उपन्यास की प्रासंगिकता और सरोकार

सर विद्याधर सूरज नायपाल की प्रतिष्ठा विदेशों में चाहे जिसके लिए हो परंतु भारत में उनकी चर्चा प्रायः उनके विवादित बयानों के कारण ही होती है. शायद इसलिए कि अपने साहित्य के माध्यम से वे आम पाठक के मन में वैसा स्थान नहीं बना पाए हैं जो किसी नोबल पुरस्कार प्राप्तकर्ता साहित्यकार के लिए अपेक्षित रहता है अथवा जिसकी वह उम्मीद बांधे रखता है. न ही उनकी किसी ऐसी कृति के बारे में सुनने को मिला है जिसने पुस्तक बाजार में बिक्री के कीर्तिमान कायम कर साहित्य के गंभीर पाठकों का ध्यान अपनी और आकर्षित किया हो. यह भी हो सकता कि उनके नाम पर होने वाले विवादों में उनका अपना योगदान जरा भी न हो और जिसकी की पर्याप्त संभावना है; मीडिया ही उनकी बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता रहा हो. किंतु मीडिया को मसाला तो वही उपल्ब्ध कराते होंगे. या उनकी रहस्यमय चुप्पी मीडिया के दुस्साहस को बढावा देने का काम करती होगी. स्वयं उनके लेखन में भी विद्वानों ने साम्राज्यवाद के पक्षधर तत्वों की खोज की थी. और अपना मीडिया भले ही अपनी जनपक्षधरता का चाहे जितना वास्ता दे, वह असल में है तो पूंजीवाद की जारज संतान ही.

एक बार उन्होंने विनोबा भावे को लेकर अभद्र टिप्पणी की थी और उन्हें गांधी जी का भौंडा नकलची तक कह दिया था. हमारे इस आलेख का विषय भी उनकी एक फतवेबाजी ही है. उन्होंने एक बार कहा था कि उपन्यास अपना समय पूरा कर चुका है. केवल गैरऔपन्यासिक लेखन ही आज के यथार्थ को पकड़ सकता है. जो लेखक केवल कथासाहित्य लिखने में ही अपना समय बिताते हैं; वे एक दिन अपनी सामग्री को झुठलाते हुए नजर आएंगे. सर विदिया के बयान पर आगे चर्चा करने से पहले हम बता दें कि उपन्यास के अंत की घोषणा करने वाली साहित्य-जगत में यह पहली या अकेली फतवेबाजी नहीं है. विदेश को लें तो वहां उपन्यास की मौत का ऐलान सबसे पहले टी. एस. इलियट ने सन 1940 में किया था. लेकिन हुआ क्या? योरोप में ही एक के बाद एक इतने कालजयी उपन्यास सामने आए कि कुछ अर्से बाद ही इलियट साहब की घोषणा की निस्सारता सामने आने लगी थी. हिंदी में शायद सुधीश पचैरी कुछ साल पहले कविता के अंत की भविष्यवाणी के रूप में ऐसी ही बचकानी घोषणा की थी. उनकी फतवेबाजी भी कभी की टांय-टांय फिस्स हो चुकी है. इधर राजेन्द्र यादव आजकल कहने लगे हैं कि बड़े उपन्यासों का जमाना अब नहीं रहा. इस भागमभाग भरे समय में लोगों के पास इतना समय कहां कि वे भारी-भरकम उपन्यासों के लिए समय निकाल सकें. इन्हीं राजेन्द्र यादव ने कभी कहा था कि उपन्यास जनता का महाकाव्य होता है. जिन चरित्रों को महाकाव्यों में जगह नहीं मिल पाती उन्हें उपन्यास बड़े सम्मान के साथ संजोए रखता है. उनकी इस बात में पूरा दम भी था. हावर्ड फा॓स्ट का ‘आदि विद्रोही’, पर्ल बक का सुप्रसिद्ध चीनी उपन्यास ‘दि गुड अर्थ’, प्रेमचंद का ‘गोदान’, गौर्की का ‘मां’, रेणु का ‘मैला आंचल’, पन्नालाल पटेल का ‘जीवनः एक नाटक’, संजीव का बिहार के महान लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के जीवन पर लिखा गया उपन्यास जैसे उपन्यासों की लंबी शृंखला है; जिन्हें राजेन्द्र यादव जी के उपर्युक्त कथन के समर्थन में रखा जा सकता है. इन सबके बावजूद बड़े उपन्यासों को लेकर राजेन्द्र जी हताशा की वजह क्या हो सकती है यह तो वही जानें. हालांकि हिंदी में ही उपन्यासों के भविष्य को लेकर सवाल करने वाले वे अकेले नहीं हैं. इसी बात को लघुकथा लेखक कुछ अलग ढंग से उठाकर लघुकथा के पक्ष में तर्क गढ़ते रहे हैं.

सच यही है कि उपन्यास न कभी मरा था, ना उस तरह का कोई खतरा उसके सामने रहा है. गोपाल राय ने अपने जनसत्ता में छपे एक लेख में गार्जियन द्वारा कराए गए एक सर्वे का उल्लेख किया है जिसके अनुसार ‘विगत पचास वर्षों में उपन्यास की स्थिति और भी मजबूत हुई है. एक अन्य सूचना के अनुसार इंग्लैंड के 48 पाठक समूहों के बीच कई हफ्तों तक चली बहस का निष्कर्ष यह था कि विगत सौ वर्षों में प्रकाशित कालजयी उपन्यासों की सूची में निकट अतीत में प्रकाशित उपन्यास अधिक हैं. यही नहीं उपन्यास की लोकप्रियता जानने के बीते साठ सालों के नोबल पुरस्कारों की सूची को भी देखा जा सकता है.’ इसके बावजूद कभी बाजार का डर दिखाकर तो कभी समय की कमी के बहाने उपन्यास और बड़ी साहित्यिक रचनाओं पर संकट की घोषणा करना निठल्लों का षगल बन चुका है.

बहरहाल जिस साल राजेन्द्र यादव ने यह वक्तव्य दिया उसी वर्ष अमरकांत का ‘इन्हीं हथियारों से’, उससे थोड़ा पहले गिरिराज किषोर का ‘पहला गिरमिटिया’, चंद्रकिशोर जायसवाल के ‘चिरंजीव’ और पलटनिया, इनके थोड़े अर्से के बाद दूधनाथ सिंह का ‘आखिरी कलाम’ जैसे खासे सेहतमंद और चर्चित उपन्यास केवल हिंदी में आ चुके थे. मैत्रेयी पुष्पा का ‘अल्मा कबूतरी’ और कमलेष्वर का ‘कितने पाकिस्तान’ भी दुबले-पतले उपन्यास नहीं माने जा सकते. इस नाकुछ कलमकार का उपन्यास ढाई कदम भी चार सौ से अधिक पृष्ठों का था. गैर हिदी क्षेत्र के उपन्यासों में लें तो तकषी नारायण पिल्लै का ‘रस्सी’, गोपीनाथ मोहंती का ‘माटी-मटाल’, शिवाजी सावंत के दो उपन्यास ‘मृत्युंजय’ और ‘छावा’ पर्याप्त स्थूलकाय और सुचर्चित कृतियां हैं. जिनके नए-नए संस्करण आज भी निकलते रहते हैं. बिल्कुल नई रचना को ले तो भगवान दास मोरवाल का ‘बावल तेरे देश में’ और ‘रेत’छपे और दोनों ही खूब चर्चित भी रहे. यदि बाजार के लिहाज से देखें तो प्रकाशक खुले मन से स्वीकारते हैं कि उपन्यास की बिक्री, साहित्य की किसी भी अन्य विधा से अधिक होती है. खरीदते समय पाठक प्रायः उपन्यासकार और उपन्यास की विषयवस्तु को देखता है, उसके आकार को नहीं. और यदि किसी उपन्यास को खरीदने से खुद को रोके रखता है तो उसका कारण उपन्यास के मूल्य का उसकी पहंुच से बाहर होना होता है. सच तो यह है कि अच्छे उपन्यासों की मांग बाजार में हमेषा बनी रहती है. अब यदि दृष्टि-दुर्बलता के कारण राजेन्द्र यादव भारी-भरकम उपन्यास नहीं पढ़ पाते हैं अथवा रुचि की कमी, समय के अभाव या अन्य किसी कारण से सर विदिया उपन्यास-पाठन से परहेज रखते हैं, या उनका आनंद नहीं ले पाते तो यह उनकी या व्यक्ति विषेश की समस्या हो सकती है. इसे लेकर फतवेबाजी पर उतर आना अपनी स्थिति और मीडिया की ताकत का अनुचित इस्तेमाल करना है, जिससे बचा जाना चाहिए.

यह बताने की आवष्यकता तो नहीं ही है कि उपन्यास किसी भी समाज के अंतर्बाह्यः जगत का प्रामाणिक लेखा होता है. यह सच को उस रूप में प्रस्तुत करता है जिसमें प्रायः हम देख नहीं पाते अथवा समाज का शिखरस्थ वर्ग निहित स्वार्थ के कारण जिसे छिपाए रखना चाहता है. बीते समय में उपन्यास की लोकप्रियता का कारण ही यह रहा है कि पाठक इसमें न केवल अपने अनुभवों की झलक पा सकता है बल्कि अपने पात्रों के साथ उठ-बैठ और बतिया सकने तक का स्पेस उसके पास होता है. जिसके माध्यम से वह अपने परिचित-अपरिचित समाजों की विषेशताओं को पहचान सकता है. अतः उपन्यास के पक्ष में दिया गया यह बयान बिल्कुल सच लगता है कि वह काल्पनिक पात्रों के सहारे लिखा जाने वाला वास्तविक इतिहास होता है. उसमें वे पात्र भी स्थान पा लेते हैं जिन्हें इतिहास प्रायः दृष्टि-ओझल कर देता है अथवा जो इतिहास के तंग खांचे में फिट नहीं बैठ पाते अथवा जिन्हें संस्थान-विरोधी बताकर हाशिये से बाहर रखने की कोशिषें की जाती हैं. समाज के वास्तविक नायकांे को इतिहास-बहिष्कृत करने का खेल चंूकि सत्ता की केंद्रिकता से जुड़ा है; जिसका चरित्र प्रायः अपरिवर्तनषील होता है. अतः इतिहास के दायरे से वास्तविक नायकों को पीछे ढकेलने की प्रक्रिया, प्रकारांतर में थोडे़-बहुत बदलावों के बावजूद हरेक समाज में अनवरत रूप से चलती रहती है. जिसको स्वर देने के कारण उपन्यास और साहित्य की शेष विधाएं सदैव अपनी प्रासंगिकता बनाए रखती हैं. हालांकि इसी दौर में उन्हें अपने परिमार्जन और परिवर्तन की प्रक्रियाओं से भी गुजरना पड़ता है. जिसके द्वारा वे अभिव्यक्ति के युगानुकूल माध्यमों से स्वयं को समृद्ध करने का काम करती हैं.

इस तरह देखा जाए तो जीवन-जगत की वास्तविकता को परचाने के लिए उपन्यास से सशक्त दूसरा कोई माध्यम नहीं है. सच यह भी है कि उपन्यास का जन्म औद्योगिकरण के बाद की घटना है. मषीनों के आगमन के बाद छपाई कला में सुधार किया गया जिससे उन पुस्तकों को पढ़ना और लिखना संभव हुआ; जिन्हें परंपरागत श्रुति प्रथा के अंतर्गत पढ़ना और कंठस्थ करना संभव नहीं था. परिणामतः बड़ी औपन्यासिक कृतियां रची गईं….एक और बात जिसने उपन्यास लेखन को बढ़ावा दिया, वह है शिक्षा का तीव्र विस्तार. पश्चिम में सोलहवीं शताब्दी औद्योगिकरण की तीव्र गति के कारण शिक्षा की दर में तेजी से इजाफा हुआ. वैज्ञानिक षोधों के द्वारा सभ्यता और संस्कृति में तो बदलाव आए ही, समाज के बौद्धिक स्तर में भी अपेक्षानुरूप सुधार हुआ. जिससे तार्किकता बढ़ी. लोगों को प्रतीकात्मक ढंग से बात कहने का सलीका भी आया. इन सभी ने मिलकर उपन्यास को जन्म दिया. और जिस उम्मीद के साथ उपन्यास को साहित्य की केंद्रीय विधा के रूप में सामने लाया गया उसे उपन्यास ने, साहित्य की अन्य किसी भी विधा के समान, पूरी गंभीरता के साथ पूरा किया. दासप्रथा के विरुद्ध लिखे गए कनाडियन उपन्यास ‘टाम काका की कुटिया’ ने अपने समय में न केवल बाइबल के बाद दूसरे नंबर पर बिक्री का गौरव हासिल किया था, बल्कि दासप्रथा के विरोध में माहौल बनाने में भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. हावर्ड फा॓स्ट के कालजयी उपन्यास ‘आदि विद्रोही’ के महत्त्व को नकार पाना भी मुष्किल है. यह विलासी और आतंककारी सत्ता के विरुद्ध उत्पीड़ितजन के सार्थक विरोध का सवार्धिक प्रामाणिक दस्तावेज है. जो यह दर्शाता है कि सत्ता का स्वरूप चाहे जितना दमनकारी और ताकतवर क्यो न हो, संगठित विरोध के माध्यम से उसे निस्तेज किया जा सकता है. एकदम हाल की बात लें तो नाटकीयता के अतिरेक तथा कथानक में भटकाव के बावजूद ‘कितने पाकिस्तान’ ने सांप्रदायिकता से जूझने के साथ-साथ हिंदी-जगत में व्याप्त पाठकीय जड़ता को तोड़ने में जो कमाल हासिल किया था, उसे यूं ही नजरंदाज नहीं किया जा सकता. बताते हैं कि बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के सुदूर अंचलों में इस उपन्यास की छायाप्रतियां खूब बेची गईं. प्रकाशन के करीब दो साल में ही इसके पांच-छह संस्करण आ चुके थे. यह घटना इकीसवीं शताब्दी की दहलीज पर बिल्कुल हाल ही में घटित हुई है. उसके बाद यानी पिछले चार-पांच सालों में बाजारवाद के नाम पर ऐसा कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ा है कि उपन्यास के अस्तित्व का रोना रोया जाए. फिर वर्तमान में सामाजिक परिवर्तनों का जो रूप हम देख रहे हैं; उपन्यास का जन्म भी लगभग वैसे ही परिवेश में हुआ है. हालांकि बाजार तब इतना संगठित और वाचाल नहीं था.

अब जरा यह भी देख लिया जाए कि वे कौन लोग हैं जो उपन्यास के अंत की कल्पना कर रहे हैं और उनकी मंषा क्या है? सच यह भी है कि जबसे उपन्यास का जन्म हुआ तब से, इन तीन-चार शताब्दियों में दुनिया बहुत आगे आ चुकी है. संचार माध्यमों तीव्र विकास ने लोगों की जीवनषैली को आमूल बदलने में सफलता प्राप्त की है. जीवन-गति में तेजी आई है. ऐसे में ज्ञानविज्ञान के जो माध्यम सामाजिक संरचना एवं मानव-मन के अंतःप्रदेशों की कारगर यात्रा के लिए जाने जाते हैं, मनुष्य और समाज के संबंधों और उनके अंतद्वंद्वों को स्वर देते रहे हैं, उनका महत्त्व अपेक्षाकृत घटा है. इसके बावजूद ऐसा कोई कारण मुझे नजर नहीं आता जो उपन्यास के अंत का सूचक जान पड़े. अतः सर विदिया का यह बयान सीधे-सीधे बाजार से अनुप्रेरित और उसी के हक में दिया गया विशुद्ध व्यावसासिक वक्तव्य लगता है. कुछ इस प्रकार का वक्तव्य जैसा कि हमारे फिल्मी अभिनेता अपनी नई फिल्म को चर्चा में लाने के लिए उसके बाजार में आने से पहले अकसर देते रहते हैं.

शिक्षा, संस्कृति और कला के उपादानों का प्रयोग अपनी छवि निर्माण के लिए करना कोई आज की बात नहीं है. शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य विवेकीकरण को गति प्रदान करना है; जो ज्ञान की सामान्य स्थिति से ऊपर उठने की कला है. ताकि व्यक्ति अपने आस-पास की घटनाओं पर प्रबुद्धता पूर्ण निर्णय ले सके. यह स्थिति उन लोगों/संस्थाओं के भी प्रतिकूल जाती है जिनके हितों को विवेकीकरण की प्रकिया से चोट पहुंचती है. अतः शीर्षस्थ शक्तियां किसी न किसी माध्यम से विवेकीकरण की प्रक्रिया को अवरुद्ध करने का कार्य करती रहती हैं. इस कार्य को वे इतनी चतुराई और सच कहें तो धूर्तता के साथ करती हैं, कि इससे उनकी लोकलुभावन छवि को कोई ठेस नहीं पहुंच पाती. स्वार्थी व्यवस्था के पक्ष में तर्क जुटाने के वे प्रायः समर्थक बुद्धिजीवियों को अपने साथ रखती हैं. प्रचारतंत्र या तो उनके प्रभामंडल में आ जाता है अन्यथा वे उसपर किसी न किसी प्रकार कब्जा जमा लेती हैं. कभी-कभी गुलाम मीडिया के माध्यम से केंद्रीय मनीषी के रूप में गैरप्रतिभाशाली बुद्धिजीवी भी थोप भी दिए जाते हैं. चूंकि ऐसे लोगों का कोई वैचारिक आधार नहीं होता, अतः ये सत्ताधीश वर्ग के लिए सबसे कभी चुनौती नहीं बन पाते. सत्ता से जुड़ने तथा सत्ताधीशों के करीब रहने का लालच और उनसे लाभ कमाने की छिछली प्रवृति भी, स्वार्थी कलमकारों को उससे जोड़े रखती है. अपनी आश्रयदाता शक्तियों के हितसाधन के लिए ये बुद्धिजीवी समय-समय पर फतवेबाजी करके जनता को भरमाते रहते हैं. उनका कुल उद्देष्य यथास्थिति को छेड़े बिना परिवर्तन की स्वयंस्फूर्त धाराओं को अपने पक्ष में मोडे़ रखना होता है. ताकि उनके शोषक, समाज के शीर्षस्थ वर्ग के हितों को किसी भी प्रकार की चोट न पहुंचे.

मीडिया द्वारा साहित्य की उपेक्षा तथा उपन्यास के अंत की हाल की घोषणा को बाजार के बढ़ते वर्चस्व से जोड़कर भी देखा जा सकता है. यह बाजार के हक में होता है कि वह उपभोक्ताओं की भीड़ पैदा करे ताकि माल की खपत के अधिकाधिक अवसर पैदा हों. मुनाफा बढ़े. चूंकि विवेकीकरण की प्रक्रिया उपभोग को संतुलित करने का काम करती है. यह उपभोग को जरूरी चीजों बनाम तात्कालिक रूप से गैरजरूरी चीजों में बांटकर रखती है. चूंकि समस्त उपभोक्ता क्रांति की सफलता गैरजरूरी चीजों को रहन-सहन और प्रतिष्ठा से जोड़कर उन्हें अनिवार्य बना देने में निहित है, अतः बाजारवादी शक्तियां सबसे पहले विवेकीकरण पर ही हमला करती हैं. ताकि मनुष्य बिना किसी व्यवधान के उपभोक्ता वस्तुओं को अपनी प्रतिष्ठा का प्रतीक मानता रहे. हमें याद रहना चाहिए कि करीब दो दशक पहले बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए शिक्षा में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देने की मांग बहुत जोर-शोर से की जा रही थी. बेकारी से निपटने के लिए यह आवश्यक भी था कि हमारे शिक्षालय केवल किताबी ज्ञान देने वाले संस्थान ही बनकर न रह जाएं. शिक्षा कम से कम इस लायक तो होनी ही चाहिए कि उससे व्यक्ति की जीविका का साधन हो सके. लेकिन शिक्षा का एक अन्य उद्देष्य जो उसके अन्य किसी भी लक्ष्य से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है, व्यक्तित्व का परिष्करण करना भी है. उसका यह उद्देष्य भी है कि वह विवेकीकरण की गति को बढ़ावा दे. बावजूद इसके बेरोजगारी का हव्वा दिखाकर व्यवसायमूलक शिक्षा के नाम पर देश के शिक्षासदनों को सीधे-सीधे बाजार के हवाले कर दिया गया. परिणाम आज हम सभी के सामने है. उच्चशिक्षा या कि जिसे व्यवसायमूलक शिक्षा का नाम दिया जा रहा है, आज इतनी महंगी हो चुकी है कि किसान या मजदूर की संतान उसके बारे सोच भी नहीं सकती. स्पर्धात्मक शिक्षा के नाम पर हमारे अघिकांश विद्यालय दोयम दर्जे की प्रतिभा के उत्पादक बनकर रह गए हैं. मैकाले ने जो काम ब्रिटिश हुकूमत को जमाने के लिए किया था वही काम आज हमारे व्यावसायिक शिक्षासदन बाजार की बेहतरी के लिए कर रहे हैं. बाजार द्वारा पोषित एवं संचालित हमारा तमाम मीडिया उच्चवर्ग की अमीरी तथा मध्यवर्ग के चेहरे पर आई चमक को देश की खुशहाली बताकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है. बाजारवादी शक्तियों के समर्थन पर टिकी सरकारें चूंकि बेरोजगारी की समस्या से अपना पल्ला झाड़ना चाहती हैं और उनमें बैठे लोग बाजार का फायदा उठाने के चक्कर में रहते हैं, अतः वह निजी शिक्षण संस्थाओं को बढ़-चढ़कर लाइसेंस दे रही है. शिक्षा जिसको कभी मानवीकरण का माध्यम और शिक्षण को पवित्र उद्देष्य माना जाता था, आज वह पूरी तरह खरीदफरोख्त की चीज बन चुकी हैं. स्वाभाविक है कि मोटी रकम के बदले डिग्री खरीदकर निकले हमारे युवा अपनी शिक्षा का जल्दी से जल्दी और अधिकतम मूल्य प्राप्त करने की कोशिश में रहते हैं. यह स्थिति बाजार के पक्ष में तो है लेकिन यह उस समाज के पक्ष में हरगिज नहीं कही जा सकती जहां पहले से भारी आर्थिक असमानताएं हैं. जहां एक तिहाई लोग आज भी भीषण गरीबी के साये में जी रहे हैं.

सवाल उठ सकता है कि इससे साहित्य या उपन्यास का क्या सरोकार है. अथवा उपन्यास या साहित्य के संकट को क्यों बाजार से जोड़कर देखना चाहिए. किसी भी साहित्यिक रचना अथवा पुस्तक की उपयोगिता उसकी विषयवस्तु या उसमें सन्निहित ज्ञान की मौलिकता से ही तय नहीं की जा सकती; बल्कि इस बात से भी देखी जाती है कि वह रचना पाठक के मस्तिष्क को कितना ऊर्जस्वित और उद्वेलित कर पाती है. दूसरे शब्दों में एक अच्छी पुस्तक अपने पाठक के मानस में भी विकसित होती रहती है. साथ-साथ वह पाठक को इस योग्य भी बनाती है कि वह स्थितियों का धैर्य पूर्वक, नीर-क्षीर विश्लेषण करते हुए बेहतर निर्णय ले सके. पुस्तकें पीढ़ियों के अनुभव का निचोड़ होती हैं. उनकी योग्यता किसी समस्या पर फैसला देने से नहीं आंकी जाती. बल्कि इस बात से आकलित की जानी चाहिए कि वे भिन्न-भिन्न परिस्थितियों रह रहे पाठकों की निर्णय लेने की क्षमता को किस हद तक बढा पाती हैं. किंतु यह तभी संभव है जब पाठक का मानस पुस्तक के मूलतत्व को ग्रहण करने में सामर्थवान हो. उपन्यास स्थितियों को बृहद परिप्रेक्ष्य में देखने की योग्यता प्रदान करता है. हालांकि साहित्य की दूसरी विधाएं भी पाठक के मानस को उद्वेलित करने का काम करती हैं. लेकिन उपन्यास में स्थितियों का बारीक चित्रण एवं अनुभवों की विशद्ता होती है जो निष्चय ही पाठक को एक विराट संसार से जोड़ने का कार्य करती है. जिससे परिस्थितियों की विवेचना के लिए उसके पास अपेक्षाकृत अधिक विकल्प होते हैं. इस तरह किसी भी साहित्यिक कृति का असली महत्त्व उस उद्वेलन से आंका जाना चाहिए जो पाठक के मानस में उमड़ता है तथा प्रकारांतर में जिसकी परिणति सार्थक सामाजिक परिवर्तन के रूप में होती है.

अब जरा इस बात पर भी विचार करके देखा जाए कि उपन्यास या साहित्य की भरपाई, क्या सामाजिक समस्याओं पर विद्वानों द्वारा लिखी गई आकादमिक पुस्तकों द्वारा संभव है. निष्चय ही आकादमिक ज्ञान के अपने लाभ होते हैं. साहित्यिक कृति जिस बात को घुमा-फिराकर, अपरोक्ष तथा प्रतीकात्मक ढंग से पाठकों को समझाने का प्रयास करती है, उसको सीधे-सीधे, अधिक प्रामाणिक ढंग से, कम समय तथा बहुत ही कम शब्दों में लेख अथवा पुस्तक के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया जा सकता है. विज्ञान, प्रौद्योगिकी, आदि अनेक विषयों का ज्ञान हम प्रायः इसी तरह की आकादमिक पुस्तकों से प्राप्त करते हुए आ रहे हैं. इसी प्रकार समाज विज्ञान की पुस्तकों का कार्य व्यक्ति को अपने समाज की विषेशताओं से परिचित कराते हुए उसे अपनी संस्कृति तथा परंपरा के करीब बनाए रखना है. इसके बावजूद इस तरह की पुस्तकें उपन्यास या साहित्य जैसी अन्य संष्लेषणात्मक विधाओं का विकल्प नहीं बन सकतीं. जिस तरह व्यक्तित्व निर्माण की बाजार में मिलने वाली पुस्तकों से इस विषय से संबंधित सूचनाएं तो एकसाथ प्राप्त की जा सकती है. मगर उसके लिए जरूरी समझ और भीतरी आग्रह उन पुस्तकों द्वारा संभव नहीं है. चूंकि नएपन की हर खोज के साथ धैर्य अनिवार्य अपेक्षा की तरह जुड़ा होता है. साहित्य, संगीत तथा अन्य मानवीय कलाएं मस्तिष्क को धैर्य और वैचारिकी से समृद्ध करने का काम भी करती हैं. वे मानवीय संवेदनाओं और ज्ञान के बीच उचित तालमेल बनाए रखती है. जिससे सामाजिक परिवर्तनों को सकारात्मक दिशा तथा भरपूर गत्यात्मकता मिलती रहती हैं. आकादमिक पुस्तकें हमारी वौद्धिकता को तो परिपक्व बनाती में लेकिन वास्तविक विवेकीकरण की स्थिति तक नहीं ले जा पातीं. संक्षेप में साहित्य अथवा मानवीय कलाओं की भरपाई अकादमिक स्तर की पुस्तकों से नहीं की जा सकती. चूंकि एक श्रेष्ठ औपन्यासिक प्रस्तुति में गांभीर्य, विवेचनात्मकता, सूक्ष्मता के साथ-साथ संवेदनाशीलता भी सन्निहित होती है; जिससे उसकी भरपाई साहित्य की अन्य किसी भी विधा, आकादमिक ज्ञान की दूसरी किसी भी धारा द्वारा संभव नहीं है.

यहां एक और सवाल खड़ा हो जाता है कि साहित्य की इतनी अपरिहार्यता और उपयोगिता के बावजूद क्या कारण है कि लोग साहित्यिक पुस्तकों से दूर होते जा रहे हैं? शिक्षा के प्रतिशत में आए सुधार के बाद भी पठनीयता का संकट क्यों बरकरार है? हम फिर साफ कर दें कि घटती पठनीयता अथवा पाठकीय संकट का रचना के आकार से कोई संबंध नहीं है. रचना भले ही कितनी बड़ी हो यदि उसमें पठनीयता का स्तर बराबर बना रहे तो वह अपना पाठक वर्ग भी स्वयं खोज लेती है. अतः साहित्य का भला सोचने वालों की कोशिश घटती पठनीयता का स्तर सुधारने की होनी चाहिए. प्रत्येक बड़ा लेखक अपना पाठक वर्ग साथ लिए चलता है. साहित्यिक रचना अपने पाठक के अंतर्जगत में जितना स्पेस बना पाती है वह उतनी ही सफल मानी जाती है. साहित्य का पाठक प्रायः अंतर्मुखी किस्म का जीव होता है. तमाम विद्रोहप्रियता के बावजूद अपनी सभ्यता, संस्कृति और परंपरा को आगे ले जाने की जिम्मेदारी भी इसी वर्ग की होती है. जब हम यह मान लेते हैं कि समाज की विवेकशीलता पर खतरा है तो अप्रत्यक्ष रूप में हम इसी वर्ग के बौद्धिक ह्रास की ओर इषारा कर रहे होते हैं. और जब हम कहते हैं कि साहित्य और संस्कृति पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं तो परोक्ष में हमारा उददेश्य इसी वर्ग की घटी संख्या पर चिंता व्यक्त करने का होता है. शिक्षा के तीव्र व्यवसायीकरण ने इसी वर्ग को नुकसान पहुचाने का कार्य किया है. समाज की उस संवेदनषीलता को भौंथरा करने का काम किया है जो उपभोक्तावाद तथा मशीनीकरण की मार से समाज को बचा सकती है. समाज के बड़े हिस्से में अपसंस्कृतिकरण के प्रति न तो पर्याप्त चिंता है न इस बारे में सोचकर वह अपना दिमाग खराब करना चाहता है. शायद इसी कारण शहरी क्षेत्र में विशेषकर उन स्थानों पर जहां व्यावसायिक शिक्षण संस्थान पर्याप्त रूप से पनप चुके हैं वहां आकादमिक विषयों के लिए पर्याप्त विद्यार्थी नहीं मिल पाते. एक और समस्या साहित्यिक पुस्तकों का नेटवर्क न होने की है. गांवों और कस्बों की तो बात ही रहने दें बड़े-बड़े शहरों में भी साहित्यिक पुस्तकों की कोई दुकान नहीं है. जहां सामान्य पाठक अपनी पसंद की पुस्तक खरीद सकें. जिस गति से छोटे शहरों और कस्बों से साहित्यिक पत्रिकाएं शुरू होती रहती हैं उस गति से साहित्यिक पुस्तकों की बिक्री के प्रबंध नहीं किए जाते. हर कोई सरकार और बाजार पर अपनी भड़ास निकालकर शांत हो जाता है. यह करीब-करीब मान लिया गया है कि साहित्य किसी को रोटी नहीं दे सकता. सहित्य-सृजन को तो पार्टटाइम जा॓ब माना ही जाता है. बड़े-बड़े साहित्यकार इसी कुंठा के शिकार हैं. इसी के कारण राजेन्द्र यादव जैसों को बड़े उपन्यासों पर संकट नजर आता है और सर विदिया जैसे नामचीन साहित्यकार उपन्यास के अंत की घोषणा करने लग जाते हैं.

विकास के चल रहे प्रयासों में मानवीय कलाओं और साहित्य की उपेक्षा का परिणाम आज हम देख ही रहे हैं कि व्यक्ति सुविधाओं का गुलाम बनता जा रहा है. यहां एक और बात साफ कर दी जाए कि साहित्य या अन्य कलाओं का सुविधाओं से वैर नहीं है. वे उनके चयन में विवेक की भूमिका तथा उनके न्यायिक बंटवारे पर जोर अवष्य देती हैं. अर्थात वे विकास को सामाजिकता के दायरे से बाहर जाने से रोकती हैं. यह मान लेना भी बेमानी होगा कि बढ़ती स्पर्धा और आपाधापी के वातावरण में लंबी रचनाओं के लिए पाठकों का सवर्था अकाल रहा है. अगर ऐसा होता तो औपन्यासिक कृतियां बिक्री के लिहाज से सबसे पीछे होतीं. जबकि हालात बिल्कुल विपरीत हैं. इस तर्क में तो दम हो सकता है कि व्यस्तता के चलते कुछ लोग बड़ी रचनाओं के लिए समय नहीं निकाल पाते. परंतु केवल पाठकों की संख्या द्वारा हम किसी विधा की उपयोगिता का आकलन नही कर सकते. विभिन्न विधाओं के पाठकों की संख्या अलग-अलग हो सकती है. अगर रचना का बड़ा आकार ही पाठकीय संकट का कारण होता तो आज की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा हाइकू, दोहा, सोरठा अथवा वैसी ही कोई छोटी विधा होती. जबकि स्थिति बहुत भिन्न है. अमेरिका जैसे अत्याधुनिक देश में भी जो हमसे कहीं ज्यादा आधुनिक और भौतिक परिवेश लिए हुए हैं, उपन्यास और साहित्य की लोकसत्ता में विश्वास किया है. गत सालों में वहां कई रोचक उपन्यासों का सृजन हुआ है. भारत में भी स्थिति संतोषजनक है तथा पूरा विश्वास है कि आगे भी बनी रहेगी. साहित्य हमेशा समाज का मार्गदर्शक रहा है. उपन्यास तो उसका वरद् पुत्र ठहरा. जिसके कंधों पर सर्वाधिक जिम्मेदारी है. इस जिम्मेदारी पर खरा उतरने के उसे वक्त के साथ-साथ जिन आवश्यक परिवर्तनों से गुजरना पड़ेगा उनसे निःसंकोच गुजरेगा. अतीत में भी वह समयानुसार साथ बदलता रहा है. ध्यान रहे कि इतिहास केवल राष्ट्रों-राज्यों का सगा होता है. वह केवल युद्धों, राजा-महाराजाओं, राष्ट्राध्यक्षों तथा उनकी छिनाल आदतों को जगह दे पाता है. मनुष्यता की स्मृतियों को लंबे समय तक संजोए रखने तथा पीढियों के बीच संवाद की स्थिति बनाए रखने का काम साहित्य और दूसरी मानवीय कलाओं का होता है. साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधा के रूप में उपन्यास ने हमेशा अपनी उपयोगिता सिद्ध की है. आज भी वह अपरिहार्य है; और बिलाशक आगे भी बना रहेगा. लेख का समापन हिंदी के समान रूप से लिखने वाले सुप्रसिद्ध दक्षिण भारतीय साहित्यकार वेणुगोपाल के वक्तव्य से वाक्य उधार लेकर करना चाहूंगा—

‘मनुष्य सोचता बिंबों अथवा चित्रों में है. इसीलिए दार्शनिकों को कथासाहित्य रचना पड़ा. वेद से काम नहीं चला तो पुराण रचे गए. और सिद्धांत-ग्रंथों से काम न चलने पर कहानी, उपन्यास.’

जाहिर है कि उपन्यास का आगमन सामाजिक विमर्श के एक जरूरी माध्यम के रूप में हुआ है. अतः जब तक मानवीय चेतना और मनुष्यता के लिए सोचने वाले लोग हैं तब तक उपन्यास के अस्तित्व को कोई खतरा नहीं है.

ओमप्रकाश कश्यप

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2 responses to “उपन्यास की प्रासंगिकता और सरोकार

  1. उपन्‍यास विधा हमेशा से ही सर्वाधिक पठनीय रही है और आगे भी रहेगी। मेरे अभी दो उपन्‍यास आए हैं और मेरी अन्‍य पुस्‍तकों के बनस्‍पत वे ज्‍यादा पढे गए हैं। लघु कथा का महत्‍व केवल पत्रिकाओं तक ही सीमित है, जब हम कोई पत्रिका पढते हैं तब सर्वप्रथम लघुकथा को खोजते हैं लेकिन उपन्‍यास का अपना स्‍थान है और आपने सही लिखा है कि उपन्‍यास अपने समय का इतिहास ही होता है।

  2. अच्छी पड़ताल करता आलेख….
    हर लेखन अपनी एक पक्षधरता रखता है, और जाहिर है वह किसी भी विधा में हो, अपने पक्ष से सांबंधित समूह विशेषों में अपनी उपयोगिता पाता भी है।
    ऐसे ही लेखक और आलोचकों के समूह बन जाते हैं, जो किसी ना किसी बहाने इस व्यवस्था को अपनी साधनसंपन्नता का मूल्य चुकाते रहते हैं…..

    विधा कोई भी हो वह अपनी जनपक्षधरता में ही कालजयी और उद्देश्यपूर्ण हो सकती है, और बची रह सकती है…..

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