बीमाः संकट में सहयोग

स्वातंत्रयोत्तर भारत में बात उन परिवर्तनों के जिक्र से शुरू की जा सकती है जो इन सतावन सालों में दृष्टिगत हुए हैं. जिन्होंने न केवल हमारी जीवन-शैली को बदल देने में कामयाबी हासिल की है, बल्कि कुछ ऐसी परंपराओं की नींव भी डाली है, जो इससे पूर्व अस्तित्व में ही नहीं थीं. आधुनिक तेज गति जीवन उन परंपराओं को पूरी तरह बदल चुका है, जिन्हें कभी भारतीय समाज-व्यवस्था का मूलाधार माना जाता था. पहले अस्सी प्रतिशत जनता ग्रामवासिनी थी. इधर के वर्षों में औद्योगीकरण और व्यावसायीकरण की तीव्र गति ने शहरीकरण को बढ़ावा दिया है. परिणामतः शहरी जनता का अनुपात करीब तीस प्रतिशत तक पहुंच चुका है. संचारक्रांति ने शहरों और गांवों के बीच पुल का निर्माण किया है. जिससे वहां भी शहरी संस्कृति का विकास हो रहा है. वहीं दूसरी और अतिआधुनिकता से उकताए लोग, शहरों में ग्राम्यः संस्कृति का टोटम रच रहे हैं. गांवों में भी-गरीबी की मार, बड़ी जोतों के सिकुड़ने, प्रतिभा पलायन से परंपरागत संयुक्त परिवार का ढांचा बिखरा है. वे बड़ी तेजी से एकल परिवारों में टूटते जा रहे हैं. अंधस्पर्धा, महंगाई, उपभोक्ता-संस्कृति का मोह आदि कुछ ऐसे कारक हैं, जो एकल परिवारों पर आर्थिक असंतुलन का दबाव बनाए रहते हैं. अतः परिवारों के अधिकाधिक वयस्क सदस्यों का आमदनी वाले कार्यों से जुड़ना, आधुनिक जीवन की आवश्यकता बनता जा रहा है.
अत्याधुनिक खोजों ने आदमी को अधिक सुविधासंपन्न बनाया है, वहीं खतरे की संभाव्यता में भी वृद्धि की है. आधुनिक जीवन की विसंगति यह भी है कि मनुष्य की जोखिमों को सहने की क्षमता निरंतर घटी है. कारण यह है कि एकल परिवारों में जोखिम सहने का सामथ्र्य, संयुक्त परिवारों की अपेक्षा कम होता है. पूरा परिवार एक या दो सदस्यों की आमदनी पर टिका रहता है. ऐसे में उनमें से किसी एक या उसके व्यवसाय को होने वाली हानि से पूरा परिवार तबाह हो जाता है. संयुक्त परिवारों में कमाऊ सदस्यों की संख्या तथा पारस्परिक लगाव का आधिक्य होने के कारण, उनमें से किसी एक को होने वाला नुकसान बाकी सदस्यों में बंट जाता है. जिससे परिवार बिखराव से बचा रहता है.
संयुक्त समाजों में, व्यावसायीकरण एवं औद्योगीकरण की नीति के चलते, संयुक्त परिवारों का बचे रहना संभव नहीं रहा है. ऐसे में एकल परिवारों को संकट के समय सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए कुछ वैकल्पिक व्यवस्थाएं की गई हैं. जीवनबीमा उन्हीं में से एक है. यह मनुष्य के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है. चूंकि जोखिम की आमद कभी और किसी भी रूप में हो सकती है, इसलिए बीमा भी वस्तु , व्यक्ति या व्यवसाय आधारित अनेक रूपों में पनपा है. कुछ इस तरह से कि यह हमारे आधुनिक जीवन की आवश्यकता बन चुका है. कल्याण सरकार में चूंकि नागरिकों के हितों की सुरक्षा का दायित्व सरकार का होता है. अतएव बीमा को आधुनिक सरकारों द्वारा भरपूर समर्थन दिया जाता है.
यह सच है कि बीमा की संकल्पना संकटकाल में आसन्न विपत्ति के रूप में सिर आ पड़ने वाली समस्याओं का सामना करने के लिए की गई थी. किंतु आधुनिक काल में उसके विभिन्न रूप सामने आए हैं. शिक्षा , वृद्धावस्था, विकलांगता, मृत्यु जैसी परिस्थितियों में भी बीमा कंपनियां पीड़ित व्यक्ति या उसके परिवार की विश्वसनीय मददगार के रूप में साथ खड़ी होती हैं.
यह सच है कि दुनिया की सभी बीमा कंपनियां अपने व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखकर काम करती हैं. किंतु उनके व्यवसाय की प्रकृति ही ऐसी होती हैे कि बीमित व्यक्ति के नुकसान की भरपाई करने के बावजूद वे मुनाफे की स्थिति में रहती है. यद्यपि यह लाभ केवल सामान्य अवस्था में ही संभव होता है. यदि किसी विशेष बीमित व्यक्ति के संदर्भ में देखा जाए तो लाभ की स्थिति केवल बीमित व्यक्ति के जोखिम से बचे रहने तक ही संभव होती है. वैसी अवस्था में बीमा कंपनी उस धनराशि को पचा जाती है जो बीमित व्यक्ति या संस्था ने प्रीमियम के रूप में जमा की थी, अथवा तय शर्तों के अनुसार उसे साधारण ब्याज के साथ लौटा दिया जाता है. मगर जैसे ही वह बीमित व्यक्ति जोेखिम की स्थिति में आता है, हालात एकदम बदल जाते हैं. तब बीमा कंपनी को प्रायः बीमित व्यक्ति या संस्था द्वारा जमा कराए गए प्रीमियम से ज्यादा धनराशि का भुगतान करना पड़ता है, और उस व्यक्ति या संस्था विशेष के संदर्भ में वह नुकसान की स्थिति में आ जाती है.
यह कोई जादुई या चमत्कारी बात नहीं है, बल्कि गणित के एक लोकप्रिय नियम पर आधारित है. बीमा कंपनियों का एक सीधा-सा अर्थशास्त्रा यह है कि जो बात किसी एक व्यक्ति के लिए महज एक संयोग है, अर्थात किसी प्रकरण विशेष में जिसका अनुमान लगा पाना संभव नही होता, वह समूह के लिए पूर्वानुमान-योग्य हो जाती है. इतनी कि उसके आधार पर सामान्य नियम बनाए जा सकते हैं. ठीक ऐसे ही जैसे कि 15, जून-2010 के दिन के तापमान के बारे में ठीक-ठीक कुछ भी बता पाना संभव नहीं है. वह बहुत कुछ उस दिन के मौसम पर निर्भर होगा. उस दिन तेज गर्मी से पारा 45 डिग्री सेलसियस को पार भी कर सकता है, अथवा धूप-बारिश-अंधड़ आदि के संयुक्त प्रभाव से तापमान तीस डिग्री से नीचेे भी गिर सकता है. परंतु जून-2010 के तापमान के बारे में, विगत वर्षों के अनुभव के आधार पर आप एक निश्चित-सा अनुमान लगा सकते हैं. हम कह सकते हैं कि उस दिन या महीने का औसत तापमान करीब 44 डिग्री सेलसियस होगा. इस अनुमान के आधार पर सामान्य नियम बनाए जा सकते हैं.
इसे एक और उदाहरण के द्वारा भी समझ सकते हैं. मान लीजिए अलादीन नाम का एक युवक है, जिसकी वर्तमान आयु तीस वर्ष है. अब इस बारे में कोई भी दावे के साथ नहीं कह सकता कि वह युवक आगे बीस सालों तक और जिएगा या नहीं. किंतु राजधानी में इस समय तीस वर्ष के यदि पांच लाख युवक हैं तो संभाव्यता के नियम के आधार पर यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि उनमें से पचास की अवस्था तक पहुंचने वाले युवक कितने प्र्रतिशत होंगे. सरकारी- गैरसरकारी सभी आकलन इसी आधार पर किए जाते हैं.
इसी सिद्धांत के आधार पर बीमा कंपनियां अपनी योजनाएं बनाती हैं. संभाव्यता का लोकजीवन में एक और उदाहरण जुआ है. यदि दो व्यक्ति जुआ खेेल रहे हों तो उनमें से प्रत्येक की जीत की संभावना केवल पचास प्रतिशत होगी. अब यहां एक सवाल पैदा हो जाता है कि एक ही नियम पर आधारित होने के बावजूद जुआ क्यों नुकसानदेह होता है. इसका सीधा-सा उत्तर यह है कि एक तो साथ-साथ जुआ खेल रहे व्यक्तियों की संख्या, बीमित व्यक्तियों की अपेक्षा बहुत कम यानी नगण्य होती है. दूसरे जोखिम की स्थिति में उसकी भरपाई के लिए उनके पास कोई वैकल्पिक सक्षम तंत्रा नहीं होता. जबकि बीमित व्यक्ति की पीठ पर बीमा कंपनी का हाथ होता है जो उसके नुकसान को उन शेष बीमित सदस्यों में बांट देता है जो जोखिम से दूर हैं. स्पष्ट है कि बीमा में जोखिम घट जाता है, साथ ही व्यक्ति को संकटकाल में मदद का भरोसा बना रहता है, जो उसको दूसरी अनेक चिंताओं से मुक्त रखता है.
जुआरी की भांति हालांकि बीमित व्यक्ति भी जमा की गई प्र्रीमियम की रकम को दांव पर लगाता है. तो भी, यह मानना गलत होगा कि वह जुआ खेलता है. सचाई यह है कि जो व्यक्ति बीमा नहीं कराता वह जुआ खेल रहा होता है. क्योंकि उस अवस्था में अपने नुकसान की भरपाई अकेले ही करनी पड़ती है. उदाहरण के लिए फैक्ट्री मालिक जिसके कारखाने में पचास लाख का माल भरा हो, बीमा की स्थिति में प्रीमियम के रूप में मामूली रकम जमा कराता है. यदि वह जोखिम से बचा रहता है तो उसके प्रीमियम की राशि या तो डूब जाएगी अथवा वह उसपर बहुत कम लार्भाजन कर पाएगा. लेकिन दुर्योग से यदि कारखाने में आग या किसी और आपदा से तबाही मच जाए तो गैरबीमित व्यक्ति बरबाद हो जाएगा. क्योंकि वैसी स्थिति में आपदा से हुई तबाही से उबरने के लिए कोई वैकल्पिक इंतजाम उसके पास नहीं होगा. अतएव जो व्यक्ति बीमा नहीं कराता , वह भी एक तरह से जुआ ही खेल रहा होता है.
अर्थशास्त्र का प्रसिद्ध ‘ह्रासमान का नियम’ भी बीमा के पक्ष में जाता है. जिसके अनुसार दांव जीतने से मिलने वाली संतुष्टि, दांव हारने में मिलने वाली असंतुष्टि की तुलना में प्र्रायः कम ही होती है. यही बात बीमा कंपनी के पक्ष में जाती है. इसलिए कि वहां दांव हारने की स्थिति में असंतुष्टि से बचाव के लिए बीमा कंपनी, बीमित व्यक्ति के साथ होती है. अर्थशास्त्रा का एक नियम यह भी है कि विभिन्न व्यक्तियों में उचित रूप से बांटी गई स्थिर आय, आर्थिक रूप से अस्थिर आय की अपेक्षा श्रेष्टतर होती है जो, उन भाग्यहीन व्यक्तियों के हिस्से में आती है जिनके पास नुकसान की भरपाई के लिए बेहतर विकल्प नहीं होते.
आधुनिक जीवन की जटिलताओं को देखते हुए जोखिम की संभावना को पूर्णतः टाल पाना संभव ही नहीं है. मगर ऐसे उपाय अवश्य किए जा सकते हैं जिनसे कम से कम आर्थिक नुकसान, की भरपाई संभव हो सके. आधुनिक भागमभाग भरे जीवन में बीमा इसीलिए अपरिहार्य होता जा रहा है.
भारत के ही संदर्भ में लें तो देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी ‘जीवन बीमा निगम’ की प्रगति का ग्र्र्राफ उत्तरोत्तर ऊपर की ओर चढ़ता जा रहा है. निगम द्वारा बीमित सदस्यों/संस्थाओं की संख्या करोड़ों में है. अकेले वर्ष 2002-2003 के दौरान निगम ने 2,45,29,946 पा॓लसियों में लगभग 1,79,811/- करोड़ रुपए का बीमा-व्यवसाय किया और पहली प्रीमियम आय के रूप में 9571.39 करोड़ रुपए जमा किए. निगम द्वार यह धनराशि सरकार द्वारा अनुमोदित विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में निवेश की जाती है. सहकारी चीनी मिलों, हाॅउसिंग, बिजली , सड़क परिवहन, सिंचाई , जल आपूर्ति एवं मल निकासी, उद्योगों आदि में निगम द्वारा वर्ष 2002-2003 तक 2,65,044.47 करोड़ रुपयों का निवेश किया जा चुका है, जो देश के किसी भी अकेले सार्वजनिक प्रतिष्ठान द्वारा सरकारी योजनाओं में किए गए निवेश से कहीं ज्यादा है. इस प्रकार बीमा के रूप में किया गया निवेश न केवल आपदा के समय बीमित व्यक्ति का मददगार बनता है बल्कि विभिन्न कल्याण कार्यक्रमों के रूप अप्रत्यक्ष सामाजिक लाभ भी देता है. फसल बीमा और पशु आधारित बीमा ने ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों और खेतिहर मजदूरों के बीच नई चेतना का संचार किया है. यही कारण है बीमा के प्रति लोगों का आकर्षण निरंतर बढ़ता जा रहा है.
जीवनबीमा निगम के अलावा और भी कई सरकारी-गैरसरकारी बीमा कंपनियां इन दिनों बाजार में हैं. जिनके बीच स्पर्धा का हमेशा माहौल बना रहता है. भारतीय जीवनबीमा निगम को छोेड़कर बाकी सभी की पहुंच अभी तक केवल शहरों और बड़े कस्बों तक ही सीमित है. ग्रामीण जनता का भरोसा भी जीवनबीमा जैसी भारतीय मूल की सरकारी कंपनियों के साथ है, शायद इसलिए कि उन्हें सरकारी संरक्षण प्राप्त है और संभवतः इसलिए भी कि उनकी योजनाओं की रूपरेखा भारतीय परिवेश और कल्याण सरकार की अवधारणाओं के अनुकूल बनाई गई है.

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