संत था॓मस मूर : पहला यूटोपियन

[हर संवेदनशील प्राणी अपने भीतर एक कल्पनालोक लिए चलता है, जिसमें वह एक ऐसे देश की कल्पना करता है जहां लोग उसकी भावनाओं को समझें, उनका सम्मान करें. जहां सब बराबर हों, जहां जाति, जाति, क्षेत्र, लिंग आदि के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव न होता हो. नागरिक स्वतंत्रतापूर्वक कहीं भी आ-जा सकते हों. ऐसा आदर्श कल्पनालोक, रूमानी संसार महज एक ‘यूटोपिया’ है, जो सिवाय सपनों के पूरी दुनिया कहीं भी नहीं है. था॓मस मूर ने सबसे पहले उसको पहचान दी थी. जीवन के अंतिम कुछ वर्षों को छोड़ दिया जाए तो सत्ता के करीब, ऊंचे पदों पर रहने वाले मूर का पूरा जीवन शाही सुख-सुविधाओं के बीच शानो-शौकत के साथ बिताया था. सत्ता से नजदीकी का सुख भोगते उसने राजसत्ता के विरोधियों का मजाक उड़ाते हुए एक प्रहसन रचा था—‘यूटोपिया’ यानी कल्पनालोक. उस समय कौन जानता था कि अपनी राजभक्ति के कारण ‘यूटोपिया’ नाम से जो प्रहसन वह रच रहा है, वही उसकी वैश्विक ख्याति का कारण बनेगा. और उसकी जीवन-भर की सेवा, भक्ति-निष्ठा को भुलाकर राजसत्ता, बिना उसकी उम्र का खयाल किए, उसको राष्ट्रदोह के मुकदमे में फंसाकर मृत्युदंड का शिकार बना देगी. जो भी हो, अपनी पुस्तक को मूर ने जो नाम दिया, जो सपना उसने दिखाया, वही आगे चलकर परिवर्तनवादियों का गुरुमंत्र बन गया.
आखरमाला के गत दो अंकों में हमने मार्टिन लूथर किंग तथा जा॓न का॓ल्विन के बारे में लिख चुके हैं, इस बार पढ़िये आदि यूटोपियन था॓मस मूर के बारे में— ओमप्रकाश कश्यप.]

संत था॓मस मूर (7 फरवरी, 1478—06 जुलाई, 1535) की प्रसिद्धि मूलतः एक पुस्तक के कारण है, जिसमें उसने एक ऐसे राज्य की कल्पना की थी, जहां न कोई राजा होगा, ना ही प्रजा, न कोई छोटा होगा, न ही बड़ा. जहां धर्म अथवा क्षेत्रीयता के आधार पर कोई भेद नहीं होगा। जीवन में समरसता होगी और धार्मिक हस्तक्षेप नगण्य। कुल मिलाकर वह एक ऐसे समतावादी समाज की कल्पना थी, जिसमें सभी एकसमान होंगे। सुख-दुःख के समान साझीदार, जिसमें सभी साथ-साथ आगे बढ़ सकें। वह खुली आंखों का मनभावन सपना था, जिसे कोई भला और संवेदनशील इंसान, हर वह इंसान जो मानवीय अस्मिता को धन-दौलत तथा जमीन-जायदाद से कहीं ऊपर मानता हो, जिसके दिल में सभी के प्रति प्यार और सम्मान की भावना हो, देखता है—देखना चाहता है। था॓मस मूर ने ऐसा सपना न केवन स्वयं देखा, बल्कि अपनी पुस्तक ‘यूटोपिया’ के माध्यम से बाकी दुनिया के सामने भी रखा, जिसके आधार पर उस जैसे अनेक स्वप्नदृष्टा दार्शनिकों को, उन विद्वानों को जो दुनिया को बेहतर रूप में देखना चाहते थे, भविष्य निर्माण के लिए एक रास्ता मिला। यूटोपिया का महत्त्व तब और भी बढ़ जाता है, जब हम यह जानते हैं कि उसका लेखन पंद्रहवी शताब्दी में हुआ जब समाज धार्मिक और सामाजिक रूढ़ियों में बुरी तरह जकड़ा हुआ था। राजनीति साम्राज्यवादियों और छोटे सामंतों के अधीन थी, जो अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए मनमाना व्यवहार करते थे।
था॓मस मूर का जन्म 7 फरवरी, 1478 को हुआ था। उसके पिता सम्राट के दरबार में प्रसिद्ध वकील थे। मूर की प्रारंभिक शिक्षा लंदन में ही हुई। बचपन से ही वह अत्यंत मेधावी था। उसकी प्रतिभा को देखकर उसके एक शिक्षक ने भविष्यवाणी की थी कि एक दिन वह विलक्षण महापुरुष बनेगा। आगे चलकर मूर ने आ॓क्सफोर्ड विश्वविद्यालय में तर्कशास्त्र तथा लेटिन भाषा का गहन अध्ययन किया था। उसके पश्चात वह लंदन चला गया, जहां उसने पिता की इच्छा के अनुपालन में वकालत की पढ़ाई करते हुए, 1501 में बेरिस्टर की उपाधि प्राप्त की। आगे चलकर वह एक कुशल लेखक, राजनयिक तथा कैथोलिक में विश्वास करने वाला नागरिक बना। लगातार तरक्की करता हुआ वह लार्ड चांसलर के पद तक पहुंच गया। इनसे उसको सुख और समृद्धि दोनों प्राप्त हुए। मार्टिन लूथर और जा॓न का॓ल्विन जैसे विद्वानों का, जो चर्च की व्यवस्था में सुधार चाहते थे, उसने हमेशा विरोध किया। कैथोलिकों का समर्थन करते हुए मूर ने लिखा कि परंपरागत व्यवस्था में सुधार से इंग्लैंड में सामाजिक एवं नैतिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। उस समय तक मूर सम्राट के सर्वाधिक विश्वसनीय लोगों में से एक था. उस समय कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि आगे चलकर उसी मूर पर राष्ट्रदोह का मुकदमा चलाया जाएगा, जिसमें उसको फांसी की सजा दी जाएगी.
सन 1501 में ही मूर बैरिस्टर के पद पर नियुक्त हो गया था, किंतु अपने पिता की मर्जी के विरुद्ध मूर की इच्छा चर्च में पुजारी बनने की थी। चार वर्षों तक लंदन के चार्टर्ड भवन में प्रवास के पश्चात उसने विवाह करने का निश्चय किया। सन 1505 में मूर ने जा॓न काल्ट नामक महिला से विवाह कर लिया, जिससे उसके चार बच्चे भी हुए। जा॓न का॓ल्ट अच्छी महिला थीं। दोनों का दांपत्य जीवन छोटा, मगर सुखमय रहा। बीमारी के कारण का॓ल्ट उसका लंबा साथ न दे सकी। सन 1511 में उसका निधन हो गया। उसके कुछ ही समय पश्चात मूर ने एलीस मिडिलेंटन(Alice Middleton) नामक एक धनी विधवा से विवाह कर लिया। एलीस की एक बेटी थी, जिसे मूर ने प्यार और सम्मान के साथ अपने परिवार में सम्मिलित कर लिया। इससे भी बड़ी बात यह है कि उसने एलीस की बेटी को उच्च शिक्षा ऐसे समय में दिलवाई, जबकि लड़कियों को पढ़ाने की समाज में परंपरा ही नहीं थी।
मूर और एलीस की कोई संतान नहीं हुई। कुछ ही दिनों में मूर आत्मसुख के प्रति उदासीन होने लगा। उसमें वैराग्य के लक्षण उमड़ने लगे। यही नहीं स्वयं को उत्पीड़ित करना उसका रोज का काम हो गया। वह बालों से बुनी कमीज पहनता तथा नियमितरूप से स्वयं को कोड़ों से सजा देता। आत्मसुख से बचने के लिए उसने भोजन में भी कमी कर दी। अपनी बाकी जिंदगी मूर ने इसी प्रकार कष्टों में रहकर, स्वयं को प्रताड़ित करते हुए बिताई।
सन 1510 से 1518 के बीच लंदन के एक अवर न्यायाधीश के साथ काम करते हुए मूर ने काफी ख्याति अर्जित की थी। परिणामतः सन 1517 में उसको सम्राट के सलाहकार के रूप में कार्य करने के लिए आमंत्रित किया गया। मूर की प्रतिभा और लगन से प्रभावित होकर उसको रोमन सम्राट चार्ल्स पंचम के पास एक कूटनीतिक मिशन पर भेजा गया। मिशन की सफलता पर सम्राट हेनरी-अष्ठम ने उसको ‘सर’ की पदवी से विभूषित करते हुए शाही खजाने का दायित्व सौंप दिया। हेनरी अष्ठम के सलाहकार के रूप में कार्य करते हुए मूर, शासन पर अपनी पकड़ बना चुका था। सन 1523 में उसको ‘हाउस आ॓फ कामन’ का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। उससे दो वर्ष पश्चात ही मूर को उत्तरी इंग्लैंड का न्यायिक एवं प्रशासनिक दायित्व सौप दिया गया।
लगातार ऊंचे पदों पर रहते हुए मूर ने सम्राट के दरबार एवं समाज में खासी प्रतिष्ठा अर्जित कर ली थी। मगर उसकी प्रसिद्धि का मूल कारण बनी एक पुस्तक। लेटिन में लिखी गई इस पुस्तक के अंग्रेजी अनुवाद का नाम है— ‘आ॓न दि बेस्ट स्टेट आफ दि रिपब्लिक एंड आ॓न दि न्यू आइसलैंड आफ यूटोपिया।’ यह पुस्तक पूरी दुनिया में ‘यूटोपिया’ के नाम से ही जानी जाती है। पुस्तक की महत्ता एक नए शब्द यूटोपिया के कारण है। पुस्तक में फंतासी और किस्सागोई के माध्यम से एक ऐसे समाज की संकल्पना की गई है, जो आदर्श है। जहां ऊंच-नीच का भाव नहीं है और समाज में ऎक्य-भाव है। सब मिल-जुलकर बिना किसी द्वेषभाव के रहते हैं. जाहिर है कि ऐसा देश दुनिया में कहीं भी नहीं था.
ध्यातव्य है कि जिन दिनों इस पुस्तक की रचना की गई लगभग उन्हीं दिनों वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुए आविष्कारों से पूरी दुनिया की अर्थव्यस्था के आधुनिकीकरण की शुरुआत हुई थी। परिणामतः समाज में एक नया वर्ग तेजी से पनपा, वह था पूंजीपति वर्ग। अपने लाभ के लिए इस वर्ग ने उत्पादन व्यवस्था का मशीनीकरण कर एक ओर जहां मानवीय श्रम एवं कौशल पर अपनी निर्भरता कम की थी, वहीं मन में पैठे डर तथा अपराधबोध के कारण, निवेश पर अपने लाभानुपात को पहले कहीं अधिक बढ़ा दिया था। बढ़े लाभांश को वह ‘निवेश पर लाभ’ की संज्ञा देता था तथा उसको अपने लिए आवश्यक मानता था। सुरक्षित भविष्य के नाम पर अधिक से अधिक लाभ कमाने की लालसा भी जोर पकड़ चुकी थी।
एक ओर यह वर्ग था जो संसाधनों तथा पूंजी के दम पर नई तकनीक एवं वैज्ञानिक आविष्कारों का लाभ उठा रहा था। दूसरी ओर समाज का गरीब तथा विपन्न वर्ग था, जो लगातार बढ़ती महंगाई एवं बेरोजगारी का शिकार था और किसी भी प्रकार उससे मुक्त होना चाहता था। चूंकि परिस्थितियां उसके विरुद्ध थीं, इसलिए बदलाव अधिकांशतः उसके सपनों तथा कल्पना की उड़ान के हिस्से ही आता था। इन दोनों के बीच एक मध्यवर्ग का विकास धीरे-धीरे हो रहा था, जो इस विपन्न वर्ग से ही उठकर आया था, बल्कि कह सकते हैं कि आर्थिक परिवर्तनों का लाभ उठाकर वह इस स्थिति तक पहुंचा था। वह वर्ग किसी न किसी प्रकार से पूंजीपतियों का सहायक बना हुआ था। स्वाभाविक रूप से इस वर्ग की महत्त्वाकांक्षाएं इसे कुछ अलग करने के लिए उकसा रही थीं।
चूंकि समाज का लगभग सारा बौद्धिक नेतृत्व मध्यवर्ग के ही हाथों में था; यहां तक कि औद्योगिक प्रतिष्ठानों को लाभप्रद स्थिति में बनाए रखने के लिए भी इसी वर्ग का योगदान सर्वाधिक था। अतः औरों से अलग दिखने और करने के लिए बौद्धिक आंदोलनों में हिस्सेदारी करना इस वर्ग स्वभाव जैसा बन चुका था। क्योंकि ऐसा करने से उसको शेष समाज की सहानुभूति और समर्थन मिलने की संभावना सर्वाधिक थी। दूसरे शब्दों में वह अपनी ही कुंठा से बाहर निकलना चाहता था, जो समाज के आर्थिक विभाजन की प्रक्रिया में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका के कारण जन्मी थी।
‘Utopia’ शब्द की व्युत्त्पत्ति ग्रीक शब्द ‘ou’ तथा ‘topos’ से हुई है; जिनका क्रमशः अर्थ है— ‘नहीं’ तथा ‘स्थान’। पुस्तक के शीर्षक से यह भी ध्वनित होता है कि था॓मस मूर ने अपनी पुस्तक के लिए संभवतः एक ऐसे द्वीप की कल्पना की थी, जो काल्पनिक है, दुनिया में जिसका कहीं अस्तित्व ही नहीं है। कुछ विद्वान Utopia के ‘u’ अक्षर को ‘eu’ का निकष् मानते हैं। ग्रीक भाषा में इस शब्द का एक अर्थ ‘श्रेष्ठ (Good)* भी है। इस प्रकार दोनों शब्दों का अभिप्राय हुआ—श्रेष्ठ स्थान। एक अन्य विचारधारा के अनुसार यूटोपिया शब्द का अर्थ ऐसे आदर्श एवं कल्याणकारी समाज से है, जिसका मनुष्य अक्सर सपना देखता है, जिसकी वह अपने लिए कामना करता है।
यूटोपिया के माध्यम से मूर ने ऐसे स्थान की संकल्पना की थी, जहां पर मनुष्य स्वेच्छा से नैतिक जीवन जीने के लिए आग्रहशील होता है। नैतिकता सदैव जीवन के मानक निर्धारण का कार्य करती है, वह मनुष्य के लिए सदैव एक लक्ष्य, एक आदर्श अथवा एक मनभावन सपने के समान होती है। इसलिए यूटोपिया में नैतिकता सदैव सम्मानीय बनी रहती है। यूटोपिया की संरचना के पीछे कल्पनाशील मध्यवर्ग का हाथ था। अतः आज वह एक कल्पनाशील, आदर्श, और सर्वसुखी, समरस समाज का प्रतीक बन चुका है।
थामस मूर के मन में इस शब्द का पहली बार विचार उस समय आया जब वह इरेस्मस के साथ ल्यूसियन की पुस्तक का ग्रीक से लेटिन में अनुवाद कर रहा था। उसका एक पात्र नाटककार मेनीप्पस है, जो अपराध जगत की हकीकत को जानने के लिए वहां वर्षों तक छिपकर रह रहा है। वह अपने रोज के अनुभवों को लिपिबद्ध करने का काम करता है। प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ में भी ‘यूटोपिया’ शब्द का कई स्थान पर उल्लेख हुआ है।
सन 1515 में लिखी गई इस पुस्तक में मूर ने सम्राट हेनरी-अष्ठम के उस दावे का रचनात्मक विरोध किया था, जिसमें उसने स्वयं को इंग्लैंड के चर्च का सर्वेसर्वा बनाने का सपना देखा था। इस पर था॓मस मूर का भारी विरोध हुआ। उन दिनों तक मूर कैथोलिक था तथा सुधारवादियों की यह कहकर आलोचना करता था कि उनके विचारों को बढ़ावा देने से राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्था को खतरा हो सकता है। अपनी मान्यता के पुष्ट करने के लिए चांसलर के पद पर कार्य करते हुए मूर ने अनेक पुस्तकों की रचना की, जिनमें उसने कैथोलिकों का बचाव करते हुए उनके विरोधियों की कड़ी आलोचना की थी। यही नहीं कैथोलिकों के समर्थन में मूर ने कई ऐसे निर्णय भी लिए, जो उसकी मुख्य पुस्तक ‘यूटोपिया’ में वर्णित विचारों के विरुद्ध थे।
उन फैसलों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मार्टिन लूथर के अनुयायी विलियम थिंडेल (William Tyndale), जो उन दिनों निर्वासित जीवन जी रहे था, के समर्थकों का सफाया था। थिंडेल ने बाईबिल का सुधारवादी दृष्टिकोण से अनुवाद किया था। उसकी पुस्तक ब्रिटेन में जोर-शोर से बांटी जा रही थी। अपनी राजभक्ति का परिचय देते हुए मूर ने थिंडेल के साथियों का न केवल पूरी तरह सफाया किया, साथ ही उसके चालीस से अधिक समर्थकों को कारावास में भेज दिया। अनेक सुधारवादियों का स्वयं मूर के घर में, उसकी देखरेख में पूछताछ के बहाने प्रताड़ित किया गया। निश्चय ही इससे सम्राट और कैथोलिक चर्च के अनुयायियों का समर्थन मूर को मिला तथा उसको सम्मानित भी किया गया।
सन 1513 से 1518 के दौरान मूर ने सम्राट रिचर्ड को लेकर ‘सम्राट रिचर्ड का इतिहास’ नामक पुस्तक पर काम किया, जो विलियम शेक्सपीयर के ‘रिचर्ड तृतीय’ से पूरी तरह प्रभावित थी। अभी तक मूर सम्राट हेनरी-अष्ठम का पूर्ण समर्थक और सहयोगी था। उसके जीवन का एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम तो अभी शुरू ही नहीं हुआ था; जिसमें चैंका देने वाली घटनाएं तथा हादसे थे। समस्या तब उत्पन्न हुई जब सन 1502 में बड़े भाई आर्थर, जो वाॅल्स का राजकुमार था, की मृत्यु के पश्चात हेनरी ब्रिटेन के ताज का उत्तराधिकारी बन गया। उसने अपने भाई की विधवा तथा स्पेन के राजा की पुत्री कैथरीन आ॓फ आ॓रगन से विवाह कर लिया। इस विवाह के पीछे हेनरी की कूटनीतिक मंशा स्पेन के साथ कूटनीतिक संबंधों को प्रगाढ़ बनाए रखना था। उसका यह कदम चर्च के अधिकारियों को नागवार गुजरा। इसलिए पादरी जूलियस द्वितीय ने कैथरीन तथा आर्थर के विवाह को ही बाईबिल की दृष्टि से अमान्य करार दे दिया। उस समय मूर ने हेनरी का ही साथ दिया, लेकिन करीब बीस साल तक साथ रहने के बावजूद कैथरीन हेनरी को उसका पुरुष उत्तराधिकारी देने में नाकाम रही।
इसी बीच हेनरी अन्ना बोलिन नाम की एक महिला जो उसकी पत्नी कैथरीन की दासी थी, के प्यार में पड़ गया। अब वह कैथरीन से विवाह-विच्छेद करना चाहता था। इसी मुद्दे पर पुनः विवाद हुआ, जिससे सम्राट हेनरी की पादरियों से ठन गई। इसी विवाद के दौरान उसने अपने सलाहकार कार्डिनल वा॓ल्स (Cardinal Wolsey) को हटाकर, सन 1529 में उसके स्थान पर मूर को नियुक्त कर लिया। इसके बाद हेनरी धार्मिक सुधारवादियों का यह कहकर समर्थन करने लगा कि पोप का अधिकार-क्षेत्र केवल रोम तक सीमित है और वह पूरी दुनिया के ईसाइयों के धर्मगुरु नहीं हैं।
इससे पहले तक मूर सम्राट हेनरी का समर्थक बना हुआ था। मगर जैसे ही सम्राट ने पोप की सर्वोच्चता पर सवाल खड़े करने शुरू किए, उसका सम्राट से मनमुटाव हो गया। उसने सम्राट से अस्वस्थता के आधार पर पदमुक्त करने का अनुरोध किया। सम्राट ने पहले तो इंकार किया, किंतु मूर की प्रार्थना पर कुछ दिनों बाद उसका त्यागपत्र स्वीकार कर लिया गया। राजसेवा से मुक्त होने के पश्चात मूर अध्ययन-लेखन में जुट गया। अच्छा ही होता अगर घटनाक्रम यहीं पर निपट गया होता और मूर को अपना बाकी समय लिखने-पढ़ने में बिताने का अवसर मिला होता। मगर मुख्य घटनाक्रम तो अभी शेष था, जिसमें मूर के जीवन की विडंबना छिपी हुई थी।
सन 1533 में मूर को सम्राट की ओर से एक निमंत्रण प्राप्त हुआ। समारोह में ऐनी बोलिन को इंग्लैंड की महारानी का ताज पहनाया जाना था। मूर ने उस समारोह मे जाने से इंकार कर दिया। इससे हेनरी उससे नाराज होे गया। उस घटना के कुछ ही दिन पश्चात मूर को गिरफ्तार कर लिया गया। उसपर रिश्वत लेने के आरोप लगाए गए थे। आरोप मिथ्या थे, अतः समय बीतने पर वे खारिज हो गए। लेकिन मूर के विरोधी उसके पीछे पड़े हुए थे और वे सम्राट की नाराजगी का फायदा उठाकर, किसी न किसी प्रकार उसको दंडित करना चाहते थे।
सन 1534 में था॓मस मूर को एक बार फिर सम्राट के दरबार में अभियुक्त की तरह पेश होना पड़ा। इस बार उसपर ऐलिजाबेथ बार्टन नामक एक नन के साथ मिलकर सम्राट के विरुद्ध षड्यंत्र रचने का आरोप था। बार्टन पर सम्राट के विवाह-विच्छेद के विरुद्ध भविष्यवाणी करने का भी आरोप था। इस बार मूर ने अपने पक्ष में एक पत्र का साक्ष्य दिया। वह पत्र उसने ऐलिजाबेथ बार्टन को लिखा था, जिसमें उसने उसको राज्य के मामलों में दखल न देने की सलाह दी थी। मूर का यह जबाव तर्कसंगत होते हुए भी अपर्याप्त माना गया।
उसी वर्ष 13 अप्रैल के दिन मूर को उत्तराधिकार अधिनियम के प्रति अपनी सहमति व्यक्त करने के लिए संसदीय आयोग के समक्ष उपस्थित होने के निर्देश मिले। मूर मानता था कि संसद को उत्तराधिकार से संबंधित मामले निर्धारित करने का अधिकार है, मगर उसको लगा कि प्रस्तावित अधिनियम की कुछ शर्तें पोप के अधिकार-क्षेत्र में हस्तक्षेप करती हैं। अधिनियम के प्रति असहमति व्यक्त करने पर उसको कारावास के लिए भेज दिया गया। उसके लगभग साढे़ तीन महीने पश्चात 1 जुलाई, 1535 को मूर को एक आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जिसके सदस्यों में नए लार्ड चांसलर सर था॓मस आ॓डले के अतिरिक्त साम्राज्ञी ऐनी बोलिन के पिता, भाई तथा उसका एक चाचा भी शामिल थे। स्पष्ट है कि आयोग की सरंचना पक्षपातपूर्ण ढंग से मूर को दंडित करने के लिए ही की गई थी।
मूर आयोग के समक्ष उपस्थित तो हुआ, किंतु उसने आयोग द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देने से इंकार कर दिया। तब था॓मस क्रामवैल ने जो उन दिनों सम्राट के सलाहकारों में सर्वाधिक शक्तिशाली था, सोलिस्टर जनरल रिचर्ड रिच को मूर पर लगे आरोप तय करने के लिए आमंत्रित किया। मुकदमे के गवाहों के सामने आयोग की नीयत साफ हो चुकी थी। उन्होंने यह कहकर कि उन्हें वह बाचचीत, जिसमें मूर ने सम्राट की सर्वोच्चता को चुनौती दी थी, ढंग से याद नहीं है, उसे बचाने का प्रयास किया। मगर आयोग तो मूर को दंडित करने का फैसला कर चुका था। एक पक्षपातपूर्ण एवं अमानवीय निर्णय लेते हुए आयोग ने मूर को मृत्युदंड की सजा सुना दी। सजा सुनाए जाने से पहले मूर ने साफ शब्दों में कहा कि मृत्यु प्रत्येक प्राणी की नियति है। कोई भी क्षणभंगुर व्यक्ति अमरता का स्वामित्व नहीं पा सकता।
मूर को मिली सजा सामान्य मृत्युदंड से भी कहीं अधिक भयानक थी। सजा में उसको फांसी के फंदे पर लटकाने, जलाने और काटने की सजा सुना दी गई। यह उन दिनों राष्ट्रदोहियों और विश्वासघातियों को दिया जाने वाला दंड था। जिसमें अपराधी को फांसी के फंदे पर लटकाने के बाद उसको मरने से पहले ही उतार लिया जाता था। उसके बाद उसकी आंखों के सामने उसके जननांगों एवं अंतड़ियांे को आग में जलाया जाता था। सजा के तीसरे चरण में सिर को धड़ से अलग कर, उसे लोगों की नुमाइश के लिए रख दिया जाता था। इस सजा को वीभत्स एवं अमानवीय मानते हुए 1870 में समाप्त कर दिया गया।
आलोचना से बचने के लिए सम्राट ने यहां एक कूटनीतिक चाल चली। जनसमर्थन हासिल करने के लिए उसनेमूर की सजा का स्वरूप बदलते हुए उसकी सजा को सिर कलम करने तक सीमित कर दिया। अंततः सम्राट के आज्ञा पर ही 6 जुलाई, 1535 को मूर को सजा के लिए फांसी के मचान तक ले जाया गया। फांसी लगने से पहले मूर के शब्द थे—
‘कोई भी आध्यात्मिक संत परमसत्ता का मुखिया नहीं बन सकता।’
मूर ने स्वयं को ‘सम्राट का अच्छा सेवक, जिसके लिए ईश्वर पहले है,’ बताया। उसकी लाश को आग के हवाले करने के पश्चात उसके सिर को ‘लंदन ब्रिज’ पर महीने-भर तक प्रदर्शन के लिए रखा गया। इससे पहले कि सिर को था॓मस नदी में बहा दिया जाए, मूर की बेटी माग्ररेट रोपर उसे वहां से ले जाने में सफल हो गई। जिसका उसने विधिवत संस्कार कर दिया।
इस मृत्युदंड के लिए सम्राट की चैतरफा आलोचना हुई। मूर के समर्थकों ने आगे चलकर उसके विचारों को फैलाने का काम किया। मूर के एक समर्थक कैथोलिक लेखक जी. के. केस्टरटन ने उसको ‘इंग्लैंड के इतिहास की एक महानतम विभूति’ के रूप में उल्लिखित किया है।

विचारधारा
थामस मूर की कैथोलिक धर्म में पूरी श्रद्धा थी, यह उसके जीवन से भी स्पष्ट हो जाता है। सम्राट हेनरी अष्ठम की सेवा में रहते हुए उसने धार्मिक सुधारवादियों का न केवल तीव्र विरोध किया, बल्कि उनके सफाये के लिए अभियान भी चलाए थे। यह विडंबना ही है कि जिस सम्राट के राज्य को सुरक्षित और शक्तिशाली बनाए रखने के लिए मूर ने आजीवन प्रयास किया, उसी ने अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के चलते मूर को वीभत्स सजा का शिकार बना लिया। मूर के मित्र इरा॓समस् (Erasmus) का सुधारवादी आंदोलन से सीधा संबंध नहीं था, बावजूद इसके वह परंपरागत चर्च में सुधार चाहता था। इरा॓समस मूर का प्रशंसक था। मूर के मिले मृत्यृदंड के पश्चात उसकी पहली और सहज प्रतिक्रिया थी—
‘वह पवित्र था, वर्फ से भी अधिक पवित्र!’
इरा॓समस् मूर की प्रतिभा का कायल था। उसकी विद्वता को लेकर इरा॓समस् का मानना था कि—
‘इंग्लैंड में उसके जितना प्रतिभाशाली न तो कोई हुआ, न ही आगे होगा।’
इंग्लैंड में मूर के प्रशंसकों की कमी नहीं थी। मूर के जीवन और संघर्ष को लेकर 1592 में ‘सर था॓मस मूर’ शीर्षक से एक नाटक खेला गया था, जिसमें उसको इंग्लैंड का ‘एक ईमानदार और विद्वान राजनयिक’ (Wise and honest statesman) दर्शाया गया था। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं थी। अपनी योग्यता एवं प्रतिभा के बल पर ही मूर ने सम्राट के दरबार में अपनी जगह बनाई थी। यदि वह समझौतावादी होता तो राजदरबार से अपनी निकटता का लाभ उठाकर स्वयं को सत्ता में बनाए रख सकता था।
दरअसल था॓मस मूर का व्यक्तित्व विरोधाभासों से घिरा था। उसने एक ओर जहां परंपरावादियों का समर्थन करते हुए अनेक पुस्तकें लिखीं, वहीं यूटोपिया नामक पुस्तक लिखकर समाज को नई व्यवस्था का चेहरा भी दिखाया। कैथोलिक चर्च में अपनी आस्था के चलते मूर ने धार्मिक सुधारवादियों का विरोध करते हुए, राज्य की ताकत के बल पर उनके आंदोलन को कुचलने का भरसक प्रयत्न किया, वहीं दूसरी ओर अपनी पुस्तक में एक ऐसे समाज की संकल्पना भी की, जहां किसी भी प्रकार के धार्मिक दुराग्रह के लिए कोई स्थान नहीं होगा। जहां राजनीतिक और धार्मिक वर्चस्वता को चुनौती दी गई।
देखा जाए तो ‘यूटोपिया’ नामक पुस्तक के ही कारण मूर की ख्याति शताब्दियों बाद भी अक्षुण्ण रह सकी। अगर यह पुस्तक न लिखी गई होती तो उसकी कहानी भी अनेक सामान्य कहानियों के समान इतिहास की पुस्तकों में दबी रह जाती। मगर ‘यूटोपिया’ में उसने जिस संसार का सपना दुनिया के सामने रखा था, वह आने वाले दिनों में परिवर्तनवादियों के लिए एक लक्ष्य की तरह काम करता रहा। पुस्तक में एक शौकिया यात्री रा॓फेल एक ऐसे काल्पनिक राष्ट्र के सामाजिक और राजनीतिक जीवन का वर्णन करता है; जहां निजी संपत्ति की अवधारणा ही नहीं है। वह धर्माडंबर में फंसे यूरोप के विवादित सामाजिक जीवन की खिल्ली उड़ाता है तथा एक ऐसे समाज की रूपरेखा सामने रखता है जो उससे कही अधिक व्यवस्थित, न्यायपूर्ण और विवेकवान है, जहां पूर्ण धार्मिक सहिष्णुता है तथा जीवन सामूहिक है। माक्र्सवादी विद्वान कार्ल (Karl Kautsky) ने अपनी पुस्तक ‘था॓मस मूर एंड हिज यूटोपिया’ में स्पष्ट किया है कि मूर की पुस्तक ‘यूटोपिया’ प्राचीन इंग्लेंड के आर्थिक एवं सामाजिक अंतर्विरोधों, विसंगतियों की विद्वतापूर्ण आलोचना है; तथा उसका स्थान समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने वाले प्रारंभिक विद्वानों में सर्वोपरि है।
विद्वानों का मानना है कि शताब्दियों पश्चात कार्ल माक्र्स का एक आदर्श साम्यवादी राज्य का सपना मूर की पुस्तक यूटोपिया से ही प्रभावित था। यहां प्रश्न उठ सकता है कि प्रकट रूप में सत्ता का सुख लूटने वाला, सम्राट को खुश करने के लिए धार्मिक सुधारवादियों का विरोध करने वाला मूर अपनी कल्पना में उसके ठीक विपरीत राज्य का सपना क्यों देखता है? क्या उस समय वह स्वयं से भाग रहा था अथवा उसके राजसुख मानस और ईसाइयत में भीतर ही भीतर कोई अंतर्द्वंद्व चल रहा था? दरअसल इसी से मूर के वैचारिक अंतर्विरोधों को समझा जा सकता है; और यह अंतर्विरोध केवल मूर का ही नहीं है, इतिहास ऐसे अंतर्विरोधों से भरा पड़ा है। ऐसे अनेक विद्वान हुए हैं, जिनके जीवन और विचारधारा में कोई साम्य नहीं था। बावजूद इसके उन्होंने विचारों के साम्राज्य में अपनी जगह बनाई। इंग्लैंड की तत्कालीन शासन व्यवस्था के घोर फा॓सीवादी चरित्र को देखते हुए ऐसा सोचना असंभव भी नहीं है। यह भी माना जाता है कि मूर ने अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए साहित्यिक माध्यम का सहारा लिया। जो भी हो यह एक बहस का विषय हो सकता है।
यह भी निर्विवाद सच है कि ‘यूटोपिया’ के माध्यम से मूर ने आधुनिक समाज की जो संकल्पना अपने राष्ट्र और समाज के सामने रखी, वह उसकी परिस्थितियों में अद्भुत थी। उसके इस सपने ने आगे आने वाली विद्वानों, दार्शनिकों की कई पीढ़ियों को प्रेरित करने का काम किया। लगभग साढ़े तीन सौ साल के बाद चर्च ने मूर के साथ हुए अत्याचार को स्वीकृति दी तथा एक लंबी बहस के पश्चात सन 1886 में पोप लियो-तेरहवें ने उसे सम्मानित करते हुए जा॓न फिशर के साथ ‘राजनीति का संरक्षक संत’ (Patron saint of politics) की पदवी से अलंकृत किया। सन 2000 में पोप जा॓न पा॓ल ने मूर को संत की उपाधि देते हुए उसे ‘राजनेताओं एवं राजनयिकों का स्वर्ग स्थित संरक्षक’ (Heavenly Patron of Statesmen and Politicians) की पदवी से अलंकृत कर चर्च को प्रायश्चित का एक और अवसर प्रदान किया।
मूर का समकालीन राबर्ट व्हिटिंटन उसके बारे में लिखता है—
‘मूर असामान्य रूप से बुद्धिमान, वाक्चातुर्य में देवदूत सरीखा था। मुझे उसके किसी साथी, समकालीन में जानकारी नहीं है, जो उसके समान भलमानसाहत और मनुष्यता की मिसाल हो। वह घोर संकट के समय मुस्करा सकता था, विपत्तिकाल में भी उसकी वाक्पटुता देखते ही बनती थी, तो किसी समय वह दुःखी भी हो सकता था। मूर वस्तुतः सदाबहार व्यक्ति था।’
मूर ने साम्राज्यवादी परिवेश में जन्म लिया, अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा उसी की सेवा को समर्पित कर दिया। लेकिन अपनी महान कृति ‘यूटोपिया’ के द्वारा वह समाज के वंचित और तिरस्कृत लोगों को नई उम्मीद के साथ, समानता और भाईचारे का जो संदेश देकर गया, उसने सतरहवीं और अठारहवीं शताब्दी के मानवतावादी आंदोलनों को नई प्रेरणा दी। इसलिए परिवर्तनवादियों में मूर का नाम सदा अविस्मरणीय रहेगा।

© ओमप्रकाश कश्यप

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2 टिप्पणियाँ

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2 responses to “संत था॓मस मूर : पहला यूटोपियन

  1. इस सुन्दर आलेख के लिए आभार. हमें सर थॉमस मूर का कृतग्य होना चाहिए.

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