भारतीय समाज: व्यवस्थाएं एवं मानव नियति


 

भारतीय समाज: व्यवस्थाएं एवं मानव नियति

 

 

व्यवस्थाएं सभ्य समाज की प्रबुद्धता का प्रतीक होती हैं. प्रत्येक कल्याणकारी समाज अपनी सदस्य इकाइयों की सुखसुविधा तथा उनके बीच संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण के लिए अनुकूल व्यवस्थाओं का चयन करता है. अपने दायित्वों के निर्वहन की प्रक्रिया में ईमानदार व्यवस्था, सदस्य इकाइयों के प्रति समानतापूर्ण व्यवहार करते हुए, उन्हें विकास के एकसमान एवं न्यायसंगत अवसर उपलब्ध कराती है. कल्याणकारी राज्य की व्यवस्थाओं का स्वरूप पूर्णतः लोकतांत्रिक होता है. उनकी प्रतिबद्धता किसी विचारधारा विशेष, सत्ताशिखर अथवा शक्तिकेंद्र के प्रति न होकर, संपूर्ण समाज के प्रति होती है. अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ये अपने विधान का उत्तरोत्तर युगानुकूल परिमार्जन तथा उसे अधिकाधिक नैतिक स्वरूप प्रदान करने हेतु निरंतर प्रयत्नशील रहती हैं. ये परंपराओं के अनुकूलन तथा उपलब्ध ज्ञानसंपदा तथा अनुभवों के योग से समरस सामाजिकसांस्कृतिक वातावरण तैयार करती हैं, जहां सभी को अपने ऐच्छिक विकास एवं वैचारिक अभिव्यक्ति के समान अवसर सहज ही उपलब्ध होते हैं. यह जानते हुए भी कि समाज की प्रत्येक इकाई को संतुष्ट कर पाना असंभव है, ये अपने आचरण में ऐसी पारदर्शिता विकसित कर लेती हैं, जिससे असंतुष्ट इकाइयों को भी यह विश्वास होने लगता है कि बहुमत के आधार पर लिया गया निर्णय बृहत्तर समाज के हित में होने के साथसाथ सर्वाधिक समीचीन भी है. इसलिए उस निर्णय के प्रति उनकी भी सहज स्वीकृति बन जाती है.

स्वाधीन भारत में कार्यकारी व्यवस्थाओं को कार्यक्षम एवं जनोन्मुखी बनाए रखने के सभी आवश्यक प्रावधान हमारे संविधान में मौजूद हैं. एक तरह से हमारा संविधान मनुष्यता के सभी निर्दिष्ट प्रतिमानों के अनुरूप है. यह सभी को जीवनयापन एवं विकास के समानुकूल अवसर प्रदान करने में सक्षम है. आमतौर पर ये उपलब्धियां सैद्धांतिक व्यवस्थाओं या कागजों तक सीमित रह जाती हैं, जिसे इस व्यवस्था की विसंगति कहा जा सकता है. व्यवहार में जब व्यवस्थाएं अपने कार्यकारी रूप में प्रकट होती हैं या जब तक ऐसा समय आता हैवे प्रायः अपने लक्ष्य से भटक चुकी होती हैं. हमारे दौर की एक बहुत बड़ी त्रासदी यह भी है कि यहां आम आदमी व्यवस्था द्वारा पूरी तरह उपेक्षित है. उसके नाम पर या उसके लिए बनने वाली योजनाएं सामान्यत: उसकी सहमति/ सूचना के बिना ही गढ़ ही जाती हैं. व्यवस्थाओं का निर्माण मुट्टीभर लोगों द्वारा मुट्ठीभर लोगों की स्वार्थपूर्ति के लिए किया जाता है, उन लोगों के लिए जो पहले से ही मजबूत स्थिति में हैं. यह स्थिति कमोबेश पूरी दुनिया में है. भारत के संदर्भ में यह इसलिए विचारणीय हो जाती है, क्योंकि यहां की तीनचौथाई जनता गरीबी रेखा से नीचे का जीवनयापन कर रही है. कुछ ही महीने पहले सरकार द्वारा गठित एक आयोग ने अपने अध्ययन में पाया था कि देश के बीस करोड़ से अधिक नागरिक मात्र बीस रुपये प्रतिदिन तक की आय पर जीवन बसर करते हैं, जो सरकार द्वारा निर्धारित गरीबी के मानकों से काफी नीचे हैं. यह स्थिति तब है जब हमारी ख्याति विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में है; और हमारे ही समाज के चंद लोग निकट भविष्य में भारत को दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में उभरने का दावा करते रहते हैं. उस समय वे इस तथ्य को पूरी तरह नजरंदाज कर जाते हैं कि जिस रास्ते पर चलते हुए हम विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्ति बनने का दावा कर रहे हैं, अथवा हमें ऐसा सपना दिखाया जा रहा है उसी रास्ते का अनुसरण करते हुए अमेरिका की करीब चालीस विशाल आर्थिक कंपनियां खुद को दिवालिया घोषित कर चुकी हैं. अब विश्वसमुदाय में अपनी साख बचाने के लिए अमेरिकी सरकार, राहत की बैशाखी के सहारे उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने की कोशिश में जुटी है.

उल्लेखनीय है कि कानूनी बंदिशें आम आदमी पर ज्यादा शिद्दत से लागू होती हैं. सीधेसीधे कहें तो थोप दी जाती हैं. इसके साथसाथ नागरिककर्तव्यों एवं सामाजिक शुचिता के पालन के लिए आम आदमी से हमारी अपेक्षाएं, उसकी हैसियत के अनुपात से कुछ अधिक ही होती हैं. इन अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए धर्म, राष्ट्रभक्ति, क्षेत्रीयता, प्रारब्ध आदि के नाम पर उससे परिस्थितियों के प्रति समझौतावादी रुख अपनाते रहने की अपेक्षा की जाती हैं. इसलिए कि हम जानते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सत्ता आम आदमी के मताधिकार द्वारा ही वैधता प्राप्त करती हैं. चूंकि प्रबुद्ध जनमानस अकल्याणकारी व्यवस्था के दोषों को पहचान कर, प्रतिकार स्वरूप उस व्यवस्था को बदलने में समर्थ होता है अथवा विरोध करते हुए अप्रीतिकर कल्याणकारी व्यवस्था को परेशानी में डाले रखता है, अतः ये व्यवस्थाएं मनुष्य के विवेकबोध से घबराती हैं. ये नहीं चाहती कि समाज के सामान्य विवेकबोध का विकास हो. जिससे वह सत्यासत्य का विवेचन कर, उपयुक्त निर्णय लेने में सक्षम हो सके. इसलिए ये जनता को प्रबुद्ध जनमानस में ढालने की अपेक्षा उसे एक अविवेकी भीड़ में बदल देने की अनवरत कोशिश करती रहती हैं.

स्वार्थी व्यवस्थाएं सदैव इस प्रयास में रहती हैं कि समाज का सामान्य विवेक कुंठित हो जाए, अथवा वह अनेकानेक विचारधाराओं, मतमतांतरों के संघर्ष में फंसकर निष्क्रयनिष्प्रभावी हो जाए. इस दिशा में सफलता प्राप्त करने के लिए ये समाज के अंतर्विरोधों को पाटने अथवा समन्वय हेतु परस्पर विरोधी शक्तियों के बीच संवाद स्थापित करने की कोशिश करने के बजाय, उनके अंतर्विरोधों को हवा देने लगती हैं. अकल्याणकारी व्यवस्था की कोशिश मनुष्य की संवेदनशीलता और संवादप्रियता को नष्ट कर, उसे अपनी ही तरह क्रूर, स्वार्थी एवं विलासी बना देने की होती है. ताकि वह संपूर्ण समाज के व्यापक हितों की अपेक्षा मात्र अपने विकास और सुखसुविधाओं के बारे में ही सोच सके. बड़ी चतुराई से मनुष्य की बौद्धिक लालसाओं एवं गतिविधियों के केंद्र में उन चीजों को प्रवेश करा दिया जाता है, जिनका मनुष्य के विकास से दूरदूर का रिश्ता नहीं होता. विश्वविद्यालयों में ज्योतिष की पढ़ाई तथा धर्म बनाम आस्था संबंधी निरर्थक एवं अंतहीन बहसों के थोपे जाने की कोशिशों को इसी रूप में लिया जाना चाहिए. सामान्य चरित्र के अभाव में, समाज में छोटेछोटे अनेक शक्तिकेंद्र पनपने लगते हैं. स्वार्थी व्यवस्था इन लघुशक्ति केंद्रों को इनके क्षुद्र हितों में उलझाकर, अपनी स्वार्थपूर्ति में निमग्न रहती है. परिणामस्वरूप समाज की रचनात्मक ऊर्जा का उपयोग गैर उत्पादक कार्यों में होने लगता है. इससे समाज में अंतर्द्वंद्व पनपने लगते हैं, राजनीति छोटेछोटे टापुओं में बंट जाती है, जो प्रकारांतर में विकास की गति को बाधित करने का काम करते हैं.

कोई भी व्यवस्था जब सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए करने लगती है, तब वह न केवल अनैतिक बन जाती है, बल्कि सत्ता में बने रहने का औचित्य भी खो देती है. इस लक्ष्यच्युत व्यवस्था को जनमानस के सामान्य विवेकबोध से निंयत्रित किया जा सकता है. जरूरत पड़ने पर इसे बदला भी जा सकता है. परंतु विखंडित जनमानस इस कार्य को करने में सक्षम नहीं होता. इस कारण अकल्याणकारी व्यवस्था को सत्ताशिखर पर बने रहने तथा मनमानी करने का (कु)अवसर मिल जाता है. प्रकारांतर में जिसकी परिणति एक निरंकुश सत्ता और जड़ समाज के रूप में होती है. जैसे बीसवीं शती के नवें दशक का मंडलमंदिर(मंडलकमंडल) आंदोलन मूलतः सामाजिक न्याय, तदनुरूप अवसरों और संसाधनों में समाज के प्रत्येक वर्ग की समान भागीदारी का मुद्दा था, जिसको केवल सरकारी नौकरियों में आरक्षण तक सीमित कर दिया गया. आगे चलकर आरक्षण को उच्चतम न्यायालय की स्वीकृति मिलने तथा सत्ता प्राप्ति के लिए अल्पमत सवर्ण मतों के साथसाथ पिछड़े वर्ग के मतों की अनिवार्यता को समझते हुए, उसे केवल आस्थाओं के मंदिर(राममंदिर) तक समेट दिया गया. नए जमाने में लोग मंदिर के नाम पर इकट्ठा होने में हिचकिचाएं नहीं, इसलिए पुन: उसको राष्ट्रीयअस्मिता का प्रतीक घोषित कर दिया गया. यही नहीं. सामान्यबोध को कुंठित करने के लिए आस्थाओं के प्रश्न को तर्कातीत भी बता दिया गया. इस तर्क को बड़ी चतुराई से छिपा लिया गया कि हिंदु धर्म जिन दार्शनिक मान्यताओं पर टिका रहकर, सहस्राब्दियों से सम्मानीय एवं अनुकरणीय बना हुआ है, उनमें ‘तर्क’ को वही स्थान प्राप्त है, जो आस्था को. ‘मुंडेमुडे मर्तिंभिन्ना’ हमारे वैदिक वाङ्मय का ही सूक्ति वाक्य है. धर्मदर्शन परंपरा में भक्ति(आस्था) को साधारण लोगों का धर्म बताया गया है. जबकि प्रबुद्ध लोग सभी आध्यात्मिक जागतिक प्रश्नों पर अपने बुद्धिविवेक के अनुसार तर्क कर उन्हें स्वीकारअस्वीकार कर सकते हैं. ईश्वर की सत्ता पर विश्वास न करते हुए भी आध्यात्मिक बना जा सकता है, यह हमारी दर्शनपरंपरा ही हमें सिखाती है. एक ओर तो धर्म के ठेकेदारों द्वारा आस्थाओं को तर्कातीत बताकर हमारी सहज बौद्धिक जिज्ञासाओं का गला घोंटा जा रहा है, दूसरी ओर बाजार अपने खानपान, पहनावे और अन्य सुविधाओं के माध्यम से उन चीजों को हमारी प्राथमिकता में ला रहा है, जिनका हमारे विकास से दूरदूर का वास्ता नहीं है. यह बात आग्रहपूर्वक दिमाग में बिठाई जा रही है कि भाषा का काम केवल संवादवहन तक सीमित है. इसलिए सुविधा के नाम पर शब्दों को तोड़नामरोड़ना, अंग्रेजी के शब्दों की मनमानी घुसपैठ करना सब चलेगा. प्रत्येक भाषा अपने साथ पूरी सामाजिक परंपरा लेकर चलती है, वह अपने आप में स्वयं सांस्कृतिक दस्तावेज होती हैइस तथ्य की जानबूझकर उपेक्षा की जा रही है.

धर्म और आस्था के नाम पर बहुमत बनाने का प्रयास, भारतीय लोकमानस को प्रबुद्ध नागरिकता में ढालने के बजाय उसे साधारण अनुयायी बनाए रखने की कोशिश मात्र है. यह कार्य विभिन्न धर्मसत्ताएं और बाजार अपनेअपने स्वार्थ के लिए समानरूप से करते हैं. धर्मसत्ताएं इसलिए ताकि वे गंभीर धार्मिकदार्शनिक प्रश्नों से बचीं रहें. तर्क से कटे जड़ अनुयायियों की भीड़ उनकी स्वार्थसत्ता को चुनौती न दे सके. बाजार इसलिए ताकि वह व्यक्ति के आलोचनासामर्थ्य को न्यूनतम कर सके, जिससे लोग उत्पादों के औचित्य और उनके वास्तविक मूल्य को लेकर कोई प्रश्न न उठा सकें. यानी सौडेढ़सौ वर्ष पहले तक जो कार्य संहिताओं के माध्यम से किया जाता था, वही आज आस्थाओं के मूर्तिकरण द्वारा किया जा रहा है. चूंकि अकल्याणकारी व्यवस्थाएं प्रबुद्ध जनमानस के बीच ज्यादा दिन नहीं पातीं, वे केवल साधारण लोगों के कंधों पर ही सवारी गांठ सकती हैं, इसलिए वे विवेकीकरण की संभावनाओं को लगातार टालती रहती हैं. यह एक त्रासद स्थिति है कि आम आदमी के जीवन में गत्यात्मकता सिर्फ नारों के रूप में ही आती है. प्रायः हर व्यवस्था लोकलुभावन नारों या जनभावनाओं के उभार के बाद सत्ता में आती है; तथा निहित स्वार्थों के कारण वह लक्ष्य से बहुत जल्दी भटक जाती हें. तो क्या अपने कर्तव्यपथ से भटकाव हर व्यवस्था की नियति है? मानव नियति का पर्याय क्या व्यवस्था के हाथों छला जाना ही है? क्या ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो व्यवस्था को उत्तरदायी बना सके? आम आदमी की किस्मत क्या सिर्फ व्यवस्था के हाथों का खिलौना बनकर रहना है, जिससे वह जैसा और जब तक जी चाहे तब तक खेल सके?

चूंकि व्यवस्थाएं सत्ताकेंद्रों द्वारा संचालित एवं नियंत्रित होती हैं, इसलिए उसमें सत्ता केंद्रों के दुर्गुणों और उनकी दुर्बलताओं का प्रभाव पड़ना भी स्वाभाविक होता है. यद्यपि लोकतांत्रिक व्यव्सथा में सारी नियामक शक्तियां जनता के हाथों में सुरक्षित रहती हैं. किंतु लोकतांत्रिक समझ के अभाव में या मूल मुद्दों से भटकाव के कारण वह इन शक्तियों का क्रियान्वयन नहीं कर पाती. समाज में सामान्य विवेकबोध का न होना भी इस असंगति का प्रमुख कारण है. जिसके कारण समस्याओं के साथसाथ मतों का भी विभाजन हो जाता है. उस अवस्था में वे संपूर्ण समाज की समस्या न होकर वर्ग विशेष की समस्याएं बन जाती हैं. जैसे लैंगिक भेदभाव के मुद्दे पर स्त्रियां जितनी उद्वेलित होती हैं, उतना पुरुष नहीं होते. अस्पृश्यता और वर्गभेद की समस्याओं से केवल दलितों और पिछड़ों को दोचार होना पड़ता है. सामाजिक वर्गव्यवस्था में ऊंचे पायदान पर स्थित लोगों के लिए तो संभवतः अस्पृश्यता और वर्गभेद जैसी कोई समस्याओं का अस्तित्व ही नहीं है, परंतु जब दलित वर्ग अपनी सामाजिक प्रस्थिति में गुणात्मक सुधार लाने के लिए संगठित होकर संघर्ष का रास्ता अपनाता है तो सवर्णों को अपने भविष्य की चिंता सताने लगती है. प्रतिक्रिया में वे स्वयं भी संगठित होने का प्रयास करते हैं. इसी प्रकार मजदूरों की समस्याएं मात्र श्रमिक वर्ग को आहत कर पाती हैं. यही स्थिति समाज के दूसरे वर्गों के साथ है. सबका कारण यह है कि स्वाधीनता के पचास से अधिक वर्ष गुजर जाने के पश्चात भी भारतीय समाज में किसी सामान्य सोच(एकात्मकता) का विकास नहीं हो पाया है. परिणामस्वरूप हम बहुमत के बजाय बंटे हुए मतों के आधार पर सत्ताकेंद्रों का निर्माण करते हैं, जो अपने परिणाम में भले की प्रभावशाली नजर आए, वास्तविक रूप में वह भटकावग्रस्त और प्रभावहीन होती है.

दूसरी ओर व्यवस्था के शिखर पर आसीन शक्तियों का चरित्र हर युग में प्रायः एक जैसा रहा है. व्यवस्थाएं बदली हैं. समय के साथसाथ उनके चेहरे मोहरे में भी परिवर्तन आया है. मगर उसका मूल चरित्र जैसा आजादी के पहले था, लगभग वैसा ही आज तक बना हुआ है. परस्पर प्रतिरोधी शक्तियों के बीच संवाद और दोनों तरफ से हस्तक्षेप करने की समान छूट, न पहले थी, न वर्तमान व्यवस्था में उपलब्ध है. सामंतशाही और राजशाही के दौरान निर्णय ऊपर से लिए जाते थे. तब की प्रजा को निर्णय में हस्तक्षेप करने के विशेषाधिकार प्राप्त नहीं थे. लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत चुनी गई सरकारें यद्यपि लोकेच्छा का प्रतिनिधित्व करती हैं, परंतु एक बार चुने जाने के बाद लोकप्रतिनिधि जिस प्रकार से ‘लोक’ की उपेक्षा करते हैं, यह किसी से भी छिपा नहीं है. यद्यपि जनता को इस व्यवस्था में अधिक अधिकार प्राप्त है. सच यह भी है कि लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकारें प्रायः जनता के दबाव में रहती हैं. परंतु यह दबाव सरकार के निर्णयों को बहुत कम मामलों में प्रभावित कर पाता है. यह दबाव सीमा के भीतर ही रहे, इसके लिए व्यवस्थाएं अलगअलग से अभियान चलाती रहती हें. जिससे समाज अलगअलग सामान्य प्राथमिकता से युक्त वर्गों में बंट जाता है. ऐसे समाज में सामान्य विवेकबोध का पूर्ण विकास नहीं हो पाता. दूसरी ओर लगातार कई मनमाने निर्णय लेने के बाद, सत्ताकेंद्रों पर उपस्थित लोग, स्वयं को शक्ति केंद्र भी समझने लगते हैं. आगे चलकर वे अपने पद और प्रतिष्ठा का मनमाना दुरुपयोग करते रहते हैं. इन लोगों की सत्ता समाज की अज्ञानता एवं गलतफहमी पर टिकी रहती है, अर्थात ये नहीं चाहते कि एक प्रबुद्ध समाज का जन्म हो या समाज अपनी स्थिति को पहचाने.

समाज को भ्रमित रखने के लिए व्यवस्थाएं लोकलुभावन नारों का सहारा लेती हैं. वे स्वयं को समाज का नीतिनियंता प्रदर्शित करती है. शिक्षा, समानता, सद्भाव, आर्थिक विकास, सभ्यता एवं संस्कृति जैसे कई विषय हैं जिन्हें लोकलुभावन नारों के बीच जनता के बीच प्रस्तुत किया जाता है. कभीकभी सत्ताकेंद्र से हट जाने का भय और लोकसमर्थन का गिरता ग्राफ भी व्यवस्था को अलोकतांत्रिक कदम उठाने के लिए बाध्य कर देता है. दूसरे शब्दों में व्यवस्थाएं यथास्थिति कायम रखने और सत्ता में बने रहने के लिए हताशापूर्ण कार्रवाहियों का सहारा भी लेती है. यह स्थिति किसी भी प्रकार के समाज में हो सकती है. परंतु प्रौद्योगिकी की दृष्टि से पिछड़े समाजों में व्यवस्थाओं की मनमानी अधिक देखने को मिलती है. विकासशील समाजों में जहां उन्नत प्रौद्योगिकी का तेजी से आगमन होता है, व्यवस्थाएं अक्सर दोगली भूमिका निभाती हैं. वे जनमत के दबाव के कारण लोक हितैषी होने का मुखौटा धारण कर लेती है यद्यपि उनकी स्वाभाविक निष्ठा पूंजीपतियों और विभिन्न शक्तिकेंद्रों के प्रति अधिक होती है.

गरीब और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े समाजों में लोकतांत्रिक समझ का विकास प्रायः हो नहीं पाता. रोटी के लिए किए जाने वाले संघर्षों में उन्हें उनके अधिकारों को समझने और फिर उनके लिए संघर्ष करने का अवसर ही नहीं मिलता. ऐसी अवस्था में वास्तविक परिवर्तन की स्थिति लगातार टलती चली जाती है. स्पष्ट है कि मानव नियति को बदलने के लिए समाज का विवेकीकरण एक विकल्पहीन अनिवार्यता है. समाज के विवेकीकरण में मीडिया और संचार के दूसरे माध्यमों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती है. पिछले कुछ वर्षों से देश में मीडिया ने तेजी से प्रगति की है. परंतु एक विडंबना की भांति समस्त संसाधनों पर आज भी शक्ति एवं सत्ताकेंद्रों का दबदबा बना हुआ है. आम आदमी मीडिया की निगाह में आज भी उपेक्षित है. जबकि मीडिया आज ऐसा सशक्त माध्यम है जो समाज को विवेकीकरण की ओर ले जा सकता है. उसको राह दिखा सकता है.

स्वविवेकीकरण के दौरान समाज अपने अंतर्विरोधों पर नियंत्रण रखते हुए, प्रतिक्रियात्मक शक्तियों को सही दिशा देता है. जिससे विध्वंसक कार्यों में खप रही ऊर्जा का उपयोग रचनात्मक कार्यों हेतु होने लगता है. अतएव संचार माध्यमों सहित सभी प्रबुद्ध लोगों की यह जिम्मेदारी है कि वे समाज की स्वविवेकीकरण की प्रक्रिया में यथासंभव सहयोग देते रहें. उसी अवस्था में यह समाज एक सर्वकल्याणकारी व्यवस्था की प्राप्ति की ओर बढ़ सकता है. तभी मानव नियति पर छाया कुहासा हट सकता है.

ओमप्रकाश कश्यप

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