चार्ल्स फ्यूरियर : समाजवादी चिंतन का पुरोधा

फ्यूरियर ने जिंदगी को बहुत करीब से देखा था. वह गरीब परिवार में जन्मा. संघर्षों के साथ बड़ा हुआ. एक सेल्समेन या कहो कि कमीशन एजेंट के रूप में फ्रांस के इस शहर से उस शहर के बीच घूमते हुए उसने पूंजीवाद का नंगा नांच देखा तो भूसामंतों की मनमानी और जमींदारों द्वारा जनसाधारण का उत्पीड़न भी. परिस्थितियों ने उसको लेखक बनाया. संघर्ष ने उसे आलोचकीय दृष्टि दी. उसने समाज में जैसा देखा, वैसा लिखा और खुलकर लिखा. मौलिक सोच और वैज्ञानिक समझ के कारण उसकी गिनती दुनिया के प्रमुख समाजवादी चिंतकों में की जाती है. लगातार निर्भीक और मौलिक लेखन करते हुए उसने अपने समय के बुर्जुआ समाज की खुलकर आलोचना की. उसकी शैली में तंज था. अपने अकाट्य तर्कों से उसने पूंजीवाद का सामना किया और सिद्ध किया कि ‘सभ्यता के विकास के चरण में गरीबी, समाज (के एक वर्ग) की अतिसंपन्नता की देन है.’ (…under civilization poverty is born of superabundance itself). समानता आधारित समाज का पक्ष लेते हुए उसने सहजीवन पर आधारित बस्तियों का समर्थन किया, जो आगे चलकर सहकारिता आंदोलन के विकास का कारण बना.

ओमप्रकाश कश्यप

राबर्ट ओवेन जिन दिनों सहजीवन के विचार को लेकर इंग्लेंड और अमेरिका में लगातार प्रयोग कर रहा था, उन्हीं दिनों फ्यूरियर फ्रांस में सहकारिता और समाजवादी विचारों की स्वीकार्यता के लिए, अपने सतत लेखन द्वारा अपेक्षित माहौल की रचना कर रहा था. वह तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की खामियों और विसंगतियों से लोगों को सावधान करता हुआ, एक समानता आधारित समाज की स्थापना के लिए प्रयासरत था. उसकी शैली मारक थी. फ्यूरियर अधिक पढ़ा-लिखा नहीं था, किंतु स्थितियों की पड़ताल करते हुए, भविष्य में झांकने की उसकी क्षमता अद्भुत थी. फ्रांसिसी क्रांति के प्रारंभिक वर्षों में ही फ्यूरियर ने औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप तेजी से पनपते, फूलते, फलते मध्यवर्ग की ताकत और उसकी पहुंच को पहचान लिया था. वह उसी का उपयोग सामाजिक बदलाव के लिए करना चाहता था.

फ्यूरियर का जन्म ७ अप्रैल, १७७२ को फ्रांस के बेसंका॓न(Besancon) नामक स्थान पर हुआ था. वहीं उसकी शिक्षा संपन्न हुई. कुछ समय पश्चात वह लेया॓न(Lyan) के लिए स्थानांतरित हो गया; जो उस समय फ्रांस के बड़े शहरों में से था. उसका परिवार प्रारंभिक दिनों में काफी धनवान था और कपड़े का व्यवसाय करता था. बावजूद इसके फ्यूरियर की शिक्षा अधिक लंबी न खिंच सकी. उसका जीवन संघर्ष भरा रहा. तबियत से आजाद खयाल फ्यूरियर ने सैल्समेन जैसी छोटी-मोटी नौकरियां कीं. कमीशन पर समाचारपत्र-पत्रिकाएं, पुस्तकें, घरेलू सामान आदि बेचने का काम किया. उसी सिलसिले में उसने हालैंड, जर्मनी, बेल्जियम आदि देशों की यात्राएं की. मगर ये कोरी व्यापारिक यात्राएं ही नहीं थीं. सामाजिक विसंगतियों को पहचानने के लिए यह उसका अपना चयन था, जिसके बारे में उसने कहा भी था कि—

‘मेरा भाग्य ही था, दुकानदारों के बेईमानी भरे कार्यों में योगदान करते हुए स्वयं को ऐसे तुच्छ और बकवास कार्य के लिए निरंतर कोसते रहना.’

फूरियर स्वभाव से अध्यवसायी था. उसने अलग-अलग देशों में जाकर वहां के समाज, अर्थव्यवस्था में रुचि लेना जारी रखा और जिससे उन्हें उन देशों की आर्थिक-सामाजिक संरचनाओं को समझने में काफी मदद मिली. उसने देखा कि प्रत्येक समाज आर्थिक आधार पर अमीर और गरीब में बंटा है और उसके कारण तथा तज्जनित समस्याएं प्रायः एक जैसी ही हैं. आर्थिक विभाजन के आधार पर सामाजिक अंतर्द्वंद्व पनपते हैं, जिनसे निपटने में शासन का बहुत-सा धन और समय बेकार चला जाता है. धीरे-धीरे उसकी यह आस्था दृढ़ होती चली गई कि आमूल परिवर्तन के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सहयोग अपरिहार्य है. सहकारी संगठन की सफलता के लिए स्वैच्छिक सहभागिता पहली और अनिवार्य शर्त है. उसका कहना था कि सच्चा सामाजिक संगठन मानव-प्रकृतियों को बलपूर्वक नियंत्रित करके नहीं बनाया जा सकता, बल्कि उनको संतुष्ट करके ही बनाया जा सकता है, ताकि संघर्ष के स्थान पर सहयोग प्रभावी रहे तथा सामाजिक ऊर्जा का उपयोग रचनात्मक कार्यों के लिए किया जा सके.

फ्यूरियर को अपने व्यवसाय से कभी संतुष्टि नहीं हुई. उसे सदैव यही लगता रहा कि वह धूर्त व्यापारियों के लिए कार्य कर रहा है. सेल्समेन के रूप में काम करते हुए फ्यूरियर ने आवश्यकता पड़ने पर अंशकालिक लिपिक के रूप में भी कार्य किया. जिससे उसका संबंध एक ओर आम आदमी से पड़ा, वहीं दूसरी ओर उसको समाज के प्रभुवर्ग की शोषणवादी प्रवृत्ति को समझने में भी सहायता मिली. उसके ग्राहकों में अधिकांश मध्यवर्ग के लोग शामिल थे. उसके संपर्क में रहकर फ्यूरियर को समझ में आने लगा कि बात-बात में पूंजीवादी व्यवस्था तथा धार्मिक जड़ताओं की आलोचना करने वाला मध्यवर्ग, वक्त पड़ने पर पूंजीपति की ओर ही झुकता है. उसकी इस चाल का सीधा-सीधा नुकसान जनसाधारण को उठाना पड़ता है, जो उसको अपना प्रतिनिधि मानकर अपने नेतृत्व की जिम्मेदारी उसको सौंपे रखता है. अपनी स्थिति का पूरा लाभ मध्यवर्ग भी नहीं उठा पाता. क्योंकि चालाक पूंजीपतिवर्ग चतुराई पूर्वक मध्यवर्ग के विभिन्न गुटों के बीच फूट डाले रखता है. जनसाधारण का कल्याण तब तक संभव नहीं है जब तक अपनी स्थिति को समझते हुए वह अपना प्रवक्ता स्वयं नहीं बन जाता.

इस विसंगति के समझ में आते ही फ्यूरियर की आलोचनात्मक मेधा जोर मारने लगी. उसने सामाजिक असंतुलन तथा उसकी कारक शक्तियों के विरुद्ध लिखना प्रारंभ कर दिया. अपने लेखों में उसने उच्चवर्ग के वर्चस्वकारी संस्कारों की जमकर आलोचना की. मध्यवर्ग की अवसरवादी और चाटुकारितापूर्ण प्रवृत्ति पर प्रहार करते हुए उसने लगातार कई व्यंग्य लिखे. उसके व्यंग्यों के विषय अधिकांश, तात्कालिक सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों पर केंद्रित होते थे. चुटीली शैली के कारण उनकी पठनीयता अदभुत थी. लेकिन उनमें समाज का यथार्थ निहित था. इसलिए जनमानस पर उनका असर भी गहरा होता था. यात्रा के दौरान मिलने वाले लोगों, समाचारपत्रों तथा आपसी बातचीत को उसने अपने विचारों का प्रमुख स्रोत स्वीकार किया है.

अपने अनुभवों को संग्रहित करते हुए उसने कई पुस्तकों की रचना भी की. उसकी पहली पुस्तक सन 1808 में प्रकाशित हुई थी. फ्यूरियर के विचारों में कई स्थान पर अस्थिरता और अनर्गलता भी देखने को मिलती है. कई जगह उसने ऐसे तथ्यों का वर्णन किया है, जिनपर विश्वास करना कठिन है. किंतु उसके सामाजिकबोध और नवजागरण के प्रति उसके समर्पण की एकाएक उपेक्षा कर पाना संभव नहीं है. जीवन के अंतिम वर्षों में वह पेरिस में रहने लगा था. वहीं पर सन १० अक्टूबर, १८३७ में उसकी मृत्यु हो गई. वह फ्रांस के उन महानतम वुद्धिजीवियों में से था, जिन्होंने अपने समय को सर्वाधिक प्रभावित किया था. 1848 की फ्रांसिसी क्रांति जिसने यूरोप सहित पूरी दुनिया में लोकतंत्र को नया वैचारिक दिया, फ्यूरियर जैसे उदारवादी विद्वानों के सतत संघर्ष का ही सुफल थी.

फ्यूरियर हालांकि बहुत पढ़ नहीं सका था, तथापि स्थितियों का विश्लेषण करने की प्रतिभा उसमें अद्वितीय थी. हालांकि उसके कई विचार ऐसे हैं, जिन्हें पढ़कर उसकी अस्थिर मनोवृत्ति का अनुमान होने लगता है. लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं है कि वह अपने समय के उन अनेक विद्वानों में से था, जिन्हें भविष्य का सटीक आकलन करने का गुर आता था. उनीसवीं शताब्दी में लोकतंत्र एवं समाजवादी सरकारों की स्थापना के समय, फ्यूरियर के योगदान पर नए सिरे से विचार किया गया और उसको वर्तमान फ्रांस के निर्माताओं में ससम्मान स्थान दिया गया. स्त्री समानता के मुद्दे पर उसके विचार एकदम प्रगतिशील थे. उसका मानना था कि स्त्री-अधिकारों की सुरक्षा ने सामाजिक प्रगति को सकारात्मक दिया दी है. फेमिनिज्म्(Féminisme) शब्द का पहला प्रयोग फ्यूरियर ने ही सन 1837 में किया था. आज महिला अधिकारिता पर जो जोर दिया जाता है, उसके पीछे कहीं न कहीं फ्यूरियर की ही प्रेरणाएं हैं. जिसने आगे चलकर जान स्टुअर्ट मिल, सार्त्र, सिमोन दा’ बुआ तथा उनके अनेक स्त्रीवादी विचारकों को जमीन दी. जिनके कारण आगे चलकर स्त्री-विमर्श को व्यापक आधार मिला.

वैचारिकी

फ्यूरियर ने अपने निष्कर्षों के लिए लेखन की संवाद शैली को अपनाया है. यह वही शैली है जिसपर सुकरात ने अपनी दार्शनिक गवेषणाएं की थीं, बाद में प्लूटो ने भी इसी शैली में अपनी कई प्रसिद्ध पुस्तकों की रचना की थी. फ्यूरियर का समकालीन हीगेल भी उसी शैली को अपना रहा था. उल्लेखनीय है कि जिन दिनों फ्यूरियर जीवन के अनुभव बटोर रहा था, उन दिनों फ्रांस का समाज वैचारिक हलचल से तथा इंग्लेंड औद्योगिकीकरण की तीव्र प्रक्रिया से गुजर रहा था. भाप के इंजन, जल-ऊर्जा द्वारा चलने वाली मशीनों के आविष्कार से उत्पादन पद्धति में आमूल बदलाव आया था. उससे कुछ ही वर्ष पहले छपाई मशीन के विकास से पुस्तक प्रकाशन आसान हुआ था. जिससे पुस्तकों की, ज्ञान की सुलभता बढ़ी थी. ज्ञान को सहेजकर, उसे बड़े पाठकवर्ग तक पहुंचाना, उसके माध्यम से नए विमर्श की शुरुआत करना यह पुस्तकों ने संभव कर दिखाया था. इस औद्योगिकीकरण की भी सीमाएं थीं. इस पर टिप्पणी करते हुए स्टीवन क्रिस लिखते हैं—

‘अठारहवीं शताब्दी के आखिरी दशकों और उनीसवीं शताब्दी के प्रांरभ की औद्योगिक क्रांति सचमुच क्रांतिकारी थी, क्योंकि उसने इंग्लेंड, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की संपूर्ण उत्पादन क्षमता में चमत्कारी परिवर्तन किए थे. ये बदलाव नई मशीनों के आविष्कार, धुआं उगलने वाली फैक्ट्रियों, तीव्र उत्पादकता वृद्धि तथा रहन-सहन का उच्च स्तर कायम करने तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि इससे कहीं व्यापक, कहीं अधिक प्रभावकारी थे. इसलिए कि इस क्रांति ने यूरोपीय समाजों को उसकी जड़ों से जोड़ने में कामयाबी हासिल की थी. नवजागरण अथवा फ्रांसिसी क्रांति की भांति, कोई भी उसके परिणामों से अछूता नहीं था. शिल्पकार और उद्योगपति, किसान और जमींदार, बालक और उसके माता-पिता; यानी प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में एक-दूसरे से संबद्ध, एक-दूसरे से प्रभावित था.’

यूरोपीय औद्योगिकीकरण के बहुआयामी प्रभावों को लेकर कुछ ऐसे ही विचार हेरा॓ल्ड परकिन ने व्यक्त किए हैं—

‘(यूरोपीय) औद्योगिक क्रांति मात्र उत्पादन तकनीक अथवा उसके माध्यम से उत्पादकता में आए सकारात्मक परिवर्तन तक ही सीमित नहीं थी, सही मायने में यह सामाजिक कारणों एवं जनाकांक्षाओं से प्रेरित महान सामाजिक क्रांति थी.’

औद्योगिक क्रांति न केवल सामाजिक बदलाव का कारक बनी थी, बल्कि इसने लोगों के विचारों, व्यवहार से लेकर उनके सोचने-विचारने की तकनीक को भी प्रभावित किया था. विज्ञान और परंपरा से प्रेरित विचार की भिन्न-भिन्न शैलियों, अवधारणाओं का जन्म इस युग में हुआ. इतना कि उनके पारस्परिक अंतर्द्वंद्वों की संभावनाओं को कम करने के लिए बचाने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अवधारणा को बल मिला. इसका सुफल यह हुआ कि बुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग लोकतंत्र के समर्थन में उतर आया था. सुदृद्ध औद्योगिकीकरण का एक परिणाम मध्यवर्ग का त्वरित उदय भी था. हैरानी की बात है कि यह मध्यवर्ग अपने ही अंतर्विरोधों का शिकार था. वह जनसाधारण के समक्ष तो उसका होने का दम भरता, उसके मन जैसी बात करता, मगर व्यवहार में पूंजीपति का समर्थक बना रहता है. दूसरे शब्दों में मध्यवर्ग सही मायने में क्रांति का साधक और अवरोधक दोनों था. उसकी महत्त्वाकांक्षाएं उसे औद्योगिकीकरण के समर्थन के लिए उकसाती थीं तथा जातीय स्मृतियां, संस्कार उसपर अपनी जड़ों की ओर लौटने का दबाव डालते रहते थे. उसकी शिक्षा का बढ़ता स्तर, उसके असंतोष को विस्तार दे रहा था, जो क्रमशः नए विचारों तथा आंदोलन के आगमन की भूमिकाएं गढ़ रहा था. मध्यवर्ग के इस असंतोष को जनसाधारण के असंतोष में बदल देने की चुनौती हर क्रांतिकारी विचारक, आंदोलनकारी की रही है. यही कार्य वाल्तेयर(1694-1778) ने अठारहवीं शताब्दी में किया था. इसी को अपनी-अपनी तरह से अंजाम देने वालों में संत साइमन, रेने देकार्ते, जा॓न ला॓क, कांट, मिल, मार्क्स आदि विद्वान थे.

फ्यूरियर के समक्ष भी ऐसी ही परिस्थितियां थीं. उसके समक्ष पूर्ववर्ती विद्वानों द्वारा परिवर्तनकारी आंदोलन की परंपराएं थीं. सहस्राब्दियों तक राजनीति, समाज एवं प्रशासन पर अपना नियंत्रण बनाए रखने वाली और उसके बहाने पूरे समाज का शोषण करनेवाली धार्मिक संस्थाएं नए ज्ञान तथा वैचारिक चेतना के आगे स्वयं को असहाय अनुभव कर रही थीं. उनका तिलिस्म धीरे-धीरे आभाहीन होता जा रहा था. इस संकट से से उबरने की कोशिश के फलस्वरूप उनके बीच भी दो फाट हो चुके थे. एक वर्ग आधुनिकता से प्रभावित था, स्वयं को आधुनिकता की कसौटी पर कसते हुए वह पूर्वस्थापित धारणाओं में संशोधन करने को भी तैयार था. दूसरा वर्ग बदलाव और आधुनिकता को अपने हितों के विपरीत मानते हुए नए ज्ञान-विज्ञान का आलोचक बना हुआ था. इस तरह परंपराओं को कुल मिलाकर पूरा समाज संक्रमण की स्थिति में था. वह उत्पादक तथा उपभोक्ता वर्ग के बीच तेज गति से बंटता जा रहा था. पूंजीवादी शक्तियां जहां आर्थिक संसाधनों पर कब्जा बनाए रखकर किसी न किसी बहाने अपने मुनाफे को बढ़ाने की कोशिश में थीं, तो सामाजिक बदलाव की समर्थक शक्तियों का सारा प्रयास जनता को पूंजीवादी मंसूबों के प्रति सचेतकर एक ऐसी व्यवस्था की नींव रखना था; जो उपयोगितावाद के मुख्य सिद्धांत ‘अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख’ की भावनाओं के अनुरूप हो.

यह स्थिति पूरे यूरोप में थी, मगर उसका सर्वाधिक प्रभाव इंग्लेंड तथा फ्रांस के समाज पर पड़ा था. इंग्लेंड में बाजी जहां उद्योगपतियों के हाथ में थी, जबकि बाकी यूरोपीय देशों में पूंजीवाद अपनी पकड़ बनाने का प्रयास की कर रहा था. फ्रांस में स्थिति लगभग उलट थी. वहां वैचारिकता का गर्माया हुआ माहौल, एक नई क्रांति की भूमिका गढ़ रहा था. इंग्लेंड की राजनीति पर पूंजीपतियों के वर्चस्व का ही परिणाम था कि ओवेन जैसों को वहां पर अंततः नाकामयाबी ही हाथ लगी. न्यू हा॓रमनी जैसी सहजीवन को समर्पित बस्तियां अमेरिका के कतिपय खुले वातावरण में ही थोड़ी-बहुत संभव हो पाई थीं. हालांकि वहां भी अपेक्षित सफलता इस कारण नहीं मिल सकी कि प्रतिरोधक शक्तियां किसी भी प्रकार से यथास्थिति बनाए रखना चाहती थीं, और परिवर्तकारी शक्तियों के बीच इतना तालमेल और अनुभव नहीं था कि वह उनका मुकाबला कर सकें.

ओवेन की भांति फ्यूरियर का भी मानना था कि समर्पण एवं सहकार सामाजिक विकास के प्रमुख कारक हैं. इन्हीं में समाज के सुख एवं सृमद्धि के रहस्य छिपे पड़े हैं. इन्हीं के माध्यम से एक ऐसे समाज की रचना संभव है, जहां पर न्यूनतम आर्थिक विषमताएं हों. जहां कल्याण में सर्वाधिक की साझेदारी हो. उसका मानना था कि जिन समाजों ने सहकार को अपनाया है, वहां न केवल उत्पादकता के स्तर में अपेक्षाकृत तेजी से सुधार हुआ है; बल्कि नागरिकों की आत्मनिर्भरता भी विकसित हुई है. उसकी मान्यता थी कि कारीगरों को उनकी मेहनत और योगदान के बदले अवश्य ही कुछ मिलना चाहिए. और उनके परिश्रम का सर्वाधिक सुफल सहकारिता पर आधारित उद्यमों की स्थापना से ही संभव सहकारिता के विस्तार के लिए फ्यूरियर ने कल्याण-आश्रमों(Phalanstere) की स्थापना पर जोर दिया. ये आश्रम ओवेन के सर्वहितैषी आश्रमों के ही समान थे. जहां पर समाज के सभी वर्ग के लोग साथ-साथ रह सकते थे.

फ्यूरियर का कहना था कि कामगार को उसकी मेहनत के अनुपात में पूरा पारिश्रमिक मिलना चाहिए. उसके द्वारा बसाई गई बस्तियां अथवा आश्रम चार मंजिला इमारतों में स्थित थे; जिन्हें ‘ग्रांड होटल’ या ‘फेलेंस्टीयर’ (Grand Hotels or Phalanstère) कहा जाता था. फ्लेंस्टीयर शब्द यूनानी फेलेंक्स(Phalanx) से लिया गया था, जिसका अभिप्राय ‘सामूहिक आवास’ से है. फ्यूरियर का विचार था कि प्राचीन यूनान में लोग फेलेंक्स में ही रहते थे; जहां पर जीवन एक-दूसरे पर पूर्णतः निर्भर था. इमारतों के सबसे ऊपर की मंजिल पर समाज के आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्तियों की रहने की व्यवस्था थी; जबकि निर्धन और विपन्न लोग भू-तल पर रहने का आनंद ले सकते थे. काम की अनिवार्यता सभी के लिए थी. कार्यों का वितरण सदस्यों की योग्यता, अनुभव तथा उनकी रुचि के अनुसार किया जाता था. धन का निर्धारण किसी एक व्यक्ति के कार्य के आधार पर होता था. अधिक और अच्छे काम के लिए प्रोत्साहन-निधि की भी व्यवस्था थी. मगर अधिक काम करने पर अतिरिक्त आमदनी का कोई प्रावधान नहीं था.

फ्यूरियर की गणित और मनोविज्ञान में विशेष रुचि थी. आंकड़ों के खेल में उसको मजा आता था. उसकी कई स्थापनाएं आकंड़ों की बाजीगरी का मजा देती हैं. जैसे कि उसको विश्वास था कि कुल मिलाकर बारह प्रकार की सामान्य ऐषणाएं संभव हैं; जिनसे 810 विभिन्न प्रकार के व्यक्तित्व विकसित हो सकते हैं. अब यदि एक जैसे मनोविज्ञान के स्त्री और पुरुष की जोडे़ के रूप में संकल्पना की जाए तो एक फेलेंस्टीयर रहने वाले कुल स्त्री-पुरुषों की आदर्श संख्या 1620 होगी. फ्यूरियर के अनुसार यहां पर ‘इच्छाओं के प्रति लगाव’ का नियम लागू होता है. इच्छाओं के प्रति लगाव का नियम (The Law of Passional Attractions) फ्यूरियर की मौलिक अवधारणा थी.

फ्यूरियर की इस संकल्पना के बारे में स्टीवन क्रिस का कहना है—

‘न्यूटन ने जो कार्य भौतिक विज्ञान के लिए किया, फ्यूरियर ने वही मानव समाज के लिए किया. कहीं न कहीं, फ्यूरियर को यह भी विश्वास था कि उसकी यह खोज न्यूटन की खोज से अधिक महत्त्वपूर्ण है.’

फ्यूरियर मानवीय स्वतंत्रता एवं अधिकारिता का समर्थक था. उसने मानवाधिकारों को उसने सात कोटियों में वर्गीकृत किया है, उनमें प्राकृतिक रूप से उपलब्ध वस्तुओं का संचयन करना, मछली का शिकार, चरागाह बनाना, आंतरिक संगठन बनाना, शिकार करना, देखभाल करने की आजादी, खोजबीन करने की आजादी तथा सम्मिलित हैं. फ्यूरियर द्वारा निर्धारित मानवाधिकारों को लेकर आज कुछ मतभेद हो सकते हैं. यथा शिकार करने की आजादी को ही लें. वर्तमान में मनुष्य एवं प्रकृति पारस्परिक निर्भरता को देखते हुए वन्यजीव संरक्षण का कानून पूरी दुनिया में लागू है, जिसके अंतर्गत पशु-पक्षियों की विशेष प्रजातियों के संरक्षण की व्यवस्था की जाती है. इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में शिकार करने की आजादी को बहुत प्रशंसनीय नहीं माना जा सकता. लेकिन हमें ध्यान रखना होगा कि फ्यूरियर द्वारा स्थापित ये मानवाधिकार लगभग दो शताब्दी पुराने हैं. इस बीच परिस्थितियां काफी बदली हैं. फ्यूरियर का मानना था कि सहजीवन पर आधारित बस्तियों द्वारा वर्तमान समाज के दुर्गुणों पर नियंत्रण पाना संभव है. उसके अनुसार—

‘सहकारिता के आधर पर बसाई गई बस्तियों के जो चामत्कारिक परिणाम सामने आ सकते हैं उनमें:

1. तीन गुना अधिक औद्योगिक उत्पादन.

2. उद्योगों के प्रति आकर्षण तथा

3. मानवीय आवेगों में सुसामन्जस्य आदि सम्मलित हैं.

इस प्रकार कुछ ही वर्षों में पूरी दुनिया सहजीवन पर आधरित बस्तियों में व्यवस्थित हो जाएगी. वह मानवीय प्रेम, भाईचारा और आपसी सौहार्द जैसे सकारात्मक मूल्यों द्वारा संचालित होगी तथा दमन, नाकारापन और धोखादड़ी, हत्या, मारकाट आदि अवगुणों को अपदस्थ कर देगी, जो वर्तमान समाज में औद्योगिक प्रतिस्पर्धा एवं घोर व्यक्तिवादिता के कारण पैदा हुए हैं.’

फ्यूरियर का मानना था कि मनुष्य के सर्वांगीण विकास के लिए स्वतंत्रता परमावश्यक स्थिति है. किंतु उसका मानना था कि—

‘वास्तविक स्वतंत्रता वही है, जिसका आनंद उठाया जा सके. ऐसी स्वतंत्रता, जिसे मनुष्य जी नहीं सकता, कोरा भ्रम और अवास्तविकता है. स्वाधीनता की रक्षा के लिए कुछ सामाजिक मर्यादाओं का निर्वाह अत्यावश्यक है. फ्यूरियर के अनुसार ये मर्यादाएं निम्नलिखित हैं—

1. कारगर औद्योगिक तंत्र की खोज एवं उसका संचालन.

2. प्रत्येक व्यक्ति के मूल अधिकारों की सुनिश्चितता.

3. धनवान एवं निर्धन व्यक्ति के अधिकारों के बीच सामंजस्य स्थापित करना, ताकि जनसामान्य को भी वे सभी न्यूनतम सुविधाएं प्राप्त हो सकें, जिससे वह जीवन-समाज प्रदत्त सभी सुखों का भोग कर सके.’

फ्यूरियर ने मानव व्यवहार की मनोविज्ञान के आधार पर व्याख्या करने का प्रयास किया है. उसके द्वारा कल्पित बारह मूल ऐषणाओं में पांच प्रमुख मानवीय ऐंद्रिक अनुभूतियां हैं: जिनमें स्पर्श करना, देखना, चखना, सुनना और सूंघना सम्मिलित हैं. चार आत्मिक अनुभूतियां—महत्त्वाकांक्षाएं, मैत्री, प्यार एवं पैत्रिकता की भावना हैं. फ्यूरियर के अनुसार शेष तीन ऐषणाएं विभाजक किस्म की हैं. इनमें से पहली नौ का परिचय देने की आवश्यकता नहीं है. विभाजक कोटि की ऐषणाओं में पहली ला॓ पेपीला॓न(la Papillone) है; जिसका संबंध विविधताओं के प्रति लगाव से है. फ्यूरियर ने इसके माध्यम से सहज मानवीय प्रवृत्तियों की ओर संकेत किया था कि कोई भी व्यक्ति एकरसता को लंबे समय तक सहन नहीं कर पाता. कारीगर एक ही प्रकार के कार्य से बहुत जल्दी ऊबने लगता है. एक ही तरह का भोजन कुछ दिनों के बाद अरुचिकर लगने लगता है. ठीक ऐसे ही जैसे कि दो प्रेमी कालांतर में अपना आकर्षण खोने लगते हैं, और उनका प्रेम उबाऊ बन जाता है.

आलोचकों की परवाह किए बिना फ्यूरियर ने चर्च की यह कहकर आलोचना की थी कि वह धर्म की आड़ में लोगों के मन में कुंठा, हताशा और अविश्वास को बढ़ावा देता है. मनुष्य अपने कार्य में बदलाव अथवा काम-संबंधों की एकसरता से उबरने के लिए जब भी कोई प्रयास करता है, तो धार्मिक दबावों के कारण उसके मन में एक कुंठा एवं ग्लानिभाव पैदा होने लगता है, जो उसके नैसर्गिक विकास में बाधक होता है. उसने एडम स्मिथ की मान्यता कि समाज में विशेषज्ञ कारीगरों की बहुलता होनी चाहिए, का भी विरोध किया था. उसका मानना था कि इससे समाज में तनाव और कुंठा का विकास होगा. कारीगर को काम के दौरान आनंद की अनुभूति न होने के कारण उसकी उत्पादकता में कमी आएगी, साथ ही नई खोजों को भी नुकसान पहुंचेगा. स्टीवन क्रिस के अनुसार—

‘फ्यूरियर ने अतिरेकपूर्ण औद्योगिकीकरण की निंदा की थी. जेम्स मिल एवं एडम स्मिथ द्वारा समर्थित लेसे फेसर (मनचाहा करने की अनुमति) नामक अर्थव्यवस्था में उदारवाद के समर्थक सिद्धांत भी वह विरोधी था. फ्यूरियर ने उदारवाद और लेसे फेयर का प्रतिवाद उनके द्वारा मानव समाज पर पड़ने वाले प्रभावों के कारण नहीं किया था. अपितु इसलिए कि उसको विश्वास था कि औद्योगिक समाज लंबे समय तक टिकने वाला नहीं है. शायद इसी कारण उसने औद्योगिकीकरण के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए कोई सुझाव तक नहीं दिया. बल्कि बड़ी आसानी से वह इनकी उपेक्षा करता हुआ आगे बढ़ता गया.’

फ्यूरियर ने दूसरी ऐषणा के रूप में ‘ला॓ केबा॓लिसट्’(la cabaliste) यानी स्पर्धा, संगठन और कूटनीति के माध्यम से अपने लक्ष्य को किसी भी भांति प्राप्त कर लेने की कामना को रखा है. उसके अनुसार यह आदिम लालसा का ही रूप है. प्रारंभिक समाजों में संगठन और स्पर्धा कदाचित हानिकारक रूप भी ग्रहण कर लेती थी. लेकिन आधुनिक समाजों में संगठन एवं स्पर्धा विकास के लिए आवश्यक बन चुकी है. एक अच्छा उत्पादक समूह अपने उत्पाद को प्रतिस्पर्धी समूह के उत्पादों की अपेक्षा अधिक उपयोगी, सस्ता एवं सुंदर बना सकता है. शीतल पेय बनाने वाला समूह अपने उत्पाद को प्रतिस्पर्धी उत्पादक की तुलना में अधिक स्वादिष्ट, स्वास्थ्यवर्धक और आकर्षक बनाकर ग्राहकों के मन में अपनी पैठ बना सकता है. ला॓ केबा॓लिस्ट की अवधारणा किसी आधुनिक उद्यम के लिए जितनी आवश्यक है, उतनी ही यह सहकारिता के लिए भी उपयोगी है. विवेक तथा उपयुक्त लक्ष्य के अभाव में स्पर्धा षड्यंत्र का रूप ग्रहण कर सकती है, जबकि स्वस्थ स्पर्धा की भावना से मनुष्य की बहस करने की नैसर्गिक प्रवृत्ति तो संतुष्ट होती ही है, उसका विकास के क्षेत्र में भी उपयोग हो सकता है. ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग ही ला॓ केबा॓लिस्ट की अवधारणा का मूलमंत्र है.

अंत में तीसरी प्रमुख ऐषणा ला॓ कंपोसिट(la composite) है. फ्यूरियर ने इसे बाकी तीनों ऐषणाओं में सर्वश्रेष्ठ माना है. ला कंपोसिट का अभिप्राय है— परस्पर मिलकर रहने, मिल-बांटकर खाने और अच्छे मामलों में सबकी साझेदारी से है. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा उसके हित सबके साथ रहने, साथ-साथ काम करने तथा सुख-दुःख में हिस्सेदारी करने से है. यही सामाजिकता का पर्याय, उसका मूल उद्देश्य भी है. उपर्युक्त तीनों ऐषणाओं से साफ है कि फ्यूरियर को मनोविज्ञान की जानकारी थी. मानव प्रवृत्तियों को विभिन्न वर्गों में बांटकर उसने उनकी उन विशेषताओं की ओर साफ संकेत किया था, जो सामाजिक विकास में सहायक सिद्ध हो सकती हैं. यही कारण है कि फ्रांस में फ्यूरियर के विचारों को पर्याप्त स्वीकृति मिली. आने वाले वर्षों में सहकार के विचार को आगे ले जाने में उसके विचार बहुत सहायक सिद्ध हुए.

फ्यूरियर के विचारों का आर्थिक महत्त्व तो असंद्धिग्ध है ही, उनका सामाजिक महत्त्व भी कम नहीं है. फ्यूरियर ने जोरदार ढंग से स्त्री-स्वातंत्रय का समर्थन किया था. यह उसकी विलक्षण मेधा का ही प्रमाण है कि उसने स्त्री-आधिकारिता का उन दिनों समर्थन किया था, जब भारत समेत किसी भी देश में स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता था. सामाजिक भेदभाव का शिकार होने के साथ उसको तरह-तरह के उत्पीड़न का सामना भी करना पड़ता था. फ्यूरियर को इसके लिए स्थानीय चर्च एवं धर्मसभाओं के भारी विरोध का सामना करना पड़ा था. हालांकि बाद में उसके धैर्य एवं विश्वसनीयता ने पूरा मामला उसके पक्ष की ओर मोड़ दिया. आगे चलकर स्त्री-स्वातंत्रय के बड़े-बड़े समर्थक फ्रांसिसी समाज में हुए और एक समता-आधारित आधुनिक समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ. स्त्री-स्वातंत्रय को लेकर फ्यूरियर के विचारों पर स्टीवन क्रिस लिखते हैं.

‘वह कामेच्छा पर किसी भी प्रकार के प्रतिबंध् के विरुद्ध था. बड़े ही साहसपूर्ण ढंग से उसने समाज में काम-संबंधें की स्वतंत्रता का पक्ष लिया, जो उस समय तक ईसाई मान्यताओं समेत किसी भी धर्म के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी. हालंकि पीड़ामय या बलात् काम-संबंधों पर प्रतिबंध का समर्थक था. वह स्त्री-आधिकारिता का भी समर्थक था, हालांकि उसने स्वीकार किया था कि उसके समाज में स्त्री पर अनेक बंधन हैं. वह मानता था कि किसी भी समाज के विकास का स्तर इस बात से आंका जा सकता है कि वह स्त्री के प्रति कितना उदार है तथा स्त्री उसमें स्वयं को कितना मुक्त अनुभव करती है.’

स्त्री-स्वातंत्र्य का पक्षधर होने के कारण यह मान लेना कि फ्यूरियर स्त्री-पुरुष समानता का भी समर्थक था, गलत होगा. उसने कभी स्त्री-पुरुष समानता का पक्ष नहीं लिया. बल्कि उसका मानना था कि स्त्री और पुरुष के बीच नैसर्गिक अंतर होने के कारण वे दोनों कभी समान नहीं हो सकते. तब उसके द्वारा प्रस्तावित फेलेंस्टियरर्स में पारिवारिक संबंध कैसे हों? सर्वकल्याण की अवधारणा पर बने उन आश्रमों में भी क्या स्त्री कल्याण से वंचित रहेगी. लैंगिक आधार पर स्त्री-पुरुष में अंतर बताने वाले फ्यूरियर के बारे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है. फेलेंस्टियरर्स के जनजीवन का उल्लेख करते समय वह एक बार फिर अपनी ही मान्यताऒं का खंडन करता हुआ नजर आता है. फेलेंस्टियरर्स के जनजीवन के बारे में—

‘उस(फ्यूरियर)ने पुरुषसत्तात्मकता का निषेध किया है. उसका मानना था कि यूरोपीय परिवारों की वर्तमान संरचना भी स्त्री की दासता के लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार है. इसी के कारण मनुष्य का झुकाव अधोमुखी यानी परिवार, पति-पत्नी तथा बच्चों की ओर बना रहता है, न कि उर्ध्वमुखी यानी समाज की ओर. इसलिए फ्यूरियर ने अपने आश्रमों के लिए ऐसी पारिवारिक संरचना की परिकल्पना की थी, जो यूरोपीय सभ्यता के लिए एकदम अलग-अनजानी होगी.’

फ्यूरियर न केवल अच्छा लेखक था बल्कि अच्छा आलोचक भी था. राबर्ट ओवेन की तरह वह भी एक संवेदनशील और आदर्शवादी विचारक था. समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता, शिक्षा एवं सम्मान में भारी अंतर देखकर उसको गहरा क्षोभ होता था. उसने विषमता से परे एक ऐसे समरस समाज की संकल्पना की थी, जहां सभी मिल-जुलकर रह सकें, जहां सभी को विकास के एक समान अवसर उपलब्ध हों तथा जिसमें अभिव्यक्ति की आजादी के साथ-साथ, सदस्य इकाइयों की राय का पूरा सम्मान होता हो. उसने ऐसे कल्याण-आश्रमों(Phalanstere) की स्थापना का आग्रह किया था, जिसमें लगभग 1500 व्यक्ति सामूहिक रूप से साथ रह सकें.

फ्यूरियर चाहता था कि उसके आश्रमों में सामूहिक रसोईघर, भोजनालय, स्कूल, उद्योग, मनोरंजन-केंद्र आदि की व्यवस्था हो. लोग अपने सामूहिक हितों के अनुसार मिलजुलकर अपने विकास की प्राथमिकताएं तय करें तथा उनके अनुरूप आपस में मिल-बांटकर कर काम करें. कोई भी एक काम किसी व्यक्ति अथवा व्यक्ति-समूह के लिए निर्धारित न हो. सदस्यों की अधिकतम कार्यक्षमता और उत्पादकता को बनाए रखने के लिए उनके काम का बदलते रहना जरूरी है. किंतु कार्य का विभाजन सदस्यों की इच्छा के अनुसार किया जाए, ताकि असहयोग एवं असंतोष की संभावना को न्यूनतम स्तर पर रखकर उत्पादकता के उच्चतम स्तर को प्राप्त किया जा सके. न्यायिक कार्यविभाजन के लिए वह कार्यों का वर्गीकरण करने के पक्ष में था.

फ्यूरियर स्वयं भी फल, सब्जियों, विशेषकर सलाद का शौकीन था, इसलिए वह चाहता था कि फेलेंस्टियर्स की स्थापना नदी के किनारे, उपजाऊ जमीन पर हो. वह अनाज के बजाय फल, सब्जी, मधुमक्खी, मुर्गीपालन आदि के उत्पादन के पक्ष में था. इसलिए कि इन फसलों से जहां कम समय में अधिक नकद आमदनी संभव थी, वहीं अनाज उत्पादन की अपेक्षा समय की बचत और लागत भी कम आती थी. प्रत्येक फेलेंस्टियर का आत्मनिर्भर और स्वावलंबी होना भी एक शर्त थी, जिसके लिए वह चाहता था कि कम से कम चार सौ एकड़ उपजाऊ भूमि उसके पास हो.

फ्यूरियर का मानना था कि सर्वकल्याणकारी आश्रमों (फेलेंस्टियर्स) का संगठन संयुक्त स्कंध के आधार पर होना चाहिए. प्रबंधकों का चयन उसके सदस्यों के बीच से आम चुनाव के आधार पर किया जाए. सदस्यों को उसका अंशधारक होना अत्यावश्यक है. उपनिवेश का प्रबंध निदेशक-मंडल द्वारा किया जाए, जिसके सदस्य यूनार्क(Unarch) कहलांएगे. फ्यूरियर सही मायने में एक दूरदृष्टा विचारक था. उसका सपना पूरे समाज को उसी प्रकार के सर्वकल्याणकारी आश्रमों में बांट देने का था. उसका सपना था कि एक दिन पूरा संसार इसी तरह के फैलेंस्टियर्स में बंट जाएगा. उस दिन पूरा संसार एक संघीय राज्य होगा, जिसकी राजधानी का॓स्टेंटीनापा॓ल(Constantinopol) में होगी और उसके राज्याध्यक्ष का पदनाम ओमीनार्क(Omniarch) होगा. फ्यूरियर को विश्वास था कि इस तरह की व्यवस्था से सामाजिक अलगाव घटेगा, लोग एक-दूसरे के करीब आएंगे, उनके संकटों में कमी आएगी, तब पूरा समाज एक पारिवारिक समूह में बदल जाएगा. कार्यों के बीच अंतरपरिवर्तनीयता होने से सदस्यों के बीच ऊंच-नीच की भावना भी नहीं रहेगी, न किसी कार्य को हीन समझा जाएगा. प्रकारांतर में इससे विभिन्न कार्यों के लिए मजदूरी में असमान अंतर को भी पाटा जा सकेगा. इस प्रकार समाज में मनुष्य एक-दूसरे के निकट आएंगे और घृणा तथा द्वेष के स्थान पर सहयोग का भाव पैदा होगा. सामूहिक भोजन निश्चय ही परिवार के भोजन की अपेक्षा सुखद होगा.

मिल की भांति फ्यूरियर भी मानता था कि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से सुखाकांक्षी होता है. उसकी प्रवृत्ति को एकाएक बदल पाना संभव नहीं है, अतएव यह आवश्यक है कि समाज का गठन ऐसा हो, जहां मनुष्य के लिए अधिकतम सुखों की प्राप्ति हो सके. इसके लिए सभी अपेक्षित साधन आसानी से प्राप्त हो सकें, ताकि मनुष्य की शक्तियों का अपव्यय न हो तथा वह अपनी कार्यक्षमता का उपयोग अपने और समाज के निर्माण के लिए कर सके. फ्यूरियर की विचारधारा भारतीय आश्रम परंपरा से काफी मेल खाती है. वह प्रस्तावित आश्रमों में फौज, अंगरक्षक, पुलिस, वकील आदि रखने का विरोधी था और उन्हें अपनी आदर्श समाज-व्यवस्था के लिए अनावश्यक मानता था.

फ्यूरियर बड़े नगरों की समाप्ति के पक्ष में था. वह आडंबरविहीन ग्रामीण जीवन को महत्त्व देता था. कृषि को वह रोजगार का महत्त्वपूर्ण साधन मानता था. हालांकि वह इतना अवश्य चाहता था कि किसान अपनी आयवृद्धि के लिए उन फसलों को उगाने के लिए प्राथमिकता दें, जिनसे उन्हें अधिकतम आय हो सके. यहां उल्लेखनीय है कि फ्यूरियर की गांव संबंधी अवधारणा भी परस्पर-आश्रित आत्मनिर्भर समूहों, जिन्हें वह फेलेंस्टियरर्स कहता था, का पर्याय थी. पूर्ण आत्मनिर्भर, आडंबरविहीन ग्राम्याधारित/आश्रमाधारित जीवन को प्रमुखता देते हुए उसने ‘भूमि की ओर चलो’(Back to Land) का नारा भी दिया था. वह चाहता था कि समाज से मजदूरी की प्रथा समाप्त हो जाए, उसने लिखा भी थ—

‘अर्थशास्त्रियों की प्रथम समस्या यह होनी चाहिए कि वे मजदूरी पर काम करने वाले मनुष्य को सहकारी मालिक में बदलने का तरीका खोजें.’

ओवेन और प्रूधों से भिन्न मत रखते हुए फ्यूरियर ने व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार का समर्थन किया है. लेकिन वह अधिकार आंशिक ही है. सहकारिता के द्वारा उसकी रचना में बदलाव लाना चाहता थे. उसका मानना था कि—

‘व्यक्तिगत संपत्ति सभ्य समाज की आज भी सबसे महान उत्प्रेरक शक्ति है.’

फ्यूरियर का आर्थिक दर्शन पूर्णतः व्यावहारिकता पर आधारित था. वह श्रम की महत्ता को समझता था, किंतु चाहता था कि श्रम की उपस्थिति अनुकूल परिस्थितियों और वातावरण में हो, जिससे कि श्रमिक अपने कार्य के प्रति समर्पित रह सके. उसका मानना था कि पूंजीवादी समाज में श्रम की स्थितियां बोझिल और उबाऊ होती हैं, इसलिए कि वहां पर केवल उत्पादन पर जोर दिया जाता है. श्रमिक को महज एक प्राणी माना जाता है, जो पेट भरने और तन ढकने खातिर अपना श्रम बेचता है, जिसका अपने श्रम पर अधिकार भी सीमित है. इसलिए कि श्रम का मूल्य तय करने संबंधी समस्त अधिकार पूंजीपतियों ने अपने पास रख छोड़े हैं. पूंजीवादी व्यवस्था में श्रमिकों के वास्तविक कल्याण को नकार कर ऐसे कानून बनाए जाते हैं, जो अंततः पूंजीवाद को ही पोषित करते हैं. परिणामतः श्रमिकों को अक्सर शोषण का सामना करना ही पड़ता है.

श्रम को रुचिकर बनाने के लिए फूरियर ने कुछ सुझाव भी दिए, जैसे कि कार्य कर्ता की रुचि के अनुकूल होना चाहिए, किसी भी कर्मचारी से एक-जैसा कार्य लगातार न कराया जाए, कार्य के बदले उचित समय पर वाजिब मजदूरी की व्यवस्था हो, अच्छे कार्य का चयन स्वेच्छा से हो, सहकारी प्रयासों से हो. अच्छे कार्यों से उसका मंतव्य था कि उससे समाज के अधिकतम लोगों को लाभ पहुंचता हो. सहकारी श्रम की महत्ता दर्शाते हुए उसने कहा थाµस्वधीनता की रक्षा के लिए समाज की निर्देशक ताकतों की रक्षा आवश्यक है.

फ्यूरियर ने मुक्त समाज की संकल्पना की थी. वह एक ऐसे समाज के निर्माण का सपना देखता था, जिसके नागरिक निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हों. किंतु उसका मानना था कि स्वाधीनता की रक्षा के लिए सामाजिक नियमों का अनुपालन भी जरूरी है, जिसके अनुसारः

1. विकास के लिए संगठन पर आधारित औद्योगिक प्रणाली की पहचान करना.

2. नैसर्गिक अधिकारों के समान, मनुष्यमात्र के सभी अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी.

3. समाज के अधिकतम लोगों के हितों को किसी भी प्रकार का नुकसान पहुंचाए बिना, धनी और निर्धन आदमियों के हितों के बीच समुचित तालमेल करना. बशर्ते गरीब लोगों को जीवनयापन के लिए न्यूनतम सुख-सुविधाएं आसानी से उपलब्ध कराई जाती हों.

फ्यूरियर ने मनुष्य के नैसर्गिक अधिकारों को सात वर्गों में बांटा है, जिनमें प्रकृति प्रदत्त उत्पादों को जमा करने का अधिकार, चरागाह जहां पर वह वह अपने पालतू पशुओं का चरा सके, मछलीपालन, शिकार करने का अधिकार, आंतरिक मेलजोल कायम करने तथा संगठन बनाने की स्वतंत्रता, राजनीतिक आजादी एवं लुटने और लूटे जाने से मुक्ति. फ्यूरियर ने जिन प्राकृतिक अधिकारों पर जोर दिया है, उन्हें लेकर मतभेद हो सकते हैं, मगर यह ध्यान रखना होगा कि उनीसवीं शताब्दी के मध्य में जनसामान्य का जीवन प्रकृति के सहारे था. समाज का बड़ा वर्ग उन दिनों भी कृषि तथा उससे जुड़े उद्यमों से जीवन निर्वाह करता था. फ्यूरियर ऐसे संवेदनशील समाज का सपना देखता था, जिसके सदस्य आपस में आत्मा की गहराई तक जुडे़ हों. श्रम और सहकार की महत्ता पर जोर देते हुए उसने एक जगह लिखा है—

‘क्या आप अपने कार्य के दौरान श्रम का आनंद लेना चाहते हैं, इसके लिए आपको अधिक कुछ नहीं करना पड़ेगा, केवल अपने श्रम की दिशा बदलने की जरूरत है. अभी तक आप दूसरों के लिए कार्य करते रहे थे, अब आप एक-दूसरे के लिए कार्य करके देखिए.’

फ्यूरियर उन शुद्धतावादियों का कट्टर विरोधी था, जो मानवीय इच्छाओं के दमन की बात करते रहते हैं. ‘इच्छाओं का सत्कार’ सुखवादियों के साथ-साथ पूंजीवादी मान्यता भी रही है. उसका यह दर्शन पूंजीवाद से पे्ररित था, मगर वह मानव-मूल्यों में भी आस्था रखता था और मानता था कि सामूहिक जीवन से पूंजीवाद की कुरीतियों को दूर किया जा सकता है. ओवेन की भांति फ्यूरियर के साथ भी बिडंबना यह रही कि लगातार समर्पित और प्रयोगरत रहने के बावजूद वह भी स्थायी सफलता से दूर रहा, लोग उसका सनकी कहकर मजाक उड़ाते रहे. गणित के प्रति आस्था और संभवतः नए सिद्धांत गढ़ने के प्रति अतिरिक्त मोह में कई जगह फ्यूरियर ने अपने आलोचकों को अपनी सनक का परिचय भी दिया है. जैसे कि उसका यह आकलन

1. कि पृथ्वी की कक्षा में छह चंद्रमाओं की उपस्थिति.

2. कि एक दिन समुद्रों अपना समस्त खारापन खोकर मीठे पानी के स्रोत बन जाएंगे.

3. कि एक अनुमान के अनुसार होमर अकेला 370 लाख कवियों के बराबर है. 370 गणितज्ञ न्यूटन के तथा दुनिया-भर के 370 लाख नाटककार मोलियर के तुल्य हैं.

4. कि प्रत्येक स्त्री के कम से कम चार प्रेमी होते हैं. पुरुषों के बारे में भी यही हकीकत है.

इन कुछ अनर्गल अवधारणाओं/दुर्बलताओं के बावजूद फ्यूरियर की विद्वता तथा मानवकल्याण के प्रति उसकी आस्था से इंकार नहीं किया जा सकता. सही मायने में उसके विचार अपने समय से वर्षों आगे थे. किंचित वैचारिक अस्थिरता के बावजूद यह साफ है कि वह ज्ञान के नाम पर रूढ़िवादिता से कोसों दूर था. एक प्रसिद्ध द्रष्टांत के माध्यम से फ्यूरियर ने विज्ञान के प्रति अपने आकर्षण का खुलासा किया है. उसके अनुसार—

‘इतिहास का मार्गदर्शन चार सेब करते रहे हैं, जिनमें से दो अपवित्र थे—पहला आदम तथा दूसरी ट्राय की नायिका हेलन. बाकी दो पवित्र हैं, जिनके नाम हैं—न्यूटन और…..!’

फ्यूरियर चौथे सेब का जानबूझकर उल्लेख नहीं करता. उसका फैसला अपने पाठकों पर छोड़ देता है. उसका इशारा अपनी ही तरफ है. कई जगह वह आत्ममोह से भी ग्रस्त नजर आता है. एक स्थान पर उसने स्वयं को ‘तर्क का मसीहा’(Messiah of Reason) घोषित किया है. एक अन्य स्थान पर वह अपनी तुलना न्यूटन से करता है. उसके अनुसार न्यूटन ने सार्वलौकिक आकर्षण(गुरुत्वाकर्षण) बल की खोज की थी और उसने अतितीव्र भावनात्मक आकर्षण(Passional attraction) की. इसे हम उसका पागलपन भी कह सकते हैं. मगर फ्यूरियर के विचारों कई जगह चैंका देने वाली मौलिकता है. रूसो की भांति वह भी बर्जुआ समाज की आलोचना करता है, जो उसके अनुसार असंतुलित विकास का जन्मदाता है. इसके स्थान पर उसने पूर्णतः शोषणमुक्त और समानता पर आधारित समाज की संकल्पना की है, जिसमें मनुष्य का चिंतन उर्ध्वमुखी हो और वह विकास के बहुआयामी लक्ष्य को प्राप्त कर सके.

हम देख सकते हैं कि एक लगभग अनपढ़ सेल्समेन बड़ी साफगोई, निडरता एवं आत्मविश्वास के साथ, धर्म और दर्शन के क्षेत्र में नए-नए विचारों से अपने समय के बड़े-बड़े विद्वानों को चमत्कृत करता चला जाता है. जिसके विचारों में अनगढ़पन की झलक है, बीच-बीच में उसकी सनकें भी हैं, जो अजीबोंगरीब मान्यताओं के रूप में प्रकट होती रहती हैं, जिनके कारण वह उपहास का पात्र भी बनता है. मगर इस सबके बावजूद उसके विचारों में गजब की मौलिकता भी है. बल्कि उनमें मौजूद नएपन के सापेक्ष असंगतियां नगण्य-सी हैं. यही कारण है कि आनेवाले वर्षों में फ्यूरियर का प्रभाव पूरे समाज पर पड़ा. तथापि किंचित वैचारिक अस्थिरता के कारण वह सीमित अवधि तक ही कायम रह सका.

फ्यूरियर के विचारों की व्यापकता तथा उनके द्वारा पड़ने वाले प्रभाव का अनुमान केवल इसी से लगाया जा सकता है कि 1855 में उसकी मृत्यु के मात्र अठारह वर्ष पश्चात फ्रांस, बेल्जियम तथा स्वीडन के फ्यूरियरवादियों ने अमेरिका के टेक्सास इलाके में एक साथ कई, सहकार पर आधारित बस्तियों की स्थापना के लिए कार्य किया और अप्रत्याशित सफलता भी प्राप्त की थी. उन दिनों अमेरिका का विस्तृत भूखंड अनेक परिवर्तनवादियों, नवजागरण के समर्थकों, उत्साही समाजसेवियों को आमंत्रित कर रहा था. 1855 के आसपास फ्यूरियर के विचारों से प्रभावित होकर लगभग दो सौ कालोनाइजर सहकार-बस्तियों की स्थापना के लिए टेक्सास पहुंचे थे. वर्तमान हचसन के पास उनका जहाज किनारे लगा. वहां से उतरकर वे उपयुक्त स्थल की तलाश में आगे बढ़े. इस बीच लगभग ढाई सौ किलोमीटर की यात्रा उन्होंने बैलगाड़ियों पर तय की.

अमेरिका के विभिन्न क्षेत्रों में फ्यूरियर के सिद्धांतों के आधार पर उन्होंने लगभग चालीस सहकार बस्तियों स्थापना की थी. उनमें से एक कालोनी वर्तमान डलास(Dallas) के निकट ला॓ रयूनिआ॓न(La Réunion) थी, जिसमें लगभग साढ़े तीन सौ परिवार आकर बसे थे. अपनी एकता तथा स्थानीय निवासियों से स्वयं को अलग दिखाने के लिए वे अलग भाषा प्रयोग करते. उनका प्रशासनिक ढांचा भी अलग था. महिलाएं वहां मतदान में हिस्सा ले सकती थीं. सह-उद्यम उन बस्तियों की अर्थव्यवस्था के आधार थे, जिनसे होने वाले लाभ को सदस्यों में बांट दिया जाता था. साम्यवाद के सिद्धांतों पर आधारित उन बस्तियों की विशेषता यह थी कि उनमें व्यक्तिगत संपत्ति का अधिकार भी दिया गया था. लेकिन बदलती वैश्विक परिस्थितियों तथा कार्यकर्ताओं में दूरदर्शिता के अभाव के कारण सहकारिता के वे प्रयोग अपेक्षित सफलता प्राप्त कर पाने में असमर्थ रहे.

टेक्सास का विपरीत मौसम, खाद्यान्न की कम उपलब्धता जैसे कुछ कारण ऐसे रहे जिससे सहकारिता का वह प्रारंभिक प्रयोग लंबा न खिंच सका. लेकिन उन बस्तियों की आंतरिक व्यवस्था दर्शाती थी, नया समाज गढ़ने के अपने प्रारंभिक संकल्प में उन्हें सफलता प्राप्त हुई थी. इन सभी कारणों से सहकारिता और समाजवाद के प्रारंभिक सिद्धांतकारों में फ्यूरियर का योगदान सदैव उल्लेखनीय बना रहेगा. इस संबंध में जी. डी. एच. कोल के विचार भी द्रष्टव्य हैं…

‘समाजवाद अधिक संपन्न विचारों की व्याख्या होता यदि फ्यूरियर के विचारों पर अधिक ध्यान दिया गया होता.’

फ्यूरियर की मौलिक प्रतिभा, चीजों को परखने की उसकी अनूठी शैली ने ही उसको फ्रांसिसी नवजागरण का पुरोधा बनने में मदद की थी. उसके विचारों के आधार पर समाजवादी आंदोलन और सहकार को नई जमीन प्राप्त हुई. यह मामला विशेष छानबीन की मांग करता है कि मात्र डेढ़ शताब्दी पहले यूरोपीय अर्थव्यवस्था की अस्थि-मज्जा बनने वाले सहकारी तंत्र के अचानक कमजोर पड़ने के कारण क्या रहे. वही अमेरिका जो सहकार के शुरुआती दौर के सफलतम प्रयोगों का गढ़ रहा है, कालांतर में पूंजीवाद की झोली में कैसे जा गिरा. तब संभव है कि हमें फ्यूरियर के विचारों की प्रासंगिकता कुछ और अधिक नजर आने लगे.

© ओमप्रकाश कश्यप

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1 टिप्पणी

Filed under चार्ल्स फ्यूरियर : समाजवादी चिंतन का पुरोधा

One response to “चार्ल्स फ्यूरियर : समाजवादी चिंतन का पुरोधा

  1. RAJ SINH

    कश्यप जी ,
    बहुत ही सुन्दर जानकारी और विश्लेषण भी .
    बहुत धन्यवाद .

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