प्रागैतिहासिक भारत में व्यापार एवं शिल्पकार-संगठन

इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि सभ्यता के लंबे विकास-क्रम में व्यापार निरंतर तरक्की करता जा रहा था. लोगों की आवश्यकताएं भी बढ़ रही थीं. इसलिए यह संभव नहीं रह गया था कि एक ही स्थान पर मनुष्य की जरूरत की समस्त वस्तुओं का उत्पादन संभव हो सके. कच्चे माल एवं दक्ष शिल्पकारों की उपलब्धता के अतिरिक्त बाजार भी एक बड़ा कारण था, जिससे लोगों ने संगठित व्यापार की आवश्यकता को समझा. आगे चलकर यही संगठन राज्य के विकास की धुरी बनकर उभरे. प्रकारांतर में इसी वर्ग ने बड़े व्यापारी समूहों को जन्म दिया था. लेकिन ये संगठन उन अर्थों में व्यावसायिक एवं स्पर्धी नहीं थे, जिस प्रकार हम आजकल के व्यापारिक समूहों को देखते हैं. वे दरअसल शिल्पियों और कलाकारों के अन्योन्याश्रित व्यावसायिक समूह थे, जिनके पीछे संसाधनों के सम्मिलित प्रयोग द्वारा परस्पर कल्याण की भावना निहित थी. बाजार से जुड़ने की कवायद के पीछे शिल्पियों और कारीगरों की अपने शिल्प-कौशल एवं व्यापार को देश-देशांतर तक फैलाने की महत्त्वाकांक्षा भी थी. व्यापारी वर्ग के ऐसे प्रयासों को राज्य का पूरा समर्थन प्राप्त होता था. समाज में भी उनका महत्त्व बढ़ता जा रहा था.
उत्तरोत्तर व्यापार-वृद्धि ने लोगों की जरूरतों को विस्तार किया था. साथ में बढ़ती जा रही थी व्यापारी वर्ग की संख्या भी. इस कारण व्यापारिक यात्राओं में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी. उन दिनों कच्चे रास्तों एवं यातायात के साधनों की अत्यल्पता के चलते यात्रा कर पाना आसान नहीं था. ऊपर से चोर-डकैतों का भय भी बना रहता था. हालांकि राज्य का दायित्व था कि वह व्यापारियों समेत अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा की पक्की व्यवस्था करे. आततायियों को दंड देकर यातायात को सुगम बनाए. राजा की ओर से इस तरह के प्रयास भी होते थे, किंतु प्रत्येक राजा की सीमाएं भी थीं. किसी भी राजा को अपने व्यापारियों की सुरक्षा के लिए उनमें से प्रत्येक को सुरक्षा दे पाना संभव ही नहीं था. निश्चित रूप से इसके पीछे कुछ भौतिक कारण भी थे. अतएव संकट के समय साथ देने के लिए लोग अपने साथियों, सहधर्मियों के साथ निकल पड़ते थे. ग्राहकों को उनकी पसंद के अनुसार विभिन्न गुणवत्ता का माल एक ही समय में उपलब्ध कराने तथा अधिक लाभ के लिए थोक में सस्ती खरीदारी करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक पूंजी की आवश्यकता पड़ती थी. इसलिए कुछ ऐसे भी संगठन बने जो केवल पूंजी का ही व्यापार करते थे, जिनका कार्य व्यापारियों को ब्याज पर ऋण प्रदान करना था. उस समय बोध हुआ कि पूंजी का प्रबंधन भी एक विशिष्ट कला है. इसलिए व्यापार की सफलता के लिए पूंजी के व्यवहार एवं प्रबंधन की महत्ता बढ़ती चली गई.
कालांतर में पूंजी का प्रबंध करने के लिए भी स्वतंत्र संगठन बने जो उस समय की अर्थव्यवस्था का खास हिस्सा थे. चूंकि व्यवसाय में धन लगाने वाला कोई भी व्यापारी, निश्चित मुनाफे के साथ अपने धन की वापसी चाहता था. वह इस बात की गारंटी भी चाहता था कि उसके द्वारा लगाया जाने वाला धन पूरी तरह सुरक्षित है तथा धोखादड़ी की संभावना न्यूनतम है. निवेशकों में यह विश्वास जगाए रखने के लिए आवश्यक था कि व्यापार के नियम सुस्पष्ट एवं सामाजिक रूप से मान्य हों. इसके लिए लिखित आचार संहिता बनाने का कार्य भी उत्तर वैदिक काल में शुरू हो चुुका था. विष्णुगुप्त चाणक्य, याज्ञवल्क्य, शुक्राचार्य आदि ने अर्थशास्त्र की नीतिगत व्याख्या के लिए ग्रंथों की रचना की, जिनमें चाणक्य रचित ‘अर्थशास्त्र’ इस विषय की प्रतिनिधि रचना है. इन पुस्तकों में उस समय के व्यापार तथा राजनीति के संबंधों की गहन विवेचना की गई है. इनके द्वारा यह संकेत मिलता है कि भारत में सहयोगाधारित आर्थिक गतिविधियों की शुरुआत वैदिककाल में ही हो चुकी थी, महाकाव्यकाल में उनका विस्तार हुआ. उत्तरवैदिक काल तथा वौद्ध काल में वे देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ बन चुकी थीं. समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी. हालांकि उनका स्वरूप देशकाल के अनुसार परिवर्तनशील था. लेकिन उन सभी का प्रमुख लक्ष्य था अपने समूह के आर्थिक विकास के लिए संगठित कार्य करना. उत्तरोत्तर सुगम होते यातायात वस्तुओं की लगातार बढ़ती मांग ने उन्हें और अधिक मजबूत और ज्यादा महत्त्वपूर्ण एवं प्रासंगिक बनाया था. उपर्युक्त आधार पर कहा जा सकता है कि—
‘सहकारिता का उद्भव उस समय की घटना है, जब व्यापार के साथ-साथ वस्तुओं की मांग में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी, जिस समय उद्योग-स्वामियों तथा उनके प्रबंधकों के व्यवहार एवं कार्यकलापों पंर निवेशकों, उपभोक्ताओं तथा आम जनता द्वारा नजर रखने की प्रविधि का विकास हो चुका था. लोक परिवीक्षण एवं अवलोकन की घटनाओं ने उद्यमों के सांगठनिक स्वरूप को मजबूत एवं कार्यक्षम बनाने का काम भी किया था. हालांकि इससे उत्पादन लागत में भी वृद्धि हुई थी. क्योंकि सांगठनिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए प्रशासन संबंधी खर्चों की अतिरिक्त रूप से आवश्यकता थी. इससे लोगों में सहकार के प्रति आग्रहशीलता का विकास हुआ, तथापि सहकारिता को बढ़ावा देने वाले केवल यही कारण नहीं थे. इनके अतिरिक्त संपत्ति, संविदा कानून जैसे कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण कारक थे, जिन्होंने सहकारिता के विकास के लिए उसके प्रवर्तक एवं उन्नायक का कार्य किया था.’1
वेदों-उपनिषदों से लेकर स्मृतियों, पुराणों आदि ग्रंथों में सामूहिक उद्यमों की चर्चाएं हमारे पूर्वज जिस तरह से करते आए हैं, इससे भी साफ होता है कि वे अर्थव्यवस्था के इस कल्याणकारी स्वरूप से न केवल भली-भांति परिचित, बल्कि इसके पोषक-प्रशंसक भी थे. इसीलिए अर्थव्यवस्था की विकासगति को बनाए रखने के लिए उन्होंने ऐसे उपक्रमों का मुक्तकंठ से समर्थन किया था, जिनमें समाज के लगभग सभी सदस्यों की सहभागिता सुनिश्चित करने की व्यवस्था थी. सहकार के रूप में यह एक आदर्श-लोकोपकारी व्यवस्था थी, जिसमें समाज का कोई भी सदस्य अपने अल्पतम संसाधनों के साथ हिस्सेदारी कर, उससे निश्चित लाभ प्राप्त कर सकता था. चूंकि निवेशक किसी भी वर्ग, जाति अथवा संप्रदाय का हो सकता था, इसलिए नियम यह था कि समाज के संपूर्ण विकास के लिए उसके समस्त वर्गों का यथासंभव सहयोग प्राप्त किया जाए.

सभ्यता का आदिकालीन दौर

प्राचीन भारतीय सभ्यता जिसे कुछ लोग वैदिक सभ्यता और कुछ विद्वान सिंधु घाटी की सभ्यता भी कहते हैं, अत्यंत उर्वरा धरती पर विकसित हुई थी. उसका कालखंड विस्तृत, लगभग छह हजार वर्षों का है. वह विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक और अनेक अर्थों में उनकी अपेक्षा अधिक विकसित भी थी. उस सभ्यता के अवशेष मेरहगढ़, मोआन-जो-दारो, हड़प्पा आदि अनेक स्थानों पर बिखरे पड़े हैं. उन स्थानों के उत्खनन से जो अवशेष प्राप्त हुए हैं, उनके आधार पर उस सभ्यता के बारे में सटीक कल्पना कर पाना संभव है. सिंधु नदी की उर्वरा भूमि पर पल्लवित हुई वह सभ्यता कई मायनों में अनूठी थी. वहां घर-आंगन चौड़े तथा जलनिकासी की उन्नत व्यवस्था थी. सड़कें पक्की और सीधी जाती थीं. सार्वजनिक स्नानगृह भी उस सभ्यता की प्रमुख विशेषता थे. संभवत वह पहली नागरी सभ्यता थी, जिसमें स्वच्छता और आवागमन के प्रबंधों पर इतना अधिक जोर दिया गया था. क्षेत्रफल की दृष्टि से देखा जाए तो उसका परिक्षेत्र समकालीन किसी भी सभ्यता के विस्तार के अधिक था.
सिंधु घाटी की सभ्यता के विकास के लिए जिम्मेदार आर्यगण प्राचीन वैदिक समाज से ही संबंधित थे, जो घुम्मकड़ प्रवृत्ति का था. एक स्थान से दूसरे स्थान तक भटकने रहने के कारण आर्य सैनिकों का अधिकांश समय युद्ध और उसकी तैयारियों में ही निकल जाता था. इससे वे जरूरत लायक अनाज का उत्पादन करने में सफल नहीं हो पाते थे. उसके लिए उन्हें युद्धों का सहारा लेना पड़ता था. युद्ध से बचे समय का उपयोग शिल्पकला के विकास के लिए किया जाता था. शिल्पकर्म के माध्यम से युद्ध के दौरान घायल-अशक्त सैनिकों का पुनर्वास भी संभव था. इस कारण शिल्पकला की उपयोगिता भी थी. परिणामस्वरूप दक्ष शिल्पकारों का समाज में सम्मान भी था. जिसके आधार पर शिल्पकला का विकास होता चला गया. भविष्य में अतिरिक्त रूप से उत्पादित माल के विपणन के लिए नए बाजारों की जरूरत महसूस की गई, उसी ने प्रकारांतर में संगठित व्यापार को बढ़ावा दिया. किरन कुमार थपल्याल के अनुसार—
‘वर्णाश्रम व्यवस्था के अंतर्गत श्रम-विभाजन की नीति ने भी संगठित व्यापार को आवश्यक बनाने, उसको विस्तृत करने का कार्य किया. तत्कालीन समय में वैश्यों के रोजगार के तीन प्रमुख साधन अर्थात कृषि, पशुधन एवं वाणिज्य के आधर पर आगे चलकर व्यापार की अनेक धाराओं का विकास हुआ.2
भारतीय सभ्यता के विकास के दौर को हम निम्नलिखित आधार पर वर्गीकृत कर सकते हैं: क्रमांक प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएं कालखंड
1 सभ्यता का आदिकालीन दौर                       6500 ई.पू. से 700 ई.पू. तक

क. सभ्यता के प्रारंभिक अवशेषः मेहरगढ, मोहनजोहदड़ो आदि 6500 ई.पू. से 3300 ई.पू तक

ख. सिंधु घाटी की सभ्यता                             3300 ई.पू. से 1900 ई.पू. तक

ग. गंगा घाटी और तराई की सभ्यता             1900 ई.पू. से 700 ई.पू. तक

2 जैन एवं बौद्ध धर्म का अभ्युदय                 700 ई.पू. से 320 ई.पू तक

3 मौर्य साम्राज्य का उद्भव एवं विकास         320 ईपू. से 185 ई.पू. तक

4 मौर्य काल के बाद का भारत                     200 ई.पू. से 1300 ई पश्चात तक

क. गुप्त साम्राज्य, भारत का स्वर्णकाल       200 ई.पू. से 550 ई. पश्चात तक

ख. हर्षबर्धन एवं राजपूत महाराजाओं का काल600 ई प. से 1100 ईसा प. तक

हड़प्पा, मोय-जो-दाड़ो तथा मेहरगढ़ की जैसी भारतीय प्रायद्वीप की प्राचीनतम सभ्यताओं के पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर यह अनुमान आसानी से लगाया जाता है कि तत्कालीन समाज कृषि-कर्म से परिचित था. उसमें शिल्पकर्म का भी पर्याप्त विकास हो चुका था. हड़प्पाकाल के लोग तो दूर-देशों के साथ अपने व्यापारिक संबंध भी बनाए हुए थे. अरब सागर के रास्ते से उनके काफिले मेसोपोटामिया, इजिप्ट, चीन आदि देशों तक निरंतर आते-जाते थे. उन काफिलों को आंतरिक स्पर्धा तथा किसी भी तनाव की स्थिति से बचाए रखने के लिए आवश्यक नियम बनाए गए थे.
भारतीय प्रायद्वीप में पनपी सभ्यताओं में मेहरगढ़ की सभ्यता के अवशेष उसके सर्वाधिक पुरातन होने के संकेत देते हैं. विद्वानों के अनुसार मेहरगढ़ सभ्यता, पाकिस्तान स्थिति आधुनिक क्योटा के निकट पनपी थी, जो करीब 6500 वर्ष पुरानी है. इस सभ्यता के अवशेष दर्शाते हैं कि मेहरगढ़ के प्राचीनतम वासियों को मिट्टी के बर्तन बनाने तथा उनको भट्टी में पकाने की कला में पारंगत हो चुके थे, तथा उनकी कलाकृतियों की मांग बाहर के बाजारों में भी बनी हुई थी. परिष्कृत सभ्यता के स्वामी सिंधु-सभ्यता के निवासी, धार्मिक दृष्टि से ईश्वर पर भरोसा करने वाले थे.
व्यापारिक दृष्टिकोण से भी वे किसी से पीछे नहीं थे. उनके व्यापारिक काफिले सूदूर रोम और ईरान तक की यात्रा करते रहते थे. भारतीय ग्रंथों में भी उसका उल्लेख मिलता है. यह इस भ्रम का भी उन्मूलन करती है कि भारतीय केवल आध्यात्मिक चिंतन में ही प्रवीण थे, दुनियादारी की बाकी बातों की तरफ उनका रुझान ही नहीं था. वस्तुतः श्रेणी के माध्यम से समूह के आर्थिक विकास तथा उसके द्वारा सामाजिक कल्याण की जो विशद् परिकल्पना की गई थी, वह भारतीय मनीषियों की मेधा की विलक्षणता और उसकी व्यापकता को दर्शाती है. आज भी अनेक अर्थशास्त्री सहयोग और सामूहिक समर्पण की प्रतीक उस व्यवस्था के प्रशंसक हैं. ऋग्वेद जिसको विश्व की किसी भी भाषा की प्राचीनतम कृति होने का गौरव प्राप्त है, में पणि का उल्लेख मिलता है. जिसके अंतर्गत व्यापारीगण परस्पर समझौता करते थे, ताकि कारवां के रूप में संगठित होकर दूर-दराज के प्रदेशों तक व्यापार किया जा सके. कठिन रास्तों तथा विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों के कारण संगठन बनाकर चलना उस समय के व्यापारियों की विवशता थी. हालांकि कुछ विद्वान वैदिक युग में श्रेणी अथवा पणि जैसे किसी संगठन की उपस्थिति का समर्थन नहीं करते. दूसरी ओर कुछ विद्वानों का मानना है कि वैदिक काल के दौरान सहयोगाधारित संगठनों की उपस्थिति सामान्य थी. तात्कालिक अर्थव्यवस्था में उनका बहुत बड़ा योगदान था. इस संबंध में जो भी प्रमाण प्राप्त हुए हैं, उनकी विश्वसनीयता किसी भी प्रकार के संदेह से परे है. तांबे की मुहरें, ताम्रपत्र, प्रस्तर कलाकृतियां, लिखित ग्रंथ इत्यादि अनेक ऐसे प्रमाण हैं, जो प्राचीन सहयोगाधारित उद्यमों की प्रामाणिकता को दर्शाते हैं. यह भी निर्विवाद तथ्य है कि प्राचीन भारतवासी सहअस्तित्व एवं साहचर्य की महत्ता को पहचान चुके थे, अतएव परस्पर सहयोग एवं समर्थन के आधार पर नीतियां बनाना, उन दिनों की दिनचर्या में सम्मिलित हो चुका था. प्रकारांतर में उन्हीं के आधार पर सहकार के नियम बनाए गए. सहकारिता की आधुनिक अवधारणा प्राचीन सिद्धांतों से बहुत मेल खाती है. वैदेत्तर काल के साहित्यिक ग्रंथों, पुरातात्विक अवशेषों में पणि अथवा श्रेणी के रूप में सहयोगाधारित व्यापारिक संगठन होने का उल्लेख तो है, लेकिन उनके बारे और अधिक विवरण, उनकी कार्यपद्धति एवं पहुंच को लेकर अधिक साक्ष्य मौजूद नहीं हंै. इसे देखते हुए कुछ विद्वानों ने उस युग में सहयोगाधारित संगठनों की मौजूदगी पर ही संदेह प्रकट किया है. उनके अनुसार पूग अथवा पणि जैसे वैदिक वांङमय में आए शब्द गिल्ड के पर्याय नहीं हैं, न श्रेष्ठि अथवा श्रेणी-प्रमुख तथा गिल्ड के अध्यक्ष के पद को परस्पर समानार्थी मानना उचित होगा. हालांकि वैदिक समाज में शिल्पकलाओं की उन्नति पर किसी को भी संदेह नहीं है. इसलिए यह अपेक्षा की जा सकती है कि शिल्पकलाओं का उतना विकास बिना उपयुक्त बाजार के संभव ही न था. इस तर्क से भी सहयोगाधारित व्यापार संगठनों की मौजूदगी एवं उनकी उपयोगिता स्पष्ट हो जाती है.

सिंधू घाटी की सभ्यता

मेहरगढ़ की सभ्यता के अवसान के लगभग ढाई हजार वर्ष पश्चात सिंधू घाटी के तट पर एक और सभ्यता का विकास हुआ, जो अपेक्षाकृत अधिक आधुनिक एवं समृद्धिशाली थी. सिंधु थाटी के तटवर्ती क्षेत्र में विकसित होने के कारण यह सभ्यता भारतीय इतिहास में सिंधु घाटी की सभ्यता के नाम से जानी जाती है. इस सभ्यता के अवशेष मोआन-जो-दारो तथा हड़प्पा नामक स्थानों पर पाए जाते हैं. ईसा पूर्व 3300 वर्ष से लेकर 1900 ईसा पूर्व, करीब चैदह सौ वर्ष तक विकासमान रही यह सभ्यता अपनी समकालीन रोम तथा मेसापोटामिया सभ्यताओं से कहीं अधिक विस्तृत एवं समृद्ध थी. उन्नत जल निकासी, बेहतर नगर नियोजन, लेन-देन के समय माप-तौल के एक जैसे मानकों का प्रयोग, मुद्रा आधारित विनिमय इस सभ्यता की विशेषताएं थीं. इनके अतिरिक्त हड़प्पा और मोआन-जो-दारो के निवासी शिल्पकला एवं व्यापार के मामले में भी अपने समकालीनों से कहीं आगे थे. वे जल-थल दोनों ही रास्तों से व्यापार करते थे. संगठित व्यापार की कला से वे परिचित थे.
सिंधु घाटी के आसपास की जमीन अत्यंत उपजाऊ एवं प्राकृतिक रूप से समृद्ध थी, जिसका प्रभाव वहां के निवासियों की जीवनशैली पर पड़ना स्वाभाविक था. लोगों में विलासिता की वस्तुओं की खपत थी, जिसने व्यापार की संभावनाओं का सघन विस्तार दिया था. दुकानदार अपनी वस्तुओं को लेकर एक स्थान पर जमा हो जाते थे. पूरा सिंधु-प्रदेश हालांकि किसी एक राजा के स्वामित्व में नहीं था, बावजूद इसके वहां के निवासियों, व्यापारियों के बीच एक ही मुद्रा का चलन था और उसकी स्वीकार्यता सिंधु घाटी की सभ्यता की विशिष्टता थी, जिसका तब तक बाकी सभ्यताओं में प्रसार नहीं हो पाया था. प्रदेश हालांकि छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था, तथापि विभिन्न राज्यों के नागरिकों के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण थे. पुरातात्विक शोधों से यह भी सिद्ध हो चुका है कि सिंधू घाटी की सभ्यता उन्नत नागरिक सभ्यता थी. नगर नियोजन में समानता दर्शाती है कि वहां के निवासियों के बीच आपसी तालमेल का स्तर ऊंचा था. राज्यों के बीच झगड़े बहुत कम होते थे. नगरों में विभिन्न प्रकार के उद्योंगों एवं शिल्पकलाओं के लिए स्थान निश्चित थे. मापतौल के लिए विभिन्न स्थानों पर एक जैसे बाटों का प्रयोग होता था. नागरीकरण के कारण उत्तरोत्तर बढ़ती मांग, एक जैसी मापतौल व्यवस्था, एक ही मुद्रा का उपयोग तथा उद्यमियों एवं कारीगरों के लिए सघन बस्तियों का निर्माण, ये सभी परिस्थितियां व्यापार के पक्ष में थीं, उद्योगों के एक ही स्थान पर केंद्रीयकरण के कारण उनके बीच तालमेल एवं उनपर नियंत्रण रखना सुविधाजनक था. इन सब स्थितियों का लाभ व्यापारियों ने खूब उठाया और उनके व्यापारिक काफिले अपने माल के साथ दूर-देश की यात्राओं पर निकलने लगे—

‘ऊपर वर्णित स्थितियां ही प्रदेश के व्यापारिक विकास में सहायक बनीं. परिक्षेत्र में अपेक्षाकृत शांति ने व्यापार को सुरक्षित एवं लाभकारी बनाने में मदद की थी, परिणामतः नए बाजारों का विकास संभव हुआ. ध्यातव्य है कि विभिन्न राज्यों के बीच माप-तौल की एक समान पद्धति, विनिमय के लिए एक समान मुद्रा का प्रयोग उस समय तक केवल सिंधू घाटी की सभ्यता की विशिष्टता थीं, जिसके कारण व्यापारियों की एक-दूसरे समाजों, राज्यों में स्वीकार्यता बढ़ी, व्यापारिक लागत में कमी आई. उद्योगों एवं व्यवसायों के एक ही स्थान पर केंद्रीयकरण ने विभिन्न वर्गों के बीच आपसी तालमेल को बढ़ाने का कार्य किया था. इससे योग्य कर्मचारियों की भर्ती एवं उनका प्रशिक्षण आसान हुआ, जो उत्पादकता में वृद्धि के लिए आवश्यक था. ये सभी कारण उस परिक्षेत्र में जहां उद्योगों के विकास में सहायक बने, वहीं इन्होंने लंबे रास्तों पर सुरक्षित यात्रा करने, बड़े पैमाने पर उत्पादन करने तथा कर्मचारियों के प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था करने के लिए, उद्यमियों एवं व्यापारियों को परस्पर सहयोग का मार्ग भी प्रशस्त किया.’3
हड़प्पा एवं मोआन-जो-दारो के टीलों की खुदाई से प्राप्त मुहरों पर उत्कीर्णित लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है. किंतु इन स्थानों की खुदाई से प्राप्त उस सभ्यता के अवशेष उस सभ्यता की अद्वितीयता एवं समृद्धिशीलता की घोषणा करते रहे हैं. प्राप्त पुरातात्विक साम्रगी में मृदा भांड, धातु की मुहरें, औजार, मूर्तियां इत्यादि सम्मिलित हैं. इनके अलावा सार्वजनिक स्नानगृह, सड़कों, पक्की नालियों, मकानों आदि से युक्त एक समृद्ध बस्ती के अवशेष के भी प्राप्त हुए हैं, जो उनके सुव्यवस्थित नगर-नियोजन के बारे में जानकारी देते हैं. प्राप्त मुहरों तथा नगर-नियोजन की उन्नत व्यवस्था को देखते हुए यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि वह एक समृद्ध सभ्यता थी. उत्खनन से प्राप्त मुहरें किसी व्यक्ति या समूह की आर्थिक समृद्धि का प्रतीक रही होंगी. बावजूद इसके यह दावा करना जल्दबाजी होगी कि उन दिनों तक समाज में सहकारिता अथवा साहचर्य का विचार अपनी पकड़ बना चुका था. न यह बात विश्वास के साथ नहीं कही जा सकती कि उस समय तक समाज में उत्पादक श्रेणियों का विकास हो चुका था, किंतु यह निविर्वाद रूप से कहा जा सकता है कि धीरे-धीरे ही सही, व्यावसायिकरण की ओर तेजी से बढ़ता हुआ वह समाज, अपने अनुभवों से सामूहिक नियंत्रण के प्रति आग्रहशील होता जा रहा था.
वस्तुतः अकेले व्यक्ति को अपनी सीमाओं का बोध भी सामूहिकीकरण का उत्पे्ररक रहा है. मनुष्य की निरंतर बढ़ती आवश्यकताओं तथा विभिन्न शिल्पकलाओं के उद्भव के बीच सिंधु घाटी के लोग अपनी कलाओं के साथ समूहबद्ध होते जा रहे थे. व्यापारियों, शिल्पियों को अब नए बाजारों की तलाश थी, जहां पर वे अपने शिल्पकर्म की अधिक से अधिक कीमत वसूल कर सकें. नए बाजारों तक आने-जाने तथा रास्ते के खतरों से निपटने के लिए व्यापारियों ने समूहबद्ध होकर यात्रा करना प्रारंभ किया, जो आगे चलकर सामूहिक उद्यमिता का रूप लेता चला गया. सभ्यता का वह पहला चरण था, जिसके आधार पर भाविष्य में साहचर्य आंदोलन की लंबी और टिकाऊ भूमिका गढ़ी जानी थी.
ध्यान देने की बात यह कि सभ्यता का वह नया रूप मनीषियों ने नहीं गढ़ा था, बल्कि उसकी रचना अपने शिल्प-कौशल के दम पर लोगों के दिलों पर छा जाने वाले शिल्पकारों, मेहनतकशों, व्यापारियों ने गढ़ी थी. संभव है कि प्रारंभ में उन्हें अपने राज्य का विरोध भी सहना पड़ा हो. लेकिन आगे चलकर जब उनका व्यवसाय अधिक मुनाफादेय होता चला गया और उसके दम पर उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति बेहद मजबूत कर ली, तो राज्य न केवल उनका समर्थन करने लगे, बल्कि मामूली कर के बाद उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठाने को तैयार हो गए. संभवतः यही प्रतिक्रिया धार्मिक नेताओं की भी रही. परंपरा और शुचिता के नाम पर विदेश यात्रा को निषिद्ध करते आए पंडितजन, उस व्यपार में अपना हित देखकर उसके न केवल समर्थक बने, बल्कि तरह-तरह से स्वयं को उनका गुणग्राहक जताने लगे थे.

गंगा-जमुनी सभ्यता

सिंधु घाटी की सभ्यता का पराभव कैसे हुआ, इस बारे में कोई ठोस जानकारी प्राप्त न होने के कारण विद्वानों के बीच मतभेद बने हुए हैं. अधिकांश विद्वान नदी में आई बाढ़ को उसका कारण मानते हैं. लेकिन उस सभ्यता के पराभव के दौर में लगभग उसी के समान एक और सभ्यता गंगा और यमुना के तटवर्ती प्रदेशों में पनप रही थी. गंगा और यमुना के दोआबे के बीच का स्थान प्राकृतिक रूप से काफी समृद्ध, हरा-भरा एवं धन-धान्य से परिपूर्ण था. मीठे पानी के लगभग अंतहीन स्रोतों से परिपूर्ण इस सभ्यता का उद्भवकाल ईसा पूर्व 1900 से लेकर ईसा पूर्व 1500 तक है.
प्राकृतिक रूप से साधन-संपन्न होने के कारण गंगा-यमुनी सभ्यता का विकास बहुत तेजी से हुआ. उद्योग-धंधों एवं शिल्पकलाओं की उन्नति ने इसे बहुत शीघ्र अपनी समकालीन सभ्यताओं में विशिष्ट बना दिया था. हालांकि इस बात के लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि इस सभ्यता के निवासी आरंभिक काल से ही श्रेणी या सहव्यापार के विचार से परिचित थे. प्राचीन गोतम धर्मसूत्र का हवाला देते हुए विक्रमादित्य खन्ना लिखते हैं कि भारतीयों को 1000 ईसापूर्व से 800 ईसापूर्व के बीच सहयोगाधारित व्यावसायिक संगठनों के बारे में ज्ञान था. महाभारत तथा बृहदारण्यक उपनिषद के हवाले से डाॅ. रमेशचंद्र मजुमदार ने भी दर्शाया है कि भारत में ऋग्वेद के समय में ही पणि का अस्तित्व था. उनका लिखते हैं कि लगभग 1500 ईसा पूर्व के आसपास इस सभ्यता के निवासियों को संगठित व्यापार की कला का बोध हो चुका था. इस तथ्य के समर्थन में तो पर्याप्त लिखित प्रमाण मौजूद हैं कि ईसा पूर्व 1000 से ईसा पूर्व 800 तक भारतवासियों को पणि एवं श्रेणी का ज्ञान था. वे अपने उद्योग-धंधों पर नियंत्रण एवं योजनाओं के निर्माण के लिए संगठनशक्ति का भली-भांति उपयोग करने लगे थे.

महाकाव्य युग में सहयोगाधरित आर्थिक संगठन

भारतीय समाज एवं संस्कृति की लगभग आधी से अधिक परंपराएं किसी न किसी प्रकार से रामायण एवं महाभारत से उद्भूत हैं. रामायण में राम की कथा है, किंतु परोक्षरूप में यह ग्रंथ आर्यों की भारत के मूल निवासियों पर विजय की गाथा है. राम-रावण युद्ध मुख्यतः दो विरोधी संस्कृतियों का संघर्ष था. वर्चस्व की उस लड़ाई में अपेक्षाकृति अधिक विकसित आर्य संस्कृति भारत की प्राचीन द्राविड़ संस्कृति को अपदस्थ कर स्वयं केंद्र पर विराजमान हो जाती है. महाभारत में पांडवों एवं कौरवांे के भीषण युद्ध की कहानी, विशुद्ध राजनीतिक संघर्ष था. दोनों ग्रंथों में वर्णित घटनाक्रमों के बीच भी लगभग एक हजार तक का अंतराल संभव है. अधिकांश विद्वान इस बात से सहमत हैं कि महाकाव्यों में वर्णित घटनाक्रम का समय तीन हजार ईसापूर्व से लेकर आठ सौ ईसा पूर्व तक फैला हुआ है.
वैदिक युग से रामायण एवं महाभारतकाल तक आते-आते भारतीय जनसमाज में काफी परिवर्तन हो चुके थे. लोगों की जीवनशैली और मान्यताओं तक में बदलाव आया था. समाज पर राजनीति का असर बढ़ा था. उत्तरवैदिक काल में ही ब्राह्मणों का सामाजिक कार्यकलापों एवं राजनीति पर बढ़ा हुआ असर साफ दिखने लगा था. महाकाव्यकाल में वर्णव्यवस्था और भी जटिल होकर उभरी थी. वर्गीय स्वार्थों के कारण उन्होंने राजा को इस धरा पर ईश्वर का उत्तराधिकारी घोषित किया था. परिणामतः राज्याधिपति का जनजीवन पर हस्तक्षेप और उसकी महत्त्वाकांक्षाओं में वृद्धि हुई थी. वैदिक युग में राजा का आशय जहां कबीले के मुखिया से था, वहीं महाकाव्यों में राजा को पूरी धरती का स्वामी और पालक, भूपति तक स्वीकार किया था. जिससे सारी शक्तियां एक व्यक्ति के हाथों में सिमटती जा रही थीं. छोटे-छोटे राज्य बडॆ़ राज्यों में मिलते जा रहे थे. उनमें आपसी प्रतिद्विंद्वता एवं युद्ध होते रहते थे. किसी राज्य के क्षेत्रफल में बड़े होने में कोई बुराई नहीं थी. बुराई थी उसकी कुल शक्तियों के किसी एक व्यक्ति के हाथों में सिमट जाने में. इससे संसाधनों के केंद्रीकरण को भी इससे बढ़ावा मिला था. एक ओर जहां कर्मकांडों में लगातार वृद्धि हो रही थी. वहीं दूसरी ओर लोगों का भौतिकता के प्रति आग्रह भी बढ़ा था.
अपने आप में यह एक विसंगति थी, जिसके पीछे ठोस कारण थे. दरअसल समाज का वह वर्ग जो धर्म और अध्यात्म के नाम पर लोगों को प्रकटतः त्याग एवं संयम का उपदेश देता था, उसका अपना जीवन भोग एवं लिप्साओं से भरा हुआ था. उसकी कथनी और करनी बिलकुल अलग-अलग थीं. लोग यह जानने लगे थे कि कर्मकांडों की संरचना उन्हें भरमाए रखने, प्रमुख सामाजिक समस्याओं से उनका ध्यान हटाने के लिए की गई है. इस कारण धर्म एवं नैतिकता से भी उसका मोहभंग हुआ था. इस सबका परिणाम यह हुआ कि समाज के बड़े वर्ग को भौतिक सुख-सुविधाएं भाने लगी थीं. लोकायत दर्शन का उद्भव इसी युग की घटना है. डाॅ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे विद्वान ने भी महाकाव्यकाल पर भौतिकवाद के प्रभाव को स्वीकार किया है—
‘रामायण और महाभारत में वर्णित घटनाएं अधिकतर उस वैदिककाल की हैं, जबकि प्राचीन आर्य बड़ी संख्या में गंगा की उपात्यका में आकर बसे थे. कुछ लोग दिल्ली के आसपास, पांचाल लोग कन्नौज के समीप, कौशल लोग अवध् के समीप और काशी लोग बनारस में-किंतु ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जो यह सिद्ध कर सके कि इन महाकाव्यों की रचना ईसा से छठी शताब्दी से पूर्व हुई हो. स्वयं वेदमंत्रों के क्रमबद्धता में आने का काल भी वही है, जिस समय आर्य लोग गंगा की उपात्यका में फैल रहे थे…रामायण में उन युद्धों का वर्णन है, जो आर्य लोगों एवं यहां के मूल निवासियों के मध्य हुए, जिन्होंने आर्य संस्कृति को अपना लिया. महाभारत उस समय का ग्रंथ है जब वैदिक ऋचाएं अपनी मौलिक शक्ति एवं अर्थ खो चुकी थीं और कर्मकांड प्रधान धर्म सर्वसाधारण को अधिक आकृष्ट करता था. जन्मपरक जाति को प्रधानता दी जाने लगी थी. इसलिए इन महाकाव्यों की रचना का समय ईसापूर्व छठी शताब्दी के लगभग कहीं रख सकते हैं. यद्यपि उनके अंदर ईसा के 200 वर्ष पश्चात तक परिवर्तन होते रहे और उस समय के महाकाव्य अपने अंतिम अर्थात वर्तमान रूप में आ गए.4
ध्यातव्य है कि महाकाव्यों में वर्णित घटनाओं का समय और उनका रचनाकाल दो अलग-अलग बाते हैं. रामायण एवं महाभारत की घटनाओं का समय निर्धारित है. लेकिन उनका लेखन किसी एक समय की घटना नहीं है. बल्कि वह विस्तृत कालखंड में फैला हुआ है. इन दोनों ही ग्रंथों को अपना वर्तमान स्वरूप प्राप्त करने में शताब्दियां लगी थीं. इसमें भी सचाई है कि इन दोनों पुस्तकों की रचना सामान्य कथानक के रूप में की गई थी. बाद में वर्णाश्रम धर्म की स्थापना के लिए उनमें अनेक घटनाएं-प्रसंग प्रक्षेपित किए गए. चूंकि उनका कथानक भारतीय पंरपरा एवं संस्कृति की अनेक मान्यताओं को प्रतिष्ठित करने का काम करता था, कुछ नई परंपराओं की स्थापना के साथ भारत की वर्णाश्रम धर्म की स्थापना भी करता था, इसी कारण का उसका गुणगान युगातीत महागाथा के रूप किया गया, उन्हें बार-बार सुनने-सुनाने का आग्रह किया जाने लगा. लोगों के मनोरंजन की भूख एवं उनकी अशिक्षा का लाभ वर्णाश्रम धर्म के समर्थकों-प्रचारकों को यह मिला कि इन ग्रंथों में वर्णित नायकों का देवताओं में शुमार होने लगा और प्रतिनायक भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के खलनायक मान लिए गए. देवताओं का नाम रटने से पुण्य और खलनायकों की स्मृति को भी पाप का भागी बना दिया गया. मानवी मेधा के ऐसे दुरुपयोग के उदाहरण अकेले भारत में ही नहीं हुआ, अपितु दुनिया-भर के यथास्थितिवादी धर्म और परंपरा के नाम पर ऐसा मखौल करते रहते हैं. वर्णाश्रम व्यवस्था के संकेत वेदों में भी हैं, किंतु महाकाव्यकाल में यह और भी परवान चढ़ती गई.
वैदिककाल में अर्थव्यवस्था का प्रमुख स्रोत पशुपालन था. किंतु महाकाव्यकाल तक आते-आते अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान बढ़ता चला गया, जिसके फलस्वरूप लोगों ने एक ही स्थान पर टिककर रहना सीखा. परिणामतः जीवन में स्थायित्व बढ़ा. इससे व्यापारिक गतिविधियों को भी संवरने का अवसर मिला. पशुपालक अर्थव्यवस्था में लोग सामान्यतः पशुओं का ही लेन-देन करते थे. उनकी बाकी आवश्यकताएं प्रकृति के साथ सहगमन करते समय स्वाभाविक रूप से पूरी हो जाती थीं. एक ही स्थान पर जमकर रहने से लोगों की आवश्यकताओं में इजाफा भी हुआ था. कृषि के लिए नए औजारों की जरूरत ने लुहार, बढ़ई जैसे शिल्पकारों को बढ़ावा देने का काम किया. सभ्यता के विकासक्रम में मोची, जुलाहे, रंगरेज जैसे दस्तकारों की मांग में भी वृद्धि हुई. कालांतर में व्यापारिक गतिविधियों का प्रसार और भी नए-नए क्षेत्रों तक होता चला गया. उत्पादन की प्रारंभिक अवस्था एकरैखिक थी. स्थानीय शिल्पकार अपने समाज के लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादन करते थे, जो उन तक सीधे पहुंचा दिया था.
कालांतर में कृषक वर्ग और शिल्पकारों के अलावा समाज में एक और वर्ग का उद्भव हुआ जो स्वयं उत्पादन से नहीं जुड़ा था. उसका कार्य उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच सेतु बनाने का था. उपभोक्ताओं की तलाश तथा उस तक माल पहुंचाने के लिए इस वर्ग ने शिल्पकारों के साथ मिलकर कई अनोखे प्रयास किए, चूंकि यह कार्य राज्य की समृद्धि से भी जुड़ा था अतः उसको स्थानीय शासन का समर्थन भी प्राप्त था. राज्यों के विस्तार से आवागमन सुरक्षित हुआ था, इससे आपसी व्यवहार एवं लेन-देन का परिक्षेत्र भी विकसित हुआ था. पहले जो व्यापार किसी एक क्षेत्र तक सीमित था, वह दूर-दराज के स्थानों तक फैलने लगा था. व्यापारियों के संगठन भी बनने लगे, जिनका सांगठनिक स्वरूप तथा व्यापार का क्षेत्र भिन्न-भिन्न था. इसी दौर में व्यापार के नए क्षेत्रों का पता लगाने का कार्य भी चलता रहा. राज्यों के समर्थन एवं उनके सहयोग के बिना भी सहयोगाधारित ये संगठन समाज में अपना स्थान बनाते जा रहे थे.
वैदिककाल की तरह महाकाव्यकाल में भी मनीषी वर्ग ज्ञान के अन्वेषण एवं परंपराओं की सुरक्षा में जुटा हुआ था. इस वर्ग का समाज में अभी भी सम्मान था. श्रेष्ठ विचारों को प्रत्येक शा से आने दो, आवश्यकता से अधिक धन का संचय पाप है, मनुष्य का धर्म संकटकाल में अपने पड़ोसी की मदद करना है, कामनारहित होकर कर्म करते जाना—ऐसी सद्कामनाएं वेदों और वेदोत्तर साहित्य में जगह-जगह बिखरी पड़ी हैं. ये सद्भावनाएँ केवल भारतीय धर्मग्रंथों में ही विद्यमान रही हों, ऐसा नहीं है. बल्कि हरेक परिवेश, प्रत्येक काल और हर धर्म में इन सद्विचारों की कमोवेश मौजूदगी रही है. हालाँकि शास्त्रों में जो सैद्धांतिक अवधारणा के रूप में मौजूद है, वही ज्यों का त्यों लोकप्रचलित भी हो, यह सदा नहीं होता और यह भी सत्य है कि चलन से बाहर होने पर सत्य की प्रामाणिकता संदिग्ध नहीं हो जाती. मूल्यपरकता प्रत्येक युग में सम्मानित रही है.
नैतिकता को प्रत्येक युग में मानवजीवन का अभीष्ट माना गया है. वेद से लेकर महाभारत काल तक आते-आते हालांकि समाज में काफी परिवर्तन आया था. साथ ही मनुष्य का अपने सिद्धांतों से विचलन भी हुआ था. धर्म और राजनीति, जो पहले नैतिकता को प्रश्रय देने, उसे और ऊंचा उठाने के लिए जाने जाते थे, वे अनुसरण और लिप्सा के जनक बन चुके थे. लेकिन समाज के एक हिस्से पर यदि जड़ता व्याप्त थी, यदि वहां पर लोग यथास्थितिवाद के पोषक-प्रवर्त्तक बनकर हरेक परिवर्तन को रोके रखना चाहते थे, तो व्यवहार एवं संगठन के स्तर पर समाज में ऐसा भी बहुत कुछ घट रहा था, जो रचनात्मक था और उम्मीद जगाता था. इसके संकेत कारीगरों, शिल्पकारों तथा छोट-छोटे व्यापारियों के उन संगठनों के द्वारा मिल रहे थे, जो अपने व्यापार के माध्यम से समाज को न केवल समृद्धि की ओर ले जा रहे थे, बल्कि भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं को देश की सीमाओं से बाहर तक फैला रहे थे. वे संगठन सामूहिक लाभ के लिए गठित किए जाते थे. किंतु उनकी सफलता इसमें थी कि जनसामान्य भी उन्हें अपने लिए लाभकारी समझें. इसलिए आम जनजीवन पर उनका प्रभाव भी होता था. उत्पादक और व्यापारिक संगठनों की उपस्थिति को शास्त्रीय मान्यता देने के लिए विशः की संकल्पना की गई थी. यह माना गया था कि अकेले ‘ब्रह्म’ और ‘क्षत्र’ से कार्य नहीं चल सकता. ब्रह्म अर्थात ब्राह्मण, धार्मिक नेतृत्वकर्ता, जो समाज में शिक्षण एवं कर्मकांड की जिम्मेदारी संभालता था. क्षत्र यानी क्षत्री, जिसके ऊपर समाज की आततायियों से सुरक्षा का दायित्व था. और ये विशः क्या थे? विशः के संबंध में बृहदारण्यक उपनिषद में उल्लिखित है कि—
‘न तो ब्रह्म द्वारा समस्त कार्यों की सिद्धि संभव है, न अकेला क्षत्र इस दायित्व को उठा सकता है. इसलिए विशः की उत्पत्ति की गई, जो गणों के रूप में संगठित होकर अपने-अपने दायित्व का निर्वाह करते हैं.’5
स्पष्ट है कि उत्तरवैदिक काल में समाज में आर्थिक गतिविधियां महत्त्वपूर्ण हो चुकी थीं. अब केवल कृषि और पशुपालन द्वारा काम चलना संभव नहीं रहा था. उपनिषदों में विशः को मिले महत्त्व का उल्लेख शंकराचार्य ने भी किया है. विशः की उत्पत्ति के संबंध में उन्होंने लिखा है कि—
‘धनार्जन न तो क्षत्रिय द्वारा संभव है, न ब्राह्मण का ही यह कर्तव्य कि वह वित्त उपार्जन पर ध्यान दे. तब? तब देवों ने वित्त के उपार्जन तथा तत्संबंधी अन्य कार्यों को साधने हेतु ‘विश’ को उत्पन्न किया. विशः गण का ही पर्याय हैं, क्योंकि ये संहत (संगठन बनाकर) वित्त-उपार्जन में समर्थ होते हैं, अकेले-अकेले नहीं. इसलिए इनमें गणों की सत्ता निहित होती है.6
प्रारंभ में प्रायः सभी व्यापारिक समूह लगभग एक ही जैसे थे. एक व्यापारिक समूह कई प्रकार के व्यवसाय एक साथ कर सकता था. विकास की प्रारंभिक स्थिति में यह कार्य सरल था और संभव भी. लेकिन जैसे-जैसे व्यापार बढ़ता गया, किसी अकेले समूह द्वारा सभी क्षेत्रों में दक्षता बनाए रखना, अपने ग्राहकों को संतुष्ट रख पाना, असंभव होने लगा था. व्यापारिक सफलता के लिए किसी एक क्षेत्र में पूर्णतः दक्षता प्राप्त कर लेना आवश्यक मान लिया गया. आचार्य चाणक्य, बृहश्पति, शुक्राचार्य आदि मनीषियों ने अर्थशास्त्रीय नियमों की संरचना कर व्यापारिक समूहों को संहिताबद्ध करने का कार्य किया, जिससे उन्हें सामाजिक मान्यता भी मिलने लगी. समूहों द्वारा किए जा रहे कार्य के आधार पर उनका वर्गीकरण भी किया जाने लगा. संगठनों के कार्य तथा उनकी पहुंच के आधार पर उनका नामकरण होने लगा.
भारत के प्राचीन आर्थिक संगठनों की विशेषताओं और उनकी महत्ता को व्यक्त करने के लिए उन्हें कई नामों से पुकारा जाता है. उन सब में श्रेणी बहुप्रचलित एवं बहुस्वीकार्य नाम है. प्राचीन भारत में दायित्वों का विभाजन वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार होता रहा है. लेकिन ‘श्रेणी’ इस मायने में किंचित भिन्न थी. दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि ‘श्रेणी’ की संज्ञा प्राप्त आर्थिक समूह सामान्य हितों के लिए बहुमान्य वर्णाश्रम व्यवस्था की उपेक्षा तक कर सकते थे— आर्थिक संगठन के रूप में ‘श्रेणी’ की तुलना मध्यकालीन यूरोपीय देशों में कार्यरत उसके समानधर्मा आर्थिक संगठन ‘गिल्ड’ से की जा सकती है. दोनों में किंचित समानताएं भी हैं. जैसे दोनों ही का गठन सामूहिक कल्याण की भावना के साथ किया जाता था. दोनों ही के लिए अपने समूह के आर्थिक हित महत्त्वपूर्ण होते थे. सामूहिक नियंत्रण की व्यवस्था भी दोनों में लगभग एक जैसी ही थी. दोनों प्रकार के संगठनों में अनुशासन एवं व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सर्वसम्मति से नियम बनाए गए थे, जिनका पालन पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी के साथ किया जाता था. बावजूद इसके गिल्ड की अपेक्षा श्रेणी का स्तर कहीं अधिक व्यापक एवं वैविध्यपूर्ण था. एक और मुख्य अंतर इन दोनों में यह है कि यूरोपीय देशों में गिल्ड की प्राचीनतम मौजूदगी के संकेत पूर्वमध्यकाल में 1100 वीं शताब्दी में मिलते हैं, जबकि भारत में सहयोगाधारित आर्थिक संगठनों के संकेत वैदिक वांङमय में भी मिलते हैं. सहकारी समिति/संस्थाओं के समानधर्मा संगठन श्रेणी का इतिहास भी कम से कम ईसा से भी छह सौ वर्ष पुराना है. श्रेणी का कार्यव्यापार भी विस्तृत था. हालांकि श्रेणी से यह अपेक्षित था कि वह किसी एक व्यवसाय में रहकर अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करे. तथापि यह उसकी अनिवार्यता नहीं बन पाई थी. प्रख्यात विद्वान रमेशचंद्र मजुमदार अपनी पुस्तक Corporate Life In Ancient India में बुनकरों की एक ऐसी श्रेणी का उल्लेख करते हैं, जो व्यापार के सिलसिले में एक नगर से दूसरे नगर की सतत यात्रा करती रहती थी और जिसके कुछ सदस्य धनुर्विद्या, ज्योतिष, मल्लयुद्ध तथा धार्मिक प्रचार-प्रसार का दायित्व भी संभालते थे. उन्हीं के हवाले से विक्रमादित्य खन्ना लिखते हैं—
‘श्रेणी के लिए किसी एक व्यवसाय से जुड़े रहना आवश्यक नहीं था. उसके सदस्य अपनी क्षमता एवं रुचि के अनुसार विभिन्न कार्यों (धनुर्विद्या, ज्योतिष, मल्लयुद्ध आदि) को अपना सकते थे…यही नहीं राजनीतिक गतिविधियों तथा नागरिक सुविधाएं प्रदान करने के लिए भी श्रेणी की मदद ली जाती थी.’7
उल्लेखनीय है कि उस युग में सामाजिकता की भावना बहुत प्रगाढ़ थी. इसके कारण भी थे. उस समय समूचा समाज अन्योन्याश्रित था. शनैः-शनैः पतनशील वर्ण-व्यवस्था जातिवादी स्वरूप ग्रहण करती जा रही थी. इस कारण समाज के बीच ऊंच-नीच का भेद और आर्थिक आधार पर स्तरीकरण भी था. ऊंच-नीच की भावना ने समाज में आंतरिक संघर्षों को जन्म दिया था. बावजूद इसके अधिकांश लोग यह समझ चुके थे कि एक सीमा के बाद शासित वर्ग की नजरों में वे सभी बराबर हैं…कि वह उन लोगों को जाति-वर्ग के मसलों में भटकाए रखकर सत्ता का असली आनंद उठाता है…कि ग्राम्यः जीवन की अभावमयी स्थितियों का सामना उन सभी को कमोवेश बराबर, साथ-साथ सहन करना पड़ता है. उच्च वर्ग को महज यह तसल्ली रहती थी कि वह वह सत्ता वर्ग के अपेक्षाकृत अधिक निकट है, कि उसको शासकवर्ग का करीबी होने का सम्मान प्राप्त है. जबकि स्तरीकरण के निचले स्तर पर शारीरिक एवं मानसिक शोषण के शिकार लोगों की मनःस्थिति विद्रोहात्मक होती है. इस विद्रोह को दबाए रखने, आक्रोश के शमन के लिए समाज में संगठन और सहयोग पर जोर दिया जाता था. इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए डाॅ. सत्यकेतु विद्यालंकार लिखते हैं—
‘उत्तर वैदिक युग में ही विभिन्न शिल्पियों का अनुसरण करने वाले, सर्वसाधारण जनता के व्यक्ति, अपने संगठन बनाकर आर्थिक उत्पादन में तत्पर हो गए थे. यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि शिल्पियों के लिए पूर्णतः स्वच्छंद होकर कार्य कर सकना संभव नही था. परस्पर संगठित होकर ही वे अपने कार्य को सुचारू रूप में संपादित कर सकते थे.’7
समाज की सत्ता उसकी प्रत्येक इकाई से विनिर्मित थी. यद्यपि समाज का चातुवण्र्य विभाजन जिसकी शुरुआत वैदिक काल में ही हो चुकी थी, निरंतर मजबूत हुआ था, अथर्ववेद में इस बात के पर्याप्त संकेत मिलते हैं कि उस काल तक ब्राह्मणों का लालच बढ़ चुका था. निहित स्वार्थों के लिए वे कर्मकांड को केंद्र में रखकर सत्ता पर नियंत्रण बनाए हुए थे. वर्णाश्रम व्यवस्था का लाभ समाज के शीर्षस्थ वर्गों के हाथों तक सिमटता जा रहा था. दार्शनिक चिंतन, क्षुद्र बहसों और तंत्र-मंत्र संबंधी पोंगा-पंथी अवधारणाओं तक सीमित हो चुका था. परंपराओं और सामाजिक नियमों की स्वार्थानुकूल व्याख्या की जा रही थी. अपने लक्ष्य में उन्हें सफलता भी मिल रही थी. उन्हीं की प्रेरणास्वरूप समाज में शासक वर्ग का उदय हो रहा था, जिससे अधिकार एवं संसाधन सीमित हाथों में कैद होते जा रहे थे. प्रकट में तो सब यही स्वीकार करते थे कि समाज को गतिमान बनाए रखने के लिए उसके सभी वर्गों का पूरा सहयोग, प्रयासों में उन सभी की समान और सक्रिय साझेदारी आवश्यक है—किसी बड़ी मशीन के छोटे-छोटे पुर्जों की भांति, जिनके बिना वह कार्य करने में अक्षम सिद्ध होती है. परंतु उनके सभी आचरण स्वार्थ-भावना से प्रेरित तथा कहीं-कहीं तो नैतिकता को लांक्षित करने वाले थे.
परिणामस्वरूप समाज का एक वर्ग इन कर्मकांडों और छिछली धार्मिक व्याख्याओं के चंगुल में फंसकर और अधिक रूढ़िवादी और वौद्धिकरूप से जड़ बनता जा रहा था, वहीं दूसरा वर्ग उनकी असलियत को पहचानकर उनसे या तो दूर भाग रहा था, अथवा धार्मिक विवादों से परे रहकर व्यापार और उद्यमशीलता के माध्यम से अपने विकास के प्रति समर्पित था. स्पष्ट है कि उनमें एक बड़ा वर्ग शिल्पियों और कारीगरों का था. अपने अनूठे श्रम-कौशल एवं श्रम-भावना के कारण यह वर्ग समाज में निरंतर प्रतिष्ठा भी पा रहा था. ऐसे में जब इस वर्ग द्वारा संगठन बनाकर बड़े स्तर पर व्यापार प्रारंभ किया गया तो समाज में उसको स्वतंत्र पहचान मिलना अवश्यंभावी था ही.
महाकाव्यों यानी महाभारत और रामायण दोनों में भी व्यावसायिक संगठनों/निगमों की सार्थक उपस्थिति का उल्लेख मिलता है. राम अपने वनवास की अवधि पूरी होने के पश्चात जब अयोध्या लौटते हैं तो उनके स्वागत के लिए अन्य प्रजाजनों के साथ श्रेणि-प्रमुख भी मौजूद रहते हैं. महाभारत के शांतिपर्व मंे श्रेणि-प्रमुखों का उल्लेख करते हुए राजा को सावधान रहने के लिए कहा गया है कि वह उन्हें शत्रुओं द्वारा भेदनीति से बचाए रखे. महाभारत में वनपर्व की एक और लोकप्रचलित कथा बताती है कि गंधर्वों से पराजित दुर्योधन यह सोचकर खिन्न है कि हस्तिनापुर लौटने पर श्रेणि-प्रमुख उसको अवश्य ही उलाहना देंगे. उस समय क्या वह उनका प्रतिकार कर पाने में सफल होगा. यदि नहीं कर सका तो प्रजा पर उनका कैसा प्रभाव पड़ेगा. यह हमें तत्कालीन राजसत्ता पर व्यापार संघों के प्रभाव एवं उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा से परिचित कराता है.

जैन एवं बौद्ध धर्म का उद्भव

भारतीय इतिहास के संदर्भ में सातवीं शताब्दी का कालखंड अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. बिना इस शताब्दी के उल्लेख न तो भारत की धार्मिक, आध्यामिक तथा तात्विक चेतना के उद्भव की व्याख्या संभव है, न ही भौतिक एवं राजनीतिक समृद्धि का इतिहास लिखा जा सकता है. इसी शताब्दी में भारत के दो प्रमुख धर्मों, जैन एवं बौद्ध का उदय हुआ था. हालांकि इन दोनों ही धर्मों का उद्भव प्राचीन परंपरागत वैदिक धर्म में कर्मकांड के बढ़ते अतिरेक एवं समाज पर एक ही वर्ग के बढ़ते वर्चस्व के प्रतिक्रियास्वरूप हुआ था, किंतु बहुत शीघ्र दोनों धर्म समाज पर अपनी पकड़ बनाने में कामयाब हो गए. दोनों की स्थापना जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण के साथ हुई थी. इसलिए इनमें जीवन और समाज को लेकर एक सकारात्मक दृष्टि थी. विशेषकर बौद्धधर्म तो व्यावहारिकता के स्तर पर इतना लचीला था कि इसके आलोचकों ने इसे भौतिकतावादी धर्म ही कह डाला. स्थिति चाहे जो भी हो, दोनों धर्म समाज और जीवन को लेकर आमजन की मान्यताओं के एकदम करीब थे. उपभोग को लेकर भी बौद्धधर्म में वैसे निषेध नहीं थे, जैसे कि उसके पूर्ववर्ती वैदिक धर्म में. इसलिए शिल्पकारों तथा व्यापारकर्म के सहारे जीविका चलाने वाली जातियां बौद्धधर्म की ओर आकर्षित होती चली गईं.
बौद्ध एवं जैन दोनों ही धर्मों में जातिप्रथा या वर्णव्यवस्था को कोई स्थान प्राप्त नहीं था. इसलिए इन धर्मों की ओर वे लोग भी आकर्षित हुए जो परंपरागत हिंदू धर्म में जातीय स्तरीकरण या वर्णविभाजन के कारण स्वयं को उत्पीड़ित-उपेक्षित अनुभव करते आ रहे थे. इससे विभिन्न क्षेत्र नई प्रतिभाओं के आगमन के लिए खुल गए. मनुष्य ने लोहे का उपयोग करना सीखा, निर्माण एवं उद्योगों के विकास के लिए नवीनतम मशीनों एवं उपकरणों की खोज हुई. आवागमन सुगम हुआ, फलस्वरूप नागरीकरण को गति मिली. व्यापारिक विनिमय को सरल बनाने के लिए धातु के सिक्कों का चलन हुआ, जिससे व्यापार के नए क्षेत्रों का उदय हुआ. उद्योगों के साथ कृषिक्षेत्र पर भी लोहे के आविष्कार का प्रभाव पड़ा. हल में लोहे की फाल के उपयोग ने कृषिकर्म को आसान बना दिया. इससे कृषिजोतों का विस्तार हुआ, उपज बढ़ी और समृद्धि को नए आयाम मिले.
व्यावसायिक प्रगति के चलते किसी एक व्यक्ति के लिए पूरे व्यवसाय पर नियंत्रण रखना कठिन होने लगा था. मुख्य उद्योग एवं व्यवसाय हालांकि अभी भी नगरों एवं कस्बों तक सिमटे हुए थे, किंतु उनपर उनपर सामूहिक नियंत्रण की प्रवृत्ति बढ़ने लगी थी. एक और विशिष्ट प्रगति इस दौर में देखने को मिली वह थी, उद्योगों, व्यवसायों में लाभ-हानि के परिकलन के लिए दक्ष लेखाकारों की भर्ती एवं लेखा-बही का उपयोग. दक्ष लेखाकारों के उपयोग से लाभ-हानि की परिगणना आसान थी, इससे उद्योगों में पूंजी का वर्चस्व बढ़ने लगा. इससे पहले तक उत्पादक स्वयं ही विपणन की जिम्मेदारी संभालता था, वही उद्यम का स्वामी भी होता था. लेकिन लेखा-बही के प्रयोग ने केवल पूंजी के दम पर उद्यम-स्वामी बनने का रास्ता आसान कर दिया था. इससे जहां व्यापार को व्यवस्थित करना आसान हुआ, वहीं शोषण को भी बढ़ावा मिला क्योंकि समाज का एक वर्ग वर्णव्यवस्था के बंधनों के कारण शिक्षा से दूर रखा गया था. बाद में लिखित परंपरा का हवाला देते हुए इस वर्ग को दबाए रखने के लिए नए कानून बनाए जाने लगे. जिसके आधार पर पुराणों की रचना हुई. और पुराणों को प्रामाण्य बनाए रखने के लिए वेद, महाकाव्य सहित सभी प्राचीन ग्रंथों में संशोधन किए जाने लगे.
प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था तथा राजनीति को जानने के लिए कौटिल्य कृत ‘अर्थशास्त्र’ को एक मानक ग्रंथ की मान्यता मिली हुई है. ईसा से चार सौ वर्ष पुरानी इस रचना में उस समय के समाज तथा आर्थिक-राजनीतिक सरंचनाओं के बारे में प्रामाणिक जानकारी हमें प्राप्त होती है. अर्थशास्त्र में नगरों को बसाने की आदर्श योजना का जो विवरण प्राप्त होता है उसमें गणों तथा श्रेणी के सदस्य शिल्पकारों को बसाने के लिए एक स्थान आरक्षित किए जाने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है. श्रेणियां राज्य को करों का भुगतान करती थीं, जो राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था. श्रेणियों के राज्य पर प्रभाव का अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि बौद्धकाल में राजदरबार में एक नए पद ‘भंडागारिका’ का सृजन किया गया था, जिस पद पर श्रेणी के मामलों के विशेषज्ञ को नियुक्त किया जाता था. भंडागारिका का दायित्व श्रेणियों के बीच होने वाले विवादों का निपटान करना था. उन दिनों कुल अठारह प्रकार की श्रेणियां होने का उल्लेख भी आचार्य चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में किया है, जो उस समय के जनजीवन में श्रेणियों के महत्त्व तथा उनकी व्यापक पहुंच की ओर इशारा करता है. कुछ श्रेणियों की आंतरिक व्यवस्था आधुनिक सहकारी समितियों के समान थी. उन्हें ‘समुत्तचरः’ कहा जाता था. ये श्रेणियां न केवल उद्योगों और व्यवसाय की देखरेख तथा नियंत्रण करने का काम करती थीं, बल्कि जनकल्याण के मामलों में उनका दखल था. जनता एवं स्थानीय प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए वे जनसरोकारों से युक्त कार्यक्रमों को वरीयता देती थीं. आवश्यकता पड़ने पर ये श्रेणियां राज्य को आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराती थीं. कई बार राज्य भी अपने उत्तरदायित्वों के निर्वहन के लिए श्रेणियों की मदद लेता था. तत्कालीन ग्रंथों में इस प्रकार के उल्लेख कई स्थानों पर आए हैं.
ईसा से पांचवी शताब्दी पहले के गं्रथ गौतम धर्मसूत्र के अनुसार—
‘किसानों, व्यापारियों, साहूकारों, शिल्पकारों, तकनीकी विशेषज्ञों यहां तक कि पशु चराने वाले गड़हरियों की भी अपनी अलग श्रेणी थी, जिनके माध्यम से वह अपने वर्ग के हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कानून बना सकते थे. उनके वर्ग के कल्याण से संबंधित किसी प्रकार की समस्या अथवा प्रस्तावित योजना को लेकर सम्राट अथवा राज्य के प्रतिनिधि उन्हीं श्रेणियों से विचार-विमर्श करते थे.’8
एक जातक कथा के अनुसार बौद्धकाल में कम से कम अठारह प्रकार की श्रेणियां कार्यरत थीं. यह भी उल्लेखनीय है कि बौद्धधर्म को राजधर्म के रूप में अपनाए जाने के बावजूद जातिप्रथा का पूरी तरह से लोप नहीं हो पाया था. एक अन्य जातक कथा में उल्लेख किया गया है कि परिवार का बड़ा पुत्र प्रायः अपने पिता के शिल्प को अपना लेता था, जिससे तकनीकी रूप से दक्ष शिल्पकारों की समस्या का समाधान हो जाता था. श्रेणियों को सम्मान और प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखा जाता था. इसलिए लोगों में अपनी पहचान कायम करने के लिए अपने नाम के साथ अपनी श्रेणी या व्यवसाय का नाम जोड़ लेने का चलन था.
श्रेणी के व्यवसाय को पैत्रिकता अथवा परंपरा के नाम पर अपनाए जाने की प्रथा भारत की श्रेणियों को शेष विश्व की श्रेणियों से अलग सिद्ध करती थी. यह विशेषता दुनिया के किसी ओर गिल्ड सिस्टम में देखने को नहीं मिलती. भारत के प्राचीन ग्रंथों में श्रेणियों की पहुंच, उनकी प्रकृति तथा विशेषताओं के बारे में जगह-जगह उल्लेख किया गया है. कहीं पर उनसे राजा को सावधान रहने का उल्लेख है तो कई स्थानों पर राजा को यह निर्देश भी दिया गया है कि वह श्रेणियों की पहुंच का लाभ उठाकर, राज्य के हित में उनके विकास के लिए सभी जरूरी उपाय करे. महाभारत में एक स्थान पर उल्लेख किया गया है कि राजा श्रेणी-प्रमुखों पर नजर रखे और उनमें शत्रुओं द्वारा भेदनीति का उपयोग न करने दे.9 इसी प्रकार एक अन्यंत्र स्थल पर श्रेणी-प्रमुखों के उपजाप अर्थात भेदनीतिपूर्ण षड्यंत्रों से अपने अमात्यों की रक्षा के सभी जरूरी उपाय करने का उपदेश दिया है.10 स्पष्ट है कि समाज में श्रेणियों की भूमिका इतनी बढ़ चुकी थी कि किसी भी स्तर पर उनकी उपेक्षा कर पाना संभव नहीं था.
‘व्यापारिक संगठनों/श्रेणियों के गठन की शुरुआत बौद्धकाल के प्रारंभिक वर्षों में ही हो चुकी थी. उस समय की स्थापत्य कला तथा अन्य ऐतिहासिक दस्तावेज में इस बात के पर्याप्त संकेत मौजूद हैं कि उन दिनों के नगरों में विभिन्न प्रकार के व्यापारियों को उनके व्यवसाय के आधर पर अलग-अलग बसाने की प्रथा थी. कच्चेमाल की उपलब्धता के आधार पर विभिन्न शिल्पकारों के पृथक गांव बसाए जाते थे. किसी भी क्षेत्र में श्रेणी अथवा गिल्ड की स्थापना के लिए तीन प्रमुख विशेषताओं पर ध्यान देना आवश्यक था. पहला कच्चेमाल की उपलब्धता के अनुसार उद्योगों का विकेंद्रीकरण, दूसरा ज्ञान तथा तकनीकी कौशल का परंपरा के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण तथा तीसरा श्रेणी के स्वामी अथवा मुख्य संगठक ‘जेट्टका’ की विचारदृष्टि, जिसके आधार पर श्रेणी की कार्यशैली तय होती थी. मौर्यकाल में श्रेणियों को व्यापक समर्थन मिलने से उनकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ती जा रही थी. श्रेणियों की लोकप्रियता का दूसरा बड़ा कारण स्पर्धा की भावना थी. प्रयोगों द्वारा यह देखा गया था कि आर्थिक दृष्टि से भी अकेले व्यक्ति की कार्यक्षमता की अपेक्षा समूह के साथ उसकी कार्यक्षमता अधिक प्रभावी और लाभदायक होती है. इस प्रकार सहकार को बढ़ावा मिला. जिसके अनुसार किसी सदस्य को जब भी आवश्यकता हो, वह दूसरों की मदद ले सकता था.11
किसी भी श्रेणी में ज्येष्ठक अथवा श्रेष्ठिन् का पद बड़ा ही महत्त्वपूर्ण होता था. जातक कथाओं में कम्मारजेट्ठक, मालाकारजेट्ठक आदि शब्द बहुतायत प्रयुक्त हुए हैं. जिनसे इनकी सत्ता स्पष्ट हो जाती है. किसी एक जेट्ठक के अधीन शिल्पियों की संख्या निर्धारित नहीं थी. समुद्द वणिज जातक में नर्तकियों के एक गांव का उल्लेख है जिसमें उनके एक हजार परिवार निवास करते थे. जातक के अनुसार गांव में दो जेट्ठक थे, उनमें से प्रत्येक के अधीन पांच सौ नर्तक परिवार थे. श्रेणी की परिकल्पना से लेकर उसकी कार्यपद्धति तय करने तक का काम श्रेष्ठिन् अथवा जेट्ठक का ही होता था. कई स्थान पर उसे स्वामी के संबोधन का भी रिवाज रहा है. उसका कार्य भंडार के हिसाब-किताब से लेकर लेखा-बही की देखभाल करने तक विस्तृत था. भंडार की देखभाल करने वाले के कारण उसे ‘भंडारी’ अथवा ‘भंडारक’ भी कहा जाता था. प्रत्येक श्रेणी के व्यवसाय, कार्यक्षमता, सदस्यों की संख्या तथा पूंजी के आदान-प्रदान से संबंधित सभी आवश्यक सूचनाएं, परंपराएं और रीति-रिवाज यहां तक कि उसका इतिहास भी साफतौर पर उल्लिखित किया जाता था. साफ है कि समाज में जेट्ठकों अथवा श्रेष्ठ्नि की व्यापक प्रतिष्ठा थी. राजदरबार में उनका सम्मान था. सूचिजातक में लिखा है कि—
‘एक सौ कम्मारों का जेट्ठक राजदरबार में बहुत सम्मानित था. वह बहुत समृद्ध एवं ऐश्वर्यशाली भी था. अन्यत्र एक जातक में यह लिखा है कि एक राजा ने कम्मारजेट्ठक को अपने पास बुलाया, और उसको सुवर्ण की एक प्रतिमा बनाने का कार्य दिया.12
उपर्युक्त उद्धणों से साफ है कि  प्रागैतिहासिक भारत में व्यवसायी समूह उसी प्रकार संगठित थे, जैसे कि यूरोपीय व्यापारी गिल्ड के रूप में. लेकिन भारतीय समूह का आचरण अपने समकालीन गिल्डों की अपेक्षा कहीं अधिक लोकतांत्रिक था.
© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका :

1.  Thus, one would expect the corporate form’s development to be more likely when the demand for production and trade is increasing and when methodologies for monitoring the behavior of owners and managers by creditors and by other owners are present. Such situations enhance the value of organizational forms and also help to contain their costs, such as their agency and creditor information costs. Of course, there are other factors that are also important to the development of the corporate form (e.g., property and contract law). Dr. Vikramaditya Khanna in The Economic History of the Corporate Form in Ancient India.

2. ‘…that division of labour under the varna system may have been conducive to the emergence of guild organization. Agriculture, animal husbandry and trade, the three occupations of the Vaisyas, in course of time developed as separate groups.- Thaplyal, Kiran Kumar in Guilds in Ancient India.
3.  The relative peace in the region makes travel safer for traders and opens up new markets for trade. The uniformity of weights and measures, uncommon at that time in world history, benefits trade by reducing the transactions costs of engaging in trade. The localization of craft and industry to certain parts of the city might enhance group cohesion, make training of new recruits/employees somewhat easier, and increase productivity. In light of all these factors, trade was active, substantial and growing which suggests the demand for collective efforts – to protect traders traveling long distances, to engage in larger scale production and so forth – was large and probably rising. This often enhances the demand for organizational forms.- Dr. Vikramaditya Khanna.
4. भारतीय दर्शन- डा॓. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, राजकमल प्रकाशन, हिंदी अनुवाद: नंदकिशोर गोभिल, प्रष्ठ-219.
5. स नैव व्यंभवत्, स विशमसृजत, यान्येतानि देवजातानि गणशः आख्यान्ते. – बृहदारण्यक-1/4/12
6.  क्षात्रसृष्टोऽपि स नैव व्यभवत् कर्मणे ब्रह्म तथा न व्यभवत् वित्तोपार्जयितुरभावात्। स विशमसृजत् कर्मसाधनवित्तोपार्जनाय। कः पुनरसौ विट? यान्येतानि देवजातानि ….गणशः गणं गणं आख्यान्यन्ते कथ्यन्ते गणप्राया हि विशः। प्रायेन संहता हि वित्तोपार्जनसमर्थाः नैकैकशः. – शंकराचार्य.
7. …a sreni need not be dedicated to a single profession and members could practice different trades – indeed, there is an example of a silk weaving sreni where some members practiced. other professions as well (e.g., archery, astrology)…Moreover, the sreni was used in municipal and political activity as well as economic activity. – Vikramaditya Khanna.
8.  The Gautama Dharmasutra (c. 5th century BC) states that “cultivators, traders, herdsmen, moneylenders, and artisans have authority to lay down rules for their respective classes and the king was to consult their representatives while dealing with matters relating to them.- By Manikant Shah & D.P. Agrawal in Sreni (Guilds): a Unique Social Innovation of Ancient India.
9.   अग्निदैर्ग़दैश्चैव प्रतिरूपककारकैः।
श्रेणिमुख्योपाजापेन वीरुधश्छेदनेन चः।। महा. शांतिपर्व-158/52.
10.  श्रेणिमुख्योपजापेषु वल्लभानुनयेषु च।
अमात्यान् परिरक्षेत भेदसंघातयोरपि।। महा. शांतिपर्व-104/64.
11.  The ancient sources frequently refer to the system of guilds which began in the early Buddhist period and continued through the Mauryan period. ….Topography aided their development, in as much as particular areas of a city were generally inhabited by all tradesmen of a certain craft. Tradesmen’s villages were also known, where one particular craft was centred, largely due to the easy availability of raw material. The three chief requisites necessary for the rise of a guild system were in existence. Firstly, the localization of occupation was possible, secondly the hereditary character of professions was recognized, and lastly the idea of a guild leader or jetthaka was a widely accepted one. The extension of trade in the Mauryan period must have helped considerably in developing and stabilizing the guilds, which at first were an intermediate step between a tribe and a caste. In later years they were dominated by strict rules, which resulted in some of them gradually becoming castes. Another early incentive to forming guilds must have been competition. Economically it was better to work in a body than to work individually, as a corporation would provide added social status, and when necessary, assistance could be sought from other members.- Thapar, Romila. Asoka and the Decline of the Mauryas, Delhi: Oxford. P. 73.
12.  डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार, प्राचीन भारत की शासन-संस्थाएं तथा राजनीतिक विचार, पृष्ठ-264.

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