राबर्ट ओवेन : आधुनिक सहकारिता आंदोलन का जन्मदाता-दो

अमेरिका में सहकार बस्तियों की स्थापना

[इस आलेख के पहले हिस्से में हमने दुनिया के प्रखर समाजवादी विचारक, उद्धमी तथा सहकारिता के जनक राबर्ट ओवेन और उसके जीवनसंघर्ष को समझा. ओवेन का कार्यक्षेत्र और उसके विचारों का भी विहंगावलोकन किया. इस कड़ी में ओवेन के विचारों के साथ-साथ हम उसके द्वारा अमेरिका में सहकारिता के प्रचार-च्रसार और उसके द्वारा वहां की अर्थव्यवस्था में किए गए योगदान के बारे में चर्चा करेंगे. – ओमप्रकाश कश्यप]
न्यू लेनार्क पर ओवेन का प्रभाव घटता जा रहा था. उसके हिस्सेदार भी छोड़कर जा चुके थे. किंतु नैतिकता और सहजीवन के प्रति ओवेन का विश्वास कम नहीं हुआ था. उसकी निगाह अब यूरोप से बाहर के देशों पर लगी थी. इसी बीच ओवेन की ख्याति अमेरिका पहुंची और वहां न्यू हा॓रमनी जाने के लिए ओवेन को अमेरिका का निमंत्रण प्राप्त हुआ. ओवेन ने न्यू लेनार्क छोड़ने का फैसला कर लिया. इस फैसले के पीछे इंग्लैंडवासियों की नए प्रयोगों के प्रति उदासीनता भी थी. यूं तो सहजीवन पर आधारित बस्तियां बसाने के लिए स्का॓टलैंड, आयरलैंड आदि प्रांतों से भी प्रस्ताव आए थे, मगर ओवेन को वहां की परिस्थितियों में कोई अंतर नजर नहीं आया. 1824 में ओवेन अटलांटिक महासागर पार करके हारमनी(Harmony) पहुंचा. वहां उसका जोरदार स्वागत किया गया. 1825 में न्यू लेनार्क के प्रयोगों को आगे बढ़ाने के लिए उसने तीस हजार पाउंड में न्यू हारमानी, इंडियाना नामक स्थान पर कई एकड़ जमीन खरीदी. जहां उसने न्यू लेना॓र्क के प्रयोगों को आगे बढ़ाने के ध्येय से एक नई बस्ती की स्थापना की. कुछ ही महीनों में न्यू हा॓रमनी की ख्याति दुनिया-भर में फैल गई. वहां मिली सफलता से उत्साहित होकर ओवेन ने ओरिबिस्टन(Oribiston) नामक स्थान पर वैसी ही एक और बस्ती की आधारशिला रखी. प्रारंभिक सफलताओं से उत्साहित होकर ओवेन ने कुछ अन्य स्थानों पर भी बस्तियां बसाईं. उनके नाम हैं क्वीन वुड(Queen Wood) रैलटाइन (Ralatine) आदि. वे सभी बस्तियां सहजीवन के सिद्धांत के आधार पर बसाई गई थीं. पहले की भांति इन बस्तियों के माध्यम से भी, ओवेन का सपना शोषण एवं वर्ग-मुक्त समाज की स्थापना करना था.
वह ऐसे समाज की कल्पना करता था जहां सभी पारस्परिकता पर आधारित जीवन-यापन करें. एक बस्ती में 300 से 2000 तक सदस्य हों, जिनके पास एक हजार एकड़ से लेकर 1500 एकड़ तक कृषि-योग्य जमीन हो. बस्ती के सदस्यों के आवास को छोड़कर रसोईघर, भोजनालय, सभा भवन, स्कूल, पुस्तकालय, आटा चक्की, कारखाने आदि सामूहिक हों और इनके लिए एक समचतुर्भुज के आकार की विशाल इमारत हो. ओवेन का सोचना था कि इस प्रकार की व्यवस्था से जीवन में धन की महत्ता घटेगी—जो मनुष्य में संग्रह की आदत के पनपने का प्रमुख कारण है.
सन 1825 से 1829 तक ओवेन के सिद्धांत के आधार पर बसाई गई कुल सोलह बस्तियों में न्यू हा॓रमनी सबसे पहली और प्रसिद्ध थी. लेकिन क्षेत्रीय परिस्थितियों के कारण बस्तियों को चलाने में समस्याएं आने लगीं. दरअसल न्यू हारॅमनी जैसे छोटे से प्रांत में एक साथ अनेक वर्गों के लोग रहते थे. उन सबकी अलग समस्याएं थीं. इसलिए न्यू हारमनी का प्रयोग अधिक लंबा न खिंच सका. अमेरिका में ओवेन के प्रयोगों को पहली ठेस उस समय मिली जब उसका एक अमेरिकी साझेदार अपनी पूंजी सहित ओवेन से अलग हो गया. उल्लेखनीय है कि इन सभी कार्यों में ओवेन की ढेर सारी पूंजी लगी थी; जिससे उसका व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित हुआ था. उसकी कुल पूंजी का तीन-चौथाई हिस्सा न्यू हा॓रमनी नामक बस्ती की बसाने में पहले ही खर्च हो चुका था.
ओवेन का मानना था कि सहजीवन पर आधारित व्यवस्था की सफलता उसके प्रयासों की व्यापकता में ही संभव है. अकेले व्यक्ति की सीमाएं होती हैं. अतः ऐसे प्रयासों की सफलता के लिए समाज के दूसरे लोगों को भी आगे आना होगा. सरकार भी तो सबसे अधिक जिम्मेदारी है ही. यही सोचते हुए उसने सरकार से भी मदद मांगी थी. मामला संसद-पटल पर भी रखा गया. मगर अव्यावहारिक मानते हुए उस प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया गया.
ओवेन द्वारा बसाई गई बस्तियों की खासियत थी कि वहां का जीवन सामूहिक एवं सहयोग पर आधारित था. पूरी बस्ती एक बृहद परिवार के समान थी; जिसके सदस्यों के सुख और दुख साझे थे. महत्त्वाकांक्षाओं में बराबरी थी. यहां तक कि उनके सपनों और संकल्पों पर भी सामूहिकता का प्रभाव था. ओवेन की स्पष्ट धारणा थी कि आदर्शोंन्मुखी समाज में सामाजिक संबंधों का आधार लाभ के स्थान पर सेवा होना चाहिए. वहां के कार्य व्यापार में पारदर्शिता एवं समसहभागिता हो, तभी शोषण से मुक्ति संभव है. ओवेन उन बस्तियों को सहजीवन के आदर्श के रूप में स्थापित करना चाहता था. ओवेन समर्थक समाजवादियों के समूह गान में सहजीवन के आदर्शों की झलक सहज ही देखी जा सकती है. यह गीत ओवेन द्वारा स्थापित बस्तियों में बड़े ही मनोयोग से गाया जाता था—
‘भाइयो उठो! अतुलनीय प्रेम से सराबोर और परमसत्य से आभासित दिन के दर्शन करो. उठकर देखो, मनुष्यता प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सामुदायिक जीवन का आनंद और आशीर्वाद लेने के लिए उत्सुक है. अब न्याय की जीत होगी. ताकतवर के दमन का अंत होगा, सार्वत्रिक आनंद ही आनंद होगा.’
बीस वर्ष तक लगातार वह सामूहिक जीवन की सफलता के लिए काम करता रहा. मगर धीरे-धीरे असफलता साफ नजर आने लगी, कारण कि इन बस्तियों में बसने पहुंचे लोगों में अधिकांश लोग ऐसे थे जिन्हें ओवेन के सिद्धांतों में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उनसे बहुत तो अपराधी मनोवृत्ति के थे और सुरक्षित ठिकाने की खोज उन्हें उन बस्तियों तक ले गई थी. नाकारा और कामचोर किस्म के लोगों को सिर छिपाने के लिए ओवेन द्वारा बसाई गई बस्तियां बहुत अनुकूल थीं.
दूसरी समस्या वहां पर समर्पित कार्यकर्ताओं की थी. उन बस्तियों के कुशल संचालन के लिए जिस प्रकार के स्वयं सेवकों की आवश्यकता थी, उनका वहां सरासर अभाव थे. हालांकि बस्तियों में आने वाले कुछ लोग सचमुच ही ओवेन के विचारों को समर्पित होकर वहां पहुंचे थे. मगर अधिकांश केवल शौकिया, वक्त बिताने के लिए वहां चले आते थे. न्यू हारमनी के कुछ सदस्य लोकतांत्रिक परंपरा से निकलकर आए थे, और व्यवस्था में खुलापन लाना चाहते थे. उन्हें ओवेन का एकाधिकार स्वीकार नहीं था. ध्यातव्य है कि उन बस्तियों में ओवेन की स्थिति परिवार के उस वुजुर्ग के समान थी, जिसे परिवार के बाकी सदस्य उपेक्षित करने लगते हैं. परिणाम यह हुआ कि ओवेन द्वारा बसाई गई बस्तियों में समस्याएं आने लगीं. जा॓न कर्ल के शब्दों में—
‘बस्ती (न्यू हा॓रमनी) का गठन उसके सदस्यों के उतावलेपन के साथ हुआ था. इसके कारण एक तरह से वे अपने पतन की घोषणा कर ही चुके थे. शायद उनका आपस में मिलना ही दुर्भाग्यपूर्ण था. वास्तव में सहकारिता के आधर पर गठित वह समूह उसकी भावना से कोसों दूर था. नौ सौ से अधिक लोगों के उस समूह का सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यही था कि सहजीवन की शुरुआत करने से वे एक-दूसरे को जानते तक नहीं थे. उनमें जगह-जगह से, विभिन्न पेशों, परिवेश से आए तरह-तरह के लोग सम्मिलित थे, जिनमें कामकाजी परिवार, मध्यवर्गी बुद्धिजीवी तथा स्वयं को प्रगतिशील कहने वाले घुम्मकड़ किस्म के बुद्धिजीवी आदि सम्मिलित थे. सामूहिक बस्तियों का गठन भारी अनुभवहीनता का शिकार था. जिसका परिणाम उनमें लड़ाई-झगड़े और कलहबाजी के रूप में देखने को मिला. विभिन्न पृष्ठभूमियों, जातियों से संबद्ध लोगों ने आपस में लड़-झगड़कर अपने लिए दूसरों के मन में वैमनस्य की भावना भर दी थी, जिसका निदान असंभव था. उनके आपसी मनमुटाव इतने बढ़ चुके थे कि अंत में जब सामूहिक बस्तियों का प्रयोग असफल होने की घोषणा हुई और लोग वापस लौटने लगे, तो भी उनके पारस्परिक झगड़े लंबे समय तक चलते रहे. अंततः जमीन का बंटवारा कर, न्यू हा॓रमनी के निवासी अनेक सहकार बस्तियों, परिवारों में बंट गए.’
न्यू हा॓रमनी का प्रयोग असफल होने के पश्चात ओवेन ने मैक्सिको में नए सिरे से फिर कोशिश की. वहां गरीबी अनुपात अधिक होने के कारण उसको सफलता की आस अधिक थी. लेकिन आशा के विपरीत मैक्सिको में उसका सामना परंपरावादी चर्च से हुआ, जिसका वहां की गरीब जनता पर अत्यधिक प्रभाव था. परिणाम यह हुआ कि ओवेन अमेरिका से ऊबने लगा. सन 1828 में वह वापस इंग्लैंड के लिए रवाना हो गया. लेकिन तब तक इंग्लैंड की परिस्थितियां भी बदल चुकी थीं. समाजवादी विचारधारा तेजी से अपनी पकड़ बना रही थी. विलियम थामसन जैसे बुद्धिजीवी लोकतांत्रिक समाजवाद की नई व्याख्याएं गढ़ रहे थे.
सहकारिता पर नए प्रयोगों का सिलसिला प्रारंभ हो चुका था. मजदूरों के संगठन बनने लगे थे. समाजवादी विचाधारा को आधार मानकर नए-नए उभरे चार्टिस्ट आंदोलनकारी संघर्ष के रास्ते सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने का मन बना चुके थे. उन्होंने एक के बाद एक तीन बड़ी हड़तालें करके सरकार के सामने मुश्किलें खड़ी कर दी थीं. जिससे उन्हें लग रहा था कि वे शीघ्र ही सत्ता पर सवार होकर बहुत आसानी से बदलाव के लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे. ओवेन द्वारा बसाई गई बस्तियों का लगातार अवसान हो रहा था.
ध्यातव्य है कि ओवेन द्वारा आदर्शोन्मुखी समाज की यह संकल्पना नई या अनोखी नहीं थी. ना ही वैसा सपना देखने वाला वह अकेला बुद्धिजीवी-विचारक था. बल्कि इस तरह की आदर्शोन्मुखी समाज की संकल्पना उससे करीब साढ़े बाइस सौ वर्ष पहले प्लेटो भी कर चुका था. जा॓न का॓ल्विन, था॓मस मूर, रूसो आदि ने भी आदर्श समाज को लेकर कुछ इसी प्रकार की साधु-संकल्पनाएं की थीं. ओवेन यदि अपने पूर्ववर्ती विचारकों से हटकर और बढ़कर था तो इस कारण कि वह कोरा सिद्धांतकार नहीं था, बल्कि विचारों को मूर्त रूप देने वाला सच्चा एवं संकल्पधर्मी इंसान था. इस तरह कुछ मामलों में वह मौलिक भी था. उसने न केवल वर्गहीन और समानता पर आधारित समाज का सपना देखा, साथ ही अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसने अनेक सफल प्रयोग भी किए थे. यह बात अलग है कि सुधार कार्यक्रमों में उसे जो कामयाबी प्रारंभ में मिली, वह बाद में लगातार घटती चली गई. क्योंकि जिस समाज का सपना ओवेन की आंखों में बस्ता था, तत्कालीन परिस्थितियां उसके विपरीत थीं. बावजूद इसके ओवेन की सफलताओं को नजरंदाज कर पाना मुश्किल है.
ओवेन पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का विरोधी था. ओवेन के प्रयोग की खिल्ली उड़ाई गई. उसे अर्धविक्षिप्त और सनकी कहकर उपहास का पात्र बनाया गया. ओवेन को हालांकि समाजवाद का समर्थक माना जाता है. यह भी माना जाता है कि समाजवादी(Socialist) शब्द का पहला प्रयोग उसी ने किया था. वह कुशल लेखक था, अपने विचारों को जनमानस तक पहुंचाने के लिए उसने Cooperative Magazine शीर्षक से एक पत्रिका भी निकाली. लेकिन मार्क्सवादी विचारक ओवेन के सारे अभियान को संदेह की दृष्टि से देखते हैं. स्वयं फ्रैड्रिक ऐंग्लस ने ओवेन की नीयत पर संदेह करते हुए उसे एक तरह से छद्म समाजवादी स्वीकार किया है. ऐंग्लस के अनुसार—
‘मजदूरों के प्रति ओवेन का प्यार ऊपरी यानी केवल दिखावा था, जो मानवीय संवेदनाओं से कोसों दूर था.
प्रमाण के लिए ऎंग्लस ने एक ओवेन की एक उक्ति का उल्लेख अपने लेख में किया है, जिससे ओवेन का दंभ झलकता है.
‘लोग मेरी दया पर जीनेवाले, मेरे दास हैं.’
ओवेन ने बड़ी बुद्धिमत्तापूर्वक, कहा जाए कि व्यावसायिक कुशलता का परिचय देते हुए मजदूरों को कुछ सुविधाएं दी थीं. उसे बदले में जो प्राप्ति हुई, वह किए गए खर्च से कई गुना थी. इस बात को ओवेन के साहित्य से ही उदाहरण लेकर फैड्रिक ऐंग्लस समझाते हैं कि—
‘ओवेन की फैक्ट्रियों में काम करनेवाले मात्र ढाई हजार मजदूर इतना मुनाफा कमाकर दे रहे थे कि जिसे कमाने के लिए आधी शताब्दी से भी कम समय पहले, लगभग छह लाख मजदूरों-दक्ष कामगारों की आवश्यकता पड़ती थी. पूंजी के इस ठहराव पर मैंने एक दिन स्वयं से ही प्रश्न कि, विकास की विडंबना देखिए कि जो धन पहले छह लाख लोगों में बंटता था, वह अब केवल केवल ढाई हजार में बांटना पड़ता है.’
इससे यह भी लगता है कि ओवेन सबसे पहले एक उद्यमी था, कूटनीतिक उद्यमी, जो येन-केन-प्रकारेण अपना ही हित देखता है. उसने जो व्यवस्था न्यू लैनार्क तथा आगे चलकर न्यू हारमनी जैसी बस्तियों के रूप में की उसका अंतिम उद्देश्य मालिकों को लाभ पहुंचाना था. फ्रैड्रिक ऐंग्लस इसे व्यावहारिक साम्यवाद की संज्ञा देता है. यही कारण था जिससे ओवेन अपने साझीदारों पर साथ में बने रहने के लिए कोई नैतिक दबाव नहीं डाल सका. न्यू हा॓रमनी की असफलता का प्रमुख कारण व्यक्तिगत अस्मिताबोध तथा निजी संपत्ति का अभाव था. जोसीह वारेन (Josiah Warren), जो न्यू हा॓रमनी में एक सदस्य के रूप में रह चुका था, उसके असफल होने पर लिखता है किः
‘वहां एक छोटे-से स्थान पर पूरी दुनिया बसी थी….मगर ऐसा लगता है कि प्रकृति का भी अपना एक कानून है जो हमें एक दूसरे से भिन्न बने रहने को उकसाती है, उसी ने हम पर जीत हासिल कर ली थी. हमारे हमारे संगठित हित, सदस्यों के अलग-अलग व्यक्तित्व, परिस्थितियों एवं सदस्यों की निजी अस्मिताबोध कायम रखने की स्वाभाविक इच्छा के सीधे निशाने पर थे.’
न्यू हारमनी से इंग्लेंड लौटने के बाद ओवेन नए सिरे से अपनी योजनाओं को साकार करने में जुट गया. सामाजिक, आर्थिक परिवर्तन की चाह में वह नए-नए प्रयास करता रहा. न्यू हाॅरमनी में मिली अप्रत्याशित नाकामी ने ओवेन को अपनी विचारधारा और अब तक के कार्यकलापों पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य भी किया था. अब वह सच्चे मायनों में समाजवाद के सिद्धांत को जीवन और समाज में स्थापित करना चाहता था. इसी दिशा में अपने प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए ओवेन ने 1832 में श्रम सुधार के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाते हुए राष्ट्रीय साम्यिक श्रम विनियम(National Equilable Labour Exchange) की स्थापना की थी. इसके मूल में ओवेन की मान्यता थी कि वस्तुओं के विनिमय की दर उनके निर्माण में लगे श्रम के अनुपात में होनी चाहिए. लाभ को वह चोरी के समान मानता था, उसका मानना था कि मुद्रा-विनिमय के माध्यम से लाभ की इच्छा पर अंकुश लगा पाना संभव नहीं है. नई व्यवस्था में वस्तुओं का विनिमय, उनके निर्माण में लगे श्रम के आधार पर करने का सुझाव दिया गया था. उस व्यवस्था का उद्देश्य उत्पादक और उपभोक्ता के बीच से बिचैलियों की संभावना को कम करना था.
राष्ट्रीय साम्यिक श्रम विनियम की शुरुआत लंदन में हुई थी. इसके प्रारंभ में ही 840 सदस्य थे. प्रारंभिक दौर में ओवेन को उत्साहजनक सफलता मिली; जिससे उसकी शाखाएं जगह-जगह खुलने लगी. इसके सदस्य स्वनिर्मित वस्तुओं को लाते थे. उनके निर्माण में लगे श्रम के अनुसार उन्हें लिखित श्रम मुद्रा(Labour note) प्राप्त होती थी. इस मुद्रा के आधार पर वे उन वस्तुओं को खरीद सकते थे, जिनके निर्माण में उन श्रम मुद्राओं के बराबर मूल्य का श्रम लगा हो.
सहकारिता के क्षेत्र में यह पहला महान प्रयोग था. यह बात अलग है कि कुछेक कमियों के ओवेन का यह प्रयोग भी बहुत सफल न हो सका. इसका एक कारण सदस्यों में सहकार-भावना का अभाव भी था. दूसरे लाभार्जन से अधिक लाभार्जन की मनोवृत्ति हानिकारक सिद्ध हुई. ओवेन ने अपनी संस्था में लाभार्जन पर अंकुश लगाने का प्रयास तो किया था; किंतु लाभ कमाने की मनोवृत्ति को बदलने में वह नाकामयाब ही रहा था. संभवतः वह लोगों की चारित्रिक दुर्बलताओं से पूरी तरह परिचित नहीं था और शेष दुनिया को अपनी ही तरह भला और दयावान समझता था. यह भी देखा गया था कि लाभ कमाने के लालच में सदस्यगण फालतू सामान उठा लाते; उसमें लगे श्रम को बढ़ा-चढ़ाकर बताते थे. साथ ही कुछ ऐसी भी चीजें बिकने को आ जाती थीं, जिनका कोई खरीदार ही होता था.
दूसरी ओर महत्त्वपूर्ण और उपयोगी वस्तुओं पर बाहरी व्यापारियों की नजर लगी रहती थी. दरअसल व्यापारीवर्ग प्रारंभ से ही ओवेन का दुश्मन बना था. वह चाहता ही नहीं था कि ओवेन के बहाने से सहकारिता के प्रयोगों को कामयाबी मिले. इसलिए व्यापारी संस्था के सदस्यों के माध्यम से उपयोगी वस्तुओं को ऊंची बोली पर खरीद लेते थे. परिणामतः संस्था के भंडारों में अनावश्यक चीजों की भरमार होने लगी. काम की वस्तुएं उपलब्ध न होने के कारण जरूरतमंद लोगों के भीतर आक्रोश उमड़ना स्वाभाविक ही था; अतः धीरे-धीरे असंतोष पनपने लगा. यहां तक कि विनिमय केंद्रों पर तोड़-फोड़ एवं लूटमार की घटनाएं भी हुईं; जिससे उस संस्था को अंततः समाप्त कर देना पड़ा.
ओवेन को विश्वास था कि पूंजीवाद का मुकाबला संगठित मजदूर आंदोलनों के माध्यम से किया जा सकता है. इसलिए वह शुरू से ही श्रमिकों के कल्याण के प्रति समर्पित रहा था. मजदूर आंदोलन को गतिशीलता प्रदान करने के लिए ओवेन ने ‘राष्ट्रीय समेकित मजदूर महासभा’ (The Grand National Consolidated Trade Union) का गठन किया. बाकी प्रयासों के समान ओवेन को उसमें भी प्रारंभिक सफलता तो मिली. मगर तब तक वह अपने अनेक आलोचक एवं विरोधी पैदा कर चुका था. वे सभी उसको असफल देखना चाहते थे. अपने इस संगठन को चलाने के लिए ओवेन ने सरकारी मदद भी मांगी; किंतु पूंजीपतियों के दबाव के कारण सरकार चुप्पी साधे रही.
ओवेन को लग रहा था कि लोगों में सहजीवन के प्रति चेतना का अभाव भी उसके प्रयोगों की असफलता का कारण है. इसलिए 1840 में उसके मन में अपने सहजीवन को लेकर अपनी मान्यताओं को शिक्षा के माध्यम से प्रचारित करने का निर्णय लिया. उस समय वह हैंपशायर की यात्रा पर था. अपने प्रयोगों को मूर्त रूप देने के लिए उसके पास पर्याप्त पूंजी का अभाव था. अतः उसने अपने पूंजीपति मित्रों से पूंजी का प्रबंध करके सहकार बस्ती की स्थापना की. उस प्रयास में भी ओवेन को पर्याप्त सफलता नहीं मिल पाई. लगभग पांच सौ सदस्यों की क्षमता वाली बस्ती के सदस्यों की संख्या कभी भी सौ का आंकड़ा पार नहीं कर सकी. 1841 में सामुदायिक जीवन के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए उसने ‘नार्मल स्कूल’ की स्थापना की, जिसमें सहजीवन के बारे में विशेष अध्ययन की व्यवस्था की गई थी. इन प्रयासों के दौरान उसका बहुत-सा धन खर्च हो चुका था. ओवेन को सरकार और मित्रों से सहयोग की आस थी. किंतु इस बार कोई मदद के लिए आगे नहीं आया. तब तक ओवेन की आयु भी काफी हो चुकी थी और वह बहुत अधिक श्रम करने की स्थिति में भी नहीं था. ओवेन के अन्य प्रयासों की भांति अंततः ‘राष्ट्रीय समेकित मजदूर महासभा’ भी बिखराव का शिकार होकर रह गई.
अपने प्रयोगों के अंतिम चरण के रूप में ओवेन ने स्वयं भी एक समिति का गठन किया था. डेविड रिकार्डों, जो अपने समय का प्रसिद्ध अर्थशास्त्री था, वह भी ओवेन द्वारा गठित की गई समिति का सदस्य था. समिति के माध्यम से वह कल्याणकारी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना चाहता था, परंतु तब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी. ओवेन द्वारा बनाई गई समिति बहुत कारगर तो नहीं हो सकी, परंतु उसने उसको सहकारिता के जनक के रूप में स्थापित अवश्य कर दिया.
ओवेन के प्रयासों को असफलता के लिए उसे दोष देने से पहले हमें याद रखना चाहिए कि ओवेन ने सारे कदम अंतःप्रेरणा के आधार पर उठाए थे और द्धवह उन विचारों को आंदोलन का रूप देना चाह रहा था; जो उससे पहले केवल पुस्तकों तक सीमित थे. उसकी असफलताएं अनुभव के दौर में जन्मीं, और वे कदाचित परिस्थितिजन्य भी थीं. एक तो यह कि उस समय तक लोगों में सामूहिक जीवन के प्रति चेतना का अभाव था. दूसरे ओवेन के विरोधी उसकी योजनाओं को असफल बनाने के लिए लगातार प्रयत्नरत थे. तीसरी और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि सामाजिक परिवर्तनों की गति उतनी तीव्र नहीं होती. आज से डेढ़ सौ वर्ष पहले कम से कम उतनी तीव्र तो बिलकुल नहीं थी; जितनी कि ओवेन चाहता था अथवा जैसी कोशिशें वह कर रहा था. इसके बावजूद ओवेन के विचारों को कामयाबी मिली थी. वैसे भी किसी भी परिवर्तन को परंपराओं से संघर्ष करते हुए समय की सुदीर्घ कसौटी पर अपनी प्रासंगिकता दर्शानी पड़ती है. कुछ ही समयांतराल के पश्चात ओवेन के विचारों की सार्थकता सामने आने लगी थी. इजरायल के किबुट्स(Kibutze) नामक स्थान पर ओवेन का सपना खूब फलीभूत हुआ. रूस में टा॓लसटाय, भारत में महात्मा गांधी और विनोबा भावे ने भी सामूहिक जीवन को सामाजिक परिवर्तन के एक अनिवार्य उपक्रम की तरह इस्तेमाल किया. गांधी तो भारत के अलावा दक्षिण में भी अपने प्रयोगों को कामयाबी के साथ आजमा चुके थे.
ओवेन को अपेक्षित कामयाबी अपने प्रयासों में नहीं मिली थी. इसके बावजूद उसकी ख्याति दुनिया-भर में फैली थी. उदारचेता और परिवर्तन के पक्षधर लोग अपनी-अपनी तरह से ओवेन के विचारों को आगे ले जाने में लगे थे. एक उद्यमी होने के बावजूद उसकी पहचान एक विचारक और दूरदृष्टा समाजकर्मी के रूप में बन चुकी थी. एक अच्छा पत्राकार होने के साथ-साथ वह बेहतर लेखक भी था. ओवेन की प्रेरणा से ही वार्षिक सहकारी अधिवेशन की शुरुआत हुई; जो 1831 से 1835 तक हर वर्ष होता रहा. उसके कारण सहकारिता के विचार को व्यापक प्रसिद्धि मिली. आने वाले वर्षों में पूरी दुनिया पर छा जाने वाले शब्द Socialism का सर्वप्रथम प्रयोग भी ओवेन द्वारा Association of all Classes of all Nations की बैठक के दौरान किया गया.
ओवेन की प्रेरणा से ही सहकारिता के क्षेत्र में सबसे ठोस काम सन 1930 में हुआ, जब विलियम कूपर और उसके सहयोगियों द्वारा पहली सहकारी समिति रोशडेल फ्रैंडली को-आ॓परेटिव सोसाइटी (Rochdale Friendly Co-operative Society) का गठन किया गया. इस समिति को उपभोक्ता भंडारों की शुरुआत करने का श्रेय भी जाता है. समिति के अधिकांश सदस्य श्रमिक थे. रोशडेल फ्रैंडली का॓आपरेटिव सोसायटी के आधार सिद्धांत, यद्यपि ओवेन के विचारों तथा उसके द्वारा गठित की गई समितियों के सिद्धांतों से भिन्न थे और वे सांगठनिकता को स्थायित्व देने के लिए अपनाए गए थे. परंतु उनसे सहकार को विश्वव्यापी ख्याति मिली.
ओवेन आजीवन नास्तिक रहा. परंतु जीवन के अंतिम वर्षों में किसी अज्ञात प्रेरणा से उसका झुकाव अध्यात्म के प्रति हो गया था. आजीवन कर्मशील रहे ओवेन ने 87 वर्ष का सार्थक और संघर्षमय जीवन जिया. प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम की शुरुआत के अगले ही वर्ष अर्थात 17 नवंबर 1858 को, उसी कस्बे में जहां उसका जन्म हुआ था, इस उदार हृदय, ईमानदार, सज्जन कर्मयोगी, महामना, दूरदृष्टा और कामयाब उद्यमी ने अततः मौत का वरण किया. ओवेन को अपने समाज के उपेक्षितों, पीड़ितों के कल्याण की चिंता सदैव सताती रही. एक गरीब परिवार से होने के बावजूद वह कामयाब उद्यमी बना और अंत तक अपने समाज के उत्थान के लिए प्रयास करता रहा. यहां तक कि लंबे, कठिन परिश्रम से कमाई गई पूंजी भी जनकल्याण के हित में बलिदान कर दी.
ओवेन की दृढ़ मान्यता थी कि समाज में आमूल परिवर्तन के लिए स्थितियों में बदलाव अत्यावश्यक है. उसी से माध्यम से मनुष्य के स्वभाव में अपेक्षित परिवर्तन किया जा सकता है. जीड तथा रिस्ट ने ओवेन का उल्लेख करते हुए लिखा है—
‘उनका यह सिद्धांत कि सामाजिक व्यवस्था को बदलकर, व्यक्ति को बदला जा सकता है, अर्थशास्त्र में वही महत्त्व रखता है जो लेमार्क का सिद्धांत जीवविज्ञान के क्षेत्र में रखता है.’
एक कर्मठ व्यक्ति की भांति ओवेन अपनी आंतरिक प्रेरणा के आधार पर सतत प्रयास करता रहा. उसे प्रशंसा और सराहना दोनों ही मिली, लेकिन पूरी जिंदगी वह अपनी असफलताओं से जूझता रहा. ओवेन के योगदान की चर्चा इसलिए भी आवश्यक है कि उसने अकेले दम पर सामाजिक परिवर्तन के लिए लगातार प्रयोग किए और उनके लिए अपने समस्त संसाधनों को दाव पर लगा दिया. अपने मौलिक प्रयोगों के बावजूद, ओवेन की कई मोर्चों पर लगातार पराजय यह भी दर्शाती है कि अपने कर्म एवं सोच के आधार पर अपने समय से कई दशक आगे था.

वैचारिकी

किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके कार्यों से होती है. फिर ओवेन जैसे उद्यमी और मानवतावादी इंसान की परख करने के लिए उसके कार्यों से अधिक प्रामाणिक और भला हो भी क्या सकता है! उसका पूरा जीवन एक कर्मयोगी के जीवन का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है. वह औद्योगिक क्रांति का दौर था, जब ओवेन का जन्म हुआ. उसके जन्म से कुछ दशक पहले ही जेम्स वाट ने भाप की शक्ति को पहचानकर भाप के इंजन का आविष्कार किया था. उधर जल-ऊर्जा को उद्यमशीलता से जोड़ते हुए रिचर्ड आर्कराइट(Richard Arkwright) के जलीय संयंत्र ने उत्पादन जगत में क्रांति का सूत्रपात किया था. रिचर्ड आर्कराइट उस समय के प्रतिष्ठित उद्यमी थे. न्यू लेनार्क की स्थापना करने वालों में उनका नाम सर्वोपरि था. जलऊर्जा के उपयोग के कारण उनका कारखाना न्यू लेना॓र्क के चार सबसे बड़े कारखानों में गिना जाता था.
तेज गति से चलने वाली मशीनों ने कपड़ा उद्योग को घरों से छीनकर फैक्ट्रियों के हवाले कर दिया था, जिससे नदी किनारे बसे कस्बे जहां पानी की बहुतायत थी, कपड़ा उद्योग के बड़े केंद्रों में बदलते जा रहे थे. दूसरी ओर गांवों में उद्योग घटने से बेरोजगारी अनुपात बढ़ा था. इसीलिए मेहनत करके अपने हुनर की कमाई खानेवाले ग्रामीण कामगार, बेमिसाल कारीगर कारखानों में मजदूरी करने को विवश हो गए थे. जनसंख्या का शहरी क्षेत्रों की ओर तेजी से पलायन हुआ था. खासकर ऐसे स्थानों पर जहां कपड़ा उद्योग तेजी से पनपा था. इस तथ्य को केवल एक उदाहरण के माध्यम से बहुत आसानी से समझा जा सकता है—
‘मेनचेस्टर में जिसकी जनसंख्या ओवेन के जन्म के समय केवल पचीस हजार थी, वह अगले पचास वर्षों में एक हजार प्रतिशत की वृद्धि के साथ लगभग ढाई लाख हो चुकी थी. फैक्ट्रियों में मजदूरों की मांग एकसमान नहीं थी. उत्तरी इंग्लैंड का इलाका अपने विरल जनसंख्या अनुपात के कारण पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध कराने में असमर्थ था. इसलिए इंग्लैंड के, विशेष रूप से दक्षिणी क्षेत्र प्रांतों और लंदन के ठेकेदार करों का दबाव घटाने के लिए बाल मजदूरों को फैक्ट्री ले आते थे. उन बच्चों को बहुत मामूली वेतन पर प्रशिक्षु के रूप में रखा जाता. केवल सात साल की उम्र से उन्हें काम पर झोंक दिया जाता. उन्हें फैक्ट्री के दरवाजे के बाहर उन्हीं के लिए विशेषरूप से बनाए गए कमरों(Prentice Houses) में रहना पड़ता था. यही नहीं आधे घंटे के विश्राम सहित उन्हें प्रातः पांच बजे से सायं आठ बजे तक, लगभग पंद्रह घंटों तक बना रुके काम करना पड़ता था.’
ऐसे ही वातावरण में ओवेन का जन्म और विकास हुआ. उसने गरीबी और लंबे संघर्ष का सामना किया था. युवावस्था में ओवेन को बैंथम और जा॓न स्टुअर्ट मिल (1806-1873) के उपयोगितावाद के सिद्धांत से भी प्रेरणा मिली थी. मनुष्य के जीवन के लक्ष्य की ओर इंगित करते हुए मिल ने स्पष्ट लिखा था कि मानव जीवन का व्यक्तिगत तथा सामाजिक लक्ष्य परमानंद की प्राप्ति है. इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु वह जो भी कार्य करता है—वह पूर्णतः नैतिक है. सामाजिक स्तर पर जिस कार्य से अधिकतम व्यक्तियों को अधिकतम आनंद की प्राप्ति हो, वही आदर्श है. ध्यातव्य है कि मिल अपने पिता जेम्स मिल तथा बैंथम से प्रभावित अवश्य था, परंतु उसकी सुख की अवधारणा उन दोनों से भिन्न थी. मिल की सुख की संकल्पना में ऐंद्रिक सुख का स्थान गौण है. उसके अनुसार सुख एक मानसिक अवस्था है. यह इंद्रियजन्य सुख के बजाए शांति, संतोष एवं बौद्धिकता के तालमेल से युक्त ऐसी उन्नत अवस्था है, जो केवल स्वार्थ के त्याग और सेवा से ही प्राप्त हो सकती है. समाज में न्याय की स्थापना, शिक्षा, समानता एवं संस्कृति कुछ ऐसे कारक हैं जो मनुष्य को आनंद की ओर ले जाने में सक्षम होते हैं. मिल ने ईसाई धर्म की यह कहकर आलोचना की थी कि—
‘उसके आदर्श निषेधात्मक हैं, विधायक(Positive) नहीं है. यह हमें बुराई से बचने की शिक्षा तो देता है, अच्छाई प्राप्त करना नहीं सिखाता.’
ओवेन का जन्म हालांकि निर्धन परिवार में हुआ था, किंतु अपनी प्रतिभा एवं उद्यमशीलता के बल पर वह अपनी युवावस्था में ही उस अवस्था तक पहुंच चुका था, जहां तक पहुंचना किसी के लिए भी सपना होता है. उसके पास भौतिक सुख-सुविधाओं की कमी नहीं थी. उसकी मिलें मेनचेस्टर की सबसे बड़ी मिलों में से थी. ब्रिटेन के सर्वाधिक चर्चित व्यक्तियों में उसकी गिनती होती थी. तो भी वह आत्मिक सुख के लिए निरंतर प्रयास करता रहा. ईसाई धर्म में आस्था के बगैर, वह उसके सेवा और लगन के सिद्धांत को अपने जीवन का लक्ष्य माने रहा. इसके लिए उसने अपने संसाधनों को जनकल्याण के कार्य में झोंक दिया. इस कारण उसके साथी और साझीदार भी उससे छिटककर दूर होते रहे. कठिन मेहनत से कमाई गई उसकी पूंजी धीरे-धीरे चुकती चली गई.
जीवन के अंतिम वर्षों में ओवेन के व्यवहार में यद्यपि आध्यात्मिकता अपना प्रभाव डाल चुकी थी. तथापि यह एक हताश-निराश व्यक्ति का विधाता के आगे समर्पण जैसा नहीं था, ना ही हारे हुए योद्धा का आत्मसमर्पण, बल्कि वर्षों लंबी संघर्षशील, त्यागमयी, सतत यात्रा के पश्चात एक श्रांत-क्लांत यायावर का नीड़ के नीचे आश्रय लेने जैसा था; जो चुनौती भरे अंदाज में कह सकता था कि अपने हाथों से उसने सिर्फ दिया है. समाज से जो लिया उससे कहीं अधिक उसको लौटाया भी है. लंबे संघर्ष और समर्पण के बावजूद ओवेन को स्थायी सफलता तो हासिल नहीं हुई, मगर इसमें ओवेन से ज्यादा दोष उस समय के सामंती संस्कारों से युक्त समाज को भी है; जिसका बहुत बड़ा हिस्सा अशिक्षा से प्रेरित था. तो भी साहचर्य के जिस विचार को मान्यता दिलाने के लिए राबर्ट ओवेन ने आजीवन समर्पण भाव से काम किया, सहकारिता की नींव रखी उसके लिए विचार जगत में उसका नाम चिरस्मरणीय बना रहेगा.
ओवेन न केवल कुशल व्यावसायी, स्वप्नदृष्टा, विचारक और कर्मठ इंसान था, बल्कि सिद्धहस्त लेखक भी था. ‘सोसिलिस्ट’(Socialist) शब्द पहली बार ओवेन की पत्रिका ‘कोआ॓परेटिव मैगजीन’ में प्रकाशित हुआ, यद्यपि उन दिनों इसका अभिप्राय उन लोगों से था जो ओवेन की विचारधारा के समर्थक थे. लगातार लेखन करते हुए ओवेन ने कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की थी; जिनमें से प्रमुख हैं—
1. ए न्यू व्यू आ॓न सोसाइटी: एस्से आन फा॓रमेशन आ॓फ ह्यूमेन करेक्टर-1813.
2. आ॓बजरवेशन आन दि इफेक्ट आ॓फ दि मैन्यूफैक्चरिंग सिस्टम-1815.
3. रिपोर्ट टू दि काउंटी आ॓फ लेनार्क आफ ए प्लान फा॓र रिलीविंग पब्लिक डिस्ट्रेस-1821.
4. एन एड्रेस टू आ॓ल क्लासिस इन दि स्टेट-1832.
5. दि बुक आफ दि न्यू मा॓रेल वर्ल्ड-1848.
6. दि रिवोल्यूशन इन दि माइंड एंड प्रैक्टिश आ॓फ दि ह्यूमेन रेस-1849. ओवेन की मान्यता थी कि केवल स्पर्धा से वास्तविक विकास संभव नहीं है. क्योंकि स्पर्धा द्वारा मस्तिष्क में निषेधात्मक मूल्यों का संचार होता है, जो जीवन में अनावश्यक तनाव को जन्म देती है. तनाव प्रकारांतर में उत्पादकता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है. इसलिए स्पर्धा के स्थान पर सहअस्तित्व और पारस्परिक सहयोग को महत्त्व दिया जाना जरूरी है. वह मानव-चरित्र की पवित्रता को बहुत महत्त्व देता था. पवित्रता न केवल विचारों की, बल्कि आचरण की भी. उसका पूरा जीवन इसी पवित्रता और समर्पण की मिसाल रहा. अपने लंबे उतार-चढ़ाव और संघर्षपूर्ण जीवन में ओवेन ने मान लिया था कि वर्तमान पूंजी-प्रधान व्यवस्था में मानव-कल्याण संभव ही नहीं है. मनुष्य अपने चरित्र-निर्माण के लिए अपने परिवेश पर निर्भर होता है और वहां से बहुत-सी बातें ग्रहण करता है. ऐसे में यदि परिवेश ही दूषित हो तो मानव-चरित्र में उसके दोषों का प्रवेश होना स्वाभाविक है. ओवेन की यह मान्यता प्रसिद्ध दार्शनिक जा॓न ला॓क के बहुत करीब थी; जो मानता था कि मनुष्य का मन कोरे स्लेट की तरह होता है. विकासक्रम में वह अपने परिवेश से ही प्रेरणा और आवश्यक सूचनाएं ग्रहण करता है, उन्हें अपने बौद्धिक सामार्थ्य द्वारा विश्लेषित-संश्लेषित कर आवश्यक निर्णय तक पहुंचता है. अतएव मानव चरित्र में बदलाव के लिए उसके चरित्र का गठन बहुत अहम भूमिका निभाता है, जिसके लिए व्यवस्था में अपेक्षित बदलाव जरूरी है.
ओवेन ने अपने लेखों तथा पुस्तकों के माध्यम से लोगों तक अपने विचार पहुंचाने का प्रयास किया. मजबूर बस्तियों में स्वयं जा-जाकर वह उन्हें सहजीवन के लिए प्रेरित करता रहा. चूंकि समाजवाद के वृहद लक्ष्य को किसी एक व्यक्ति अथवा समूह द्वारा प्राप्त कर पाना संभव नहीं है, इसलिए उसने अपने साथी उद्यमियों का भी आवाह्न किया था कि वे जनकल्याण के लिए आगे आएं. व्यक्तिगत प्रयासों द्वारा भी उसने सरकार एवं प्रशासन के माध्यम से अपनी सहजीवन पर आधारित बस्तियों को बढ़ावा देने का प्रयास किया था. लेकिन पूंजीपतियों का दबाव झेल रही अपने समय की व्यवस्था के वह बुरी तरह आहत हो चुका था. वह जानता था कि व्यवस्था में वास्तविक बदलाव उसमें आमूल परिवर्तन द्वारा ही संभव है.
समाजवादी चिंतन को आगे बढ़ाते हुए राबर्ट ओवेन ने कहा कि राज्य की संपत्ति पर व्यक्ति अथवा राज्य के बजाए समाज का अधिकार होना चाहिए. मगर इसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति समिति अथवा संगठन के माध्यम से एकजुट हों; ताकि समाज की ऊर्जा एकजुट हो और उपलब्ध संसाधनों का समाज-हित में अधिकतम उपयोग किया जा सके. इस तरह राबर्ट ओवेन ने समाजवाद की एक      अलग धारा का अन्वेषण किया, जिसे विद्वानों ने साहचर्य के विशेषण के साथ ‘साहचर्य समाजवाद’ की संज्ञा दी. साहचर्य समाजवाद की निम्नलिखित विशेषताएं हैं—
1. साहचर्य समाजवाद में सामाजिक कार्यव्यवहार पूर्णतः स्वायत्त संस्थाओं/ संघों के अधीन होता है. उन संस्थाओं के सभी फैसले लोकतांत्रिक आधार पर लिए जाते हैं. सहकारिता की भावना को समर्पित संघ पूर्णतः आत्मनिर्भर, अधिकार-संपन्न एवं चेतना प्रधान होते हैं. इनकी स्थापना तथा नियंत्रण में राज्य अथवा अन्य बाहरी शक्ति का कोई दबाव नहीं होता.
2. यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और साहस के नियम में आस्था रखता है.
3. साहचर्य समाजवादी, आदर्शवादी योजनाओं के अनुसार काम करते हुए समाज में नैतिकता की स्थापना और उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए काम करता है.
4. स्पर्धा को सभी मौजूदा बुराइयों का निमित्त मानते हुए, साहचर्य समाजवादी उसके उन्मूलन पर जोर देते हैं. स्पर्धा के स्थान पर वह सहयोग एवं तथा सहयोग के स्थान पर साहचर्य(Association) को महत्त्व देता है.
कह सकते हैं कि साहचर्य समाजवाद की विचारधारा कदाचित व्यक्ति-स्वातंत्रय के उन घटकों का निषेध कर रही थी, जिनके समर्थन बैंथम, जेम्स मिल जैसे सुखवादी दार्शनिक और एडम स्मिथ जैसे ख्यातिनाम अर्थशास्त्री कर रहे थे. मेरी स्वतंत्रता सभी की स्वतंत्रता के साथ ही सुनिश्चित है और सबके स्वतंत्र रहने में ही मेरी स्वतंत्रता अर्थवान है—साहचर्य समाजवादी कुछ इसी प्रकार का व्यक्तिगत स्वतंत्रता-बोध चाहते थे. यह सामाजिक दृष्टि से गलत भी नहीं है. इसलिए कि समाज अपने भीतर अनेक इकाइयों को शामिल किए रहता है. उसके प्रत्येक सदस्य की अपनी विशिष्ट कार्यक्षमता एवं वैचारिक आग्रह होते हैं. अतः समाज में अकेले व्यक्ति की स्वतंत्रता किसी काम की नहीं होती, जब तक कि उसका पूरा परिवेश स्वतंत्रता की भावना से ओत-प्रोत न हो. स्वतंत्रता हो या संपन्नता वह परिवेश के साथ समरूपता में ही प्रशंसनीय होती है.
ओवेन का अत्यंत महत्त्वपूर्ण विचार जो आगे चलकर सहकारिता आंदोलन का आधार-सिद्धांत बना, जिसके आधार पर सहकारिता की कामयाब इबारत लिखी जा सकी, लाभ का निषेध था. यद्यपि लाभ के निषेध का विचार ओवेन की मौलिक स्थापना नहीं थी. यह एकमात्र ऐसा सिद्धांत है जो प्रायः सभी धार्मिक-नैतिक व्यवस्थाओं समान रूप में मौजूद रहा है. आर्थिक लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ पर जोर देने का आग्रह प्रायः सभी समाजों में नैतिक रूप से मान्य रहा है. भारतीय परंपरा में तो चिरकाल से ही अपरिग्रह और अस्तेय की महिमा का बखान होता रहा है, जिनके अनुसार आवश्यकता से अधिक धन का संचय न करने और संकट के समय दूसरों की मदद करने का आदर्श समाहित है. ईसाई धर्म में जहां करुणा एवं मैत्री के प्रति विशेष आग्रह दर्शाते हुए, आर्थिक उपलब्धियों को उनकी अपेक्षा हेय माना गया है. लाभ की मौजूदगी व्यक्तिगत संपत्ति की लालसा को विस्तार देती है. अरस्तु तक का मानना था कि व्यक्तिगत स्वामित्व होते हुए भी संपत्ति का उपयोग सार्वजनिक कल्याण के लिए किया जाना चाहिए. महात्मा गांधी संपत्ति को ट्रस्टीशिप के अधीन रखना चाहते थे. जिससे लाभ पर समस्त समाज की आधिकारिता हो. संत एक्वीनास का मानना था कि लाभ की कामना निर्धन वर्ग के शोषण को जन्म देते है, अतएव उन्होंने लाभ के उन्मूलन पर बल दिया था. इस्लाम धर्म में ब्याजमुक्त ऋण देना, संकट के समय पड़ोसी की मदद को आगे आना, धार्मिक रूप से मान्य रहा है, जिसके उल्लंघन पर सामाजिक बहिष्कार और जैसे दंड की भी व्यवस्था रही है.
ओवेन का लाभ के निषेध का सिद्धांत मात्र उसके निषेध तक ही सीमित नहीं था. इससे भी आगे बढ़कर वह लाभ के नाम पर अर्जित राशि का सार्वजनिक हित में पुनः निवेशन भी चाहता था, ताकि उसको उत्पादकता से जोड़ा जा सके. इसके लिए उसने प्रबुद्ध लोगों की समिति बनाने का सुझाव दिया था. ताकि लाभ को एकाधिकार की सीमा से बाहर लाया जा सकते. लाभ की भावना का निषेध करते हुए ओवेन ने लिखा है कि—
‘दुनिया में एक जरूरी बुराई, वास्तविक पाप लाभ की कामना है. वस्तुतः लाभ ही वह वर्जित फल था, जिसे खाकर आदम का स्वर्ग से पतन हुआ.’
ओवेन यद्यपि प्रकृति से धार्मिक नहीं था. धर्म को वह विकास के मार्ग में बाधक मानता था. किंतु ईसाई धर्म के कल्याण एवं सेवा के संदेश का उसपर गहरा प्रभाव पड़ा था. उसका प्रत्येक निर्णय इससे प्रभावित नजर आता है. समाजवादी विचारों का उसपर गहरा प्रभाव था. व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा का वह विरोधी था तथा उसको बहुत ही घृणित तथा अनैतिक कर्म मानता था. उसका कहना था कि—
‘व्यक्तिगत संपत्ति बहुत ही घृणित एवं अनैतिक शक्ति है…यह असंख्य अन्यायों और अपराधों की जन्मदाता है. इससे चतुर्दिक बुराइयां फैलती है.’
ओवेन ने अपनी उद्यमशीलता का लोहा पूरे समाज से मनवाया था. न्यू लेनार्क के कपड़ा उद्योग में उसकी धाक थी. किंतु यह बात हैरान कर देने वाली है कि उसको तात्कालिक फैक्ट्री सिस्टम से घृणा थी. इसीलिए वह उसमें आमूल बदलाव चाहता था. उसका मानना था कि मौजूदा फैक्ट्री व्यवस्था सामाजिक गैरजिम्मेदारी की भावना, विध्वंसात्मक स्पर्धा एवं अमानीय किस्म के व्यक्तिवाद को बढ़ावा देनेवाली है. जबकि औद्योगिकीकरण के पहले का समाज नैतिकतावादी सोच और मानवीय संबंधों पर आधारित था. अपनी पुस्तक ‘दि न्यू व्यूज आफ सोसाइटी’ में ओवेन ने समाज को लेकर अपने विचारों का उल्लेख किया है. इसमें उसने समाज के रूप में एक ऐसी व्यवस्था की संकल्पना की थी, जो अपने प्रत्येक सदस्य के कल्याण की कामना करते हुए, उसके लिए सततरूप से प्रयत्नशील रहती है—
‘एक सरल, साधरण एवं व्यावहारिक व्यवस्था जिसमें किसी भी व्यक्ति या समाज के किसी वर्ग-विशेष को जरा भी नुकसान ना हो.’
समाज के रूप में वह ऐसी व्यवस्था की कामना करता था, जो गरीबों को सुखी, बंधनमुक्त एवं आत्मनिर्भर बनाती हो. उन्हें गर्व करने का अवसर प्रदान करती हो. ऐसी व्यवस्था के लिए उसने समाज की पुनर्रचना पर जोर दिया है. व्यक्तिगत संपत्ति का विरोध करने के बावजूद ओवेन इस बात का विरोधी था कि संपत्ति पर राज्य का स्वामित्व हो. उसे संशय था कि इससे राज्य को मानव जीवन पर अनुचित दबाव बनाने की शक्ति मिलने की संभावना बढ़ेगी. इस कारण वह संपत्ति पर समिति या समूहों को अधिकार का पक्षधर था. वह चाहता था कि समाज में ऐसे चैतन्य समूहों का विकास हो जो उत्पादकता को सामूहिक कल्याण से जोड़ने का कार्य कर सकें. संक्षेप में सहकारिता का भी आदर्श भी यही है. कदाचित इसी के कारण ओवेन को उसके आलोचकों ने आधुनिकता का विरोधी कहकर उसका मजाक उड़ाया था. और इसी के आधार पर तत्कालीन परंपरावादी विद्वानों द्वारा उसका समर्थन भी किया था. लेकिन जल्दी ही उनका यह भ्रम जाता रहा. ओवेन द्वारा किए गए कार्यों, सतत लेखन तथा समय-समय पर दिए गए वक्तव्यों ने सिद्ध कर दिया कि वह एक कर्मठ उद्यमी और दूरदर्शी विद्वान था, जिसकी विचारधारा उदारवादी समाजवाद की सहोदरा है.
ओवेन ने जोर देकर कहा कि हम सभी अपने परिवेश की देन हैं. उसी से हमारा व्यक्तित्व एवं संस्कार बनते हैं. इसीलिए परिवेश को बदलकर मानव स्वभाव में भी अनुकूल परिवर्तन लाए जा सकते हैं. ओवेन का यही सूत्रवाक्य उनीसवीं शताब्दी के समस्त समाजवादी चिंतन एवं कार्यक्रमों के लिए मील का पत्थर सिद्ध हुआ. विलियम मौरिस तथा बलफर्ट बक्स ओवेन के योगदान की चर्चा करते हुए लिखते हैं कि—
‘ओवेन ने जनकल्याण के लिए उदारतापूर्वक प्रायः हर तरह के कार्यक्रम को अपनाया. उसके द्वारा सामूहिक कल्याण की भावना के साथ किए गए कार्य इस सिद्धांत की कसौटी हैं कि मनुष्य का अपना आचरण उसके वातावरण से संपूर्ण बनता और बनाता है. ओवेन के इन्हीं विचारों ने उसको महान समाजवादी और सहकारिता का आदि प्रवर्तक सिद्ध किया. यह अलग है कि ओवेन की सहकारिता-संबंधी अवधारणा वह नहीं थी, जो कि सहकारिता के वर्तमान समर्थक मानते हैं और जिसके आधार पर वैश्विक सहकारिता आंदोलन का वटवृक्ष आज चारों दिशाओं में अपना प्रभाव जमाए हुए है.’
समाज की पुनर्रचना का सपना देखते हुए ओवेन ने ऐसे समाज की परिकल्पना की थी, जहां स्वेच्छिक सहभागिता और पारस्परिकता सभी संबंधों का मुख्याधार हों. लाभ के बजाय लोग सेवा और त्याग को महत्त्व दें और इन्हें स्वेच्छापूर्वक अपने जीवन में अपनाएं. सभी नागरिक स्वयं को वृहद विश्व-परिवार का हिस्सा मानते हुए सौहार्दमय जीवनयापन करें. ओवेन का आदर्श ऐसी बस्तियां थीं, जिनके निवासियों की संख्या ज्यादा से ज्यादा 2000 हो. जहां के लोगों का जीवन सामूहिक हो. प्रत्येक बस्ती के पास एक हजार से डेढ़ हजार एकड़ तक कृषि-योग्य भूमि हो. लोगों के निवास स्थान को छोड़कर बाकी सब सुविधापूर्ण जैसे रसोईघर, स्कूल, पुस्तकालय, कारखाने, दुकानंे आदि सामूहिक उपयोग की हों.
ओवेन को विश्वास था कि ऐसे समाज में न तो व्यक्तिगत संपत्ति की लालसा रहेगी, न ही लाभ कमाने की प्रवृत्ति का विकास होगा. वर्गीय शोषण एवं उत्पीड़न की संभावनाओं से परे वह एक आदर्श, आत्मनिर्भर और एकात्म समाज होगा. अपने कार्यक्रमों के कारण ओवेन ने दुनिया-भर में अपने प्रशंसक पैदा किए थे. जिससे सरकार के लिए उसके विचारों की एकाएक अवहेलना कर पाना संभव न था. व्यक्तिगत प्रभाव से अपनी सामाजिक पुनर्गठन की योजना को वह संसद तक ले जाने में कामयाब भी हुआ था. मगर संसद में उसके प्रस्तावों को अव्यावहारिक मानते हुए अस्वीकृत कर दिया गया.
जाहिर है कि यह सब पूंजीपतियों के दबाव में लिया गया फैसला था, जिन्होंने उससे पहले भी ओवेन को बदनाम करने की भरपूर कोशिश की थी. ओवेन के आलोचक उसको अर्द्धविक्षिप्त कहकर उसका मजाक भी उड़ाते थे. जबकि ओवेन को अपने विचारों पर दृढ़ आस्था थी. वह अपने विरोधी विचारकों के साथ तर्क करने को सदैव तैयार रहता था. मगर विरोधियों को तर्क से ज्यादा आनंद छींटाकशी करने में आता था. भारत की शिक्षा-नीति में अपने उपनिवेशवादी परिवर्तनों के लिए कुख्यात मैकाले ओवेन को ‘दिमाग चाटने वाला बुड्ढा’ कहकर उसका उपहास करता था. वह ओवेन को देखते ही भाग छूटता था.
ओवेन की वैचारिक मान्यताओं तथा उसके जीवन-दर्शन में हमें पवित्रता और नैतिकता के दर्शन होते हैं. उसके विचार केवल कागजों तक सिमटे हुए नहीं थे, बल्कि ऐसे समय में जबकि सभी यूरोपीय देशों में वैचारिक हलचल सर्वाधिक तेज थी, एक से बढ़कर एक विद्वान, बुद्धिजीवी नवीनतम विचारों के साथ विश्वमेधा को लगातार चमत्कृत किए जा रहे थे, महानतम विचारकों की उस भीड़ के बीच ओवेन लगभग अकेला था, जो अपनी मान्यताओं पर पूरी ईमानदारी और लगन के साथ, अपने संसाधनों को खपाकर, लगातार प्रयोग भी कर रहा था. बिना किसी बाहरी मदद के. ओवेन की महानता का कारण यह नहीं कि एक गरीब परिवार और संघर्ष के बीच से उठकर उसने अपने श्रम और कार्य-कुशलता के दमपर पश्चिमी जगत पर अपना प्रभाव स्थापित किया था. उसकी महानता इस तथ्य में निहित है कि उपलब्धियांे के चरम पर पहुंचकर भी वह समाज के मेहनतकश, विपन्न और अभावग्रस्त वर्ग के प्रति अपने कर्तव्य और संवेदनाओं को बनाए रख सका.
इस तरह से देखें तो ओवेन के समकालीन विचारक उससे काफी नीचे नजर आते हैं. अपने विचारों में अटूट आस्था तथा उनके अनुरूप आचरण की ओवेन जैसी नैतिक जिद उसके बाद के यदि किसी महामानव में दिखाई पड़ती है तो वह केवल महात्मा गांधी ही हैं, जो विचारों को प्रयोगों की कसौटी पर निरंतर कसते रहे. हालांकि गांधीजी की भांति ओवेन का न तो जादुई व्यक्तित्व था, न ही उसमें आमजन को प्रभावित करने की वैसी क्षमता ही थी. इसीलिए भी उसको अपने लक्ष्य में वांछित सफलता प्राप्त न हो सकी. मगर इससे ओवेन तथा उसके विचारों की महत्ता कम नहीं हो जाती.
ओवेन आजीवन समाजवादी रहा, किंतु सहकार बस्तियां बनाए जाने का उसका प्रस्ताव, मजदूरों के हित में समय-समय पर छेड़ा गया संघर्ष, व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा का निषेध उसको साम्यवादी विचारधारा के करीब ले आता है. माक्र्स और ऐंग्लस जैसे साम्यवादियों ने ओवेन आदि साहचर्य समाजवादियों की ‘स्वप्नजीवी’ कहकर उसकी आलोचना की थी, लेकिन सहकार-बस्तियों की स्थापना के कार्य के लिए माक्र्स के सहयोगी फ्रैड्रिक ऐंग्लस ने ओवेन की बहुत सराहना की है. हालांकि इसके पीछे वह ओवेन पर साम्यवादी विचारधारा का ही प्रभाव मानता था. ओवेन तथा दूसरे साहचर्य समाजवादियों पर लिखे गए अपने एक लेख में ऐंग्लस ने लिखा है कि—
‘साम्यवाद के सामान्य अनुदेशों में ओवेन की रुचि ही उसके जीवन का निर्णायक मोड़ थी. जब तक वह केवल कल्याणवादी था, उसको केवल धन, तालियों की गड़गड़ाहट, मान-सम्मान तथा ख्याति के अतिरिक्त और कुछ हासिल न हो सका. अपने समय में वह यूरोप के सर्वाधिक चर्चित व्यक्तियों में से था. न केवल उद्योगपति जो उसके वर्ग से संबंधित थे, बल्कि राजनेता और शाही परिवार के सदस्य भी उसकी बातों को गंभीरता से लेते थे और उनपर विचार भी करते थे. साम्यवादी विचारधारा से उसका अंतरग परिचय, ही उसके कायाकल्प का प्रमुख साधन बना. गंभीर चिंतन के पश्चात वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि निजी संपत्ति की अवधारणा, विवाह की प्रचलित पद्धति, धर्म आदि मनुष्य के बहुआयामी विकास के प्रमुख अवरोधों में से हैं.’
व्यक्तिगत आचरण में मानवतावादी ओवेन निजी संपत्ति के साथ-साथ धर्म एवं वैवाहिक संस्था का भी बहिष्कार करने के पक्ष में था. वह इन तीनों को मानव जीवन की उन्नति की मुख्य बाधाएं मानता था. उसने लिखा भी हैं—
‘मानव जीवन की उन्नति में तीन मुख्य बाधाएं हैं – धर्म, व्यक्तिगत संपत्ति, एवं विवाह. आदर्श समाज में इन तीनों को समाप्त करना अत्यावश्यक है.’
ओवेन एक दूरदर्शी और प्रतिभासंपन्न उद्यमी था. उसके विचारों एवं कार्यक्रमों के साथ समस्या यह भी रही कि वे समय से पहले ही समाज में प्रस्तुत कर दिए गए. दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि उस समय का समाज, यहां तक कि परिवर्तन का सपना देख रहे बुद्धिजीवी, मानवकल्याण के प्रति आस्थावान उद्योगपति भी ओवेन के संकल्पों में उसका साथ देने में असमर्थ रहे थे. अपने सपने की सच में परिणति के लिए ओवेन अपने संसाधनों को झोंक रहा था. वैसी हिम्मत उसके साथियों में नहीं थी. इसलिए वे एक-एक कर ओवेन से अलग होते चले गए.
दूसरे जिन दिनों ओवेन ने अपने प्रयोग आरंभ किए, वह तीव्र वैचारिक परिवर्तनों एवं नई स्थापनाओं का दौर था. एक ओर सामंतवादी और पूंजीवादी संस्कार जनमानस को जकड़े हुए थे, मशीनीकरण के कारण लोगों से रोजगार के अवसर छीनकर उन्हें बेरोजगार और परावलंबी बनाया जा रहा था. भीषण गरीबी तथा बेरोजगारी के कारण जनमानस का आत्मविश्वास खंडित था और लोग; जिनमें वे कारीगर भी शामिल थे, जो मशीनीकरण से पहले अपनी कला के बदले न केवल जीविका के मामले में आत्मनिर्भर थे, बल्कि उसके कारण समाज में उनका अच्छा-खासा सम्मान था, उन सभी को अब अठारह-बीस घंटे तक मशीनों से जूझना पड़ता था. रहने के लिए शहर की गंदी बस्तियां थीं जहां का जीवन अत्यंत शोचनीय था. मशीनों ने उनकी कला को हेय तथा उन्हें बेचारा बना दिया था.
ऐसी परिस्थितियों में ओवेन पूंजीवाद के आचरण पर संदेह करके, न केवल उसकी खामियों की ओर संकेत कर रहा था, साथ ही वह आमूल परिवर्तनवादियों की तरह समाज में ऐसी व्यवस्था कायम करने के लिए प्रतिबद्ध भी था जो उसके अपने ही वर्ग, यानी पूंजीवादी शक्तियों के हितों के सर्वथा प्रतिकूल थी. ओवेन को समाजवाद का प्रथम आख्याकार भी माना जाता है. यह बात अलग है कि उससे अगली पीढ़ी के समाजवादियों, विशेषकर उन विद्वानों, जिन्हें विश्वास था कि आर्थिक समानता एवं समाजबाद बिना क्रांति के संभव ही नहीं है, ने ओवेन की निष्ठा पर ही सवाल खड़े किए हैं. माक्र्स के सहयोगी फ्रैडरिक ऐंग्लस का मानना था कि ओवेन की साम्यवादी विचारधारा विशुद्ध रूप से व्यापारिक लाभ के सिद्धांत एवं धंधे के जोड़-घटाव पर टिकी थी. चतुर व्यवसायी की भांति उसने ऐसे कार्यक्रमों में निवेश किया जहां से वह अधिकतम मुनाफा बटोर सके. इस कार्य के लिए गरीब कामगारों का भावनात्मक शोषण भी उसने किया. लेकिन उसकी दूरदर्शिता उसको अपने समकालीन उद्यमियों से महान और विशिष्ठ बनाती है. औद्योगिक क्रांति के दौर में जहां बाकी उद्यमी नई उदारवादी व्यवस्था को लेकर संशय और भ्रम के शिकार नजर आते हैं, वहीं ओवेन ने साहसपूर्वक सिद्धांत-आधारित व्यवस्था को अपने कारखानों में अपनाया था.
फ्रैडरिक ऐंग्लस के अनुसार एक चतुर पूंजीपति की भांति ओवेन ने मजदूरों को अपने व्यवसाय के अनुकूल ढालने के लिए नए-नए कार्यक्रम बनाए. ऊपर से देखने पर वे सभी कल्याणकारी तथा अनूठे नजर आते थे, मगर उनके पीछे ओवेन के व्यावसायिक हित जुड़े थे. ओवेन की असली नजर अपने मुनाफे पर थी. मजदूर उसके लिए मुनाफा कमाने का माध्यम भर थे. ऐंग्लस के अनुसार—
‘‘समाज के विपन्न वर्ग के प्रति ओवेन की उदारता और दरियादिली मनुष्यता के तय मापदंडों से बहुत पीछे थी. उनके प्रति उसके सभी आग्रह केवल दिखावटी, अवास्तविक तथा मनुष्यता की पवित्र अवधारणा से बहुत परे थे— ‘लोग मेरी मेहरबानी पर पलने वाले मेरे दास थे.’ ओवेन के ये शब्द उसकी उदारता और दरियादली को कटघरे में खड़ा करने के लिए पर्याप्त हैं. ओवेन द्वारा कामगारों के लिए आनुपातिक रूप से उपलब्ध कराया गया बेहतर वातावरण, व्यक्तित्व के बहुआयामी विकास के लिए आवश्यक परिवेश से बहुत पीछे था.’’
अपने विचार को फ्रैडरिक ऐंग्लस ने उदाहरण देकर समझाने का प्रयास भी किया है. ‘दि रिवोल्युशन इन माइंड एंड पै्रक्टिश’ नामक ग्रंथ में ऐंग्लस का एक यादगार भाषण संकलित है. जिसमें वह ओवेन की फैक्ट्रियों की तात्कालिक स्थिति की आलोचना करते हुए उसके प्रयासों को संदेह के घेरे में ले आता है. ओवेन की व्यावसायिक कुशलता एवं मशीनीकरण के कारण उत्पादन व्यवस्था में आए बदलाव की ओर संकेत करते हुए वह लिखता है कि:
‘लगभग ढाई हजार की आबादी का प्रमुख कामगार वर्ग प्रतिदिन इतना विशुद्ध लाभ कमा रहा था जिसे कमाने के लिए करीब पचास वर्ष पहले पूरे साठ लाख मजदूरों और कामगारों की आवश्यकता पड़ती थी.’ ओवेन की उद्यमशीलता को देखकर ऐंग्लस भी चमत्कृत था. उसने आगे लिखा है कि—‘मैं स्वयं यह सोचकर हैरान हूं कि ढाई हजार कामगारों के ऊपर किए जाने तथा साठ लाख कामगारों के ऊपर किए जाने वाले खर्च का कितना अंतर होगा.’
पूंजी के कारण सामाजिक और राजनीतिक संबंधों में आए बदलाव को लेकर ऎंग्लस एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थापना देता है कि—
‘यदि अत्याधुनिक तकनीक के आधार पर निर्मित मशीनों और नई औद्योगिक नीतियों के कारण, नई पूंजी का सृजन नहीं होता, जैसे कि वह हुआ, तो नेपोलियन के विरुद्ध यूरोप का संगठित युद्ध तथा समाज के संभ्रांत वर्ग के हितों की सुरक्षा असंभव थी. समाज में यह नई ताकत दरअसल औद्योगिकीकरण के कारण नौकरीपेशा लोगों की जमात के पैदा होने के कारण आई थी.’
स्पष्ट है कि उससे पहले तक समाज में सामंती मूल्यों का वर्चस्व था. राजनीति और धर्म के स्वार्थी गठजोड़ से सामाजिक मूल्य धराशायी हुए थे. व्यवस्था के नाम पर केवल अराजकता थी और संगठित चेतना का अभाव. हांलाकि प्रारंभ में कोई बाहरी दबाव न होने के कारण नए-नए जन्मे पूंजीपति वर्ग का सारा जोर अधिक से अधिक रुपया कमाने पर था. मगर उसके लिए लंबे समय तक समाज की उपेक्षा कर पाना संभव नहीं था. क्योंकि उत्पादन एवं उपभोग के स्तर पर पूंजीवादी व्यवस्था को जनसमर्थन की आवश्यकता पड़ती है. इसीलिए पूंजीवाद के बढ़ते प्रभाव के दौरान, उत्पादन व्यवस्था को अधिकाधिक कार्यक्षम बनाने के साथ-साथ उसको लोकोपकारी बनाने के प्रयास भी शुरू हो चुके थे.
उधर समाज में तेजी से उभरते बुद्धिजीवी वर्ग से पूंजीपतियों की नीयत छिपी न थी. इसीलिए उसका एक वर्ग वैकल्पिक व्यवस्था के निर्माण में जुटा था, तो दूसरा वर्ग नागरिकों के सहयोग से पूंजीवाद को नख-दंत विहीन कर देने की कोशिशें कर रहा था. पहले वर्ग का प्रतिनिधित्व करने का श्रेय रोशडेल पायनियर्स जैसे सहकारी संगठन को जाता है तो दूसरे वर्ग के नेतृत्व की बागडोर राबर्ट ओवेन जैसे उद्यमी-विचारकों के हाथों में थी. ध्यातव्य है कि समाजवादियों का यह उदीयमान वर्ग सुविधाओं को समाज के निम्नतम वर्गों तक पहुंचाने के प्रति संकल्पबद्ध था. धर्म एवं संस्कृतिवादियों द्वारा समाज के निचले वर्ग पर त्याग एवं संयम के नाम पर थोपे गए परंपरागत बंधनों का यह वर्ग निषेध करता था. प्रसिद्ध समाजविज्ञानी जी. डी. एच. कोल इस समाजवादी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए लिखा है—
‘किसी औचित्यपूर्ण सामाजिक संस्थान के गठन का आधार, मनुष्य की नैसर्गिक इच्छाओं का दमन न होकर, प्राणीमात्र की इस तरह से संतुष्टि होना चाहिए कि वह आपसी वैमनस्य के स्थान पर सामाजिक सद्भाव का जन्मदाता बन सके.’
यद्यपि ऐंग्लस के अनुसार ओवेन का साम्यवाद मात्रा एक व्यापारिक कर्मकांड था, जो धंधे के स्वाभाविक जोड़-घटाव और लाभ-हानि के सिद्धांत पर टिका था. कहा जा सकता है कि ओवेन ने अपने समय के समाजवादी चिंतकों से प्रेरणा तो ली, किंतु लाभ कमाने की सहज अभिलाषा से वह मुक्त न हो सका था. लाभार्जन किसी भी व्यापारी और उद्यमी की सहज और स्वाभाविक अभिलाषा है. अतः ओवेन के महत्ता मात्रा इस बात से कम नहीं हो जाती कि वह अपनी लाभार्जन की स्वाभाविक इच्छा का परित्याग कर पाने में असमर्थ रहा था. ओवेन की महत्ता इस बात में है कि उसने अपने मजदूरों और कामगारों की समस्याओं को पहचाना तथा उनको हल करने के लिए ठोस पहल भी की. इसका व्यावसायिक लाभ भी उसको मिला. मजदूरों ने ओवेन की भावनाओं का सम्मान करते हुए उसको अपना संपूर्ण सहयोग प्रदान किया था.
ओवेन द्वारा बच्चों के पाठशालाओं की शुरुआत उस समय की एकदम नई पहल थी. इसलिए ओवेन को शिशु पाठशालाओं का जन्मदाता भी माना गया है. 1823 में ओवेन द्वारा आयरलैंड में मजदूरों के कल्याण के लिए बस्तियों की स्थापना, उस समय सहजीवन का एकदम नया प्रयोग था. उसने अपनी संपूर्ण ऊर्जा और संपत्ति उस कार्यक्रम की सफलता के लिए झोंक दी थी. अपनी उन क्रांतिकारी योजनाओं में यद्यपि ओवेन को असफलता ही हाथ लगी थी, मगर उसके पीछे तात्कालिक समाज और राजनीति पर सामंतवाद के अनुचित दबाव थे, जो उसके पश्चात लगभग आधी शताब्दी तक बने रहे. हीगेल, माक्र्स, जा॓न स्टुअर्ट मिल, सार्त्र आदि के प्रभाव से आगे चलकर समाज का जनतांत्रिकरण संभव हो सका. अतः प्रारंभिक असफलताओं को ओवेन की चारित्रिक कमी का पर्याय नहीं माना जा सकता. हां, उसकी सफलता को हम उसके मजदूरों की संवेदनशीलता का परिणाम अवश्य मान सकते है.
यहां यह उल्लेख कर देना अप्रासंगिक नहीं होगा कि उनीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में पश्चिमी समाज पर कल्पनाशीलता का प्रभाव था, जिसे जा॓न कीट्स ‘विचारों के स्थान पर जीवन में संवेदनशीलता की खातिर.’ के द्वारा आवाह्न कर कर रहे थे तो विलियम ब्लैक जैसे कवि-कथाकार ‘करो जीवन-जल में स्नान’ कहकर काव्यात्मकता और रहस्यात्मकता की ऊचाइयों तक ले जाने का प्रयास कर रहे थे. जबकि बैंथम, पूधों और जेम्स मिल जैसे विचारक, एडम स्मिथ और रिकार्डो जैसे विद्वान अर्थशास्त्री स्थितियों पर अधिक वस्तुनिष्ठ ढंग से विचार कर रहे थे. उन्होंने खोखली रूमानियत तथा धार्मिक मिथ्याचारों से समाज को बाहर लाकर उसे ठोस आधार देने का प्रयास किया तथा सुख को सबकी पहुंच में लाने वाली व्यवस्था का पक्ष लेते हुए उन कुंठाओं से समाज को मुक्त करने का प्रयास किया जिन्होंने समाज को शताब्दियों से जकड़ा हुआ था. ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख’ इस वर्ग के विचारकों का मूल मंत्र रहा.
धर्म और धार्मिक संस्थाओं की अवहेलना के कारण उनको अनेक बार धर्म-सत्ता के उग्र विरोध का सामना भी करना पड़ा. कई बार धार्मिक पोंगापंथियों ने अपने कुतर्क के सहारे लोगों को फुसलाकर सामाजिक परिवर्तनवादियों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास भी किया. इन लोगों की स्वार्थी दृष्टि में लाभ कमाने की प्रवृत्ति के स्थान पर सेवा-सहयोग-समर्पण एवं त्याग के माध्यम से सामाजिक विकास की रूपरेखा गढ़ना, कल्पना की उड़ान जैसा था. बावजूद इसके समाज में इन विचारकों का प्रभाव लगातार बढ़ता चला गया. विशेषकर तेजी से उभरते मध्यवर्ग में, जो एक और तो नई तकनीक में पारंगत होकर पूंजीवादी व्यवस्था को मजबूत करने पर तुला था, तो दूसरी ओर अपने विद्रोही स्वभाव की रक्षा करता हुआ, समाज में नई वैचारिक क्रांति का आवाह्न कर रहा था. चूंकि समाज के बौद्धिक नेतृत्व की सर्वाधिक जिम्मेदारी मध्यवर्ग की ही थी जिसका अधिकांश समाज के निम्न वर्ग से ऊपर उठकर अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहा था, अतः इस वर्ग की स्वाभाविक आस्था परिवर्तनवादी दार्शनिकों एवं अर्थशास्त्रियों के प्रति थी.
बहरहाल, परिवर्तनवादियों के प्रति निरंतर बढ़ते जनसमर्थन के आगे कालांतर में यथास्थितिवादियों को झुकना ही पड़ा. नवजागरण की लहर ने स्वार्थी धर्मसत्ता और भ्रष्ट राजनीतिज्ञों की एक न चलने दी. राबर्ट ओवेन को अपने जीवन में हालांकि असफलता का सामना करना पड़ा था. मगर अपने संसाधनों के आधार पर उसने जो आजीवन प्रयोग किए थे, कालांतर में उन्हीं के आधार पर सहकारिता जैसे कल्याणकारी विचार का जन्म हुआ और आने वाले वर्षों में सहकार की नींव रखी जा सकी.

© ओमप्रकाश कश्यप

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1 टिप्पणी

Filed under राबर्ट ओवेन: आधुनिक सहकारिता आंदोलन का जन्मदाता

One response to “राबर्ट ओवेन : आधुनिक सहकारिता आंदोलन का जन्मदाता-दो

  1. राबर्ट ओवेन के बारे में आपके द्वारा लिखे लेख में मैने मामूली सा सुधार किया है। देखें-

    http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9F_%E0%A4%93%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A8

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