राबर्ट ओवेन: आधुनिक सहकारिता आंदोलन का जन्मदाता-एक

[राबर्ट ओवेन की ख्याति एक समाजवादी विचारक, उदार उद्यमी और समर्पित लोक-कार्यकर्ता की है. भीषण गरीबी में बचपन बिताने वाले राबर्ट ओवेन ने मात्र दस वर्ष की वयस् में प्रशिक्षु दर्जी से जीवन-संघर्ष की शुरुआत की. अपनी प्रतिभा, लगन और उद्यमशीलता के दम पर वह आगे चलकर ब्रिटेन का जाना-माना उद्योगपति बना. मनुष्यता के इतिहास में उसे दो प्रमुख आंदोलनों का जन्मदाता और उन्नायक होने का श्रेय प्राप्त है. अपने कारखानों में ओवेन ने सबसे पहले शिशु शिक्षा की शुरुआत की तथा काम के साथ-साथ शिक्षा की अवधारणा का जन्मदाता बना. वह श्रम-अधिकारों का समर्थक था. श्रमिकों को आर्थिक मोर्चे पर आत्मनिर्भर बनाने के लिए उसने सहकारी समितियां गठित कीं. मजदूरों की आवास-समस्याओं के निदान के लिए उसने सहजीवन पर आधारित बस्तियों की स्थापना की, जिससे सहकारिता का नया रूप दुनिया के सामने आया. कामगार बच्चों के लिए पाठशालाओं के अलावा खेल-सदन एवं गर्भवती स्त्रियों के लिए आराम के घंटों और उपयुक्त इलाज की व्यवस्था भी उसने अपने संसाधनों के बल पर की.
इसमें कोई संदेह नहीं कि ओवेन द्वारा किए गए श्रम-सुधारों का उसको आर्थिक लाभ भी पहुंचा. एक समय में ओवेन के कारखाने ब्रिटेन के सर्वाधिक मुनाफा कमाने वाले कारखानों में से थे. मगर उसने श्रमिकों के जीवन में सुधार के प्रयास से कभी मुंह नहीं मोड़ा. हर महान व्यक्तित्व की भांति ओवेन को भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. कुछ विद्वानों ने ओवेन के प्रयासों को उसकी सोची-समझी उद्योगनीति का हिस्सा माना है. मार्क्स और फ्रेड्रिक ऎंगल्स आदि साम्यवादियों ने ओवेन के विचारों की आलोचना की तो श्रमिकों के कल्याण के लिए उसके द्वारा उठाए गए कदमों की सराहना भी की. अपने कल्याणधर्मी प्रयासों में ओवेन को हालांकि अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई, किंतु उसकी सदाशयता और श्रम-कल्याण के प्रति समर्पण-भावना का अनुमान मात्र इससे लगाया जा सकता है कि उसने श्रम-पूर्वक कमाई गई अपनी समस्त पूंजी अपने प्रयोगों और योजनाओं पर खर्च कर दी. परिणामस्वरूप उसे अपने जीवन के आखिरी दिन भयानक आर्थिक संकट में बिताने पड़े. वह चाहता था कि बाकी उद्योगपति और सरकार भी श्रम-कल्याण के लिए आगे आएं. मगर सही मायनों में ऐसा हो न सका. ओवेन को अधिकांश उन्हीं लोगों का समर्थन मिला जो आर्थिक मोर्चे पर विपन्न थे. तो भी सहकारिता आंदोलन पुनर्जीवित करने तथा शिशु-शिक्षा की महत्ता को रेखांकित करते हुए उसके लिए व्यापक प्रयास करने का जो महान ऐतिहासिक योगदान ओवेन ने दिया, उसके कारण उसकी उपेक्षा कर पाना शताब्दियों तक असंभव ही रहेगा. राबर्ट ओवेन का जीवन न केवल आधुनिक अर्थव्यवस्था से आजिज आ चुके अर्थशास्त्रियों और विद्वानों के लिए प्रेरक है, बल्कि इससे वे धनकुबेर, विशेषकर भारतीय, भी प्रेरणा ले सकते हैं, जो अस्सी करोड़ भारतीयों की भूख, गरीबी और तंगहाली की कीमत पर रातों-रात और अमीर, और ज्यादा अमीर होते जा रहे हैं. —ओमप्रकाश कश्यप]

सहकारिता के जनक राबर्ट ओवेन (मई 14, 1771 – नवंबर 17, 1858) के बारे में कुछ कहने से पूर्व हमें स्मरण करना होगा कि वह सहकारिता के सिद्धांत का मौलिक विचारक नहीं था. उससे पहले भी आर्थिक संसाधनों के विकेंद्रीकरण के पक्ष में अनेक अर्थशास्त्री अपना पक्ष रख चुके थे. यहां तक कि सहकारिता के पर्याय साहचर्य का शब्द का उदय भी हो चुका था. किंतु इससे राबर्ट ओवेन का योगदान कम नहीं हो जाता. उसकी महत्ता इस बात में है कि उसने सहकार को व्यावहारिकता के धरातल पर साकार करने की कोशिश अपनी पूरी ईमानदारी और सामर्थ्य के साथ की. अपने विचारों के लिए सदैव समर्पित भाव से काम करता रहा. हालांकि उसे अंततः असफलता ही हासिल हुई; मगर तब तक दुनिया सहकार के सामर्थ्य से पूरी तरह परिचित हो चुकी थी.
अठारहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में ही अर्थशास्त्री एवं विचारक यह मानने लगे थे कि समाज की आर्थिक समस्याओं का निदान छोटे-छोटे कार्यसमूह बनाकर किया जा सकता है. उस समय स्पष्ट है कि उनकी निगाह, समाज के उस वंचित, अशिक्षित, गरीब और संसाधनविहीन वर्ग पर थी, जो विभिन्न सामाजिक कारणों से विकास की दौड़ में पिछड़ा हुआ था. उसके पास विपुल श्रम-सामर्थ्य था, परंपरागत तकनिकी कौशल जो जगह-जगह बिखरा पड़ा था. संसाधनों का अभाव था. मगर उससे भी अधिक थे—आत्मविश्वास की कमी, दिशा एवं नेतृत्वकला का अभाव, संसाधनों की विरलता तथा सकारात्मक स्पर्धा में टिके रहकर कार्य करने का जुनून. नकारात्मक स्पर्धा का उपयोग पूंजीपतिवर्ग अर्से से करता आ रहा था. इसी कारण उस श्रमशक्ति का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा था. जबकि उससे कुछ ही दशक पहले दुनिया में पूंजीवाद का आगमन बड़े जोर-शोर के साथ हुआ था.
औद्योगिकीकरण के प्रारंभ में पूंजीवाद ने बड़बोलापन दिखाते हुए दुनिया-भर के गरीब मजदूरों, सर्वहारा वर्ग के आंसू पोंछने का आश्वासन दिया था. प्रत्येक नागरिक को एक बेहतरीन दुनिया का सपना दिखाया गया था. मशीनें चूंकि कठिन श्रम से मुक्ति प्रदान करती थीं, अतएव शुरू-शुरू में मजदूरों एवं शिल्पकारों ने उनका स्वागत खुले मन के साथ किया था. हालांकि समाजवादियों के एक वर्ग के मन में उन्हें लेकर संदेह भी था, किंतु नई तकनीक के आगमन के समय के जोश ने उनकी सलाह को अनसुना करने को विवश कर दिया था. मगर उस आश्वासन का हश्र भी पूंजीपतियों की बाकी घोषणाओं की तरह ही हुआ. औद्योगिक विकास के चलते समाज में मध्यवर्ग का तेजी से विकास होने लगा. कालांतर में मध्यवर्ग खुद भी कई खानों में बंटता गया. एक वर्ग की आस्था परंपरागत समाज-व्यवस्था में थी. किसी भी परिवर्तन के विरोध में खड़ा होने वाला वह वर्ग पहले सामंतों-जमींदारों का समर्थन करता आया था और अब उनके स्थान पर पनपे नवउद्यमी वर्ग के समर्थन में खड़ा था. हमेशा की भांति मध्यवर्ग एक हिस्सा पूरी तरह निष्क्रय था तो उसका दूसरा हिस्सा ऐसा भी था जो स्वाभावतः विद्रोही था. वह देख रहा था कि सामंतवाद के पतन तथा औद्योगिक क्रांति का कोई लाभ समाज के बहुसंख्यक वर्ग को नहीं मिल पाया है. यही वर्ग स्थिति में आमूल परिवर्तन के लिए प्रयासरत था. जब इस वर्ग ने देखा कि औद्योगिकीकरण के अंधड़ में सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न होती जा रही है और लोगों का भरोसा उनसे उठने लगा था; तो उसने संगठित जनशक्ति का उपयोग कर सहकार की नींव डाली.
राबर्ट ओवेन और उसी के समान सोचवाले कुछ विचारकों का मानना था कि समाज की आर्थिक समस्याओं का हल विशेष उद्देश्य वाले कार्य-समूह बनाकर किया जा सकता है. यह एक युगानुकूल विचारधारा थी. इससे भी बड़ी बात यह रही कि उसको ऐसे समय में कार्यान्वित किया गया जिस समय समाज को उसकी सर्वाधिक आवश्यकता थी. जाहिर है इसके पीछे यूरोप-भर में सक्रिय बुद्धिजीवियों तथा उनके द्वारा प्रेरित जनतांत्रिक आंदोलनों का भी हाथ था. समाज का बहुत बड़ा वर्ग पूंजी-प्रधान अर्थव्यवस्था से उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक असंतुलन से जूझ रहा था. लोगों के मन में गहन आक्रोश था. ऐसे लोगों की ओर से भी राबर्ट ओवेन को भरपूर समर्थन मिला. शास्त्रीय भाषा में इन विचारकों को साहचर्य समाजवादी (Associative Socialists) का नाम दिया गया है.
सहकारिता का उद्भव औद्योगिकीकरण की तीव्र गति के बीच निरंतर कमजोर पड़ते जा रहे, समाजवाद को नई दिशा देने की कोशिशों का परिणाम था. यह एक तरह से समाजवाद की पूरक एवं सहयोगी विचारधारा थी, जिसमें नए जमाने की चुनौतियों से निपटने का क्षमता और उसके लिए जरूरी आत्मविश्वास था. इससे पहले के समाजवादियों का मानना था कि पूंजी एवं अन्य संसाधनों पर पूरे समाज का अधिकार होना चाहिए. जनतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा चुनी गई उत्तरदायी सरकारें, उनका प्रयोग राष्ट्रहित में करें. अवसरों की समानता, संसाधनों का विकेंद्रीकरण उस व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएं थीं. साहचर्य समाजवादी भी पूंजी सहित सभी संसाधनों पर समाज एवं समूह का सम्मिलित अधिकार मानने के पक्षधर थे, किंतु उनका विश्वास था कि सदस्यों की साझेदारी के अभाव विकास के ऐच्छिक लक्ष्यों की प्राप्ति असंभव है. संसाधनों के विकेंद्रीकरण के लिए वे चाहते थे कि छोटे-छोटे उत्पादक समूह संगठित होकर बड़े दायित्वों का निर्वाह करें. समूह अपने आप में आत्मनिर्भर होंगे, तभी वे समाज को आत्मनिर्भरता की ओर ले जा सकेंगे. तभी संसाधनों का वांछित दोहन तथा लाभ का न्यायिक वितरण संभव हो सकेगा.
साहचर्य शब्द तो आधुनिक समाज की उपज है. राबर्ट ओवेन खुद को मात्र समाजवादी ही मानते थे. अपनी पत्रिका Co-operative Magzine में Socialist शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग भी राबर्ट ओवेन ने किया था. हालांकि इन दोनों ही शब्दों के पारंपरिक अर्थ इनके वर्तमान अर्थों के अपेक्षा तब थोड़े भिन्न थे. किंतु मूल भावनाएं तब भी लगभग वही थीं, जो कि आज हैं.

प्रारंभिक जीवन

ओवन का जन्म 14, मई 1771 को सेंट्रलवैल्स के एक साधारण-से कस्बे न्यूटाउन में हुआ था. सात भाई-बहनों में से एक ओवेन के पिता साधारण व्यापारी थे. लोहे के औजारों की बिक्री की दुकान थी उनकी. जबकि मां का संबंध एक संपन्न किसान परिवार से था. ओवेन का बचपन घने अभावों के बीच बीता. उसकी शिक्षा की शुरुआत तो ठीक-ठाक हुई मगर वह पूरी हो उससे पहले, मात्रा नौ वर्ष की अवस्था में ही उसे स्कूल छोड़कर नौकरी करनी पड़ी. काम की तलाश में वह अपने सबसे बड़े भाई विलियम के साथ लंदन चला गया. उसको पहली नौकरी लंकाशायर में दर्जी के रूप में मिली. कुछ वर्षों तक ओवेन वहां पर काम सीखता रहा. उससे आगे के नौ वर्ष ओवेन ने नौकरी करते हुए बिताए. धीरे-धीरे उसने कुछ रकम और कुछ सपने भी जमा किए. इस बीच महत्त्वाकांक्षाएं जो परिस्थितिवश कुछ समय के लिए दब गई थीं, वे फिर से सिर उठाने लगीं. भाप के इंजन का आविष्कार उससे कुछ ही वर्षों पहले हुआ था, भापशक्ति से चलने वाले करघों के कारण कपड़ा उद्योग में क्रांति आई हुई थी. इसी कारण मैनचेस्टर के कपड़ा उद्योग का उन दिनों बड़ा नाम था. 1790 के आखिरी महीनों में ओवेन ने अपने बड़े भाई विलियम से सौ पौंड की रकम उधार ली. अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का खूबसूरत सपना मन में सजाए एक दिन वह मैनचेस्टर पहुंच गया.
अपनी मामूली-सी पूंजी से उसने जोन के साथ मिलकर एक धागे की जूतियां बुनने के छोटे-से कारखाने की शुरुआत की. जोन उससे पहले मैकेनिक का काम करता था. काम को देखते हुए सौ पौंड की पूंजी बहुत कम थी. बड़ी कंपनियों के साथ कठिन स्पर्धा में ओवेन की मिल टिक नहीं पाई. इस बीच जोन के साथ साझेदारी निभाने में भी समस्याएं आने लगी थीं. इसलिए मात्रा तीन महीने के अंतराल में जोन के साथ अपने साझेदारी तोड़कर ओवेन ने अपने अलग कारखाने की नींव रखी. ओवेन उसे चालू रखने के लिए संघर्ष कर ही रहा था कि मैनचेस्टर के एक बड़े कारखाने में प्रबंधक का पद रिक्त होने की सूचना उसे मिली. उसने अपनी मिल का लालच छोड़ दिया और उस नौकरी पर जा लगा. उस समय उसकी उम्र केवल इकीस वर्ष थी. वह एक प्रकार से सतत संघर्ष एवं सफलता की शुरुआत थी. मेहनती और लगनशील तो वह था ही. छह महीने के अल्प समय में ही वह मिल मालिक के दिलो-दिमाग पर अपनी कार्यशैली का सिक्का जमाने में सफल हो गया.
उस कारखाने में उस समय पांच सौ मजदूर काम करते थे. ओवेन के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी, किंतु उसकी सफलताओं का सही मायने में तो यह प्रारंभ ही था. रात-दिन के कठिन परिश्रम, प्रतिभा और लगन से ओवेन ने उस कारखाने को कुछ ही वर्षों में ब्रिटेन के सर्वश्रेष्ठ कारखानों में ला दिया. ओवेन उद्यमशीलता का अनुमान मात्रा एक उदाहरण से लगाया जा सकता है कि उसने अपने कारखाने के लिए अमेरिकी द्वीपों से रूई का आयात किया. वह दक्षिणी राज्यों से पहला रूई का पहला आयात था.
यही नहीं ओवेन ने रूई कताई के कार्य में भी उल्लेखनीय दक्षता प्राप्त की. निर्विवाद रूप से उसका कारखाना तत्कालीन ब्रिटेन के सर्वश्रेष्ठ कताई कारखानों में से एक था; जिसकी सफलता का श्रेय यदि किसी को दिया जा सकता है तो वह केवल ओवेन ही था. इकीस वर्ष का तरुण ओवेन 1795 में मेनचेस्टर के एक ओर बड़ी कपड़ा मिल काल्र्टन ट्विस्ट कंपनी का प्रबंधक और हिस्सेदार बन चुका था; जिससे उसका नाम वहां के सर्वाधिक सफल उद्यमियों में गिना जाने लगा.
उन्हीं दिनों ओवेन को अपनी फैक्ट्री के कार्य से न्यू लेनार्क जाना पड़ा, जो अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण वस्त्र उद्योग के लिए बहुत ही उपयुक्त स्थान था. तब तक वह एक सुदर्शन युवक बन चुका था. वस्तुतः ओवेन को खबर मिली थी कि न्यू लेनार्क के प्रसिद्ध कपड़ा व्यवसायी डेविड डेल अपनी कपड़ा मिलों का सौदा करना चाहते हैं. डेविड डेल की ख्याति दूरदर्शी एवं कामयाब उद्यमियों में होती थी. ओवेन की ख्याति उन तक पहुंच चुकी थी. उसकी बेजोड़ प्रतिभा और लगनशीलता से डेल चमत्कृत थे. न्यू लेनार्क पहुंचते ही ओवेन के जीवन में एक और सुखद मोड़ आया. डेविड डेल की एक बेटी थी—का॓रोलिना डेल. युवा ओवेन उसके प्यार में पड़ गया. का॓रोलिना भी उसके आकर्षण से बच न सकी. डेविड डेल ने ओवेन के हाथों न केवल कपड़ा मिलों के एक हिस्से का सौदा किया, बल्कि अपनी कन्या का विवाह भी उसके साथ कर दिया. यह सितंबर, 1799 की घटना थी, जिसने ओवेन को एक साथ कई उपलब्धियों से लाद दिया. विवाह के पश्चात ओवेन वहीं अपना घर बनाकर रहने लगा.

एक दूरदृष्टा उद्यमी

न्यू लेनार्क की वह फैक्ट्री डेल और रिचर्ड आर्कराइड ने 1784 में प्रारंभ की थी. फैक्ट्री उस समय न्यू लेनार्क की सबसे बड़ी कपड़ा मिलों में से एक थी; जिसे चलाने के लिए जल-शक्ति का उपयोग किया जाता था. दो हजार से अधिक कर्मचारी उसमें कार्य करते थे; जिनमें से लगभग पांच सौ गरीब परिवारों के बच्चे थे. बच्चों में भी अधिकांश की आयु पांच से छह वर्ष के बीच थी. यही स्थिति उन दिनों अधिकांश कपड़ा मिलों में थी. डेविड डेल यद्यपि बालश्रमिकों का पूरा ध्यान रखते थे, लेकिन कोई कारगर व्यवस्था न होने के कारण मजदूरों, विशेषकर बालश्रमिकों की दशा शोचनीय बनी हुई थी. अधिकांश कामगार बेहद गरीब, अशिक्षित परिवारों से संबद्ध थे. अशिक्षा, कुंठा और हताशा के कारण चोरी, जुआ, शराब और नशाखोरी जैसी अनेक कुरीतियां उनके जीवन में प्रवेश कर चुकी थीं. घर के नाम पर उन सभी के पास एक-एक कमरा होता था, छोटा-सा और गंदा भी, जिसमें स्वच्छ हवा का प्रवेश भी असंभव था. बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था तो दूर बीमारों के इलाज के लिए भी कोई इंतजाम नहीं था.
उस समय तक ओवेन खूब संपन्नता एवं समृद्धि बटोर चुका था. विवाह के पश्चात उसके आत्मविश्वास में वृद्धि भी खूब हुई. परंतु ओवेन की महत्त्वाकांक्षाओं का अंत अभी दूर था. उसके भविष्य की रूपरेखा इसी आत्मविश्वास के आधार पर तय होनी थी, क्योंकि यह उसका आत्मविश्वास ही था जिसने उसे कठोर फैसले लेने की प्रेरणा दी, जिससे वह आजीवन अपने विचारों एवं उद्देश्यों के लिए संघर्षरत रह सका. अपने क्रांतिकारी फैसलों के लिए ओवेन ने अपने सरकार और उद्योगपतियों की आलोचनाएं सहीं. उसके हिस्सेदार उसे छोड़कर चले गए. करोड़ो रुपये की संपत्ति जो उसने कठिन परिश्रम से अर्जित की थी, धीरे-धीरे उसकी कल्याणकारी योजनाओं की भंेट चढ़ गई. लेकिन इतिहास में अलग चलने, नया कार्य करने, आने वाली पीढ़ियों के लिए नए प्रतिमान गढ़ने वाले महापुरुषों के लिए यह कोई नया नहीं है. इतिहास का दरबार ऐसी ही चुनौतियों को पार करने वाले महापुरुषों को सहेजने में गर्वानुभूति करता है.
ओवेन कोरा व्यवसायी नहीं था. उसके पास खूबसूरत और संवेदनशील मानस भी था, जो दूसरों को कष्ट में देखते ही विचलित हो उठता था. वह स्वयं गरीब परिवार से आया था. इस कारण गरीबी की विवशताओं और कष्टों से वह भली-भांति परिचित था. उन दिनों न्यू लेना॓र्क में जहां बड़े-बड़े कारखानों की भरमार थी, वहीं उसके आसपास गरीब मजदूरों की छोटी-छोटी अनेक बस्तियां भी बसी हुई थीं. वहां का जीवन नारकीय था. ओवेन को लग रहा था कि उत्पादकता में अपेक्षित वृद्धि कारीगरों और मजदूरों के रहन-सहन तथा उनकी परिस्थितियों में सुधार किए बिना संभव नहीं है. इसलिए उसने अपने जीवन के अगले दस वर्ष मजदूरों की हालत सुधारने के नाम कर दिए. उसने मजदूरों की आवास-बस्तियों का उद्धार किया. उन बस्तियों में स्वयं जा-जाकर मजदूरों की गंदी आदतों को छुड़ाने का प्रयास किया. बालश्रमिकों के कार्य-घंटे कम कर, उनकी शिक्षा एवं मनोरंजन का प्रबंध किया. महिला मजदूरों के लिए अलग विश्रामघर और प्रसूति-केंद्रों की व्यवस्था की. इन प्रयासों से एक ओर तो मजदूरों के जीवन में सुधार आया, अभी तक जो मजदूर औद्योगिकीकरण को संदेह की दृष्टि से देखते थे, उनके विचारों में परिवर्तन भी हुआ. नई व्यवस्था के प्रति उनका आक्रोश कम होने लगा.
परिणामतः उत्पादन बढ़ा, उसका लाभ भी ओवेन को मिला. ध्यातव्य है कि ओवेन द्वारा अपने कर्मचारियों के कल्याण के लिए जितने भी कदम उठाए गए उनके पीछे उसकी विशुद्ध व्यावसायिक दृष्टि थी. एक दक्ष उद्यमी की भांति वह स्थितियों का अपने पक्ष में मोड़ लेने में पारंगत था. कार्ल मार्क्स के सहयोगी और मार्क्सवादी विचारक फ्रैड्रिक ऐंग्लस ने अपने चर्चित लेख—Socialism: Utopian and Scientific में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि—
‘विकास एवं श्रमिक-कल्याण के नाम पर ओवेन द्वारा अभी तक जितने भी कदम उठाए गए थे, वे सभी मानवीय गरिमा से परे, केवल दिखावटी थे. ‘लोग मेरी दया पर निर्भर, मेरे दास के समान हैं.’— ओवेन का यही सोचना था. तुलनात्मक रूप में उसने अपने कर्मचारियों को बेहतर वातावरण उपलब्ध कराने के प्रयास तो किए, मगर वे उनके व्यक्तित्व एवं बुद्धि के चहुमुंखी विकास से काफी दूर थे. उन्हें अपने विवेक का इस्तेमाल करने की छूट बहुत कम, विशिष्ट संदर्भों तक सीमित थी.
ओवेन पर सुधारवादियों का प्रभाव पड़ा था. वह मेनचेस्टर की Literary and Philosophical Society का सम्मानित सदस्य था. स्काटिश नवजागरण आंदोलन से प्रभावित ओवेन का मानना था कि मनुष्य का व्यक्तित्व उसके वातावरण से प्रभावित एवं विनिर्मित होता है. इसलिए वातावरण में सुधार द्वारा व्यक्तित्व का परिष्कार किया जा सकता है.
‘शिक्षा नैतिक जगत से संपर्क कराने वाला इंजन है.’ शिक्षा के महत्त्व को रेखांकित करती किसी इतिहासकार की इस उक्ति का वह समर्थक था. व्यक्तित्व निर्माण के लिए शिक्षा की अनिवार्यता दर्शाते हुए उसने कहा था कि—
‘मनुष्य का व्यक्तित्व उसके वातावरण से प्रभावित होता है. अतः विवेकवान एवं मानवीय भावनाओं से ओतप्रोत व्यक्तित्व के निर्माण के लिए शिक्षा का योगदान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है. इसलिए शिक्षक का पहला कर्तव्य है कि बालक के मानसिक एवं शारीरिक विकास के लिए पूर्णतः अनुकूल वातावरण की सरंचना करे.’
उन दिनों अधिकांश कारखाना मालिकों द्वारा अपने मजदूरों को नकद मजदूरी देने के बजाए वस्तुविनिमय प्रणाली के आधार पर भुगतान किया जाता था. तदनुसार मजदूरों को टोकन दे दिए जाते थे; जिनकी कारखाना मालिकों के समूह से बाहर कोई कीमत न थी. उन टोकन के बदले मजदूर तयशुदा दुकानों से आवश्यक वस्तुएं खरीद सकते थे. मजदूरों की विवशता का लाभ उठाने के लिए उन दुकानों पर भी उनका खुला शोषण होता था. वहां मिलने वाला सामान घटिया और बाजार की अपेक्षा महंगा होता था. उस कुरीति के विरुद्ध आवाज उठने लगी तो, ब्रिटिश संसद ने गैरकानूनी करार देते हुए उसपर रोक लगा दी थी.
मजदूरों की समस्या को देखते हुए ओवेन ने एक उपभोक्ता केंद्र की शुरुआत की जहां अच्छी गुणवत्ता का सामान लागत-मूल्य से कुछ ही ऊपर का भुगतान करने पर प्राप्त हो सकता था. उसने मजदूरों के चारित्रिक विकास के लिए भी आवश्यक कदम उठाए. यह जानते हुए कि मजदूर अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा शराब तथा नशे की अन्य वस्तुओं पर लुटा देते हैं, ओवेन ने उनकी बिक्री को कड़े नियंत्रण में रख दिया. यही नहीं ओवेन ने अपने कामगारों को उपभोक्ता भंडारों से थोक खरीद के लिए भी प्रोत्साहित किया; जिससे वे अधिक बचत कर सकें. बचत पर जोर देते हुए उसने मजदूरों को कठिन समय के लिए अपनी आय का एक हिस्सा अनिवार्य रूप से बचाने के लिए कहा. बालश्रमिकों के लिए उसने बेहतर परिस्थितियों का सृजन किया. उनके कार्यघंटे सुनिश्चित किए तथा अनिवार्य शिक्षा के लिए पाठशालाएं खुलवाईं. ओवेन के उपभोक्ता भंडार को पर्याप्त सफलता मिली. उसी ने आगे चलकर सहकारी क्षेत्र के उपभोक्ता आंदोलन को प्रेरित किया. हालांकि सहकारिता पर आधारित उपभोक्ता केंद्रों की सफल शुरुआत उसके लगभग चार दशक पश्चात हो सकी, जब रोशडेल पायनियर्स ने लंदन के टोडलेन इलाके में पहला उपभोक्ता केंद्र स्थापित किया.
उन दिनों मिल मजदूरों को प्रतिदिन कम से कम ग्यारह घंटे लगातार कार्य करना पड़ता था. ओवेन ने उसमें एक घंटा प्रतिदिन की कटौती कर दी. तत्कालीन परिस्थितियों में यह कदम साहसपूर्ण होने के साथ-साथ चामत्कारिक भी था. उसके इस कदम का दूसरे उद्योगपतियों ने जमकर विरोध किया. पूंजीपतियों द्वारा पोषित समाचारपत्र-पत्रिकाओं में ओवेन के इस कदम की आलोचना करने वाले लेख छापे गए. इससे घबराए बिना ओवेन ने दस वर्ष से छोटे बच्चों के अपनी मिल में काम करने पर पाबंदी लगा दी. मिल-मजदूरों के लिए कल्याण सुविधाओं का विस्तार करते हुए उसने उन्हें कारखाने में ही आवास सुविधाएं प्रदान कीं. साथ ही अस्पताल, विश्रामालय और मनोरंजनगृहों की स्थापना की.
उन दिनों काम के दौरान हुई गलतियों का खामियाजा मजदूरों को ही भुगतना पड़ता था, जिससे उनके वेतन का बड़ा हिस्सा नुकसान की भरपाई में ही निकल जाता था. ओवेन ने ऐसे जुर्माने की परंपरा को समाप्त कर दिया, जिसका दूसरे उद्योगपतियों ने काफी विरोध किया. मगर ओवेन अपने निर्णय पर अटल रहा.
ओवेन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान बच्चों की शिक्षा का प्रबंध करना था. उसने शिशु पाठशालाओं की स्थापना की और सहकार का जन्मदाता होने के साथ-साथ वह शिशु शिक्षा कार्यक्रम का प्रवर्त्तक बना. पांच साल के बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य करते हुए उसने एक क्रांति का शुभारंभ किया. यह सब ओवेन ने केवल अपनी आंतरिक प्रेरणा के आधार पर शुरू किया था; जिसका मजदूरवर्ग की ओर जोरदार स्वागत किया गया. ध्यान देने की बात है कि मजदूरों के लिए आवास-बस्तियों के निर्माण, अस्पताल, विश्रामालय, मनोरंजनगृहों तथा शिशु पाठशालाओं के निर्माण पर ओवेन का बहुत-सा धन खर्च हो रहा था. मजदूर कल्याण कार्यक्रमों पर उससे पहले इतना बड़ा निवेश किसी ने नहीं किया था. इसलिए प्रारंभ में लोगों को ओवेन का व्यवहार पागलपन जैसा लगा. विरोधी ओवेन का मजाक उड़ाते, अपने पूर्वाग्रह से भरे मस्तिष्क में उसके एक दिन दिवालिया होने के मंसूबे सजाते. किंतु समय के साथ-साथ लोगों को सब समझ में आने लगा. मजदूर कल्याण कार्यक्रमों में लाखों पाउंड खर्च कर देने के बावजूद ओवेन की फैक्ट्रियां लगातार मुनाफा उगल रही थीं, बल्कि उसके लाभ में निरंतर वृद्धि हो रही थी. साथ ही उसकी लोकप्रियता और प्रसिद्धि में भी निरंतर इजाफा हो रहा था.
ओवेन की कुछ योजनाएं बेहद खर्चीली सिद्ध हुईं थीं. जिससे उसके हिस्सेदारों ने विरोध करना प्रारंभ कर दिया. साझीदार कारखाने को सामान्य तरीके से चलाना चाहते थे. उनसे तंग आकर ओवेन ने एक नई कंपनी की शुरुआत की, जिसमें उसने व्यवस्था की थी कि मुनाफे का बीसवां हिस्सा तयशुदा लोकहितैषी कार्यक्रमों पर खर्च किया जाएगा. जेरेमी बैंथम, विलियम एलेन नई कंपनी में ओवेन के साझेदार बने. ऐसे विचारकों के साथ मिल जाने से ओवेन के जनहितैषी कार्यक्रमों को व्यापक लोकप्रतिष्ठा मिलनी निश्चित ही थी. इस बीच में ओवेन वैचारिक रूप में भी परिपक्व हुआ था. बैंथम के विचारों से वह पहले ही प्रभावित था. अपने विचारों को अभिव्यक्ति देते हुए उसने एक लंबा लेख New View of Society, Or, Essays on the Principle of the Formation of the Human Character, and the Application of the Principle to Practice (1813-16) लिखा. कई किश्तों में लिखी गई उस लेखमाला में ओवेन के समाजवादी विचारों की झलक एकदम साफ थी. समाजवाद के प्रति ओवेन की आस्था आगे भी बढ़ती ही गई. बैंथम मुक्त बाजार-व्यवस्था का समर्थक था. उसका मानना था कि मजदूरों को यह अधिकार हो कि वे अपने लिए अपने पसंदीदा व्यापारी या उत्पादक को चुन सकें. उसपर किसी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष दबाव नहीं होना चाहिए.
तब तक ओवेन की ख्याति बहुत बढ़ चुकी थी. साथ में स्थानीय प्रशासन पर उसका प्रभाव भी. सुधार कार्यक्रमों का उद्योगपतियों की ओर से निरंतर होते विरोध से भी वह विचलित नहीं हुआ. उलटे उसने श्रमिक-अधिकारों के संरक्षण के लिए वैधानिक व्यवस्थाएं करने के अपने प्रयास तेज कर दिए. बालश्रमिकों के कार्य-घंटों को घटाने के लिए भी ओवेन ने भरपूर प्रयास किए. परंतु इस काम में केवल नाकामयाबी ही उसके हाथ लगी; क्योंकि तब तक यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर उद्योगपति और उनके समर्थक अधिकारीगण ओवेन के प्रखर विरोधी बन चुके थे. तब तक ओवेन की ख्याति ब्रिटेन की सीमाओं को लांघकर बाहर जा चुकी थी. श्रमिक कल्याण की वांछा रखने वाले देश, ओवेन के लोकहितैषी कार्यक्रमों का क्रियान्वयन अपने यहां करना चाहते थे. रूस, हालेंड, प्रशा के तत्कालीन शासकों ने ओवेन के परामर्श के अनुसार मजदूर सुधार-कार्यक्रम शुरू कर दिए थे.
ओवेन के सुधार-कार्यक्रमों को मजदूर वर्ग की ओर से भरपूर समर्थन मिला था. उसके कारखानों का मुनाफा आश्चर्यजनक रूप से बढ़ा था. दूसरे उद्योगपति जो ओवेन के सुधार कार्यक्रमों को उसका आत्मघाती कदम बता रहे थे, ओवेन ने एक ही साल में साठ हजार पौंड कमाकर उनकी बोलती बंद कर दी. उसने दिखा दिया कि धनार्जन के लिए शोषण, बेईमानी अथवा गलाकाट प्रतियोगिता ही आवश्यक नहीं है. यदि दूरंदेशी से कार्य किया जाए तो सहयोग और पारस्परिक सहानुभूति से भी प्रगति के लक्ष्य की प्राप्ति संभव है.
ओवेन धर्म के नाम पर थोपी जा रही जड़ मान्यताओं से भी क्षुब्ध था. उसका यह मानना था कि जीवन में धर्म का अतिरेक पूर्ण हस्तक्षेप मनुष्य को तार्किक निर्णय लेने से रोकता है. कि मजदूर वर्ग की दयनीय स्थिति का कारण वे रूढ़ियां भी हैं, जिन्हें वह धर्म के नाम पर पाले हुए है. इसलिए अपने लेखों में उसने धार्मिक मान्यताओं की जमकर आलोचना की थी. परिणाम यह हुआ कि पादरी और धर्मसत्ता पर असीन दूसरे प्रभावशाली लोग उसके विरुद्ध लामबंध होने लगे. अपने कल्याण कार्यक्रमों के कारण वह पूंजीपति वर्ग को पहले ही नाराज कर चुका था. इसलिए स्वार्थी उद्यमियों तथा धर्म के ठेकेदारों ने ओवेन के विरुद्ध अभियान की शुरुआत कर दी. प्रकारांतर में इससे ओवेन की प्रतिष्ठा को धक्का लगा.
ओवन सही मायने में एक महान स्वप्नदृष्टा था. एक बेहतर दुनिया का सपना उसकी आंखों में सदैव झिलमिलाता रहता था. जीवन के प्रारंभिक वर्षों में ही धर्म के उसकी आस्था समाप्त हो चुकी थी. उसका मानना था कि स्वर्ग जैसी स्थितियां धरती से परे संभव ही नहीं है. बड़े लोग यदि थोड़े से त्याग और दूरदर्शिता से काम लें तो इस धरती को ही स्वर्ग समान बनाया जा सकता है. उसके सोच का आधार यह था कि मनुष्य अपना व्यक्तित्व स्वयं नहीं, अपितु स्वयं के लिए बनाता है यानी उसकी उपलब्धियों एवं व्यक्तित्व के निर्माण में किसी न किसी प्रकार दूसरों का भी योगदान होता है. अतः यह मनुष्य का कर्तव्य है कि बाकी लोगों के साथ पूरा-पूरा सहयोग करे ताकि अधिकतम लोगों का भला हो सके.
स्वप्नदृष्टा होने के साथ वह संकल्पवान भी था. उसने अपनी आलोचना की परवाह किए बिना अपनी योजनाओं पर काम किया. मजदूर कल्याण के कार्यक्रमों के अतिरिक्त उसने बच्चों के लिए शिक्षा को अनिवार्य घोषित कर बाल शिक्षा संस्थानों का आदि प्रवत्र्तक होने का श्रेय लिया. समाज की बेहतरी के लिए उसने और भी अनेक प्रयोग किए; जिनमें पूंजी के साथ-साथ बहुमूल्य समय भी लगा. हालांकि विरोधियों के कारण ओवेन को यद्यपि अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी, मगर असफल रहकर भी उसने उन रास्तों का अन्वेषण किया जिस पर भविष्य की अनेक विकासगाथाएं लिखी जानी थी—और आगे जिनका अनुसरण पूरी दुनिया को करना था.
सन् अठारह सौ पंद्रह में आर्थिक मंदी का दौर चला. ओवेन के लिए सुधार कार्यक्रमों को आगे चलाना कठिन हो गया. इसलिए उसको अपने कार्यक्रम कुछ दिनों के लिए स्थगित करने पड़े. तब तक ओवेन के व्यवस्था की खामियों से परिचित हो चुका था. उसे लग रहा था कि पूंजीवादी व्यवस्था और शोषण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. पूंजीवादी व्यवस्था के परवान चढ़ने के लिए जरूरी है कि समाज में असंतोष और दिशाहीनता हो. भूख, बेकारी, गरीबी और निरक्षरता जो आम आदमी को बेबस बनाते हों, एक कामयाब उद्योगपति के लिए मुनाफे का महल खड़ा करने में सहायक होते हैं. जनता की अज्ञानता और दिगभ्रमता पूंजीवाद के विस्तार के लिए उत्प्रेरक बन जाती हैं. उसको अपने समय की सामाजिक-आर्थिक विषमता देखकर उसके लिए जिम्मेदार व्यवस्था से ऊब और निराशा होने लगी थीं. उसे विश्वास हो चला था कि बेहतर कल के लिए व्यवस्था में आमूल परिवर्तन अत्यावश्यक है. इसलिए कि वर्तमान व्यवस्था पूंजी के केंद्रीयकरण और तज्जनित शोषण को बढ़ावा देने वाली है. ओवन की मनःस्थिति उसी के इन शब्दों से सहज उजागर हो जाती है—
‘मैं अपने लंबे जीवन में व्यापार, उत्पादन और वाणिज्य के विभिन्न वस्तुओं का अनुभव प्राप्त कर चुका हूं. मूझे पूरा विश्वास है कि इस स्वार्थपूर्ण व्यवस्था से किसी श्रेष्ठ चरित्र का निर्माण संभव नहीं है.’
यह उस संघर्षशील, स्वप्नदृष्टा, कर्मठ और दूरदृष्टा उद्यमी के विचार थे जो अपनी उद्यमशीलता का लोहा देश-विदेश में मनवा चुका था. वह भी अपने अद्वितीय सुधार-कार्यक्रमों के चलते, जिसमें उसने अपने धन और संसाधनों का व्यय किया था. जाहिर है कि पूंजीवादी व्यवस्था की समस्त खामियां ओवेन के सामने आ चुकी थीं. उसको विश्वास हो चला था कि जिस प्रगतिगामी समाज का बिंब उसकी आंखों में है, वह पूंजीवादी व्यवस्था के द्वारा अथवा उसके समर्थन से संभव ही नहीं है. जो व्यवस्था स्वयं शोषण एवं असामानता के ऊपर टिकी हो, वह शोषण-मुक्त और समानता पर आधारित सामाजिकता की वाहक नहीं हो सकती. उसका विश्वास था कि मनुष्य अपने पर्यावरण से प्रभावित होता है, अतः पर्यावरण के बदलाव के साथ उसके व्यक्तित्व में बदलाव भी संभव है. हालांकि उसके विचारों में कहीं-कहीं अंतर्विरोध भी देखने को मिलते हैं. पूंजी-पे्ररित वर्चस्ववाद की आलोचना करते हुए फ्रांसिसी विद्वान फ्यूरियर ने कहा था कि—
‘निर्धनता, सभ्यता के क्रम में मनुष्य की अंतहीन लालसाओं का दुष्परिणाम है.’
व्यापारिक मंदी के दौर से गुजरते हुए ओवेन द्वारा 1816 में की गई टिप्पणी उसकी पूंजीवादी मनोवृत्ति का प्रतीक है. उसने कहा था कि—
‘हमारा सर्वोत्तम ग्राहक युद्ध, अब समाप्त हो चुका है.’
ओवेन को तत्कालीन फैक्ट्री सिस्टम से घृणा थी. उसका मानना था कि इस उत्पादन व्यवस्था ने सामाजिक गैरजिम्मेदारी, विध्वंसक स्पर्धा एवं हृदयविहीन व्यक्तिवाद को जन्म दिया है. उसका विचार था कि सामाजिक तनाव का एक कारण मानवीय श्रम और मशीनों की अवांछित, अनियंत्रित स्पर्धा भी है. इसका हल यही है कि मनुष्य संगठित होकर मशीनों का सहयोग लेते हुए उत्पादन कार्य करे. इसलिए उसने अपने श्रमिकों जीवन-स्तर में सुधार लाने के लिए कई कदम उठाए. यही नहीं उच्च गुणवत्ता के महत्त्व को स्वीकारते हुए उसने उन कर्मचारियों को विशेष लाभ एवं प्रोत्साहन देने का काम प्रारंभ किया जो बेहतर गुणवत्ता का माल बनाने में निपुण थे. उसके कारखाने में प्रत्येक मशीन के बराबर में विभिन्न रंगों के घनाकार टुकड़े रख दिए जाते थे. घन के रंग से बन रहे माल की गुणवत्ता की कोटि निर्धारित की जाती थी. इससे कारीगर को अपने काम के स्तर का पता होता था. उसी के आधार पर प्रोत्साहन राशि का भुगतान किया जाता था. स्पष्ट है कि उस समय ओवेन के कारखानों में कार्य का स्तर और उसकी परिस्थितियां दूसरे कारखानों के अपेक्षा बेहतर, लगभग आदर्श अवस्था में थीं.
पूंजीवादी व्यवस्था से मोहभंग के पश्चात ओवेन ने वर्गहीन और समानता पर आधारित समाज की स्थापना के लिए कुछ नए और तत्कालीन परिवेश में अनोखे कदम उठाए. ऐसे कदम जिनसे समाज के सपंन्न तथा समृद्धिशाली वर्ग की जिम्मेदारी सुनिश्चित होती हो. इस संबंध में ओवेन की विचारधारा बिल्कुल साफ एवं सरल थी. अपनी पहले निबंध—New View of Society, जो आगे चलकर पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ, में अपनी योजना की ओर संकेत करते हुए लिखा था—
‘एक सरल, साधारण और पूर्णतः व्यावहारिक योजना, जिससे किसी व्यक्ति या समाज के किसी हिस्से को जरा भी नुकसान ना हो.’
ओवेन का विचार था कि लगभग बारह सौ व्यक्तियों की सामूहिक बस्तियां बसाई जानी चाहिए. हरेक बस्ती के पास चार से छह वर्ग किलोमीटर का परिक्षेत्र हो, जिसमें सामूहिक रसोई, भोजनालय एवं स्नानग्रह आदि की व्यवस्था हो. उनमें से प्रत्येक परिवार के पास आवास के लिए स्वतंत्र रूप से एक कमरा हो. तीन साल तक के बच्चे अपने माता-पिता के साथ रह सकते हैं. उससे बड़े बच्चों को समुदाय का सदस्य माना जाए. लेकिन परिपक्व होने तक माता-पिता उन्हें भोजन-वस्त्र आदि की देखभाल की जिम्मेदारी का निर्वाह कर सकते हैं. मगर उसका खर्च समुदाय द्वारा वहन किया जाए. इस तरह की बस्तियां व्यक्तिगत अथवा सामूहिक प्रयास से बसाई जा सकती हैं. जिम्मेदार पूंजीपति तथा राज्य सरकारें भी इस काम को कर सकते हैं.
ओवेन ने इन बस्तियों को ‘सहकार के गांव’ की संज्ञा’ दी थी. इन गांवों में किसान बस्तियां भी शामिल थीं. कोई भी बेरोजगार व्यक्ति इन बस्तियों में जाकर अपनी योग्यतानुसार किसी भी उत्पादक कार्य से जुड़ सकता था. उसका विश्वास था कि भविष्य में ऐसी बस्तियों का तीव्रता से विकास होगा तथा कुछ ही वर्षो में ये पूरे ब्रिटेन में फैल जाएंगी. क्योंकि एक तो ये परस्पर संगठित श्रम (Cooperative Labor) पर आधारित हैं. दूसरे इनकी उत्पादकता पूंजीवादी फैक्ट्रियों की अपेक्षा अधिक है. इस योजना से ओवेन की निष्ठा झलकती थी. किंतु कालांतर में ओवेन का यह आकलन गलत सिद्ध हुआ. क्योंकि ‘सहकार ग्रामों’ की स्थापना के लिए जितने धन की आवश्यकता थी, वह न तो सरकार की ओर से प्राप्त हो सका था, न ही कोई उद्यमी संस्थान इस कार्य को विस्तार देने के लिए आगे आया. विडंबना यह रही कि श्रमिक नेता जो अपने वर्गीय हितों की देखभाल का दम भरते थे, उसके लिए आंदोलन और संघर्ष करने तक का जिनका दावा था, उन्होंने भी श्रमिक कल्याण की ओवेन की इस योजना को अधिक महत्ता नहीं दी. वे ओवेन के प्रयासों को संदेह की दृष्टि से ही देखते रहे. क्योंकि उनकी निगाह में ओवेन भी एक पूंजीपति ही था.
तो भी यह ओवेन की सफलता ही मानी जाएगी कि उसके द्वारा बसाई गई बस्तियां सहजीवन के आदर्श पर बसी थीं. जहां समस्त फैसलों तथा उत्पादन के साधनों पर सामूहिक अधिकार था. यह कम प्रशंसनीय नहीं है कि सहजीवन के आधार पर ओवेन द्वारा बसाई गई बस्तियों की संख्या 2500 तक जा पहुंची थी, जिनमें पुलिस, न्यायालय, कानूनी विवाद, जुआ तथा अन्य कुरीतियों के लिए कोई स्थान नहीं था. शिशुओं के लिए नियमित पाठशालाएं थीं, जहां उनकी शिक्षा की निःशुल्क व्यवस्था थी. मुफ्त औषधालय, विश्रामकेंद्र आदि बनाए गए थे. हीगेल के द्वंद्ववाद के सिद्धांत के आधार पर समाज की समस्याओं का हल ढूंढने वाले कार्ल मार्क्स आदि समाजवादियों ने हालांकि ओवेन की योजनाओं से असहमत थे. उन्होंने उसकी आलोचना की थी, किंतु उन्हीं के सहयोगी फ्रैडरिक ऐंग्लस ने अपने एक लेख में ओवेन के प्रयासों के क्रांतिकारी परिणाम की सराहना करते हुए लिखा है, कि—
‘ओवेन के प्रतिस्पर्धी कारखानों के कामगार को दिन-भर में जहां तेरह से चैदह घंटे काम करना पड़ता था, वहीं न्यू लैनार्क में ओवेन के कारखाने के मजदूर आधे घंटे के भोजनावकाश सहित मात्र साढे़ दस घंटे काम करते थे. यहां तक कि जब कपास की अनुपलब्ध्ता के कारण जब कारखाने को चार महीनों तक बंद रखना पड़ा, तब भी ओवेन ने अपने मजदूरों को उस अवधि के वेतन का भुगतान किया था.’
यह घटना 1806 की है, अपने इस कदम के कारण ओवेन को लगभग सात हजार पाउंड बिना किसी उत्पादन के खर्च करने पड़े थे. सहजीवन पर आधारित आदर्श बस्तियों की स्थापना के कारण न्यू लेनार्क की ख्याति पूरी दुनिया में फैल चुकी थी. उस समय ओवेन अपने समय के सर्वाधिक चर्चित व्यक्तियों में से था. पूरी दुनिया में उसके प्रयोगों की चर्चा हो रही थी. उसकी ख्याति का अनुमान मात्र इस उदाहरण से लगाया जा सकता है कि सन 1805 से लेकर 1815 तक मात्र एक दशक में न्यू लेनार्क में, वहां की स्थिति और सामाजिक-आर्थिक बदलावों का अध्ययन करने के लिए, लगभग पंद्रह हजार सैलानी, पर्यवेक्षक पहुंचे थे. समाचारपत्र पत्रिकाओं में वहां के विशिष्ट अध्ययन पर लेख छापे गए थे, जिनमें ओवेन के प्रयासों की मुक्तकंठ से सराहना की गई थी.
बावजूद इसके ओवेन को अंततः निराशा ही हाथ लगी. इसमें हालांकि कुछ भौगोलिक परिस्थितियां भी सम्मिलित थीं. इसका पहला कारण तो यह कि न्यू लेनार्क में भाप ऊर्जा के स्थान पर जलऊर्जा का उपयोग किया जाता था, जो कतिपय पुरानी तकनीक थी. जिसमें मजदूरों को अधिक परिश्रम करना पड़ता था. हालांकि रोजी-रोटी की तलाश में बाहर से आए कारीगर इतनी जल्दी हताश होने वाले नहीं थे, फिर भी उनमें से कुछ को आधुनिक तकनीक ललचाने लगी थी. जिससे वे भाप ऊर्जा से चलने वाली मशीनों पर कार्य करने को वरीयता देने लगे थे. संक्षेप में हम कह सकते हैं कि न्यू लेनाॅर्क जैसे किसी समय में कपड़ा उद्योग में दुनिया-भर में नाम कमा चुके स्थान पर तकनीक के पिछड़ेपन ने भी लोगों को उस ओर से उदासीन बनाया था—
इन सब खूबियों-कमजोरियों के कारण न्यू लेनार्क समाजवादी व्यवस्था का आदर्श मा॓डल नहीं बन पाया. इसलिए कि मामूली लोकतांत्रिक छोंक के साथ उसपर ओवेन तथा उसके अन्य साझेदारों का सम्मिलित स्वामित्व था. यद्यपि ओवेन ने कुछ मानवीय कदम उठाए थे, बावजूद इसके एक आम उद्यमी की भांति उसके मन में भी लाभ की कामना थी. साथ ही उद्योगों पर व्यक्तिगत स्वामित्व बना हुआ था. इसलिए न्यू लेनार्क की असफलता को समाजवादी मा॓डल की असफलता नहीं माना जा सकता. दरअसल इसका कारण ओवेन का पित्रसत्तावादी मानवबोध था. एक ओर तो वह बदलाव चाहता था और दूसरी और लाभ की वांछा भी रखता था और उद्योगों पर अपना अधिकार बनाए रखना चाहता था, जो समाजवादी आदर्श के विपरीत थी. एक और कारण यह भी रहा कि न्यू लेनार्क में कार्य करने वाले मजदूर भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमियों से आए थे. उनकी संस्कृति और विचारधारा अलग-अलग थीं, मजदूरों का एक वर्ग स्का॓टिश मूल के केल्विनवादियों का था, जिसका झुकाव अनुशासन, निर्दोष श्रम तथा आत्मपरिष्कार की ओर था.
न्यू लेनार्क में ओवेन को अंततः असफलता का सामना करना पड़ा. लेकिन यह अकेले ओवेन की या उसके विचारों की असफलता नहीं थी. बल्कि यह ओवेन के उस विश्वास की हार थी, जिसके आधार पर वह यह सोच बैठा था कि उसकी तरह ही बाकी उद्यमी भी आवश्यकता पड़ने पर आगे आएंगे. उसके बाद सहजीवन पर आधारित बस्तियों बसाने की गति तीव्र होने और समय नहीं लगेगा.

क्रमश:….
© ओमप्रकाश कश्यप

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