साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रायोजित विशेषांक : कितने साहित्यिक

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प्रकाशित सामग्री पर प्रतिक्रया आमतौर पर नहीं लिखता. ऐसा नहीं है कि पढ़ते समय चीजें मानस को उद्वेलित नहीं करतीं. करती हैं. बल्कि कभीकभी तो दिमाग में बिजलीसी कोंध जाती है, तत्काल प्रतिक्रिया लिखने का मन होता है. उंगलियां कलम उठाने के लिए कसमसा उठती हैं. लेकिन कभी एकांत की कमी तो कभी समय का अभाव, सहजस्वाभाविक समुद्वेलन को शब्द देना प्रत्येक बार संभव नहीं हो पाता. कई बार अंतर्विमर्श की प्रक्रिया ही इतनी धीमी और लंबी होती है कि उसको शब्दों में उतारने से पहले ही घटनाएं पुरानी पड़ने लगती हैं. ऐसी प्रतिक्रियाएं अपने लिखित स्वरूप में आतेआते प्रायः अपनी प्रासंगिकता खो बैठती हैं. नित्यप्रति पढ़े जाने वाले साहित्य या समाचारों में से सभी चीजें उद्वेलित कर सकें, यह आवश्यक नहीं है. मगर कुछ पत्रिकाएं और लेखक ऐसे जरूर हैं, जो अपनी रचनाओं के साथ अक्सर चैंकाते रहते हैं. यह चैंकाना स्वयंस्फूर्त भी हो सकता है और अनायास भी. कभीकभी यह इतना सुतीक्ष्ण होता है कि मन झनझना उठता है. हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बस चैंकाने के लिए ही कलम उठाते हैं.

इधर कथासंसार का प्रेम विशेषांक हाथों में है. परंतु इसका शीर्षक मुझे चैंकाता नहीं है. जिसने भी सुरंजन को जाना, उनकी कविताओं को पढ़ा है, वे जानते हैं कि वे ऐसा ही कोई शीर्षक चुनते. उनकी अधिकांश कविताएं मांसल प्रेम और सेक्स के इर्दगिर्द घूमती हैं. उनमें स्त्री का आगमन तो होता है, बल्कि बारबार होता है. मगर स्त्री की आकांक्षाएं, उसका संघर्ष और उसकी आत्मा उनकी कविताओं से नदारद ही रहती है. यही हाल उनके बनाए कोलाज का है. वहां भी स्त्री की उपस्थिति है तो मात्र इसलिए कि उसके बिना मांसल प्रेम, जिसकी कि सुरंजन वकालत करते रहते हैं, संभव ही नहीं है. यूं सुरंजन ने कथासंसार के स्त्रीशक्ति विशेषांक भी निकाले हैं. मगर उनके पीछे किसी स्पष्ट दृष्टिबोध का अभाव रहा है. शायद इसके पीछे कोई मजबूरी रही हो. इसलिए उनमें वह भावना या विचार नहीं है, जिनके आधार पर आधुनिक स्त्री के संघर्ष और उसकी जद्दोजहद का रूपक खड़ा किया गया है. स्वयं सुरंजन अपने नारीशक्ति विशेषांक में कह चुके हैं कि औरत को तो मर्द के नीचे ही रहना है…! उनसे उसी समय पूछा जाना चाहिए था कि यदि स्त्री की नियति चैकेचूल्हे और बिस्तर तक ही सीमित है तो उसपर काहे का विशेषांक निकाला जाए? स्त्रीशक्ति और उसपर विमर्श आदि का औचित्य ही क्या है! लेकिन अपने हिंदी क्षेत्र में बहसें उस समय तक नहीं गर्मातीं जब तक कि उनमें राजनीति, भले ही साहित्य की, का मौका न हो. या बहस मंे हिस्सा लेेने वालों का कोई हितसाधन न होता हो.

कल्पना कीजिए कि यही बात यदि राजेंद्र यादव ने कही होती? मैं मानता हूं कि सुरंजन और राजेंद्र यादव में बहुत फर्क हैं, लेकिन क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि राजेंद यादव या ऐसे ही सूरमाओं को लेकर उठी बहसें अक्सर मंचीय राजनीति का हिस्सा बन जाती हैं, जिसके चलते वे लगभग बेअसर रहती हैं. कई बार निजी खुदंक निकालने के लिए भी लिख्खाड़ लोग मैदान में उतर आते हैं. ऐसी बहसें मंच से नीचे उतरते ही आमतौर पर पूरी तरह से भुला दी जाती हैं. इसके विपरीत सुरंजन के पाठक सामान्य हैं. वे साहित्य की राजनीति को प्रभावित करने का उतना सामथ्र्य नहीं रखते. हां, उससे प्रभावित जरूर होते हैं. उनका भावुक मन लिखे हुए शब्दों को आप्तवाक्य की तरह लेता है. जिस कविलेखक को वे पसंद करने लगें, वह उनके लिए भगवान की तरह होता है. उनमें से कुछ लिखने के अपने शौक को चर्चा में रखने के लिए छोटीमोटी साहित्यिक राजनीति भी कर लेते हैं. ऐसे लोगों को एक मंच की तलाश हमेशा रहती है. कथासंसार और दूसरी पत्रिकाएं उन्हें यह सुविधा उपलब्ध कराती हैं और इसके लिए उनका आर्थिक एवं भावनात्मक दोहन भी करती हैं. कई बार अभिव्यक्ति के मंच के छिन जाने का डर भी उन्हें संपादकीय नीति का सार्वजनिक विरोध करने से रोकता है. जो हो, सुरंजन ने उन शब्दों, उनकी चालाकी और रूढ़िवादिता पर जोरदार प्रहार होना चाहिए था. लेकिन मुझे याद है कि इक्कादुक्का पत्रों के अतिरिक्त इस मसले पर कोई गंभीर बहस का आयोजन नहीं हो पाया था. सुरंजन थोड़े और चालाक होते तो कलम उठाने से पहले ही प्रायोजित बहस के लिए ‘सूरमा’ तैयार कर लेते. ऐसे ‘दारूकुट्टों’ की हिंदी में कमी भी नहीं है.

पत्रिका के मूल्य के रूप में कवर पर छपी सहयोग राशि 50 रुपये भी नहीं चैंकाती. मैं यह नहीं कहूंगा कि यह वाजिब है. नकद चुकानी पड़ती तो फौरन कन्नी काट जाता. लेकिन सुरंजन को इसकी चिंता नहीं. चिंता हो भी क्यों? हिंदी में पत्रिका खरीदकर पढ़नेवाले पाठक तो रहे नहीं. जो हैं वे भला कथासंसार को क्यों खरीदेंगे. फिर भी पत्रिका यदि छपती है और लगातार निकल रही है, यदि पत्रिका के संरक्षक मंडल में ही सतरह सदस्य हैं, तो जाहिर है कि पत्रिका को चाहने वाले पाठक भले ही उनकी संख्या गिनीचुनी हो, पर हैं अवश्य. और यह नियति तो आज हिंदी की लगभग हर पत्रिका की है. लेकिन सुरंजन जिस तरह की सामग्री का चयन करते हैं, उससे कभीकभी आभास होता है कि कथासंसार एक ब्रांड का नाम है. जिसके लिए खास किस्म की रचनाएं तैयार की जाती हैं तथा जिन्हें खास सोच वाले पाठकवर्ग के लिए प्रस्तुत किया जाता है. किसी भी ऐसी पत्रिका के लिए जो साहित्य के नाम पर और बेहद सीमित प्रयासों द्वारा निकाली जा रही हो, इस तरह का ब्रांडीकरण बहुत उपयोगी नहीं रह पाता. क्योंकि ब्रांड की सफलता के लिए अपने उत्पाद की विशिष्टओं को विज्ञापित कर उपभोक्ताओं तक ले जाना, उन्हें पापुलर कल्चर का हिस्सा बना देना, बहुत ही चुनौतीभरा उपक्रम है, जो संसाधनों के अभाव में संभव नहीं हो पाता. यह बात सुरंजन को भी मालूम है, लेकिन चर्चा में बने रहने का मोह छूटता नहीं. इसलिए कभीकभी अपने पाठकों, जो निःसंदेह उनका लेखकवर्ग भी है, को संतुष्ट करने के लिए वे हर अंक में कुछ न कुछ ऐसा अवश्य ले आते हैं, जो विवादित की श्रेणी में आता है.

अंदर के पृष्ठ पर एक विनम्र अनुरोध है, उदारमना पाठकों और रचनाकारों से. वह भी चैंकानेवाला नहीं है. निजी प्रयासों से चलने वाली पत्रिकाओं में इस प्रकार के संपादकीय निवेदन अक्सर छाए रहते हैं. और यह गैरवाजिब भी नहीं है. सुरंजन ने भी कथासंसार के पाठकों से अपील की है कि वे उदारदृष्टि अपनाएं. साहित्यिक दान के लिए आगे आएं. पत्रिका भेजी जा रही है, कीमत नकद भिजवाने की भी जरूरत नहीं है. मात्र पचास रुपये के डाक टिकट पर्याप्त होंगे, भिजवाने की कृपा करें. जाहिर है कि वे टिकट दूसरों को पत्रिका बिना एडवांस भिजवाने के काम आएंगे. पत्रिका में सदस्यता सहयोग के लिए ऐसी टिप्पणियां दूसरे संपादक भी करते हैं. लेकिन उनकी अपील में वैसी भावुकता का अभाव होता है, जिसे सुरंजन बड़ी ही सहजता से उंडेल देते हैं. आगे पंचम की कविताएं हैं. हिंदी मंे जीविका के विभिन्न क्षेत्रों से आए हुए लोग हैं. बेरोजगार भी हैं, लेकिन साहित्य को अपनी आजीविका बनाने वाले लेखक उंगलियों पर गिने जा सकते हैं. शायद इसीलिए एक सामान्य हिंदी लेखक नहीं चाहता कि उसके बेटेबेटियां साहित्य के क्षेत्र में आएं. सुरंजन इस मामले में अलग हैं. यह भावुक कवि अपने बेटे को जिस तरह प्रोत्साहित करता है, वह इस बाजार और कठिन स्पर्धा के दौर में अनन्य है, यह उसके साहित्य के प्रति सच्चे समर्पण को दर्शाता है.

पत्रिका के आगे के पन्नों पर डाॅ. अनूप सिंह ने अपनी पीड़ा उंडेली है. पर यह केवल उन्हीं की पीड़ा नहीं. बल्कि हिंदी जगत के हर उस लेखकप्राणी की पीड़ा है. जो कम से कम समय में अधिक से अधिक चर्चा पा लेना चाहता है. इसके लिए वह कलम से अधिक भरोसा मंच और माइक पर करता है. मुश्किल तब होती है जब किसी कार्यक्रम में उसको अपने ही जैसे दर्जनों लोग मिल जाते हैं. ऐसे लोग जो आपाधापी में हैं. जिनमें धैर्य का अभाव है. और जिनके पास ऐसा कोई मौलिक विचार, मुद्दा भी नहीं जिसके सहारे वे अपने साहित्यिक अभियान को आ॑क्सीजन दे सकें. ऐसे कार्यक्रम का खर्च चूंकि आयोजक पक्ष के लोग वहन करते हैं, इसलिए ज्यादा लाभ भी वही उठाते हैं. सवाल है कि इस तरह की निजी पीड़ा को सार्वजनिक करने में साहित्य का अंश कुछ है कि नहीं. यदि वह मात्र व्यक्तिगत कुंठा का प्रदर्शन है, जो संपादक को चाहिए कि ऐसी टिप्पणियों को पत्रिका में स्थान न दें. क्योंकि यदि उनके पास कोई अच्छी बात है, और उसके प्रति उनकी निष्ठा सघन है, तो देरसवेर वह अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम खोज ही लेगी. इस तरह टेसुए बहाने, गिड़गिड़ाने से न तो साहित्य का भला हो सकता है, न ही साहित्यकार का. हां साहित्यिक राजनीति जरूर की जा सकती है, जो अंततः विमर्श की संभावनाओं को कमजोर करने का काम करती है.

पत्रिका में एक अपील भी है. नाम और छपास के लोभी साहित्यकारों से. जिन्हें लगता है कि वे हिंदी साहित्यजगत को अपना बहुमूल्य योगदान दे चुके हैं. पर यह समाज इतना नाशुक्रा है कि भाव ही नहीं देता. ऐसे समाज को बताने के लिए उनका पत्रिकाओं के एकल संकलन या विशेषांक के रूप में आना जरूरी है. सुरंजन की अपील ऐसे ही स्वनामधन्य साहित्यकारों के लिए है. उनके लिए महान बनने का अनूठा अवसर, कि आगे आएं. एक विशेषांक हेतु संपर्क करें. निवेश करें, नाम पाएं. पैसे लेकर एकल विशेषांक निकालना नई परंपरा नहीं है. सुरंजन ने जो किया है, वह बाकी संपादक भी करते हैं, कर रहे हैं. मगर थोड़ी नफासत से. दूसरों से छिपाकर, लटकेझटके के साथ. और उनसे ज्यादा रकम ऐंठ लेते हैं. कुछ ने तो महान बनाने की फैक्ट्रियां तक खोली हैं. जिनसे हर साल उपाधियां बांटी जाती हैं. जिसकी जेब में नामा हो वह नाम लेकर जाए. वहां नाम कमाया नहीं, खरीदा जाता है. उनके बनाए ‘महान’ अंधेरे से आते हैं और वहीं खो जाते हैं. फिर भी उनके धंधे पर आंच नहीं आती. सुरंजन यही खेल खुलेआम खेलते हैं. इसलिए बदनामियां ओढ़तेबिछाते हैं. यह बात अलग है कि ऐसी बदनामियां सुरंजन को हतोत्साहित नहीं करतीं. शराब की तरह ऐसी बदचलनियों के प्रति सुरंजन की प्यास गोया बढ़ती ही जाती है.

एकल विशेषांक के लिए सुरंजन का साहित्यकारों को आमंत्रित करना भी नहीं चैंकाता. जमाना ही खुद को प्रोमोट करने का है. आधुनिक सभ्यता ने जिन चीजों को पूरी तरह मिटाने का काम किया है, उनमें से एक आपसी विश्वास भी है. लोगों को अपने भाईबहन, मित्रहितैषी, सगेसंबंधी तक पर विश्वास नहीं रहा. कोई लिखकर भी दे दे तो यह कहकर उसकी हवा निकाल दी जाती है कि ऊपरी मन से लिखा होगा. इसलिए सारी धनुर्विद्या अपने ही कंधे से साधनी पड़ती है. हिंदी के ही एक कवि हैं, ढंग के कवि वे कभी बन नहीं पाए सो आजकल खुद को महाकवि लिखने लगे हैं. महानता के पंखों पर उड़ान भरते हैं. मंचों और चैनलों पर कविता का चक्र उठाए फिरते हैं. पिछले दिनों जब अभिताभ बच्चन की तूती बोलती थी तो उन्होंने सदी के कथित महानायक पर कविता लिखकर, उन्हें ही आग्रहपूर्वक सुना दी थी. हालांकि कौन नहीं जानता कि किसी जमाने का यह ‘गुस्सैल युवा’ (यंग्र एंग्रीमैन) साठ पार करतेकरते बुरी तरह से हांफने लगा है. घुटने टेक दिए हैं उसने. बहू का मंगलदोष उतारने के लिए वह मंदिरमंदिर माथा टेकता है. टोनेटोटके करवाता है.

इस अंक में सुरंजन के संपादकीय के कुछ अंश उपनी भावुक उदघोषणाओं के बावजूद प्रभावित करते हैं. हममें से कितनों में ऐसी खरीखरी कहने का साहस है. अपनी संपादकीय अभिव्यक्ति के लिए सुरंजन ने अपनी ही कविता पुस्तक ‘सूरज का सातवां जन्म’ के विमोचन कार्यक्रम को चुना है. हिंदी भवन, दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम में सुरंजन को नामवर सिंह जैसे बड़े साहित्यकारों और अपने कुछ मित्रों के न पहुंचने का मलाल था. संपादकीय में उसी शिकायत की निर्मैल्य एवं भावुक अभिव्यक्ति है—

मुझ जैसे जिंदा साहित्य रचनेवाले भक्तों का एक विधाता तो होना ही चाहिए. पर राजेंद्र यादव जैसा महारथी नहीं. नामवर सिंह जैसा योद्धा नहीं. अशोक वाजपेयी जैसा सूरमा भी नहीं. यानी विधाता हो तो विधाता जैसी बात करे. हमारी सुने और हमारा मार्गदर्शन करे

लंबे संघर्ष से तपे सुरंजन की इस भावभरी अपील में उन जैसे दूसरे लेखकोंसंपादकों का दर्द भी छिपा हुआ है, जो आजीविका के संघर्ष से थोड़ाबहुत समय बचाकर अपने साहित्यिक लगाव को निभाए जाने का प्रयास करते रहते हैं. बावजूद इसके यह मुझे चैंका नहीं पाता. क्योंकि इस तरह की टिप्पणी या अपील साहित्य जगत में व्याप्त राजनीति और साहित्यकारों के वौद्धिक स्खलन की ओर इशारा करती है, जो केवल क्षोभ पैदा कर सकती हैं. वैसे आत्मव्यामोह से सुरंजन भी बचे नहीं हैं. अपने इसी संपादकीय में वे आगे लिखते हैं—

सच कहूं तो मेरा विधाता मेरा ‘मैं’ रहा है और आत्मा मेरी प्रेमिका. इन्हीं दोनों ने मुझे जैसे सातवीं तक पढ़े आधेअधूरे इंसान को कविलेखक; और न जाने क्याक्या मुझे बना दिया. मैं खुद ही खुद को आजतक समझ नहीं पाया.’ सुरंजन की एक दबीछिपी आकांक्षा यह भी है कि लोग उनके जीवनसंघर्ष को पुस्तक का कलेवर दें. उनका भोला विश्वास है कि उनके मित्रसंबंधी इस कार्य में आगे आएंगे. अपने व्यक्तित्व का कुछ समय के लिए दूसरे के व्यक्तित्व में लोप कर देना, उसके जीवन को स्मृतियों और अनुभव में जीना, फिर जीवंत शब्दांे में उतारना, यह काम आसान है क्या? ऊपर से सुरंजन का व्यक्तित्व ही इतना जटिल है कि उसको शब्दों में ढालना आसान काम नहीं. जीवनयात्रा के लिहाज से सुरंजन एक ऐसा ‘मास्टरपीस’ है, कि कोई मनोवैज्ञानिक उनके जीवनव्यवहार का अध्ययन कर एक शोधपत्र तैयार कर सकता है. साहित्यिक दृष्टि से भी उसमें इतना कुछ मौजूद है कि उसे लेकर एक वृहदकाय उपन्यास तो लिखा ही जा सकता है. लेकिन यह काम जल्दबाजी में नहीं होना चाहिए. आवारा मसीहा जैसी कृति को शब्द देने के लिए उसके लेखक को थोड़ाबहुत आवारापन तो चरित्र में उतारना ही पड़ेगा. इसलिए मुझे सुरंजन की इच्छा में दोष नजर नहीं आता. कमी हमारे समय और समाज की है, जहां किसी लेखक को लेखन से अधिक समय अपनी जीविकासंबंधी मामलों के लिए देना पड़ता है.

 

 

पत्रिका के कुल मिलाकर बारह पृष्ठ अपने साहित्यिक गुरु डा॑. शिवशंकर को समर्पित किए हैं. इन पृष्ठों पर डा॑. शिवशंकर के सात ‘कामायनी गीत’ हैं. तटबंध की भांति इन सभी बारह पृष्ठों पर जयभगवान गुप्त ‘राकेश’ के हाइकू हैं. मानों डा॑. शिवशंकर की भावकामायनी को बांधने की कोशिश की गई हो. लेकिन जैसे नदी तट पर पहुंचते ही सबका ध्यान उन्मुक्त बहती जलधारा पर होता है, किनारे प्रायः उपेक्षित ही रह जाते हैं, यही हाल इन गीतों के आजूबाजू दिए हाइकू का है. भावकामायनी को प्रस्तुत करते समय सुरंजन जानते थे कि यह विवादित हो सकती है, इसलिए उन्होंने इसे ‘गुरुदक्षिणा’ का नाम देकर इसकी प्रस्तुति से अपना पीछा छुटाने का नाकाम प्रयास किया है. इसके बाद भी डर नहीं गया तो पत्रिका के सहायक संपादक ने अपना सहायकधर्म निभाते हुए जिम्मेदारियों से भागने का प्रयास किया है. मेरी समझ में नहीं आता कि संपादक या सहायक संपादक को ऐसा करने की आवश्यकता ही क्या थी. क्यों उन्हें आरंभ में ही अपनी सफाई देने की जरूरत आ पड़ी. यह तो ठीक ऐसा हुआ जैसे मुंह फेरकर भीड़ पर पत्थर फेंकना और फिर जान बचाकर भाग लेना. सुरंजन का दावा है कि वे 22 वर्ष बाद अपने साहित्यिक गुरु को गुरुदक्षिणा के बतौर ये गीत ससम्मान छाप रहे हैं. उन्हें इस बात पर खुशी भी है. और चाहते हैं कि पत्रिका के पाठक उन गीतों का रसास्वादन करें. यानी उन्हें मालूम था कि वे क्या परोस रहे हैं और पाठक उन्हें किस अंदाज में लेंगे. लेकिन गीतों के बाद में सहायक संपादक की टिप्पणी क्या उनकी गुरुदक्षिणा पर सवाल खडे़ नहीं करती? क्या इससे यह जाहिर नहीं होता कि सुरंजन ने कथासंसार के रूप में जिस ‘साहित्यिक ब्रांड’ की स्थापना की है, डा॑. शिवशंकर की भावकामायनी उसी में स्वयंस्फूर्त भागीदारी है. कहें तो गुरुदक्षिणा के समानांतर गुरु का आशीर्वाद भी. यह प्रसंग गुरुचेले की एकसमान मानसिकता की ओर संकेत तो करता ही है, यह भी दर्शाता है कि सुरंजन किस ‘संस्थान’ की उपज हैं. डाॅ. शिवशंकर ने अपनी गुरुता सिद्ध भी की है.

भाव कामायनी के नायक के रूप में स्वयं गीतकार है. एक उसकी नायिका है. दोनों के प्रेम की मांसल अभिव्यक्ति है. नायिका विवाह के पश्चात ससुराल चली जाती है. किंतु नायक के प्रति अपने समर्पण के कारण वह अपने पति के संग अभिसार के क्षणों में उसका साथ नहीं दे पाती. लौटते ही वह फिर नायक पर लुट जाती है. यही सामान्यसा कथानक है, बेहद साधारण गीत रचना. जिसमें कोई छंदशास्त्री दर्जनों नुक्स निकाल सकता है. परंतु भाषाई जटिलता, संस्कृत, अरबी और फारसी के दुरूह शब्दों का प्रयोग इन गीतों को सहजग्राह्यः नहीं रहने देता. यदि थोड़ी और कल्पनाशीलता से काम लिया जाता तो एक बेहतर रचना बनने की गुंजाइश थी. गीतों को पढ़ते हुए साफ हो जाता है कि उनका रचियता कवि नहीं, एक कामुक प्रेमी है, जिसका अपनी कुंठाओं पर जराभी नियंत्रण नहीं है. काव्यधारा में कामप्रसंगों की प्रस्तुति गलत नहीं है. न डाॅ. शिवशंकर पहले कवि हैं जिन्होंने स्त्रीपुरुष अंतरंगता को कविता का विषय बनाया हो. विश्वसाहित्य और हिंदी में इस प्रकार की अनेक रचनाएं पढ़ने को मिल सकती हैं. ‘गीतगोविंद’ संस्कृत की है तो ‘कनुप्रिया’ हिंदी की. हिंदी के ही कवि नरेद्र शर्मा ने अनेक गीत प्रेम और अभिसार को केंद्र बनाकर लिखे हैं, जिनकी सराहना होती है. कारण यह है कि वहां अभिव्यक्ति संभ्रांतीय शालीनता की हदों में ही रहती है. उनका एक शंृगार गीत लगभग पचीस वर्ष पहले पढ़ा था, जिसकी गमक आज भी ज्यों की त्यों दिमाग में है. हां स्मृतिलोप के कारण गीत के कुछ शब्द इधरउधर जरूर हुए हैं. इसलिए क्षमायाचना के साथ प्रस्तुत है—

आज न सोने दूंगी बालम

आज विश्व से छीन तुम्हें मैं अपनी सांसों में भर लूंगी

मृदुलगोलगोरी बांहों में कंपित अंगों में कस लूंगी

फूलों से रस में भर लूंगी, अलि से रैननिदारे बालम

ऊपर ‘संभ्रांतीय शालीनता’ शब्दयुग्म का प्रयोग अनायास नहीं है. वस्तुतः हमारे समाज में सभ्यता, संस्कृति और अनुशासन के नाम पर अजीबसा दुरंगापन मौजूद रहा है. यहां शब्दों के ऐरफेर से रचना को श्लील और अश्लील ठहरा दिया जाता है. सत्ता का समर्थन मिले तो रमणी को नगरबवधू की गरिमा, राजकीय मानसम्मान, नहीं तो वेश्या के रूप में तिरष्कार, उपेक्षा और लांछनाएं— यह हमारे ही समाज की रीतिनीति रही हंै. यहां जो अभिजात्य के लिए, उसकी भाषा में है, वह सवालों के घेरे में उतना और उस तरह से नहीं आता, जितनी कि आम आदमी के लिए आमफहम भाषा में की गई सहज प्रस्तुतियां. जो संपन्न है, वही सुसंस्कृत भी है—ऐसा मान लेने की प्रवृत्ति लगभग हर समय, प्रत्येक समाज और संस्कृति में रही है. भारतीय समाज भी इसका अपवाद नहीं है. अर्थात जो लोक और उसकी आमफहम भाषा में है, वह भदेस और गैरशास्त्रीय है. उसको सुनकर भारत का औसत वुद्धिजीवी नाकमुंह सिकोड़ने लगता है. चालू कहकर उसको खारिज करने का प्रयास करता है. कमोबेश यही बात साहित्यिक प्रवृत्तियों को लेकर है. पूरा रीतिकाल नायिकाभेद और कामसंबंधों की व्याख्या से भरा पड़ा है. बिहारी, मतिराम और विद्यापति जैसे कवियों की गिनती हिंदी के प्रमुख रीतिकालीन कवियों में की जाती है. यह लिखने की आवश्यकता नहीं है कि हिंदी के प्रमुख रीतिकालीन कवि किसी न किसी राजा के अधीनस्थ थे। उसके खजाने से वेतन प्राप्त करते थे. राजा के रंजन के लिए कविता गढ़तेपढ़ते थे. राजा प्रसन्न होता तो कविता श्रेष्ठ और कामयाब मान ली जाती. चूंकि कविता लेखन और उसकी प्रस्तुति का सारा आयोजन राजा की खुशी के लिए था, इसलिए उसकी निष्पक्ष आलोचना के बारे में सोचना ही कठिन था.

कुछ लोग कह सकते हैं कि ‘गीत गोविंद’ और ‘कनुप्रिया’ बड़ी रचनाएं हैंकि उनमें वर्णित प्रेम अलौकिक हैकि राधाकृष्ण के प्रेम की तुलना साधारण प्रेम से नहीं की जा सकती है. दरअसल इस प्रकार की आलोचनाएं कामसंबंधों को लेकर हमारी वर्जनाओं और कुंठाओं की उपज हैं. डाॅ. अनूप सिंह की टिप्पणी हमारे नकली मानस को ही इंगित करती है. वे लिखते हैं कि ‘मैं गीतों की शाब्दिक चित्रकारिता में निम्नवर्गीय भाषा का प्रयोग ठीक नहीं समझता.’ यह बात आहत करने वाली है. निम्नवर्गीय भाषा! आखिर क्या मायने हैं इसके? यह भाषाई उच्चवर्ग कौनसी बला है जनाब? आप यदि थोड़ासा पढ़लिख लिए तो, कथित उच्च जातिवर्ग में सम्मिलित हो गए तो, क्या इससे आपका सब कहाकरा मान्य हो गया? जो दूसरों के गाढ़े पसीने की कमाई पर मौज उड़ाते, उनकी अभिव्यक्ति पर लगाम डाले रहे, वे ऊंचे और महान! जिन्हें संसाधनों और अवसरों से वंचित रखा गया, पढ़नेलिखने नहीं दिया, अपने श्रमकौशल पर जो जैसेतैसे जीवित रहे, ऐसे मेहनतकश यदि अपनी बोलीबानी में अपनी बात कहें तो उनकी अभिव्यक्ति का कोई मोल ही नहीं. जिस कविता से पसीने की गंध आए, जो आमजन की मुश्किलों और संघर्षों का सच्चा बयान है, वह निकृष्ट और वह गंदी. उनकी तरह उनकी अभिव्यक्ति भी निम्नवर्गीय हुई, वाह! और जिन कविताओं में आश्रयदाता सम्राट की, उसके दरबारियों की चाटुकारिता, उनको हंसाने के लिए किया गया भाषाई मखौल, नायिका का नखशिख वर्णन है, वह श्रेष्ठ और उच्चवर्गीय! क्षोभ होता है, अमानवीयता की बू आती है इस गंदी स्थापना से.

आखिर भाषा अपने आप में क्या है? क्या उसका काम संवादवहन से इतर है? संस्कृत की गाली क्या गाली नहीं होती? अजीब छद्म है कि हम नंगे तो हों, लेकिन हमाम में. ऐसे कि हमारी नंगई सिर्फ हमीं को दिखाई दे. पर जिसके पास हमाम की सुविधा नहीं है; या जो आपके जैसी देवभाषा में पारंगत नहीं है. वह अपनी कामनाओंकल्पनाओं को अपनी भाषा में अभिव्यक्त करे तो वह पाप है, चारित्रिक स्खलन है! यह दृष्टिकोण सामंतवादी नहीं तो और क्या है? यह स्थिति दुनिया के प्रायः सभी देशों में रही है. इसी को लक्षित करते हुए मार्टिन लूथर ने कहा था कि—

मृत्यु के बाद मैं प्रेत बनना चाहूंगा, ताकि मैं वाचाल पादरियों, पुजारियों तथा पाखंडी साधुओं को सबक सिखा सकूं। उस समय तक और इतना तंग कर सकूं, जितना हजारों जीवित लूथर एक साथ मिलकर भी नहीं कर सकते।’

एक जमाना था जब समाज का एक वर्ग भोग और व्यभिचार में लिप्त रहता था तथा दूसरों के लिए उपदेश बांटता था. उसने अपने भोग और व्यभिचार के अलग मापदंड बनाए हुए थे. ‘गीतगोविंद’ जैसी रचनाएं संस्कृत में रची गईं, जो उस समय समाज के संभ्रांत वर्ग की भाषा थी. उसको आम आदमी समझ नहीं पाता था. इसलिए उसमें मुक्त कामाभियक्ति को भी स्थान मिला. बाद में जब समाज के दूसरे लोग भी संस्कृत समझने लगे तो सच पर पर्दा डालने के लिए उसमें आध्यात्मिक तत्वों की खोज की जाने लगी. कि कहीं हमारी महान संस्कृति को धब्बा न लग जाए. अश्लीलता को दर्शाने के दुहरे मापदंड गढ़े गए. उन दिनों काईंया बुद्धिजीवियों के प्रयास से समाज भाषाई आधार पर विभाजित था. यानी प्रभुवर्ग की भाषा अलग, दीनहीनों की अलग. प्रभुवर्ग की शास्त्रों में वुद्धिविचार के साथ भरपूर मनोरंजन भी. दीनहीनों की भाषा में त्याग और तपस्या का गुणगान, भक्तिमहात्म्य तथा उपदेश. साथ में आमजन को रूढ़िवादी बनाए रखने का बाकी सभी साजोसामान.

ऐसा नहीं है कि इस चालाकी को समझा नहीं गया. समझने के बाद उसका तोड़ निकाला गया. सेक्स यदि प्रकृति की भाषा है तो उसके द्वारा होने वाला मनःरंजन प्रभुवर्ग तक ही क्यों सीमित रहे. अतः जिसे शास्त्रों ने निषिद्ध माना गया, वह लोकसंस्कृति का हिस्सा बन गया. तभी तो पे्रम और सेक्स की वर्जनाओं का विरोध भारत की लोकसंस्कृति का अभिन्न हिस्सा है. डाॅ. अनूप सिंह तो गांव के हैं. जानते होंगे कि विवाह वाले वाले घर में जब वर पक्ष के मर्द बारात में चले जाते हैं तो घर पर अकेली रह गई औरतें खोइया के रूप में क्या करती हैं. उस समय उनके गीतों के व्यंजार्थ की गहराई में जाने का प्रयास करें. समझ आएगा कि उनमें उन सभी वर्जनाओं का मखौल उड़ाया जाता है, जो औरत होने के नाते खासतौर पर उनपर लाद दी जाती हैं. अब तीज मनाना तो गुजरे जमाने की बात होती जा रही है. लेकिन डाॅ. अनूप सिंह को अगर याद हो, तीज खेलने गई कुंवारी ललनाएं ‘वरवरनी’ का नाटक करते हुए कौन से संवाद करती हैं? क्या उनमें युवा काम का उद्दीपन नहीं होता? क्या वह हमारे लोकसाहित्य और संस्कृति का हिस्सा नहीं है? पर उसे तो कोई निम्नवर्गीय नहीं मानता. वे कहेंगे कि साहित्य नहीं है वह. तो मेरा विनम्र प्रश्न है कि साहित्य क्या संस्कृति से भी बड़ी संरचना है. यदि संस्कृति साहित्य में प्रतिबिंत होती है तो इसमें बुरा क्या है!

इसका आशय यह नहीं है कि डा॑. शिवशंकर की भावकामायनी को प्रकाशन का अधिकार मिल जाता है. वस्तुतः हमें तय करना होगा कि किसी पत्रिका में रचनाओं के मापदंड की कसौटी क्या हो. ऐसी रचनाओं के छापने या आलोचना का आधार भाषा या उसके किसी खास गुण को नहीं बनाया जा सकता. किसी ऐसी पत्रिका में जिसका प्रकाशन साहित्य के नाम पर किया जा रहा है, रचना के चयन का आधार केवल और केवल उसमें मौजूद साहित्यिकता ही हो सकती है. इस आधार पर तो डाॅ. शिवशंकर की कविता पहली नजर में ही कूड़ेदान के हवाले कर देनी चाहिए थी, यही सच्ची गुरुदक्षिणा भी होती. क्योंकि उसमें साहित्यभाव का लेश भी नहीं है. वह आत्मरति की कविता है, जो किसी कामुक व्यक्ति को ही सुख पहुंचा सकती है. सुरंजन एक भावुक और अनुभवी संपादक है, आशा है आगे से रचना के चयन का आधार इस बात को बनाएंगे कि वह समाज को आखिर क्या दे सकती है. गुरुदक्षिणा के और कई रास्ते हैं. पत्रिका अपने आप में एक सार्वजनिक मंच होती है, उसका उपयोग निजी सुख या अनुकंपा के लिए नहीं किया जाना चाहिएपर सुरंजन माने तब ना!

वैसे यह वर्ष सुरंजन के लिए खास रहा है. उनकी बड़ी बहू का आगमन हुआ है. मेरी कामना है कि घर में जल्द ही किलकारी गूंजे और मैं उनके चेहरे पर दादा की मुस्कान देखूं

 

 

ओमप्रकाश कश्यप

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