वह उत्पादन के नए क्षेत्रों की तलाश कर अपनी पूंजी को बहुमुखी विस्तार देने के सपने पालने लगता है. पूंजी के विस्तार के साथ यह प्रवृत्ति कम होने के बजाय लगातार बढ़ती ही जाती है. मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी विस्तार अतिरिक्त श्रमशक्ति की अपेक्षा करता है. यह श्रमशक्ति अनायास नहीं उत्पन्न नहीं होती. वह समझाता है—

पूंजीवादी उत्पादन का पूरा का पूरा तंत्र, वास्तव में उस श्रमिक वर्ग के उत्पादन और पुनरुत्पादन की स्थायी व्यवस्था है, जो अपने जीवन के लिए मजदूरी पर निर्भर रहता है, इस प्रकार पूंजीपति की श्रमशक्ति संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए वह उस(पूंजीपति)के विस्तार में सहायक बनता है.’

मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी व्यवस्था में श्रमपुनरुत्पादन में खर्च होने वाला श्रम पूंजीपति के और अधिक लाभ की संभावना के बिना असंभव है. यहां तक कि श्रमिक वर्ग की भोजन और कामसंबंधी मूल जैविक आवश्यकताएं भी लगातार पूंजीवाद को ही पुष्ठ करने में सहायक होती है, उनके माध्यम से पूंजीपति के लिए श्रमशक्ति की निरंतर उपलब्धता बनी रहती है. उसके उपभोक्तावर्ग का दिनोंदिन विस्तार होता जाता है. इससे पूंजीपति का लाभ लगातार बढ़ता जाता है, जिसका एक हिस्सा उत्पादन में ढलकर उसके लाभानुपात को निरंतर विस्तार देता जाता है. यह प्रक्रिया चक्रीय रूप धारण कर लेती है. इस विश्लेषण के माध्यम से मार्क्स तीन परिणामों तक पहुंचता है, जो धन को पूंजी में अंतरित करने में सहायक होते हैं—

. यह कि उत्पाद पर पूंजीपति का अधिकार होता है, न कि श्रमिक का.

. यह कि उत्पाद के मूल्य में लगाई गई पूंजी के अतिरिक्त, पूंजीपतिस्वामी का अधिलाभ भी सम्मिलित होता है, जिसे केवल श्रमिक का पसीना संभव बनाता है, पूंजीपति का नहीं. बावजूद इसके उसे पूंजीपति की वैध संपत्ति मान लिया जाता है. सरकार और सामाजिक संस्थानों की सहमति पूंजीपतिस्वामी को राजनीतिकआर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाती है.

. यह कि श्रमिक अपनी श्रमशक्ति को सुरक्षित रखता है. यदि कोई नया खरीदार मिले तो वह उसको नए रूप में बेचने को तत्पर होता है.

उपर्युक्त विवेचना के उपरांत मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि उत्पादन और पुनरुत्पादन की साधारण स्थितियों में भी पूंजी का चक्रीय क्रम(निवेश—उत्पादन—लाभांश—पुनः निवेश—पुनरुत्पादन—अतिरिक्त लाभांश) बना ही रहता है. इस बीच पूंजीपति के लाभ में भी उत्तरोत्तर वृद्धि जारी रहती है, हालांकि इस बीच पूंजीपति द्वारा किए गए प्रारंभिक निवेश—मशीनरी, भवन आदि के मूल्य में स्वाभाविक मूल्यहृास के कारण लगातार कमी आती रहती है. दूसरे शब्दों में पूंजीपति एक बार निवेश के बाद कारखाने से सतत लाभांश का अधिकारी मान लिया जाता है, जबकि श्रमिक को उसके निरंतर श्रम के बावजूद केवल उत्तरजीविता ही हासिल होती है. विड़बना यह है कि मजदूरी की संतति आगे चलकर उन्हीं कारखानों को समृद्धि के लिए अपना खूनपसीना बहाती है, जहां उनके पूर्वज का शोषण हुआ था.


20. पूंजी संचयन का सामान्य सिद्धांत

पूंजी का निर्माण दो घटकों से होता है, वे हैं—श्रममूल्य एवं उत्पादन के अन्य संसाधन.अन्य संसाधनों में कच्चामाल, मशीनरी, भवन, औजार आदि सम्मिलित हैं. इनमें भी श्रमऊर्जा अधिक महत्त्व रखती है. किसी भी उत्पादन कार्य के लिए जब नई मशीनरी का उपयोग किया जाता है, तब पूंजी के घटकों में गुणात्मक परिवर्तन देखने को मिलता है. नई तकनीकयुक्त मशीनों के परिचालन के लिए प्रशिक्षित श्रमशक्ति की आवश्यकता पड़ती है. विशिष्ट क्षेत्र में प्रशिक्षित श्रमशक्ति को पूंजीपति अधिक मजदूरी देकर भी खरीद सकता है. मगर उसका श्रमशक्ति के वास्तविक कल्याण पर कम ही असर पड़ता है, क्योंकि उच्च तकनीकयुक्त मशीनें मानवश्रम विरोधी भी होती हैं, जो येनकेनप्रकारेण पूंजीपति को ही लाभ पहुंचाती हें.

पूंजी के विविध घटकों के बीच गुणात्मक परिवर्तन, समाज की कुल पूंजी में वृद्धि अथवा उसके संचयन के समय भी दिखाई पड़ता है, तथापि उसके दुष्परिणाम भी कम नहीं होते. मार्क्स के अनुसार पूंजी का संचयन और उच्च प्रौद्योगिकी के रूप में उसका पुनः निवेशन, संबंधित उद्योग में उत्पादनवृद्धि की संभावना पैदा करता है. मगर उन्नत तकनीक का श्रम विरोधी चरित्र, उत्पादन प्रक्रिया में श्रमशक्ति के महत्त्व को कम करने का काम करता है. उच्च उत्पादकतायुक्त मशीनें अनेक श्रमिकों का कार्य कम समय और लागत में निपटा देती हैं. जिससे अनेक श्रमिकों का कार्य अनायास छिन जाता है. परिणामस्वरूप श्रमिक नए क्षेत्रों में कार्य खोजने को विवश हो जाता है, जिनमें उसकी कार्यक्षमता सीमित होती है. ऐसी अवस्था में पूंजीपति उसकी वृत्तिका का निर्धारण मनमानी दरों पर करता है. मानवश्रम के स्थान पर मशीनों के आगमन से उत्पादकता में वृद्धि तो होती है, मगर साथ ही रोजगार के अवसरों में भी गिरावट आती है. हालांकि नए क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ने से वहां रोजगार के नवीन अवसर पैदा हो सकते हैं, मगर कुल मिलाकर मशीनें उत्पादन कार्य में मानवश्रम के आनुपातिक योगदान को कम करने का काम करती हैं. हालाकि समाज में उत्पादकता का बढ़ता स्तर उसकी ऊपरी पर्तों में समृद्धि ला सकता है. उनके जीवन को सुखमय और सुविधासंपन्न बना सकता है, तथापि कुल मिलाकर इससे रोजगार के अवसरों में गिरावट आती है, जिससे समाज के बड़े वर्ग के समक्ष, उस वर्ग के समक्ष जो केवल अपना श्रम बेचकर जीविकोपार्जन करना जानता है, जीविकासंकट पैदा होने लगता है. उन्नत प्रौद्योगिकी समाज में बेरोजगारों की फौज खड़ी कर दूसरे सामाजिक संकटों को बढ़ावा देती है.

इसके विपरीत यदि उत्पादन और पूंजी संचयन स्थिर रहता है, अथवा मशीनों की लागत और लाभ का अनुपात पूंजीपति के हितों के प्रतिकूल है, तो वह उसकी भरपाई श्रमशक्ति से करना चाहता है. उस अवस्था में पूंजीपति के लिए लार्भाजन की दर को बढ़ाने या कम से कम स्थिर बनाए रखने की और बड़ी जिम्मेदारी, श्रमशक्ति के कंधों पर आ जाती है. पूंजीपति इसी से संतोष नहीं कर लेता. उसका पूरा ध्यान उत्पादनवृद्धि द्वारा अपने अधिलाभ में अधिकतम वृद्धि करने पर केंद्रित होता है. चूंकि वह पूंजी का बड़ा हिस्सा मशीनों में निवेश कर चुका होता है, इसलिए उसका प्रयास होता है कि कम से कम श्रमिकों द्वारा अधिकतम उत्पादकता प्राप्त कर सके. इसके लिए वह श्रमिकों से अधिक समय तक काम लेता है. ऐसी तकनीक को बढ़ावा देता है, जो श्रमविरोधी हो. अपने लाभ का एक हिस्सा वह तकनीक के परिष्करण पर अनिवार्यरूप से निवेश करता है, ताकि श्रम पर अपनी अनिवार्यता को कम से कम कर सके, जिससे कारखानों में कार्यरत श्रमिकों पर भी संकट मंडराने लगता है. चूंकि उन्नत तकनीकी युक्त मशीनों के संचालन के लिए दक्ष श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए वह कम मजदूरी वाले अनेक श्रमिकों के स्थान पर अधिक वेतनमान वाले कम कामगारों की नियुक्ति पर जोर देता है.

मार्क्स के अनुसार यह स्थिति श्रमिकों के बीच वर्गविभाजन का काम करती है. उसके एक सिरे पर वे श्रमिक होते हैं, जिन्हें मशीनीकरण के कारण नौकरी से बेदखल होना पड़ा है या वे लोग जो बढ़ते प्रौद्योगिकीकरण के साथ अपनी संगति बिठा पाने में असमर्थ रहे हैं और इस कारण बेरोजगारी का शिकार बने हैं. या जो नई तकनीक के आगमन के पश्चात सहायक की भूमिका आ चुके हैं, इस डर के शिकार हैं कि उत्तरोत्तर विकासमान तकनीक कभी भी उन्हें उत्पादनप्रक्रिया के लिए ‘बेकार’ घोषित कर सकती है. दूसरे सिरे पर वे कामगार होते हैं जो रोजगार में हैं, मगर जिनको कम मजदूरी के बावजूद अधिक श्रम करना पड़ता है. दोनों ही पक्ष तनाव की स्थिति में होते हैं. एक रोजगार छिन जाने के गम, जीविका के संकट से तनावग्रस्त होता है. दूसरा वर्ग इसलिए तनाव में होता है, क्योंकि उसको लगता है कि उससे कम पगार देकर अधिक काम लिया जा रहा है. यह स्थिति मजदूरी को दो तरीके से प्रभावित करती है. यदि बेरोजगार श्रमिकों की संख्या, रोजगार प्राप्त अथवा कार्यरत श्रमिकों की संख्या से अधिक है, तब उसका सीधासा निष्कर्ष है कि बाजार में श्रमिकों की मांग कम है. उस अवस्था में स्वाभाविक रूप से मजदूरी में गिरावट देखने को मिलेगी. इसके विपरीत यदि आरक्षित यानी बेरोजगार श्रमिकों की संख्या, रोजगार प्राप्त श्रमिकों की संख्या से कम है, तब यह समझा जाएगा कि श्रमिकों की मांग अधिक है, साथ में उनकी मजदूरी भी अधिक है, यानी पूंजीपति के मुद्राभंडार में नियमित वृद्धि हो रही है. प्रथम दृष्टया यह स्थिति श्रमिकवर्ग के लिए हितकर हो सकती है.

पूंजीवाद का धुर विरोधी मार्क्स यहां एक और पहलु पर चिंता व्यक्त करता है. यदि पूंजीवादी व्यवस्था में रोजगार प्राप्त श्रमिकों की संख्या बेरोजगार श्रमिकों से अधिक है तो समझना होगा कि कारखाने अपनी पूरी क्षमता के साथ उत्पादन कर रहे हैं. उस अवस्था में उत्पादनदर इतनी बढ़ सकती है कि उनकी खपत संभव न हो. इसके परिणामस्वरूप उत्पाद और उसके माध्यम से पूंजीपति को मिलने वाला लाभ दोनों ही बेकार जा सकते हैं. घटते मुनाफे की सबसे पहली मार श्रमिकों पर पड़ेगी. अपने लाभ के स्तर को बनाए रखने के लिए पूंजीपति मजदूरों की छंटनी करेगा और जो श्रमिक काम पर रहेंगे, उनकी मजदूरी में कटौती करेगा. छंटनी के शिकार हुए बेरोजगार मजदूर नए क्षेत्रों में काम की तलाश में होंगे. परिणामस्वरूप बाजार में बेरोजगारों की संख्या बढ़ने लगेगी. एक बार फिर वही चक्र आरंभ हो जाएगा. एक बिंदु ऐसा भी आ सकता है, जब श्रमशक्ति अपने उच्चतम मूल्य पर हो. उस अवस्था में पूंजीपति, खासकर छोटा उद्यमी उत्पादन से अपने हाथ खींच लेगा. इसका परिणाम यह होगा कि उत्पादनव्यवस्था बिखर जाएगी, जिससे और भी लोग बेरोजगार होकर सड़क पर आ सकते हैं. इसकी मार मजदूरी पर पड़ेगी और उसमें गिरावट का नया दौर फिर शुरू हो जाएगा. अंत में एक ओर तो अत्यधिक धनी पूंजीपति बचेगा, दूसरी ओर अत्यधिक गरीब मजदूर.

पूंजीवादी व्यवस्था में एक श्रमिक का जीवन ही अपने आप में विडंबना है. विसंगति है कि खूब मेहनत करो, भूखे पेट, नंगे तन रहो, पसीना बहाओ, खूब पैदा करके दोलेकिन अंत में गालियां और धक्के खाने के लिए तैयार रहो. इसलिए कि पूंजीपति समाज की जरूरत के लिए नहीं, अपने लाभ के लिए उत्पादन में हाथ डालता है. वह जरूरतें पैदा करता है. जितनी जल्दी आविष्कार होते हैं, जितनी जल्दी नए उत्पाद बाजार में आते हैं, उतनी जल्दी आवश्यकताएं सृजित नहीं हो पातीं. अर्से से जड़ जमाए संस्कार आसानी से नहीं बदलते. समाज बदलने में समय लेता है. सिर्फ लाभ की कामना के साथ काम करने वाले पूंजीपति को बदलने में देर नहीं लगती. बल्कि समाज जल्दी बदले, नए आविष्कारों, का उपभोक्तावर्ग पैदा हो, इसके लिए वह पूरे संसाधन झोंक देता है. उसकी पूंजी इशारे पर नाचने वाला मीडिया उसका साथ देता है. इस कारण पूंजीवादी व्यवस्था में उतारचढ़ाव का स्वाभाविक दौर सदैव बना रहता है. जैसेजैसे सामाजिक धन में अभिवृद्धि होती है, उसका वैसा ही प्रभाव जनसंख्या पर भी पड़ता है. ऊपर दिए गए चक्र के दौरान जितनी जनसाधारण की परेशानी बढ़ती है, अत्यधिक उत्पादकता के शिकार बेरोजगार उसी अनुपात में बढ़ते जाते हैं. पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत यह अपरिहार्य स्थिति है. इससे बच पाना असंभव है.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

4 टिप्पणियाँ

Filed under कार्ल मार्क्स, दि कैपीटल, पूंजी, मार्क्सवाद

4 responses to “पूंजी (दि कैपीटल): संक्षिप्त विमर्श—तीन

  1. Hello, the whole thing is going well here and ofcourse every
    one is sharing information, that’s actually excellent, keep up writing.

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