लुईस ज्यां जोसेफ चार्ल्स ब्लैंक : श्रम कल्याण के लिए समर्पित विचारक और नेता

स्पर्धा औद्योगिक विकास के लिए अपरिहार्य है—ऐसा पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में माना जाता है. उसके समर्थक अक्सर यह दावा करते हैं कि किसी विशिष्ट उत्पादन क्षेत्र में नई कंपनियों के आने से स्पर्धा होती है. जिससे ग्राहकों को वस्तुएं सस्ती मिलने लगती हैं. ब्लैंक ने उदाहरण देकर सिद्ध किया था कि स्पर्धा पूंजीवादी व्यवस्था का छल है. हर पूंजीपति उत्पादकता के क्षेत्र में एकाधिकार चाहता है. इसलिए वह उत्पादन के उन क्षेत्रों में निवेश करता है, जिनमें उसको औद्योगिक प्रतिद्विंद्वता का कम से कम सामना करना पड़े. वह नई से नई तकनीक की खोज में रहता है. जो भले ही महंगी हो, मगर जिसका संचालन अकुशल कामगारों द्वारा कम से कम खर्च में किया जा सके. जैसे-जैसे उस क्षेत्र में मांग बढ़ती है, उत्पादक का मुनाफा भी बढ़ता चला जाता है, परिणामस्वरूप वह क्षेत्र नए उद्यमियों को ललचाने लगता है.

इस बीच तकनीक में भी अपेक्षित सुधार होता चला जाता है. नया उद्यमी नवीनतम तकनीक के साथ उस क्षेत्र में प्रवेश करता है, जो और भी श्रम-विरोधी होती है. पुराना जमा-जमाया उद्यमी जो मुनाफा अपनी ग्राहक संख्या के बल पर बटोरता है, नया कम ग्राहकों के बावजूद नवीनतम तकनीक के दम पर कमाता है. सरकार भी औद्योगिक प्रोत्साहन नीति के तहत नए उद्यमियों को विशेष सुविधाएं प्रदान करती है. इसलिए जिसे स्पर्धा द्वारा चीजों का सस्ते होना कहते हैं, वह दरअसल नई तकनीक और बढ़ी हुई ग्राहक-संख्या का लाभ उपभोक्ता तक पहुंचाना है. क्योंकि इससे उत्पादक पूंजीपति का औसत लाभ लगभग अपरिवर्तनशील रहता है, बल्कि अधिकांश मामलों में यह निरंतर बढ़ता ही जाता है. नवीनतम तकनीक चूंकि अत्यंत महंगी भी होती है, इसलिए छोटा उत्पादक उसका लाभ नहीं उठा पाता. अतएव जिसे स्पर्धा कहते हैं, वह वस्तुत: पूंजीपतियों के बीच, पूंजीपतियों द्वारा, अधिकाधिक मुनाफे के लिए खेला जाने वाला पूंजी का नंगा खेल है, जिसमें उपभोक्ता को क्षणिक मौद्रिक लाभ की कीमत सामाजिक लाभों की बलि देकर चुकानी पड़ती है. इस तथ्य को ब्लैंक ने लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले ही पहचान लिया था…                 ओमप्रकाश कश्यप

सहकारिता की अवधारणा को व्यापक जनसमूह के समक्ष लाने तथा उसकी सैद्धांतिक गवेषणा करने में जिन विचारकों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा, उनमें लुईस ज्यां जोसेफ चार्ल्स ब्लैंक(Louis Jean Joseph Charles Blanc) प्रमुख है. ब्लैंक ने समाजवाद तथा उसके सहयोगी सहकारिता आंदोलन के विकास के लिए सरकारी समर्थन जुटाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. वह सामाजिक आर्थिक समानता तथा श्रम-अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष करता रहा. उल्लेखनीय है कि प्रारंभिक दौर में समाजवादी विचारधारा सामान्यतः सैद्धांतिक बहसों और अकादमिक दस्तावेज तक सिमटी हुई थी. जबकि सहकारी प्रयास आमतौर पर बड़े पूंजीपतियों की दया पर निर्भर थे. लोगों में उनकी व्याप्ति भी कम ही थी. सरकारी समर्थन मिलने से सहकारिता को सरकारों द्वारा, विशेषकर उनके द्वारा जो समाजवाद अथवा लोकतांत्रिक पद्धति के आधार पर शासन के लिए जिम्मेदार थीं, सीधे मदद मिलने की संभावना बढ़ी. साथ ही वह एक विचार से अधिक उद्यम के रूप में समाज में लोकप्रिय होने लगा. परिणामस्वरूप सहकारिता आंदोलन को बल मिला. लोग सहकार और पूंजीपतियों से सहायता की उम्मीद छोड़ अपने कल्याण के लिए संगठित होने लगे. ब्लैंक का महत्त्वपूर्ण सिद्धांत जो आगे चलकर समाजवादी विचारधारा का मूलमंत्र माना गया, यह था—

‘प्रत्येक को उसकी क्षमताओं के अनुसार, हर एक को उसकी जरूरत के मुताबिक.’ लुईस ब्लैंक का जन्म 29 अक्टूबर, 1811 को स्पेन के मैड्रिड नामक शहर में हुआ. उसके पिता नेपोलियन बोर्नापाट के भाई सम्राट जोसेफ के दरबार में वित्तीय नियंत्रक थे. राजशाही के साथ उनकी समस्त संपत्ति भी फ्रांसिसी क्रांति की भेंट चढ़ चुकी थी. उसके बाद वे पेरिस के लिए रवाना हो गए. लुइस ब्लैंक का बचपन अत्यधिक गरीबी में बीता. उसकी प्रारंभिक पढ़ाई मैड्रिड में ही हुई थी. आगे पेरिस से कानून की परीक्षा पास करने के पश्चात वह नौकरी की खोज में जुट गया. अपने संघर्षमय जीवन की शुरुआत ब्लैंक ने अखबार की नौकरी से की. जीविका चलाने के लिए उसने एक साथ कई समाचारपत्रों के लिए लेख लिखने का कार्य किया. उसमें चीजों को समझने, उनका विश्लेषण करने की अद्भुत क्षमता थी. अपनी प्रतिभा के दम पर उसने शीघ्र ही अपनी पहचान कायम कर ली और थोड़े ही दिनों में वह एक विचारशील, उपयोगितावादी विचारों के समर्थक के रूप में विख्यात हो गया. किंतु अखबार की नौकरी लेखन-कार्य में बहुत बड़ी बाधा थी. कुछ ही वर्षों में उसने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया.

कुछ दिन फ्रीलांसिंग करने के पश्चात ब्लैंक ने एक समाचारपत्र ‘रिव्यू दि प्रोग्रेस’ (Revue du progres) की शुरुआत की, जिसके द्वारा उसका प्रमुख उद्देश्य था, अपनी वैचारिक अभिव्यक्ति को विस्तार देना. पत्र में उसने अर्थव्यवस्था एवं राजनीति से संबंधित अपने लेखों को धारावाहिक रूप में प्रकाशित करना शुरू कर दिया. वह समाज में व्याप्त बुराइयों से आहत रहता था. उसका मानना था कि समाज की समस्त बुराइयों का एकमात्र कारण अनावश्यक प्रतिद्वंद्विता है. पूंजीपति सबसे आगे निकलने के लिए अधिकाधिक धन कमाना चाहता है. इसके लिए वह अपने श्रमिकों की उपेक्षा करता है. उन्हें कम से कम मजदूरी देता है. कम मजदूरी मिलने से मजदूरों की आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पातीं, जिससे उनके मन में मालिक एवं व्यवस्था के प्रति आक्रोश पनपने लगता है. इन सबसे अंततः सामाजिक अंतविर्रोधों एवं तथा दूसरी बुराइयों को बढ़ावा मिलता है. इसलिए प्रशासन को चाहिए कि वह सामाजिक असंतोष एवं असमानता को बढ़ाने वाले कारकों पर नियंत्रण रखे.

सन 1839 में उसने अपने अखबार में धारावाहिक लेख लिखना प्रारंभ किया, जिसका शीर्षक था—The Organization of Labor झकझोर देने वाले तथ्यों के साथ लिखे गए इस लेख के प्रकाशन के साथ ही धूम मच गई. उस लेख का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ. इस निबंध में ब्लैंक ने व्यक्ति और समाज के अंतर्संबंधों की व्याख्या की थी. उसने लिखा था नागरिकों के रोजगार के अधिकार की सुरक्षा करना सरकार का कर्तव्य है. राज्य को चाहिए कि अपने प्रत्येक नागरिक की योग्यता एवं कार्यक्षमता को पहचानकर उसके लिए उपयुक्त रोजगार की व्यवस्था करे. तत्पश्चात उसे मजदूरी अथवा वेतन के रूप में इतना प्रदान करे, ताकि उसके माध्यम से वह अपनी सभी आवश्यक जरूरतें पूरी कर सके. अपने आर्थिक विचारों की व्याख्या करते हुए ब्लैंक ने उस लेख में व्यक्तिगत हितों को सामूहिक हितों में बदलने की मांग करते हुए, एकसमान मजदूरी का आग्रह किया गया था. इस लेख में जिस तथ्य की ओर बार-बार संकेत किया था, वह था—

‘हर आदमी अपनी भरपूर क्षमता से काम करे. हर आदमी की उसकी जरूरत के अनुसार आमदनी हो.’

ब्लैंक के यही शब्द आगे चलकर जनमानस में विद्रोह की चिंगारी लाने वाले सिद्ध हुए. इस लेख-शृंखला को ब्लैंक ने ‘सामाजिक कार्यशाला’(Social workshops) की संज्ञा दी थी. लेखमाला के माध्यम से उसने मजदूरों का आवाहन किया गया था कि वे उत्पादन के साधनों पर अपना कब्जा उस स्थिति तक बढ़ाते रहें जब तक कि समाजवादी व्यवस्था का सपना पूरी तरह सच नहीं हो जाता. लेख को चैतरफा मिली सराहना के साथ ही फ्रांस और इंग्लैंड के बुद्धिजीवी क्षेत्रों में उसका नाम होता चला गया. प्रस्तावित ‘सामाजिक कार्यशाला’ का अभिप्राय ऐसी व्यवस्था से था, जिसपर मजदूर संगठनों तथा सहकारी समितियों का नियंत्रण हो. जहां सभी मजदूर आपस में एक-दूसरे से जुड़े हों. वह एक प्रकार से मजदूर संगठन तथा सहकारी समिति जैसी मिली-जुली व्यवस्था थी, जिसमें मजदूर एक सामान्य हित के लिए परस्पर संबद्ध हों. ब्लैंक के आवाहन पर मजदूर एकजुट होने लगे.

फ्रांसिसी क्रांति को लेकर 1841 में ब्लैंक की पुस्तक[Histoire de dix ans 1830-1840 (History of Ten Years, 1830-1840)], प्रकाशित हुई. जिसके माध्यम से उसने राजशाही की आलोचना की थी. पुस्तक का वौद्धिक जगत द्वारा शानदार स्वागत किया गया. चार वर्ष में ही पुस्तक के चार संस्करण पाठकों के बीच हाथों-हाथ बिक गए. पुस्तक के माध्यम से ब्लैंक की वैचारिक प्रतिबद्धता भी साफ नजर आने लगी. लेकिन ब्लैंक के अवदान को सरकारी स्तर पर उस समय मान्यता मिली, जब 24 फरवरी 1848 को उसको राजशाही के पतन के बाद बनी अंतरिम सरकार का सदस्य मनोनीत किया गया. अंतरिम सरकार के सदस्य के रूप में भी उसने श्रमिकों के अधिकारों के अपने संघर्ष को जारी रखा. उसने लक्समबर्ग आयोग का गठन भी किया, जिसका उद्देश्य सामाजिक समस्याओं एवं उनके निदान के लिए किए जा रहे प्रयासों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करना था. यही नहीं, श्रम कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए ब्लैंक ने अपने सहयोगियों से आग्रह किया कि वे रोजगार गारंटी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कानून बनाने के सरकार को बाध्य करें. उसने 25 फरवरी 1848 को सरकार के समक्ष एक बिल भी प्रस्तुत किया, जिसमें श्रमिकों की अस्मिता और सम्मान की रक्षा के साथ-साथ उनके लिए कार्य-उपलब्धता की गारंटी देने के लिए प्रथक श्रम मंत्रालय के गठन की मांग की गई. इस मांग को स्वीकार करना अंतरिम सरकार की क्षमता से बाहर है, इस बहाने से उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया गया. लेकिन ब्लैंक को मिल रहे श्रमिकों के भारी समर्थन को देखते हुए, उसको कुछ ही दिनों बाद श्रमआयोग का अध्यक्ष बना दिया गया.

ब्लैंक के साथ अपने मतभेदों के चलते कार्ल मार्क्स ने उसके श्रम और संगठन संबंधी विचारों की आलोचना की थी. लेकिन बुद्धिजीवियों और मजदूरों में ब्लैंक के विचारों को लेकर उत्साह था. वे उसके बारे में अधिक से अधिक पढ़ना और जानना चाहते थे. इससे ब्लैंक के अखबार की बिक्री लगातार बढ़ती चली गई. उसकी सदस्य-संख्या में भी लगातार वृद्धि होती गई, जिनमें अधिकांश मजदूर थे. परिणाम यह हुआ कि 1848 तक आते-आते ब्लैंक की लेखमाला का शीर्षक ‘आर्गेनाइजेशन आफ लेबर’, क्रांतिकारियों के नारे में ढल गया. मजदूर कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए ब्लैंक ने 10 मई, 1848 को संसद में एक बार फिर मजदूरों की समस्याओं पर विचार करते हुए सरकार से मजूदर कल्याण के लिए आवश्यक कानून बनाने की अपील की. किंतु राष्ट्रीय परिषद के अधिकांश सदस्य समाजवादी विचारों के विरोधी थे. उनके दबाव में ब्लैंक का प्रस्ताव एक बार पुनः ठुकरा दिया गया. इस बीच उसको नेशनल कंसरवेटिव असेंबली का सदस्य मनोनीत किया जा चुका था. लेकिन ब्लैंक के विरोधी भी सक्रिय थे. उनके दबाव में लक्समबर्ग आयोग को भंग कर दिया गया.

इसके बाद ब्लैंक का अंतरिम सरकार से मोहभंग होना स्वाभाविक ही था. लेकिन सरकार के कदम की इससे भी बड़ी प्रतिक्रिया मजदूरों के बीच हुई, जिनके अधिकारों के लिए वह संघर्ष कर रहा था. वे मजदूर हिंसा पर उतर आए. जून 1848 में मजदूर विद्रोह को दबाने के लिए जनरल कवेना॓क ने भारी मात्रा में बलप्रयोग किया. जिसमें डेढ़ हजार के अधिक श्रमिक मारे गए. लगभग बारह हजार को गिरफ्तार कर लिया गया तथा हजारों को देशनिकाले की सजा दी गई, जो भाग कर अल्जीरिया पहुंच गए. उस हत्याकांड के लिए जनरल कवेना॓क को ‘जून का कसाई’ कहा जाता है. इतिहास में यह घटना ‘फ्रांसिसी क्रांति’ के नाम से प्रसिद्ध है. क्रांतिकारियों से संबंध के आरोप में ब्लैंक को गिरफ्तार करने का प्रयास भी किया गया, जिसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षागार्डों ने उसके साथ बदसलूकी की. जैसे-तैसे जान बचाकर, फर्जी पासपोर्ट के आधार पर वह फ्रांस से भागकर बेल्जियम के रास्ते लंदन पहुंचा, जहां उसको राजनीतिक शरण दी गई.

ब्लैंक ने  प्रूधों, रिकार्डो, बैंथम, राबर्ट ओवेन, फ्यूरियर आदि विचारकों के जीवन-संघर्ष एवं मान्यताओं का गंभीर अध्ययन किया था. विशेषकर राबर्ट ओवेन के सहजीवन पर आधारित बस्तियों के विचार से वह प्रभावित था; और इसी कारण सहजीवन का समर्थक भी. लंदन पहुंचते ही उसकी कलम फिर सक्रिय हो उठी. तत्कालीन फ्रांसिसी सरकार के तानाशाही रवैये तथा उसकी जनविरोधी नीतियों की आलोचना करते हुए उसने स्थानीय समाचारपत्र-पत्रिकाओं में कई लेख लिखे, जिन्हें बाद में पुस्तकाकार प्रकाशित भी किया गया. अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘फ्रांसिसी क्रांति का इतिहास’ दो खंड वह 1847 में लिख चुका था. लंदन प्रवास के दौरान उसने फ्रांसिसी क्रांति से जुड़ी सामग्री का संचयन आरंभ कर दिया, जिसके आधार पर उसने ‘फ्रांसीसी क्रांति का इतिहास’ का पुनर्लेखन करते हुए बारह खंडों में एक दस्तावेजी ग्रंथ तैयार किया, जिसने उसको विश्वस्तर पर प्रतिष्ठित करने का कार्य किया.

लंदन में रहते हुए ब्लैंक ने 1865 में क्रिस्टीना ग्रो(Christina Groh) के साथ विवाह किया. किंतु उसका दांपत्य मात्र दस वर्ष तक ही चल सका. 1876 में ग्रो की मृत्यु ने ब्लैंक को मानसिक रूप से कमजोर कर दिया था. भीषण तनाव और लगातार परिश्रम का उसके स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा था. इस बीच फ्रांस में स्थितियां अनुकूल होने लगी थीं. अंततः बाइस वर्ष(1848-1870) तक निष्कासन की सजा भोगने के पश्चात वह 1870 में पेरिस लौट आया. जहां अगले ही वर्ष उसको राष्ट्रीय परिषद का सदस्य मनोनीत कर दिया गया. उस पद पर रहते हुए उसने अपने सुधारवादी प्रयासों को जारी रखा.

उम्र के इस पड़ाव पर आकर ब्लैंक स्वयं को अकेला अनुभव कर रहा था. उसका स्वास्थ्य भी गड़बड़ाने लगा था. कुछ वर्ष तक लगातार बीमार रहने के पश्चात, अंततः 12 दिसंबर, 1882 को केंस(Cannes) में उसका निधन हो गया. उसकी अंतिम क्रिया राजकीय सम्मान के साथ संपन्न की गई. वह बहुमुखी प्रतिभा का धनी, अच्छा लेखक, उत्कृष्ट वक्ता और मानवतावादी विचारक था. अपने विचारों को लेकर किसी भी प्रकार के संदेह से परे. उसके सामाजिक और राजनीतिक विचारों का प्रभाव फ्रांसिसी समाज और राजनीति पर पड़ा. इसलिए उसको फ्रांसिसी क्रांति के प्रमुखतम नेताओं में गिना जाता है.

वैचारिकी

ब्लैंक के जीवनचरित को पढ़कर बहुत आसानी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह अपने सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध मानवतावादी विचारक था. वह एक प्रभावी वक्ता, विद्वान लेखक एवं सफल संपादक था. उसकी विश्लेषण क्षमता बेजोड़, अभिव्यक्ति सामथ्र्य अत्युत्तम था. फ्रांस की क्रांति का उसने तथ्यपरक एवं बृहद् इतिहास लिखा, जिसको विश्वव्यापी सराहना मिली. अपने समाचारपत्र के माध्यम से उसने मजदूरों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया. ‘आर्गेनाइजेशन आ॓फ लेबर’ शीर्षक के अंतर्गत उसने स्वयं एक लेखमाला लिखी, जिसने मजदूरों को जागरूक एवं संगठित होने के लिए प्रेरित किया, जिसका परिणाम फ्रांसिसी क्रांति और तदुपरांत समाजवाद की स्थापना के रूप में हुआ.

ध्यातव्य है कि जिन दिनों ब्लैंक का जन्म हुआ, उन दिनों पूरे पश्चिमी जगत पर औद्योगिकीकरण की मार पड़ी हुई थी. नई तकनीक एवं मशीनीकरण के बल पर पूंजीपति-वर्ग मजदूरों और शिल्पकारों के शोषण पर तुला हुआ था. घरेलू उद्योग तबाह हो चुके थे. अपनी शिल्पकला के दम पर सम्मान का जीवन जीने वाले बुनकर भुखमरी के कगार पर पहुंचकर, छोटी-मोटी नौकरी करने को मजबूर थे. शहरों में गंदगी का आलम था. सरकार के नाम पर एक तानाशाह व्यवस्था थी, जिसके समक्ष अपना पक्ष रखना भी विद्रोह का प्रतीक था. जनसुविधाओं का अकाल जैसा था. गरीबों और कमजोरों की बात करने को कोई भी तैयार न था. एक और तो सत्तावर्ग अपनी मनमानी कर रहा था, दूसरी ओर पूंजीपति वर्ग की आमदनी और शाहखर्ची बढ़ती ही जा रही थी.

मजदूरों के उत्पीड़न की स्थति से उबारने के लिए ओवेन ने पूंजीपतियों से उदारता की अपील कर, मजदूर कल्याण के लिए आगे आने को कहा था. लेकिन स्वार्थी पूंजीपति वर्ग ने उसकी ओर कोई ध्यान न दिया. उल्टे ओवेन द्वारा श्रमिक-कल्याण के लिए चलाए जा रहे अभियान को अवरुद्ध करने का पूरा-पूरा प्रयास किया. यही कारण रहा कि ओवेन द्वारा स्थापित सहकार बस्तियों का प्रयोग असफल रहा. यही नहीं फैक्ट्रियों में कार्यघंटे कम करने तथा कार्यानुकूल परिस्थितियां बनाने के ओवेन के प्रयास को भी अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई थी.

राबर्ट ओवेन, प्रूधों तथा फ्यूरियर के विचारों से प्रभावित ब्लैंक ने राजनीति का उपयोग अपने सिद्धांतों को व्यापक आधार देने के लिए किया था. यह बात अलग है कि पर्याप्त समर्थन न मिल जाने के कारण वह अपेक्षित सफलता से वंचित रहा, किंतु उसने अपने लेखन द्वारा पूंजीवाद के विरुद्ध चेतना फैलाने का जो कार्य किया, प्रकारांतर में वह कार्ल माक्र्स जैसे विचारकों की प्रेरणा बना. ब्लैंक औद्योगिक मजदूर संगठनों एवं सहकारी समितियों को परस्पर पूरक मानता था. वह इन दोनों के तालमेल द्वारा एक ऐसी कल्याणकारी व्यवस्था कायम करने के पक्ष में था, जो उत्पादन के स्तर को बनाए रखकर, श्रमिक-हितों के साथ भी न्याय कर सके. समाजवाद के प्रति उसकी अटूट आस्था थी. 1839 में ही उसने राजनीति में तानाशाह नेपोलियन बोर्नापाट की वर्चस्वकारी प्रवृत्तियों पर कटाक्ष करते हुए, उन्हें फूहड़ और बकवास कहा था. तानाशाही और नेपोलियनिलिज्म की आलोचना करते हुए उसने उसने कहा था कि—

‘बिना कीर्ति के सत्ता हथियाए रखना ठीक वैसा ही है, जैसे कि बिना बादशाह के मुल्क.’

ब्लैंक की समाजवादी विचारधारा के दर्शन उनके महत्त्वपूर्ण ग्रंथ ‘आर्गेनाइजेशन आ॓फ लेबर (1848) में होते हैं. उसपर अपने समकालीन एवं पूर्ववर्ती विचारकों सिसमांदी, फूरियर, ओवेन, संत साइमन, प्रूधों आदि का प्रभाव था. राबर्ट ओवेन तथा फ्यूरियर की भांति ब्लैंक भी स्पर्धा के स्थान पर सहयोग को महत्त्व देता था. उसने स्पष्ट कहा था कि सामाजिक बुराइयों की जड़ स्पर्धा की भावना में है. उसने बताया कि स्पर्धा पूंजीवादी समाज का आदर्श तो हो सकती है, क्योंकि उसमें येन-केन प्रकारेण अधिकाधिक लाभ प्राप्त करने पर जोर दिया जाता है. किंतु किसी कल्याण आधारित राज्य-व्यवस्था का आदर्श उसे कभी नहीं माना जा सकता, क्योंकि वहां राज्य अपने नागरिकों के विकास को नैतिक कर्तव्य मानते हुए, उसके प्रति सतत प्रयत्नशील रहता है. लाभ की स्थिति में बने रहने के लिए उद्यमी अपने उत्पाद की गुणवत्ता घटाने के साथ-साथ, कोई भी ऐसा समझौता करने को तैयार रहता है, जो अधिकतम लाभ की सुनिश्चितता हेतु उपभोक्ता को तिकड़मी जाल में फंसाने के लिए जरूरी लगे. वह अधिकाधिक मशीनीकरण को अपनाता है, ताकि लाभ का बंटवारा कम से कम हाथों तक हो सके. इस प्रयास में ऐसे अनेक व्यक्ति बेरोजगार हो जाते हैं, जिनके पास सिवाय अपने श्रम-कौशल के, अपनी जीविका चलाने के लिए अन्य कोई साधन नहीं है.

यह एक तरह से अनैतिक व्यवस्था है, जहां विकास समाज के एक सीमित वर्ग तक सिमटकर रह जाता है. स्पर्धा में बने रहने के लिए चालाक पूंजीपति लोगों की भावनाओं से भी खिलवाड़ करता है. वह अपने उत्पाद को धर्म, जाति, लिंग आदि से जोड़कर उनकी पहचान के रूप में प्रस्तुत करता है. इससे सामाजिक एकता खतरे में पड़ जाती है और उसका भीतर ही भीतर विभाजन होने लगता है, दूसरे भावनात्मक आधार लिए गए निर्णयों के आधार पर उपभोक्ता को उसके द्वारा लगाए गए धन का उचित मूल्य नहीं मिल पाता. कई बार उत्पाद को लोगों में खपाने के लिए पूंजीपतिवर्ग राजनीतिक और धर्म-सत्तात्मक समर्थन जुटाने का भी प्रयास भी करता है. ब्लैंक ने समाज में व्याप्त गरीबी, दुराचार, असमानता और मूल्यहीनता के लिए स्पर्धा को जिम्मेदार माना है. स्पर्धा के स्थान पर वह सहयोग को महत्त्व देता था—

‘यदि तुम स्पर्धा के दुष्परिणामों से बचना चाहते हो तो तुम्हें इसको आमूल नष्ट कर देना होगा. इसके बदले सहयोग को सामाजिक जीवन का आधार बनाकर नए सिरे से कार्यारंभ करना होगा.’

स्पर्धा के दुष्परिणाम! ब्लैंक की स्वाभाविक निष्ठा समाजवाद के प्रति थी. एक ऐसी व्यवस्था की वह कल्पना करता था, जिसमें समाज के प्रत्येक व्यक्ति की हिस्सेदारी हो, जो उसके प्रत्येक सदस्य को अपनी जान पड़े. स्पर्धा के साथ सभी का अपनापन संभव नहीं है. अपनेपन का अभाव या कि अपनत्व पर संकट ही ‘स्पर्धा का प्रमुख दुष्परिणाम’ है. वस्तुतः औद्योगिकीकरण के आरंभ से ही अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग स्पर्धा को व्यावसायिक विकास का अनिवार्य तत्व मानता रहा है. दूसरी ओर समाजवादी विचारकों का मानना था कि स्पर्धा के माध्यम से समाज की एकजुटता को बनाए रखना संभव न होगा. उनके अनुसार स्पर्धा केवल पूंजी और तकनीक के कंधों पर सवार होकर ही कारगर सिद्ध हो सकती थी, जबकि समाज के बहुलांश के पास इनका अभाव होता है. अतएव सहकार के नए दर्शन के उदय के साथ स्पर्धा को संगठन के सिद्धांत द्वारा अपदस्थ किया गया. लुइस ब्लैंक ने स्पर्धा को दरकिनार करते हुए लिखा—

‘क्या स्पर्धा का अभिप्राय किसी गरीब को मिलने वाले रोजगार की सुनिश्चितता से है? एक सवाल यह भी है कि किसी कामगार के लिए स्पर्धा कितनी उपयोगी हो सकती है? क्या यह कार्य के बंटवारे का न्यायिक सिद्धांत बन सकती है, जिससे कि जिसे काम की सर्वाधिक जरूरत है, उसी को मिले. उत्तर तक पहुंचने के लिए हम एक पहेली बूझते हैं—

मान लीजिए कि किसी ठेकेदार को एक श्रमिक की आवश्यकता है. बुलाने पर तीन चले आते हैं.

‘इस कार्य के बदले तुम्हें कितनी मजदूरी चाहिए?’ ठेकेदार एक से पूछता है.

‘तीन फ्रैंक! मेरे साथ मेरी पत्नी और एक बच्चा भी है.’

‘ठीक है…और तुम?’

‘केवल ढाई फ्रैंक…मेरे साथ केवल मेरी पत्नी है…मैं इतने से ही काम चला सकता हूं.’

‘उससे तो बेहतर है, चलो अब तुम बताओ?’

‘मैं अकेला हूं…मेरे लिए मात्र दो फ्रैंक पर्याप्त होंगे!’

‘बहुत अच्छे, चलो काम पूरा करो.’

इस तरह मोलभाव के साथ मामला तय हो जाता है. लेकिन उन दो गरीब, जरूरतमंदों का क्या हुआ? हमें उम्मीद करनी चाहिए कि वे जीवित रहेंगे. पर कैसे? क्या होगा यदि पेट भरने के लिए वे चोरी करने लगें? कोई बात नहीं, आप कहेंगे कि हमारे पास बचाव के लिए पुलिस है. लेकिन यदि वे भूख से व्याकुल होकर हत्या करने पर उतर आएं, हत्यारे बन जाएं तब? शायद इस बार आप यह कहेंगे कि ऐसे लोगों के लिए आपके पास जेल की सलाखें हैं. यह भी ठीक है, परंतु क्या आपने सोचा है कि स्पर्धा के चलते उस तीसरे का क्या होगा. उसे तो काम मिल चुका है. ठीक है, लेकिन उसकी जीत भी पक्की कहां है! उसको चुनौती देने के लिए चौथा मजदूर कभी भी टपक सकता है, जिसे दो दिन में केवल एक ही दिन भोजन नसीब होता हो. हो सकता है कि वह सिर्फ पेट-भर रोटी के लिए अपनी सारी मजदूरी छोड़ दे. बेचारा दीन-दरिद्र या फिर जहाजी बेड़े का मजबूर गुलाम!’

ब्लैंक ने अपने इस रूपक से वर्षों पहले यह दर्शा दिया था कि स्पर्धा केवल पूंजीपतियों के लिए कारगर सिद्ध हो सकती है. गरीबों, अभावग्रस्तों के लिए वह अनुपयोगी, बल्कि खतरनाक स्थिति तक नुकसानदेह है. इसलिए उसने स्पर्धा को को अपदस्थ कर उसके स्थान पर सहयोग को स्थापित करने की सलाह दी थी. स्पर्धा के प्रति ब्लैंक का विरोध जीवन में लालसाओं की स्वाभाविक मौजूदगी के कारण था. गरीब संसाधनों के अभाव में स्पर्धा को नहीं चुन सकता, जबकि उद्यमी न केवल स्पर्धा में लगातार बने रहने का सामथ्र्य रखता है, बल्कि उसमें सफलता के लिए महंगी तथा उच्चतर तकनीक का इस्तेमाल भी कर सकता है. यही नहीं वह दूसरे माध्यमों से भी स्पर्धा के परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. संभवतः ब्लैंक को यह विश्वास हो चला था कि स्पर्धा को आधुनिक मुक्त अर्थव्यवस्था की देन है, जो शोषण तथा लाभ के असमान बंटवारे पर टिकी है. और वह यह भी समझ चुका था कि स्पर्धा के नाम पर राज्य अपने निर्णय और किंचित अधिकार भी, पूंजीपति वर्ग के हाथों में सौंपकर अपने कर्तव्य से उदासीन भी हो सकता है. उसकी कहना था कि—

‘धन का असमान वितरण, मजदूरी की अनुपयुक्त दरें तथा बेरोजगारी, ये सब स्पर्धा की ही देन हैं.’

ब्लैंक पूंजीवादी व्यवस्था का प्रखर आलोचक था. उसकी पुस्तक ‘सामाजिक प्रयोगशाला’ की अवधारणा सहकारी समूहों के काफी निकट है. फ्रेंक नोफ(Frank Noff) के शब्दों में—

‘सामाजिक प्रयोगशालाएं जिन्हें ब्लैंक स्थापित करना चाहता था, वस्तुतः समान व्यवसाय में लगे सदस्यों का संगठन थीं. सदस्यगण इन समानधर्मा सामाजिक प्रयोगशालाओं में सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शामिल होते थे, इस उद्देश्य के साथ कि वे अपने लक्ष्य को जनतांत्रिक समानता के आधार पर प्राप्त कर सकते हैं.’

ब्लैंक का मानना था कि समाज की अनेक दुरावस्थाओं का निदान उत्पादन की सहकारी व्यवस्था को लागू करके किया जा सकता है. वह कारखानों पर श्रमिकों के अधिकार का समर्थक था और चाहता था कि श्रमिक अपने श्रम की महत्ता को स्वीकारते हुए संगठित हों. उस कारखानों का स्वयं संचालन करें, इस कार्य में राज्य को भी मजदूरों की मदद करनी चाहिए. ब्लैक की विचारधारा उसके अपने शोध एवं अनुभव पर आधारित है.

उसका (ब्लैंक का) मानना था कि केवल लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित सरकार ही आर्थिक और सामाजिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त कर सकती हैं. चूंकि रोजगार प्रत्येक व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकार है, अतएव सरकार का यह कर्तव्य है कि नागरिकों के इस अधिकार की रक्षा करे. यहां तक कि बीमारों और वुजुर्गों को भी किसी प्रकार की परेशानी न होने दे. इस लक्ष्य को पाने के लिए उसने ‘सामाजिक कार्यशालाओं’ की स्थापना पर जोर दिया है, जो उत्पादक सहकारी समितियों जैसी ही व्यवस्था है. उसका संगठन उत्पादित वस्तु या शिल्प की प्रकृति के आधार पर किया जा सकता है. इन सामाजिक कार्यशालाओं का प्रबंधन मजदूरों के हाथ में होगा. वे लाभ को आपस में बांटकर सरकारी ऋण को लौटाने की जिम्मेदारी संभालेंगे. प्रकारांतर में श्रमिकों के स्वामित्व वाली ये कार्यशालाएं कृषिफार्म, फैक्ट्री, दुकान आदि निजी स्वामित्व वाले सभी उद्यमों और व्यवसायों को अपने अधिकार में ले लेंगी. इस प्रकार से समूचा उत्पादन सहकारिताकेसिद्धांतोंकेअनुरूप होने लगेगा.

ब्लैंक प्रत्येक अवस्था में मजदूरों एवं वंचितों के अधिकारों का संरक्षण चाहता था. आवश्यकता पड़े तो कानून बनाकर भी. वह चाहता था कि कानून इस तरह से बनाए जाने चाहिए कि श्रमिक समूहों द्वारा संचालित कारखाने सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त रह सकें. सरकार का दायित्व है कि ऐसे कारखानों के लिए पूंजी का प्रबंध वह अपने òोतों से करे. आवश्यकता पड़ने पर बिना ब्याज का ऋण उपलब्ध कराए. ऐसे कारखानों का प्रबंध पूर्णतः लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप हो. यही नहीं, ब्लैंक मानता था कि प्रबंधन में लगे श्रमिक वर्ग की सहभागिता भी स्वैच्छिक होनी चाहिए, ताकि वे स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकें. उसने सहकारी कारखानों में आय का वितरण तीन मदों में किए जाने का सुझाव दिया है—

1. संचालन निधि : इस निधि से श्रमिकों के वेतन आदि संचालन संबंधी अन्य व्यय निकाले जाएंगे. संचालन संबंधी खर्चों में कच्चे माल की कीमत, भाड़े पर खर्च की गई रकम तथा अनुरक्षण संबंधी व्यय सम्मिलित हैं.

2. सुरक्षित निधि : इस निधि के एक हिस्से से बाह्यः ऋणों का भुगतान किया जाएगा, जबकि दूसरे हिस्से से नवीन पूंजी का निर्माण होगा. नवीन पूंजी का उपयोग कारखाने के विस्तार संबंधी योजनाओं में निवेश हेतु किया जाएगा.

3. लाभ : लाभ में मजदूरों की भागीदारी होगी. वह उनमें बांट दिया जाएगा.

देखा जाए तो ब्लैंक अपने पूर्व के तथा समकालीन विचारकों रिकार्डो, संत साइमन, राबर्ट ओवेन, फूरियर, प्रूधों आदि के स्वर में स्वर मिलाते हुए, उन्हीं की परंपरा को समृद्ध कर रहा थे. किंतु ‘श्रमिकों की उत्पादक सहकारी समितियां’ बनाने का विचार उसका मौलिक था, जिसके लिए उसको सदैव याद किया जाता रहेगा. इस तरह हम कह सकते हैं कि सहकार का जो विचार राबर्ट ओवेन के दिमाग में पनपा था, ब्लैंक ने उसी को खाद-पानी देकर ऊर्जस्वित करने का सार्थक प्रयास किया था. तथापि इन विद्वानों से भिन्न मत रखते हुए ब्लैंक ने आश्चर्यजनक रूप से किफायत और बचत के विचार का भी विरोध किया है. ध्यान रहे कि बचत के सिद्धांत का समर्थन राबर्ट ओवेन ने भी किया है. ब्लैंक का मानना था कि मितव्ययिता और बचत व्यक्ति-विशेष के संबंध में तो उपयोगी हो सकती है, किंतु सामूहिक आधार पर बचत की प्रवृत्ति पूंजी के केंद्रीयकरण को बढ़ावा देती है, जो अन्याय जैसी अन्य अनैतिक व्यवस्थाओं का कारक है. इस संबंध में उसका कहना था—

‘मितव्ययिता अच्छी चीज हो सकती है, परंतु जब वह व्यक्तिवादी उद्देश्य से की जाती है तो अहंकार को जन्म देती है. दानशीलता का विरोध करती है तथा मनुष्य की अच्छी भावनाओं को समाप्त करती है. केवल अपने लिए बचत करना, अपने मित्रों और भविष्य पर अविश्वास करना है.’

ओवेन की भांति ब्लैंक को भी अपने प्रयासों में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी. तो भी मजदूरों की सहकारी समिति गठित करने का विचार सहकारिता के क्षेत्र में उसकी मौलिक देन माना जाएगा, जिसकी उस समय पूंजीवाद के बेलगाम घोड़े पर रोक लगाने के लिए अत्यंत आवश्यकता थी. वस्तुतः उस समय यह कार्य सहकारिता आंदोलन की एक भूमिका जैसा था. एक पीठिका थी जिसपर आगे चलकर महाकाव्य लिखा जाना था. यह बात अलग है कि सहकारिता का आगे चलकर जिन लोगों में विकास हुआ, उनमें उत्पादक सहकारी समितियों की संस्था आनुपातिक रूप में कम ही रही है, विशेषकर भारत जैसे विकासशील देशों में, जहां विपुल जनसंख्या के सापेक्ष संसाधनों की विरलता के चलते, इसकी सर्वाधिक आवश्यकता थी. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि सहकारी आंदोलन को खड़ा करने और उसे प्रभावी गत्यात्मकता देने के लिए अनिवार्य कौशल और व्यावहारिकता का गरीब और अल्पशिक्षित वर्गों में अभाव होता है. हालांकि हाल के वर्षों में इसके कुछ अपवाद भी देखने में आए हैं. समाज का गरीब, अशिक्षित वर्ग भी सहकारी संस्थाओं का संचालन कुशलतापूर्वक कर सकता है, कुछ उदाहरणों से यह स्पष्ट भी हो चुका है. मगर यह उन्हीं क्षेत्रों में संभव हो पाया है, जहां कुछ समर्पित और ऊर्जावान व्यक्तियों ने उस वर्ग के उत्थान के लिए प्रतिबद्धता और ईमानदारी के साथ कार्य किया है.

ब्लैंक की मान्यता थी कि कारखानों को समाजवादी आधार पर चलाया जाए, ताकि उनका लाभ अधिकतम लोगों तक पहुंच सके. विचार के रूप में यह बहुत अच्छी बात है, मगर इसके लिए पूंजीपतियों को तैयार करना बड़ा ही मुश्किल, असंभव-सा कार्य था. अधिकांश कारखाने पूंजीपतियों के आधिपत्य में थे और उनसे यह अपेक्षा रखना प्रायः व्यर्थ ही था कि वे अपने स्वामित्व को समाज या श्रमिक संगठनों को आसानी से सौंप देंगे. इस तरह के असफल प्रयास ब्लैंक से पहले भी हो चुके थे, अतएव उसपर विचारों की चोरी का आरोप लगाते हुए, उसकी आलोचना भी की गई.

सही है कि समाज में सबसे बड़ी ताकत साधारणजन की होती है और वह किसी भी महान परिवर्तन का कारण बन सकती है—राबर्ट ओवेन का समाज की कार्यक्षमताओं में विश्वास करना गलत नहीं था, परंतु वह यह आकलन संभवतः नहीं कर पाया था कि जनता भले ही विराट शक्ति की स्वामिनी हो, लेकिन वह स्वयं धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, भाषा, रंगभेद आदि मुद्दों पर बुरी तरह बंटी होती है. अथवा शिखरस्थ शक्तियां निहित स्वार्थों के लिए जनता की भावुकता और भलमनसाहत का लाभ उठाकर उसे ऐसे काल्पनिक वर्गों में बांटे रखती हैं. ऐसे अनेक खानों में बंटे जन-मानस को उद्देश्यपूर्ण सामूहिकता के दायरे में लाना और लंबे समय तक सक्रिय बनाए रखना सरल नहीं होता. इसके लिए महात्मा गांधी जैसे नेताओं की जरूरत पड़ती है, जो पूरी तरह ईमानदार हों, जिनकी कथनी और करनी में एकरूपता हो; और जो इतने चतुर भी हों कि आमजन के मानस की राई-रत्ती परख कर सकें. बिडंवना यह है कि वैसे नेता सहस्राब्दियों में एकाध ही पैदा होते हैं.

स्वाभाविक एवं निरंतर विकास के लिए जागरूक लोकमानस आवश्यक है. एक बार जनमानस जाग्रत होकर लक्ष्योन्मुखी प्रयास करने लगे तो बाकी बाधाएं स्वतः दूर होती जाती हैं. नागरिक कल्याण के वही प्रयास सफलता के शिखर तक पहुंचते हैं, जिनमें शुरुआत साधारणतम से होती है. इस बीच असफलताएं स्वाभाविक रूप से आती हैं, किंतु सक्रिय एवं प्रबुद्ध लोकचेतना उनके निस्तारण का उपाय सहज ही खोज लेती है. इस तथ्य को राबर्ट ओवेन भले ही नहीं समझ पाए हों, लेकिन रोशडेल पायनियर्स के दिलों में इसके प्रति विश्वास अवश्य ही रहा होगा, तभी वे एक कामयाब संगठन को गढ़ सके थे. इसके बावजूद बैंथम, जेम्स मिल, संत साइमन, राबर्ट ओवेन, फ्यूरियर, प्रूधों जैसे विचारकों के योगदान को भुला पाना संभव नहीं हैं. उन्होंने जिस साहसिक जनपक्षधरता का परिचय दिया, अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को आधार बनाकर, अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर जो चुनौती-भरे प्रयोग किये, कालांतर में वही सफल सहकारी आंदोलन की नींव बन सके, उन्हीं के आधार पर आगे चलकर विश्वव्यापी सहकारिता आंदोलन खड़ा हो सका.

ब्लैंक के प्रयोगों के असफल रह जाने से उसके आलोचक मुखर हो चुके थे. असफलता के बावजूद उसने अपनी आलोचनाओं को सहज भाव से लिया. उसकी नाकामयाबी का एक कारण यह भी था कि उन दिनों सहकारी आंदोलन अपनी बाल्यावस्था में था. मजदूर वर्ग में शिक्षा और जागरूकता का अभाव था. उनके भीतर अधिकार चेतना धीरे-धीरे पनपने तो लगी थी, परंतु उसकी नेतृत्वकारी शक्तियों, जिनमें ज्यादातर मजदूर ही थे, को सहकारी संगठनों को चलाने का विशेष अनुभव नहीं था. अधिकांश मजदूर गरीब, अशिक्षित और विपन्न थे. पूंजी प्रधान अर्थव्यवस्था के आगे सहकारी समूहों की बाजार में टिके रहने की क्षमता भी बहुत कम थी. न चाहते हुए भी उन्हें तकनीक एवं पूंजी-बाहुल्य वाले निगमों के साथ स्पर्धा करनी पड़ रही थी, जो तात्कालिक परिस्थितियों में निश्चय ही बहुत कठिन एवं चुनौती-भरा काम था.

ब्लैंक के विचारों की उपयोगिता कुछ ही वर्षों के बाद विशेषकर तब समझ में आने लगी थी, जब मजदूर आंदोलनों का विकास हुआ और संगठित मजदूर-संघों ने जागरूक होकर अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष की शुरुआत की. उसके बाद जगह-जगह उत्पादक समितियां बनाकर उन्होंने उत्पादन-प्रणाली को अपने अधिकार में लेना शुरू कर दिया. वैसे भी विचारों को यथार्थ के धरातल पर अपना वजूद सिद्ध करने में कुछ समय तो लगता ही है. ब्लैंक के विचारों ने भी समय आने पर स्वयं को खरा सिद्ध कर दिया था, अतएव समाजवादी आंदोलन के विचारकों में उसका स्थान सुरक्षित है.

©ओमप्रकाश कश्यप

2 टिप्पणियाँ

Filed under लुईस ज्यां जोसेफ चार्ल्स ब्लैंक : श्रम कल्याण के लिए समर्पित विचारक और नेता

2 responses to “लुईस ज्यां जोसेफ चार्ल्स ब्लैंक : श्रम कल्याण के लिए समर्पित विचारक और नेता

  1. उफ़.काफ़ी लंबा था, पर पूरा पढ़ गया।
    बहुत ही महत्वपूर्ण प्रस्तुति।

    आज के इस दौर को समझने के लिए, डेढ़ सौ वर्ष पहले के यूरोप की खलबली से गुजरना एक बेहतर अनुभव साबित हो सकता है, क्योंकि भारत अभी लगभग वैसे ही हालातों से गुजर रहा है और विकास में, विचार में बहुत पीछे है।

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