बहुजन राजनीति और अस्मिता

करीब ढाई साल पहले उत्तरप्रदेश में बसपा की जीत ने दलितों समेत कई लोगों को यह भ्रम बनाए रखने का अवसर दिया था कि ब्राह्मणों तथा अन्य सवर्णों को मायावती का नेतृत्व स्वीकार है. वे मान चुके थे कि करीब सवा सौ साल पहले उत्पीड़ित समुदाय के सम्मान एवं समानता के लिए जो आंदोलन ज्योतिबा फुले ने प्रारंभ किया था, जिसे बाद में डा॓. आंबेडकर, पेरियार जैसे महामानवों ने आगे बढ़ाने तथा कामयाबी तक पहुंचाने कार्य किया; और कांशीराम ने जिसे राजनीतिक शक्ति रूप में बदलने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी, वह मुलायम की हार तथा मायावती की एकक्षत्र विजय के साथ अपनी कामयाबी के शिखर तक जा पहुंचा है. दलित-ब्राह्मण गठजोड़ द्वारा सत्ता में मिली हिस्सेदारी से ब्राह्मण भी इस बात से प्रसन्न हो रहे थे कि येन-केन-प्रकारेण सत्ता की चाबी उन्हीं के हाथों में है. उनके लिए निर्णायक स्थिति में बने रहना, अपने सम्मान को बचाए रखना ही आपदधर्म है, जिसकी रक्षा उनके पूर्वज विश्वामित्र ने व्याध के घर मांस खाकर भी की थी. कुछ लोग मुलायम सिंह और उनके यादववाद की हार को मायावती के निजी पराक्रम की जीत मानकर प्रसन्न थे. जबकि कुछ इसे नए युग की शुरुआत के रूप में देख रहे थे. कुछ अनमन्यस्क भाव से परिवर्तनों के साक्षी बने थे.
कम ही सही परंतु कुछ लोग ऐसे भी थे, जो जानते थे कि दलित-ब्राह्मण राजनीति वास्तव में एक अतिअवसरवादी गठजोड़ है. एक ऐसी बेमेल खिचड़ी है, जिसके घटकों को कुछ दिन बाद ही अलग-अलग दिखने लगना है. उनके निहित स्वार्थ उन्हें लंबे समय तक एक रहने ही नहीं देंगे. वे लोग इसे दलित राजनीति के भटकाव और परिवर्तनकारी शक्तियों के एक वर्ग के पराभव के रूप में देख रहे थे. वे समझते थे कि इस जीत में दलितों के हाथ लगना कम, खिसकना कहीं ज्यादा है. वह इसलिए कि बसपा की राजनीति सामाजिक न्याय की राह में एक लंबे और प्रतिबद्ध आंदोलन का सुफल रही थी. ऐसे लोगों का विश्वास था कि दलित-ब्राह्मण गठजोड़ अस्वाभाविक है, जो प्रकारांतर में उत्पीड़ितों, वंचितों के स्वाभिमान के लिए चलाए जा रहे अभियान के लिए वाटरलू सिद्ध होगा. ब्राह्मणों के कंधे पर सवार होकर मायावती की ताजपोशी अंततः दलितों को ही भारी पड़ने वाली है. यह मानकर वे दुःखी और भीतर ही भीतर आहत हो रहे थे.
यह बात अलग है कि उनकी पीड़ा के बारे में जानने-सुनने की किसी को न तो फुर्सत थी, न अवसर. मीडिया तो षड्यंत्रकारी ढंग से उस जीत को युगपरिवर्तनकारी घटना के रूप में बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा था. दलित मतों के सहारे केवल कुर्सी की राजनीति करने वाली मायावती अपनी जीत पर गद्गद थीं. लगभग दलितों जितने ही जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे अतिपिछड़े वर्ग की अपेक्षा ब्राह्मणों को दलितों का स्वभाविक सहयोगी मानने वाले चंद्रभान प्रसाद जैसे बसपा के सलाहकार और तथाकथित दलित चिंतक भी अपने विचारों को साकार होते देख प्रसन्न थे. गठजोड़ के स्थायित्व को मन में भले ही हजार शंकाएं सही, मगर उस समय वे अपनी खुशी में जरा-भी कमी आने देने या संभलने के लिए तैयार नहीं थे. अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि लंबे संघर्ष में तपकर राजनीति में अपना स्थान सुरक्षित करने वाली मायावती को इन बातों का अंदेशा ही न हो. हां चुप्पी साधे रहना उनकी तात्कालिक विवशता, या फिर सत्ता के लिए किए गए समझौते का परिणाम अवश्य हो सकती है. वे जरूर समझती होंगी कि किसी ब्राह्मण के लिए दलितों के साथ राजनीतिक गठबंधन में आना जितना आसान है, उसका अपने ब्राह्मणत्व से मुक्त होना उतना ही कठिन है. शपथग्रहण के दिन मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष मायावती के बजाए पीछे बैठे सतीशचंद्र मिश्र के पांव छूने वाले ब्राह्मण विधायकों ने साफ कर दिया था कि वे अब भी ब्राह्मणत्व की मर्यादा में हैं. दलित मायावती के नेतृत्व को स्वीकारना न तो उनका कायाकल्प था, न इस बात का प्रतीक कि उनका ब्राह्मणत्व नख-दंत विहीन हो चुका है. मायावती यदि राजनीतिक सत्ता पर काबिज होकर दलित सम्मान की रक्षा करना चाहती हैं, तो उनका लक्ष्य भी राजनीति के जरिए अपने वर्गीय हितों को पूरा करना है. उसी को अब तक साधते आए हैं, वही आगे साधते रहेंगे. यह उन्हांेने पिछले लोकसभा चुनावों में दिखा भी दिया, जब ब्राह्मण मतों का बड़ा हिस्सा कांग्रेस की ओर खिसकता हुआ नजर आया.
ध्यातव्य है कि बसपा के बैनर तले जीतकर आए अधिकांश विधायक राजनीति के लिए अपेक्षाकृत नए और अनजाने चेहरे हैं. जिनके लिए दूसरी किसी पार्टी से टिकट पर जीतकर आना कठिन था. बसपा के प्रतिबद्ध दलित वोटों के सहारे उन्होंने चुनाव की वैतरिणी पार की है. इसके अलावा उन्हें मुलायम सिंह यादव से खिन्न अतिपिछड़े वर्ग का भी वोट भी मिला, जिससे जीत उनकी झोली में आ गिरी. विधान सभा चुनावों से पहले समाज की अतिपिछड़ी जातियां मुलायम सिंह यादव के साथ थीं. समाजवादी पार्टी से उनके मोहभंग के भी पर्याप्त कारण रहे. स्मरणीय है कि 2005 में अतिपिछड़े वर्ग को लुभाने के लिए मुलायम सिंह यादव ने कुछ अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में सम्मिलित करने का नाटक किया था. जिसके अंतर्गत प्रदेश में इन जातियों के लिए अनुसूचित जाति के प्रमाणपत्र भी बनने लगे थे. हालांकि इसके पीछे भी उनकी चाल थी, जिसके द्वारा वे इन जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग से निकालकर ओबीसी के सताइस प्रतिशत आरक्षण को यादव जैसी पिछड़े वर्ग की मजबूत जातियों के लिए छोड़ देना चाहते थे. दूसरी तरफ अनुसूचित जातियों की संख्या बढ़ाकर वे अपनी राजनीतिक प्रतिद्विंद्वी मायावती को अपनी ताकत का एहसास कराना चाहते थे. वे यह भी जानते थे कि किसी जाति को अनुसूचित जाति वर्ग में सम्मिलित करना राज्य सरकार के अधिकार-क्षेत्र से बाहर है. मुलायम सिंह यादव के निर्णय को अदालत में चुनौती मिलनी ही थी. उस समय अपने निर्णय के पक्ष में केंद्र सरकार और अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखने के बजाय राज्य सरकार ने जिस तरह से लापरवाही दिखाई यह प्रभावित अतिपिछड़ी जातियों से छिपा नहीं था. जैसा कि अंदेशा था अदालत ने राज्य सरकार के निर्णय पर रोक लगा दी थी. अब मुलायम अतिपिछड़ी जातियों को दुबारा अपनी ओर खींचने के लिए मायावती सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने इन जातियों के उत्थान के लिए किए गए कार्य के ऊपर पानी फेर दिया है. उनकी बातों पर अतिपिछड़ावर्ग कितना विश्वास करता है, यह तो आनेवाला समय ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि आने वाले चुनावों में मायावती को यदि सत्ता बनाए रखने के लिऐ उन्हें अपने ‘स्वाभाविक साथियों’के मन में झांककर यह पता लगाना होगा कि क्या उनका सचमुच कायाकल्प हो चुका है! गत लोकसभा चुनावों के परिणाम उनका आवश्यक दिशा-निर्देश कर सकते हैं.
जहां तक अपना मानना है उससे पहले मुलायम सिंह यादव को सत्ता में लाने में मुसलमान, यादव, ठाकुर और अतिपिछड़ेवर्ग का हाथ रहा था. लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने अतिपिछड़ेवर्गों की उपेक्षा की. चुनावों को करीब जानकर आरक्षण के नाटक के बहाने उन्हें एक बार फिर बरगलाने का प्रयास किया, लेकिन तब तक यह वर्ग उनकी चुनावी चाल को समझ चुका था. मुलायम सिंह यादव से मोहभंग के पश्चात यही अतिपिछड़ा वर्ग चुनावों में मायावती के समर्थन में उतरा था. मायावती की सख्त प्रशासक की छवि और समाजवादी पार्टी के जंगलराज ने भी बसपा की ओर मतदाताओं को मोड़ा था. यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतों का स्वाभाविक अंतरण था. इसका लाभ ब्राह्मणों ने उठाया, जो पिछले कई वर्षों से राजनीतिक उपेक्षा का दंश झेलते आ रहे थे. अभिप्राय है कि सर्वजन राजनीति के नाम पर मायावती ने जो चमत्कार किया दलित और ब्राह्मण मतों के गठजोड़ का यह करिश्मा कांग्रेस आजादी के बाद से ही करती आ रही थी. अंतर सिर्फ यह रहा कि कांग्रेस का अध्यक्ष प्रायः नेहरू-गांधी परिवार का सदस्य रहा है, जबकि मायावती दलित हैं. किंतु राजनीति के लिए इस प्रकार की अवसरवादी घटनाएं असामान्य नहीं हैं.
ध्यातव्य है कि कांग्रेस के प्रदेश में पतन के बाद से ही लगभग दो दशकों से ब्राह्मणों को अपनी उपेक्षा खल रही थी. दूसरे उत्तरप्रदेश के पिछड़े वर्गों में उभरती राजनीतिक चेतना ने भाजपा समेत सभी दलों को अपनी राजनीति को पिछड़ा वर्ग पर केंद्रित कर दिया था. भाजपा स्वयं पिछड़े मुख्यमंत्री को आगे करके चुनाव लड़ रही थी. इन चुनावों में ब्राह्मणों की समझदारी यह रही कि उन्होंने उसी पार्टी को चुना, जिसमें समाजवादी पार्टी का विकल्प बनने की संभावना सर्वाधिक थी. यह अवसर देखकर राजनीति के समीकरण बिठाने की कला है, जिसमें मायावती ने अपनी परिपक्वता का परिचय दिया था. उत्साह में आकर इसको सोशल इंजीनियरिंग भी कहा सकता है. लेकिन यह मान लेना कि इस घटना से भारतीय समाज की जातिवादी संरचना कमजोर हुई या होगी अथवा यह कहना कि जातिवादी राजनीति का दौर समाप्त हो चुका है, जल्दबाजी होगी. अंत में इतना कहना ही काफी है कि मायावती की पिछली जीत केवल बहुजन राजनीति की जीत थी. इसको सर्वजन राजनीति कहना, एक छल-जैसा है. लोकसभा चुनावों में यह सच सामने आ चुका है. मायावती अगर अब भी न संभली जो आने वाले विधानसभा चुनावों में उन्हें और भी मात खानी पड़ सकती है. हालांकि वे इस बात पर प्रसन्न हो सकती हैं कि गत लोकसभा चुनावों में बसपा के मत-प्रतिशत में अपेक्षाकृत वृद्धि हुई थी. मगर वह वृद्धि मतदाताओं का भाजपा से मोहभंग होने का भी परिणाम थी. दूसरे वोट प्रतिशत बढ़ना सीट-संख्या बढ़ना नहीं होता.
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है बसपा की तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग मायावती द्वारा अपनी ही प्रतिबद्धताओं के साथ खिलवाड़ है. इसके लिए उन्हें उन नारों को भी बदलना पड़ा था, जिनके सहारे वह अब तक की सीढ़ियां चढ़कर आई थीं. हालांकि वे नारे विभेदकारी राजनीति के परिचायक थे. और समाज की जातीय विभाजन की घिनौनी राजनीति को बढ़ावा देने वाले थे. मगर इस बात से भी कोई इंकार नहीं किया जा सकता कि उन नारों के पीछे समाज के बड़े वर्ग का आक्रोश भी झलकता था जो सहस्राब्दियों से जातीय उत्पीड़न का दंश सहते आए थे.
चूंकि वापस लौटना एकाएक संभव नहीं है, इसलिए मायावती अब दलित नेताओं की मूर्तियां लगवाकर दलित राजनीति और उसके बहाने सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती हैं. इसके लिए राज्य में भारी भरकम धनराशि खर्च करके पार्क बनवाए जा रहे हैं. जिनमें डाॅ. आंबेडकर, पेरियार, महात्मा बुद्ध, कांशीराम आदि की मूर्तियां लगवाई जा रही हैं. लेकिन क्या कोई मूर्ति बिना बौद्धिक आंदोलन अथवा उसके समर्थन के समाज को परिवर्तन की हद तक प्रभावित कर सकती है? उस आंदोलन को पुनर्जीवन प्रदान कर सकती हैं, जिसको उन्होंने अपनी सर्वजन राजनीति अथवा तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग द्वारा शक्तिहीन कर दिया है. प्रदेश की जनता महंगाई, बिजली और सूखे की समस्या से त्रस्त है. इनसे जूझने के लिए केंद्र सरकार से संसाधनों की मांग करना और प्रदेश के अपने संसाधनों को मूर्तियों और पार्कों के नवीकरण पर खर्च कर देना, किस परिवर्तनकारी आंदोलन का प्रतीक है. खबर यह भी है कि मायावती महान नेताओं की बगल में अपनी मूर्तियां भी टिकवा रही हैं. क्या इससे लोग उन्हें ज्योतिबा फुले या डा॓. आंबेडर के समकक्ष मानने लग जाएंगे? कहीं उनके मन में डर तो नहीं कि अपनी सर्व सत्तावादी राजनीति के चलते उन्होंने दलित आंदोलन, विशेषकर दलित चेतना को इतना धूमिल कर दिया है कि उसको वापस अपनी स्थिति में आने में वर्षों लग सकते हैं. इतना कि मायावती का अपना जीवनकाल भी कम पड़ सकता है. उस अवस्था में आने वाली पीढ़ियां उन्हें मूर्तियों के बहाने याद रखेगी. क्या उन्हें पता नहीं कि गांधी जी के विचारों की हत्या करने वाले ही राजघाट जाकर उनकी समाधि पर फूल चढ़ाते हैं. कि मूर्तियों के प्रति अंधश्रद्धा समय आने टोटम में बदल जाती है. जिसका मनमाना अर्थ निकाला जा सकता है. और शताब्दियों पहले विलक्षण भारतीय मनीषा का तंत्र-मंत्र, जादू-टोने और कर्मकांडों में सिमट जाना भी समाज का विचारों से कट जाने का दुष्परिणाम था. इसलिए आने वाले वर्षों में एक चुनौती मायावती के सामने यह भी होगी कि प्रदेश की जनता को समस्याओं से मुक्ति दिलाने के साथ-साथ, अपने स्वाभाविक सहयोगियों की तलाश द्वारा वे किस प्रकार अपनी प्रतिबद्धताओं की रक्षा कर पाती हैं. वे संभवतः यह तो समझ चुकी हैं कि उनकी सोशल इंजीनियरिंग आने वाले वर्षों में कारगर नहीं होने वाली है. लेकिन जिस रास्ते पर चलकर वह दलित चेतना में जान डालने का प्रयास कर रही हैं, वह भी अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा उद्यम है. यह याद रखना भी जरूरी है कि मूर्तियां सिर्फ श्रद्धालु समाज गढ़ सकती हैं, विवेकवान समाज की स्थापना तो विचारों और उनके निरंतर परिवर्धन-परिष्करण द्वारा ही संभव है. लेकिन मायावती जिस रास्ते पर बढ़ रही हैं, उस ओर तो यह संभावना नजर नहीं आती.
ओमप्रकाश कश्यप

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4 टिप्पणियाँ

Filed under दलित विमर्श

4 responses to “बहुजन राजनीति और अस्मिता

  1. इस साल लोकसभा चुनाव से शुरू हुआ हार का सिलसिला भाजपा के लिए थमने का नाम नहीं ले रहा है और महाराष्ट्र, हरियाणा तथा अरुणाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भी भगवा पार्टी को मुंह की खानी पड़ी है।

    इनेलोद से नाता तोड़ने और भजन लाल की पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस के साथ गठजोड़ नहीं होने से हरियाणा में भाजपा को ज्यादा उम्मीद नहीं थी लेकिन महाराष्ट्र में उसे भारी झटका लगा है और उसे लगातार तीसरी बार पराजय का मुंह देखना पड़ा है।

    पारंपरिक साझेदार शिवसेना के साथ मिलकर भाजपा ने लोकसभा चुनाव की हार के बाद खोई जमीन पर काबिज होने की कोशिश की थी लेकिन कांग्रेस-राकांपा गठजोड़ के आगे उसका गठबंधन टिक नहीं पाया। राज ठाकरे की मनसे ने शिवसेना के वोट बैंक में सेंध लगाई, जिसका सीधा फायदा कांग्रेस-राकांपा को हुआ। भाजपा प्रवक्ता रवि शंकर प्रसाद ने स्वीकार किया कि मनसे ने 40 से अधिक सीटों पर गठजोड़ का नुकसान किया है। उन्होंने कहा कि इससे जीत और हार का अंतर बढ़ गया है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पार्टी में कुछ कमियां हैं, जिन्हें दूर करने के लिए ईमानदारी से आत्मावलोकन किया जाएगा।

    महाराष्ट्र में भाजपा के शीर्ष नेता गोपीनाथ मुंडे ने कहा कि पार्टी का मनोबल बढ़ाने की सख्त आवश्यकता थी लेकिन राज्य के चुनावी नतीजे तो मनोबल गिराने वाले हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी को युवा नेतृत्व की आवश्यकता है। उनके इस तर्क को पार्टी में और लोगों का समर्थन मिलने की भी उम्मीद है।

    मुंडे ने कहा कि यदि हम जीतते तो राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी पर काफी असर होता लेकिन हम हार गए। पार्टी का मनोबल बढ़ाने की जरूरत है और युवा नेतृत्व भी जरूरी है।

    प्रसाद ने कहा कि हम अपनी कमजोरियों के बारे में सोचेंगे। ईमानदारी से कारणों का विश्लेषण करेंगे। हमें इन मुद्दों का हल करना ही होगा। पार्टी के खराब प्रदर्शन के लिए अंतर्कलह को एक वजह मानने का संकेत देते हुए उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें एक सुर में बोलना चाहिए।

    अध्यक्ष राजनाथ सिंह का कार्यकाल दिसंबर में समाप्त होने वाला है। ऐसे में इस हार से लालकृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता पर भी लोकसभा के विपक्ष का नेता पद छोड़ने का दबाव बनेगा। आडवाणी को विपक्ष के नेता पद के रूप में अपने उत्तराधिकारी का चयन करने के लिए कह चुके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भाजपा के मामलों में अब और महत्वपूर्ण भूमिका निभाए जाने की उम्मीद बढ़ी है।

    पार्टी सूत्रों ने कहा कि इससे आडवाणी पर सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का और दबाव पड़ सकता है। भाजपा-शिवसेना के किले में सेंध लगाने वाली राज ठाकरे के नेतृत्व वाली मनसे को भावी गठजोड़ साझेदार बनाने के बारे में भी सोच पनप सकती है। मुंडे ने कहा कि पांच से छह प्रतिशत वोट लेकर मनसे 13 सीटें जीतती नजर आ रही है। कुल मिलाकर ये सभी हमारे वोट हैं।

    हरियाणा में ओम प्रकाश चौटाला की इनेलोद से नाता तोड़ना भाजपा के लिए भारी पड़ा। चौटाला हालांकि गठजोड़ के काफी इच्छुक थे लेकिन भाजपा का एक वर्ग महसूस करता था कि लोकसभा चुनाव में गठजोड़ द्वारा एक भी सीट नहीं जीत पाने के कारण अब भाजपा और इनेलोद के बीच गठजोड़ का कोई औचित्य नहीं है।

    भाजपा के एक नेता ने कहा कि इनेलोद ने हरियाणा विधानसभा चुनाव में 31 सीटें जीती हैं। यदि गठजोड़ जारी रहता तो हमें भी काफी फायदा होता। भाजपा के हरियाणा मामलों के प्रभारी विजय गोयल ने कहा कि गठजोड़ से बेहतर परिणाम आते, यह चर्चा अब बेमानी है लेकिन उन्होंने कहा कि कांग्रेस को विपक्षी खेमे में भ्रम की स्थिति का फायदा मिला है।

    उन्होंने कहा कि कांग्रेस को विपक्षी दलों के वोटों में विभाजन का फायदा मिला है। यदि ये पार्टियां मिलकर चुनाव लड़तीं तो कांग्रेस को हम पराजित कर सकते थे। भाजपा मंहगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद और कांग्रेस के कुशासन जैसे मुद्दों को मतदाताओं के बीच भुना पाने में विफल रही।

  2. satyendranatha

    bahan g abhi bhi dalit hit ko prathamikata de rahi hai

  3. thoughtes are very clear.according to Mayabati is going in dark. She cheat her cast and qwn persons.

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